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नागर खण्ड · अध्याय 189

औदुम्बर्युत्पत्तिपूर्वक प्राग्जन्म वृत्तान्त वर्णन

अध्याय 188अध्याय-सूचीअध्याय 190

श्लोक 1 (skanda.6.189.1)

सूत उवाच । अथ यावच्च ताः शप्ता मातरो द्विजसत्तमाः । सावित्र्या तास्तु गंधर्व्यः प्राप्ताः सा यत्र तिष्ठति

sūta uvāca atha yāvacca tāḥ śaptā mātaro dvijasattamāḥ sāvitryā tāstu gaṁdharvyaḥ prāptāḥ sā yatra tiṣṭhati

सूत जी ने कहा — हे द्विजसत्तमो, जैसे ही वे माताएँ शापित हुईं, वे गन्धर्विकाएँ वहाँ गईं जहाँ सावित्री खड़ी थीं।

श्लोक 2 (skanda.6.189.2)

ततः प्रणम्य ता ऊचुः सर्वा दीनतरं वचः । वयं समागता देवि सर्वास्तव मखे यतः

tataḥ praṇamya tā ūcuḥ sarvā dīnataraṁ vacaḥ vayaṁ samāgatā devi sarvāstava makhe yataḥ

फिर प्रणाम करके उन सबने अत्यंत दीन वचन कहा — "हे देवि, हम सब यहाँ इसलिए आई हैं क्योंकि यह तुम्हारा ही यज्ञ है —"

श्लोक 3 (skanda.6.189.3)

यज्ञभागं लभिष्याम औदुंबर्याः प्रसादतः । न चास्माभिः परिज्ञाता सावित्री चात्र तिष्ठति

yajñabhāgaṁ labhiṣyāma auduṁbaryāḥ prasādataḥ na cāsmābhiḥ parijñātā sāvitrī cātra tiṣṭhati

"हमें आशा थी कि औदुम्बरी की कृपा से हमें यज्ञभाग प्राप्त होगा; किन्तु हमें ज्ञात नहीं था कि सावित्री भी यहाँ उपस्थित हैं।"

श्लोक 4 (skanda.6.189.4)

दौर्भाग्यदोषसंपन्ना नागरीभिः समावृता । अस्माकं सुखमार्गोऽयं नृत्यगीतसमुद्भवः

daurbhāgyadoṣasaṁpannā nāgarībhiḥ samāvṛtā asmākaṁ sukhamārgo'yaṁ nṛtyagītasamudbhavaḥ

"दुर्भाग्य के दोष से युक्त, नागर स्त्रियों से घिरी हुई — यह नृत्य-गान से उत्पन्न हमारा मार्ग ही हमारे सुख का साधन है।"

श्लोक 5 (skanda.6.189.5)

तत्कुर्वाणास्ततो रात्रौ शप्ता गांधर्वसत्तमे । स्त्रीणां दुःखेन दुःखार्ता जायंते सर्वयोषितः

tatkurvāṇāstato rātrau śaptā gāṁdharvasattame strīṇāṁ duḥkhena duḥkhārtā jāyaṁte sarvayoṣitaḥ

"रात्रि में यही करते हुए हमें शाप मिल गया, हे गन्धर्विश्रेष्ठे; एक स्त्री के दुःख से समस्त स्त्रियाँ दुःखी हो जाती हैं।"

श्लोक 6 (skanda.6.189.6)

यूयमानंदिताः सर्वाः सपत्न्या मम चोत्सवे । तां प्रणम्य प्रपूज्याद्य नाहं संभाषितापि च

yūyamānaṁditāḥ sarvāḥ sapatnyā mama cotsave tāṁ praṇamya prapūjyādya nāhaṁ saṁbhāṣitāpi ca

"'तुम सब मेरी सपत्नी के उत्सव में आनन्दित हुईं; आज उसे प्रणाम करके, पूजा करके, तुमने मुझसे बात तक नहीं की।'"

श्लोक 7 (skanda.6.189.7)

विशेषान्नृत्यगीतं च प्रारब्धं मम चाग्रतः। तस्माद्व्योमगति र्नैव भवतीनां भविष्यति

viśeṣānnṛtyagītaṁ ca prārabdhaṁ mama cāgrataḥ tasmādvyomagati rnaiva bhavatīnāṁ bhaviṣyati

