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नागर खण्ड · अध्याय 192

सावित्रीमाहात्म्य वर्णन

अध्याय 191अध्याय-सूचीअध्याय 193

श्लोक 1 (skanda.6.192.1)

सूत उवाच । अथ श्रुत्वा महानादं वाद्यानां समुपस्थितम् । नारदः सम्मुखः प्रायाज्ज्ञात्वा च जननीं निजाम्

sūta uvāca atha śrutvā mahānādaṁ vādyānāṁ samupasthitam nāradaḥ sammukhaḥ prāyājjñātvā ca jananīṁ nijām

सूत जी ने कहा — तब वाद्यों का महान शब्द सुनकर, अपनी जननी को पहचानकर नारद सम्मुख गए।

श्लोक 2 (skanda.6.192.2)

प्रणिपत्य स दीनात्मा भूत्वा चाश्रुपरिप्लुतः । प्राह गद्गदया वाचा कण्ठे बाष्पसमावृतः

praṇipatya sa dīnātmā bhūtvā cāśrupariplutaḥ prāha gadgadayā vācā kaṇṭhe bāṣpasamāvṛtaḥ

प्रणाम करके, दीनचित्त होकर, आँसुओं से भीगे हुए, कण्ठ में अश्रु भरे, वे गद्गद वाणी में बोले —

श्लोक 3 (skanda.6.192.3)

आत्मनः शापरक्षार्थं तस्याः कोपविवृद्धये । कलिप्रियस्तदा विप्रो देवस्त्रीणां पुरः स्थितः

ātmanaḥ śāparakṣārthaṁ tasyāḥ kopavivṛddhaye kalipriyastadā vipro devastrīṇāṁ puraḥ sthitaḥ

अपने को उनके शाप से बचाने हेतु, उनके क्रोध को अन्यत्र बढ़ाने के लिए, कलिप्रिय नामक वह विप्र देवपत्नियों के सामने खड़ा हुआ,

श्लोक 4 (skanda.6.192.4)

मेघगम्भीरया वाचा प्रस्खलंत्या पदेपदे । मया त्वं देवि चाहूता पुलस्त्येन ततः परम्

meghagambhīrayā vācā praskhalaṁtyā padepade mayā tvaṁ devi cāhūtā pulastyena tataḥ param

और मेघ के समान गम्भीर वाणी में, पद-पद पर लड़खड़ाते हुए — "हे देवि, मैंने तुम्हें बुलाया था, और फिर पुलस्त्य ने भी —"

श्लोक 5 (skanda.6.192.5)

स्त्रीस्वभावं समाश्रित्य दीक्षाकालेऽपि नागता

strīsvabhāvaṁ samāśritya dīkṣākāle'pi nāgatā

"किन्तु स्त्रीस्वभाव के कारण तुम दीक्षा-काल में भी नहीं आईं।"

श्लोक 6 (skanda.6.192.6)

ततो विधेः समादेशाच्छक्रेणान्या समाहृता । काचिद्गोपसमुद्भूता कुमारी देव रूपिणी

tato vidheḥ samādeśācchakreṇānyā samāhṛtā kācidgopasamudbhūtā kumārī deva rūpiṇī

"तब विधाता के आदेश से शक्र द्वारा एक अन्य कन्या लाई गई — गोपकुल में उत्पन्न, दिव्यरूपिणी कोई कुमारी,"

श्लोक 7 (skanda.6.192.7)

गोवक्त्रेण प्रवेश्याथ गुह्यमार्गेण तत्क्षणात् । आकर्षिता महाभागे समानीताथ तत्क्षणात्

govaktreṇa praveśyātha guhyamārgeṇa tatkṣaṇāt ākarṣitā mahābhāge samānītātha tatkṣaṇāt

"गोमुख के गुप्त मार्ग से उसी क्षण खींचकर, हे महाभागे, उसी क्षण लाई गई।"

श्लोक 8 (skanda.6.192.8)

सा विष्णुना विवाहार्थं ततश्चैवानुमोदिता । ईश्वरेण कृतं नाम गायत्री च तवानुगम्

sā viṣṇunā vivāhārthaṁ tataścaivānumoditā īśvareṇa kṛtaṁ nāma gāyatrī ca tavānugam

"फिर विवाह हेतु विष्णु द्वारा उसे अनुमोदित किया गया; ईश्वर (शिव) ने तुम्हारे ही अनुरूप 'गायत्री' नाम रखा,"

श्लोक 9 (skanda.6.192.9)

ब्राह्मणैः सकलैः प्रोक्तं ब्राह्मणीति भवत्वियम् । अस्माकं वचनाद्ब्रह्मन्कुरु हस्तग्रहं विभो

brāhmaṇaiḥ sakalaiḥ proktaṁ brāhmaṇīti bhavatviyam asmākaṁ vacanādbrahmankuru hastagrahaṁ vibho

"और समस्त ब्राह्मणों ने कहा — 'यह ब्राह्मणी बने।' 'हे ब्रह्मन्, हमारे वचन से इसका पाणिग्रहण करो, हे विभो।'"

श्लोक 10 (skanda.6.192.10)

देवैः सर्वैः स सम्प्रोक्तस्ततस्तां च वराननाम् । ततः पत्न्युत्थधर्मेण योजयामास सत्वरम् किं वा ते बहुनोक्तेन पत्नीशालां समागता । रशना योजिता तस्या गोप्याः कट्यां सुरेश्वरि

devaiḥ sarvaiḥ sa samproktastatastāṁ ca varānanām tataḥ patnyutthadharmeṇa yojayāmāsa satvaram kiṁ vā te bahunoktena patnīśālāṁ samāgatā raśanā yojitā tasyā gopyāḥ kaṭyāṁ sureśvari

"समस्त देवताओं द्वारा ऐसा कहे जाने पर उन्होंने उस सुन्दरमुखी को शीघ्र ही पत्नीविधि से जोड़ लिया। अधिक क्या कहूँ — वह पत्नीशाला में लाई गई; हे सुरेश्वरि, उस गोपकन्या की कटि में मेखला बाँधी गई।"

श्लोक 11 (skanda.6.192.11)

तद्दृष्ट्वा गर्हितं कर्म निष्क्रांतो यज्ञमण्डपात् । अमर्ष वशमापन्नो न शक्तो वीक्षितुं च ताम्

taddṛṣṭvā garhitaṁ karma niṣkrāṁto yajñamaṇḍapāt amarṣa vaśamāpanno na śakto vīkṣituṁ ca tām

"यह निन्दनीय कर्म देखकर मैं यज्ञमण्डप से बाहर निकल आया, अत्यंत असहनशील होकर, उसे देखने में भी असमर्थ।"

श्लोक 12 (skanda.6.192.12)

एतज्ज्ञात्वा महाभागे यत्क्षमं तत्समाचर । गच्छ वा तिष्ठ वा तत्र मण्डपे धर्मवर्जिते

etajjñātvā mahābhāge yatkṣamaṁ tatsamācara gaccha vā tiṣṭha vā tatra maṇḍape dharmavarjite

"यह जानकर, हे महाभागे, जो उचित लगे वह करो; जाओ या वहीं रहो — वह मण्डप अब धर्म से रहित हो चुका है।"

श्लोक 13 (skanda.6.192.13)

तच्छ्रुत्वा सा तदा देवी सावित्री द्विजसत्तमाः । प्रम्लानवदना जाता पद्मिनीव हिमागमे

tacchrutvā sā tadā devī sāvitrī dvijasattamāḥ pramlānavadanā jātā padminīva himāgame

यह सुनकर वह देवी सावित्री, हे द्विजसत्तमो, हेमन्त ऋतु के आगमन पर कमलिनी के समान म्लान-मुखी हो गईं,

