नागर खण्ड · अध्याय 188
मातृगणगमन एवं सावित्रीदत्त-मातृगणशाप वर्णन
श्लोक 1 (skanda.6.188.1)
सूत उवाच । ततस्तु पंचमे चाह्नि संजाते ते द्विजोत्तमाः । श्वेतधौतांबराः सर्वे सुस्नाताः शुचयः स्थिताः
sūta uvāca tatastu paṁcame cāhni saṁjāte te dvijottamāḥ śvetadhautāṁbarāḥ sarve susnātāḥ śucayaḥ sthitāḥ
सूत जी ने कहा — फिर पाँचवाँ दिन आने पर, हे द्विजोत्तमो, वे सभी श्वेत धुले वस्त्र पहने, भलीभाँति स्नान किए, पवित्र होकर खड़े हुए।
श्लोक 2 (skanda.6.188.2)
चक्रुः सर्वाणि कर्माणि पुलस्त्येन प्रबोधिताः । सदोमध्ये गताश्चैव ऋत्विग्वरणपूर्वकाः
cakruḥ sarvāṇi karmāṇi pulastyena prabodhitāḥ sadomadhye gatāścaiva ṛtvigvaraṇapūrvakāḥ
पुलस्त्य के निर्देशानुसार उन्होंने सभी कर्म सम्पन्न किए, और ऋत्विजों का वरण करके सभा के मध्य में गए।
श्लोक 3 (skanda.6.188.3)
अध्वर्युणा समादिष्टान्प्रैषान्प्रोचुर्यथा क्रमम् । होमार्थं दीप्तवह्नौ च ऋत्विग्भिः सुसमाहितैः
adhvaryuṇā samādiṣṭānpraiṣānprocuryathā kramam homārthaṁ dīptavahnau ca ṛtvigbhiḥ susamāhitaiḥ
अध्वर्यु द्वारा निर्धारित होम हेतु प्रैष (आदेश) उन्होंने क्रमशः कहे, प्रज्वलित अग्नि में, सुसमाहित ऋत्विजों के साथ।
श्लोक 4 (skanda.6.188.4)
एतस्मिन्नेव काले तु ह्युद्गात्रा कर्म योजितम् । शंकुभिः क्रियते यच्च साम गीतिप्रसूचितम्
etasminneva kāle tu hyudgātrā karma yojitam śaṁkubhiḥ kriyate yacca sāma gītiprasūcitam
इसी समय उद्गाता का कर्म आरम्भ हुआ — शंकुओं द्वारा सूचित साम-गान।
श्लोक 5 (skanda.6.188.5)
सप्तावर्तं द्विजश्रेष्ठाः सदोमध्यगतेन च । यत्राऽऽगच्छंति ते सर्वे देवा यज्ञांशलालसाः
saptāvartaṁ dvijaśreṣṭhāḥ sadomadhyagatena ca yatrā''gacchaṁti te sarve devā yajñāṁśalālasāḥ
हे द्विजश्रेष्ठो, सभा के मध्य में सात बार, जहाँ यज्ञभाग के लोभी समस्त देवगण आते हैं —
श्लोक 6 (skanda.6.188.6)
सोमपानकृते चैव विशेषेण मुदान्विताः । प्रारब्धे सोमभक्ष्येऽथ गीते चोद्गातृनिर्मिते
somapānakṛte caiva viśeṣeṇa mudānvitāḥ prārabdhe somabhakṣye'tha gīte codgātṛnirmite
विशेषतः सोमपान के लिए प्रसन्न होकर; सोमभक्षण आरम्भ होने पर, उद्गाता द्वारा किए गए गान के साथ,
श्लोक 7 (skanda.6.188.7)
आगता कन्यका चैका सामगीतिसमुत्सुका । शंकुकर्णनजं चित्रं वांछमाना विचक्षणा
āgatā kanyakā caikā sāmagītisamutsukā śaṁkukarṇanajaṁ citraṁ vāṁchamānā vicakṣaṇā
एक कन्या वहाँ आ पहुँची, साम-गान सुनने की उत्सुक, चतुर, शंकु द्वारा उत्पन्न विचित्र गति देखने की इच्छुक,
श्लोक 8 (skanda.6.188.8)
छन्दोगस्य सुता श्रेष्ठा देवशर्माभिधस्य च । औदुम्बरीति नाम्ना सा सामश्रवणलालसा
chandogasya sutā śreṣṭhā devaśarmābhidhasya ca audumbarīti nāmnā sā sāmaśravaṇalālasā
छन्दोग देवशर्मा नामक ब्राह्मण की श्रेष्ठ पुत्री, औदुम्बरी नाम की, साम सुनने की लालसा से युक्त।
श्लोक 9 (skanda.6.188.9)
उद्गातारं च सदसि वचनं व्याजहार सा । यथायथा प्रवर्तंते शंकवः सामसूचिताः
udgātāraṁ ca sadasi vacanaṁ vyājahāra sā yathāyathā pravartaṁte śaṁkavaḥ sāmasūcitāḥ
उसने सभा में उद्गाता से यह वचन कहा — "जिस प्रकार साम द्वारा सूचित शंकु आगे बढ़ते हैं —"
श्लोक 10 (skanda.6.188.10)
दक्षिणाग्नौ द्रुतं गत्वा कुरु होमं यथोदितम् । येन त्वं मुच्यसे पापान्न चेद्व्यर्थो भविष्यति
dakṣiṇāgnau drutaṁ gatvā kuru homaṁ yathoditam yena tvaṁ mucyase pāpānna cedvyartho bhaviṣyati
"दक्षिणाग्नि में शीघ्र जाकर विधिपूर्वक होम करो, जिससे तुम पापों से मुक्त हो जाओगे — अन्यथा यह व्यर्थ हो जाएगा।"
श्लोक 11 (skanda.6.188.11)
तस्यास्तद्वचनं श्रुत्वा साभिप्रायं द्विजोत्तमाः । ततः स चिन्तयामास यावत्तद्व्याहृतं वचः
tasyāstadvacanaṁ śrutvā sābhiprāyaṁ dvijottamāḥ tataḥ sa cintayāmāsa yāvattadvyāhṛtaṁ vacaḥ
उसका यह अभिप्रायपूर्ण वचन सुनकर, हे द्विजोत्तमो, उन्होंने उतनी देर तक विचार किया जितनी देर वह वचन कहा गया था।
श्लोक 12 (skanda.6.188.12)
ततः पप्रच्छ तां कन्यामुद्गाता विस्मयान्वितः । कुतस्त्वमसि चाऽऽयाता सुता कस्य वदस्व मे
