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नागर खण्ड · अध्याय 197

परावसु के प्रायश्चित्त-विधान का वृत्तान्त-वर्णन

अध्याय 196अध्याय-सूचीअध्याय 198

श्लोक 1 (skanda.6.197.1)

सूत उवाच एतस्मिन्नेव काले तु नागरो द्विजसत्तमाः विश्वावसुरिति ख्यातो वेदवेदांगपारगः

sūta uvāca etasminneva kāle tu nāgaro dvijasattamāḥ viśvāvasuriti khyāto vedavedāṁgapāragaḥ

सूत जी ने कहा — हे द्विजश्रेष्ठो, इसी समय विश्वावसु नामक एक प्रसिद्ध नागर ब्राह्मण था, जो वेद और वेदांगों में पारंगत था।

श्लोक 2 (skanda.6.197.2)

पश्चिमे वयसि प्राप्ते तस्य पुत्रो बभूव ह परावसुरिति ख्यातस्तस्य प्राणसमः सदा

paścime vayasi prāpte tasya putro babhūva ha parāvasuriti khyātastasya prāṇasamaḥ sadā

उसकी वृद्धावस्था में उसे एक पुत्र उत्पन्न हुआ, जो परावसु नाम से प्रसिद्ध था और उसे सदा अपने प्राणों के समान प्रिय था।

श्लोक 3 (skanda.6.197.3)

स वेदाध्ययनं चक्रे यौवने समुपस्थिते वयस्यैः संमतैः सार्धं सदा हास्यपरायणैः

sa vedādhyayanaṁ cakre yauvane samupasthite vayasyaiḥ saṁmataiḥ sārdhaṁ sadā hāsyaparāyaṇaiḥ

युवावस्था आने पर वह अपने सदा हँसी-मजाक में रत, प्रिय सखाओं के साथ वेदाध्ययन करने लगा।

श्लोक 4 (skanda.6.197.4)

कस्यचित्त्वथ कालस्य माघमास उपस्थिते रात्रौ सोऽध्ययनं चक्र उपाध्यायगृहं गतः

kasyacittvatha kālasya māghamāsa upasthite rātrau so'dhyayanaṁ cakra upādhyāyagṛhaṁ gataḥ

एक बार माघ मास आने पर, वह रात्रि में अध्ययन करने के लिए अपने गुरु के घर गया।

श्लोक 5 (skanda.6.197.5)

निशीथे स समुत्थाय सर्वैर्मित्रैश्च रक्षितः वेश्यागृहं समासाद्य प्रसुप्तो वेश्यया सह

niśīthe sa samutthāya sarvairmitraiśca rakṣitaḥ veśyāgṛhaṁ samāsādya prasupto veśyayā saha

आधी रात को वह उठकर, सभी मित्रों की रखवाली में, एक वेश्या के घर जा पहुँचा और वहाँ उसके साथ सो गया।

श्लोक 6 (skanda.6.197.6)

जलपूर्णं समाधाय जलपात्रं समीपगम् निजाचमनयोग्यं च जलपानार्थमेव च

jalapūrṇaṁ samādhāya jalapātraṁ samīpagam nijācamanayogyaṁ ca jalapānārthameva ca

उसने अपने आचमन तथा जलपान के लिए जल से भरा एक पात्र समीप ही रख लिया था।

श्लोक 7 (skanda.6.197.7)

निशाशेषे तु संप्राप्ते स पिपासासमाकुलः निद्रालस्यसमोपेतः शय्यां त्यक्त्वा समुत्थितः

niśāśeṣe tu saṁprāpte sa pipāsāsamākulaḥ nidrālasyasamopetaḥ śayyāṁ tyaktvā samutthitaḥ

रात्रि का अंत होने पर, प्यास से व्याकुल तथा निद्रा की सुस्ती से युक्त वह शय्या छोड़कर उठा।

श्लोक 8 (skanda.6.197.8)

वेश्याया मद्यपात्रं तु ह्यधस्तात्संव्यवस्थितम् तदादाय पपौ मद्यं जलभ्रांत्या यदैव सः

veśyāyā madyapātraṁ tu hyadhastātsaṁvyavasthitam tadādāya papau madyaṁ jalabhrāṁtyā yadaiva saḥ

वेश्या का मद्य-पात्र वहीं नीचे रखा हुआ था। जल समझकर भ्रमवश उसने वही पात्र उठाकर मद्य पी लिया।

श्लोक 9 (skanda.6.197.9)

तदा मद्यं परिज्ञाय पात्रं त्यक्त्वा सुदुःखितः वैराग्यं परमं गत्वा प्रलापानकरो द्बहून्

tadā madyaṁ parijñāya pātraṁ tyaktvā suduḥkhitaḥ vairāgyaṁ paramaṁ gatvā pralāpānakaro dbahūn

तब उसे मद्य होने का बोध हुआ, और अत्यंत दुःखी होकर उसने पात्र फेंक दिया। घोर विरक्ति को प्राप्त होकर वह अनेक विलाप करने लगा।

श्लोक 10 (skanda.6.197.10)

अहो निद्रान्वितेनाद्य किं मया विकृतं कृतम् यदद्य मद्यमापीतं जलभ्रांत्या विगर्हितम्

aho nidrānvitenādya kiṁ mayā vikṛtaṁ kṛtam yadadya madyamāpītaṁ jalabhrāṁtyā vigarhitam

'हाय, निद्रा में डूबे हुए मुझसे आज यह कैसा विकृत कर्म हो गया, कि मैंने जल के भ्रम में यह निंदनीय मद्य पी लिया!'

श्लोक 11 (skanda.6.197.11)

किं करोमि क्व गच्छामि कथं शुद्धिर्भवेन्मम प्रायश्चित्तं करिष्यामि यद्यपि स्यात्सुदुष्करम्

kiṁ karomi kva gacchāmi kathaṁ śuddhirbhavenmama prāyaścittaṁ kariṣyāmi yadyapi syātsuduṣkaram

'अब मैं क्या करूँ, कहाँ जाऊँ, मेरी शुद्धि कैसे हो? मैं प्रायश्चित्त करूँगा, चाहे वह कितना ही दुष्कर क्यों न हो।'

श्लोक 12 (skanda.6.197.12)

एवं निश्चित्य मनसा प्रभाते समुपस्थिते शंखतीर्थं समासाद्य कृत्वा स्नानं तथा परम्

evaṁ niścitya manasā prabhāte samupasthite śaṁkhatīrthaṁ samāsādya kṛtvā snānaṁ tathā param

मन में यह निश्चय करके, प्रातःकाल होने पर वह शंखतीर्थ में जाकर स्नान करने के बाद,

श्लोक 13 (skanda.6.197.13)

सशिखं वपनं पश्चात्कारयित्वा त्वरावितः गतश्च तिष्ठते यत्र ब्रह्मघोषपरायणः

saśikhaṁ vapanaṁ paścātkārayitvā tvarāvitaḥ gataśca tiṣṭhate yatra brahmaghoṣaparāyaṇaḥ

शिखा सहित मुंडन कराकर, शीघ्रतापूर्वक वहाँ गया जहाँ ब्रह्मघोष (वेदाध्ययन) में तत्पर उसका गुरु था।

श्लोक 14 (skanda.6.197.14)

उपाध्यायः सशिष्यश्च ब्रह्मस्थानं समाश्रितः स गत्वा दूरतः स्थित्वा संनिविष्टो यथान्त्यजः

upādhyāyaḥ saśiṣyaśca brahmasthānaṁ samāśritaḥ sa gatvā dūrataḥ sthitvā saṁniviṣṭo yathāntyajaḥ

गुरु अपने शिष्यों सहित वेदाध्ययन-स्थान में विराजमान थे। वहाँ जाकर वह दूर ही खड़ा हो गया और अंत्यज के समान बैठ गया।

श्लोक 15 (skanda.6.197.15)

श्मश्रुमूर्धजहीनस्तु यदा मित्रैर्विलोकितः तदा हास्याद्धतो मूर्ध्नि हस्ताग्रैश्च मुहुर्मुहुः

śmaśrumūrdhajahīnastu yadā mitrairvilokitaḥ tadā hāsyāddhato mūrdhni hastāgraiśca muhurmuhuḥ

जब मित्रों ने उसे दाढ़ी-मूँछ और केश रहित देखा, तब वे हँसते हुए बार-बार अपनी उँगलियों के अग्रभाग से उसके सिर पर थपकी मारने लगे।

श्लोक 16 (skanda.6.197.16)

उपाध्यायस्तु तं दृष्ट्वा दीनं बाष्पपरिप्लुतम् श्मश्रुमूर्धजसंत्यक्तं ततः प्रोवाच सादरम्

upādhyāyastu taṁ dṛṣṭvā dīnaṁ bāṣpapariplutam śmaśrumūrdhajasaṁtyaktaṁ tataḥ provāca sādaram

किंतु गुरु ने उसे दीन, आँसुओं से भीगा हुआ, दाढ़ी-केश से रहित देखकर, आदरपूर्वक यह पूछा।

श्लोक 17 (skanda.6.197.17)

किमद्य वत्स दूरे त्वमुपविष्टस्तु दैन्यधृक् एहि मे संनिधौ ब्रूहि पराभूतोऽसि केन वा

kimadya vatsa dūre tvamupaviṣṭastu dainyadhṛk ehi me saṁnidhau brūhi parābhūto'si kena vā

'हे वत्स, आज तुम इतनी दीनता लिए दूर क्यों बैठे हो? मेरे पास आओ और बताओ — तुम्हें किसने पराभूत किया है?'