श्लोक 14 (skanda.6.192.14)

लतेव च्छिन्नमूला सा चक्रीव प्रियविच्युता । शुचिशुक्लागमे काले सरसीव गतोदका

lateva cchinnamūlā sā cakrīva priyavicyutā śuciśuklāgame kāle sarasīva gatodakā

मूल कटी हुई लता के समान, प्रिय से बिछड़ी चक्रवाकी के समान, शरद ऋतु के आने पर जलरहित सरोवर के समान,

श्लोक 15 (skanda.6.192.15)

प्रक्षीणचन्द्रलेखेव मृगीव मृगवर्जिता । सेनेव हतभूपाला सतीव गतभर्तृका

prakṣīṇacandralekheva mṛgīva mṛgavarjitā seneva hatabhūpālā satīva gatabhartṛkā

क्षीण चन्द्ररेखा के समान, मृगरहित हरिणी के समान, राजा के मारे जाने पर सेना के समान, पति खोई हुई सती के समान,

श्लोक 16 (skanda.6.192.16)

संशुष्का पुष्पमालेव मृतवत्सैव सौरभी । वैमनस्यं परं गत्वा निश्चलत्वमुपस्थिताम् । तां दृष्ट्वा देवपत्न्यस्ता जगदुर्नारदं तदा

saṁśuṣkā puṣpamāleva mṛtavatsaiva saurabhī vaimanasyaṁ paraṁ gatvā niścalatvamupasthitām tāṁ dṛṣṭvā devapatnyastā jagadurnāradaṁ tadā

मुरझाई पुष्पमाला के समान, वत्स खोई हुई सुगन्धित गाय के समान — परम वैमनस्य को प्राप्त होकर वे निश्चलता को प्राप्त हो गईं। उन्हें ऐसा देखकर देवपत्नियों ने तब नारद से कहा —

श्लोक 17 (skanda.6.192.17)

धिग्धिक्कलिप्रिय त्वां च रागे वैराग्यकारकम् । त्वया कृतं सर्वमेतद्विधेस्तस्य तथान्तरम्

dhigdhikkalipriya tvāṁ ca rāge vairāgyakārakam tvayā kṛtaṁ sarvametadvidhestasya tathāntaram

"धिक्कार है, धिक्कार है, हे कलिप्रिय, तुम्हें, जो हर्ष के बीच वैराग्य उत्पन्न करते हो! यह सब जो हुआ है, यह तुम्हारा ही किया है, और उस विधाता का भी।"

श्लोक 18 (skanda.6.192.18)

गौर्युवाच । अयं कलिप्रियो देवि ब्रूते सत्यानृतं वचः । अनेन कर्मणा प्राणान्बिभर्त्येष सदा मुनिः

gauryuvāca ayaṁ kalipriyo devi brūte satyānṛtaṁ vacaḥ anena karmaṇā prāṇānbibhartyeṣa sadā muniḥ

गौरी ने कहा — "हे देवि, यह कलिप्रिय सत्य-मिथ्या मिश्रित वचन बोलता है; इसी आचरण से यह मुनि सदा अपने प्राण धारण करता है।"

श्लोक 19 (skanda.6.192.19)

अहं त्र्यक्षेण सावित्रि पुरा प्रोक्ता मुहुर्मुहुः । नारदस्य मुनेर्वाक्यं न श्रद्धेयं त्वया प्रिये । यदि वांछसि सौख्यानि मम जातानि पार्वति

ahaṁ tryakṣeṇa sāvitri purā proktā muhurmuhuḥ nāradasya munervākyaṁ na śraddheyaṁ tvayā priye yadi vāṁchasi saukhyāni mama jātāni pārvati

"हे सावित्रि, मुझे स्वयं त्र्यक्ष (शिव) ने पूर्वकाल में बारंबार कहा था — 'हे प्रिये, यदि तुम मुझसे प्राप्त सुख चाहती हो, हे पार्वति, तो नारद मुनि के वचन पर श्रद्धा मत करना।'"

श्लोक 20 (skanda.6.192.20)

ततःप्रभृति नैवाहं श्रद्दधेऽस्य वचः क्वचित् । तस्माद्गच्छामहे तत्र यत्र तिष्ठति ते पतिः

tataḥprabhṛti naivāhaṁ śraddadhe'sya vacaḥ kvacit tasmādgacchāmahe tatra yatra tiṣṭhati te patiḥ

"तभी से मैंने कभी भी इसके वचनों पर विश्वास नहीं किया। इसलिए चलो वहाँ, जहाँ तुम्हारे पति खड़े हैं;"

श्लोक 21 (skanda.6.192.21)

स्वयं दृष्ट्वैव वृत्तांतं कर्तव्यं यत्क्षमं ततः । नात्रास्य वचनादद्य स्थातव्यं तत्र गम्यताम्

svayaṁ dṛṣṭvaiva vṛttāṁtaṁ kartavyaṁ yatkṣamaṁ tataḥ nātrāsya vacanādadya sthātavyaṁ tatra gamyatām

"स्वयं वृत्तान्त देखकर ही जो उचित हो वह करना चाहिए। केवल इसके वचन पर यहाँ रुकना उचित नहीं — वहीं चलो।"

श्लोक 22 (skanda.6.192.22)

सूत उवाच । गौर्या स्तद्वचनं श्रुत्वा सावित्री हर्षवर्जिता । मखमण्डपमुद्दिश्य प्रस्खलन्ती पदेपदे

sūta uvāca gauryā stadvacanaṁ śrutvā sāvitrī harṣavarjitā makhamaṇḍapamuddiśya praskhalantī padepade

सूत जी ने कहा — गौरी का यह वचन सुनकर, हर्षरहित सावित्री, पद-पद पर लड़खड़ाती हुई, यज्ञमण्डप की ओर चल पड़ीं,

श्लोक 23 (skanda.6.192.23)

प्रजगाम द्विजश्रेष्ठाः शून्येन मनसा तदा । प्रतिभाति तदा गीतं तस्या मधुरमप्यहो

prajagāma dvijaśreṣṭhāḥ śūnyena manasā tadā pratibhāti tadā gītaṁ tasyā madhuramapyaho

हे द्विजश्रेष्ठो, शून्य मन से आगे बढ़ती हुईं। तब उन्हें मधुरतम गीत भी,

श्लोक 24 (skanda.6.192.24)

कर्णशूलं यथाऽऽयातमसकृद्द्विजसत्तमाः । वन्ध्यवाद्यं यथा वाद्यं मृदंगानकपूर्वकम्

karṇaśūlaṁ yathā''yātamasakṛddvijasattamāḥ vandhyavādyaṁ yathā vādyaṁ mṛdaṁgānakapūrvakam

बारंबार कर्णशूल के समान प्रतीत होने लगा, हे द्विजसत्तमो; मृदंग-आनक आदि वाद्य भी उन्हें निष्फल, बंध्य वाद्य के समान लगने लगे।

श्लोक 25 (skanda.6.192.25)

प्रेतसंदर्शनं यद्वन्मर्त्यं तत्सा महासती । वीक्षितुं न च शक्रोति गच्छमाना तदा मखे

pretasaṁdarśanaṁ yadvanmartyaṁ tatsā mahāsatī vīkṣituṁ na ca śakroti gacchamānā tadā makhe

जैसे मृत्युलोक में मनुष्य प्रेत-दर्शन से कतराता है, वैसे ही वह महासती उसे देख नहीं पा रही थीं, यज्ञ की ओर जाते हुए।

श्लोक 26 (skanda.6.192.26)

शृंगारं च तथांगारं मन्यते सा तनुस्थितम् । वाष्पपूर्णेक्षणा दीना प्रजगाम महासती

śṛṁgāraṁ ca tathāṁgāraṁ manyate sā tanusthitam vāṣpapūrṇekṣaṇā dīnā prajagāma mahāsatī

