नागर खण्ड · अध्याय 195
छान्दोग्य ब्राह्मण की कन्या का वृत्तान्त-वर्णन
श्लोक 1 (skanda.6.195.1)
ऋषय ऊचुः शूद्री च ब्राह्मणी चापि ये त्वया परिकीर्तिते हाटकेश्वरजे क्षेत्रे तीर्थद्वयमनुत्तमम्
ṛṣaya ūcuḥ śūdrī ca brāhmaṇī cāpi ye tvayā parikīrtite hāṭakeśvaraje kṣetre tīrthadvayamanuttamam
ऋषियों ने कहा — हाटकेश्वर से उत्पन्न क्षेत्र में जो अनुपम तीर्थद्वय आपने शूद्र-कन्या और ब्राह्मण-कन्या द्वारा निर्मित बताया है,
श्लोक 2 (skanda.6.195.2)
तत्कथं तत्र संजातं केन वा तद्विनिर्मितम् एतच्च सर्वमाचक्ष्व विस्तरेण महामते
tatkathaṁ tatra saṁjātaṁ kena vā tadvinirmitam etacca sarvamācakṣva vistareṇa mahāmate
वे वहाँ कैसे उत्पन्न हुए, और किसने उन्हें बनाया? हे महामते, यह सब हमें विस्तारपूर्वक बताइए।
श्लोक 3 (skanda.6.195.3)
पादुकाभ्यां समुत्पत्तिः श्रुताऽस्माभिः पुरा तव वद तच्चापि माहात्म्यं ताभ्यां चैव समुद्भवम्
pādukābhyāṁ samutpattiḥ śrutā'smābhiḥ purā tava vada taccāpi māhātmyaṁ tābhyāṁ caiva samudbhavam
पादुकाओं की उत्पत्ति हमने पहले आपसे सुनी है। अब उनका माहात्म्य तथा उनकी उत्पत्ति का कारण भी बताइए।
श्लोक 4 (skanda.6.195.4)
सूत उवाच पुरासीन्नागरो विप्रश्छांदोग्य इति विश्रुतः यस्याऽन्वयेऽपि विप्रेन्द्राश्छान्दोग्या इति विश्रुताः
sūta uvāca purāsīnnāgaro vipraśchāṁdogya iti viśrutaḥ yasyā'nvaye'pi viprendrāśchāndogyā iti viśrutāḥ
सूत जी ने कहा — पूर्वकाल में छांदोग्य नामक एक प्रसिद्ध नागर ब्राह्मण था, जिसके वंश में उत्पन्न श्रेष्ठ ब्राह्मण आज भी छांदोग्य के नाम से विख्यात हैं।
श्लोक 5 (skanda.6.195.5)
सामवेदविदस्तस्य गृहस्थाश्रमधर्मिणः पश्चिमे वयसि प्राप्ते कन्या जाता सुशोभना
sāmavedavidastasya gṛhasthāśramadharmiṇaḥ paścime vayasi prāpte kanyā jātā suśobhanā
सामवेद के ज्ञाता और गृहस्थाश्रम-धर्म में स्थित उस ब्राह्मण के, अपनी वृद्धावस्था में, एक अत्यंत सुंदर कन्या उत्पन्न हुई।
श्लोक 6 (skanda.6.195.6)
सर्वैरपि गुणैर्युक्ता सर्वलक्षणलक्षिता सप्तरक्ता त्रिगंभीरा पञ्चसूक्ष्माऽबृहत्कटिः
sarvairapi guṇairyuktā sarvalakṣaṇalakṣitā saptaraktā trigaṁbhīrā pañcasūkṣmā'bṛhatkaṭiḥ
वह समस्त गुणों से युक्त तथा सभी शुभ लक्षणों से चिह्नित थी — सप्त-रक्त, त्रि-गंभीर, पंच-सूक्ष्म तथा पतली कटि वाली।
श्लोक 7 (skanda.6.195.7)
पद्मपत्रविशालाक्षी लंबकेशी सुशोभना बिंबोष्ठी ह्रस्वलोमा च पूर्णचन्द्रसमप्रभा
padmapatraviśālākṣī laṁbakeśī suśobhanā biṁboṣṭhī hrasvalomā ca pūrṇacandrasamaprabhā
उसके नेत्र कमल-पत्र के समान विशाल थे, केश लंबे और सुंदर, अधर बिंबफल के समान लाल, रोम सूक्ष्म, और कांति पूर्ण चंद्रमा के समान थी।
श्लोक 8 (skanda.6.195.8)