tataḥ papraccha tāṁ kanyāmudgātā vismayānvitaḥ kutastvamasi cā''yātā sutā kasya vadasva me
तब उद्गाता ने आश्चर्यचकित होकर उस कन्या से पूछा — "तुम कहाँ से आई हो? किसकी पुत्री हो? मुझे बताओ।"
श्लोक 13 (skanda.6.188.13)
औदुम्बर्युवाच । पर्वतस्य सुता चास्मि विख्याता देवशर्मणः । जातिस्मरा महाभाग प्राप्ता गन्धर्वलोकतः
audumbaryuvāca parvatasya sutā cāsmi vikhyātā devaśarmaṇaḥ jātismarā mahābhāga prāptā gandharvalokataḥ
औदुम्बरी ने कहा — "मैं देवशर्मा की, विख्यात पर्वत की पुत्री हूँ; हे महाभाग, पूर्वजन्म का स्मरण रखते हुए मैं गन्धर्वलोक से आई हूँ।"
श्लोक 14 (skanda.6.188.14)
उद्गातोवाच । गन्धर्वस्य सुता कस्य केन शप्तासि पुत्रिके । कदा ते भविता मोक्षो मानुषत्वस्य कीर्त्तय
udgātovāca gandharvasya sutā kasya kena śaptāsi putrike kadā te bhavitā mokṣo mānuṣatvasya kīrttaya
उद्गाता ने कहा — "तुम किस गन्धर्व की पुत्री हो, और किसने तुम्हें शाप दिया, हे पुत्रिके? तुम्हारी मानुषत्व से मुक्ति कब होगी? बताओ।"
श्लोक 15 (skanda.6.188.15)
औदुम्बर्युवाच । नारदः पर्वतश्चैव गन्धर्वौ विदितौ जनैः । पर्वतस्य सुता चास्मि शप्ताहं नारदेन हि
audumbaryuvāca nāradaḥ parvataścaiva gandharvau viditau janaiḥ parvatasya sutā cāsmi śaptāhaṁ nāradena hi
औदुम्बरी ने कहा — "नारद और पर्वत — ये दो गन्धर्व लोगों में विख्यात हैं; मैं पर्वत की पुत्री हूँ, और मुझे नारद ने ही शाप दिया था।"
श्लोक 16 (skanda.6.188.16)
विपंचीं वादयन्स्वैरं दृष्टः स मुनिसत्तमः । अजानंत्या च तानानां विशेषं मूर्च्छनोद्भवम् । मया स हसितोऽतीव तानभंगतया गतः । ततः स कुपितो मह्यं ददौ शापं द्विजोत्तमः । मिथ्यापहसितो यस्मादहं शापमतोऽर्हसि
vipaṁcīṁ vādayansvairaṁ dṛṣṭaḥ sa munisattamaḥ ajānaṁtyā ca tānānāṁ viśeṣaṁ mūrcchanodbhavam mayā sa hasito'tīva tānabhaṁgatayā gataḥ tataḥ sa kupito mahyaṁ dadau śāpaṁ dvijottamaḥ mithyāpahasito yasmādahaṁ śāpamato'rhasi
"उस मुनिश्रेष्ठ को स्वच्छन्दतापूर्वक विपंची (वीणा) बजाते देखा; स्वरों की विशेष मूर्च्छना (झंकार) को न जानते हुए मैंने उन्हें बहुत हँसा, क्योंकि वे तान से भटक गए थे। तब वे क्रुद्ध होकर, हे द्विजोत्तमो, मुझे शाप देने लगे — 'चूँकि मुझे मिथ्या उपहासित किया गया है, इसलिए तू इस शाप की पात्र है।'"
श्लोक 17 (skanda.6.188.17)
मानुषाणामयं धर्मस्तस्मात्त्वं मानुषी भव । मया प्रसादितः सोऽथ पित्रा सार्धं मुनीश्वरः
mānuṣāṇāmayaṁ dharmastasmāttvaṁ mānuṣī bhava mayā prasāditaḥ so'tha pitrā sārdhaṁ munīśvaraḥ
"'यह मनुष्यों का धर्म है, इसलिए तू मनुष्य बन जा।' तब पिता सहित मेरे द्वारा प्रसन्न किए गए वे मुनीश्वर —"
श्लोक 18 (skanda.6.188.18)
शापांतं कुरु मे नाथ बालिशाया विशेषतः । मानुषत्वं च मे भूयात्सुस्थाने सुकुले विभो
śāpāṁtaṁ kuru me nātha bāliśāyā viśeṣataḥ mānuṣatvaṁ ca me bhūyātsusthāne sukule vibho
"'हे नाथ, विशेष रूप से बालिका होने के कारण मेरा शापांत करो; मेरा मानुषत्व सुस्थान और सुकुल में हो, हे विभो —"
श्लोक 19 (skanda.6.188.19)
सुस्थाने चांतकालश्च ब्राह्मणस्य निवेशने । ततोऽहं तेन संप्रोक्ता चमत्कारपुरें शुभे देवशर्मा तु विप्रेंद्रः कुलीनः सर्वशास्त्रवित् । तस्य तु ब्राह्मणी नाम्ना सत्यभामेति विश्रुता
susthāne cāṁtakālaśca brāhmaṇasya niveśane tato'haṁ tena saṁproktā camatkārapureṁ śubhe devaśarmā tu vipreṁdraḥ kulīnaḥ sarvaśāstravit tasya tu brāhmaṇī nāmnā satyabhāmeti viśrutā
"'सुस्थान में हो, और मृत्यु के समय भी ब्राह्मण के घर में हो।' तब उन्होंने मुझसे कहा — 'शुभ चमत्कारपुर में।' देवशर्मा कुलीन, सर्वशास्त्रवेत्ता श्रेष्ठ ब्राह्मण हैं; उनकी पत्नी सत्यभामा नाम से विख्यात है।"
श्लोक 20 (skanda.6.188.20)
तस्या गर्भं समासाद्य मानुषत्वं समाचर । यदा पैतामहो यज्ञस्तस्मिन्क्षेत्रे भविष्यति
tasyā garbhaṁ samāsādya mānuṣatvaṁ samācara yadā paitāmaho yajñastasminkṣetre bhaviṣyati