अपने शरीर पर धारण श्रृंगार को भी वे अंगारे के समान मानने लगीं; आँसुओं से भरे नेत्रों वाली, दीन, वह महासती आगे बढ़ती गईं।

श्लोक 27 (skanda.6.192.27)

ततः कृच्छ्रात्समासाद्य सैवं तं यज्ञमंडपम् । कृच्छ्रात्कारागृहं तद्वद्दुष्प्रेक्ष्यं दृक्पथं गतम्

tataḥ kṛcchrātsamāsādya saivaṁ taṁ yajñamaṁḍapam kṛcchrātkārāgṛhaṁ tadvadduṣprekṣyaṁ dṛkpathaṁ gatam

फिर अत्यंत कठिनाई से वे उस यज्ञमण्डप तक पहुँचीं — कारागार के समान दुष्प्रेक्ष्य, मानो दृष्टिपथ में प्रवेश कर रहा हो।

श्लोक 28 (skanda.6.192.28)

अथ दृष्ट्वा तु संप्राप्तां सावित्रीं यज्ञमण्डपम् । तत्क्षणाच्च चतुर्वक्त्रः संस्थितोऽधोमुखो ह्रिया

atha dṛṣṭvā tu saṁprāptāṁ sāvitrīṁ yajñamaṇḍapam tatkṣaṇācca caturvaktraḥ saṁsthito'dhomukho hriyā

फिर सावित्री को यज्ञमण्डप में पहुँचा देखकर चतुर्मुख तत्क्षण लज्जा से मुख नीचा किए खड़े हो गए।

श्लोक 29 (skanda.6.192.29)

तथा शम्भुश्च शक्रश्च वासुदेवस्तथैव च । ये चान्ये विबुधास्तत्र संस्थिता यज्ञमंडपे

tathā śambhuśca śakraśca vāsudevastathaiva ca ye cānye vibudhāstatra saṁsthitā yajñamaṁḍape

और उसी प्रकार शम्भु, शक्र, तथा वासुदेव भी, तथा यज्ञमण्डप में स्थित अन्य जो भी देवता थे —

श्लोक 30 (skanda.6.192.30)

ते च ब्राह्मणशार्दूलास्त्यक्त्वा वेदध्वनिं ततः । मूकीभावं गताः सर्वे भयसंत्रस्तमानसाः

te ca brāhmaṇaśārdūlāstyaktvā vedadhvaniṁ tataḥ mūkībhāvaṁ gatāḥ sarve bhayasaṁtrastamānasāḥ

वे सभी ब्राह्मणश्रेष्ठ भी वेदध्वनि त्यागकर, भय से त्रस्त मन वाले होकर मौन हो गए।

श्लोक 31 (skanda.6.192.31)

अथ संवीक्ष्य सावित्री सपत्न्या सहितं पतिम् । कोपसंरक्तनयना परुषं वाक्यमब्रवीत्

atha saṁvīkṣya sāvitrī sapatnyā sahitaṁ patim kopasaṁraktanayanā paruṣaṁ vākyamabravīt

तब अपने पति को सपत्नी सहित देखकर, क्रोध से लाल नेत्रों वाली सावित्री ने यह कठोर वचन कहा —

श्लोक 32 (skanda.6.192.32)

सावित्र्युवाच । किमेतद्युज्यते कर्तुं तव वृद्ध तमाकृते । ऊढवानसि यत्पत्नीमेतां गोपसमुद्भवाम्

sāvitryuvāca kimetadyujyate kartuṁ tava vṛddha tamākṛte ūḍhavānasi yatpatnīmetāṁ gopasamudbhavām

सावित्री ने कहा — "हे वृद्धतम आकृति वाले, तुम्हें यह करना उचित है क्या, कि तुमने गोपोत्पन्न इसे पत्नी बना लिया,

श्लोक 33 (skanda.6.192.33)

उभयोः पक्षयोर्यस्याः स्त्रीणां कांता यथेप्सिताः । शौचाचारपरित्यक्ता धर्मकृत्यपराङ्मुखाः

ubhayoḥ pakṣayoryasyāḥ strīṇāṁ kāṁtā yathepsitāḥ śaucācāraparityaktā dharmakṛtyaparāṅmukhāḥ

जिसके दोनों कुलों की स्त्रियाँ केवल पुरुषों की इच्छानुसार प्रिय, शौचाचार से रहित, धर्मकर्म से विमुख हैं,

श्लोक 34 (skanda.6.192.34)

यदन्वये जनाः सर्वे पशुधर्मरतोत्सवाः । सोदर्यां भगिनीं त्यक्त्वा जननीं च तथा पराम् । तस्याः कुले प्रसेवंते सर्वां नारीं जनाः पराम् । यथा हि पशवोऽश्नंति तृणानि जलपानगाः

yadanvaye janāḥ sarve paśudharmaratotsavāḥ sodaryāṁ bhaginīṁ tyaktvā jananīṁ ca tathā parām tasyāḥ kule prasevaṁte sarvāṁ nārīṁ janāḥ parām yathā hi paśavo'śnaṁti tṛṇāni jalapānagāḥ

जिसके वंश में सभी लोग पशुधर्मरत उत्सवों में लगे रहते हैं — अपनी सगी बहन और यहाँ तक कि अपनी माता को भी छोड़कर, उस कुल के लोग अन्य समस्त स्त्रियों का सेवन करते हैं, जैसे जल पीने वाले पशु तृण खाते हैं।

श्लोक 35 (skanda.6.192.35)

विण्मूत्रं केवलं चक्रुर्भारोद्वहनमेव च तद्वदस्याः कुलं सर्वं तक्रमश्राति केवलम्

viṇmūtraṁ kevalaṁ cakrurbhārodvahanameva ca tadvadasyāḥ kulaṁ sarvaṁ takramaśrāti kevalam

वे केवल मल-मूत्र उत्पन्न करते हैं और भार ढोते हैं — उसी प्रकार उसका सम्पूर्ण कुल केवल तक्र (छाछ) पीता है।

श्लोक 36 (skanda.6.192.36)

कृत्वा मूत्रपुरीषं च जन्मभोगविवर्जितम् । नान्यज्जानाति कर्तव्यं धर्मं स्वोदरसं श्रयात्

kṛtvā mūtrapurīṣaṁ ca janmabhogavivarjitam nānyajjānāti kartavyaṁ dharmaṁ svodarasaṁ śrayāt

मूत्र-पुरीष उत्पन्न करके, जन्म के किसी भी उच्च भोग से रहित, वे अपने उदर की सेवा के अतिरिक्त कोई अन्य कर्तव्य नहीं जानते।

श्लोक 37 (skanda.6.192.37)

अन्त्यजा अपि नो कर्म यत्कुर्वन्ति विगर्हितम् । आभीरास्तच्च कुर्वंति तत्किमेतत्त्वया कृतम्

antyajā api no karma yatkurvanti vigarhitam ābhīrāstacca kurvaṁti tatkimetattvayā kṛtam

अन्त्यज भी वह निन्दनीय कर्म नहीं करते जो आभीर करते हैं — तो फिर तुमने यह क्या कर डाला?

श्लोक 38 (skanda.6.192.38)

अवश्यं यदि ते कार्यं भार्यया परया मखे । त्वया वा ब्राह्मणी कापि प्रख्याता भुवनत्रये

avaśyaṁ yadi te kāryaṁ bhāryayā parayā makhe tvayā vā brāhmaṇī kāpi prakhyātā bhuvanatraye

यदि यज्ञ के लिए तुम्हें अवश्य ही किसी दूसरी पत्नी की आवश्यकता थी, तो क्या त्रैलोक्य में विख्यात कोई ब्राह्मणी तुम्हें नहीं मिली?