"'और विशेष रूप से नृत्य-गान मेरे सामने नहीं, उसके सामने आरम्भ हुआ — इसलिए तुम्हें आकाश-गति कभी प्राप्त नहीं होगी।'"

श्लोक 8 (skanda.6.189.8)

अस्मिन्स्थाने सदा दीनास्तथाऽऽश्रयविवर्जिताः । संतिष्ठध्वं न वः पूजां करिष्यंति च मानवाः

asminsthāne sadā dīnāstathā''śrayavivarjitāḥ saṁtiṣṭhadhvaṁ na vaḥ pūjāṁ kariṣyaṁti ca mānavāḥ

"'इस स्थान पर तुम सदा दीन और आश्रयहीन बनी रहोगी; मनुष्य तुम्हारी पूजा कभी नहीं करेंगे —'"

श्लोक 9 (skanda.6.189.9)

दीनानामसमर्थानां यात्राकृत्येषु सर्वदा । तस्यास्तद्वचनं देवि नान्यथा संभविष्यति

dīnānāmasamarthānāṁ yātrākṛtyeṣu sarvadā tasyāstadvacanaṁ devi nānyathā saṁbhaviṣyati

"'दीन, असमर्थ, सदा यात्रा-कार्यों में।' हे देवि, उनका यह वचन अन्यथा नहीं होगा।"

श्लोक 10 (skanda.6.189.10)

औदुम्बर्याः पूजनाय गत्वा तस्यै निवेद्यताम् । सा हि व्यपनयेद्दुःखं ध्रुवं सा हि प्रकामदा

audumbaryāḥ pūjanāya gatvā tasyai nivedyatām sā hi vyapanayedduḥkhaṁ dhruvaṁ sā hi prakāmadā

"औदुम्बरी की पूजा हेतु जाकर उसे यह निवेदन किया जाए; वही हमारा दुःख दूर करेंगी — निश्चय ही वही सर्वकाम प्रदान करने वाली हैं।"

श्लोक 11 (skanda.6.189.11)

तेनाऽत्र सहसा प्राप्ता यावन्नष्टमनोरथाः

tenā'tra sahasā prāptā yāvannaṣṭamanorathāḥ

"क्योंकि उन्हीं के कारण हम यहाँ सहसा प्राप्त हुईं, जब तक हमारे मनोरथ नष्ट नहीं हुए थे।"

श्लोक 12 (skanda.6.189.12)

तस्मात्कुरुष्व कल्याणि यथास्माकं गतिर्भवेत् । माहात्म्यं तव वर्द्धेत त्रैलोक्येऽपि चराचरे

tasmātkuruṣva kalyāṇi yathāsmākaṁ gatirbhavet māhātmyaṁ tava varddheta trailokye'pi carācare

"इसलिए, हे कल्याणि, ऐसा करो जिससे हमारी गति बने; तुम्हारी महिमा त्रैलोक्य में, चराचर में, वृद्धि को प्राप्त हो।"

श्लोक 13 (skanda.6.189.13)

औदुम्बर्युवाच । का शक्तिर्विद्यतेऽस्माकं कृतं सावित्रिसंभवम् । अन्यथा कर्तुमेवाद्य सर्वैरपि सुरासुरैः

audumbaryuvāca kā śaktirvidyate'smākaṁ kṛtaṁ sāvitrisaṁbhavam anyathā kartumevādya sarvairapi surāsuraiḥ

औदुम्बरी ने कहा — "हममें ऐसी क्या शक्ति है कि सावित्री द्वारा किए गए कार्य को आज हम अन्यथा कर सकें, वह भी समस्त सुर-असुरों के होते हुए?"

श्लोक 14 (skanda.6.189.14)

तथापि शक्तितो देव्यो यतिष्यामि हिताय वः । अष्टषष्टिषु गोत्रेषु भवत्यः संनियोजिताः

tathāpi śaktito devyo yatiṣyāmi hitāya vaḥ aṣṭaṣaṣṭiṣu gotreṣu bhavatyaḥ saṁniyojitāḥ

"फिर भी, हे देवियो, मैं अपनी शक्ति के अनुसार तुम्हारे हित का प्रयत्न करूँगी। तुम अड़सठ गोत्रों में नियोजित की जाओगी;"

श्लोक 15 (skanda.6.189.15)

पितामहेन तुष्टेन तत्र पूजामवाप्स्यथ । यूयं रात्रौ च संज्ञाभिर्हास्यपूर्वाभिरेव च

pitāmahena tuṣṭena tatra pūjāmavāpsyatha yūyaṁ rātrau ca saṁjñābhirhāsyapūrvābhireva ca

