नागर खण्ड · अध्याय 194
ब्रह्मज्ञान-प्राप्ति हेतु कुमारिकातीर्थद्वय एवं गर्तक्षेत्रस्थ पादुका का माहात्म्य-वर्णन
श्लोक 1 (skanda.6.194.1)
सूत उवाच एवं सा तान्वरान्दत्त्वा सर्वेषां शापभागिनाम् मौनव्रतपरा भूत्वा निविष्टाऽथ धरातले
sūta uvāca evaṁ sā tānvarāndattvā sarveṣāṁ śāpabhāginām maunavrataparā bhūtvā niviṣṭā'tha dharātale
सूत जी ने कहा — इस प्रकार शाप से ग्रस्त उन सबको वे वर देकर, मौनव्रत धारण किए हुए वह देवी पृथ्वी पर स्थित हो गईं।
श्लोक 2 (skanda.6.194.2)
ततो देवगणाः सर्वे तापसाश्च महर्षयः साधुसाध्विति तां प्रोच्य ततः प्रोचुरिदं वचः
tato devagaṇāḥ sarve tāpasāśca maharṣayaḥ sādhusādhviti tāṁ procya tataḥ procuridaṁ vacaḥ
तत्पश्चात् समस्त देवगण और तपस्वी महर्षि, उन्हें 'साधु-साधु' कहकर, फिर यह वचन बोले।
श्लोक 3 (skanda.6.194.3)
एतां देवीप्रसादेन ब्राह्मणानां विशेषतः पूजयिष्यंति मर्त्येऽत्र सर्वे लोकाः समाहिताः
etāṁ devīprasādena brāhmaṇānāṁ viśeṣataḥ pūjayiṣyaṁti martye'tra sarve lokāḥ samāhitāḥ
इस देवी के प्रसाद से, विशेषतः ब्राह्मणों की, मृत्युलोक में समस्त लोग एकाग्रचित्त होकर पूजा करेंगे।
श्लोक 4 (skanda.6.194.4)
ब्रह्माणं पूजयित्वा तु पश्चादेनां सुरेश्वरीम् पूजयिष्यंति ये मर्त्यास्ते तु यांति परां गतिम्
brahmāṇaṁ pūjayitvā tu paścādenāṁ sureśvarīm pūjayiṣyaṁti ye martyāste tu yāṁti parāṁ gatim
जो मनुष्य ब्रह्मा की पूजा करके तत्पश्चात् इस सुरेश्वरी की पूजा करेंगे, वे परम गति को प्राप्त होंगे।
श्लोक 5 (skanda.6.194.5)
या कन्या पतिसंयोगं संप्राप्यात्र समाहिता ततः पादप्रणामं च गायत्र्याश्च करिष्यति पतिं प्रजापतिं प्राप्य सा भविष्यत्यसंशयम्
yā kanyā patisaṁyogaṁ saṁprāpyātra samāhitā tataḥ pādapraṇāmaṁ ca gāyatryāśca kariṣyati patiṁ prajāpatiṁ prāpya sā bhaviṣyatyasaṁśayam
जो कन्या यहाँ पति से संयोग पाकर एकाग्रचित्त होकर गायत्री के चरणों में प्रणाम करेगी, वह प्रजापति के समान पति को पाकर निःसंदेह धन्य होगी।
श्लोक 6 (skanda.6.194.6)
सर्वकामसुखोपेता धनधान्यसमन्विता या नारी दुर्भगा वंध्या भविष्यति च शोभना
sarvakāmasukhopetā dhanadhānyasamanvitā yā nārī durbhagā vaṁdhyā bhaviṣyati ca śobhanā
वह समस्त कामनाओं के सुख से युक्त तथा धन-धान्य से संपन्न होगी; और जो नारी दुर्भागी या वंध्या है, वह भी शोभासंपन्न हो जाएगी।
श्लोक 7 (skanda.6.194.7)
ऋषय ऊचुः यदेतद्भवता प्रोक्तं गते पंचोत्तरे शते पद्मजानां हरः प्रादादेतत्कथमनुत्तमम्
ṛṣaya ūcuḥ yadetadbhavatā proktaṁ gate paṁcottare śate padmajānāṁ haraḥ prādādetatkathamanuttamam
ऋषियों ने कहा — आपने जो यह बताया कि एक सौ पाँच वर्ष बीतने पर हर ने कमलज ब्राह्मणों को यह सर्वोत्तम वस्तु प्रदान की, वह किस प्रकार हुआ?