"'उसके गर्भ में प्रवेश करके मानुषत्व धारण करो; जब उस क्षेत्र में पितामह का यज्ञ होगा,"
श्लोक 21 (skanda.6.188.21)
उद्गातुः समये तस्य शंकोश्चैव विपर्यये । तदा तु स त्वया वाच्यो ह्यस्थाने शंकुराहितः । सर्वदेवसभा मध्ये तदा मोक्षो भविष्यति
udgātuḥ samaye tasya śaṁkoścaiva viparyaye tadā tu sa tvayā vācyo hyasthāne śaṁkurāhitaḥ sarvadevasabhā madhye tadā mokṣo bhaviṣyati
"'उद्गाता के कर्मकाल में, शंकु के विपर्यय (गलत स्थापन) के समय — तब उससे यही कहा जाएगा कि शंकु अनुचित स्थान पर रखा गया है, समस्त देवसभा के मध्य; तभी तुम्हारी मुक्ति होगी।'"
श्लोक 22 (skanda.6.188.22)
इमां मे दैविकीं कांतां तनुं पश्य द्विजोत्तम । विमानं पश्य चायातं पित्रा संप्रेषितं मम । उद्गातोवाच । तुष्टोऽहं ते विशालाक्षि यज्ञस्याऽविघ्नकारके । न वृथा दर्शनं मे स्याद्विशेषाद्देवसंभवे । वरं वरय मत्तस्त्वं तस्मादौदुम्बरीप्सितम्
imāṁ me daivikīṁ kāṁtāṁ tanuṁ paśya dvijottama vimānaṁ paśya cāyātaṁ pitrā saṁpreṣitaṁ mama udgātovāca tuṣṭo'haṁ te viśālākṣi yajñasyā'vighnakārake na vṛthā darśanaṁ me syādviśeṣāddevasaṁbhave varaṁ varaya mattastvaṁ tasmādaudumbarīpsitam
"हे द्विजोत्तम, मेरी इस दिव्य, सुन्दर देह को देखो; मेरे पिता द्वारा भेजा गया विमान भी देखो जो आ पहुँचा है।" उद्गाता ने कहा — "हे विशालाक्षि, यज्ञ में विघ्न को रोकने वाली तुमसे मैं प्रसन्न हूँ; मेरा तुम्हारा दर्शन व्यर्थ न हो, विशेषतः जब तुम दिव्य उत्पत्ति की हो। इसलिए मुझसे वर माँगो, जो भी औदुम्बरी को अभीष्ट हो।"
श्लोक 23 (skanda.6.188.23)
औदुम्बर्युवाच । यदि मे यच्छसि वरं सन्तुष्टो ब्राह्मणोत्तम । सर्वेषामेव देवानां पुरतश्च ददस्व तम्
audumbaryuvāca yadi me yacchasi varaṁ santuṣṭo brāhmaṇottama sarveṣāmeva devānāṁ purataśca dadasva tam
औदुम्बरी ने कहा — "यदि तुम प्रसन्न होकर मुझे वर देते हो, हे ब्राह्मणोत्तम, तो समस्त देवताओं के सामने ही दो।"
श्लोक 24 (skanda.6.188.24)
अद्यप्रभृति यः कश्चिद्यज्ञं भूमौ समाचरेत् । तस्मिन्सदसि मध्यस्था मूर्तिः कार्या यथा मम
adyaprabhṛti yaḥ kaścidyajñaṁ bhūmau samācaret tasminsadasi madhyasthā mūrtiḥ kāryā yathā mama
"आज से जो भी पृथ्वी पर यज्ञ करेगा — उस सभा में मेरे समान एक मध्यस्थ मूर्ति बनाई जाए।"
श्लोक 25 (skanda.6.188.25)
ततो मत्पुरतश्चैव कार्यं शंकुप्रचारणम् । स्वर्गस्थाया भवेत्तुष्टिर्मम तेन कृतेन च
tato matpurataścaiva kāryaṁ śaṁkupracāraṇam svargasthāyā bhavettuṣṭirmama tena kṛtena ca
"फिर मेरे सामने ही शंकु-प्रचारण किया जाए; उस कर्म से स्वर्गस्थ मुझे संतुष्टि प्राप्त होगी।"
श्लोक 26 (skanda.6.188.26)
सूत उवाच । तस्यास्तद्वचनं श्रुत्वा उद्गाता तामथाब्रवीत् । अद्यप्रभृति यः कश्चिद्यज्ञमत्र करिष्यति
sūta uvāca tasyāstadvacanaṁ śrutvā udgātā tāmathābravīt adyaprabhṛti yaḥ kaścidyajñamatra kariṣyati
सूत जी ने कहा — उसका यह वचन सुनकर उद्गाता ने तब उससे कहा — "आज से जो भी यहाँ यज्ञ करेगा —"
श्लोक 27 (skanda.6.188.27)
सदोमध्ये तु तां स्थाप्य पूजयित्वा विलेपनैः । वस्त्रैराभरणैश्चैव गन्धपुष्पानुलेपनैः
sadomadhye tu tāṁ sthāpya pūjayitvā vilepanaiḥ vastrairābharaṇaiścaiva gandhapuṣpānulepanaiḥ
"तुम्हें सभा के मध्य में स्थापित करके, उबटन, वस्त्र, आभूषण तथा सुगन्धित पुष्प-अनुलेपन से पूजा करके,"
श्लोक 28 (skanda.6.188.28)
ततः शंकुप्रचारं तु करिष्यति तदग्रतः । एतद्वाक्यं मया प्रोक्तं सर्वदेवसमा गमे
tataḥ śaṁkupracāraṁ tu kariṣyati tadagrataḥ etadvākyaṁ mayā proktaṁ sarvadevasamā game
"तुम्हारे सामने ही शंकु-प्रचारण करेगा। यह वचन मैंने समस्त देवताओं की सभा में कहा है।"
श्लोक 29 (skanda.6.188.29)
नान्यथा भावि भद्रं ते त्वं संतोषं परं व्रज । त्वया विरहितं भद्रे सदःकर्म करिष्यति
nānyathā bhāvi bhadraṁ te tvaṁ saṁtoṣaṁ paraṁ vraja tvayā virahitaṁ bhadre sadaḥkarma kariṣyati
"यह अन्यथा नहीं होगा, हे भद्रे; अब तुम परम संतोष को प्राप्त हो। तुम्हारे बिना सभा का कर्म व्यर्थ हो जाएगा —"
श्लोक 30 (skanda.6.188.30)
