Skip to main content

नागर खण्ड · अध्याय 199

नागर अष्टकुल के श्रेष्ठत्व का वर्णन

अध्याय 198अध्याय-सूचीअध्याय 200

श्लोक 1 (skanda.6.199.1)

ऋषय ऊचुः तिस्रःकोट्योर्धकोटी च तीर्थानामिह भूतले श्रूयते सूत कार्त्स्न्येन कीर्त्यमाना मुनीश्वरैः

ṛṣaya ūcuḥ tisraḥkoṭyordhakoṭī ca tīrthānāmiha bhūtale śrūyate sūta kārtsnyena kīrtyamānā munīśvaraiḥ

ऋषियों ने कहा — हे सूत, इस पृथ्वीतल पर साढ़े तीन करोड़ तीर्थ हैं, ऐसा मुनीश्वरों द्वारा पूर्णतः वर्णित सुना जाता है।

श्लोक 2 (skanda.6.199.2)

कथं लभ्येत सर्वेषां तीर्थानां स्नानजं फलम् अल्पायुर्भिर्महाभाग कलिकाल उपस्थिते

kathaṁ labhyeta sarveṣāṁ tīrthānāṁ snānajaṁ phalam alpāyurbhirmahābhāga kalikāla upasthite

हे महाभाग, कलिकाल आने पर अल्पायु मनुष्यों को समस्त तीर्थों के स्नान से उत्पन्न फल कैसे प्राप्त हो सकता है?

श्लोक 3 (skanda.6.199.3)

सूत उवाच क्षेत्रत्रयमिहाख्यातं तथारण्यत्रयं महत् पुरीत्रयं वनान्येव त्रीणि ग्रामास्तथात्रयः

sūta uvāca kṣetratrayamihākhyātaṁ tathāraṇyatrayaṁ mahat purītrayaṁ vanānyeva trīṇi grāmāstathātrayaḥ

सूत जी ने कहा — यहाँ तीन क्षेत्र कहे गए हैं, तथा तीन महान अरण्य, तीन पुरियाँ, तीन वन, तथा तीन ग्राम भी।

श्लोक 4 (skanda.6.199.4)

तथा तीर्थत्रयं चान्यत्पर्वतत्रितयान्वितम् महानदीत्रयं चैव सर्वपातकनाशनम्

tathā tīrthatrayaṁ cānyatparvatatritayānvitam mahānadītrayaṁ caiva sarvapātakanāśanam

इसी प्रकार तीन अन्य तीर्थ भी हैं, तीन पर्वत, तथा समस्त पापों का नाश करने वाली तीन महानदियाँ भी हैं।

श्लोक 5 (skanda.6.199.5)

मर्त्यलोकेस्थितं विप्राः सर्वतीर्थफलप्रदम् सर्वेष्वेतेषु यः स्नाति स सर्वेषां फलं लभेत्

martyalokesthitaṁ viprāḥ sarvatīrthaphalapradam sarveṣveteṣu yaḥ snāti sa sarveṣāṁ phalaṁ labhet

हे विप्रो, ये सब मृत्युलोक में स्थित हैं और समस्त तीर्थों का फल देने वाले हैं। जो इन सबमें स्नान करता है, वह सबका फल प्राप्त कर लेता है।

श्लोक 6 (skanda.6.199.6)

चतुर्विंशतिसंख्यानामिदमाह प्रजापतिः य एकस्मिंस्त्रिके स्नाति सर्वत्रिकफलं लभेत्

caturviṁśatisaṁkhyānāmidamāha prajāpatiḥ ya ekasmiṁstrike snāti sarvatrikaphalaṁ labhet

प्रजापति ने इन चौबीस स्थानों के विषय में यह कहा है — जो किसी एक त्रिक में स्नान करता है, वह उस संपूर्ण त्रिक का फल प्राप्त करता है।

श्लोक 7 (skanda.6.199.7)

ऋषय ऊचुः त्रीणि क्षेत्राणि कानीह तथारण्यानि कानि च पुर्यस्तिस्रो महाभाग काःख्याताश्च वनानि च

ṛṣaya ūcuḥ trīṇi kṣetrāṇi kānīha tathāraṇyāni kāni ca puryastisro mahābhāga kāḥkhyātāśca vanāni ca

ऋषियों ने कहा — हे महाभाग, यहाँ वे तीन क्षेत्र कौन-से हैं, तथा वे अरण्य कौन-से हैं? वे तीन विख्यात पुरियाँ और वन कौन-से हैं?