श्लोक 8 (skanda.6.194.8)
ब्राह्मणेभ्यः स संतुष्टः किंवाऽन्योऽस्ति महेश्वरः एतं नः संशयं भूयो यथावद्वक्तुमर्हसि
brāhmaṇebhyaḥ sa saṁtuṣṭaḥ kiṁvā'nyo'sti maheśvaraḥ etaṁ naḥ saṁśayaṁ bhūyo yathāvadvaktumarhasi
क्या महेश्वर ब्राह्मणों से संतुष्ट हुए, या इसका अन्य कोई कारण है? हमारे इस संशय को आप पुनः यथावत् बताने योग्य हैं।
श्लोक 9 (skanda.6.194.9)
आयुष्यं शंकरस्यापि यत्प्रमाणं तथा हरेः ब्रह्मणोऽपि समाचक्ष्व परं कौतूहलं हि नः
āyuṣyaṁ śaṁkarasyāpi yatpramāṇaṁ tathā hareḥ brahmaṇo'pi samācakṣva paraṁ kautūhalaṁ hi naḥ
शंकर की तथा हरि की आयु का जो प्रमाण है, और ब्रह्मा की भी, वह हमें बताइए, क्योंकि हमें इसमें अत्यंत कुतूहल है।
श्लोक 10 (skanda.6.194.10)
सूत उवाच अहं वः कीर्तयिष्यामि विस्तरेण द्विजोत्तमाः त्रयाणामपि चायुष्यं यत्प्रमाणं व्यवस्थितम्
sūta uvāca ahaṁ vaḥ kīrtayiṣyāmi vistareṇa dvijottamāḥ trayāṇāmapi cāyuṣyaṁ yatpramāṇaṁ vyavasthitam
सूत जी ने कहा — हे द्विजश्रेष्ठो, मैं तुम्हें विस्तारपूर्वक उन तीनों देवों की आयु का जो प्रमाण निश्चित है, वह बताऊँगा।
श्लोक 11 (skanda.6.194.11)
निमेषस्य चतुर्भागस्त्रुटिः स्यात्तद्द्वयं लवः लवद्वयं कला प्रोक्ता काष्ठा तु दशपंचभिः
nimeṣasya caturbhāgastruṭiḥ syāttaddvayaṁ lavaḥ lavadvayaṁ kalā proktā kāṣṭhā tu daśapaṁcabhiḥ
निमेष का चौथा भाग त्रुटि कहलाता है, उसके दो त्रुटि का एक लव होता है; दो लव को कला कहा गया है, और पंद्रह कलाओं की एक काष्ठा होती है।
श्लोक 12 (skanda.6.194.12)
त्रिंशत्काष्ठां कलामाहुः क्षणस्त्रिंशत्कलो मतः मुहूर्तमानं मौहूर्ता वदंति द्वादशक्षणम्
triṁśatkāṣṭhāṁ kalāmāhuḥ kṣaṇastriṁśatkalo mataḥ muhūrtamānaṁ mauhūrtā vadaṁti dvādaśakṣaṇam
तीस काष्ठाओं को भी कला कहा गया है, और तीस कलाओं का एक क्षण माना जाता है; मुहूर्त-ज्ञाता मुहूर्त का प्रमाण बारह क्षण बताते हैं।
श्लोक 13 (skanda.6.194.13)
त्रिंशन्मुहूर्तमुद्दिष्टमहोरात्रं मनीषिभिः मासस्त्रिंशदहोरात्रैर्द्वौ मासावृतुसंज्ञितः
triṁśanmuhūrtamuddiṣṭamahorātraṁ manīṣibhiḥ māsastriṁśadahorātrairdvau māsāvṛtusaṁjñitaḥ
बुद्धिमानों ने अहोरात्र को तीस मुहूर्त का बताया है; तीस अहोरात्रों का एक मास होता है, और दो मास को ऋतु कहा जाता है।
श्लोक 14 (skanda.6.194.14)
ऋतुत्रयं चायनं च अयने द्वे तु वत्सरम् दैविकं च भवेत्तच्च ह्यहोरात्रं द्विजोत्तमाः
ṛtutrayaṁ cāyanaṁ ca ayane dve tu vatsaram daivikaṁ ca bhavettacca hyahorātraṁ dvijottamāḥ
तीन ऋतुओं का एक अयन होता है, और दो अयन का एक वर्ष; और हे द्विजश्रेष्ठो, वही एक दिव्य अहोरात्र होता है।
श्लोक 15 (skanda.6.194.15)
उत्तरं चायनं तत्र दिनं रात्रिस्तथाऽपरम् लक्षैः सप्तदशाख्यैस्तु मनुष्याणां च वत्सरैः
uttaraṁ cāyanaṁ tatra dinaṁ rātristathā'param lakṣaiḥ saptadaśākhyaistu manuṣyāṇāṁ ca vatsaraiḥ
उसमें उत्तरायण दिन है, और दूसरा दक्षिणायन रात्रि है। सत्रह लाख मनुष्य-वर्षों से,
श्लोक 16 (skanda.6.194.16)
अष्टाविंशतिभिश्चैव सहस्रैस्तु तथा परैः आद्यं कृतयुगं चैव तद्भविष्यति सद्द्विजाः
