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नागर खण्ड · अध्याय 198

शूद्री-ब्राह्मणी तीर्थद्वय का माहात्म्य-वर्णन

अध्याय 197अध्याय-सूचीअध्याय 199

श्लोक 1 (skanda.6.198.1)

सूत उवाच एतस्मिन्नेव काले तु दशार्णाधिपतिस्तदा रत्नवत्या विवाहार्थं तत्र स्थाने समागतः

sūta uvāca etasminneva kāle tu daśārṇādhipatistadā ratnavatyā vivāhārthaṁ tatra sthāne samāgataḥ

सूत जी ने कहा — इसी समय दशार्णाधिपति रत्नवती के विवाह हेतु उस स्थान पर आ पहुँचा।

श्लोक 2 (skanda.6.198.2)

स श्रुत्वा तत्र वृत्तांतं रत्नवत्याः समुद्भवम् विरक्तिं परमां कृत्वा प्रस्थितः स्वपुरं प्रति

sa śrutvā tatra vṛttāṁtaṁ ratnavatyāḥ samudbhavam viraktiṁ paramāṁ kṛtvā prasthitaḥ svapuraṁ prati

वहाँ रत्नवती से संबंधित वह वृत्तांत सुनकर वह अत्यंत विरक्त हो गया, और अपने नगर की ओर लौट पड़ा।

श्लोक 3 (skanda.6.198.3)

तं श्रुत्वा प्रस्थितं भूपमानर्तः स्वपुरं प्रति पृष्ठतोऽनुययौ तस्य व्याघोटनकृते तदा

taṁ śrutvā prasthitaṁ bhūpamānartaḥ svapuraṁ prati pṛṣṭhato'nuyayau tasya vyāghoṭanakṛte tadā

उस राजा को अपने नगर की ओर प्रस्थान करते सुनकर, आनर्त उसे मनाने के लिए तुरंत पीछे-पीछे चल पड़ा।

श्लोक 4 (skanda.6.198.4)

अथाब्रवीच्च तं प्राप्य कस्मात्त्वं प्रस्थितो नृप पाणिग्रहमकृत्वा तु मम कन्यासमुद्भवम्

athābravīcca taṁ prāpya kasmāttvaṁ prasthito nṛpa pāṇigrahamakṛtvā tu mama kanyāsamudbhavam

उसे पाकर आनर्त ने कहा — 'हे राजन्, मेरी कन्या का पाणिग्रहण किए बिना ही आप क्यों प्रस्थान कर गए?'

श्लोक 5 (skanda.6.198.5)

दशार्ण उवाच दूषितेयं तव सुता कन्यकात्वविवर्जिता यस्याः पीतोऽधरोऽन्येन मर्दितौ च तथा स्तनौ

daśārṇa uvāca dūṣiteyaṁ tava sutā kanyakātvavivarjitā yasyāḥ pīto'dharo'nyena marditau ca tathā stanau

दशार्ण ने कहा — 'आपकी यह पुत्री दूषित हो चुकी है, कन्यात्व से रहित है — क्योंकि इसका अधर किसी अन्य ने पान किया है, और इसके दोनों स्तन भी उसके द्वारा स्पर्शित किए गए हैं।'

श्लोक 6 (skanda.6.198.6)

पुनर्भूरिति संज्ञा सा सञ्जाता दुहिता तव पुनर्भूर्जनयेत्पुत्रं यं कदाचित्कथंचन

punarbhūriti saṁjñā sā sañjātā duhitā tava punarbhūrjanayetputraṁ yaṁ kadācitkathaṁcana

'आपकी यह पुत्री अब पुनर्भू नाम से कही जाती है। और यदि कभी, किसी प्रकार, कोई पुनर्भू पुत्र को जन्म दे,'

श्लोक 7 (skanda.6.198.7)

स पातयत्यसंदिग्धं दश पूर्वान्दशापरान् एकविंशतिमं चैव तथैवात्मानमेव च

sa pātayatyasaṁdigdhaṁ daśa pūrvāndaśāparān ekaviṁśatimaṁ caiva tathaivātmānameva ca

'तो वह पुत्र निःसंदेह दस पूर्व पीढ़ियों और दस पर की पीढ़ियों को, तथा इक्कीसवीं पीढ़ी के रूप में स्वयं को भी, पतित कर देता है।'

श्लोक 8 (skanda.6.198.8)

न वरिष्याम्यहं तेन सुतां तेऽहं नरसिप निर्दाक्षिण्यमिति प्रोच्य दशार्णाधिपतिस्तदा

na variṣyāmyahaṁ tena sutāṁ te'haṁ narasipa nirdākṣiṇyamiti procya daśārṇādhipatistadā

'अतः हे नरेश्वर, मैं आपकी पुत्री को वरण नहीं करूँगा।' यह अस्वीकृति कहकर दशार्णाधिपति,

श्लोक 9 (skanda.6.198.9)

छंद्यमानोऽपि विविधैर्हस्त्यश्वरथपूर्वकैः अवज्ञाय महीपालं प्रस्थितः स्वपुरं प्रति

chaṁdyamāno'pi vividhairhastyaśvarathapūrvakaiḥ avajñāya mahīpālaṁ prasthitaḥ svapuraṁ prati

हाथी, घोड़े, रथ आदि विविध वस्तुओं का प्रलोभन दिए जाने पर भी, राजा की अवज्ञा करके अपने नगर की ओर चला गया।

श्लोक 10 (skanda.6.198.10)

अथानर्त्तो गृहं प्राप्य मृगावत्याः समाकुलः तद्वृत्तं कथयामास यदुक्तं तेन भूभुजा स्वभार्यायाः सुतायाश्च मन्त्रिणां दुःखसंयुतः

athānartto gṛhaṁ prāpya mṛgāvatyāḥ samākulaḥ tadvṛttaṁ kathayāmāsa yaduktaṁ tena bhūbhujā svabhāryāyāḥ sutāyāśca mantriṇāṁ duḥkhasaṁyutaḥ

तब आनर्त, घर पहुँचकर व्याकुल होते हुए, दुःखी होकर मृगावती, अपनी पुत्री तथा मंत्रियों को उस राजा द्वारा कहा गया संपूर्ण वृत्तांत सुनाने लगा।

श्लोक 11 (skanda.6.198.11)

ते प्रोचुः संति भूपालाः संख्याहीना महीतले रूपाढ्या यौवनोपेता हस्त्यश्वरथसंयुताः

te procuḥ saṁti bhūpālāḥ saṁkhyāhīnā mahītale rūpāḍhyā yauvanopetā hastyaśvarathasaṁyutāḥ

उन्होंने कहा — 'पृथ्वी पर असंख्य राजा हैं, रूपसंपन्न, यौवन से युक्त, हाथी-घोड़े-रथों से सज्जित।'

श्लोक 12 (skanda.6.198.12)

तेषामेकतमस्य त्वं देहि कन्यां निजां विभो मा विषादे मनः कृत्वा दुःखस्य वशगो भव

teṣāmekatamasya tvaṁ dehi kanyāṁ nijāṁ vibho mā viṣāde manaḥ kṛtvā duḥkhasya vaśago bhava

'हे प्रभु, उनमें से किसी एक को अपनी कन्या दे दीजिए। विषाद में मन मत डालिए, दुःख के वशीभूत मत होइए।'

श्लोक 13 (skanda.6.198.13)

आनर्तोऽपि च तच्छ्रुत्वा तेषां वाक्यं सुदुःखितम् ततः प्राह प्रहृष्टात्मा तान्सर्वान्मन्त्रिपूर्वकान्

ānarto'pi ca tacchrutvā teṣāṁ vākyaṁ suduḥkhitam tataḥ prāha prahṛṣṭātmā tānsarvānmantripūrvakān

आनर्त भी, अत्यंत दुःखी होते हुए उनका यह सांत्वना-वचन सुनकर, फिर हर्षित होकर मंत्रियों सहित उन सबसे बोला।