"पितामह प्रसन्न होकर वहाँ तुम्हें पूजा प्राप्त कराएँगे — रात्रि में हास्ययुक्त संकेतों द्वारा।"

श्लोक 16 (skanda.6.189.16)

अद्यप्रभृति यस्यात्र नागरस्य तु मंदिरे । वृद्धिः संपत्स्यते काचिद्वि शेषान्मंडपोद्भवा

adyaprabhṛti yasyātra nāgarasya tu maṁdire vṛddhiḥ saṁpatsyate kācidvi śeṣānmaṁḍapodbhavā

"आज से यहाँ जिस भी नागर के घर में कोई वृद्धि होगी, विशेषतः मण्डप (विवाह-मण्डप) से उत्पन्न वृद्धि,"

श्लोक 17 (skanda.6.189.17)

तथा या योषितः काश्चित्पुरद्वारं समेत्य च । अदृष्टहास्यमाध्याय क्षपिष्यंति बलिं ततः

tathā yā yoṣitaḥ kāścitpuradvāraṁ sametya ca adṛṣṭahāsyamādhyāya kṣapiṣyaṁti baliṁ tataḥ

"तथा जो भी स्त्रियाँ नगरद्वार पर आकर, मौन भाव से अदृष्ट हास्य करके, तब बलि अर्पित करेंगी —"

श्लोक 18 (skanda.6.189.18)

तेन वो भविता तृप्तिर्देवानां च यथा मखैः । याः पुनर्न करिष्यंति पूजामेतां मयोदिताम्

tena vo bhavitā tṛptirdevānāṁ ca yathā makhaiḥ yāḥ punarna kariṣyaṁti pūjāmetāṁ mayoditām

"उससे तुम्हें उसी प्रकार तृप्ति मिलेगी जैसे देवताओं को यज्ञों से। किन्तु जो यह पूजा, जो मैंने बताई है, नहीं करेंगी —"

श्लोक 19 (skanda.6.189.19)

युष्माकं नगरे तासां सुपुत्रो नाशमाप्स्यति । युष्माकमपमाने न सदा रोगी भविष्यति

yuṣmākaṁ nagare tāsāṁ suputro nāśamāpsyati yuṣmākamapamāne na sadā rogī bhaviṣyati

"उनके नगर में उनका सुयोग्य पुत्र नाश को प्राप्त होगा; तुम्हारे अपमान से उनके यहाँ सदा रोग बना रहेगा।"

श्लोक 20 (skanda.6.189.20)

तस्मात्तिष्ठध्वमत्रैव रक्षार्थं नगरस्य च । शापव्याजेन युष्माकं वरोऽयं समुपस्थितः

tasmāttiṣṭhadhvamatraiva rakṣārthaṁ nagarasya ca śāpavyājena yuṣmākaṁ varo'yaṁ samupasthitaḥ

"इसलिए नगर की रक्षा हेतु तुम यहीं रहो; शाप के बहाने ही यह वर तुम्हें प्राप्त हो गया है।"

श्लोक 21 (skanda.6.189.21)

एतस्मिन्नंतरे प्राप्तो देवशर्मा द्विजोत्तमाः । गंधर्वः पर्वतो जातः स्वपत्न्या सहितस्तदा

etasminnaṁtare prāpto devaśarmā dvijottamāḥ gaṁdharvaḥ parvato jātaḥ svapatnyā sahitastadā

इसी बीच, हे द्विजोत्तमो, देवशर्मा वहाँ आ पहुँचे — जो गन्धर्व पर्वत के रूप में उत्पन्न हुए थे — तब अपनी पत्नी सहित।

श्लोक 22 (skanda.6.189.22)

यदा चौदुम्बरी शप्ता नारदेन सुरर्षिणा । मानुषी भव क्रुद्धेन तदा संप्रार्थितस्तया

yadā caudumbarī śaptā nāradena surarṣiṇā mānuṣī bhava kruddhena tadā saṁprārthitastayā

जब औदुम्बरी को क्रुद्ध देवर्षि नारद ने "मनुष्य बन जा" कहकर शाप दिया, तब उसने उनसे यह प्रार्थना की,

श्लोक 23 (skanda.6.189.23)