aṣṭāviṁśatibhiścaiva sahasraistu tathā paraiḥ ādyaṁ kṛtayugaṁ caiva tadbhaviṣyati saddvijāḥ
तथा अट्ठाईस हजार और वर्षों के साथ, हे सज्जन द्विजो, प्रथम कृतयुग की गणना पूर्ण होती है।
श्लोक 17 (skanda.6.194.17)
ततो द्वादशभिर्लक्षैः षोडशानां सहस्रकैः त्रेतायुगं समादिष्टं द्वितीयं द्विजसत्तमाः
tato dvādaśabhirlakṣaiḥ ṣoḍaśānāṁ sahasrakaiḥ tretāyugaṁ samādiṣṭaṁ dvitīyaṁ dvijasattamāḥ
तत्पश्चात् बारह लाख और सोलह हजार वर्षों से, हे द्विजसत्तमो, द्वितीय त्रेतायुग बताया गया है।
श्लोक 18 (skanda.6.194.18)
द्वापरं चाष्टभिर्लक्षैस्तृतीयं परिकीर्तितम् चतुःषष्टिसहस्रैस्तु यथावत्परिसंख्यया
dvāparaṁ cāṣṭabhirlakṣaistṛtīyaṁ parikīrtitam catuḥṣaṣṭisahasraistu yathāvatparisaṁkhyayā
आठ लाख तथा चौंसठ हजार वर्षों के यथोचित परिगणन से तीसरा द्वापरयुग कहा गया है।
श्लोक 19 (skanda.6.194.19)
चतुर्लक्षं समादिष्टं युगं कलिसमुद्भवम् द्वात्रिंशता सहस्रैस्तु चतुर्थं तद्विदुर्बुधाः
caturlakṣaṁ samādiṣṭaṁ yugaṁ kalisamudbhavam dvātriṁśatā sahasraistu caturthaṁ tadvidurbudhāḥ
कलियुग से उत्पन्न चौथे युग को चार लाख और बत्तीस हजार वर्षों का बुद्धिमान लोग जानते हैं।
श्लोक 20 (skanda.6.194.20)
चतुर्युगसहस्रेण दिनं पैतामहं भवेत् तेषां त्रिंशद्दिनैर्मासो मासैर्द्वादशभिर्वत्सरो भवेत्
caturyugasahasreṇa dinaṁ paitāmahaṁ bhavet teṣāṁ triṁśaddinairmāso māsairdvādaśabhirvatsaro bhavet
एक हजार चतुर्युगों से ब्रह्मा का एक दिन होता है; उन दिनों में से तीस दिनों का एक मास, और बारह मासों का एक वर्ष होता है।
श्लोक 21 (skanda.6.194.21)
ब्रह्मा तेषां शतं यावत्स जीवति पितामहः सांप्रतं चाष्टवर्षीयः षण्मासश्चैव संस्थितः
brahmā teṣāṁ śataṁ yāvatsa jīvati pitāmahaḥ sāṁprataṁ cāṣṭavarṣīyaḥ ṣaṇmāsaścaiva saṁsthitaḥ
पितामह ब्रह्मा उन वर्षों में सौ वर्ष तक जीवित रहते हैं; अभी वे आठ वर्ष और छह मास की अवस्था में स्थित हैं।
श्लोक 22 (skanda.6.194.22)
प्रतिपद्दिवसस्यास्य प्रथमस्य तथा गतम् यामद्वयं शुक्रवारे वर्तमाने महात्मनः
pratipaddivasasyāsya prathamasya tathā gatam yāmadvayaṁ śukravāre vartamāne mahātmanaḥ
उस महात्मा के प्रथम प्रतिपदा दिवस के दो याम भी बीत चुके हैं, और अभी शुक्रवार वर्तमान है।
श्लोक 23 (skanda.6.194.23)
ब्रह्मणो वर्षमात्रेण दिनं वैष्णवमुच्यते
brahmaṇo varṣamātreṇa dinaṁ vaiṣṇavamucyate
ब्रह्मा के मात्र एक वर्ष से विष्णु का एक दिन कहा जाता है।
श्लोक 24 (skanda.6.194.24)
सोपि वर्षशतंयावदात्ममानेन जीवति पंचपचाशदादिष्टास्तस्य जातस्य वत्सराः
sopi varṣaśataṁyāvadātmamānena jīvati paṁcapacāśadādiṣṭāstasya jātasya vatsarāḥ
वे भी अपने मान से सौ वर्ष तक जीवित रहते हैं; उनके जन्म से अब तक पचपन वर्ष बताए गए हैं।
श्लोक 25 (skanda.6.194.25)
तिथयः पंच यामार्द्धं सोमवारेण संगतम् वैष्णवेन तु वर्षेण दिनं माहेश्वरं भवेत्
tithayaḥ paṁca yāmārddhaṁ somavāreṇa saṁgatam vaiṣṇavena tu varṣeṇa dinaṁ māheśvaraṁ bhavet
इसके साथ पाँच तिथियाँ और आधा याम भी है, तथा सोमवार का योग है। एक वैष्णव वर्ष से माहेश्वर दिन होता है।