श्लोक 8 (skanda.6.199.8)

के ग्रामाः कानि तीर्थानि के नगाः सरितश्च काः नामभिर्वद नः सूत सर्वाण्येतानि विस्तरात्

ke grāmāḥ kāni tīrthāni ke nagāḥ saritaśca kāḥ nāmabhirvada naḥ sūta sarvāṇyetāni vistarāt

वे कौन-से ग्राम, कौन-से तीर्थ, कौन-से पर्वत तथा कौन-सी नदियाँ हैं? हे सूत, इन सबको नाम सहित हमें विस्तार से बताइए।

श्लोक 9 (skanda.6.199.9)

सूत उवाच कुरुक्षेत्रमिति ख्यातं प्रथमं क्षेत्रमुत्तमम् हाटकेश्वरजं क्षेत्रं द्वितीयं परिकीर्तितम्

sūta uvāca kurukṣetramiti khyātaṁ prathamaṁ kṣetramuttamam hāṭakeśvarajaṁ kṣetraṁ dvitīyaṁ parikīrtitam

सूत जी ने कहा — कुरुक्षेत्र नाम से विख्यात प्रथम उत्तम क्षेत्र है; हाटकेश्वर से उत्पन्न क्षेत्र दूसरा कहा गया है।

श्लोक 10 (skanda.6.199.10)

प्राभासिकं तृतीयं तु क्षेत्रं हि द्विजसत्तमाः एतत्क्षेत्रत्रयं पुण्यं सर्वपातकनाशनम्

prābhāsikaṁ tṛtīyaṁ tu kṣetraṁ hi dvijasattamāḥ etatkṣetratrayaṁ puṇyaṁ sarvapātakanāśanam

हे द्विजसत्तमो, प्राभासिक क्षेत्र तीसरा है। यह त्रिक्षेत्र पवित्र है और समस्त पापों का नाशक है।

श्लोक 11 (skanda.6.199.11)

यथोक्तविधिना दृष्ट्वा नरः पापात्प्रमुच्यते यो यं काममभिध्यायन्क्षेत्रेष्वेतेषु भक्तितः

yathoktavidhinā dṛṣṭvā naraḥ pāpātpramucyate yo yaṁ kāmamabhidhyāyankṣetreṣveteṣu bhaktitaḥ

यथोक्त विधि से इनका दर्शन करके मनुष्य पाप से मुक्त हो जाता है। जो व्यक्ति इन क्षेत्रों में भक्तिपूर्वक जिस कामना का ध्यान करता है,

श्लोक 12 (skanda.6.199.12)

स्नानं करोति तस्येष्टं मनसो जायते फलम् चतुर्विंशतिमानेषु स्नातो भवति स द्विजाः

snānaṁ karoti tasyeṣṭaṁ manaso jāyate phalam caturviṁśatimāneṣu snāto bhavati sa dvijāḥ

और स्नान करता है, उसके मन की इच्छा का फल उत्पन्न होता है। हे द्विजो, वह उन चौबीस तीर्थों में स्नात हुए के समान हो जाता है।

श्लोक 13 (skanda.6.199.13)

एकं तु पुष्करारण्यं नैमिषारण्यमेव च धर्मारण्यं तृतीयं तु तेषां संकीर्त्यते द्विजाः

ekaṁ tu puṣkarāraṇyaṁ naimiṣāraṇyameva ca dharmāraṇyaṁ tṛtīyaṁ tu teṣāṁ saṁkīrtyate dvijāḥ

एक तो पुष्कर-अरण्य है, दूसरा नैमिष-अरण्य, और हे द्विजो, तीसरा धर्म-अरण्य कहा गया है।

श्लोक 14 (skanda.6.199.14)

त्रिष्वेतेषु च यः स्नाति चतुर्विंशतिभाग्भवेत्

triṣveteṣu ca yaḥ snāti caturviṁśatibhāgbhavet

इन तीनों में जो स्नान करता है, वह चौबीस तीर्थों के भाग का अधिकारी हो जाता है।

श्लोक 15 (skanda.6.199.15)