श्लोक 14 (skanda.6.198.14)

तां च कन्यां स्थितां तत्र साम्ना परमवल्गुना पुत्रि दृष्टा महीपालाः सर्वे चित्रगतास्त्वया

tāṁ ca kanyāṁ sthitāṁ tatra sāmnā paramavalgunā putri dṛṣṭā mahīpālāḥ sarve citragatāstvayā

उसने वहाँ बैठी उस कन्या से अत्यंत मधुर वचनों में कहा — 'हे पुत्री, तुमने चित्रों में अंकित समस्त राजाओं को देख लिया है।'

श्लोक 15 (skanda.6.198.15)

तेषां मध्यान्नृपं चान्यं कञ्चिद्वरय शोभने यस्ते चित्तस्य सन्तोषं कुरुते दृक्पथं गतः

teṣāṁ madhyānnṛpaṁ cānyaṁ kañcidvaraya śobhane yaste cittasya santoṣaṁ kurute dṛkpathaṁ gataḥ

'हे शोभने, उनमें से किसी अन्य राजा को वरण करो — जो भी दृष्टिपथ में आकर तुम्हारे चित्त को संतोष प्रदान करे।'

श्लोक 16 (skanda.6.198.16)

रत्नावत्युवाच न चाहं वरयिष्यामि पतिमन्यं कथंचन दशार्णाधिपतिं मुक्त्वा श्रूयतामत्र कारणम्

ratnāvatyuvāca na cāhaṁ varayiṣyāmi patimanyaṁ kathaṁcana daśārṇādhipatiṁ muktvā śrūyatāmatra kāraṇam

रत्नावती ने कहा — 'मैं दशार्णाधिपति को छोड़कर अन्य किसी को भी पति के रूप में किसी प्रकार वरण नहीं करूँगी। इसका कारण सुनिए।'

श्लोक 17 (skanda.6.198.17)

सकृज्जल्पंति राजानः सकृज्जल्पंति च द्विजाः सकृत्कन्याः प्रदीयंते त्रीण्येतानि सकृत्सकृत्

sakṛjjalpaṁti rājānaḥ sakṛjjalpaṁti ca dvijāḥ sakṛtkanyāḥ pradīyaṁte trīṇyetāni sakṛtsakṛt

'राजा एक ही बार वचन देते हैं, ब्राह्मण भी एक ही बार वचन देते हैं, और कन्याएँ भी एक ही बार दी जाती हैं — ये तीनों बातें एक-एक ही बार होती हैं।'

श्लोक 18 (skanda.6.198.18)

एवं ज्ञात्वा न मां तात त्वमन्यस्मिन्महीपतौ दातुमर्हसि धर्मोऽयं न भवेच्छाश्वतो यतः

evaṁ jñātvā na māṁ tāta tvamanyasminmahīpatau dātumarhasi dharmo'yaṁ na bhavecchāśvato yataḥ

'हे तात, यह जानकर मुझे किसी अन्य राजा को देना उचित नहीं है, क्योंकि अन्यथा यह सनातन धर्म ही स्थिर न रह सकेगा।'

श्लोक 19 (skanda.6.198.19)

आनर्त उवाच वाङ्मात्रेण प्रदत्ता त्वं दशार्णाधिपतेर्मया न ते हस्तग्रहं प्राप्तो विप्राग्निगुरुसन्निधौ

ānarta uvāca vāṅmātreṇa pradattā tvaṁ daśārṇādhipatermayā na te hastagrahaṁ prāpto viprāgnigurusannidhau

आनर्त ने कहा — 'मैंने तुम्हें केवल वाणी से ही दशार्णाधिपति को दिया था। ब्राह्मण, अग्नि और गुरुजनों की उपस्थिति में तुम्हारा पाणिग्रहण अभी उसने नहीं किया है।'

श्लोक 20 (skanda.6.198.20)

तत्कथं स पतिर्जातस्तव पुत्रि वदस्व मे

tatkathaṁ sa patirjātastava putri vadasva me

'तो हे पुत्री, वह तुम्हारा पति कैसे बन गया — यह मुझे बताओ।'

श्लोक 21 (skanda.6.198.21)

रत्नावत्युवाच मनसा चिंत्यते कार्यं सकृत्तातपुरा यतः वाचया प्रोच्यते पश्चात्कर्मणा क्रियते ततः

ratnāvatyuvāca manasā ciṁtyate kāryaṁ sakṛttātapurā yataḥ vācayā procyate paścātkarmaṇā kriyate tataḥ

रत्नावती ने कहा — 'हे तात, कोई भी कार्य पहले मन में एक बार सोचा जाता है, फिर वाणी से कहा जाता है, और उसके बाद कर्म से किया जाता है।'

श्लोक 22 (skanda.6.198.22)

तन्मया मनसा दत्तस्तस्यात्माऽयं पुरा किल त्वया च वाचया चास्मै प्रदत्तास्मि तथा विभो तत्कथं न पतिर्मे स्याद्ब्रूहि वा यदि मन्यसे

tanmayā manasā dattastasyātmā'yaṁ purā kila tvayā ca vācayā cāsmai pradattāsmi tathā vibho tatkathaṁ na patirme syādbrūhi vā yadi manyase

'मैंने पहले ही अपना यह आत्मा मन से उसे दे दिया था, और हे प्रभु, आपने भी वाणी से मुझे उसे दे दिया है। तो वह मेरा पति क्यों न होगा? यदि आप कुछ और मानते हों तो बताइए।'

श्लोक 23 (skanda.6.198.23)

साहं तपश्चरिष्यामि कौमारव्रतधारिणी नान्यं पतिं करिष्यामि निश्चयोऽयं मया कृतः

sāhaṁ tapaścariṣyāmi kaumāravratadhāriṇī nānyaṁ patiṁ kariṣyāmi niścayo'yaṁ mayā kṛtaḥ

'अतः मैं कौमार्य-व्रत धारण करके तप करूँगी। मैं किसी अन्य को पति नहीं बनाऊँगी — यह मेरा दृढ़ निश्चय है।'

श्लोक 24 (skanda.6.198.24)

तच्छ्रुत्वा वचनं रौद्रं माता तस्या मृगावती अश्रुपूर्णेक्षणा दीना वाक्यमेतदुवाच ह

tacchrutvā vacanaṁ raudraṁ mātā tasyā mṛgāvatī aśrupūrṇekṣaṇā dīnā vākyametaduvāca ha

यह कठोर वचन सुनकर उसकी माता मृगावती, आँसुओं से भरे नेत्रों के साथ, दीन होकर यह बोली।

श्लोक 25 (skanda.6.198.25)

मा पुत्रि साहसं कार्षीस्तपोऽर्थं त्वं कथञ्चन बाला त्वं सुकुमारांगी सदैव सुखभागिनी

mā putri sāhasaṁ kārṣīstapo'rthaṁ tvaṁ kathañcana bālā tvaṁ sukumārāṁgī sadaiva sukhabhāginī

'हे पुत्री, तप के लिए किसी भी प्रकार का दुःसाहस मत करो। तुम अभी बालिका हो, कोमलांगी हो, सदा सुख भोगने वाली हो।'

श्लोक 26 (skanda.6.198.26)

कथं तपः समर्थासि विधातुं त्वमनिंदिते कन्दमूलफलाहारा चीरवल्कलधारिणी

kathaṁ tapaḥ samarthāsi vidhātuṁ tvamaniṁdite kandamūlaphalāhārā cīravalkaladhāriṇī

'हे निर्दोष कन्ये, तुम कंद-मूल-फल खाकर, वल्कल वस्त्र धारण करके, तप करने में कैसे समर्थ हो सकोगी?'