श्लोक 18 (skanda.6.197.18)

परावसुरुवाच अयोग्योऽहं गुरो जातः सेवायास्तव सांप्रतम् वेश्याया मंदिरस्थेन ज्ञात्वा निजकमंडलुम्

parāvasuruvāca ayogyo'haṁ guro jātaḥ sevāyāstava sāṁpratam veśyāyā maṁdirasthena jñātvā nijakamaṁḍalum

परावसु ने कहा — 'हे गुरुदेव, अब मैं आपकी सेवा के अयोग्य हो गया हूँ, क्योंकि वेश्या के घर में रहते हुए, अपना कमण्डलु समझकर,

श्लोक 19 (skanda.6.197.19)

वेश्याया मद्यपात्रं तु मद्यपूर्णं प्रगृह्य च तस्माद्देहि विभो मह्यं प्रायश्चित्तं विशुद्धये

veśyāyā madyapātraṁ tu madyapūrṇaṁ pragṛhya ca tasmāddehi vibho mahyaṁ prāyaścittaṁ viśuddhaye

मैंने वेश्या का मद्य से भरा पात्र उठाकर पी लिया। अतः हे प्रभु, मुझे शुद्धि के लिए प्रायश्चित्त बताइए।'

श्लोक 20 (skanda.6.197.20)

धर्मद्रोणेषु यत्प्रोक्तं तत्करिष्याम्यसंशयम्

dharmadroṇeṣu yatproktaṁ tatkariṣyāmyasaṁśayam

'धर्मशास्त्रों में जो कहा गया है, वह मैं निःसंदेह करूँगा।'

श्लोक 21 (skanda.6.197.21)

अथ तं बटवः प्रोचुर्वयस्यास्तस्य ये स्थिताः हास्यं कृत्वा प्रकामाश्च वेश्या या गुरुसंनिधौ

atha taṁ baṭavaḥ procurvayasyāstasya ye sthitāḥ hāsyaṁ kṛtvā prakāmāśca veśyā yā gurusaṁnidhau

तब वहाँ खड़े उसके सखा विद्यार्थियों ने, गुरु के समक्ष ही खूब हँसी-मजाक करते हुए, यह कहा —

श्लोक 22 (skanda.6.197.22)

या एषा नृपतेः कन्या ख्याता रत्नावती जने अस्याः स्तनौ गृहीत्वा त्वमधरं पिबसि द्रुतम् ततस्ते स्याद्विशुद्धिश्च नान्यथा प्रभविष्यति

yā eṣā nṛpateḥ kanyā khyātā ratnāvatī jane asyāḥ stanau gṛhītvā tvamadharaṁ pibasi drutam tataste syādviśuddhiśca nānyathā prabhaviṣyati

'यह जो राजा की कन्या रत्नावती है, जो लोगों में विख्यात है — इसके दोनों स्तन पकड़कर तुम शीघ्र इसका अधरपान करो। तभी तुम्हारी शुद्धि होगी, अन्यथा नहीं।'

श्लोक 23 (skanda.6.197.23)

परावसुरुवाच न वयस्या नर्मकालो विषमे मम संस्थिते ममोपरि यदि स्नेहो वालमित्रत्वसंभवः तदानीय द्विजानन्यान्वदध्वं निष्कृतिं मम

parāvasuruvāca na vayasyā narmakālo viṣame mama saṁsthite mamopari yadi sneho vālamitratvasaṁbhavaḥ tadānīya dvijānanyānvadadhvaṁ niṣkṛtiṁ mama

परावसु ने कहा — 'हे मित्रो, मेरी इस विकट स्थिति में यह हँसी-मजाक का समय नहीं है। यदि तुम्हें बचपन की मित्रता से उत्पन्न स्नेह है, तो अन्य ब्राह्मणों को लाकर मेरा प्रायश्चित्त बताओ।'

श्लोक 24 (skanda.6.197.24)

अथ ते नर्ममुत्सृज्य तद्दुःखेन च दुःखिताः विश्वावसुं समासाद्य तद्वृत्तांतमथाब्रुवन्

atha te narmamutsṛjya tadduḥkhena ca duḥkhitāḥ viśvāvasuṁ samāsādya tadvṛttāṁtamathābruvan

तब वे हँसी-मजाक छोड़कर, उसके दुःख से स्वयं भी दुःखी होते हुए, विश्वावसु के पास जाकर सारा वृत्तांत कह सुनाया।

श्लोक 25 (skanda.6.197.25)

सोऽपि तेषां समाकर्ण्य तत्कर्णकटुकं वचः सभार्यः प्रययौ तत्र यत्र पुत्रो व्यवस्थितः

so'pi teṣāṁ samākarṇya tatkarṇakaṭukaṁ vacaḥ sabhāryaḥ prayayau tatra yatra putro vyavasthitaḥ

वह भी उनका वह कर्णकटु वचन सुनकर, अपनी पत्नी सहित तुरंत वहाँ गया जहाँ उसका पुत्र था।

श्लोक 26 (skanda.6.197.26)

दुःखेन महता युक्तः स्खलमानः पदेपदे वृद्धभावात्तथा शोकात्पुत्राकृत्यसमुद्भवात्

duḥkhena mahatā yuktaḥ skhalamānaḥ padepade vṛddhabhāvāttathā śokātputrākṛtyasamudbhavāt

अत्यंत दुःख से युक्त, वृद्धावस्था के कारण तथा पुत्र के इस अकृत्य से उत्पन्न शोक के कारण, वह पग-पग पर लड़खड़ाता जा रहा था।

श्लोक 27 (skanda.6.197.27)

ततस्तौ प्रोचतुः पुत्रं बाष्पगद्गदया गिरा दंपती बहुशोकार्तौ हा पुत्र किमिदं कृतम् सोऽपि सर्वं समाचख्यौ ताभ्यां वृतांतमात्मनः

tatastau procatuḥ putraṁ bāṣpagadgadayā girā daṁpatī bahuśokārtau hā putra kimidaṁ kṛtam so'pi sarvaṁ samācakhyau tābhyāṁ vṛtāṁtamātmanaḥ

अत्यंत शोकाकुल उस दंपती ने आँसुओं से गद्गद वाणी में पुत्र से कहा — 'हाय पुत्र, यह तूने क्या कर डाला!' उसने भी उन्हें अपना संपूर्ण वृत्तांत यथावत् कह सुनाया।

श्लोक 28 (skanda.6.197.28)

प्रायश्चित्तं करिष्यामि तस्मादात्मविशुद्धये ततो विश्वावसुर्विप्रान्स्मार्ताञ्छ्रुतिसमन्वितान् तदर्थमानयामास वेदविद्याविचक्षणान्

prāyaścittaṁ kariṣyāmi tasmādātmaviśuddhaye tato viśvāvasurviprānsmārtāñchrutisamanvitān tadarthamānayāmāsa vedavidyāvicakṣaṇān

'अतः मैं अपनी शुद्धि के लिए प्रायश्चित्त करूँगा।' तब विश्वावसु ने इसी प्रयोजन के लिए, स्मृति और श्रुति में निपुण, वेदविद्या में निष्णात ब्राह्मणों को बुलवाया।

श्लोक 29 (skanda.6.197.29)

ततः परावसुस्तेषां पुरः स्थित्वा कृतांजलिः प्रोवाच स्वादितं मद्यं मया रात्रावजानता वेश्या भांडं समादाय ज्ञात्वा निजकमंडलुम्

tataḥ parāvasusteṣāṁ puraḥ sthitvā kṛtāṁjaliḥ provāca svāditaṁ madyaṁ mayā rātrāvajānatā veśyā bhāṁḍaṁ samādāya jñātvā nijakamaṁḍalum

तब परावसु उनके सामने हाथ जोड़कर खड़ा हुआ और बोला — 'रात्रि में अनजाने में, अपना कमण्डलु समझकर, मैंने वेश्या के पात्र से मद्य का स्वाद ले लिया।'

श्लोक 30 (skanda.6.197.30)

एवं ज्ञात्वा यदर्हं च प्रायश्चित्तं प्रदीयताम् येन मे जायते शुद्धिः प्रसादाद्वो द्विजोत्तमाः

evaṁ jñātvā yadarhaṁ ca prāyaścittaṁ pradīyatām yena me jāyate śuddhiḥ prasādādvo dvijottamāḥ

'यह जानकर, जो उचित प्रायश्चित्त हो, वह मुझे बताइए, जिससे हे द्विजश्रेष्ठो, आपकी कृपा से मुझे शुद्धि प्राप्त हो।'

श्लोक 31 (skanda.6.197.31)

एवमुक्तास्ततस्तेन विप्रास्ते स्मृतिवादिनः धर्मशास्त्रं समालोक्य ततः प्रोचुश्च तं द्विजाः

evamuktāstatastena viprāste smṛtivādinaḥ dharmaśāstraṁ samālokya tataḥ procuśca taṁ dvijāḥ