वाराणसी पुरीत्येका द्वितीया द्वारकापुरी अवन्त्याख्या तृतीया च विश्रुता भुवनत्रये

vārāṇasī purītyekā dvitīyā dvārakāpurī avantyākhyā tṛtīyā ca viśrutā bhuvanatraye

एक पुरी वाराणसी है, दूसरी द्वारका-पुरी, और तीनों लोकों में विख्यात तीसरी अवंती नामक पुरी है।

श्लोक 16 (skanda.6.199.16)

एतासु यो नरः स्नाति चतुर्विंशतिभाग्भवेत्

etāsu yo naraḥ snāti caturviṁśatibhāgbhavet

इनमें जो मनुष्य स्नान करता है, वह चौबीस तीर्थों के भाग का अधिकारी हो जाता है।

श्लोक 17 (skanda.6.199.17)

वृन्दावनं वनं चैकं द्वितीयं खांडवं वनम् ख्यातं द्वैतवनं चान्यत्तृतीयं धरणीतले

vṛndāvanaṁ vanaṁ caikaṁ dvitīyaṁ khāṁḍavaṁ vanam khyātaṁ dvaitavanaṁ cānyattṛtīyaṁ dharaṇītale

एक वन वृंदावन है, दूसरा खांडव वन, और पृथ्वी पर विख्यात तीसरा द्वैतवन है।

श्लोक 18 (skanda.6.199.18)

त्रिष्वेतेषु च यः स्नाति चतुर्विंशतिभाग्भवेत्

triṣveteṣu ca yaḥ snāti caturviṁśatibhāgbhavet

इन तीनों में जो स्नान करता है, वह चौबीस तीर्थों के भाग का अधिकारी हो जाता है।

श्लोक 19 (skanda.6.199.19)

कल्पग्रामः स्मृतश्चैकः शालिग्रामो द्वितीयकः नंदिग्रामस्तृतीयस्तु विश्रुतो द्विजसत्तमाः

kalpagrāmaḥ smṛtaścaikaḥ śāligrāmo dvitīyakaḥ naṁdigrāmastṛtīyastu viśruto dvijasattamāḥ

एक ग्राम कल्पग्राम कहा गया है, दूसरा शालिग्राम, और हे द्विजसत्तमो, तीसरा विख्यात नंदिग्राम है।

श्लोक 20 (skanda.6.199.20)

त्रिष्वेतेषु च यः स्नाति चतुर्विंशतिभाग्भवेत्

triṣveteṣu ca yaḥ snāti caturviṁśatibhāgbhavet

इन तीनों में जो स्नान करता है, वह चौबीस तीर्थों के भाग का अधिकारी हो जाता है।

श्लोक 21 (skanda.6.199.21)

अग्नितीर्थं स्मृतं चैकं शुक्लतीर्थमथापरम् तृतीयं पितृतीर्थं तु पितॄणामतिवल्लभम्

agnitīrthaṁ smṛtaṁ caikaṁ śuklatīrthamathāparam tṛtīyaṁ pitṛtīrthaṁ tu pitṝṇāmativallabham

एक तीर्थ अग्नितीर्थ कहा गया है, दूसरा शुक्लतीर्थ, और तीसरा पितृतीर्थ है, जो पितरों को अत्यंत प्रिय है।

श्लोक 22 (skanda.6.199.22)

त्रिष्वेतेषु च यः स्नाति चतुर्विंशतिभाग्भवेत्

triṣveteṣu ca yaḥ snāti caturviṁśatibhāgbhavet

इन तीनों में जो स्नान करता है, वह चौबीस तीर्थों के भाग का अधिकारी हो जाता है।

श्लोक 23 (skanda.6.199.23)

श्रीपर्वतः स्मृतश्चैको द्वितीयश्चार्बुदस्तथा तृतीयो रैवताख्योऽत्र विख्यातः पर्वतोत्तमाः

śrīparvataḥ smṛtaścaiko dvitīyaścārbudastathā tṛtīyo raivatākhyo'tra vikhyātaḥ parvatottamāḥ

एक पर्वत श्रीपर्वत कहा गया है, दूसरा अर्बुद पर्वत, और यहाँ विख्यात श्रेष्ठ पर्वतों में तीसरा रैवतक नामक है।