श्लोक 27 (skanda.6.198.27)

तस्मान्मुख्यस्य भूपस्य कस्यचित्वां ददाम्यहम्

tasmānmukhyasya bhūpasya kasyacitvāṁ dadāmyaham

'अतः मैं तुम्हें किसी अन्य श्रेष्ठ राजा को दे दूँगी।'

श्लोक 28 (skanda.6.198.28)

एषा ते ब्राह्मणीनाम सखी परमसंमता प्रतीक्षते विवाहं ते कौमारं भावमाश्रिता

eṣā te brāhmaṇīnāma sakhī paramasaṁmatā pratīkṣate vivāhaṁ te kaumāraṁ bhāvamāśritā

'यह तुम्हारी अत्यंत प्रिय सखी ब्राह्मणी, कौमार्य-भाव में रहते हुए, तुम्हारे विवाह की प्रतीक्षा कर रही है।'

श्लोक 29 (skanda.6.198.29)

यस्य भूपस्य त्वं हर्म्ये प्रयास्यसि विवाहिता पुरोधास्तस्य यो राज्ञो भार्येयं तस्य भाविनी

yasya bhūpasya tvaṁ harmye prayāsyasi vivāhitā purodhāstasya yo rājño bhāryeyaṁ tasya bhāvinī

'जिस राजा के भवन में तुम विवाहिता होकर जाओगी, उसी राजा के पुरोहित की भावी पत्नी यह बनेगी।'

श्लोक 30 (skanda.6.198.30)

रत्नावत्युवाच न च भूयस्त्वया वाच्यं वाक्यमेवंविधं क्वचित् मदर्थे यदि मे प्राणास्त्वं वांछसि सुतैषिणी

ratnāvatyuvāca na ca bhūyastvayā vācyaṁ vākyamevaṁvidhaṁ kvacit madarthe yadi me prāṇāstvaṁ vāṁchasi sutaiṣiṇī

रत्नावती ने कहा — 'यदि आप मेरी हितैषी माता होकर मेरे प्राणों की कामना करती हैं, तो ऐसा वचन फिर कभी मुझसे मत कहिए।'

श्लोक 31 (skanda.6.198.31)

अथवा त्वं हठार्थं च तपोविघ्नं करिष्यसि

athavā tvaṁ haṭhārthaṁ ca tapovighnaṁ kariṣyasi

'अथवा यदि आप हठपूर्वक मेरे तप में विघ्न डालेंगी,'

श्लोक 32 (skanda.6.198.32)

ततस्त्यक्ष्याम्यहं देहं भक्षयित्वा महद्विषम् खंडयिष्याम्यहं जिह्वां प्रवेक्ष्यामि च वा जलम्

tatastyakṣyāmyahaṁ dehaṁ bhakṣayitvā mahadviṣam khaṁḍayiṣyāmyahaṁ jihvāṁ pravekṣyāmi ca vā jalam

'तो मैं महाविष खाकर अपना शरीर त्याग दूँगी, या अपनी जिह्वा काट लूँगी, अथवा जल में प्रवेश कर जाऊँगी।'

श्लोक 33 (skanda.6.198.33)

एवं सा निश्चयं कृत्वा प्रोच्य तां जननीं तदा

evaṁ sā niścayaṁ kṛtvā procya tāṁ jananīṁ tadā

इस प्रकार निश्चय करके, और अपनी माता से यह कहकर,

श्लोक 34 (skanda.6.198.34)

ततः प्रोवाच तां कन्यां ब्राह्मणीं संमतां सखीम् कृतांजलिपुटा भूत्वा समालिंग्य च सादरम्

tataḥ provāca tāṁ kanyāṁ brāhmaṇīṁ saṁmatāṁ sakhīm kṛtāṁjalipuṭā bhūtvā samāliṁgya ca sādaram

उसने फिर हाथ जोड़कर, आदरपूर्वक आलिंगन करते हुए, अपनी प्रिय सखी ब्राह्मणी से यह कहा।

श्लोक 35 (skanda.6.198.35)

गच्छ त्वं स्वपितुर्हर्म्यं प्रेषितासि मया शुभे येन ते यच्छति पिता नागराय महात्मने

gaccha tvaṁ svapiturharmyaṁ preṣitāsi mayā śubhe yena te yacchati pitā nāgarāya mahātmane

'हे शुभे, मैंने तुम्हें भेजा है — अपने पिता के भवन को जाओ, जिससे तुम्हारे पिता तुम्हें किसी महान् नागर को दे सकें।'

श्लोक 36 (skanda.6.198.36)

क्षमस्व यन्मया प्रोक्ता कदाचित्परुषं वचः त्वयापि यन्मम प्रोक्तं क्षांतं चैतन्मया ध्रुवम्

kṣamasva yanmayā proktā kadācitparuṣaṁ vacaḥ tvayāpi yanmama proktaṁ kṣāṁtaṁ caitanmayā dhruvam

'मैंने यदि कभी तुम्हें कोई कठोर वचन कहा हो, तो मुझे क्षमा करना; और तुमने भी मुझसे जो कुछ कहा हो, उसे मैंने निश्चय ही क्षमा कर दिया है।'

श्लोक 37 (skanda.6.198.37)

ब्राह्मण्युवाच अष्टवर्षा भवेद्गौरी नववर्षा तु रोहिणी दशवर्षा भवेत्कन्या अत ऊर्ध्वं रजस्वला

brāhmaṇyuvāca aṣṭavarṣā bhavedgaurī navavarṣā tu rohiṇī daśavarṣā bhavetkanyā ata ūrdhvaṁ rajasvalā

ब्राह्मणी ने कहा — 'आठ वर्ष की कन्या गौरी कहलाती है, नौ वर्ष की रोहिणी, दस वर्ष की कन्या, और इसके पश्चात् वह रजस्वला होती है।'

श्लोक 38 (skanda.6.198.38)

कौमार्यं च प्रणष्टं मे त्वत्संपर्काद्वरानने जातं षोडशकं वर्षं स्त्रीधर्मेण समन्वितम्

kaumāryaṁ ca praṇaṣṭaṁ me tvatsaṁparkādvarānane jātaṁ ṣoḍaśakaṁ varṣaṁ strīdharmeṇa samanvitam

'हे वरानने, तुम्हारे साहचर्य के कारण मेरा कौमार्य अब समाप्त हो चुका है — मेरा सोलहवाँ वर्ष आ गया है, और मैं स्त्री-धर्म से युक्त हो चुकी हूँ।'

श्लोक 39 (skanda.6.198.39)

न मे पाणिग्रहं कश्चिन्नागरोऽत्र करिष्यति बुध्यमानस्तु स्मृत्यर्थं वक्ष्यमाणं वरानने

na me pāṇigrahaṁ kaścinnāgaro'tra kariṣyati budhyamānastu smṛtyarthaṁ vakṣyamāṇaṁ varānane

'हे वरानने, इसे जानने वाला कोई भी नागर अब मेरा पाणिग्रहण नहीं करेगा — स्मृति के प्रयोजन से आगे यह कहा जा रहा है:'

श्लोक 40 (skanda.6.198.40)

रजस्वलां च यः कन्यामुद्वाहयति निर्घृणः तस्याः सन्तानमासाद्य पातयेत्पुरुषान्दश

rajasvalāṁ ca yaḥ kanyāmudvāhayati nirghṛṇaḥ tasyāḥ santānamāsādya pātayetpuruṣāndaśa

'जो निर्दयी पुरुष रजस्वला हो चुकी कन्या से विवाह करता है, वह उससे उत्पन्न संतान के कारण दस पीढ़ियों को पतित कर देता है।'

श्लोक 41 (skanda.6.198.41)

रजस्वला तु यः कन्यां पिता यच्छति निर्घृणः स पातयेदसंदिग्धं दश पूर्वान्दशापरान्

rajasvalā tu yaḥ kanyāṁ pitā yacchati nirghṛṇaḥ sa pātayedasaṁdigdhaṁ daśa pūrvāndaśāparān