श्लोक 39 (skanda.6.192.39)

नोढा विधे वृथा मुण्ड नूनं धूर्तोऽसि मे मतः । यत्त्वया शौचसंत्यक्ता कन्याभावप्रदूषिता

noḍhā vidhe vṛthā muṇḍa nūnaṁ dhūrto'si me mataḥ yattvayā śaucasaṁtyaktā kanyābhāvapradūṣitā

हे मुण्ड विधे, तुमने इसे व्यर्थ नहीं ब्याहा — निश्चय ही मेरे विचार से तुम धूर्त हो, कि तुमने शौचरहित, कुमारीभाव से पहले ही दूषित,

श्लोक 40 (skanda.6.192.40)

प्रभुक्ता बहुभिः पूर्वं तथा गोपकुमारिका। एषा प्राप्ता सुपापाढ्या वेश्याजनशताधिका

prabhuktā bahubhiḥ pūrvaṁ tathā gopakumārikā eṣā prāptā supāpāḍhyā veśyājanaśatādhikā

पहले अनेकों द्वारा भोगी गई इस गोपकुमारी को अपनाया; यह अत्यंत पापयुक्त सैकड़ों वेश्याजनों से भी बढ़कर यहाँ आ पहुँची है।

श्लोक 41 (skanda.6.192.41)

अन्त्यजाता तथा कन्या क्षतयोनिः प्रजायते। तथा गोपकुमारी च काचित्तादृक्प्रजायते

antyajātā tathā kanyā kṣatayoniḥ prajāyate tathā gopakumārī ca kācittādṛkprajāyate

अन्त्यजा में उत्पन्न कन्या क्षतयोनि होकर ही जन्म लेती है; वैसे ही कोई गोपकुमारी भी उसी प्रकार जन्म लेती है।

श्लोक 42 (skanda.6.192.42)

मातृकं पैतृकं वंशं श्वाशुरं च प्रपातयेत्। तस्मादेतेन कृत्येन गर्हितेन धरातले

mātṛkaṁ paitṛkaṁ vaṁśaṁ śvāśuraṁ ca prapātayet tasmādetena kṛtyena garhitena dharātale

वह मातृकुल, पितृकुल, और श्वसुरकुल — तीनों को गिरा देगी। इसलिए इस निन्दनीय कृत्य के कारण, इस पृथ्वी पर,

श्लोक 43 (skanda.6.192.43)

न त्वं प्राप्स्यसि तां पूजां तथा न्ये विबुधोत्तमाः। अनेन कर्मणा चैव यदि मे स्ति ऋतं क्वचित्

na tvaṁ prāpsyasi tāṁ pūjāṁ tathā nye vibudhottamāḥ anena karmaṇā caiva yadi me sti ṛtaṁ kvacit

तुम्हें अन्य श्रेष्ठ देवताओं के समान वह पूजा कभी प्राप्त नहीं होगी — इसी कर्म के कारण, यदि मुझमें कहीं भी सत्य है।

श्लोक 44 (skanda.6.192.44)

पूजां ये च करिष्यंति भविष्यंति च निर्धनाः। कथं न लज्जितोसि त्वमेतत्कुर्वन्विगर्हितम्

pūjāṁ ye ca kariṣyaṁti bhaviṣyaṁti ca nirdhanāḥ kathaṁ na lajjitosi tvametatkurvanvigarhitam

जो तुम्हारी पूजा करेंगे, वे निर्धन हो जाएँगे। यह निन्दनीय कर्म करते हुए तुम्हें लज्जा क्यों नहीं आती,

श्लोक 45 (skanda.6.192.45)

पुत्राणामथ पौत्राणामन्येषां च दिवौकसाम्। अयोग्यं चैव विप्राणां यदेतत्कृतवानसि

putrāṇāmatha pautrāṇāmanyeṣāṁ ca divaukasām ayogyaṁ caiva viprāṇāṁ yadetatkṛtavānasi

जो तुमने किया है, वह पुत्रों, पौत्रों, अन्य देवताओं तथा ब्राह्मणों के लिए भी अयोग्य है।

श्लोक 46 (skanda.6.192.46)

अथ वा नैष दोषस्ते न कामवशगा नराः। लज्जंति च विजानंति कृत्याकृत्यं शुभाशुभम्

atha vā naiṣa doṣaste na kāmavaśagā narāḥ lajjaṁti ca vijānaṁti kṛtyākṛtyaṁ śubhāśubham

अथवा यह दोष तुम्हारा नहीं है — कामवश पुरुष लज्जित नहीं होते, और कृत्य-अकृत्य, शुभ-अशुभ को नहीं पहचानते।

श्लोक 47 (skanda.6.192.47)

अकृत्यं मन्यते कृत्यं मित्रं शत्रुं च मन्यते। शत्रुं च मन्यते मित्रं जनः कामवशं गतः

akṛtyaṁ manyate kṛtyaṁ mitraṁ śatruṁ ca manyate śatruṁ ca manyate mitraṁ janaḥ kāmavaśaṁ gataḥ

कामवश हुआ मनुष्य अकृत्य को कृत्य मानता है, मित्र को शत्रु मानता है,

श्लोक 48 (skanda.6.192.48)

द्यूतकारे यथा सत्यं यथा चौरं च सौहृदम्। यथा नृपस्य नो मित्रं तथा लज्जा न कामिनाम्

dyūtakāre yathā satyaṁ yathā cauraṁ ca sauhṛdam yathā nṛpasya no mitraṁ tathā lajjā na kāminām

और शत्रु को मित्र मानता है। जैसे जुआरी में सत्य, चोर में सौहार्द, राजा में मित्रता नहीं होती, वैसे ही कामी में लज्जा नहीं होती।

श्लोक 49 (skanda.6.192.49)

अपि स्याच्छीतलो वह्निश्चंद्रमा दहनात्मकः। क्षाराब्दिरपि मिष्टः स्यान्न कामी लज्जते ध्रुवम्

api syācchītalo vahniścaṁdramā dahanātmakaḥ kṣārābdirapi miṣṭaḥ syānna kāmī lajjate dhruvam

अग्नि शीतल हो सकती है, चन्द्रमा दाहक हो सकता है, खारा समुद्र मीठा हो सकता है, किन्तु कामी निश्चय ही कभी लज्जित नहीं होता।

श्लोक 50 (skanda.6.192.50)

न मे स्याद्दुखमेतद्धि यत्सापत्न्यमुपस्थितम्। सहस्रमपि नारीणां पुरुषाणां यथा भवेत्

na me syāddukhametaddhi yatsāpatnyamupasthitam sahasramapi nārīṇāṁ puruṣāṇāṁ yathā bhavet

यह सापत्न्य जो मुझ पर आया है, यह मुझे दुःखकर न होता, यदि यह वैसा होता जैसे सहस्र स्त्रियों वाले पुरुषों में होता है —

श्लोक 51 (skanda.6.192.51)

कुलीनानां च शुद्धानां स्वजात्यानां विशेषतः। त्वं कुरुष्व पराणां च यदि कामवशं गतः

kulīnānāṁ ca śuddhānāṁ svajātyānāṁ viśeṣataḥ tvaṁ kuruṣva parāṇāṁ ca yadi kāmavaśaṁ gataḥ

अर्थात् यदि तुम अपनी ही जाति की, कुलीन और शुद्ध किसी अन्य स्त्री को अपनाते। किन्तु तुमने, कामवश होकर, सर्वथा अन्य जाति की स्त्री को अपनाया है।

श्लोक 52 (skanda.6.192.52)