तस्या नाम पिता चक्रे ब्राह्मणीति द्विजोत्तमाः यस्मात्सा ब्राह्मणैर्दत्ता मण्डपान्ते सुपूजितैः
tasyā nāma pitā cakre brāhmaṇīti dvijottamāḥ yasmātsā brāhmaṇairdattā maṇḍapānte supūjitaiḥ
हे द्विजश्रेष्ठो, उसके पिता ने उसका नाम 'ब्राह्मणी' रखा, क्योंकि वह भलीभाँति पूजित ब्राह्मणों द्वारा यज्ञमंडप के अंत में वरदान-रूप में प्राप्त हुई थी।
श्लोक 9 (skanda.6.195.9)
पश्चिमे वयसि प्राप्ते अपत्यरहितस्य च ववृधे सा च तन्वङ्गी चन्द्रलेखा यथा तथा
paścime vayasi prāpte apatyarahitasya ca vavṛdhe sā ca tanvaṅgī candralekhā yathā tathā
संतानहीन उस पिता को वृद्धावस्था में यह पुत्री प्राप्त हुई थी, और वह कोमलांगी कन्या चंद्रमा की कला के समान बढ़ती गई।
श्लोक 10 (skanda.6.195.10)
शुक्लपक्षे तु संप्राप्ते जनलोचनतुष्टिदा यस्मिन्नहनि संजाता छान्दोग्यस्य महात्मनः आनर्ताधिपतेस्तस्मिंस्तादृग्रूपा सुताऽभवत्
śuklapakṣe tu saṁprāpte janalocanatuṣṭidā yasminnahani saṁjātā chāndogyasya mahātmanaḥ ānartādhipatestasmiṁstādṛgrūpā sutā'bhavat
जिस दिन शुक्लपक्ष में महात्मा छांदोग्य के यहाँ, सबके नेत्रों को संतुष्टि देने वाली यह कन्या उत्पन्न हुई, उसी दिन आनर्त के अधिपति (राजा) के यहाँ भी वैसी ही रूपवती पुत्री उत्पन्न हुई।
श्लोक 11 (skanda.6.195.11)
यस्याः कायप्रभौघेण सर्वं तत्सूतिकागृहम् निशागमेऽपि संजातं रत्नौघैरिव सुप्रभम् ततस्तस्याः पिता नाम चक्रे रत्नवतीति च
yasyāḥ kāyaprabhaugheṇa sarvaṁ tatsūtikāgṛham niśāgame'pi saṁjātaṁ ratnaughairiva suprabham tatastasyāḥ pitā nāma cakre ratnavatīti ca
जिसके शरीर की प्रभा-समूह से वह संपूर्ण सूतिकागृह, रात्रि होने पर भी, मानो रत्नों के समूह से देदीप्यमान हो उठा। इसी कारण उसके पिता ने उसका नाम 'रत्नवती' रखा।
श्लोक 12 (skanda.6.195.12)
अथ सख्यं समापन्ना ब्राह्मण्या सह सा शुभा नैरन्तर्येण ताभ्यां च वियोगो नैव जायते
atha sakhyaṁ samāpannā brāhmaṇyā saha sā śubhā nairantaryeṇa tābhyāṁ ca viyogo naiva jāyate
तत्पश्चात् वह शुभा (रत्नवती) ब्राह्मणी के साथ सखीभाव को प्राप्त हुई, और उन दोनों के बीच निरंतर कभी वियोग नहीं होता था।
श्लोक 13 (skanda.6.195.13)
एकाशनं तथा शय्या एकान्नेन च भोजनम् अष्टमेऽब्दे च संजाते पिता तस्या द्विजोत्तमाः
ekāśanaṁ tathā śayyā ekānnena ca bhojanam aṣṭame'bde ca saṁjāte pitā tasyā dvijottamāḥ
वे एक ही आसन पर बैठतीं, एक ही शय्या पर सोतीं, और एक ही अन्न से भोजन करतीं। हे द्विजश्रेष्ठो, जब उसका आठवाँ वर्ष आया, तब उसके पिता ने
श्लोक 14 (skanda.6.195.14)
विवाहं चिन्तयामास प्रदानाय वरे तथा सा ज्ञात्वा चेष्टितं तस्य पितुर्दुःखसमन्विता
vivāhaṁ cintayāmāsa pradānāya vare tathā sā jñātvā ceṣṭitaṁ tasya piturduḥkhasamanvitā
