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नागर खण्ड · अध्याय 193

गायत्रीवरप्रदान वर्णन

अध्याय 192अध्याय-सूचीअध्याय 194

श्लोक 1 (skanda.6.193.1)

ऋषय ऊचुः । एवं गतायां सावित्र्यां सकोपायां च सूतज । किं कृतं तत्र गायत्र्या ब्रह्माद्यैश्चापि किं सुरैः

ṛṣaya ūcuḥ evaṁ gatāyāṁ sāvitryāṁ sakopāyāṁ ca sūtaja kiṁ kṛtaṁ tatra gāyatryā brahmādyaiścāpi kiṁ suraiḥ

ऋषियों ने कहा — "हे सूतपुत्र, इस प्रकार सावित्री के क्रोधित होकर चले जाने पर, वहाँ गायत्री ने क्या किया, और ब्रह्मा आदि देवताओं ने भी क्या किया?"

श्लोक 2 (skanda.6.193.2)

एतत्सर्वं समाचक्ष्व परं कौतूहलं हि नः । कथं शापान्विता देवाः संस्थितास्तत्र मण्डपे

etatsarvaṁ samācakṣva paraṁ kautūhalaṁ hi naḥ kathaṁ śāpānvitā devāḥ saṁsthitāstatra maṇḍape

"यह सब हमें बताइए — हमें अत्यंत कौतूहल है — शाप से युक्त होकर देवगण उस मण्डप में कैसे स्थित रहे?"

श्लोक 3 (skanda.6.193.3)

सूत उवाच । गतायामथ सावित्र्यां शापं दत्त्वा द्विजोत्तमाः । गायत्री सहसोत्थाय वाक्यमेतदुदैरयत्

sūta uvāca gatāyāmatha sāvitryāṁ śāpaṁ dattvā dvijottamāḥ gāyatrī sahasotthāya vākyametadudairayat

सूत जी ने कहा — जब सावित्री शाप देकर चली गईं, हे द्विजोत्तमो, तब गायत्री सहसा उठकर यह वचन बोलीं —

श्लोक 4 (skanda.6.193.4)

सावित्र्या यद्वचः प्रोक्तं तन्न शक्यं कथंचन । अन्यथा कर्तुमेवाथ सर्वैरपि सुरासुरैः

sāvitryā yadvacaḥ proktaṁ tanna śakyaṁ kathaṁcana anyathā kartumevātha sarvairapi surāsuraiḥ

"सावित्री ने जो कुछ कहा है, वह किसी भी प्रकार अन्यथा नहीं किया जा सकता, चाहे समस्त देव और असुर मिलकर भी प्रयत्न करें।"

श्लोक 5 (skanda.6.193.5)

महासती महाभागा सावित्री सा पतिव्रता । पूज्या च सर्वदेवानां ज्येष्ठा श्रेष्ठा च सद्गणैः

mahāsatī mahābhāgā sāvitrī sā pativratā pūjyā ca sarvadevānāṁ jyeṣṭhā śreṣṭhā ca sadgaṇaiḥ

"वह महासती, महाभागा, पतिव्रता सावित्री समस्त देवताओं द्वारा पूज्य हैं, सद्गणों में ज्येष्ठा और श्रेष्ठा हैं।"

श्लोक 6 (skanda.6.193.6)

परं स्त्रीणां स्वभावोऽयं सर्वासां सुरसत्तमाः। अपि सह्यो वज्रपातः सपत्न्या न पुनः कथा

paraṁ strīṇāṁ svabhāvo'yaṁ sarvāsāṁ surasattamāḥ api sahyo vajrapātaḥ sapatnyā na punaḥ kathā

"किन्तु यह सभी स्त्रियों का स्वभाव ही है, हे सुरसत्तमो — वज्रपात तो सहा जा सकता है, किन्तु सपत्नी की बात कभी नहीं।"

श्लोक 7 (skanda.6.193.7)

मत्कृते येऽत्र शपिता सावित्र्या ब्राह्मणाः सुराः । तेषामहं करिष्यामि शक्त्या साधारणां स्वयम्

matkṛte ye'tra śapitā sāvitryā brāhmaṇāḥ surāḥ teṣāmahaṁ kariṣyāmi śaktyā sādhāraṇāṁ svayam

"मेरे कारण यहाँ जो ब्राह्मण और देवता सावित्री द्वारा शापित हुए हैं, उन सबके लिए मैं स्वयं अपनी शक्ति के अनुसार साधारण (उचित उपाय) करूँगी।"