एतत्पुनर्महद्दुःखं यदाभीरी विगर्हिता। वेश्येव नष्टचारित्रा त्वयोढा बहुभर्तृका

etatpunarmahadduḥkhaṁ yadābhīrī vigarhitā veśyeva naṣṭacāritrā tvayoḍhā bahubhartṛkā

किन्तु यह और भी बड़ा दुःख है कि यह निन्दित आभीर स्त्री, नष्टचरित्रा वेश्या के समान, पहले से ही अनेक पतियों वाली होकर तुम्हारे द्वारा ब्याही गई है।

श्लोक 53 (skanda.6.192.53)

तस्मादहं प्रयास्यामि यत्र नाम न ते विधे । श्रूयते कामलुब्धस्य ह्रिया परिहृतस्य च

tasmādahaṁ prayāsyāmi yatra nāma na te vidhe śrūyate kāmalubdhasya hriyā parihṛtasya ca

इसलिए मैं वहाँ जाऊँगी, हे विधे, जहाँ तुम्हारा नाम भी न सुना जाता हो — कामी और लज्जा से त्यक्त पुरुष के योग्य स्थान।

श्लोक 54 (skanda.6.192.54)

अहं विडंबिता यस्मादत्रानीय त्वया विधे । पुरतो देवपत्नीनां देवानां च द्विजन्मनाम् । तस्मात्पूजां न ते कश्चित्सांप्रतं प्रकरिष्यति

ahaṁ viḍaṁbitā yasmādatrānīya tvayā vidhe purato devapatnīnāṁ devānāṁ ca dvijanmanām tasmātpūjāṁ na te kaścitsāṁprataṁ prakariṣyati

चूँकि मुझे यहाँ लाकर, हे विधे, देवपत्नियों, देवताओं और द्विजों के सामने उपहासित किया गया है, इसलिए अब कोई भी तुम्हारी पूजा नहीं करेगा।

श्लोक 55 (skanda.6.192.55)

अद्य प्रभृति यः पूजां मंत्रपूजां करिष्यति । तव मर्त्यो धरापृष्ठे यथान्येषां दिवौकसाम्

adya prabhṛti yaḥ pūjāṁ maṁtrapūjāṁ kariṣyati tava martyo dharāpṛṣṭhe yathānyeṣāṁ divaukasām

आज से जो भी मन्त्रपूर्वक तुम्हारी पूजा करेगा, वह मर्त्य इस धरातल पर, जैसे अन्य देवताओं की पूजा होती है वैसे ही,

श्लोक 56 (skanda.6.192.56)

भविष्यति च तद्वंशो दरिद्रो दुःखसंयुतः । ब्राह्मणः क्षत्रियो वापि वैश्यः शूद्रोपि चालये

bhaviṣyati ca tadvaṁśo daridro duḥkhasaṁyutaḥ brāhmaṇaḥ kṣatriyo vāpi vaiśyaḥ śūdropi cālaye

उसका वंश दरिद्र और दुःखयुक्त हो जाएगा, चाहे वह ब्राह्मण हो, क्षत्रिय हो, वैश्य हो, अथवा शूद्र भी उसके घर में हो।

श्लोक 57 (skanda.6.192.57)

एषाऽभीरसुता यस्मान्मम स्थाने विगर्हिता । भविष्यति न संतानस्तस्माद्वाक्यान्ममैव हि

eṣā'bhīrasutā yasmānmama sthāne vigarhitā bhaviṣyati na saṁtānastasmādvākyānmamaiva hi

चूँकि यह आभीरकन्या मेरे सामने इस प्रकार निन्दित हुई है, इसलिए मेरे इसी वचन से इसे संतान प्राप्त नहीं होगी।

श्लोक 58 (skanda.6.192.58)

न पूजां लप्स्यते लोके यथान्या देवयोषितः

na pūjāṁ lapsyate loke yathānyā devayoṣitaḥ

यह अन्य देवांगनाओं के समान लोक में पूजा कभी प्राप्त नहीं करेगी।

श्लोक 59 (skanda.6.192.59)

करिष्यति च या नारी पूजा यस्या अपि क्वचित् । सा भविष्यति दुःखाढ्या वंध्या दौर्भाग्यसंयुता

kariṣyati ca yā nārī pūjā yasyā api kvacit sā bhaviṣyati duḥkhāḍhyā vaṁdhyā daurbhāgyasaṁyutā

और जो भी स्त्री कभी, कहीं भी इसकी पूजा करेगी, वह दुःखयुक्त, वंध्या, दुर्भाग्ययुक्त हो जाएगी,

श्लोक 60 (skanda.6.192.60)

पापिष्ठा नष्टचारित्रा यथैषा पंचभर्तृका । विख्यातिं यास्यते लोके यथा चासौ तथैव सा

pāpiṣṭhā naṣṭacāritrā yathaiṣā paṁcabhartṛkā vikhyātiṁ yāsyate loke yathā cāsau tathaiva sā

अत्यंत पापिष्ठा, नष्टचरित्रा, इसी पंचभर्तृका के समान — वह लोक में उसी प्रकार विख्यात होगी जैसे यह है।

श्लोक 61 (skanda.6.192.61)

एतस्या अन्वयः पापो भविष्यति निशाचर । सत्यशौचपरित्यक्ताः शिष्टसंगविवर्जिताः

etasyā anvayaḥ pāpo bhaviṣyati niśācara satyaśaucaparityaktāḥ śiṣṭasaṁgavivarjitāḥ

इसका वंश पापी होगा, हे निशाचर; सत्य और शौच से रहित, सज्जनों के संग से वंचित,

श्लोक 62 (skanda.6.192.62)

अनिकेता भविष्यंति वंशेऽस्या गोप्रजीविनः । एवं शप्त्वा विधिं साध्वी गायत्रीं च ततः परम्

aniketā bhaviṣyaṁti vaṁśe'syā goprajīvinaḥ evaṁ śaptvā vidhiṁ sādhvī gāyatrīṁ ca tataḥ param

इसके वंश में लोग गृहरहित, गोपालन पर जीवनयापन करने वाले होंगे।" इस प्रकार विधाता को और फिर गायत्री को शाप देकर, वह साध्वी —

श्लोक 63 (skanda.6.192.63)

ततो देवगणान्सर्वाञ्छशाप च तदा सती । भोभोः शक्र त्वयानीता यदेषा पंचभर्तृका

tato devagaṇānsarvāñchaśāpa ca tadā satī bhobhoḥ śakra tvayānītā yadeṣā paṁcabhartṛkā

फिर समस्त देवगणों को भी उन्होंने शाप दे दिया — "हे शक्र, चूँकि तुमने इस पंचभर्तृका को यहाँ लाया है,

श्लोक 64 (skanda.6.192.64)

तदाप्नुहि फलं सम्यक्छुभं कृत्वा गुरोरिदम् । त्वं शत्रुभिर्जितो युद्धे बंधनं समवाप्स्यसि

tadāpnuhi phalaṁ samyakchubhaṁ kṛtvā guroridam tvaṁ śatrubhirjito yuddhe baṁdhanaṁ samavāpsyasi

तो अपने गुरु के लिए यह सुन्दर कार्य करने का उचित फल पाओ — युद्ध में शत्रुओं द्वारा पराजित होकर तुम बंधन को प्राप्त होगे।

श्लोक 65 (skanda.6.192.65)

कारागारे चिरं कालं संगमिष्यत्यसंशयम् । वासुदेव त्वया यस्मादेषा वै पंचभर्तृका

kārāgāre ciraṁ kālaṁ saṁgamiṣyatyasaṁśayam vāsudeva tvayā yasmādeṣā vai paṁcabhartṛkā

दीर्घकाल तक निःसंदेह कारागार में रहोगे। हे वासुदेव, चूँकि तुमने भी इस पंचभर्तृका का,