श्लोक 26 (skanda.6.194.26)
शिवो वर्षशतं यावत्तेन रूपेण च स्थितः यावदुच्छ्वसितं वक्त्रं सदाशिवसमुद्भवम्
śivo varṣaśataṁ yāvattena rūpeṇa ca sthitaḥ yāvaducchvasitaṁ vaktraṁ sadāśivasamudbhavam
शिव उस रूप में सौ वर्ष तक स्थित रहते हैं, जब तक सदाशिव से उत्पन्न मुख श्वास बाहर छोड़ता रहता है।
श्लोक 27 (skanda.6.194.27)
पश्चाच्छक्तिं समभ्येति यावन्निश्वसितं भवेत् निश्वासोच्छ्वसितानां च सर्वेषामेव देहिनाम्
paścācchaktiṁ samabhyeti yāvanniśvasitaṁ bhavet niśvāsocchvasitānāṁ ca sarveṣāmeva dehinām
तत्पश्चात् वे शक्ति में लीन हो जाते हैं, जब तक श्वास भीतर लेना होता है। और समस्त प्राणियों के श्वास-प्रश्वास के
श्लोक 28 (skanda.6.194.28)
ब्रह्मविष्णुशिवानां च गन्धर्वोरगरक्षसाम् एकविंशत्सहस्राणि शतैः षड्भिः शतानि च
brahmaviṣṇuśivānāṁ ca gandharvoragarakṣasām ekaviṁśatsahasrāṇi śataiḥ ṣaḍbhiḥ śatāni ca
अर्थात् ब्रह्मा, विष्णु, शिव, गंधर्व, नाग और राक्षसों के — इक्कीस हजार छह सौ श्वास-प्रश्वास
श्लोक 29 (skanda.6.194.29)
अहोरात्रेण चोक्तानि प्रमाणे द्विजसत्तमाः षड्भिरुच्छ्वासनिश्वासैः पलमेकं प्रवर्तते
ahorātreṇa coktāni pramāṇe dvijasattamāḥ ṣaḍbhirucchvāsaniśvāsaiḥ palamekaṁ pravartate
हे द्विजसत्तमो, एक अहोरात्र के प्रमाण में कहे गए हैं। छह श्वास-प्रश्वासों से एक पल होता है।
श्लोक 30 (skanda.6.194.30)
नाडी षष्टिपला प्रोक्ता तासां षष्ट्या दिनं निशा निश्वासोच्छ्वसितानां च परिसंख्या न विद्यते सदाशिवसमुत्थानामेतस्मात्सोऽक्षयः स्मृतः
nāḍī ṣaṣṭipalā proktā tāsāṁ ṣaṣṭyā dinaṁ niśā niśvāsocchvasitānāṁ ca parisaṁkhyā na vidyate sadāśivasamutthānāmetasmātso'kṣayaḥ smṛtaḥ
एक नाड़ी साठ पलों की कही गई है, और साठ नाड़ियों से एक दिन-रात होता है। किंतु सदाशिव से उत्पन्न श्वास-प्रश्वासों की कोई गणना नहीं है — इसी कारण वे अक्षय स्मरण किए जाते हैं।
श्लोक 31 (skanda.6.194.31)
अन्येऽपि ये प्रगच्छंति ब्रह्मज्ञानसमन्विताः अक्षयास्तेऽपि जायंते सत्यमेतन्मयोदितम्
anye'pi ye pragacchaṁti brahmajñānasamanvitāḥ akṣayāste'pi jāyaṁte satyametanmayoditam
अन्य जो भी लोग ब्रह्मज्ञान से युक्त होकर आगे बढ़ते हैं, वे भी अक्षय हो जाते हैं — यह मेरा कहा हुआ सत्य वचन है।
श्लोक 32 (skanda.6.194.32)
ऋषय ऊचुः यद्येवं सूतपुत्रात्र ब्रह्मविष्णुमहेश्वराः आत्मवर्षशते पूर्णे यांति नाशमसंशयम्
ṛṣaya ūcuḥ yadyevaṁ sūtaputrātra brahmaviṣṇumaheśvarāḥ ātmavarṣaśate pūrṇe yāṁti nāśamasaṁśayam
ऋषियों ने कहा — हे सूतपुत्र, यदि इस प्रकार ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर अपने-अपने सौ वर्ष पूर्ण होने पर निःसंदेह नाश को प्राप्त होते हैं,
श्लोक 33 (skanda.6.194.33)
तत्कथं मानुषाणां च मर्त्यलोकेल्पजीविनाम् कथयंति च ये मुक्तिं विद्वांसश्चैव सूतज
tatkathaṁ mānuṣāṇāṁ ca martyalokelpajīvinām kathayaṁti ca ye muktiṁ vidvāṁsaścaiva sūtaja
तो हे सूतज, मृत्युलोक के अल्पजीवी मनुष्यों की मुक्ति की बात जो विद्वान कहते हैं, वह कैसे संभव है?
