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नागर खण्ड · अध्याय 196

दशार्णाधिपति बृहद्बल का आनर्तेश्वर की नगरी की ओर प्रयाण-वर्णन

अध्याय 195अध्याय-सूचीअध्याय 197

श्लोक 1 (skanda.6.196.1)

सूत उवाच अथ तां यौवनोपेतां स्वसुतां प्रेक्ष्य पार्थिवः अनौपम्येन रूपेण संयुक्तां वरवर्णिनीम् आनर्तश्चिन्तयामास कन्यकां प्रददाम्यहम्

sūta uvāca atha tāṁ yauvanopetāṁ svasutāṁ prekṣya pārthivaḥ anaupamyena rūpeṇa saṁyuktāṁ varavarṇinīm ānartaścintayāmāsa kanyakāṁ pradadāmyaham

सूत जी ने कहा — तत्पश्चात् राजा आनर्त अपनी उस यौवनवती, अनुपम रूप से युक्त, सुंदरवर्णा पुत्री को देखकर सोचने लगे — 'मैं इस कन्या को किसे दूँ?'

श्लोक 2 (skanda.6.196.2)

अनर्हाय च यो दद्या द्वराय निजकन्यकाम् कार्यकारणलोभेन नरकं स प्रगच्छति

anarhāya ca yo dadyā dvarāya nijakanyakām kāryakāraṇalobhena narakaṁ sa pragacchati

जो कोई किसी प्रयोजन के लोभवश अपनी कन्या किसी अयोग्य वर को दे देता है, वह नरक को प्राप्त होता है।

श्लोक 3 (skanda.6.196.3)

एवं चिंतयतस्तस्य महान्कालो व्यवस्थितः न पश्यति च तद्योग्यं कंचिद्वरमनुत्तमम्

evaṁ ciṁtayatastasya mahānkālo vyavasthitaḥ na paśyati ca tadyogyaṁ kaṁcidvaramanuttamam

इस प्रकार सोचते-सोचते उनका दीर्घ काल बीत गया, फिर भी उन्हें उसके योग्य कोई सर्वोत्तम वर नहीं दिखा।

श्लोक 4 (skanda.6.196.4)

अथ संप्रेषयामास सर्वभूताश्रयेषु ये चित्रकर्मणि विख्यातान्नरांश्चित्रकरांस्तदा

atha saṁpreṣayāmāsa sarvabhūtāśrayeṣu ye citrakarmaṇi vikhyātānnarāṁścitrakarāṁstadā

तब उन्होंने चित्रकला में प्रसिद्ध चित्रकारों को, प्राणियों के निवास वाले समस्त प्रदेशों में भेजा।

श्लोक 5 (skanda.6.196.5)

गच्छध्वं मम वाक्येन सर्वान्भूमितले नृपान् लिखित्वा पट्टमध्ये तु दर्शयध्वं ततः परम्

gacchadhvaṁ mama vākyena sarvānbhūmitale nṛpān likhitvā paṭṭamadhye tu darśayadhvaṁ tataḥ param

'मेरी आज्ञा से जाओ, पृथ्वी के समस्त राजाओं का चित्र पट पर बनाओ, और फिर वह मुझे दिखलाओ।'

श्लोक 6 (skanda.6.196.6)

सुताया मम येनाऽसौ दृष्ट्वाऽभीष्टं नराधिपम् पत्यर्थं वरयेत्साध्वी मम दोषो भवेन्न हि

sutāyā mama yenā'sau dṛṣṭvā'bhīṣṭaṁ narādhipam patyarthaṁ varayetsādhvī mama doṣo bhavenna hi

'जिससे मेरी यह साध्वी पुत्री अपने अभीष्ट राजा को देखकर उसे पति के रूप में वरण कर सके, और मुझ पर कोई दोष न आए।'

श्लोक 7 (skanda.6.196.7)

तस्य तद्वचनं श्रुत्वा सर्वे चित्रकरास्तदा प्रस्थिता धरणीपृष्ठे पार्थिवानां गृहेषु च

tasya tadvacanaṁ śrutvā sarve citrakarāstadā prasthitā dharaṇīpṛṣṭhe pārthivānāṁ gṛheṣu ca

उनका यह वचन सुनकर, वे सभी चित्रकार तब पृथ्वीतल पर राजाओं के भवनों की ओर चल पड़े।

श्लोक 8 (skanda.6.196.8)