श्लोक 66 (skanda.6.192.66)

अनुमोदिता विधेः पूर्वं तस्माच्छप्स्याम्यसंशयम् । त्वं चापि परभृत्यत्वं संप्राप्स्यसि सुदुर्मते

anumoditā vidheḥ pūrvaṁ tasmācchapsyāmyasaṁśayam tvaṁ cāpi parabhṛtyatvaṁ saṁprāpsyasi sudurmate

पूर्व में विधाता के कहने पर, अनुमोदन किया था, इसलिए मैं तुम्हें भी निःसंदेह शाप देती हूँ — तुम भी, हे दुर्मते, दूसरों की सेवा को प्राप्त होगे।

श्लोक 67 (skanda.6.192.67)

समीपस्थोऽपि रुद्र त्वं कर्मैतद्यदुपेक्षसे । निषेधयसि नो मूढ तस्माच्शृणु वचो मम

samīpastho'pi rudra tvaṁ karmaitadyadupekṣase niṣedhayasi no mūḍha tasmācśṛṇu vaco mama

और हे रुद्र, समीप खड़े होते हुए भी, इस कर्म की उपेक्षा करने के कारण, हे मूढ़, इसे रोकते न होने के कारण, इसलिए मेरा वचन सुनो —

श्लोक 68 (skanda.6.192.68)

जीवमानस्य कांतस्य मया तद्विरहोद्भवम् । संसेवितं मृतायां ते दयितायां भविष्यति

jīvamānasya kāṁtasya mayā tadvirahodbhavam saṁsevitaṁ mṛtāyāṁ te dayitāyāṁ bhaviṣyati

जीवित पति से मैंने जो यह विरह-जनित दुःख सहा है, वैसा ही तुम्हें अपनी प्रिया के मृत होने पर सहना होगा।

श्लोक 69 (skanda.6.192.69)

यत्र यज्ञे प्रविष्टेयं गर्हिता पंचभर्तृका । भवानपि हविर्वह्ने यत्त्वं गृह्णासि लौल्यतः

yatra yajñe praviṣṭeyaṁ garhitā paṁcabhartṛkā bhavānapi havirvahne yattvaṁ gṛhṇāsi laulyataḥ

जिस यज्ञ में यह निन्दित पंचभर्तृका प्रविष्ट हुई है, तुम भी, हे अग्नि, जो लोभवश उसमें आहुति ग्रहण करते हो,

श्लोक 70 (skanda.6.192.70)

तथान्येषु च यज्ञेषु सम्यक्छंकाविवर्जितः । तस्माद्दुष्टसमाचार सर्वभक्षो भविष्यसि

tathānyeṣu ca yajñeṣu samyakchaṁkāvivarjitaḥ tasmādduṣṭasamācāra sarvabhakṣo bhaviṣyasi

तथा अन्य यज्ञों में भी बिना किसी शंका के — इसलिए, हे दुष्टाचार, तुम सर्वभक्षी हो जाओगे।

श्लोक 71 (skanda.6.192.71)

स्वधया स्वाहया सार्धं सदा दुःखसमन्वितः । नैवाप्स्यसि परं सौख्यं सर्वकालं यथा पुरा

svadhayā svāhayā sārdhaṁ sadā duḥkhasamanvitaḥ naivāpsyasi paraṁ saukhyaṁ sarvakālaṁ yathā purā

स्वधा और स्वाहा सहित सदा दुःखयुक्त रहोगे; पूर्व की भाँति सर्वकाल परम सुख कभी नहीं पाओगे।

श्लोक 72 (skanda.6.192.72)

एते च ब्राह्मणाः सर्वे लोभोपहतचेतसः । होमं प्रकुर्वते ये च मखे चापि विगर्हिते वित्तलोभेन यत्रैषा निविष्टा पञ्चभर्तृका । तथा च वचनं प्रोक्तं ब्राह्मणीयं भविष्यति

ete ca brāhmaṇāḥ sarve lobhopahatacetasaḥ homaṁ prakurvate ye ca makhe cāpi vigarhite vittalobhena yatraiṣā niviṣṭā pañcabhartṛkā tathā ca vacanaṁ proktaṁ brāhmaṇīyaṁ bhaviṣyati

और लोभ से ग्रस्तचित्त ये सभी ब्राह्मण, जो इस निन्दित यज्ञ में होम करते हैं — जहाँ धनलोभवश यह पंचभर्तृका स्थापित की गई है — यह वचन भी कहा गया है — वे केवल नाममात्र के ब्राह्मण रह जाएँगे।

श्लोक 73 (skanda.6.192.73)

दरिद्रोपहतास्तस्माद्वृषलीपतयस्तथा । वेदविक्रयकर्तारो भविष्यथ न संशयः

daridropahatāstasmādvṛṣalīpatayastathā vedavikrayakartāro bhaviṣyatha na saṁśayaḥ

इसलिए दरिद्रता से पीड़ित होकर वे वृषलीपति (शूद्रा-पति) बनेंगे, तथा निःसंदेह वेदविक्रेता होंगे।

श्लोक 74 (skanda.6.192.74)

भोभो वित्तपते वित्तं ददासि मखविप्लवे । तस्माद्यत्तेऽखिलं वित्तमभोग्यं संभविष्यति

bhobho vittapate vittaṁ dadāsi makhaviplave tasmādyatte'khilaṁ vittamabhogyaṁ saṁbhaviṣyati

"हे वित्तपति (कुबेर), तुम इस विनाशकारी यज्ञ में धन देते हो — इसलिए तुम्हारा जो भी धन है, वह सब अभोग्य हो जाएगा।"

श्लोक 75 (skanda.6.192.75)

तथा देवगणाः सर्वे साहाय्यं ये समाश्रिताः । अत्र कुर्वंति दोषाढ्ये यज्ञे वै पांचभर्तृके

tathā devagaṇāḥ sarve sāhāyyaṁ ye samāśritāḥ atra kurvaṁti doṣāḍhye yajñe vai pāṁcabhartṛke

तथा जो भी देवगण इस दोषयुक्त, पंचभर्तृक यज्ञ में सहायता करते हैं,

श्लोक 76 (skanda.6.192.76)

संतानेन परित्यक्तास्ते भविष्यंति सांप्रतम्। दानवैश्च पराभूता दुःखं प्राप्स्यति केवलम्

saṁtānena parityaktāste bhaviṣyaṁti sāṁpratam dānavaiśca parābhūtā duḥkhaṁ prāpsyati kevalam

वे अब अपनी ही संतान द्वारा त्यक्त हो जाएँगे, और दानवों से पराभूत होकर केवल दुःख ही पाएँगे।

श्लोक 77 (skanda.6.192.77)

एतस्याः पार्श्वतश्चान्याश्चतस्रो या व्यवस्थिताः । आभीरीति सप त्नीति प्रोक्ता ध्यानप्रहर्षिताः

etasyāḥ pārśvataścānyāścatasro yā vyavasthitāḥ ābhīrīti sapa tnīti proktā dhyānapraharṣitāḥ

और इसके पार्श्व में स्थित ये अन्य चार, जो आभीर की सपत्नियाँ कही जाती हैं, ध्यान में प्रसन्न रहने वाली,

श्लोक 78 (skanda.6.192.78)

मम द्वेषपरा नित्यं शिवदूतीपुरस्सराः । तासां परस्परं संगः कदाचिच्च भविष्यति

mama dveṣaparā nityaṁ śivadūtīpurassarāḥ tāsāṁ parasparaṁ saṁgaḥ kadācicca bhaviṣyati

सदा मुझसे द्वेष रखने वाली, शिवदूती के अनुगामी — कभी-कभी उनका आपस में मिलन होगा,

श्लोक 79 (skanda.6.192.79)