श्लोक 34 (skanda.6.194.34)
नूनं तेषां मृषा वादो मोक्षमार्गसमुद्भवः
nūnaṁ teṣāṁ mṛṣā vādo mokṣamārgasamudbhavaḥ
निश्चय ही मोक्ष-मार्ग के विषय में उनका यह कथन मिथ्या ही प्रतीत होता है।
श्लोक 35 (skanda.6.194.35)
सूत उवाच अनादिनिधनः कालः संख्यया परिवर्जितः असंख्याता गता मोक्षं ब्रह्मविष्णुमहेश्वराः
sūta uvāca anādinidhanaḥ kālaḥ saṁkhyayā parivarjitaḥ asaṁkhyātā gatā mokṣaṁ brahmaviṣṇumaheśvarāḥ
सूत जी ने कहा — काल अनादि और अनंत है, गणना से रहित है; असंख्य ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर पहले ही मोक्ष को प्राप्त हो चुके हैं।
श्लोक 36 (skanda.6.194.36)
निजे वर्षशते पूर्णे वालुकारेणवो यथा निजमानेन या श्रद्धा ब्रह्मज्ञानसमुद्भवा तेषां चेन्मानुषाणां च तन्मुक्तिः स्यादसंशयम्
nije varṣaśate pūrṇe vālukāreṇavo yathā nijamānena yā śraddhā brahmajñānasamudbhavā teṣāṁ cenmānuṣāṇāṁ ca tanmuktiḥ syādasaṁśayam
अपने-अपने सौ वर्ष पूर्ण होने पर, बालू के कणों के समान अगणित। और मनुष्यों में भी यदि अपने-अपने मान से ब्रह्मज्ञान से उत्पन्न श्रद्धा हो, तो उनकी भी मुक्ति निःसंदेह होगी।
श्लोक 37 (skanda.6.194.37)
यथैते दंशमशका मानुषाणां च कीटकाः जायंते च म्रियंते च गण्यंते नैव कुत्रचित् इन्द्रादीनां तथा मर्त्याः संभाव्या जगतीतले
yathaite daṁśamaśakā mānuṣāṇāṁ ca kīṭakāḥ jāyaṁte ca mriyaṁte ca gaṇyaṁte naiva kutracit indrādīnāṁ tathā martyāḥ saṁbhāvyā jagatītale
जैसे ये डाँस-मच्छर और मनुष्यों के शरीर के कीड़े जन्मते और मरते हैं, और कहीं भी उनकी गणना नहीं होती, वैसे ही पृथ्वी पर इंद्र आदि देवों की तुलना में मनुष्य समझने चाहिए।
श्लोक 38 (skanda.6.194.38)
देवानां च यथा मर्त्याः कीटस्थाने च संस्थिताः तथा देवा अपि ज्ञेया ब्रह्मणोऽव्यक्तजन्मनः
devānāṁ ca yathā martyāḥ kīṭasthāne ca saṁsthitāḥ tathā devā api jñeyā brahmaṇo'vyaktajanmanaḥ
और जैसे मनुष्य देवताओं की तुलना में कीड़ों के स्थान पर स्थित हैं, वैसे ही देवता भी अव्यक्त-जन्मा ब्रह्मा की तुलना में जानने चाहिए।
श्लोक 39 (skanda.6.194.39)
ब्रह्मणस्तु यथा देवाः कीटस्थाने व्यवस्थिताः तथा ब्रह्मापि विष्णोश्च कीटस्थाने व्यवस्थितः
brahmaṇastu yathā devāḥ kīṭasthāne vyavasthitāḥ tathā brahmāpi viṣṇośca kīṭasthāne vyavasthitaḥ
और जैसे देवता ब्रह्मा की तुलना में कीड़ों के स्थान पर स्थित हैं, वैसे ही ब्रह्मा भी विष्णु की तुलना में कीड़े के स्थान पर स्थित हैं।
श्लोक 40 (skanda.6.194.40)
पितामहो यथा विष्णोः कीटस्थाने व्यवस्थितः तथा स शिवशक्तिभ्यां परिज्ञेयो द्विजोत्तमाः
pitāmaho yathā viṣṇoḥ kīṭasthāne vyavasthitaḥ tathā sa śivaśaktibhyāṁ parijñeyo dvijottamāḥ
जैसे पितामह ब्रह्मा विष्णु की तुलना में कीड़े के स्थान पर स्थित हैं, वैसे ही हे द्विजश्रेष्ठो, वे विष्णु भी शिव और शक्ति की तुलना में समझने चाहिए।
श्लोक 41 (skanda.6.194.41)
यथा विष्णुः कृमिर्ज्ञेयस्ताभ्यामेव द्विजोत्तमाः सदाशिवस्य विज्ञेयौ तथा तौ कृमिरूपकौ
yathā viṣṇuḥ kṛmirjñeyastābhyāmeva dvijottamāḥ sadāśivasya vijñeyau tathā tau kṛmirūpakau