इस प्रकार उससे कहे जाने पर, स्मृति-वेत्ता उन ब्राह्मणों ने धर्मशास्त्र का अवलोकन करके उससे यह कहा।

श्लोक 32 (skanda.6.197.32)

अतिमानादतिक्रोधात्स्नेहाद्वा यदि वा भयात् प्रायश्चित्तमनर्हं तु ददत्तत्पापमश्नुते

atimānādatikrodhātsnehādvā yadi vā bhayāt prāyaścittamanarhaṁ tu dadattatpāpamaśnute

'जो अत्यंत अभिमान, अत्यंत क्रोध, स्नेह अथवा भय के कारण अनुचित प्रायश्चित्त बताता है, वह स्वयं ही उस पाप को भोगता है।'

श्लोक 33 (skanda.6.197.33)

प्रायश्चित्तं प्रदास्यामस्तस्माद्युक्तं वयं तव यदि शक्नोषि तत्कर्तुं तत्कुरुष्व समाहितः

prāyaścittaṁ pradāsyāmastasmādyuktaṁ vayaṁ tava yadi śaknoṣi tatkartuṁ tatkuruṣva samāhitaḥ

'अतः हम तुम्हें उचित प्रायश्चित्त बताएँगे। यदि तुम उसे करने में समर्थ हो, तो स्थिरचित्त होकर वह करो।'

श्लोक 34 (skanda.6.197.34)

परावसुरुवाच करोमि वो न चेद्वाक्यं तत्पृच्छामि कुतो द्विजाः नाहं केनापि संदृष्टो मद्यपानं समाचरन्

parāvasuruvāca karomi vo na cedvākyaṁ tatpṛcchāmi kuto dvijāḥ nāhaṁ kenāpi saṁdṛṣṭo madyapānaṁ samācaran

परावसु ने कहा — 'यदि मैं आपका वचन न मानूँ, तो हे द्विजो, मैं यह पूछ ही क्यों रहा हूँ? यद्यपि मुझे मद्यपान करते हुए किसी ने नहीं देखा है,'

श्लोक 35 (skanda.6.197.35)

तस्माद्ब्रूत यथार्हं मे प्रायश्चित्तं विशुद्धये अपि प्राणहरं रौद्रं नो चेत्पापमवाप्स्यथ

tasmādbrūta yathārhaṁ me prāyaścittaṁ viśuddhaye api prāṇaharaṁ raudraṁ no cetpāpamavāpsyatha

फिर भी मुझे मेरी शुद्धि के लिए उचित प्रायश्चित्त बताइए, चाहे वह प्राणघातक और भयंकर ही क्यों न हो — अन्यथा आपको ही पाप लगेगा।'

श्लोक 36 (skanda.6.197.36)

ब्राह्मणा ऊचुः बुध्यमानो द्विजो यस्तु मद्यपानं समाचरेत् तावन्मात्रं हिरण्यं च तप्तं पीत्वा विशुध्यति

brāhmaṇā ūcuḥ budhyamāno dvijo yastu madyapānaṁ samācaret tāvanmātraṁ hiraṇyaṁ ca taptaṁ pītvā viśudhyati

ब्राह्मणों ने कहा — 'जो ब्राह्मण जानबूझकर मद्यपान करता है, वह उतनी ही मात्रा में तपाया हुआ सोना पीकर शुद्ध होता है।'

श्लोक 37 (skanda.6.197.37)

अज्ञानतो यदा पीतं मद्यं विप्रेण कर्हिचित् अग्नितुल्यं घृतं पीत्वा तावन्मात्रं विशुध्यति

ajñānato yadā pītaṁ madyaṁ vipreṇa karhicit agnitulyaṁ ghṛtaṁ pītvā tāvanmātraṁ viśudhyati

'किंतु जब किसी ब्राह्मण ने अनजाने में कभी मद्यपान किया हो, तो वह अग्नितुल्य तपाया हुआ घृत उतनी ही मात्रा में पीकर शुद्ध हो जाता है।'

श्लोक 38 (skanda.6.197.38)

एवं ते सर्वमाख्यातं प्रायश्चित्तं विशुद्धये यदि शक्तोषि चेत्कर्तुं कुरुष्व त्वं द्विजोत्तम

evaṁ te sarvamākhyātaṁ prāyaścittaṁ viśuddhaye yadi śaktoṣi cetkartuṁ kuruṣva tvaṁ dvijottama

'इस प्रकार हमने तुम्हें शुद्धि का संपूर्ण प्रायश्चित्त बता दिया। हे द्विजश्रेष्ठ, यदि तुम उसे करने में समर्थ हो, तो करो।'

श्लोक 39 (skanda.6.197.39)

परावसुरुवाच गंडूषमेकं मद्यस्य मया पीतं द्विजोत्तमाः तावन्मात्रं पिबाम्येव घृतं वह्निसमं कृतम्

parāvasuruvāca gaṁḍūṣamekaṁ madyasya mayā pītaṁ dvijottamāḥ tāvanmātraṁ pibāmyeva ghṛtaṁ vahnisamaṁ kṛtam

परावसु ने कहा — 'हे द्विजश्रेष्ठो, मैंने मद्य का एक ही कुल्ला भर पिया था। उतनी ही मात्रा में अग्नि के समान तपाया हुआ घृत मैं अवश्य पिऊँगा,

श्लोक 40 (skanda.6.197.40)

युष्मदादेशतोऽद्यैव स्वशरीरविशुद्धये विश्वावसुश्च तच्छ्रुत्वा वज्रपातोपमं वचः

yuṣmadādeśato'dyaiva svaśarīraviśuddhaye viśvāvasuśca tacchrutvā vajrapātopamaṁ vacaḥ

आपकी आज्ञा से आज ही, अपने शरीर की शुद्धि के लिए।' यह वज्रपात के समान वचन सुनकर विश्वावसु,

श्लोक 41 (skanda.6.197.41)

विप्राणां चाथ पुत्रस्य तदोवाच सुदुःखितः कृत्वाश्रुमोक्षणं भूरि बाष्पगद्गदया गिरा

viprāṇāṁ cātha putrasya tadovāca suduḥkhitaḥ kṛtvāśrumokṣaṇaṁ bhūri bāṣpagadgadayā girā

अपने पुत्र द्वारा उन ब्राह्मणों के समक्ष कहा गया, अत्यंत दुःखी होकर, बहुत आँसू बहाते हुए, गद्गद वाणी में यह बोला।

श्लोक 42 (skanda.6.197.42)

सर्वस्वमपि दास्यामि पुत्रस्यास्य विशुद्धये प्रायश्चित्तं समाचर्तुं न दास्यामि कथंचन

sarvasvamapi dāsyāmi putrasyāsya viśuddhaye prāyaścittaṁ samācartuṁ na dāsyāmi kathaṁcana

'इस पुत्र की शुद्धि के लिए मैं अपना सर्वस्व दे दूँगा, किंतु इसे यह प्रायश्चित्त करने की अनुमति किसी भी प्रकार नहीं दूँगा।'

श्लोक 43 (skanda.6.197.43)

अश्राद्धेयो विपांक्तेयः सपुत्रो वा भवाम्यहम् स्थानं वा संत्यजाम्येतत्पुत्र मैवं समाचर

aśrāddheyo vipāṁkteyaḥ saputro vā bhavāmyaham sthānaṁ vā saṁtyajāmyetatputra maivaṁ samācara

'भले ही मैं अपने पुत्र सहित श्राद्ध के अयोग्य और पंक्ति-बहिष्कृत हो जाऊँ, या यह स्थान ही छोड़ दूँ — किंतु हे पुत्र, ऐसा मत करो।'

श्लोक 44 (skanda.6.197.44)

तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य पितुर्विघ्नकरं परम् प्रायश्चित्तस्य सस्नेहं पुत्रो वचनमब्रवीत्

tacchrutvā vacanaṁ tasya piturvighnakaraṁ param prāyaścittasya sasnehaṁ putro vacanamabravīt

पिता के इस वचन को सुनकर, जो उसके प्रायश्चित्त में बड़ी बाधा बन रहा था, पुत्र ने स्नेहपूर्वक यह उत्तर दिया।

श्लोक 45 (skanda.6.197.45)

त्यज तात मम स्नेहं मा विघ्नं मे समाचर प्रायश्चित्तं करिष्यामि निश्चयोऽयं मया कृतः

tyaja tāta mama snehaṁ mā vighnaṁ me samācara prāyaścittaṁ kariṣyāmi niścayo'yaṁ mayā kṛtaḥ

'हे तात, मेरे प्रति स्नेह त्याग दीजिए, मुझमें विघ्न मत डालिए। मैं प्रायश्चित्त अवश्य करूँगा — यह मेरा दृढ़ निश्चय है।'

श्लोक 46 (skanda.6.197.46)

मातोवाच यदि पुत्र त्वया कार्यं प्रायश्चित्तं विशुद्धये तदहं पतिना सार्धं प्रवेक्ष्यामि पुरोऽनलम्

mātovāca yadi putra tvayā kāryaṁ prāyaścittaṁ viśuddhaye tadahaṁ patinā sārdhaṁ pravekṣyāmi puro'nalam