'और जो निर्दयी पिता अपनी रजस्वला हो चुकी कन्या को विवाह के लिए दे देता है, वह निःसंदेह दस पूर्व और दस पर की पीढ़ियों को पतित कर देता है।'

श्लोक 42 (skanda.6.198.42)

तस्मादहं करिष्यामि त्वया सार्धं तपः शुभे पित्रा नैव हि मे कार्यं न च मात्रा कथंचन

tasmādahaṁ kariṣyāmi tvayā sārdhaṁ tapaḥ śubhe pitrā naiva hi me kāryaṁ na ca mātrā kathaṁcana

'अतः हे शुभे, मैं तुम्हारे साथ ही तप करूँगी। अब मुझे अपने पिता से कोई प्रयोजन नहीं, और माता से भी किसी प्रकार नहीं।'

श्लोक 43 (skanda.6.198.43)

सूत उवाच एवं ते निश्चयं कृत्वा कन्यके द्वे द्विजोतमाः गते यत्र स्थितः साक्षाद्भर्तृयज्ञो महामुनिः

sūta uvāca evaṁ te niścayaṁ kṛtvā kanyake dve dvijotamāḥ gate yatra sthitaḥ sākṣādbhartṛyajño mahāmuniḥ

सूत जी ने कहा — हे द्विजश्रेष्ठो, इस प्रकार निश्चय करके वे दोनों कन्याएँ वहाँ गईं जहाँ साक्षात् महामुनि भर्तृयज्ञ निवास करते थे।

श्लोक 44 (skanda.6.198.44)

स्थितो वास्तुपदे रम्ये सर्वतीर्थमये शुभे तस्य तपःप्रभावेन जातु कोपो न दृश्यते

sthito vāstupade ramye sarvatīrthamaye śubhe tasya tapaḥprabhāvena jātu kopo na dṛśyate

वे एक रम्य, शुभ, समस्त तीर्थों से युक्त बस्ती में रहते थे। उनकी तपस्या के प्रभाव से वहाँ कभी क्रोध देखने को नहीं मिलता था —

श्लोक 45 (skanda.6.198.45)

कस्यचित्क्वापि मर्त्यस्य तिर्यग्योनिगतस्य च

kasyacitkvāpi martyasya tiryagyonigatasya ca

किसी भी मनुष्य में, अथवा तिर्यक् योनि में स्थित किसी भी प्राणी में।

श्लोक 46 (skanda.6.198.46)

क्रीडंति नकुलाः सर्पैर्मार्जाराः सह मूषकैः सारंगा द्वीपिभिः सार्धं काकाश्च सह कौशिकैः भर्तृयज्ञं सुखासीनं तत्र गत्वा तु ते शुभे प्रोचतुर्विनयोपेते कृतांजलिपुटे स्थिते

krīḍaṁti nakulāḥ sarpairmārjārāḥ saha mūṣakaiḥ sāraṁgā dvīpibhiḥ sārdhaṁ kākāśca saha kauśikaiḥ bhartṛyajñaṁ sukhāsīnaṁ tatra gatvā tu te śubhe procaturvinayopete kṛtāṁjalipuṭe sthite

वहाँ नेवले साँपों के साथ, बिल्लियाँ चूहों के साथ, हिरण तेंदुओं के साथ, तथा कौवे उल्लुओं के साथ क्रीड़ा करते थे। वहाँ जाकर, सुखपूर्वक बैठे भर्तृयज्ञ के समक्ष वे दोनों शुभा कन्याएँ, विनयपूर्वक हाथ जोड़े खड़ी होकर बोलीं।

श्लोक 47 (skanda.6.198.47)

ब्राह्मण्युवाच अहं सख्या समं याता ह्यनया राजकन्यया तपोऽर्थे तव पादांते तद्ब्रूहि तपसो विधिम्

brāhmaṇyuvāca ahaṁ sakhyā samaṁ yātā hyanayā rājakanyayā tapo'rthe tava pādāṁte tadbrūhi tapaso vidhim

ब्राह्मणी ने कहा — 'मैं इस राजकन्या सखी के साथ, तप के प्रयोजन से आपके चरणों में आई हूँ। तप की विधि बताइए।'

श्लोक 48 (skanda.6.198.48)

वदस्व येन तत्कृत्स्नं प्रकरोमि महामते

vadasva yena tatkṛtsnaṁ prakaromi mahāmate

'हे महामते, वह हमें बताइए, जिससे मैं उसे संपूर्णतः कर सकूँ।'

श्लोक 49 (skanda.6.198.49)

भर्तृयज्ञ उवाच अहं ते कथयिष्यामि तपश्चर्याविधिं पृथक् येन संप्राप्यते मोक्षः कि पुनस्त्रिदशालयः

bhartṛyajña uvāca ahaṁ te kathayiṣyāmi tapaścaryāvidhiṁ pṛthak yena saṁprāpyate mokṣaḥ ki punastridaśālayaḥ

भर्तृयज्ञ ने कहा — 'मैं तुम्हें तपश्चर्या की विधि पृथक्-पृथक् बताऊँगा, जिससे मोक्ष प्राप्त होता है — फिर स्वर्गलोक की तो बात ही क्या!'

श्लोक 50 (skanda.6.198.50)

चांद्रायणानि कृच्छ्राणि तथा सांतपनानि च षष्ठे काले तथा भोज्यं दिनांतरितमेव च

cāṁdrāyaṇāni kṛcchrāṇi tathā sāṁtapanāni ca ṣaṣṭhe kāle tathā bhojyaṁ dināṁtaritameva ca

'चांद्रायण व्रत, कृच्छ्र व्रत, तथा सांतपन व्रत; छठे समय भोजन करना, तथा एक दिन छोड़कर भोजन करना;

श्लोक 51 (skanda.6.198.51)

ब्रह्मकूर्चं त्रिरात्रं च एकभक्तमयाचितम् तपोद्वाराणि सर्वाणि कृतान्येतानि वेधसा

brahmakūrcaṁ trirātraṁ ca ekabhaktamayācitam tapodvārāṇi sarvāṇi kṛtānyetāni vedhasā

ब्रह्मकूर्च, त्रिरात्र, बिना माँगे प्राप्त एक ही समय का भोजन — तप के इन समस्त द्वारों की रचना विधाता ने की है।'

श्लोक 52 (skanda.6.198.52)

स्वशक्त्या चैव कार्याणि रागद्वेषविवर्जितैः वांछितव्यं फलं चैव सर्वेषामेव पुत्रिके ततः सिद्धिमवाप्नोति या सदा मनसि स्थिता

svaśaktyā caiva kāryāṇi rāgadveṣavivarjitaiḥ vāṁchitavyaṁ phalaṁ caiva sarveṣāmeva putrike tataḥ siddhimavāpnoti yā sadā manasi sthitā

'हे पुत्रियो, राग-द्वेष से रहित होकर, अपनी-अपनी शक्ति के अनुसार इन्हें करना चाहिए, और मन में सदा वांछित फल रखना चाहिए — तभी वह सिद्धि प्राप्त होती है जो सदा चित्त में स्थित है।'

श्लोक 53 (skanda.6.198.53)

समत्वं शत्रुमित्राभ्यां तथा पाषाणरत्नयोः यदा संजायते चित्ते तदा मोक्षमवाप्नुयात्

samatvaṁ śatrumitrābhyāṁ tathā pāṣāṇaratnayoḥ yadā saṁjāyate citte tadā mokṣamavāpnuyāt

'जब शत्रु और मित्र में, तथा पत्थर और रत्न में, चित्त में समभाव उत्पन्न हो जाए, तभी मोक्ष प्राप्त होता है।'

श्लोक 54 (skanda.6.198.54)

यो लिंगग्रहणं कृत्वा ततः कोपपरो भवेत् तस्य वृथा हि तत्सर्वं यथा भस्महुतं तथा

yo liṁgagrahaṇaṁ kṛtvā tataḥ kopaparo bhavet tasya vṛthā hi tatsarvaṁ yathā bhasmahutaṁ tathā