उसके विवाह का तथा किसी वर को कन्यादान करने का विचार किया। पिता के इस विचार को जानकर वह दुःख से भर गई।
श्लोक 15 (skanda.6.195.15)
सख्या वियोगभीता च प्रोचे रत्नवती तदा अश्रुपूर्णेक्षणा दीना बाष्पगद्गदया गिरा
sakhyā viyogabhītā ca proce ratnavatī tadā aśrupūrṇekṣaṇā dīnā bāṣpagadgadayā girā
तब सखी के वियोग से भयभीत रत्नवती ने, आँसुओं से भरे नेत्रों तथा गद्गद वाणी में, दीन होकर यह कहा।
श्लोक 16 (skanda.6.195.16)
सखि तातो विवाहं मे प्रकरिष्यति सांप्रतम् विवाहितायाश्च सख्यं न भविष्यति कर्हिचित्
sakhi tāto vivāhaṁ me prakariṣyati sāṁpratam vivāhitāyāśca sakhyaṁ na bhaviṣyati karhicit
'हे सखी, अब पिता मेरा विवाह करेंगे। और विवाहित हो जाने पर हमारी यह मैत्री फिर कभी नहीं रह सकेगी।'
श्लोक 17 (skanda.6.195.17)
वज्रपातोपमं वाक्यं तस्याः श्रुत्वा सखी च सा रुरोद कण्ठमाश्लिष्य स्नेहव्याकुलितेन्द्रिया
vajrapātopamaṁ vākyaṁ tasyāḥ śrutvā sakhī ca sā ruroda kaṇṭhamāśliṣya snehavyākulitendriyā
उसका वज्रपात के समान वचन सुनकर उसकी सखी भी, स्नेह से व्याकुल होकर, उसका कंठ आलिंगन कर रो पड़ी।
श्लोक 18 (skanda.6.195.18)
अथ तद्रुदितं श्रुत्वा माता तस्या मृगावती ससंभ्रमा समागत्य वाक्यमेतदुवाच ह
atha tadruditaṁ śrutvā mātā tasyā mṛgāvatī sasaṁbhramā samāgatya vākyametaduvāca ha
तत्पश्चात् उस रुदन को सुनकर उसकी माता मृगावती घबराई हुई वहाँ आईं और यह वचन बोलीं।
श्लोक 19 (skanda.6.195.19)
किमर्थं रुद्यते पुत्रि केन ते विप्रियं कृतम् करोमि निग्रहं येन तस्याद्यैव दुरात्मनः
kimarthaṁ rudyate putri kena te vipriyaṁ kṛtam karomi nigrahaṁ yena tasyādyaiva durātmanaḥ
'हे पुत्री, तुम क्यों रो रही हो? किसने तुम्हारा अप्रिय किया है? मैं उस दुरात्मा को आज ही दंड दूँगी।'
श्लोक 20 (skanda.6.195.20)
रत्नवत्युवाच शृणु मे सुप्रियातीव ब्राह्मणी प्राणसंमता विवाहं प्राप्य कल्याणी प्रयास्यति पतेर्गृहम्
ratnavatyuvāca śṛṇu me supriyātīva brāhmaṇī prāṇasaṁmatā vivāhaṁ prāpya kalyāṇī prayāsyati patergṛham
रत्नवती ने कहा — सुनिए, मुझे अत्यंत प्रिय, प्राणों के समान माननीय वह ब्राह्मणी, विवाह पाकर, अब पति के घर चली जाएगी।
श्लोक 21 (skanda.6.195.21)
अनया रहिताहं च न जीवामि कथंचन एतस्मात्कारणाद्देवि प्ररोदिमि सुदुःखिता
anayā rahitāhaṁ ca na jīvāmi kathaṁcana etasmātkāraṇāddevi prarodimi suduḥkhitā
उसके बिना मैं किसी भी प्रकार जीवित नहीं रह सकती। हे देवी, इसी कारण मैं अत्यंत दुःखी होकर रो रही हूँ।
श्लोक 22 (skanda.6.195.22)
मृगावत्युवाच यद्येवं पुत्रि यत्र त्वं प्रयास्यसि पतेर्गृहे तस्य राज्ञस्तु यो विप्रः पौरोहित्ये व्यवस्थितः