माता ने कहा — 'हे पुत्र, यदि तुझे शुद्धि के लिए यह प्रायश्चित्त करना ही है, तो मैं भी अपने पति सहित तेरे सामने अग्नि में प्रवेश करूँगी।'

श्लोक 47 (skanda.6.197.47)

त्वां द्रष्टुं नैव शक्रोमि पिबंतमग्निवद्घृतम् पश्चात्प्राणपरित्यक्तं सत्येनात्मानमालभे

tvāṁ draṣṭuṁ naiva śakromi pibaṁtamagnivadghṛtam paścātprāṇaparityaktaṁ satyenātmānamālabhe

'अग्नि के समान उस घृत को पीते हुए तुझे मैं देख ही नहीं सकती। मैं सत्य की शपथ लेती हूँ कि इसके पश्चात् मैं अपने प्राण त्याग दूँगी।'

श्लोक 48 (skanda.6.197.48)

पितोवाच युक्तं पुत्रानया प्रोक्तं मात्रा तव हितं तथा ममापि संमतं ह्येतत्करिष्यामि न संशयः

pitovāca yuktaṁ putrānayā proktaṁ mātrā tava hitaṁ tathā mamāpi saṁmataṁ hyetatkariṣyāmi na saṁśayaḥ

पिता ने कहा — 'हे पुत्र, तेरी माता ने जो उचित और हितकर वचन कहा है, वह मुझे भी स्वीकार है। मैं भी निःसंदेह ऐसा ही करूँगा।'

श्लोक 49 (skanda.6.197.49)

सूत उवाच एतस्मिन्नंतरे सर्वे सुहृदस्तस्य ये स्थिताः तच्छ्रुत्वा तं समायाता वृत्तांतं दुःखसंयुताः

sūta uvāca etasminnaṁtare sarve suhṛdastasya ye sthitāḥ tacchrutvā taṁ samāyātā vṛttāṁtaṁ duḥkhasaṁyutāḥ

सूत जी ने कहा — इसी बीच उसके सभी मित्र, यह वृत्तांत सुनकर, स्वयं दुःखी होते हुए वहाँ आ पहुँचे।

श्लोक 50 (skanda.6.197.50)

प्रोचुश्च विविधैर्वाक्यैः सपत्नीकं विभावसुम् पुत्रशोकेन संतप्तं मरणे कृतनिश्चयम्

procuśca vividhairvākyaiḥ sapatnīkaṁ vibhāvasum putraśokena saṁtaptaṁ maraṇe kṛtaniścayam

पुत्र-शोक से संतप्त तथा मृत्यु का निश्चय कर चुके विश्वावसु और उसकी पत्नी से उन्होंने विविध वचनों से यह कहा।

श्लोक 51 (skanda.6.197.51)

पुत्रं प्रबोधयामासुः प्रायश्चित्तनिवृत्तये तदा न शक्नुवंति स्म निवर्तयितुमंजसा

putraṁ prabodhayāmāsuḥ prāyaścittanivṛttaye tadā na śaknuvaṁti sma nivartayitumaṁjasā

उन्होंने पुत्र को प्रायश्चित्त से हटाने का बहुत प्रयत्न किया, किंतु वे उसे किसी प्रकार भी उससे विरत नहीं कर सके।

श्लोक 52 (skanda.6.197.52)

तावुभौ च पितापुत्रौ प्राणत्यागकृतादरौ

tāvubhau ca pitāputrau prāṇatyāgakṛtādarau

वे पिता-पुत्र दोनों ही प्राणत्याग के निश्चय पर दृढ़ बने रहे।

श्लोक 53 (skanda.6.197.53)

ततो वास्तुपदं जग्मुः सर्वज्ञो यत्र तिष्ठति भर्तृयज्ञो महाभागः सर्वसंदेहवारकः

tato vāstupadaṁ jagmuḥ sarvajño yatra tiṣṭhati bhartṛyajño mahābhāgaḥ sarvasaṁdehavārakaḥ

तब वे सब उस बस्ती में गए जहाँ सर्वज्ञ, समस्त संशयों के निवारक, महाभाग भर्तृयज्ञ निवास करते थे।

श्लोक 54 (skanda.6.197.54)

तस्य सर्वं समाचख्युः परावसुसमुद्भवम् वृत्तांतं मद्यपानोत्थं यन्मित्रैस्तस्य कीर्तितम्

tasya sarvaṁ samācakhyuḥ parāvasusamudbhavam vṛttāṁtaṁ madyapānotthaṁ yanmitraistasya kīrtitam

उन्होंने उन्हें परावसु के मद्यपान से उत्पन्न वह संपूर्ण वृत्तांत सुनाया, जो उसके मित्रों द्वारा कहा गया था,

श्लोक 55 (skanda.6.197.55)

प्रायश्चित्तं तु हास्येन यच्च स्मार्तैः प्रकीर्तितम् विश्वावसोश्च संकल्पं वह्निसाधनसंभवम्

prāyaścittaṁ tu hāsyena yacca smārtaiḥ prakīrtitam viśvāvasośca saṁkalpaṁ vahnisādhanasaṁbhavam

हँसी में बताया गया प्रायश्चित्त, तथा स्मार्त ब्राह्मणों द्वारा कहा गया प्रायश्चित्त, और विश्वावसु का अग्नि-प्रवेश का संकल्प —

श्लोक 56 (skanda.6.197.56)

सपत्नीकस्य मित्राणां यच्च दुःखमुपस्थितम् निवेद्य तत्तथा प्रोचुर्भूयोऽपि विनयान्वितम्

sapatnīkasya mitrāṇāṁ yacca duḥkhamupasthitam nivedya tattathā procurbhūyo'pi vinayānvitam

पत्नी सहित उनका यह सब, तथा मित्रों को हुए दुःख को निवेदन करके, फिर से अत्यंत विनयपूर्वक उनसे यह कहा।

श्लोक 57 (skanda.6.197.57)

अतीतं वर्तमानं च भविष्यद्वापि यद्भवेत् न तेऽस्त्यविदितं किंचित्सर्वं जानीमहे वयम्

atītaṁ vartamānaṁ ca bhaviṣyadvāpi yadbhavet na te'styaviditaṁ kiṁcitsarvaṁ jānīmahe vayam

'भूत, वर्तमान अथवा भविष्य में जो कुछ भी होने वाला है, उसमें से कुछ भी आपसे अज्ञात नहीं है — यह हम भलीभाँति जानते हैं।'

श्लोक 58 (skanda.6.197.58)

एतच्च नगरं सर्वं विश्वावसुकृतेऽधुना संशयं परमं प्राप्तं तेन प्राप्तास्तवांतिकम्

etacca nagaraṁ sarvaṁ viśvāvasukṛte'dhunā saṁśayaṁ paramaṁ prāptaṁ tena prāptāstavāṁtikam

'अभी यह संपूर्ण नगर विश्वावसु के इस प्रकरण से घोर संशय में पड़ गया है, इसीलिए हम आपके पास आए हैं।'

श्लोक 59 (skanda.6.197.59)

तस्माद्ब्रूहि महाभाग यद्यस्त्यपरमेव हि प्रायश्चित्तं द्विजस्यास्य मद्यपानविशुद्धये

tasmādbrūhi mahābhāga yadyastyaparameva hi prāyaścittaṁ dvijasyāsya madyapānaviśuddhaye

'अतः हे महाभाग, यदि इस ब्राह्मण के मद्यपान की शुद्धि के लिए कोई अन्य प्रायश्चित्त हो, तो वह हमें बताइए।'

श्लोक 60 (skanda.6.197.60)

न ते ह्यविदितं किंचित्तव वेदसमुद्भवम् भर्तृयज्ञो विहस्योच्चैस्ततो वचनमब्रवीत्

na te hyaviditaṁ kiṁcittava vedasamudbhavam bhartṛyajño vihasyoccaistato vacanamabravīt

'वेद से उत्पन्न कुछ भी आपसे अज्ञात नहीं है।' तब भर्तृयज्ञ ने ऊँचे स्वर से हँसते हुए यह वचन कहा।

श्लोक 61 (skanda.6.197.61)

ब्राह्मणस्यास्य शुद्ध्यर्थमप्ययुपायः सुखावहः विद्यमानोऽपि नास्त्येव मतिरेषा स्थिता मम

brāhmaṇasyāsya śuddhyarthamapyayupāyaḥ sukhāvahaḥ vidyamāno'pi nāstyeva matireṣā sthitā mama

'इस ब्राह्मण की शुद्धि के लिए सुखद उपाय विद्यमान होते हुए भी, मानो नहीं है — ऐसा ही मेरा निश्चित मत है।'

श्लोक 62 (skanda.6.197.62)

ब्राह्मणा ऊचुः पूर्वापरविरोधे न वाक्यमेतन्महामते कथमस्ति कथं नास्ति तस्मात्त्वं वक्तुमर्हसि विस्मयोऽयं महाञ्जातः सर्वेषां च द्विजन्मनाम्

brāhmaṇā ūcuḥ pūrvāparavirodhe na vākyametanmahāmate kathamasti kathaṁ nāsti tasmāttvaṁ vaktumarhasi vismayo'yaṁ mahāñjātaḥ sarveṣāṁ ca dvijanmanām