नान्येनात्र नरेणापि दृष्टिमात्रमपि क्षितौ । पर्वताग्रेषु दुर्गेषु चागम्येषु च देहिनाम् । वासः संपत्स्यते नित्यं सर्वभोगविवर्जितः

nānyenātra nareṇāpi dṛṣṭimātramapi kṣitau parvatāgreṣu durgeṣu cāgamyeṣu ca dehinām vāsaḥ saṁpatsyate nityaṁ sarvabhogavivarjitaḥ

किन्तु इस पृथ्वी पर वे किसी अन्य पुरुष को कभी दिखाई नहीं देंगी; उनका निवास सदा पर्वतशिखरों पर, दुर्गम किलों में, प्राणियों के लिए अगम्य स्थानों में, समस्त भोगों से रहित रहेगा।"

श्लोक 80 (skanda.6.192.80)

सूत उवाच । एवमुक्त्वाऽथ सावित्रीकोपोपहतचेतसा । विसृज्य देवपत्नीस्ताः सर्वा याः पार्श्वतः स्थिताः

sūta uvāca evamuktvā'tha sāvitrīkopopahatacetasā visṛjya devapatnīstāḥ sarvā yāḥ pārśvataḥ sthitāḥ

सूत जी ने कहा — ऐसा कहकर, क्रोध से आक्रान्त चित्त सावित्री ने अपने पार्श्व में खड़ी उन समस्त देवपत्नियों को विदा कर दिया,

श्लोक 81 (skanda.6.192.81)

उदङ्मुखी प्रतस्थे च वार्यमाणापि सर्वतः । सर्वाभिर्देवपत्नीभिर्लक्ष्मीपूर्वाभिरेवच

udaṅmukhī pratasthe ca vāryamāṇāpi sarvataḥ sarvābhirdevapatnībhirlakṣmīpūrvābhirevaca

और उत्तराभिमुख होकर प्रस्थित हुईं, यद्यपि लक्ष्मी आदि समस्त देवपत्नियों द्वारा सब ओर से रोकी जाती रहीं —

श्लोक 82 (skanda.6.192.82)

तत्र यास्यामि नो यत्र नामापि किल वै यतः । श्रूयते कामुकस्यास्य तत्र यास्याम्यहं द्रुतम्

tatra yāsyāmi no yatra nāmāpi kila vai yataḥ śrūyate kāmukasyāsya tatra yāsyāmyahaṁ drutam

"मैं वहीं जाऊँगी जहाँ इस कामुक का नाम भी सुनाई न दे — वहीं शीघ्र जाऊँगी।"

श्लोक 83 (skanda.6.192.83)

एकश्चरणयोर्न्यस्तो वामः पर्वतरोधसि । द्वितीयेन समारूढा तस्यागस्य तथोपरि

ekaścaraṇayornyasto vāmaḥ parvatarodhasi dvitīyena samārūḍhā tasyāgasya tathopari

उन्होंने एक चरण पर्वत के ढाल पर रखा, और दूसरे से उसके शिखर पर आरूढ़ हो गईं।

श्लोक 84 (skanda.6.192.84)

अद्यापि तत्पदं वामं तस्यास्तत्र प्रदृश्यते । सर्वपापहरं पुण्यं स्थितं पर्वतरोधसि

adyāpi tatpadaṁ vāmaṁ tasyāstatra pradṛśyate sarvapāpaharaṁ puṇyaṁ sthitaṁ parvatarodhasi

आज भी वह उनका वाम चरण-चिह्न वहाँ, पर्वत के ढाल पर, सर्वपापहर पवित्र रूप में दिखाई देता है।

श्लोक 85 (skanda.6.192.85)

अपि पापसमाचारो यस्तं पूजयते नरः । सर्वपातकनिर्मुक्तः स याति परमं पदम्

api pāpasamācāro yastaṁ pūjayate naraḥ sarvapātakanirmuktaḥ sa yāti paramaṁ padam

यहाँ तक कि पापाचारी मनुष्य भी उसकी पूजा करके समस्त पातकों से मुक्त होकर परमपद को प्राप्त होता है।

श्लोक 86 (skanda.6.192.86)

यो यं काममभि ध्याय तमर्चयति मानवः । अवश्यं समवाप्नोति यद्यपि स्यात्सुदुर्लभम्

yo yaṁ kāmamabhi dhyāya tamarcayati mānavaḥ avaśyaṁ samavāpnoti yadyapi syātsudurlabham

जो मनुष्य जिस कामना का ध्यान करके उसकी अर्चना करता है, वह उसे अवश्य प्राप्त कर लेता है, चाहे वह कितना भी दुर्लभ क्यों न हो।

श्लोक 87 (skanda.6.192.87)

सूत उवाच । एवं तत्र स्थिता देवी सावित्री पर्वता श्रया । अपमानं महत्प्राप्य सकाशात्स्वपतेस्तदा

sūta uvāca evaṁ tatra sthitā devī sāvitrī parvatā śrayā apamānaṁ mahatprāpya sakāśātsvapatestadā

सूत जी ने कहा — इस प्रकार पर्वत का आश्रय लेकर वहाँ स्थित वह देवी सावित्री, अपने ही पति से महान अपमान पाकर —

श्लोक 88 (skanda.6.192.88)

यस्तामर्चयते सम्यक्पौर्णमास्यां विशेषतः । सर्वान्कामानवाप्नोति स मनोवांछितां स्तदा

yastāmarcayate samyakpaurṇamāsyāṁ viśeṣataḥ sarvānkāmānavāpnoti sa manovāṁchitāṁ stadā

जो कोई विशेषतः पूर्णिमा को उनकी भलीभाँति पूजा करता है, वह उसी समय अपनी समस्त मनोवांछित कामनाओं को प्राप्त कर लेता है।

श्लोक 89 (skanda.6.192.89)

या नारी कुरुते भक्त्या दीपदानं तदग्रतः । रक्ततंतुभिराज्येन श्रूयतां तस्य यत्फलम्

yā nārī kurute bhaktyā dīpadānaṁ tadagrataḥ raktataṁtubhirājyena śrūyatāṁ tasya yatphalam

जो नारी भक्तिपूर्वक उनके सामने रक्त-वर्ती (लाल बत्ती) और घृत से दीपदान करती है, उसका फल सुनिए —

श्लोक 90 (skanda.6.192.90)

यावन्तस्तंतवस्तस्य दह्यंते दीप संभवाः । मुहूर्तानि च यावंति घृतदीपश्च तिष्ठति । तावज्जन्मसहस्राणि सा स्यात्सौभाग्यभांगिनी

yāvantastaṁtavastasya dahyaṁte dīpa saṁbhavāḥ muhūrtāni ca yāvaṁti ghṛtadīpaśca tiṣṭhati tāvajjanmasahasrāṇi sā syātsaubhāgyabhāṁginī

जितने तंतु (बत्तियाँ) उस दीप में जलते हैं, और जितने मुहूर्त तक वह घृतदीप जलता रहता है, उतने ही सहस्र जन्मों तक वह सौभाग्यशालिनी होगी,

श्लोक 91 (skanda.6.192.91)

पुत्रपौत्रसमोपेता धनिनी शील मंडना। न दुर्भगा न वन्ध्या च न च काणा विरूपिका

putrapautrasamopetā dhaninī śīla maṁḍanā na durbhagā na vandhyā ca na ca kāṇā virūpikā

पुत्र-पौत्रों से युक्त, धनवती, शीलमण्डिता; न वह दुर्भगा होगी, न वंध्या, न काणी, न विरूपा।

श्लोक 92 (skanda.6.192.92)