mṛgāvatyuvāca yadyevaṁ putri yatra tvaṁ prayāsyasi patergṛhe tasya rājñastu yo vipraḥ paurohitye vyavasthitaḥ
मृगावती ने कहा — यदि ऐसा है, पुत्री, तो जहाँ तुम पति के घर जाओगी, उस राजा के जो ब्राह्मण पुरोहित के पद पर स्थित होंगे,
श्लोक 23 (skanda.6.195.23)
तस्य पुत्राय दास्यामि सखीमेनां तव प्रियाम् तत्रापि येन ते संगो भविष्यत्यनया सह
tasya putrāya dāsyāmi sakhīmenāṁ tava priyām tatrāpi yena te saṁgo bhaviṣyatyanayā saha
उसके पुत्र को मैं तुम्हारी इस प्रिय सखी को दे दूँगी, जिससे वहाँ भी तुम्हें इसका साथ मिलता रहेगा।
श्लोक 24 (skanda.6.195.24)
एवमुक्त्वा ततो राज्ञी छादोग्यं द्विजसत्तमम् समानीयाब्रवीदेनं विनयावनता स्थिता
evamuktvā tato rājñī chādogyaṁ dvijasattamam samānīyābravīdenaṁ vinayāvanatā sthitā
इस प्रकार कहकर, रानी ने द्विजश्रेष्ठ छांदोग्य को बुलवाकर, विनयपूर्वक झुककर उनसे यह कहा।
श्लोक 25 (skanda.6.195.25)
इयं तव सुता ब्रह्मन्सुताया मम सुप्रिया न वियोगं सहत्यस्या मुहूर्तमपि भामिनी
iyaṁ tava sutā brahmansutāyā mama supriyā na viyogaṁ sahatyasyā muhūrtamapi bhāminī
'हे ब्रह्मन्, आपकी यह पुत्री मेरी पुत्री को अत्यंत प्रिय है। यह सुंदरी इससे एक क्षण भी वियोग सहन नहीं कर पाती।'
श्लोक 26 (skanda.6.195.26)
तथा तव सुतायाश्च सुतेयं मम सुप्रिया तस्मात्कुरु वचो मह्यं यच्च वक्ष्यामि सुव्रत
tathā tava sutāyāśca suteyaṁ mama supriyā tasmātkuru vaco mahyaṁ yacca vakṣyāmi suvrata
और वैसे ही आपकी पुत्री को भी मेरी यह पुत्री अत्यंत प्रिय है। अतः हे सुव्रत, मैं जो कहूँ, वह वचन मान लीजिए।
श्लोक 27 (skanda.6.195.27)
यस्य मे दीयते कन्या कदाचिन्नृपतेरियम् पुरोधास्तस्य यो विप्रस्तस्मै देया निजा सुता
yasya me dīyate kanyā kadācinnṛpateriyam purodhāstasya yo viprastasmai deyā nijā sutā
जिस किसी राजा को कभी मेरी यह पुत्री दी जाएगी, उस राजा के जो ब्राह्मण पुरोहित होंगे, उन्हीं के पुत्र को आप अपनी पुत्री दे दीजिए।
श्लोक 28 (skanda.6.195.28)
येन न स्यान्मिथो भेदस्ताभ्यां द्विजवरोत्तम एकस्थाने स्थिताभ्यां च प्रसादात्तव सत्तम
yena na syānmitho bhedastābhyāṁ dvijavarottama ekasthāne sthitābhyāṁ ca prasādāttava sattama
हे द्विजवरोत्तम, इससे उन दोनों में परस्पर वियोग नहीं होगा, और हे सत्तम, आपकी कृपा से वे दोनों एक ही स्थान पर रह सकेंगी।
श्लोक 29 (skanda.6.195.29)
छांदोग्य उवाच नागरो नागरं मुक्त्वा योऽन्यस्मै संप्रयच्छति कन्यकां यः प्रगृह्णाति विवाहार्थं कथंचन
chāṁdogya uvāca nāgaro nāgaraṁ muktvā yo'nyasmai saṁprayacchati kanyakāṁ yaḥ pragṛhṇāti vivāhārthaṁ kathaṁcana
छांदोग्य ने कहा — जो नागर, नागर वर को छोड़कर अपनी कन्या किसी अन्य को दे देता है, और जो किसी प्रकार विवाह के लिए किसी अन्य से कन्या ग्रहण करता है,