ब्राह्मणों ने कहा — 'हे महामते, आपका यह वचन तो पूर्वापर-विरोधी प्रतीत होता है। यह कैसे है और कैसे नहीं है, यह आप बताने योग्य हैं। हम सब ब्राह्मणों को इससे बड़ा विस्मय हुआ है।'

श्लोक 63 (skanda.6.197.63)

भर्तृयज्ञ उवाच जपच्छिद्रं तपश्छिद्रं यच्छिद्रं यज्ञकर्मणि सर्वं भवति निश्छिद्रं यस्य चेच्छंति ब्राह्मणाः

bhartṛyajña uvāca japacchidraṁ tapaśchidraṁ yacchidraṁ yajñakarmaṇi sarvaṁ bhavati niśchidraṁ yasya cecchaṁti brāhmaṇāḥ

भर्तृयज्ञ ने कहा — 'जप में जो त्रुटि हो, तप में जो त्रुटि हो, यज्ञकर्म में जो त्रुटि हो — यदि ब्राह्मण चाहें, तो वह सब त्रुटिरहित हो जाती है।'

श्लोक 64 (skanda.6.197.64)

अच्छिद्रमिति यद्वाक्यं वदंति क्षितिदेवताः विशेषान्नागरोद्भूतास्तत्तथैव न चान्यथा

acchidramiti yadvākyaṁ vadaṁti kṣitidevatāḥ viśeṣānnāgarodbhūtāstattathaiva na cānyathā

'पृथ्वी के देवता (ब्राह्मण) जिस बात को त्रुटिरहित कहते हैं, विशेषतः नागर-कुल में उत्पन्न ब्राह्मण, वह वैसी ही होती है, अन्यथा नहीं।'

श्लोक 65 (skanda.6.197.65)

तथा च ब्रह्मशालायां संस्थितैर्यदुदाहृतम् नान्यथा तत्परिज्ञेयं हास्येनापि स्मृतिं विना

tathā ca brahmaśālāyāṁ saṁsthitairyadudāhṛtam nānyathā tatparijñeyaṁ hāsyenāpi smṛtiṁ vinā

'इसी प्रकार ब्रह्मशाला में एकत्रित ब्राह्मणों द्वारा जो कुछ भी कहा जाए, वह वैसा ही जानना चाहिए, चाहे वह हँसी में, बिना स्मृतिशास्त्र के आधार के ही क्यों न कहा गया हो।'

श्लोक 66 (skanda.6.197.66)

स एष हास्यभावेन प्रोक्तो मित्रैः परावसुः

sa eṣa hāsyabhāvena prokto mitraiḥ parāvasuḥ

'परावसु के मित्रों द्वारा हँसी में जो कहा गया है, वही —'

श्लोक 67 (skanda.6.197.67)

रत्नवत्याः स्तनौ गृह्य यद्यास्वादयतेऽधरम् तद्भविष्यति मे शुद्धिर्मद्यपानसमुद्भवा

ratnavatyāḥ stanau gṛhya yadyāsvādayate'dharam tadbhaviṣyati me śuddhirmadyapānasamudbhavā

'— कि रत्नवती के दोनों स्तन पकड़कर वह उसका अधरपान करे, तभी उसकी मद्यपान से हुई शुद्धि होगी।'

श्लोक 68 (skanda.6.197.68)

तदुपायो मया प्रोक्तो विप्रस्यास्य सुखावहः पराशरमतेनैव करोति यदि शुध्यति

tadupāyo mayā prokto viprasyāsya sukhāvahaḥ parāśaramatenaiva karoti yadi śudhyati

'वही सुखद उपाय मैंने इस ब्राह्मण के लिए बताया है। यदि वह पराशर के मत के अनुसार ही यह करे, तो वह शुद्ध हो जाएगा।'

श्लोक 69 (skanda.6.197.69)

ब्राह्मणा ऊचुः यद्येतच्छुणुते राजा वाक्यमीर्ष्यापरायणः तत्सर्वेषां वधं कुर्याद्विप्राणामन्यथा भवेत्

brāhmaṇā ūcuḥ yadyetacchuṇute rājā vākyamīrṣyāparāyaṇaḥ tatsarveṣāṁ vadhaṁ kuryādviprāṇāmanyathā bhavet

ब्राह्मणों ने कहा — 'यदि ईर्ष्यालु राजा यह प्रस्ताव सुन ले, तो वह हम सब ब्राह्मणों का वध कर सकता है — मामला उलटा भी हो सकता है।'

श्लोक 70 (skanda.6.197.70)

तस्मात्करोतु चाभीष्टमेष विप्रः परावसुः मातापितृसमोपेतो वयं यास्यामहे गृहम्

tasmātkarotu cābhīṣṭameṣa vipraḥ parāvasuḥ mātāpitṛsamopeto vayaṁ yāsyāmahe gṛham

'अतः यह ब्राह्मण परावसु अपने माता-पिता सहित जो चाहे सो करे — हम तो अपने-अपने घर जाएँगे।'

श्लोक 71 (skanda.6.197.71)

भर्तृयज्ञ उवाच स राजा नीतिमान्विज्ञः सर्वधर्मपरायणः भक्तो देवद्विजानां च सर्वशास्त्रविचक्षणः

bhartṛyajña uvāca sa rājā nītimānvijñaḥ sarvadharmaparāyaṇaḥ bhakto devadvijānāṁ ca sarvaśāstravicakṣaṇaḥ

भर्तृयज्ञ ने कहा — 'वह राजा नीतिज्ञ, विद्वान, सर्वधर्मपरायण, देव-द्विजों का भक्त तथा समस्त शास्त्रों में निपुण है।'

श्लोक 72 (skanda.6.197.72)

तस्मान्मया समं सर्वे नागरायांतु तद्ग्रहे

tasmānmayā samaṁ sarve nāgarāyāṁtu tadgrahe

'अतः तुम सब नागर मेरे साथ उसके भवन को चलो।'

श्लोक 73 (skanda.6.197.73)

मध्यगं पुरतः कृत्वा तद्वक्त्रेण च तत्पुरः कथयंतु च वृत्तांतं मद्यपानसमुद्भवम्

madhyagaṁ purataḥ kṛtvā tadvaktreṇa ca tatpuraḥ kathayaṁtu ca vṛttāṁtaṁ madyapānasamudbhavam

'इसे मध्य में करके, उसके ही मुख से राजा के समक्ष मद्यपान से उत्पन्न वह संपूर्ण वृत्तांत कहलवाया जाए —'

श्लोक 74 (skanda.6.197.74)

परावसोश्च यत्प्रोक्तं वयस्यैर्हास्यमाश्रितैः पराशरसमुत्थं च यद्वाक्यं तत्स्मृतेः परम्

parāvasośca yatproktaṁ vayasyairhāsyamāśritaiḥ parāśarasamutthaṁ ca yadvākyaṁ tatsmṛteḥ param

'— अर्थात् जो परावसु से उसके मित्रों ने हँसी में कहा, और पराशर से उत्पन्न जो वचन स्मृति में सर्वोपरि है।'

श्लोक 75 (skanda.6.197.75)

तच्छ्रुत्वा यदि भूपाल ईर्ष्यालोभसमन्वितः भविष्यति ततोऽहं तं धारयिष्यामि सत्पथे

tacchrutvā yadi bhūpāla īrṣyālobhasamanvitaḥ bhaviṣyati tato'haṁ taṁ dhārayiṣyāmi satpathe

'और यदि यह सुनकर राजा ईर्ष्या या लोभ से युक्त हो जाए, तो मैं स्वयं उसे सत्पथ पर स्थिर रखूँगा।'

श्लोक 76 (skanda.6.197.76)

सूत उवाच ततस्ते नागराः सर्वे सन्तोषं परमं गताः साधुवादैः समभ्यर्च्य भर्तृयज्ञं पृथग्विधैः

sūta uvāca tataste nāgarāḥ sarve santoṣaṁ paramaṁ gatāḥ sādhuvādaiḥ samabhyarcya bhartṛyajñaṁ pṛthagvidhaiḥ

सूत जी ने कहा — तब वे सभी नागर परम संतोष को प्राप्त हुए, और नाना प्रकार के साधुवादों से भर्तृयज्ञ का सम्मान किया।

श्लोक 77 (skanda.6.197.77)

तेनैव सहितं तूर्णं मध्ये कृत्वा च मध्यगम् गर्त्तातीर्थसमुद्भूतं वेदवेदांगपारगम्

tenaiva sahitaṁ tūrṇaṁ madhye kṛtvā ca madhyagam garttātīrthasamudbhūtaṁ vedavedāṁgapāragam

उनके साथ ही शीघ्रतापूर्वक, गर्त-तीर्थ में स्थित, वेद-वेदांग में पारंगत उस मध्यस्थ पुरुष को बीच में लेकर,

श्लोक 78 (skanda.6.197.78)

स्मृतिज्ञं लक्षणज्ञं तमाहिताग्निं यशस्विनम् यष्टारं बहुयज्ञानां भर्तृयज्ञमते स्थितम्

smṛtijñaṁ lakṣaṇajñaṁ tamāhitāgniṁ yaśasvinam yaṣṭāraṁ bahuyajñānāṁ bhartṛyajñamate sthitam