'जो तपस्वी के चिह्न धारण करके भी क्रोधवश हो जाता है, उसका वह सारा कर्म वैसे ही व्यर्थ हो जाता है जैसे राख में डाली गई आहुति।'

श्लोक 55 (skanda.6.198.55)

सूत उवाच सा तथेति प्रतिज्ञाय ब्राह्मणी सहिता तया रत्नावत्या जगामाथ किंचिच्चैव जलाशयम्

sūta uvāca sā tatheti pratijñāya brāhmaṇī sahitā tayā ratnāvatyā jagāmātha kiṁciccaiva jalāśayam

सूत जी ने कहा — 'तथास्तु' कहकर स्वीकार करके, ब्राह्मणी रत्नावती के साथ किसी एक जलाशय के पास गई,

श्लोक 56 (skanda.6.198.56)

स्वच्छोदकेन संपूर्णं पद्मिनीषंडमंडितम् ततश्चांद्रायणं चक्रे तपसः प्रथमं व्रतम्

svacchodakena saṁpūrṇaṁ padminīṣaṁḍamaṁḍitam tataścāṁdrāyaṇaṁ cakre tapasaḥ prathamaṁ vratam

जो स्वच्छ जल से परिपूर्ण, कमल-समूहों से सुशोभित था। वहाँ उसने तप के प्रथम व्रत के रूप में चांद्रायण व्रत किया।

श्लोक 57 (skanda.6.198.57)

ततः कृच्छ्रव्रतं चक्रे ततः सांतपनं च सा षष्ठान्नकालभोज्या च सा चाभूद्वत्सरत्रयम्

tataḥ kṛcchravrataṁ cakre tataḥ sāṁtapanaṁ ca sā ṣaṣṭhānnakālabhojyā ca sā cābhūdvatsaratrayam

फिर उसने कृच्छ्र व्रत किया, फिर सांतपन व्रत, और तीन वर्षों तक वह छठे समय ही भोजन करती रही।

श्लोक 58 (skanda.6.198.58)

त्रिरात्रोपोषणं पश्चाद्यावद्वर्षत्रयं तथा एकान्तरोपवासैश्च साऽनयद्वत्सरत्रयम्

trirātropoṣaṇaṁ paścādyāvadvarṣatrayaṁ tathā ekāntaropavāsaiśca sā'nayadvatsaratrayam

तत्पश्चात् तीन वर्षों तक त्रिरात्र उपवास किया, और फिर तीन वर्ष एक-एक दिन छोड़कर उपवास करते हुए बिताए।

श्लोक 59 (skanda.6.198.59)

हेमंते जलमध्यस्था सा बभूव तपस्विनी पंचाग्निसाधका ग्रीष्मे सा बभूव यशस्विनी

hemaṁte jalamadhyasthā sā babhūva tapasvinī paṁcāgnisādhakā grīṣme sā babhūva yaśasvinī

हेमंत ऋतु में वह तपस्विनी जल के मध्य खड़ी रहती, और ग्रीष्म ऋतु में वह यशस्विनी पंचाग्नि-साधना करती।

श्लोक 60 (skanda.6.198.60)

निराश्रयाऽभवत्साध्वी वर्षाकाल उपस्थिते ध्यायमाना दिवानक्तं देवदेवं जनार्दनम्

nirāśrayā'bhavatsādhvī varṣākāla upasthite dhyāyamānā divānaktaṁ devadevaṁ janārdanam

वर्षा ऋतु आने पर वह साध्वी निराश्रय होकर, दिन-रात देवदेव जनार्दन का ध्यान करती रहती।

श्लोक 61 (skanda.6.198.61)

यद्यद्व्रतं पुरा चक्रे ब्राह्मणी सा च सुव्रता अन्यं जलाशयं प्राप्य सा तच्चक्रे नृपात्मजा प्रीत्या परमया युक्ता तदा सा द्विजसत्तमाः

yadyadvrataṁ purā cakre brāhmaṇī sā ca suvratā anyaṁ jalāśayaṁ prāpya sā taccakre nṛpātmajā prītyā paramayā yuktā tadā sā dvijasattamāḥ

हे द्विजश्रेष्ठो, सुव्रता ब्राह्मणी ने पहले जो-जो व्रत किया था, वही सब उस राजकन्या ने भी, किसी अन्य जलाशय को पाकर, परम प्रीति के साथ किया।

श्लोक 62 (skanda.6.198.62)

ततो वर्षशतं सार्धं फलाहारा बभूव सा शीर्णपर्णाशना पश्चात्तावन्मात्रं व्यवस्थिता

tato varṣaśataṁ sārdhaṁ phalāhārā babhūva sā śīrṇaparṇāśanā paścāttāvanmātraṁ vyavasthitā

फिर वह सौ वर्षों तक फलाहारी रही, और उसके पश्चात् उतने ही समय तक झरे हुए पत्तों का आहार करती रही।

श्लोक 63 (skanda.6.198.63)

ततश्चैव जलाहारा यावद्वर्षशतानि षट् वायुभक्षा बभूवाथ सहस्रं परिवत्सरान्

tataścaiva jalāhārā yāvadvarṣaśatāni ṣaṭ vāyubhakṣā babhūvātha sahasraṁ parivatsarān

फिर छह सौ वर्षों तक वह केवल जल का आहार करती रही, और उसके बाद एक हजार वर्षों तक वायु का ही भक्षण करती रही।

श्लोक 64 (skanda.6.198.64)

यथायथा तपश्चक्रे सा कुमारी द्विजोत्तमाः तथातथाऽभवत्तस्यास्तेजोवृद्धिरनुत्तमा

yathāyathā tapaścakre sā kumārī dvijottamāḥ tathātathā'bhavattasyāstejovṛddhiranuttamā

हे द्विजश्रेष्ठो, जैसे-जैसे वह कुमारी तप करती गई, वैसे-वैसे उसका तेज अनुपम रूप से बढ़ता गया।

श्लोक 65 (skanda.6.198.65)

एतस्मिन्नेव काले तु भगवाञ्छशिशेखरः

etasminneva kāle tu bhagavāñchaśiśekharaḥ

इसी समय भगवान शशिशेखर (शिव),

श्लोक 66 (skanda.6.198.66)

गौर्या सह प्रसन्नात्मा तस्या गोचरमागतः मेघगंभीरया वाचा ततोवचनमब्रवीत्

gauryā saha prasannātmā tasyā gocaramāgataḥ meghagaṁbhīrayā vācā tatovacanamabravīt

गौरी सहित प्रसन्नचित्त होकर उसके समक्ष प्रकट हुए, और मेघ के समान गंभीर वाणी में यह वचन बोले।

श्लोक 67 (skanda.6.198.67)

वत्से तपोनिवृत्तिं त्वं कुरुष्व वचनान्मम प्रार्थयस्व मनोऽभीष्टं येन सर्वं ददामि ते

vatse taponivṛttiṁ tvaṁ kuruṣva vacanānmama prārthayasva mano'bhīṣṭaṁ yena sarvaṁ dadāmi te

'हे वत्से, मेरे वचन से अब तप को समाप्त करो। जो तुम्हारे मन को अभीष्ट हो, वह माँगो, जिससे मैं तुम्हें वह सब दे सकूँ।'

श्लोक 68 (skanda.6.198.68)

ब्राह्मण्युवाच अभीष्टमेतदेवं मे यत्त्वं दृष्टोऽसि शंकर स्वप्नेऽपि दर्शनं देव दुर्लभं ते नृणां यतः

brāhmaṇyuvāca abhīṣṭametadevaṁ me yattvaṁ dṛṣṭo'si śaṁkara svapne'pi darśanaṁ deva durlabhaṁ te nṛṇāṁ yataḥ