श्लोक 30 (skanda.6.195.30)
स पंक्तिदूषकः पापान्नागरो न भवेदिह तस्मान्नाहं प्रदास्यामि कथंचिन्निजकन्यकाम् अन्यस्मै नागरं मुक्त्वा निश्चयोऽयं मया कृतः
sa paṁktidūṣakaḥ pāpānnāgaro na bhavediha tasmānnāhaṁ pradāsyāmi kathaṁcinnijakanyakām anyasmai nāgaraṁ muktvā niścayo'yaṁ mayā kṛtaḥ
वह पंक्तिदूषक पापी है, और यहाँ नागर नहीं कहलाता। अतः नागर को छोड़कर मैं अपनी कन्या किसी अन्य को कभी नहीं दूँगा — यह मैंने निश्चय कर लिया है।
श्लोक 31 (skanda.6.195.31)
ब्राह्मण्युवाच नाहं पतिं प्रयास्यामि कुमारी ब्रह्मचारिणी देया प्रिया सखी यत्र तावद्यास्यामि तत्र च
brāhmaṇyuvāca nāhaṁ patiṁ prayāsyāmi kumārī brahmacāriṇī deyā priyā sakhī yatra tāvadyāsyāmi tatra ca
ब्राह्मणी ने कहा — मैं पति के घर नहीं जाऊँगी; मैं ब्रह्मचारिणी कुमारी ही बनी रहूँगी। जहाँ भी मेरी प्रिय सखी दी जाएगी, वहीं मैं भी जाऊँगी।
श्लोक 32 (skanda.6.195.32)
यदि तात बलान्मह्यं विवाहं त्वं करिष्यसि विषं वा भक्षयिष्यामि साधयिष्यामि पावकम्
yadi tāta balānmahyaṁ vivāhaṁ tvaṁ kariṣyasi viṣaṁ vā bhakṣayiṣyāmi sādhayiṣyāmi pāvakam
'हे तात, यदि आप बलपूर्वक मेरा विवाह करेंगे, तो मैं विष खा लूँगी, अथवा अग्नि में प्रवेश करूँगी,
श्लोक 33 (skanda.6.195.33)
शस्त्रेण वा हनिष्यामि स्वदेहं तात निश्चयम् एवं ज्ञात्वा तु तात त्वं यत्क्षमं तत्समाचर
śastreṇa vā haniṣyāmi svadehaṁ tāta niścayam evaṁ jñātvā tu tāta tvaṁ yatkṣamaṁ tatsamācara
अथवा शस्त्र से अपने शरीर का वध कर लूँगी — यह मेरा निश्चय है, हे तात। यह जानकर आप जो उचित समझें, वही कीजिए।'
श्लोक 34 (skanda.6.195.34)
सूत उवाच तस्यास्तं निश्चयं ज्ञात्वा स विप्रो दुःखसंयुतः स्त्रीहत्यापापभीतस्तु तां त्यक्त्वा स्वगृहं ययौ
sūta uvāca tasyāstaṁ niścayaṁ jñātvā sa vipro duḥkhasaṁyutaḥ strīhatyāpāpabhītastu tāṁ tyaktvā svagṛhaṁ yayau
सूत जी ने कहा — उसके इस निश्चय को जानकर वह ब्राह्मण दुःखी हो गया, और स्त्री-हत्या के पाप से डरकर विवाह के आग्रह को त्यागकर अपने घर लौट गया।
श्लोक 35 (skanda.6.195.35)
सापि रेमे तया सार्धं रत्नवत्या द्विजोत्तमाः संहृष्टहृदया नित्यं संत्यक्तपितृसौहृदा
sāpi reme tayā sārdhaṁ ratnavatyā dvijottamāḥ saṁhṛṣṭahṛdayā nityaṁ saṁtyaktapitṛsauhṛdā
हे द्विजश्रेष्ठो, वह भी रत्नवती के साथ आनंदपूर्वक रहने लगी, सदा प्रसन्नचित्त, पिता के [विवाह-विषयक] आग्रह को त्याग चुकी।
श्लोक 36 (skanda.6.195.36)
यौवनं सा तु संप्राप्ता रूपेणाप्रतिमा भुवि
yauvanaṁ sā tu saṁprāptā rūpeṇāpratimā bhuvi
इस प्रकार वह युवावस्था को प्राप्त हुई, जो पृथ्वी पर रूप में अनुपम थी।