स्मृतिज्ञ, व्याकरणज्ञ, अग्निहोत्री, यशस्वी, अनेक यज्ञों के यजमान, भर्तृयज्ञ के मत में स्थित उस पुरुष को,

श्लोक 79 (skanda.6.197.79)

आनर्तेनापि भूपेन स्वर्गभ्रष्टेन वै पुरा कर्णोत्पलाजनित्रेण यश्च पूर्वं चिरन्तनः

ānartenāpi bhūpena svargabhraṣṭena vai purā karṇotpalājanitreṇa yaśca pūrvaṁ cirantanaḥ

जो पूर्वकाल में कर्णोत्पल से उत्पन्न, अत्यंत प्राचीन, तथा स्वर्ग से भ्रष्ट हुए राजा आनर्त द्वारा ही,

श्लोक 80 (skanda.6.197.80)

चमत्कारपुरे न्यस्तः स्थानेऽस्मिन्विप्रगौरवात् येन सिध्यंति कार्याणि सर्वेषां च द्विजन्मनाम्

camatkārapure nyastaḥ sthāne'sminvipragauravāt yena sidhyaṁti kāryāṇi sarveṣāṁ ca dvijanmanām

ब्राह्मणों के गौरव-रक्षण हेतु इस चमत्कारपुर में स्थापित किया गया था, जिसकी कृपा से समस्त ब्राह्मणों के कार्य सिद्ध होते हैं,

श्लोक 81 (skanda.6.197.81)

तथा चैव तु चान्यानि चमत्कारपुरस्य च हरिभद्राभिधानं तं भर्तृयज्ञसमन्वितम्

tathā caiva tu cānyāni camatkārapurasya ca haribhadrābhidhānaṁ taṁ bhartṛyajñasamanvitam

तथा चमत्कारपुर के अन्य कार्य भी सिद्ध होते हैं — उस हरिभद्र नामक पुरुष को, भर्तृयज्ञ सहित,

श्लोक 82 (skanda.6.197.82)

कृत्वा ते नागराः सर्वे राजद्वारमुपागताः परावसुं समादाय मातापितृसमन्वितम्

kṛtvā te nāgarāḥ sarve rājadvāramupāgatāḥ parāvasuṁ samādāya mātāpitṛsamanvitam

साथ लेकर, वे सभी नागर परावसु को उसके माता-पिता सहित लेकर राजद्वार पर पहुँचे।

श्लोक 83 (skanda.6.197.83)

अथ द्वाःस्थो द्रुतं गत्वा भूपतेस्तान्न्यवेदयत् ब्राह्मणान्भर्तृयज्ञेन हरिभद्रेण संयुतान्

atha dvāḥstho drutaṁ gatvā bhūpatestānnyavedayat brāhmaṇānbhartṛyajñena haribhadreṇa saṁyutān

तब द्वारपाल शीघ्र जाकर राजा को उन ब्राह्मणों के आगमन की सूचना दी, जो भर्तृयज्ञ और हरिभद्र से युक्त थे।

श्लोक 84 (skanda.6.197.84)

आनर्तोऽपि च ताञ्छ्रुत्वा राजद्वारसमागतान् पुरोधसा समायुक्तः संमुखं प्रययौ तदा

ānarto'pi ca tāñchrutvā rājadvārasamāgatān purodhasā samāyuktaḥ saṁmukhaṁ prayayau tadā

राजा आनर्त भी उनके राजद्वार पर आने की बात सुनकर, अपने पुरोहित सहित तुरंत उनका स्वागत करने गया।

श्लोक 85 (skanda.6.197.85)

दत्त्वार्घं मधुपर्कं च विष्टरं गां तथा नृपः प्रथमं भर्तृयज्ञाय हरिभद्राय वै ततः

dattvārghaṁ madhuparkaṁ ca viṣṭaraṁ gāṁ tathā nṛpaḥ prathamaṁ bhartṛyajñāya haribhadrāya vai tataḥ

राजा ने पहले भर्तृयज्ञ को और फिर हरिभद्र को अर्घ्य, मधुपर्क, आसन और गौ अर्पित की,

श्लोक 86 (skanda.6.197.86)

चतुर्णां मुद्गहस्तानां तथान्येषां द्विजन्मनाम् आद्यऋग्यजुःसाम्नां च प्रगृह्याशीर्वचः परम्

caturṇāṁ mudgahastānāṁ tathānyeṣāṁ dvijanmanām ādyaṛgyajuḥsāmnāṁ ca pragṛhyāśīrvacaḥ param

तथा मूँग की टहनी हाथ में लिए चार सहायकों को, एवं ऋक्, यजुः तथा साम वेद में प्रमुख अन्य ब्राह्मणों को भी सम्मानित किया, और उनका सर्वोत्तम आशीर्वचन ग्रहण किया।

श्लोक 87 (skanda.6.197.87)

सभामंडपमासाद्य सर्वान्समुपवेशयत् वरासनेषु हैमेषु यथावदनुपूर्वशः

sabhāmaṁḍapamāsādya sarvānsamupaveśayat varāsaneṣu haimeṣu yathāvadanupūrvaśaḥ

उसने उन्हें सभामंडप में ले जाकर, यथाक्रम श्रेष्ठ स्वर्णासनों पर बिठाया।

श्लोक 88 (skanda.6.197.88)

तथा तेषूपविष्टेषु सर्वेषु पृथिवीपतिः उपविश्य धरापृष्ठे कृतांजलिरभाषत

tathā teṣūpaviṣṭeṣu sarveṣu pṛthivīpatiḥ upaviśya dharāpṛṣṭhe kṛtāṁjalirabhāṣata

उन सबके बैठ जाने पर, राजा स्वयं धरातल पर बैठकर, हाथ जोड़कर यह बोला।

श्लोक 89 (skanda.6.197.89)

धन्योऽस्म्यनुगृहीतोऽस्मि यन्मे गृहमुपागतः सर्वोऽयं नागरो लोको भर्तृयज्ञसमन्वितः

dhanyo'smyanugṛhīto'smi yanme gṛhamupāgataḥ sarvo'yaṁ nāgaro loko bhartṛyajñasamanvitaḥ

'मैं धन्य हूँ, अनुगृहीत हूँ, कि भर्तृयज्ञ सहित यह समस्त नागर-समुदाय मेरे घर पधारा है।'

श्लोक 90 (skanda.6.197.90)

तदादिशतु मां लोको यत्कृत्यं प्रकरोमि वः अदेयमपि यच्छामि गृहायातस्य सांप्रतम्

tadādiśatu māṁ loko yatkṛtyaṁ prakaromi vaḥ adeyamapi yacchāmi gṛhāyātasya sāṁpratam

'अतः आप सब मुझे आज्ञा दें कि मैं आपके लिए क्या करूँ। आप मेरे घर पधारे हैं, अतः अभी मैं अदेय वस्तु भी दे दूँगा,

श्लोक 91 (skanda.6.197.91)

अगम्यमपि यास्यामि करिष्येऽकृत्यमेव च तच्छ्रुत्वा हरिभद्रः स समुत्थाय त्वरान्वितः

agamyamapi yāsyāmi kariṣye'kṛtyameva ca tacchrutvā haribhadraḥ sa samutthāya tvarānvitaḥ

अगम्य स्थान पर भी जाऊँगा, और अकरणीय कार्य भी करूँगा।' यह सुनकर हरिभद्र तुरंत उठ खड़े हुए,

श्लोक 92 (skanda.6.197.92)

पप्रच्छाद्यांस्तदर्थं च बह्वृचांस्तदनंतरम् अध्वर्यूंश्चैव छांदोग्याननुज्ञातश्च तैस्तदा

papracchādyāṁstadarthaṁ ca bahvṛcāṁstadanaṁtaram adhvaryūṁścaiva chāṁdogyānanujñātaśca taistadā

और इस प्रयोजन के लिए पहले ऋग्वेदी ब्राह्मणों से, फिर अध्वर्युओं और छांदोग्यों से पूछा, और उनकी अनुमति पाकर,

श्लोक 93 (skanda.6.197.93)

प्राणरुद्रान्वदंत्वाद्या जीवसूक्तं च बह्वृचाः एषां चैव पृथिव्यादिसवनं यत्पुरा कृतम्

prāṇarudrānvadaṁtvādyā jīvasūktaṁ ca bahvṛcāḥ eṣāṁ caiva pṛthivyādisavanaṁ yatpurā kṛtam

उन्हें आदेश दिया — 'पहले ऋग्वेदी प्राण-रुद्र मंत्र तथा जीव-सूक्त का पाठ करें, और इन दोनों के लिए जो पृथ्वी आदि का सवन पूर्वकाल में किया गया था, वही करें,'

श्लोक 94 (skanda.6.197.94)

पठन्त्वध्वर्यवः सर्वे छांदोग्याश्च पृथक्पृथक् मधुच्युतेन संयुक्तं प्रपठन्तु च सिद्धये

paṭhantvadhvaryavaḥ sarve chāṁdogyāśca pṛthakpṛthak madhucyutena saṁyuktaṁ prapaṭhantu ca siddhaye