वृथा भावि च तत्सर्वं यथा भस्महुतं तथा । या नारी सदसो मध्ये फलैस्त्वां पूजयिष्यति
vṛthā bhāvi ca tatsarvaṁ yathā bhasmahutaṁ tathā yā nārī sadaso madhye phalaistvāṁ pūjayiṣyati
"वह सब भस्म में डाले हुए हवन के समान व्यर्थ हो जाएगा। जो नारी सभा के मध्य में फलों से तुम्हारी पूजा करेगी,"
श्लोक 31 (skanda.6.188.31)
फलेफले कोटिगुणं तस्याः श्रेयो भविष्यति । सफलाश्च दिशः सर्वा भविष्यंति न संशयः
phalephale koṭiguṇaṁ tasyāḥ śreyo bhaviṣyati saphalāśca diśaḥ sarvā bhaviṣyaṁti na saṁśayaḥ
"उसके लिए प्रत्येक फल पर करोड़गुना पुण्य होगा, और उसकी सभी दिशाएँ सफल होंगी, इसमें संदेह नहीं।"
श्लोक 32 (skanda.6.188.32)
वस्त्रमाभरणं या च पुष्पधूपादिकं तथा । तुभ्यं दास्यति तत्सर्वं तस्याः कोटिगुणं फलम्
vastramābharaṇaṁ yā ca puṣpadhūpādikaṁ tathā tubhyaṁ dāsyati tatsarvaṁ tasyāḥ koṭiguṇaṁ phalam
"जो नारी तुम्हें वस्त्र, आभूषण, धूप आदि देगी, उसे उसका करोड़गुना फल प्राप्त होगा।"
श्लोक 33 (skanda.6.188.33)
परं तावत्प्रतीक्षस्व मा विमानं समारुह । देवि केनापि कार्येण तव पूजां समाचरे
paraṁ tāvatpratīkṣasva mā vimānaṁ samāruha devi kenāpi kāryeṇa tava pūjāṁ samācare
"किन्तु अभी थोड़ी देर प्रतीक्षा करो — हे देवि, विमान पर मत चढ़ो; किसी कार्य से मैं तुम्हारी पूजा करूँगा।"
श्लोक 34 (skanda.6.188.34)
देवा ऊचुः । युक्तं त्वया द्विजश्रेष्ठ वचनं समुदाहृतम् । अस्माकमपि वाक्येन सत्यमेतद्भविष्यति
devā ūcuḥ yuktaṁ tvayā dvijaśreṣṭha vacanaṁ samudāhṛtam asmākamapi vākyena satyametadbhaviṣyati
देवताओं ने कहा — "हे द्विजश्रेष्ठ, तुमने जो वचन कहा है, वह उचित है; हमारे वचन से भी यह सत्य होगा।"
श्लोक 35 (skanda.6.188.35)
सूत उवाच । उद्गात्रा सैतमुक्ता च तिष्ठतिष्ठेत्यथोदिता । देवी वरविमानेन गृहीता सांऽबरे स्थिता
sūta uvāca udgātrā saitamuktā ca tiṣṭhatiṣṭhetyathoditā devī varavimānena gṛhītā sāṁ'bare sthitā
सूत जी ने कहा — उद्गाता द्वारा "ठहरो, ठहरो" कहे जाने पर वह देवी वहीं श्रेष्ठ विमान द्वारा धारण की हुई, आकाश में खड़ी रह गई।
श्लोक 36 (skanda.6.188.36)
एतस्मिन्नेव काले तु देवशर्मसुताऽभवत् । देवी नगरमध्यस्थां सर्वा नार्यो द्विजोत्तमाः
etasminneva kāle tu devaśarmasutā'bhavat devī nagaramadhyasthāṁ sarvā nāryo dvijottamāḥ
इसी समय, हे द्विजोत्तमो, नगर की समस्त स्त्रियों ने देवशर्मा की पुत्री को देवी बना हुआ सुना,
श्लोक 37 (skanda.6.188.37)
कुतूहलात्समायातास्तस्या दर्शनलालसाः । काचित्फलानि चादाय काचिद्वस्त्राणि भक्तितः । यथार्हं पूजिता ताभिः सर्वाभिश्च द्विजोत्तमाः
kutūhalātsamāyātāstasyā darśanalālasāḥ kācitphalāni cādāya kācidvastrāṇi bhaktitaḥ yathārhaṁ pūjitā tābhiḥ sarvābhiśca dvijottamāḥ
और कौतूहलवश उसे देखने की इच्छा से आ पहुँचीं — कोई फल लेकर, कोई भक्तिपूर्वक वस्त्र लेकर; उन सबने उसकी यथोचित पूजा की, हे द्विजोत्तमो।
श्लोक 38 (skanda.6.188.38)
श्रुत्वा स्वदुहितुः सोऽपि देवशर्मा समाययौ । सपत्नीकः प्रहृष्टात्मा विस्मयोत्फुल्ललोचनः
śrutvā svaduhituḥ so'pi devaśarmā samāyayau sapatnīkaḥ prahṛṣṭātmā vismayotphullalocanaḥ
अपनी पुत्री की यह ख्याति सुनकर देवशर्मा भी पत्नी सहित वहाँ आ पहुँचे, प्रसन्नचित्त, आश्चर्यचकित नेत्रों वाले।
श्लोक 39 (skanda.6.188.39)
सोऽपि यावत्प्रणामं च तस्याश्चक्रे द्विजोत्तमाः । सपत्नीकस्तदा प्रोक्त्वा निषिद्धस्तु तथा तया
so'pi yāvatpraṇāmaṁ ca tasyāścakre dvijottamāḥ sapatnīkastadā proktvā niṣiddhastu tathā tayā
जैसे ही वे पत्नी सहित उसे प्रणाम करने लगे, हे द्विजोत्तमो, उसने उन्हें रोक दिया —
श्लोक 40 (skanda.6.188.40)
ताततात नमस्कारं मा मे कुरु सहांबया । प्राप्ता स्वर्गगतिर्नाम मम नाशं प्रयास्यति
tātatāta namaskāraṁ mā me kuru sahāṁbayā prāptā svargagatirnāma mama nāśaṁ prayāsyati
"हे तात, तात, माता सहित मुझे नमस्कार मत करो; मुझे प्राप्त यह स्वर्गगति मेरे ही नाश का कारण बन जाएगी।"
श्लोक 41 (skanda.6.188.41)