ते लिखित्वा महीपालान्यौवनस्थान्वयोऽन्वितान् रूपौदार्यगुणोपेतान्दर्शयामासुरग्रतः रत्नवत्याः क्रमेणैव तस्य भूपस्य शासनात्

te likhitvā mahīpālānyauvanasthānvayo'nvitān rūpaudāryaguṇopetāndarśayāmāsuragrataḥ ratnavatyāḥ krameṇaiva tasya bhūpasya śāsanāt

उन्होंने युवावस्था में स्थित, उत्तम कुल में उत्पन्न, रूप-औदार्य आदि गुणों से युक्त राजाओं का चित्रण करके, उस राजा की आज्ञा से क्रमशः रत्नवती के समक्ष उन्हें दिखलाया।

श्लोक 9 (skanda.6.196.9)

अथ तेषां तु सर्वेषां मध्ये राजा वृहद्बलः दशार्णाधिपतिर्भव्यः पत्यर्थं च वृतस्तया

atha teṣāṁ tu sarveṣāṁ madhye rājā vṛhadbalaḥ daśārṇādhipatirbhavyaḥ patyarthaṁ ca vṛtastayā

तब उन सबके बीच, दशार्ण के अधिपति, तेजस्वी राजा बृहद्बल को उसने पति के रूप में चुन लिया।

श्लोक 10 (skanda.6.196.10)

तदाऽऽनर्ताधिपो हृष्टः प्रेषयामास तं प्रति विवाहार्थं सुविज्ञाय वाक्यमेतदुवाच ह

tadā''nartādhipo hṛṣṭaḥ preṣayāmāsa taṁ prati vivāhārthaṁ suvijñāya vākyametaduvāca ha

तब आनर्त के राजा प्रसन्न होकर, यह भलीभाँति जानकर, विवाह हेतु उसके पास दूत भेजा और यह संदेश कहलवाया।

श्लोक 11 (skanda.6.196.11)

गच्छध्वं मम वाक्येन दशार्णाधिपतिं प्रति वाच्यः स विनयाद्गत्वा विवाहार्थं ममांतिकम्

gacchadhvaṁ mama vākyena daśārṇādhipatiṁ prati vācyaḥ sa vinayādgatvā vivāhārthaṁ mamāṁtikam

'मेरी आज्ञा से दशार्णाधिपति के पास जाओ। उन्हें विनयपूर्वक जाकर कहो कि विवाह हेतु मेरे समीप आएँ।'

श्लोक 12 (skanda.6.196.12)

समागच्छ निजां कन्यां येन यच्छाम्यहं तव नाम्ना रत्नवतीं ख्यातां त्रैलोक्यस्यापि सुन्दरीम्

samāgaccha nijāṁ kanyāṁ yena yacchāmyahaṁ tava nāmnā ratnavatīṁ khyātāṁ trailokyasyāpi sundarīm

'यहाँ आइए, जिससे मैं आपको अपनी कन्या दे सकूँ — जो त्रैलोक्य में भी सुंदरी के रूप में विख्यात है और रत्नवती नाम से प्रसिद्ध है।'

श्लोक 13 (skanda.6.196.13)

गत्वा स सत्वरं तत्र यत्र राजा बृहद्बलः प्रोवाच सकलं वाक्यमानर्ताधिपतेः स्फुटम्

gatvā sa satvaraṁ tatra yatra rājā bṛhadbalaḥ provāca sakalaṁ vākyamānartādhipateḥ sphuṭam

वह दूत तुरंत वहाँ गया जहाँ राजा बृहद्बल थे, और आनर्त के राजा का संपूर्ण संदेश स्पष्ट रूप से कह सुनाया।

श्लोक 14 (skanda.6.196.14)

सोऽपि तत्सहसा श्रुत्वा तेषां वाक्यमनुत्तमम् परमां तुष्टिमासाद्य प्रस्थितस्तत्पुरं प्रति सैन्येन महता युक्तश्चतुरंगेण पार्थिवः

so'pi tatsahasā śrutvā teṣāṁ vākyamanuttamam paramāṁ tuṣṭimāsādya prasthitastatpuraṁ prati sainyena mahatā yuktaścaturaṁgeṇa pārthivaḥ

वह भी उनके इस अत्यंत उत्तम वचन को सुनकर परम प्रसन्नता को प्राप्त हुआ, और राजा बृहद्बल विशाल चतुरंगिणी सेना सहित उस नगरी की ओर चल पड़े।

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