हे द्विजश्रेष्ठो, जैसे विष्णु उन दोनों (शिव-शक्ति) की तुलना में कीड़ा-रूप जानने चाहिए, वैसे ही वे दोनों भी सदाशिव की तुलना में कीड़े के रूप जानने चाहिए।
श्लोक 42 (skanda.6.194.42)
एवं च विविधैर्यज्ञैः श्रद्धा पूतेन चेतसा ब्रह्मज्ञानात्परं यांति सदाशिवसमुद्भवम्
evaṁ ca vividhairyajñaiḥ śraddhā pūtena cetasā brahmajñānātparaṁ yāṁti sadāśivasamudbhavam
इस प्रकार विविध यज्ञों से, श्रद्धा से पवित्र हुए चित्त द्वारा, प्राणी ब्रह्मज्ञान से सदाशिव से उत्पन्न परम पद को प्राप्त होते हैं।
श्लोक 43 (skanda.6.194.43)
अग्निष्टोमादिभिर्यज्ञैः कृतैः संपूर्णदक्षिणैः तदर्थं ते दिवं यांति भुक्त्वा भोगान्पृथग्विधान्
agniṣṭomādibhiryajñaiḥ kṛtaiḥ saṁpūrṇadakṣiṇaiḥ tadarthaṁ te divaṁ yāṁti bhuktvā bhogānpṛthagvidhān
अग्निष्टोम आदि यज्ञों को पूर्ण दक्षिणा सहित करके, वे उसके फलस्वरूप स्वर्ग को प्राप्त होते हैं और वहाँ विविध प्रकार के भोगों का उपभोग करते हैं।
श्लोक 44 (skanda.6.194.44)
क्षये च पुनरायांति सुकृतस्य महीतले ब्रह्मज्ञानात्परं प्राप्य पुनर्जन्म न विद्यते
kṣaye ca punarāyāṁti sukṛtasya mahītale brahmajñānātparaṁ prāpya punarjanma na vidyate
पुण्य क्षीण होने पर वे पुनः पृथ्वी पर लौट आते हैं। किंतु ब्रह्मज्ञान से परम पद प्राप्त कर पुनर्जन्म नहीं होता।
श्लोक 45 (skanda.6.194.45)
तस्मात्सर्वप्रयत्नेन तत्राभ्यासं समाचरेत् जन्मभिर्बहुभिः पश्चाच्छनैर्मुक्तिमवाप्नुयात्
tasmātsarvaprayatnena tatrābhyāsaṁ samācaret janmabhirbahubhiḥ paścācchanairmuktimavāpnuyāt
अतः सर्वप्रकार के प्रयत्न से उस दिशा में अभ्यास करना चाहिए; अनेक जन्मों के पश्चात् धीरे-धीरे मुक्ति प्राप्त होती है।
श्लोक 46 (skanda.6.194.46)
एकजन्मनि संप्राप्तो लेशो ज्ञानस्य तस्य च द्वितीये द्विगुणस्तस्य तृतीये त्रिगुणो भवेत्
ekajanmani saṁprāpto leśo jñānasya tasya ca dvitīye dviguṇastasya tṛtīye triguṇo bhavet
एक जन्म में प्राप्त उस ज्ञान का अंश दूसरे जन्म में दुगुना और तीसरे जन्म में तिगुना हो जाता है।
श्लोक 47 (skanda.6.194.47)
एकोत्तरो भवेदेवं सदा जन्मनिजन्मनि
ekottaro bhavedevaṁ sadā janmanijanmani
इस प्रकार वह प्रत्येक जन्म में सदा एक-एक अंश बढ़ता रहता है।
श्लोक 48 (skanda.6.194.48)
ऋषय ऊचुः ब्रह्मज्ञानस्य संप्राप्तिर्मर्त्यानां जायते कथम् एतन्नः सर्वमाचक्ष्व यदि त्वं वेत्सि सूतज
ṛṣaya ūcuḥ brahmajñānasya saṁprāptirmartyānāṁ jāyate katham etannaḥ sarvamācakṣva yadi tvaṁ vetsi sūtaja
ऋषियों ने कहा — मनुष्यों को ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति किस प्रकार होती है? हे सूतज, यदि आप जानते हों तो यह सब हमें बताइए।
श्लोक 49 (skanda.6.194.49)
सूत उवाच का शक्तिर्मम वक्तव्ये ज्ञाने मर्त्यसमुद्भवे स्वयमेव न यो वेत्ति स परस्य वदेत्कथम्
sūta uvāca kā śaktirmama vaktavye jñāne martyasamudbhave svayameva na yo vetti sa parasya vadetkatham
सूत जी ने कहा — मनुष्यों में उत्पन्न होने वाले उस ज्ञान को कहने की मुझमें क्या शक्ति है? जो स्वयं ही नहीं जानता, वह दूसरे से कैसे कह सकता है?