तिष्ठात्रैव सपत्नीको यावदद्य दिनं विभो । त्वामादाय सपत्नीकं यास्यामि त्रिदिवालयम् । अनेनैव शरीरेण याचयित्वा सुरोत्तमान्
tiṣṭhātraiva sapatnīko yāvadadya dinaṁ vibho tvāmādāya sapatnīkaṁ yāsyāmi tridivālayam anenaiva śarīreṇa yācayitvā surottamān
"हे विभो, आज इसी दिन तक पत्नी सहित यहीं रहो; तुम दोनों को साथ लेकर, इसी शरीर से, देवताओं की प्रार्थना करके, मैं स्वर्गलोक जाऊँगी।"
श्लोक 42 (skanda.6.188.42)
ततस्तौ हर्षितौ तत्र पितरौ हि व्यवस्थितौ । प्रेक्षमाणौ सुतायास्तां पूजां जनविनिर्मिताम् । मन्यमानौ तदात्मानमधिकं सर्व देहिनाम्
tatastau harṣitau tatra pitarau hi vyavasthitau prekṣamāṇau sutāyāstāṁ pūjāṁ janavinirmitām manyamānau tadātmānamadhikaṁ sarva dehinām
तब वे दोनों माता-पिता वहाँ प्रसन्न होकर खड़े रहे, लोगों द्वारा की गई अपनी पुत्री की इस पूजा को देखते हुए, स्वयं को समस्त प्राणियों से बढ़कर मानते हुए।
श्लोक 43 (skanda.6.188.43)
तस्य ये स्वजनाः केचित्सर्वे तेऽपि द्विजोत्तमाः । शंसमाना सुतां तां तु तत्समीपं व्यवस्थिताः
tasya ye svajanāḥ kecitsarve te'pi dvijottamāḥ śaṁsamānā sutāṁ tāṁ tu tatsamīpaṁ vyavasthitāḥ
और उनके जो भी स्वजन थे, हे द्विजोत्तमो, वे सब भी उस पुत्री की प्रशंसा करते हुए उसके समीप खड़े रहे।
श्लोक 44 (skanda.6.188.44)
एतस्मिन्नंतरे प्राप्तो भृगुर्यत्र पितामहः । निष्क्रम्य सदसस्तस्मात्कृताञ्जलिरुवाच तम्
etasminnaṁtare prāpto bhṛguryatra pitāmahaḥ niṣkramya sadasastasmātkṛtāñjaliruvāca tam
इसी बीच भृगु वहाँ पहुँचे जहाँ पितामह थे; सभा से बाहर निकलकर हाथ जोड़कर उनसे बोले —
श्लोक 45 (skanda.6.188.45)
उद्गात्रा देव चात्मीयो मार्गः श्रुतिविवर्जितः । विहितः कन्यकां धृत्वा सदोमध्ये सुरेश्वर
udgātrā deva cātmīyo mārgaḥ śrutivivarjitaḥ vihitaḥ kanyakāṁ dhṛtvā sadomadhye sureśvara
"हे देव, उद्गाता ने स्वयं ही श्रुति-विरुद्ध एक मार्ग बना दिया है — हे सुरेश्वर, सभा के मध्य में एक कन्या को स्थापित किया है।"
श्लोक 46 (skanda.6.188.46)
देवत्वं जल्पितं तस्या नागर्याः सुरसंनिधौ । सोमपानं तथा कुर्मो वयं तत्र तया सह
devatvaṁ jalpitaṁ tasyā nāgaryāḥ surasaṁnidhau somapānaṁ tathā kurmo vayaṁ tatra tayā saha
"देवताओं की उपस्थिति में इस नागर कन्या को देवत्व घोषित किया गया है; हम वहाँ उसके साथ ही सोमपान करते हैं।"
श्लोक 47 (skanda.6.188.47)
ततो विधिस्तमानीय पप्रच्छ द्विजसत्तमाः। काऽसौ कन्या किमर्थं च सदोमध्ये धृता त्वया। सोऽब्रवीच्छापभ्रष्टेयं गन्धर्वी ब्राह्मणालये । अवतीर्णा विधेर्यज्ञे मुक्तिरस्याः प्रकीर्तिता
tato vidhistamānīya papraccha dvijasattamāḥ kā'sau kanyā kimarthaṁ ca sadomadhye dhṛtā tvayā so'bravīcchāpabhraṣṭeyaṁ gandharvī brāhmaṇālaye avatīrṇā vidheryajñe muktirasyāḥ prakīrtitā
तब विधाता ने उसे बुलाकर पूछा, हे द्विजसत्तमो — "यह कन्या कौन है, और तुमने इसे सभा के मध्य में क्यों स्थापित किया?" उसने कहा — "यह शापभ्रष्ट गन्धर्वी है, अब ब्राह्मण के घर में है; विधाता के यज्ञ में यह अवतीर्ण हुई है — इसकी मुक्ति घोषित है।"
श्लोक 48 (skanda.6.188.48)
नारदेन पुरा देव कोपेन च तथा मुदा । तस्या देव वरो दत्तो मया तुष्टेन सांप्रतम्
nāradena purā deva kopena ca tathā mudā tasyā deva varo datto mayā tuṣṭena sāṁpratam
"हे देव, पूर्वकाल में नारद द्वारा क्रोध में, और फिर प्रसन्नता में, इसे वर दिया गया था; अभी प्रसन्न होकर मैंने भी इसे वर दिया है।"
श्लोक 49 (skanda.6.188.49)
शंकुप्रचारं नो बाह्यं तव संपत्स्यते क्वचित् । देवैः सर्वैः समानीता प्रतिष्ठां प्रपितामह
śaṁkupracāraṁ no bāhyaṁ tava saṁpatsyate kvacit devaiḥ sarvaiḥ samānītā pratiṣṭhāṁ prapitāmaha
"शंकु-प्रचारण अब इसे छोड़कर कभी नहीं किया जाएगा; हे प्रपितामह, समस्त देवताओं ने इसे इसकी प्रतिष्ठा के लिए यहाँ लाया है।"
श्लोक 50 (skanda.6.188.50)
एतस्मिन्नंतरे प्राप्ताः कैलासाच्च द्विजोत्तमाः । श्रुत्वा चौदुंबरीजातं माहात्म्यं धरणीतले