या नृत्यं कुरुते नारी विधवापि तदग्रतः । गीतं वा कुरुते तत्र तस्याः शृणुत यत्फलम्

yā nṛtyaṁ kurute nārī vidhavāpi tadagrataḥ gītaṁ vā kurute tatra tasyāḥ śṛṇuta yatphalam

जो नारी, विधवा होते हुए भी, उनके सामने नृत्य करती है, अथवा वहाँ गान करती है, उसका फल सुनिए —

श्लोक 93 (skanda.6.192.93)

यथायथा नृत्यमाना स्वगात्रं विधुनोति च । तथातथा धुनोत्येव यत्पापं प्रकृतं पुरा

yathāyathā nṛtyamānā svagātraṁ vidhunoti ca tathātathā dhunotyeva yatpāpaṁ prakṛtaṁ purā

जैसे-जैसे वह नृत्य करते हुए अपने शरीर को हिलाती है, वैसे-वैसे ही वह पूर्वकृत पाप को झाड़ देती है।

श्लोक 94 (skanda.6.192.94)

यावन्तो जन्तवो गीतं तस्याः शृण्वंति तत्र च । तावंति दिवि वर्षाणि सहस्राणि वसेच्च सा

yāvanto jantavo gītaṁ tasyāḥ śṛṇvaṁti tatra ca tāvaṁti divi varṣāṇi sahasrāṇi vasecca sā

जितने प्राणी उसका गीत वहाँ सुनते हैं, उतने ही सहस्र वर्षों तक वह स्वर्ग में निवास करती है।

श्लोक 95 (skanda.6.192.95)

सावित्रीं या समुद्दिश्य फलदानं करोति सा । फलसंख्याप्रमाणानि युगानि दिवि मोदते

sāvitrīṁ yā samuddiśya phaladānaṁ karoti sā phalasaṁkhyāpramāṇāni yugāni divi modate

जो सावित्री को लक्ष्य करके फलदान करती है, वह फलों की संख्या के बराबर युगों तक स्वर्ग में आनन्दित रहती है।

श्लोक 96 (skanda.6.192.96)

मिष्टान्नं यच्छते यश्च नारीणां च विशेषतः । तस्या दक्षिणमूर्तौ च भर्त्राढ्यानां द्विजोत्तमाः । स च सिक्थप्रमाणानि युगा नि दिवि मोदते

miṣṭānnaṁ yacchate yaśca nārīṇāṁ ca viśeṣataḥ tasyā dakṣiṇamūrtau ca bhartrāḍhyānāṁ dvijottamāḥ sa ca sikthapramāṇāni yugā ni divi modate

और जो मिष्टान्न देता है, विशेषतः सधवा स्त्रियों को, उनकी दक्षिणाभिमुख मूर्ति के सामने, हे द्विजोत्तमो, वह भी चावल के दानों की संख्या के बराबर युगों तक स्वर्ग में आनन्दित रहता है।

श्लोक 97 (skanda.6.192.97)

यः श्राद्धं कुरुते तत्र सम्यक्छ्रद्धासमन्वितः । रसेनैकेन सस्येन तथैकेन द्विजोत्तमाः । तस्यापि जायते पुण्यं गयाश्राद्धेन यद्भवेत्

yaḥ śrāddhaṁ kurute tatra samyakchraddhāsamanvitaḥ rasenaikena sasyena tathaikena dvijottamāḥ tasyāpi jāyate puṇyaṁ gayāśrāddhena yadbhavet

जो वहाँ श्रद्धासहित, केवल एक रस और एक अन्न से भी श्राद्ध करता है, हे द्विजोत्तमो, उसे भी गया-श्राद्ध के समान पुण्य प्राप्त होता है।

श्लोक 98 (skanda.6.192.98)

यः करोति द्विजस्तस्या दक्षिणां दिशमाश्रितः । सन्ध्योपासनमेकं तु स्वपत्न्या क्षिपितैर्जलैः

yaḥ karoti dvijastasyā dakṣiṇāṁ diśamāśritaḥ sandhyopāsanamekaṁ tu svapatnyā kṣipitairjalaiḥ

जो ब्राह्मण उस दक्षिण दिशा की ओर मुख करके, अपनी पत्नी द्वारा छिड़के गए जल से एक बार भी संध्योपासन करता है,

श्लोक 99 (skanda.6.192.99)

सायंतने च संप्राप्ते काले ब्राह्मणसत्तमाः। तेन स्याद्वंदिता संध्या सम्यग्द्वादशवार्षिकी

sāyaṁtane ca saṁprāpte kāle brāhmaṇasattamāḥ tena syādvaṁditā saṁdhyā samyagdvādaśavārṣikī

सायंकाल का समय आने पर, हे ब्राह्मणसत्तमो, उसकी वह संध्या द्वादश वर्षों तक भलीभाँति की गई मानी जाती है।

श्लोक 100 (skanda.6.192.100)

यो जपेद्ब्राह्मणस्तस्याः सावित्रीं पुरतः स्थितः । तस्य यत्स्यात्फलं विप्राः श्रूयतां तद्वदामि वः

yo japedbrāhmaṇastasyāḥ sāvitrīṁ purataḥ sthitaḥ tasya yatsyātphalaṁ viprāḥ śrūyatāṁ tadvadāmi vaḥ

जो ब्राह्मण उनकी सावित्री के सामने खड़े होकर जप करता है, उसका जो फल होता है, हे विप्रो, सुनो, मैं तुम्हें बताता हूँ।

श्लोक 101 (skanda.6.192.101)

दशभिर्ज्जन्मजनितं शतेन च पुरा कृतम् । त्रियुगे तु सहस्रेण तस्य नश्यति पातकम्

daśabhirjjanmajanitaṁ śatena ca purā kṛtam triyuge tu sahasreṇa tasya naśyati pātakam

दस जन्मों में उत्पन्न पाप सौ जप से, और तीन युगों (कृत, त्रेता, द्वापर) में किया गया पाप सहस्र जप से नष्ट हो जाता है।

श्लोक 102 (skanda.6.192.102)

तस्मात्सर्वप्रयत्नेन चमत्कारपुरं प्रति । गत्वा तां पूजयेद्देवीं स्तोतव्या च विशेषतः

tasmātsarvaprayatnena camatkārapuraṁ prati gatvā tāṁ pūjayeddevīṁ stotavyā ca viśeṣataḥ

इसलिए सर्वप्रयत्न से चमत्कारपुर जाकर उस देवी की पूजा करनी चाहिए, तथा विशेष रूप से उनकी स्तुति करनी चाहिए।

श्लोक 103 (skanda.6.192.103)

सावित्र्या इदमाख्यानं यः पठेच्छृणुयाच्च वा । सर्वपापविनिर्मुक्तः सुखभागत्र जायते

sāvitryā idamākhyānaṁ yaḥ paṭhecchṛṇuyācca vā sarvapāpavinirmuktaḥ sukhabhāgatra jāyate

जो सावित्री के इस आख्यान को पढ़ता या सुनता है, वह समस्त पापों से मुक्त होकर इस लोक में सुखभागी होकर जन्म लेता है।

श्लोक 104 (skanda.6.192.104)

एतद्वः सर्वमाख्यातं यत्पृष्टोऽहं द्विजोत्तमाः । सावित्र्याः कृत्स्नं माहात्म्यं किं भूयः प्रवदाम्यहम्

etadvaḥ sarvamākhyātaṁ yatpṛṣṭo'haṁ dvijottamāḥ sāvitryāḥ kṛtsnaṁ māhātmyaṁ kiṁ bhūyaḥ pravadāmyaham

यह सब मैंने तुम्हें बताया, हे द्विजोत्तमो, जैसा मुझसे पूछा गया था; सावित्री की सम्पूर्ण महिमा में और क्या कहूँ?

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