श्लोक 8 (skanda.6.193.8)

अपूज्योऽयं विधिः प्रोक्तस्तया मंत्रपुरःसरः । सर्वेषामेव वर्णानां विप्रादीनां सुरो त्तमाः

apūjyo'yaṁ vidhiḥ proktastayā maṁtrapuraḥsaraḥ sarveṣāmeva varṇānāṁ viprādīnāṁ suro ttamāḥ

"उन्होंने इस मन्त्रपूर्वक विधि को समस्त वर्णों — ब्राह्मण आदि — के लिए अपूज्य घोषित कर दिया है, हे सुरोत्तमो।"

श्लोक 9 (skanda.6.193.9)

ब्रह्मस्थानेषु सर्वेषु समये धरणीतले । न ब्रह्मणा विना किंचित्कृत्यं सिद्धिमुपैष्यति

brahmasthāneṣu sarveṣu samaye dharaṇītale na brahmaṇā vinā kiṁcitkṛtyaṁ siddhimupaiṣyati

"तथापि ब्रह्मा के समस्त स्थानों में, उचित समय पर, इस पृथ्वी पर, ब्रह्मा के बिना कोई भी कार्य सिद्धि को नहीं प्राप्त होगा।"

श्लोक 10 (skanda.6.193.10)

कृष्णार्चने च यत्पुण्यं यत्पुण्यं लिंग पूजने । तत्फलं कोटिगुणितं सदा वै ब्रह्मदर्शनात् । भविष्यति न सन्देहो विशेषात्सर्वपर्वसु

kṛṣṇārcane ca yatpuṇyaṁ yatpuṇyaṁ liṁga pūjane tatphalaṁ koṭiguṇitaṁ sadā vai brahmadarśanāt bhaviṣyati na sandeho viśeṣātsarvaparvasu

"कृष्ण के अर्चन में जो पुण्य है, लिंग-पूजन में जो पुण्य है, वह फल ब्रह्मा के दर्शनमात्र से सदा करोड़गुना हो जाएगा; इसमें कोई संदेह नहीं, विशेषतः समस्त पर्वों में।"

श्लोक 11 (skanda.6.193.11)

त्वं च विष्णो तया प्रोक्तो मर्त्यजन्म यदाऽप्स्यसि । तत्रापि परभृत्यत्वं परेषां ते भविष्यति

tvaṁ ca viṣṇo tayā prokto martyajanma yadā'psyasi tatrāpi parabhṛtyatvaṁ pareṣāṁ te bhaviṣyati

"और हे विष्णु, उन्होंने तुमसे कहा है कि जब तुम मर्त्य जन्म ग्रहण करोगे, वहाँ भी तुम्हें दूसरों की सेवा करनी होगी।"

श्लोक 12 (skanda.6.193.12)

तत्कृत्वा रूपद्वितयं तत्र जन्म त्वमाप्स्यसि । यत्तया कथितो वंशो ममायं गोपसंज्ञितः । तत्र त्वं पावनार्थाय चिरं वृद्धिमवाप्स्यसि

tatkṛtvā rūpadvitayaṁ tatra janma tvamāpsyasi yattayā kathito vaṁśo mamāyaṁ gopasaṁjñitaḥ tatra tvaṁ pāvanārthāya ciraṁ vṛddhimavāpsyasi

"वहाँ दो रूप धारण करके तुम वह जन्म प्राप्त करोगे; उन्होंने जिस वंश को मेरा, गोपसंज्ञक, बताया है, उसमें तुम उसकी पवित्रता के लिए दीर्घकाल तक महती वृद्धि प्राप्त करोगे।"

श्लोक 13 (skanda.6.193.13)

एकः कृष्णाभिधानस्तु द्वितीयोऽर्जुनसंज्ञितः । तस्यात्मनोऽर्जुनाख्यस्य सारथ्यं त्वं करिष्यसि

ekaḥ kṛṣṇābhidhānastu dvitīyo'rjunasaṁjñitaḥ tasyātmano'rjunākhyasya sārathyaṁ tvaṁ kariṣyasi

"एक कृष्ण नाम से, दूसरा अर्जुन नाम से होगा; उसी अर्जुन नामक अपने ही स्वरूप का तुम सारथ्य करोगे।"

श्लोक 14 (skanda.6.193.14)

तेनाकृत्येऽपि रक्तास्ते गोपा यास्यंति श्लाघ्यताम् । सर्वेषामेव लोकानां देवानां च विशेषतः

tenākṛtye'pi raktāste gopā yāsyaṁti ślāghyatām sarveṣāmeva lokānāṁ devānāṁ ca viśeṣataḥ