etasminnaṁtare prāptāḥ kailāsācca dvijottamāḥ śrutvā cauduṁbarījātaṁ māhātmyaṁ dharaṇītale
इसी बीच, हे द्विजोत्तमो, कैलास से भी कुछ लोग आ पहुँचे, पृथ्वी पर औदुम्बरी से उत्पन्न इस महिमा को सुनकर,
श्लोक 51 (skanda.6.188.51)
यज्ञे पैतामहे चैव हाटकेश्वरसंभवे । क्षेत्रे पुण्यतमे तत्र पूजार्थं द्विजसत्तमाः
yajñe paitāmahe caiva hāṭakeśvarasaṁbhave kṣetre puṇyatame tatra pūjārthaṁ dvijasattamāḥ
पितामह के इस यज्ञ में, हाटकेश्वर में उत्पन्न, उस परम पुण्य क्षेत्र में, पूजा हेतु, हे द्विजसत्तमो —
श्लोक 52 (skanda.6.188.52)
हृष्टा मातृगणा ये च अष्टषष्टिप्रमाणतः । पूज्यंते ये च गन्धर्वैः सिद्धैः साध्यैर्मरुद्गणैः
hṛṣṭā mātṛgaṇā ye ca aṣṭaṣaṣṭipramāṇataḥ pūjyaṁte ye ca gandharvaiḥ siddhaiḥ sādhyairmarudgaṇaiḥ
अड़सठ (अष्टषष्टि) की संख्या में प्रसन्न मातृगण, जो गन्धर्वों, सिद्धों, साध्यों और मरुद्गणों द्वारा पूजित हैं,
श्लोक 53 (skanda.6.188.53)
पृथक्पृथग्विधै रूपैर्लोकविस्मयकारकैः । नृत्यंत्यश्च हसंत्यश्च गायंत्यश्च तथापराः
pṛthakpṛthagvidhai rūpairlokavismayakārakaiḥ nṛtyaṁtyaśca hasaṁtyaśca gāyaṁtyaśca tathāparāḥ
पृथक्-पृथक् प्रकार के, लोक को आश्चर्यचकित करने वाले रूपों में, नृत्य करती, हँसती, तथा गाती हुईं, अन्य भी वैसी ही।
श्लोक 54 (skanda.6.188.54)
तासां कोलाहलं श्रुत्वा ब्रह्मविष्णुपुरःसराः । विस्मयं परमं प्राप्ताः सर्वे देवाः सवासवाः
tāsāṁ kolāhalaṁ śrutvā brahmaviṣṇupuraḥsarāḥ vismayaṁ paramaṁ prāptāḥ sarve devāḥ savāsavāḥ
उनका कोलाहल सुनकर ब्रह्मा-विष्णु सहित वासव सहित समस्त देवगण परम आश्चर्य को प्राप्त हुए।
श्लोक 55 (skanda.6.188.55)
किमेतदिति जल्पंतः प्रोत्थिता यज्ञमंडपात् । एतस्मिन्नंतरे प्राप्ताः सर्वास्ता यत्र पद्मजः
kimetaditi jalpaṁtaḥ protthitā yajñamaṁḍapāt etasminnaṁtare prāptāḥ sarvāstā yatra padmajaḥ
"यह क्या है" कहते हुए वे यज्ञमण्डप से उठ खड़े हुए। इसी बीच वे सब वहाँ पहुँचीं जहाँ पद्मज थे।
श्लोक 56 (skanda.6.188.56)
प्रणम्य शिरसा हृष्टास्ततः प्रोचुस्तु सादरम् । वयमेवं समायाताः श्रुत्वा ते यज्ञमुत्तमम्
praṇamya śirasā hṛṣṭāstataḥ procustu sādaram vayamevaṁ samāyātāḥ śrutvā te yajñamuttamam
सिर झुकाकर प्रणाम करके, प्रसन्नतापूर्वक उन्होंने आदरपूर्वक कहा — "तुम्हारे इस उत्तम यज्ञ का समाचार सुनकर हम इस प्रकार आ पहुँचीं हैं।"
श्लोक 57 (skanda.6.188.57)
आमंत्रिताश्च देवेश वायुना जगदायुना । यज्ञभागा न चास्माकं विद्यंते यज्ञकर्मणि
āmaṁtritāśca deveśa vāyunā jagadāyunā yajñabhāgā na cāsmākaṁ vidyaṁte yajñakarmaṇi
"हे देवेश, जगत् के प्राण वायु द्वारा हमें आमन्त्रित किया गया था; किन्तु इस यज्ञकर्म में हमारा कोई यज्ञभाग नहीं है —"
श्लोक 58 (skanda.6.188.58)
एतान्येव दिनानीह नायातास्तेन पद्मज । औदुंबरीं वयं श्रुत्वा ह्यपूर्वां तेन संगताः
etānyeva dinānīha nāyātāstena padmaja auduṁbarīṁ vayaṁ śrutvā hyapūrvāṁ tena saṁgatāḥ
"इसी कारण, हे पद्मज, हम इन्हीं दिनों में नहीं आईं; औदुम्बरी की इस अपूर्व महिमा को सुनकर ही हम उसके निमित्त एकत्र हुई हैं।"
श्लोक 59 (skanda.6.188.59)
सा दृष्ट्वा पूजिताऽस्माभिः प्रणिपातपुरःसरम्। पर्वतस्य सुता यस्माद्गन्धर्वस्य महात्मनः
sā dṛṣṭvā pūjitā'smābhiḥ praṇipātapuraḥsaram parvatasya sutā yasmādgandharvasya mahātmanaḥ
"उसे देखकर, प्रणिपातपूर्वक हमने पूजा की — क्योंकि वह महात्मा गन्धर्व पर्वत की पुत्री है,"
श्लोक 60 (skanda.6.188.60)
सर्वकामप्रदा स्त्रीणां सर्वदेवैः प्रतिष्ठिता । स्थानं दर्शय चास्माकं त्वं देव प्रपितामह
sarvakāmapradā strīṇāṁ sarvadevaiḥ pratiṣṭhitā sthānaṁ darśaya cāsmākaṁ tvaṁ deva prapitāmaha
"स्त्रियों की सभी कामनाएँ पूर्ण करने वाली, समस्त देवताओं द्वारा प्रतिष्ठित; हे देव प्रपितामह, हमें भी एक स्थान दिखाओ।"
श्लोक 61 (skanda.6.188.61)
अष्टषष्टिप्रमाणश्च गणोऽस्माकं व्यवस्थितः । तच्छ्रुत्वा पद्मजो ज्ञात्वा संकीर्णं यतमंडपम् । व्याप्तं देवगणैः सर्वैस्त्रयस्त्रिंशत्प्रमाणकैः