ब्राह्मणी ने कहा — 'हे शंकर, यही मेरा अभीष्ट पूर्ण हो गया कि मैंने आपके दर्शन किए, क्योंकि हे देव, मनुष्यों को स्वप्न में भी आपका दर्शन दुर्लभ है।'

श्लोक 69 (skanda.6.198.69)

भगवानुवाच न मे स्याद्दर्शनं व्यर्थं कथंचित्सुतपस्विनि तस्माद्वरय भद्रं ते वरं येन ददाम्यहम्

bhagavānuvāca na me syāddarśanaṁ vyarthaṁ kathaṁcitsutapasvini tasmādvaraya bhadraṁ te varaṁ yena dadāmyaham

भगवान ने कहा — 'हे परम तपस्विनी, मेरा दर्शन किसी भी प्रकार व्यर्थ नहीं होना चाहिए। अतः वर माँगो, तुम्हारा कल्याण हो, जिससे मैं तुम्हें वह दे सकूँ।'

श्लोक 70 (skanda.6.198.70)

ब्राह्मण्युवाच एषा मे सुसखी साध्वी राजपुत्री यशस्विनी ख्याता रत्नावतीनाम प्राणेभ्योऽपिगरीयसी

brāhmaṇyuvāca eṣā me susakhī sādhvī rājaputrī yaśasvinī khyātā ratnāvatīnāma prāṇebhyo'pigarīyasī

ब्राह्मणी ने कहा — 'यह मेरी परम प्रिय सखी है, साध्वी, यशस्विनी राजपुत्री, रत्नावती नाम से विख्यात, जो मुझे प्राणों से भी अधिक प्रिय है।'

श्लोक 71 (skanda.6.198.71)

मम तुल्यं तपश्चक्रे शूद्रयोनावपि स्थिता निवर्तते तु यद्येषा तपसस्तु निवर्तनम् करोम्यद्य जगन्नाथ तदहं संशयं विना

mama tulyaṁ tapaścakre śūdrayonāvapi sthitā nivartate tu yadyeṣā tapasastu nivartanam karomyadya jagannātha tadahaṁ saṁśayaṁ vinā

'शूद्र-योनि में स्थित होते हुए भी इसने मेरे समान तप किया है। हे जगन्नाथ, यदि यह अपने तप से निवृत्त हो, तो मैं भी निःसंदेह आज ही अपने तप से निवृत्त हो जाऊँगी।'

श्लोक 72 (skanda.6.198.72)

अस्याः स्नेहेन संत्यक्तो मया भर्ता सुरेश्वर तस्माद्देव वरं देहि त्वमस्या मनसि स्थितम्

asyāḥ snehena saṁtyakto mayā bhartā sureśvara tasmāddeva varaṁ dehi tvamasyā manasi sthitam

'हे सुरेश्वर, इसी के स्नेह के कारण मैंने पति का विचार भी त्याग दिया है। अतः हे देव, इसके मन में जो है, वही वर इसे दीजिए।'

श्लोक 73 (skanda.6.198.73)

सूत उवाच तस्यास्तद्वचनं श्रुत्वा भगवाञ्छशिशेखरः अब्रवीद्राजपुत्रीं तां मेघगंभीरया गिरा वत्से मद्वचनादद्य तपस्त्वं त्यक्तुमर्हसि

sūta uvāca tasyāstadvacanaṁ śrutvā bhagavāñchaśiśekharaḥ abravīdrājaputrīṁ tāṁ meghagaṁbhīrayā girā vatse madvacanādadya tapastvaṁ tyaktumarhasi

सूत जी ने कहा — उसका यह वचन सुनकर भगवान शशिशेखर ने उस राजकन्या से मेघ के समान गंभीर वाणी में कहा — 'हे वत्से, मेरे वचन से अब तुम भी तप को त्याग दो।'

श्लोक 74 (skanda.6.198.74)

वरं वरय कल्याणि नित्यं मनसि संस्थितम् अदेयमपि दास्यामि सांप्रतं तव भामिनि

varaṁ varaya kalyāṇi nityaṁ manasi saṁsthitam adeyamapi dāsyāmi sāṁprataṁ tava bhāmini

'हे कल्याणी, जो सदा तुम्हारे मन में स्थित हो, वही वर माँगो। हे भामिनि, अभी मैं तुम्हें अदेय वस्तु भी दे दूँगा।'

श्लोक 75 (skanda.6.198.75)

रत्नावत्युवाच एतज्जलाशयं पुण्यं पद्मिनीषण्डमण्डितम्

ratnāvatyuvāca etajjalāśayaṁ puṇyaṁ padminīṣaṇḍamaṇḍitam

रत्नावती ने कहा — 'कमल-समूहों से सुशोभित यह पवित्र जलाशय,

श्लोक 76 (skanda.6.198.76)

यत्रैषा ब्राह्मणी साध्वी नित्यं च तपसि स्थिता अस्या नाम्ना च विख्यातिं तीर्थमेतत्प्रपद्यताम्

yatraiṣā brāhmaṇī sādhvī nityaṁ ca tapasi sthitā asyā nāmnā ca vikhyātiṁ tīrthametatprapadyatām

जहाँ यह साध्वी ब्राह्मणी सदा तप में स्थित रही है — यह तीर्थ इसी के नाम से विख्यात हो जाए।'

श्लोक 77 (skanda.6.198.77)

अत्र यः कुरुते स्नानं श्रद्धया परया युतः तस्य भूयात्सदा वासो देवदेव त्रिविष्टपे

atra yaḥ kurute snānaṁ śraddhayā parayā yutaḥ tasya bhūyātsadā vāso devadeva triviṣṭape

'हे देवदेव, जो भी परम श्रद्धा से युक्त होकर यहाँ स्नान करे, उसका सदा स्वर्गलोक में निवास हो।'

श्लोक 78 (skanda.6.198.78)

मदीयं मम नाम्ना तु शूद्रासंज्ञं तु जायताम् तस्य तुल्यप्रभावं तु तीर्थस्य प्रतिपद्यताम्

madīyaṁ mama nāmnā tu śūdrāsaṁjñaṁ tu jāyatām tasya tulyaprabhāvaṁ tu tīrthasya pratipadyatām

'और मेरा भी जलाशय मेरे ही नाम से शूद्रा-नाम को प्राप्त हो, और उस तीर्थ के समान ही प्रभाव को प्राप्त हो।'

श्लोक 79 (skanda.6.198.79)

आवाभ्यां नित्यशः कार्यं कुमारत्वे महत्तपः आराध्यस्त्वं सुरश्रेष्ठो वाङ्मनःकर्मभिस्तथा

āvābhyāṁ nityaśaḥ kāryaṁ kumāratve mahattapaḥ ārādhyastvaṁ suraśreṣṭho vāṅmanaḥkarmabhistathā

'हम दोनों सदा कौमार्य-अवस्था में रहकर यह महान तप करेंगी, और हे सुरश्रेष्ठ, आपकी वाणी, मन तथा कर्म से आराधना करेंगी।'

श्लोक 80 (skanda.6.198.80)

एतस्मिन्नेव काले तु निर्भिद्य धरणीतलम् लिंगं माहेश्वरं विप्रा निष्क्रांतं सूर्यसंनिभम्

etasminneva kāle tu nirbhidya dharaṇītalam liṁgaṁ māheśvaraṁ viprā niṣkrāṁtaṁ sūryasaṁnibham

हे ब्राह्मणो, इसी समय पृथ्वीतल को भेदकर, सूर्य के समान तेजस्वी महेश्वर का एक लिंग प्रकट हुआ।

श्लोक 81 (skanda.6.198.81)

ततः प्रोवाच ते देवः स्वयमेव महेश्वरः ताभ्यां सुतपसा तुष्टः सादरं भक्तवत्सलः

tataḥ provāca te devaḥ svayameva maheśvaraḥ tābhyāṁ sutapasā tuṣṭaḥ sādaraṁ bhaktavatsalaḥ