'सभी अध्वर्यु तथा छांदोग्य पृथक्-पृथक् अपना-अपना पाठ करें, और सिद्धि के लिए मधुच्युत सूक्त के साथ मिलाकर पाठ करें।'

श्लोक 95 (skanda.6.197.95)

भर्तृयज्ञमतेनैवं तेन प्रोक्ता द्विजोत्तमाः पप्रच्छुश्चैव तत्सर्वं यत्प्रोक्तं तेन धीमता

bhartṛyajñamatenaivaṁ tena proktā dvijottamāḥ papracchuścaiva tatsarvaṁ yatproktaṁ tena dhīmatā

इस प्रकार भर्तृयज्ञ के मत के अनुसार उससे कहे जाने पर, उन श्रेष्ठ ब्राह्मणों ने उस बुद्धिमान द्वारा कही गई हर बात के विषय में पूछा।

श्लोक 96 (skanda.6.197.96)

ततः पाठावसाने तु मध्यगः प्राह सादरम् परावसुसमुद्भूतं वृत्तांतं तस्य भूपतेः

tataḥ pāṭhāvasāne tu madhyagaḥ prāha sādaram parāvasusamudbhūtaṁ vṛttāṁtaṁ tasya bhūpateḥ

पाठ की समाप्ति पर उस मध्यस्थ हरिभद्र ने आदरपूर्वक राजा को परावसु से संबंधित संपूर्ण वृत्तांत सुनाया —

श्लोक 97 (skanda.6.197.97)

यथा तेनाऽऽसवः पीतो यथा मित्रैः प्रजल्पितम् प्रायश्चित्तं समादिष्टं यथा स्मार्तैर्घृतोद्भवम्

yathā tenā''savaḥ pīto yathā mitraiḥ prajalpitam prāyaścittaṁ samādiṣṭaṁ yathā smārtairghṛtodbhavam

उसने मद्य कैसे पिया, मित्रों ने क्या हँसी-मजाक की, स्मार्त ब्राह्मणों ने घृतपान का जो प्रायश्चित्त बताया —

श्लोक 98 (skanda.6.197.98)

भर्तृयज्ञेन चानीता यथा सर्वे द्विजातयः तच्छ्रुत्वा पार्थिवो हृष्टः कृतांजलिपुटोऽब्रवीत्

bhartṛyajñena cānītā yathā sarve dvijātayaḥ tacchrutvā pārthivo hṛṣṭaḥ kṛtāṁjalipuṭo'bravīt

— तथा भर्तृयज्ञ द्वारा किस प्रकार सभी ब्राह्मणों को यहाँ लाया गया। यह सुनकर राजा प्रसन्न होकर हाथ जोड़कर बोला।

श्लोक 99 (skanda.6.197.99)

धन्योहं कृतपुण्योऽस्मि यस्य मे नागरैर्द्विजैः विप्रत्रयप्ररक्षार्थं प्रसादोऽयं महान्कृतः

dhanyohaṁ kṛtapuṇyo'smi yasya me nāgarairdvijaiḥ vipratrayaprarakṣārthaṁ prasādo'yaṁ mahānkṛtaḥ

'मैं धन्य हूँ, मैंने पुण्य किया है, कि नागर ब्राह्मणों ने इन तीन ब्राह्मणों की रक्षा के लिए मुझ पर यह महान अनुग्रह किया है।'

श्लोक 100 (skanda.6.197.100)

धन्या मे कन्यका चेयं रक्षयिष्यति च स्वयम् ब्राह्मणत्रितयं ह्येतन्मरणे कृतनिश्चयम्

dhanyā me kanyakā ceyaṁ rakṣayiṣyati ca svayam brāhmaṇatritayaṁ hyetanmaraṇe kṛtaniścayam

'तथा धन्य है मेरी यह कन्या भी, जो मृत्यु का निश्चय कर चुके इन तीनों ब्राह्मणों की स्वयं रक्षा करेगी।'

श्लोक 101 (skanda.6.197.101)

अथाऽसावानयामास तां कन्यां तत्क्षणाद्द्विजाः उपविष्टं सभामध्ये ब्राह्मणेभ्यो न्यवेदयत्

athā'sāvānayāmāsa tāṁ kanyāṁ tatkṣaṇāddvijāḥ upaviṣṭaṁ sabhāmadhye brāhmaṇebhyo nyavedayat

तब उसने उसी क्षण उस कन्या को बुलवाया, और सभा के मध्य बिठाकर उसे ब्राह्मणों के समक्ष प्रस्तुत किया।

श्लोक 102 (skanda.6.197.102)

एषा कन्या मयानीता युष्मद्वाक्याद्द्विजोत्तमाः भर्तृयज्ञेन यत्प्रोक्तं तत्करोतु च स द्विजः

eṣā kanyā mayānītā yuṣmadvākyāddvijottamāḥ bhartṛyajñena yatproktaṁ tatkarotu ca sa dvijaḥ

'हे द्विजश्रेष्ठो, मैं यह कन्या आपके वचन से लाया हूँ। भर्तृयज्ञ ने जो कहा है, वह ब्राह्मण अब वही करे।'

श्लोक 103 (skanda.6.197.103)

ततस्तत्र समानीय ब्राह्मणं तं परावसुम् भर्तृयज्ञ इदं वाक्यं कन्यायाः पुरतोऽब्रवीत्

tatastatra samānīya brāhmaṇaṁ taṁ parāvasum bhartṛyajña idaṁ vākyaṁ kanyāyāḥ purato'bravīt

तब उस ब्राह्मण परावसु को वहाँ बुलाकर, भर्तृयज्ञ ने कन्या के समक्ष यह वचन कहा।

श्लोक 104 (skanda.6.197.104)

इमां त्वं कन्यकां चित्ते जननीं यदि मन्यसे अधरास्वादनं कुर्वंस्ततः सिद्धिमवाप्स्यसि

imāṁ tvaṁ kanyakāṁ citte jananīṁ yadi manyase adharāsvādanaṁ kurvaṁstataḥ siddhimavāpsyasi

'यदि तुम इस कन्या को अपने मन में जननी मानो, तो इसके अधर का स्वाद लेने पर तुम सिद्धि को प्राप्त करोगे।'

श्लोक 105 (skanda.6.197.105)

अनुरागपरो भूत्वा यद्यास्वादनतत्परः भविष्यति ततो रक्तं तव वक्त्रे परावसो

anurāgaparo bhūtvā yadyāsvādanatatparaḥ bhaviṣyati tato raktaṁ tava vaktre parāvaso

'किंतु हे परावसु, यदि तुम आसक्तिवश काम-भाव से यह करोगे, तो तुम्हारे मुख में रक्त प्रकट हो जाएगा —'

श्लोक 106 (skanda.6.197.106)

शुद्धस्य त्वथ दुग्धं च भविष्यति न संशयः

śuddhasya tvatha dugdhaṁ ca bhaviṣyati na saṁśayaḥ

'— किंतु यदि तुम शुद्ध रहे, तो निःसंदेह दूध प्रकट होगा।'

श्लोक 107 (skanda.6.197.107)

स्तनाभ्यां तव हस्ताभ्यां स्पर्शात्क्षीरं भवेद्यदि तत्ते शुद्धिः परिज्ञेया रक्तं वा न भविष्यति

stanābhyāṁ tava hastābhyāṁ sparśātkṣīraṁ bhavedyadi tatte śuddhiḥ parijñeyā raktaṁ vā na bhaviṣyati

'यदि तुम्हारे हाथों के स्पर्श से इसके स्तनों से रक्त के स्थान पर दूध निकले, तो वही तुम्हारी शुद्धि का प्रमाण जानना चाहिए।'

श्लोक 108 (skanda.6.197.108)

एवमुक्त्वाथ तं कन्यां ततः प्रोवाच स द्विजः एनं त्वं पुत्रवत्पश्य पुत्रि ब्राह्मणसत्तमम्

evamuktvātha taṁ kanyāṁ tataḥ provāca sa dvijaḥ enaṁ tvaṁ putravatpaśya putri brāhmaṇasattamam

ऐसा कहकर, उस ब्राह्मण ने फिर कन्या से कहा — 'हे पुत्री, इस उत्तम ब्राह्मण को अपने पुत्र के समान देखो।'

श्लोक 109 (skanda.6.197.109)

येन शुद्धिमवाप्नोति त्वदोष्ठास्वादने कृते स्पर्शिताभ्यां स्तनाभ्यां च प्रायश्चित्तं यतः स्मृतम्

yena śuddhimavāpnoti tvadoṣṭhāsvādane kṛte sparśitābhyāṁ stanābhyāṁ ca prāyaścittaṁ yataḥ smṛtam

'तुम्हारे अधर के स्वाद और तुम्हारे स्तनों के स्पर्श से यह शुद्धि प्राप्त करेगा, क्योंकि स्मृति में यही प्रायश्चित्त बताया गया है —'

श्लोक 110 (skanda.6.197.110)

एतदस्य द्विजेंद्रस्य वयस्यैर्हास्यसंयुतैः येन शुद्धिमवाप्नोति नो चेन्मृत्युमवाप्स्यति

etadasya dvijeṁdrasya vayasyairhāsyasaṁyutaiḥ yena śuddhimavāpnoti no cenmṛtyumavāpsyati