aṣṭaṣaṣṭipramāṇaśca gaṇo'smākaṁ vyavasthitaḥ tacchrutvā padmajo jñātvā saṁkīrṇaṁ yatamaṁḍapam vyāptaṁ devagaṇaiḥ sarvaistrayastriṁśatpramāṇakaiḥ
"हमारा गण अड़सठ की संख्या में स्थापित है।" यह सुनकर पद्मज ने, यज्ञमण्डप को संकीर्ण जानकर, जो पहले से ही तैंतीस देवगणों से व्याप्त था —
श्लोक 62 (skanda.6.188.62)
ततो मध्यगमाहूय स तदा नगरोद्भवम् । श्रुताध्ययनसंपन्नं वृहस्पतिमिवापरम् । अब्रवीच्छ्लक्ष्णया वाचा त्यक्ता मौनं पितामहः
tato madhyagamāhūya sa tadā nagarodbhavam śrutādhyayanasaṁpannaṁ vṛhaspatimivāparam abravīcchlakṣṇayā vācā tyaktā maunaṁ pitāmahaḥ
तब नागरनगर में उत्पन्न, अध्ययन-सम्पन्न, मानो दूसरे बृहस्पति के समान मध्यग को बुलाकर, मौन त्यागकर पितामह ने कोमल वाणी में उससे कहा —
श्लोक 63 (skanda.6.188.63)
त्वं गत्वा मम वाक्येन विप्रान्नागरसंभवान् । प्रब्रूहि गोत्रमुख्यांश्च ह्यष्टषष्टिप्रमाणतः
tvaṁ gatvā mama vākyena viprānnāgarasaṁbhavān prabrūhi gotramukhyāṁśca hyaṣṭaṣaṣṭipramāṇataḥ
"तुम जाकर, मेरे वचन से, नागरों में उत्पन्न ब्राह्मणों से कहो, उनके प्रमुख गोत्रों को, अड़सठ की संख्या के अनुसार —"
श्लोक 64 (skanda.6.188.64)
एते मातृगणाः प्राप्ता अष्टषष्टिप्रमाणकाः । एकैक गोत्रमुख्याश्च एकैकस्य प्रमाणतः
ete mātṛgaṇāḥ prāptā aṣṭaṣaṣṭipramāṇakāḥ ekaika gotramukhyāśca ekaikasya pramāṇataḥ
"'ये अड़सठ मातृगण यहाँ आ पहुँचे हैं; प्रत्येक को उसके प्रमुख गोत्र के अनुसार —"
श्लोक 65 (skanda.6.188.65)
स्वेस्वे भूमिविभागे च स्थानं यच्छतु सांप्रतम् । एतत्साहाय्यकं कार्यं भवद्भिर्मम नागराः । प्रसादं प्रचुरं कृत्वा येन तुष्टिं प्रयांति च
svesve bhūmivibhāge ca sthānaṁ yacchatu sāṁpratam etatsāhāyyakaṁ kāryaṁ bhavadbhirmama nāgarāḥ prasādaṁ pracuraṁ kṛtvā yena tuṣṭiṁ prayāṁti ca
"'अपने-अपने भूमिभाग में अभी स्थान दिया जाए; हे नागरो, मुझे यह सहायता करनी होगी — प्रचुर कृपा करके, जिससे वे संतुष्ट हो सकें।'"
श्लोक 66 (skanda.6.188.66)
ततः स सत्वरं गत्वा तान्समाहूय नागरान्। प्रोवाच विनयोपेतः प्रणिपत्य ततः परम्
tataḥ sa satvaraṁ gatvā tānsamāhūya nāgarān provāca vinayopetaḥ praṇipatya tataḥ param
तब वह शीघ्र जाकर उन नागरों को बुलाकर, पहले उन्हें प्रणाम करके, विनयपूर्वक बोला।
श्लोक 67 (skanda.6.188.67)
तच्छ्रुत्वा नागराः सर्वे संतोषं परमं गताः। एकैकस्य गणस्यैव ददुः स्थानं निजं तदा
tacchrutvā nāgarāḥ sarve saṁtoṣaṁ paramaṁ gatāḥ ekaikasya gaṇasyaiva daduḥ sthānaṁ nijaṁ tadā
यह सुनकर समस्त नागर परम संतोष को प्राप्त हुए, और तब प्रत्येक गण को उन्होंने अपना-अपना स्थान दे दिया।
श्लोक 68 (skanda.6.188.68)
ततस्ताः मातरः सर्वाः प्रणिपत्य पितामहम्। तदनन्तरमेवाथ गायत्रीं भक्तिपूर्वकम्
tatastāḥ mātaraḥ sarvāḥ praṇipatya pitāmaham tadanantaramevātha gāyatrīṁ bhaktipūrvakam
तब वे सभी माताएँ पितामह को प्रणाम करके, तथा तदनन्तर भक्तिपूर्वक गायत्री को प्रणाम करके,
श्लोक 69 (skanda.6.188.69)
विप्रसंसूचिते स्थाने सर्वाश्चैव व्यवस्थिताः। पूजितास्तर्पिताश्चैव बलिभिर्विविधैरपि
viprasaṁsūcite sthāne sarvāścaiva vyavasthitāḥ pūjitāstarpitāścaiva balibhirvividhairapi
ब्राह्मणों द्वारा सूचित स्थान में स्थापित हो गईं, तथा नाना प्रकार के बलियों से पूजित और तृप्त हुईं।
श्लोक 70 (skanda.6.188.70)
ततो गायन्ति ता हृष्टा नृत्यंति च हसंति च। तर्पिता ब्राह्मणेन्द्रैश्च प्रोचुश्च तदनन्तरम्
tato gāyanti tā hṛṣṭā nṛtyaṁti ca hasaṁti ca tarpitā brāhmaṇendraiśca procuśca tadanantaram
फिर वे प्रसन्न होकर गातीं, नृत्य करतीं, हँसतीं; ब्राह्मणेन्द्रों द्वारा तृप्त होकर उन्होंने तब कहा —
श्लोक 71 (skanda.6.188.71)
न यास्यामो परं स्थानं स्थास्यामोत्रैव सर्वदा। ईदृशा यत्र विप्रेन्द्राः सर्वे भक्तिसमन्विताः
na yāsyāmo paraṁ sthānaṁ sthāsyāmotraiva sarvadā īdṛśā yatra viprendrāḥ sarve bhaktisamanvitāḥ
"हम अन्य किसी स्थान पर नहीं जाएँगी; हम सदा यहीं रहेंगी, जहाँ ऐसे भक्तिसम्पन्न श्रेष्ठ ब्राह्मण हैं,"