श्लोक 50 (skanda.6.194.50)
उपदेशः परं यो मे पित्रा दत्तो द्विजोत्तमाः तमहं वः प्रवक्ष्यामि ब्रह्मज्ञानसमुद्भवम्
upadeśaḥ paraṁ yo me pitrā datto dvijottamāḥ tamahaṁ vaḥ pravakṣyāmi brahmajñānasamudbhavam
किंतु हे द्विजश्रेष्ठो, मेरे पिता ने मुझे जो सर्वोत्तम उपदेश दिया था, ब्रह्मज्ञान को जन्म देने वाला वही उपदेश मैं तुम्हें बताऊँगा।
श्लोक 51 (skanda.6.194.51)
हाटकेश्वरजे क्षेत्रे ह्यस्ति तीर्थद्वयं शुभम् कुमारिकाभ्यां विहितं ब्रह्मज्ञानप्रदं नृणाम्
hāṭakeśvaraje kṣetre hyasti tīrthadvayaṁ śubham kumārikābhyāṁ vihitaṁ brahmajñānapradaṁ nṛṇām
हाटकेश्वर से उत्पन्न क्षेत्र में दो कुमारियों द्वारा स्थापित दो शुभ तीर्थ हैं, जो मनुष्यों को ब्रह्मज्ञान प्रदान करते हैं।
श्लोक 52 (skanda.6.194.52)
ब्राह्मण्या चैव शूद्र्या च कुमारीभ्यां विनिर्मितम् अष्टम्यां च चतुर्दश्यां यस्ताभ्यां स्नानमाचरेत्
brāhmaṇyā caiva śūdryā ca kumārībhyāṁ vinirmitam aṣṭamyāṁ ca caturdaśyāṁ yastābhyāṁ snānamācaret
एक ब्राह्मण-कन्या तथा एक शूद्र-कन्या द्वारा निर्मित ये तीर्थ हैं। जो व्यक्ति अष्टमी और चतुर्दशी को उनमें स्नान करता है,
श्लोक 53 (skanda.6.194.53)
पश्चात्पूजयते भक्त्या प्रसिद्धे सिद्धिपादुके सुगुप्ते गर्तमध्यस्थे कुमार्या परिपूजिते
paścātpūjayate bhaktyā prasiddhe siddhipāduke sugupte gartamadhyasthe kumāryā paripūjite
और तत्पश्चात् भक्तिपूर्वक उस प्रसिद्ध, सुगुप्त, गर्त के मध्य में स्थित तथा कुमारी द्वारा पूजित सिद्धि-पादुका की पूजा करता है,
श्लोक 54 (skanda.6.194.54)
तस्य संवत्सरस्यान्ते ब्रह्मज्ञानं प्रजायते शक्त्या विनिहिते ते च स्वदर्शनविवृद्धये
tasya saṁvatsarasyānte brahmajñānaṁ prajāyate śaktyā vinihite te ca svadarśanavivṛddhaye
उसे एक वर्ष के अंत में ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति होती है। वे पादुकाएँ स्वयं शक्ति द्वारा अपने ही दर्शन की वृद्धि के लिए स्थापित की गई थीं,
श्लोक 55 (skanda.6.194.55)
लोकानां मुक्तिकामानां ब्रह्मज्ञानसुखावहे मम तातो गतस्तत्र ततश्च ज्ञानवान्स्थितः
lokānāṁ muktikāmānāṁ brahmajñānasukhāvahe mama tāto gatastatra tataśca jñānavānsthitaḥ
मुक्ति की कामना करने वाले लोगों के लिए, ब्रह्मज्ञान का सुख देने वाली। मेरे पिता वहाँ गए थे, और तत्पश्चात् वे ज्ञानवान होकर स्थित हुए।
श्लोक 56 (skanda.6.194.56)
तस्यादेशादहं तत्र गतः संवत्सरं स्थितः पादुके पूजयामास ततो ज्ञानं च संस्थितम्
tasyādeśādahaṁ tatra gataḥ saṁvatsaraṁ sthitaḥ pāduke pūjayāmāsa tato jñānaṁ ca saṁsthitam