'— वही जो इस श्रेष्ठ ब्राह्मण को उसके हँसते हुए मित्रों ने कहा था। इसी से यह शुद्धि पाएगा, अन्यथा मृत्यु को प्राप्त होगा।'

श्लोक 111 (skanda.6.197.111)

सूत उवाच सा तथेति प्रतिज्ञाय सव्रीडं तमुवाच ह एहि वत्स कुरुष्व त्वं प्रायश्चित्तं विशुद्धये

sūta uvāca sā tatheti pratijñāya savrīḍaṁ tamuvāca ha ehi vatsa kuruṣva tvaṁ prāyaścittaṁ viśuddhaye

सूत जी ने कहा — उसने 'तथास्तु' कहकर स्वीकार किया, और लज्जा सहित उससे कहा — 'आओ वत्स, अपनी शुद्धि के लिए यह प्रायश्चित्त करो।'

श्लोक 112 (skanda.6.197.112)

मातृभावं समाधाय मया त्वं कल्पितः सुतः सोऽपि तां मातृवन्मत्वा तस्याः सांनिध्यमागतः

mātṛbhāvaṁ samādhāya mayā tvaṁ kalpitaḥ sutaḥ so'pi tāṁ mātṛvanmatvā tasyāḥ sāṁnidhyamāgataḥ

'मातृभाव धारण करके मैंने तुम्हें अपना पुत्र मान लिया है।' वह भी उसे माता के समान मानकर उसके समीप आया।

श्लोक 113 (skanda.6.197.113)

स्पृष्टवांश्च स्तनौ तस्याः सर्वलोकस्य पश्यतः स्पृष्टाभ्यां च स्तनाभ्यां च तत्क्षणाद्द्विजसत्तमाः

spṛṣṭavāṁśca stanau tasyāḥ sarvalokasya paśyataḥ spṛṣṭābhyāṁ ca stanābhyāṁ ca tatkṣaṇāddvijasattamāḥ

उसने सबके देखते-देखते उसके दोनों स्तनों का स्पर्श किया। हे द्विजश्रेष्ठो, उन दोनों स्तनों के स्पर्श होते ही उसी क्षण,

श्लोक 114 (skanda.6.197.114)

क्षीरधारे विनिष्क्रांते कुन्देंदुहिमसंनिभे

kṣīradhāre viniṣkrāṁte kundeṁduhimasaṁnibhe

कुंद-पुष्प, चंद्रमा और हिम के समान श्वेत दूध की दो धाराएँ बह निकलीं।

श्लोक 115 (skanda.6.197.115)

अथौष्ठास्वादनं यावत्तस्याः स कुरुते द्विजः तावत्क्षीरं विनिष्क्रांतं तादृग्रूपं तदाननात्

athauṣṭhāsvādanaṁ yāvattasyāḥ sa kurute dvijaḥ tāvatkṣīraṁ viniṣkrāṁtaṁ tādṛgrūpaṁ tadānanāt

जैसे ही उस ब्राह्मण ने उसके अधर का स्वाद लिया, वैसे ही उसके मुख से भी वैसा ही दूध बहने लगा।

श्लोक 116 (skanda.6.197.116)

एतस्मिन्नंतरे सर्वैस्ताला दत्ता द्विजातिभिः राज्ञाऽयं ब्राह्मणः शुद्धो वदमानैर्मुहुर्मुहुः

etasminnaṁtare sarvaistālā dattā dvijātibhiḥ rājñā'yaṁ brāhmaṇaḥ śuddho vadamānairmuhurmuhuḥ

इसी बीच सभी ब्राह्मणों ने बार-बार तालियाँ बजाईं, और राजा से बार-बार कहा — 'यह ब्राह्मण शुद्ध हो गया है!'

श्लोक 117 (skanda.6.197.117)

सोऽपि प्रदक्षिणीकृत्य तां च कन्यां मुहुर्मुहुः नमस्कृत्य क्षमस्वेति त्वं मातः पुत्रवत्सले

so'pi pradakṣiṇīkṛtya tāṁ ca kanyāṁ muhurmuhuḥ namaskṛtya kṣamasveti tvaṁ mātaḥ putravatsale

उसने भी बार-बार उस कन्या की परिक्रमा की, और उसे नमस्कार करके कहा — 'हे पुत्रवत्सला माता, मुझे क्षमा करो।'

श्लोक 118 (skanda.6.197.118)

तद्दृष्ट्वा महदाश्चर्यमानर्तो विस्मयान्वितः शशंस भतृयज्ञं तं प्रायश्चित्तप्रदायकम्

taddṛṣṭvā mahadāścaryamānarto vismayānvitaḥ śaśaṁsa bhatṛyajñaṁ taṁ prāyaścittapradāyakam

यह महान आश्चर्य देखकर राजा आनर्त विस्मित हो गया, और प्रायश्चित्त के प्रदाता भर्तृयज्ञ की प्रशंसा करने लगा।

श्लोक 119 (skanda.6.197.119)

अहोऽतीव सुभाग्योऽहं यस्य मे गृहमागताः ईदृशा ब्राह्मणाः सर्वे चमत्कारपुरोद्भवाः

aho'tīva subhāgyo'haṁ yasya me gṛhamāgatāḥ īdṛśā brāhmaṇāḥ sarve camatkārapurodbhavāḥ

'अहो, मैं अत्यंत सौभाग्यशाली हूँ, कि चमत्कारपुर में उत्पन्न ऐसे सभी ब्राह्मण मेरे घर पधारे!'

श्लोक 120 (skanda.6.197.120)

तथा चैतादृशी कन्या ह्यसामान्यप्रवर्तिनी रत्नावती महाभागा सत्यशौचसमन्विता

tathā caitādṛśī kanyā hyasāmānyapravartinī ratnāvatī mahābhāgā satyaśaucasamanvitā

'और ऐसी ही यह मेरी कन्या रत्नावती भी है — महाभागा, सत्य और शौच से युक्त, असामान्य आचरण वाली!'

श्लोक 121 (skanda.6.197.121)

तथाऽयं नैव सामान्यो ब्राह्मणश्च परावसुः यश्चेदृशीं समासाद्य कन्यां नो विकृतः स्थितः

tathā'yaṁ naiva sāmānyo brāhmaṇaśca parāvasuḥ yaścedṛśīṁ samāsādya kanyāṁ no vikṛtaḥ sthitaḥ

'और यह ब्राह्मण परावसु भी साधारण नहीं है, जो ऐसी कन्या के इतने समीप आकर भी विकार-रहित बना रहा!'

श्लोक 122 (skanda.6.197.122)

एवमुक्त्वा विसृज्याथ तान्विप्रान्पार्थिवोत्तमाः तां च कन्यां समादाय ततश्चांतःपुरं ययौ

evamuktvā visṛjyātha tānviprānpārthivottamāḥ tāṁ ca kanyāṁ samādāya tataścāṁtaḥpuraṁ yayau

ऐसा कहकर, उस श्रेष्ठ राजा ने उन ब्राह्मणों को विदा किया, और अपनी कन्या को साथ लेकर अंतःपुर में चला गया।

श्लोक 123 (skanda.6.197.123)

अथ ते नागराः सर्वे मर्यादां चक्रिरे ततः अद्यप्रभृति या वेश्या स्थानेऽस्मिन्वासमेष्यति

atha te nāgarāḥ sarve maryādāṁ cakrire tataḥ adyaprabhṛti yā veśyā sthāne'sminvāsameṣyati

तत्पश्चात् उन सभी नागरों ने यह मर्यादा स्थापित की — 'आज से जो भी वेश्या इस स्थान में निवास करने आएगी,

श्लोक 124 (skanda.6.197.124)

तया नैव गृहे धार्यं सुरामांसं कथंचन दूषयंति सदा दुष्टा नागराणां सुतानिह

tayā naiva gṛhe dhāryaṁ surāmāṁsaṁ kathaṁcana dūṣayaṁti sadā duṣṭā nāgarāṇāṁ sutāniha

वह अपने घर में किसी भी प्रकार सुरा और मांस नहीं रखेगी — क्योंकि ऐसी दुष्ट स्त्रियाँ सदा नागरों के पुत्रों को यहाँ बिगाड़ देती हैं।'

श्लोक 125 (skanda.6.197.125)

अथ व्यवस्थामुत्क्रम्य या हि तद्धारयिष्यति सा दण्ड्यास्माच्च निर्वास्या प्रेत्य स्यात्पापभागिनी

atha vyavasthāmutkramya yā hi taddhārayiṣyati sā daṇḍyāsmācca nirvāsyā pretya syātpāpabhāginī

'और जो कोई इस व्यवस्था का उल्लंघन कर उन्हें रखेगी, वह दंडनीय होगी, यहाँ से निर्वासित की जाएगी, और मृत्यु के बाद पाप की भागिनी होगी।'

श्लोक 126 (skanda.6.197.126)

औदुम्बर्या मध्यगेन दत्तं तालत्रयं तदा

audumbaryā madhyagena dattaṁ tālatrayaṁ tadā

तब उदुम्बर वृक्ष के मध्य में उपस्थित उस पुरुष द्वारा तीन बार ताली बजाई गई।

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