तब भक्तवत्सल महेश्वर स्वयं ही, उन दोनों के उत्तम तप से संतुष्ट होकर, आदरपूर्वक उनसे बोले।

श्लोक 82 (skanda.6.198.82)

एतत्तीर्थद्वयं ख्यातं त्रैलोक्येपि भविष्यति शूद्रीनाम त्वदीयं तु ब्राह्मणी च सखी तव

etattīrthadvayaṁ khyātaṁ trailokyepi bhaviṣyati śūdrīnāma tvadīyaṁ tu brāhmaṇī ca sakhī tava

'यह तीर्थद्वय त्रैलोक्य में भी विख्यात होगा — तुम्हारा 'शूद्री' नाम से, और तुम्हारी सखी का 'ब्राह्मणी' नाम से।'

श्लोक 83 (skanda.6.198.83)

तीर्थद्वयेऽपि यः स्नात्वा एतस्मिञ्छ्रद्धयाऽन्वितः त्वत्तः पद्मानि संगृह्य अस्यास्तोयं च निर्मलम् एतच्च मामकं लिंगं स्नापयित्वाऽर्चयिष्यति

tīrthadvaye'pi yaḥ snātvā etasmiñchraddhayā'nvitaḥ tvattaḥ padmāni saṁgṛhya asyāstoyaṁ ca nirmalam etacca māmakaṁ liṁgaṁ snāpayitvā'rcayiṣyati

'जो भी श्रद्धायुक्त होकर दोनों तीर्थों में स्नान करके, तुमसे कमल तथा इसका निर्मल जल लेकर, इस मेरे लिंग को स्नान कराकर पूजा करेगा,

श्लोक 84 (skanda.6.198.84)

पश्चात्पद्मैश्चतुर्दश्यां शुक्लायां सोमवासरे चैत्रे मासि च संप्राप्ते चिरायुः स भविष्यति

paścātpadmaiścaturdaśyāṁ śuklāyāṁ somavāsare caitre māsi ca saṁprāpte cirāyuḥ sa bhaviṣyati

और फिर शुक्ल चतुर्दशी को, सोमवार के दिन, चैत्र मास आने पर उन्हीं कमलों से पूजा करेगा, वह दीर्घायु होगा।'

श्लोक 85 (skanda.6.198.85)

सर्वपापविनिर्मुक्तो यद्यपि स्यात्सुपापकृत्

sarvapāpavinirmukto yadyapi syātsupāpakṛt

'वह समस्त पापों से मुक्त हो जाएगा, चाहे वह पहले घोर पापी ही क्यों न रहा हो।'

श्लोक 86 (skanda.6.198.86)

एवमुक्त्वा स भगवांस्ततश्चादर्शनं गतः तत्र नित्यं च तपसि स्थिते सख्यावुभावपि

evamuktvā sa bhagavāṁstataścādarśanaṁ gataḥ tatra nityaṁ ca tapasi sthite sakhyāvubhāvapi

ऐसा कहकर वे भगवान वहाँ से अदृश्य हो गए। वहाँ वे दोनों सखियाँ सदा तप में स्थित रहीं —

श्लोक 87 (skanda.6.198.87)

यावत्कल्पशतं तावज्जरामरणवर्जिते अद्यापि गगने ते च दृश्येते तारकात्मके

yāvatkalpaśataṁ tāvajjarāmaraṇavarjite adyāpi gagane te ca dṛśyete tārakātmake

सौ कल्पों तक जरा-मृत्यु से रहित होकर, और आज भी वे दोनों आकाश में तारे के रूप में दिखाई देती हैं।

श्लोक 88 (skanda.6.198.88)

ततःप्रभृति तत्ख्यातं तीर्थयुग्मं धरातले आगत्याथ नरो दूरात्ताभ्यां कृत्वा निमज्जनम्

tataḥprabhṛti tatkhyātaṁ tīrthayugmaṁ dharātale āgatyātha naro dūrāttābhyāṁ kṛtvā nimajjanam

तभी से पृथ्वीतल पर वह तीर्थयुगल विख्यात हो गया। दूर से भी आकर जो मनुष्य उन दोनों में स्नान करके,

श्लोक 89 (skanda.6.198.89)

पूजयित्वा तु तल्लिंगं ततो याति दिवालयम् महापातकयुक्तोऽपि तत्प्रभावादसंशयम्

pūjayitvā tu talliṁgaṁ tato yāti divālayam mahāpātakayukto'pi tatprabhāvādasaṁśayam

उस लिंग की पूजा करता है, वह उसी प्रभाव से, महापातकी होते हुए भी, निःसंदेह स्वर्गलोक को जाता है।

श्लोक 90 (skanda.6.198.90)

एतस्मिन्नंतरे मर्त्ये नष्टा धर्मस्य च क्रिया यज्ञदानकृता या च देवार्चनसमुद्भवा

etasminnaṁtare martye naṣṭā dharmasya ca kriyā yajñadānakṛtā yā ca devārcanasamudbhavā

इसी बीच मृत्युलोक में धर्म का आचरण, यज्ञ और दान से किया जाने वाला कर्म, तथा देव-अर्चना से उत्पन्न होने वाला पुण्य लगभग नष्ट हो गया,

श्लोक 91 (skanda.6.198.91)

व्याप्तस्तथाखिलः स्वर्गो मानवैः स्पर्धयान्वितैः सार्धं देवैर्विमानस्थैरप्सरोगणसेवितैः

vyāptastathākhilaḥ svargo mānavaiḥ spardhayānvitaiḥ sārdhaṁ devairvimānasthairapsarogaṇasevitaiḥ

क्योंकि स्वर्ग भी होड़ लगाते हुए मनुष्यों से, विमानों पर बैठे तथा अप्सरागणों से सेवित देवताओं के साथ, पूर्णतः भर गया था।

श्लोक 92 (skanda.6.198.92)

एतस्मिन्नेव काले तु धर्मराजः समाययौ यत्र वेदध्वनिर्ब्रह्मा ब्रह्मलोकं समाश्रितः

etasminneva kāle tu dharmarājaḥ samāyayau yatra vedadhvanirbrahmā brahmalokaṁ samāśritaḥ

इसी समय धर्मराज (यम) वहाँ आए, जहाँ वेदध्वनि से गुंजायमान ब्रह्मा ब्रह्मलोक में विराजमान थे।

श्लोक 93 (skanda.6.198.93)

अब्रवीद्दुःखितो दीनः क्षिप्त्वाग्रे पत्रकद्वयम् एकं पापसमुद्भूतमन्यद्धर्मसमुद्भवम्

abravīdduḥkhito dīnaḥ kṣiptvāgre patrakadvayam ekaṁ pāpasamudbhūtamanyaddharmasamudbhavam

दुःखी और दीन होकर उन्होंने दो पत्र उनके समक्ष रखते हुए कहा — एक पाप से संबंधित, और दूसरा धर्म से संबंधित।

श्लोक 94 (skanda.6.198.94)

चित्रेण लिखितं यच्च विचित्रेण तथा परम् हाटकेश्वरजे क्षेत्रे देवतीर्थयुगं स्थितम्

citreṇa likhitaṁ yacca vicitreṇa tathā param hāṭakeśvaraje kṣetre devatīrthayugaṁ sthitam

एक में साधारण रूप से, और दूसरे में विचित्र रूप से यह लिखा था कि हाटकेश्वर से उत्पन्न क्षेत्र में देवतीर्थयुगल स्थित है —

श्लोक 95 (skanda.6.198.95)

शूद्राख्यं ब्राह्मणीनाम तथान्यत्पद्ममंडितम् तथा तत्रास्ति लिंगं च पुण्यं माहेश्वरं महत्

śūdrākhyaṁ brāhmaṇīnāma tathānyatpadmamaṁḍitam tathā tatrāsti liṁgaṁ ca puṇyaṁ māheśvaraṁ mahat