श्लोक 72 (skanda.6.188.72)
ईदृशं च महाक्षेत्रं हाटकेश्वरसंभवम्। एतस्मिन्नेव काले तु सावित्री तत्र संस्थिता
īdṛśaṁ ca mahākṣetraṁ hāṭakeśvarasaṁbhavam etasminneva kāle tu sāvitrī tatra saṁsthitā
"और हाटकेश्वर से उत्पन्न यह ऐसा महाक्षेत्र है।" इसी समय वहाँ सावित्री भी उपस्थित थीं,
श्लोक 73 (skanda.6.188.73)
प्रणिपत्य द्विजैः सर्वैर्गच्छमाना निवारिता। मा देवयजनं गच्छ सावित्रि पतिवल्लभे
praṇipatya dvijaiḥ sarvairgacchamānā nivāritā mā devayajanaṁ gaccha sāvitri pativallabhe
प्रणाम करके, आगे बढ़ते हुए, सभी ब्राह्मणों ने उन्हें रोक दिया — "हे पतिवल्लभे सावित्री, देवयजन (यज्ञस्थल) की ओर मत जाओ —"
श्लोक 74 (skanda.6.188.74)
ब्रह्मणा परिणीतास्ति गायत्रीति वरांगना
brahmaṇā pariṇītāsti gāyatrīti varāṁganā
"गायत्री नामक सुन्दरी को ब्रह्मा ने विवाह कर लिया है।"
श्लोक 75 (skanda.6.188.75)
तच्छ्रुत्वा वचनं तेषां सावित्री भ्रांतलोचना। दुःखशोकसमोपेता बाष्पव्याकुललोचना
tacchrutvā vacanaṁ teṣāṁ sāvitrī bhrāṁtalocanā duḥkhaśokasamopetā bāṣpavyākulalocanā
उनका यह वचन सुनकर सावित्री, भ्रान्त नेत्रों वाली, दुःख-शोक से युक्त, आँसुओं से व्याकुल नेत्रों वाली,
श्लोक 76 (skanda.6.188.76)
दृष्ट्वा ता नृत्यमानाश्च गायमानास्तथैव च। उत्कूर्दतीर्धरापृष्ठे संतोषं परमं गताः
dṛṣṭvā tā nṛtyamānāśca gāyamānāstathaiva ca utkūrdatīrdharāpṛṣṭhe saṁtoṣaṁ paramaṁ gatāḥ
उन्हें (मातृगणों को) नृत्य और गान करते देखकर, पृथ्वी पर उछलते हुए, परम संतोष को प्राप्त,
श्लोक 77 (skanda.6.188.77)
शशापाथ च सावित्री बाष्पगद्गदया गिरा। सपत्न्या मम यत्पूजां कृत्वा वै सुसमागताः
śaśāpātha ca sāvitrī bāṣpagadgadayā girā sapatnyā mama yatpūjāṁ kṛtvā vai susamāgatāḥ
सावित्री ने रुँधी हुई वाणी में उन्हें शाप दे दिया — "चूँकि तुमने मेरी सपत्नी की पूजा करके इस प्रकार प्रसन्नतापूर्वक आकर एकत्र हुई हो —"
श्लोक 78 (skanda.6.188.78)
न प्रणामः कृतोऽस्माकं मम दुःखेन दुःखिताः । तस्मान्नैवापरं स्थानं गमिष्यथ कथंचन
na praṇāmaḥ kṛto'smākaṁ mama duḥkhena duḥkhitāḥ tasmānnaivāparaṁ sthānaṁ gamiṣyatha kathaṁcana
"हमें प्रणाम नहीं किया, हमारे दुःख से दुःखी हुए बिना; इसलिए तुम कभी किसी अन्य स्थान को नहीं जाओगी,"
श्लोक 79 (skanda.6.188.79)
नागराणां च नो पूजा कदाचित्प्रभविष्यति । न प्रासादोऽथ युष्माकं कदाचित्संभविष्यति
nāgarāṇāṁ ca no pūjā kadācitprabhaviṣyati na prāsādo'tha yuṣmākaṁ kadācitsaṁbhaviṣyati
"न कभी नागरों की पूजा तुम्हें प्राप्त होगी, न कभी तुम्हारा कोई मन्दिर बनेगा,"
श्लोक 80 (skanda.6.188.80)
शीतकाले तु शीतेन ह्युष्णकाले च रश्मिभिः । वर्षाकाले तु तोयेन क्लेशं यास्य थ भूरिशः
śītakāle tu śītena hyuṣṇakāle ca raśmibhiḥ varṣākāle tu toyena kleśaṁ yāsya tha bhūriśaḥ
"शीतकाल में शीत से, ग्रीष्मकाल में सूर्य की किरणों से, और वर्षाकाल में जल से तुम्हें अत्यंत क्लेश प्राप्त होगा।"
श्लोक 81 (skanda.6.188.81)
एवमुक्त्वा ततो देवी सा तत्रैव व्यवस्थिता । नागराणां वरस्त्रीभिः सर्वाभिः परिवारिता
evamuktvā tato devī sā tatraiva vyavasthitā nāgarāṇāṁ varastrībhiḥ sarvābhiḥ parivāritā
ऐसा कहकर वह देवी वहीं स्थापित हो गईं, नागरों की समस्त श्रेष्ठ स्त्रियों से घिरी हुईं,
श्लोक 82 (skanda.6.188.82)
संबोध्यमाना सततं सुस्त्रीणां चेष्टितेन च । एतस्मिन्नेव काले तु भगवांस्तीक्ष्णदीधितिः
saṁbodhyamānā satataṁ sustrīṇāṁ ceṣṭitena ca etasminneva kāle tu bhagavāṁstīkṣṇadīdhitiḥ
उन सुशीला स्त्रियों के आचरण से निरन्तर सान्त्वना पाती हुईं। इसी समय तीक्ष्णकिरण भगवान् सूर्य,
श्लोक 83 (skanda.6.188.83)
अस्तं गतो महाञ्छब्दः प्रस्थितो यज्ञमंडपे । याज्ञिकानां तु विप्राणां सुमहाञ्छास्त्रसंभवः
astaṁ gato mahāñchabdaḥ prasthito yajñamaṁḍape yājñikānāṁ tu viprāṇāṁ sumahāñchāstrasaṁbhavaḥ
महान शब्द के साथ अस्त हो गए; वे सब यज्ञमण्डप की ओर प्रस्थित हुए — याज्ञिक ब्राह्मणों के बीच शास्त्र की एक महती चर्चा उत्पन्न हुई।