उनकी आज्ञा से मैं भी वहाँ गया और एक वर्ष तक रहा। मैंने उन पादुकाओं की पूजा की, और तत्पश्चात् मुझमें ज्ञान स्थापित हो गया।
श्लोक 57 (skanda.6.194.57)
यत्किञ्चिद्वा श्रुतं लोके पुराणाग्र्यं व्यवस्थितम् वर्तमानं भविष्यच्च तदहं वेद्मि भो द्विजाः
yatkiñcidvā śrutaṁ loke purāṇāgryaṁ vyavasthitam vartamānaṁ bhaviṣyacca tadahaṁ vedmi bho dvijāḥ
इस लोक में जो कुछ भी सर्वश्रेष्ठ पुराणों में स्थित सुना गया है — भूत, वर्तमान और भविष्य — हे द्विजो, वह सब मैं जानता हूँ।
श्लोक 58 (skanda.6.194.58)
तत्प्रसादादसंदिग्धं प्रमाणं चात्र संस्थितम् मुक्त्वैकं वेदपठनं सूतत्वं च यतो मयि
tatprasādādasaṁdigdhaṁ pramāṇaṁ cātra saṁsthitam muktvaikaṁ vedapaṭhanaṁ sūtatvaṁ ca yato mayi
उसी प्रसाद से यहाँ निःसंदेह प्रमाण मुझमें स्थित है — केवल वेद-पठन को छोड़कर, क्योंकि मुझमें सूत-भाव ही रहता है।
श्लोक 59 (skanda.6.194.59)
तस्यापि वेद्मि सर्वार्थं भर्तृयज्ञो यथा मुनिः अस्मादत्रैव गच्छध्वं यदि मुक्तेः प्रयोजनम्
tasyāpi vedmi sarvārthaṁ bhartṛyajño yathā muniḥ asmādatraiva gacchadhvaṁ yadi mukteḥ prayojanam
उसका भी संपूर्ण अर्थ मैं भर्तृयज्ञ मुनि के समान जानता हूँ। यदि मुक्ति ही तुम्हारा प्रयोजन है, तो यहाँ से सीधे वहीं जाओ।
श्लोक 60 (skanda.6.194.60)
किमेतैः स्वर्गदैः सत्रैः पुनरावृत्तिकारकैः आराधयध्वं ते गत्वा पादुके सिद्धिदे नृणाम् येन संवत्सरस्यान्ते ब्रह्मज्ञानं प्रजायते
kimetaiḥ svargadaiḥ satraiḥ punarāvṛttikārakaiḥ ārādhayadhvaṁ te gatvā pāduke siddhide nṛṇām yena saṁvatsarasyānte brahmajñānaṁ prajāyate
स्वर्ग देने वाले किंतु पुनरावृत्ति कराने वाले इन सत्रों से क्या लाभ? वहाँ जाकर मनुष्यों को सिद्धि देने वाली उन दोनों पादुकाओं की आराधना करो, जिससे एक वर्ष के अंत में ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति होती है।
श्लोक 61 (skanda.6.194.61)
ऋषय ऊचुः साधुसाधु महाभाग ह्युपदेशः कृतो महान् तेन संतारिताः सर्वे वयं संसारसागरात्
ṛṣaya ūcuḥ sādhusādhu mahābhāga hyupadeśaḥ kṛto mahān tena saṁtāritāḥ sarve vayaṁ saṁsārasāgarāt
ऋषियों ने कहा — साधु, साधु, हे महाभाग! आपने महान उपदेश दिया है। उससे हम सब संसार-सागर से पार हो गए।
श्लोक 62 (skanda.6.194.62)
यास्यामोऽपि वयं तत्र सत्रे द्वादशवार्षिके समाप्तेऽस्मिन्न संदेहः सर्वे च कृतनिश्चयाः
yāsyāmo'pi vayaṁ tatra satre dvādaśavārṣike samāpte'sminna saṁdehaḥ sarve ca kṛtaniścayāḥ
यह द्वादशवार्षिक सत्र समाप्त होने पर हम सब भी निःसंदेह वहीं जाएँगे, ऐसा हमने निश्चय कर लिया है।