मदर्थं मानुषो भूत्वा तता त्वं चानया सह। सृज मां मानुषीं चेव येन गच्छामि नो भुवि

madarthaṁ mānuṣo bhūtvā tatā tvaṁ cānayā saha sṛja māṁ mānuṣīṁ ceva yena gacchāmi no bhuvi

"मेरे लिए मनुष्य बनकर, आप उसके साथ मुझे भी मनुष्य बनाइए, जिससे मैं भूतल पर जा सकूँ —"

श्लोक 24 (skanda.6.189.24)

विण्मूत्रसंयुते गर्भे सर्वदोषसमन्विते। ततः सा कृपया तस्याः सत्पत्न्या देवशर्मणः

viṇmūtrasaṁyute garbhe sarvadoṣasamanvite tataḥ sā kṛpayā tasyāḥ satpatnyā devaśarmaṇaḥ

"मल-मूत्र से युक्त, समस्त दोषों से युक्त गर्भ में।" तब कृपावश वह देवशर्मा की सत्पत्नी के गर्भ में,

श्लोक 25 (skanda.6.189.25)

अवतीर्णा धरापृष्ठे वानप्रस्थाश्रमे ततः। एवं सा पञ्चमी रात्रिस्तस्य यज्ञस्य सत्तमाः

avatīrṇā dharāpṛṣṭhe vānaprasthāśrame tataḥ evaṁ sā pañcamī rātristasya yajñasya sattamāḥ

पृथ्वी पर अवतीर्ण हुई, वानप्रस्थाश्रम में। इस प्रकार, हे सत्तमो, उस यज्ञ की वह पाँचवीं रात्रि,

श्लोक 26 (skanda.6.189.26)

उत्सवेन मनोज्ञेन चौदुम्बर्या व्यतिक्रमात्। प्रत्यूषे च ततो जाते यदा तेन विसर्जिता

utsavena manojñena caudumbaryā vyatikramāt pratyūṣe ca tato jāte yadā tena visarjitā

औदुम्बरी के इस प्रसंग से मनोहर उत्सव में व्यतीत हुई। फिर प्रातःकाल होने पर, जब उसे उद्गाता द्वारा विसर्जित कर दिया गया,

श्लोक 27 (skanda.6.189.27)

औदुम्बरी तदा प्राह पर्वतं जनकं निजम्। कल्येऽत्रावभृथो भावी विधियज्ञसमुद्भवः

audumbarī tadā prāha parvataṁ janakaṁ nijam kalye'trāvabhṛtho bhāvī vidhiyajñasamudbhavaḥ

तब औदुम्बरी ने अपने पिता पर्वत से कहा — "कल यहाँ विधिपूर्वक यज्ञ से उत्पन्न अवभृथ (समापन-स्नान) होने वाला है।"

श्लोक 28 (skanda.6.189.28)

सर्वतीर्थमयस्तस्मिन्स्नानं न स्यात्ततः परम्। यास्यामः स्वगृहान्भूयः सर्वैर्देवैः समन्विताः

sarvatīrthamayastasminsnānaṁ na syāttataḥ param yāsyāmaḥ svagṛhānbhūyaḥ sarvairdevaiḥ samanvitāḥ

"वह समस्त तीर्थों से युक्त होने के कारण, उसके बाद कोई और स्नान नहीं करना है। हम समस्त देवताओं सहित पुनः अपने घर जाएँगे,"

श्लोक 29 (skanda.6.189.29)

अनेनैव विमानेन त्रयो वापि यथासुखम्। ममापि च वरो जातो यः शापान्नारदोद्भवात्। यज्ञभागो मया प्राप्तो देवानामपि दुर्लभः। पौर्णमासीदिने प्राप्ते विशेषात्स्त्रीजनैः कृतः

anenaiva vimānena trayo vāpi yathāsukham mamāpi ca varo jāto yaḥ śāpānnāradodbhavāt yajñabhāgo mayā prāpto devānāmapi durlabhaḥ paurṇamāsīdine prāpte viśeṣātstrījanaiḥ kṛtaḥ

"इसी विमान से, हम तीनों, जैसे इच्छा हो। मुझे भी नारद के शाप से उत्पन्न एक वर प्राप्त हुआ है — मुझे देवताओं के लिए भी दुर्लभ यज्ञभाग प्राप्त हुआ है, विशेषरूप से पूर्णिमा के दिन, स्त्रियों द्वारा किया जाने वाला।"

अध्याय 188अध्याय-सूचीअध्याय 190