"उस कार्य से, अकुलीन होते हुए भी, वे गोप समस्त लोकों में, तथा विशेषतः देवताओं में भी प्रशंसनीयता को प्राप्त होंगे।"

श्लोक 15 (skanda.6.193.15)

यत्रयत्र च वत्स्यंति मद्वं शप्रभवानराः । तत्रतत्र श्रियो वासो वनेऽपि प्रभविष्यति

yatrayatra ca vatsyaṁti madvaṁ śaprabhavānarāḥ tatratatra śriyo vāso vane'pi prabhaviṣyati

"और जहाँ-जहाँ मेरे वंश में उत्पन्न मनुष्य निवास करेंगे, वहाँ-वहाँ, वन में भी, श्री (लक्ष्मी) का निवास प्रभावशाली होगा।"

श्लोक 16 (skanda.6.193.16)

भोभोः शक्र भवानुक्तो यत्तया कोपयुक्तया । पराजयं रिपोः प्राप्य कारा गारे पतिष्यति

bhobhoḥ śakra bhavānukto yattayā kopayuktayā parājayaṁ ripoḥ prāpya kārā gāre patiṣyati

"'हे शक्र, क्रोधयुक्त होकर उन्होंने तुमसे कहा है कि तुम शत्रु से पराजय प्राप्त करके कारागार में पड़ोगे।"

श्लोक 17 (skanda.6.193.17)

तन्मुक्तिं ते स्वयं ब्रह्मा मद्वाक्येन करिष्यति

tanmuktiṁ te svayaṁ brahmā madvākyena kariṣyati

"किन्तु उससे तुम्हारी मुक्ति स्वयं ब्रह्मा मेरे वचन से करेंगे।"

श्लोक 18 (skanda.6.193.18)

ततः प्रविष्टः संग्रामे न पराजयमाप्स्यसि । त्वं वह्ने सर्वभक्षश्च यत्प्रोक्तो रुष्टया तया

tataḥ praviṣṭaḥ saṁgrāme na parājayamāpsyasi tvaṁ vahne sarvabhakṣaśca yatprokto ruṣṭayā tayā

"फिर संग्राम में प्रविष्ट होकर तुम्हें पराजय प्राप्त नहीं होगी। हे अग्नि, क्रुद्ध होकर उन्होंने तुमसे कहा है कि तुम सर्वभक्षी हो जाओगे —"

श्लोक 19 (skanda.6.193.19)

तदमेध्यमपि प्रायः स्पृष्टं तेऽर्च्चिर्भिरग्रतः । मेध्यतां यास्यति क्षिप्रं ततः पूजामवाप्त्यसि

tadamedhyamapi prāyaḥ spṛṣṭaṁ te'rccirbhiragrataḥ medhyatāṁ yāsyati kṣipraṁ tataḥ pūjāmavāptyasi

"किन्तु जो भी अपवित्र वस्तु पहले तुम्हारी ज्वालाओं से स्पर्श होगी, वह भी शीघ्र पवित्रता को प्राप्त होगी; इससे तुम्हें पूजा प्राप्त होगी।"

श्लोक 20 (skanda.6.193.20)

स्वाहा नाम च भार्या या देवान्सन्तर्पयिष्यति । स्वधा चाऽपि पितॄन्सर्वान्मम वाक्यादसंशयम् । यद्रुद्र प्रियया सार्धं वियोगः कथितस्तया । तस्याः श्रेष्ठ तरा चान्या तव भार्या भविष्यति । गौरीनामेति विख्याता हिमाचलसुता शुभा

svāhā nāma ca bhāryā yā devānsantarpayiṣyati svadhā cā'pi pitṝnsarvānmama vākyādasaṁśayam yadrudra priyayā sārdhaṁ viyogaḥ kathitastayā tasyāḥ śreṣṭha tarā cānyā tava bhāryā bhaviṣyati gaurīnāmeti vikhyātā himācalasutā śubhā

"तथा स्वाहा नामक तुम्हारी पत्नी देवताओं को तृप्त करेगी, और स्वधा भी समस्त पितरों को, मेरे वचन से, निःसंदेह। रुद्र के लिए उन्होंने जो प्रिया-वियोग बताया है, उसकी अपेक्षा भी अधिक श्रेष्ठ पत्नी उन्हें प्राप्त होगी — हिमाचल की शुभ पुत्री, गौरी नाम से विख्यात।"

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