एक शूद्रा नाम का, दूसरा कमलों से सुशोभित ब्राह्मणी नाम का; तथा वहाँ महेश्वर का महान पुण्य लिंग भी स्थित है।

श्लोक 96 (skanda.6.198.96)

त्रयाणामथ तेषां च प्रभावात्सर्वमानवाः अपि पापसमायुक्ताः प्रयांति त्रिदशालयम्

trayāṇāmatha teṣāṁ ca prabhāvātsarvamānavāḥ api pāpasamāyuktāḥ prayāṁti tridaśālayam

'इन तीनों के प्रभाव से समस्त मनुष्य, पापयुक्त होते हुए भी, स्वर्गलोक को जा रहे हैं।'

श्लोक 97 (skanda.6.198.97)

शून्या मे नरका जाताः सर्वे ते रौरवादयः

śūnyā me narakā jātāḥ sarve te rauravādayaḥ

'रौरव आदि मेरे समस्त नरक अब शून्य हो गए हैं।'

श्लोक 98 (skanda.6.198.98)

न कश्चिद्यजनं चक्रे न दानं न च तर्पणम् देवतानां पितॄणां च मनुष्याणां विशेषतः

na kaścidyajanaṁ cakre na dānaṁ na ca tarpaṇam devatānāṁ pitṝṇāṁ ca manuṣyāṇāṁ viśeṣataḥ

'अब कोई भी न यज्ञ करता है, न दान, न तर्पण — न देवताओं का, न पितरों का, विशेषतः मनुष्यों में तो और भी नहीं।'

श्लोक 99 (skanda.6.198.99)

तस्मान्मुक्तो मया सर्वो योऽधिकारस्तवोद्भवः नियोजयस्व तत्रान्यं कञ्चिच्छक्ततमं ततः

tasmānmukto mayā sarvo yo'dhikārastavodbhavaḥ niyojayasva tatrānyaṁ kañcicchaktatamaṁ tataḥ

'अतः आपसे प्राप्त हुआ यह समस्त अधिकार मैंने त्याग दिया है। अब इस पद पर किसी अन्य समर्थतम को नियुक्त कीजिए।'

श्लोक 100 (skanda.6.198.100)

अप्रमाणं स्थितं सर्वमेतत्पत्रद्वयं मम तच्छ्रुत्वा पद्मजः प्राह समानीय शतक्रतुम्

apramāṇaṁ sthitaṁ sarvametatpatradvayaṁ mama tacchrutvā padmajaḥ prāha samānīya śatakratum

'मेरे ये दोनों पत्र अब सर्वथा अप्रमाण हो गए हैं।' यह सुनकर, कमलज ब्रह्मा ने इंद्र को बुलाकर कहा।

श्लोक 101 (skanda.6.198.101)

गत्वा शीघ्रतमं मर्त्ये त्वं शक्र वचनान्मम हाटकेश्वरजे क्षेत्रे तीर्थद्वयमनुत्तमम्

gatvā śīghratamaṁ martye tvaṁ śakra vacanānmama hāṭakeśvaraje kṣetre tīrthadvayamanuttamam

'हे शक्र, मेरे वचन से तुरंत मृत्युलोक में जाओ — हाटकेश्वर से उत्पन्न क्षेत्र में वह अनुपम तीर्थद्वय है,'

श्लोक 102 (skanda.6.198.102)

शूद्र्याख्यं ब्राह्मणीत्येव यच्च लिंगमनुत्तमम् तत्रस्थं नाशय क्षिप्रं कृत्वा पांसुप्रवर्षणम्

śūdryākhyaṁ brāhmaṇītyeva yacca liṁgamanuttamam tatrasthaṁ nāśaya kṣipraṁ kṛtvā pāṁsupravarṣaṇam

'शूद्री और ब्राह्मणी नाम का, तथा वहाँ स्थित अनुपम लिंग को भी — इन्हें धूल बरसाकर शीघ्र नष्ट कर दो।'

श्लोक 103 (skanda.6.198.103)

सूत उवाच तच्छ्रुत्वा सत्वरं शक्रो गत्वा भूमितलं ततः पांसुभिः पूरयामास ते तीर्थे लिंगमेव च

sūta uvāca tacchrutvā satvaraṁ śakro gatvā bhūmitalaṁ tataḥ pāṁsubhiḥ pūrayāmāsa te tīrthe liṁgameva ca

सूत जी ने कहा — यह सुनकर शक्र तुरंत पृथ्वीतल पर जाकर उन दोनों तीर्थों को, तथा उस लिंग को भी धूल से भर दिया।

श्लोक 104 (skanda.6.198.104)

अद्यापि कलिकालेऽस्मिन्द्वाभ्यां गृह्य सुमृत्तिकाम् स्नात्वा च तिलकं कार्यं सर्वपापविशुद्धये

adyāpi kalikāle'smindvābhyāṁ gṛhya sumṛttikām snātvā ca tilakaṁ kāryaṁ sarvapāpaviśuddhaye

आज भी इस कलिकाल में, दोनों स्थानों से उत्तम मिट्टी लेकर, स्नान करके, समस्त पापों की शुद्धि के लिए तिलक करना चाहिए।

श्लोक 105 (skanda.6.198.105)

चतुर्दशीदिने प्राप्ते सोमवारे च संस्थिते द्वाभ्यां यः कुरुते श्राद्धं श्रद्धया परया युतः गयाश्राद्धेन किं तस्य मनुः स्वायंभुवोऽब्रवीत्

caturdaśīdine prāpte somavāre ca saṁsthite dvābhyāṁ yaḥ kurute śrāddhaṁ śraddhayā parayā yutaḥ gayāśrāddhena kiṁ tasya manuḥ svāyaṁbhuvo'bravīt

चतुर्दशी के दिन सोमवार पड़ने पर, जो परम श्रद्धा से युक्त होकर दोनों स्थानों पर श्राद्ध करता है, उसे गया-श्राद्ध से क्या प्रयोजन? ऐसा स्वयं स्वायंभुव मनु ने कहा है।

श्लोक 106 (skanda.6.198.106)

एतद्वः सर्वमाख्यातं यत्पृष्टोऽस्मि द्विजोत्तमाः यथा सा ब्राह्मणी जाता शूद्री चापि तथापरा

etadvaḥ sarvamākhyātaṁ yatpṛṣṭo'smi dvijottamāḥ yathā sā brāhmaṇī jātā śūdrī cāpi tathāparā

हे द्विजश्रेष्ठो, आपने जो पूछा था — ब्राह्मणी कैसे उत्पन्न हुई, और वैसे ही दूसरी शूद्री भी — यह सब मैंने तुम्हें बता दिया।

श्लोक 107 (skanda.6.198.107)

यश्चैतच्छृणुयाद्भक्त्या पठेद्वा द्विजसत्तमाः सोऽपि तद्दिनजात्पापान्मुच्यते नात्र संशयः

yaścaitacchṛṇuyādbhaktyā paṭhedvā dvijasattamāḥ so'pi taddinajātpāpānmucyate nātra saṁśayaḥ

हे द्विजश्रेष्ठो, जो कोई इसे भक्तिपूर्वक सुने या पढ़े, वह भी उस दिन के पापों से मुक्त हो जाता है — इसमें कोई संशय नहीं है।

श्लोक 108 (skanda.6.198.108)

एवं नरो न कः सिद्धस्तस्य लिंगस्य पूजनात् चिरायुश्च तथा जातो यथान्यो नात्र विद्यते

evaṁ naro na kaḥ siddhastasya liṁgasya pūjanāt cirāyuśca tathā jāto yathānyo nātra vidyate

इस प्रकार उस लिंग की पूजा से कौन मनुष्य सिद्ध नहीं होता? और वह इतना दीर्घायु हो जाता है, जितना अन्य कोई नहीं होता।

अध्याय 197अध्याय-सूचीअध्याय 199