श्लोक 24 (skanda.6.199.24)

त्रिष्वेतेषु च यः स्नाति चतुर्विंशतिभाग्भवेत्

triṣveteṣu ca yaḥ snāti caturviṁśatibhāgbhavet

इन तीनों में जो स्नान करता है, वह चौबीस तीर्थों के भाग का अधिकारी हो जाता है।

श्लोक 25 (skanda.6.199.25)

गंगा नदी स्मृता पूर्वा नर्मदाख्या तथा परा सरस्वती तृतीया तु नदी प्लक्षसमुद्भवा

gaṁgā nadī smṛtā pūrvā narmadākhyā tathā parā sarasvatī tṛtīyā tu nadī plakṣasamudbhavā

पहली नदी गंगा कही गई है, दूसरी नर्मदा नामक, और तीसरी प्लक्ष वृक्ष से उत्पन्न सरस्वती नदी है।

श्लोक 26 (skanda.6.199.26)

आसु सर्वासु यः स्नाति चतुर्विंशतिभाग्भवेत्

āsu sarvāsu yaḥ snāti caturviṁśatibhāgbhavet

इन सभी में जो स्नान करता है, वह चौबीस तीर्थों के भाग का अधिकारी हो जाता है।

श्लोक 27 (skanda.6.199.27)

एतेष्वेव हि सर्वेषु यः स्नानं कुरुते नरः सार्धकोटित्रयस्यात्र स कृत्स्नं फलमाप्नुयात्

eteṣveva hi sarveṣu yaḥ snānaṁ kurute naraḥ sārdhakoṭitrayasyātra sa kṛtsnaṁ phalamāpnuyāt

जो मनुष्य इन सबमें स्नान करता है, वह यहाँ साढ़े तीन करोड़ तीर्थों का संपूर्ण फल प्राप्त करता है।

श्लोक 28 (skanda.6.199.28)

यश्चैकस्मिन्नरः स्नाति स त्रिकस्य फलं लभेत्

yaścaikasminnaraḥ snāti sa trikasya phalaṁ labhet

और जो मनुष्य किसी एक में ही स्नान करता है, वह उसकी संपूर्ण त्रिक का फल प्राप्त करता है।

श्लोक 29 (skanda.6.199.29)

एतद्वः सर्वमाख्यातं यत्पृष्टोऽस्मि द्विजोत्तमाः संक्षेपात्तीर्थजं पुण्यं लभ्यते यन्नरैर्भुवि

etadvaḥ sarvamākhyātaṁ yatpṛṣṭo'smi dvijottamāḥ saṁkṣepāttīrthajaṁ puṇyaṁ labhyate yannarairbhuvi

हे द्विजश्रेष्ठो, आपने जो पूछा था, वह सब मैंने बता दिया — संक्षेप में यह बताया कि पृथ्वी पर मनुष्यों को तीर्थ से उत्पन्न पुण्य किस प्रकार प्राप्त होता है।

श्लोक 30 (skanda.6.199.30)

सांप्रतं किं नु वो वच्मि यत्तद्वदत मा चिरम्

sāṁprataṁ kiṁ nu vo vacmi yattadvadata mā ciram

अब मैं आपसे और क्या कहूँ? जो कुछ भी हो, बिना विलंब किए बताइए।

श्लोक 31 (skanda.6.199.31)

ऋषय ऊचुः हाटकेश्वरजे क्षेत्रे यानि तीर्थानि सूतज तानि प्रोक्तानि सर्वाणि त्वयाऽस्माकं सुविस्तरात्

ṛṣaya ūcuḥ hāṭakeśvaraje kṣetre yāni tīrthāni sūtaja tāni proktāni sarvāṇi tvayā'smākaṁ suvistarāt

ऋषियों ने कहा — हे सूतज, हाटकेश्वर से उत्पन्न क्षेत्र में जो भी तीर्थ हैं, वे सब आपने हमें विस्तार से बता दिए हैं।

श्लोक 32 (skanda.6.199.32)

तथा चायतनान्येव संख्यया रहितानि च अपि वर्षशतेनात्र स्नानं कर्तुं न शक्यते

tathā cāyatanānyeva saṁkhyayā rahitāni ca api varṣaśatenātra snānaṁ kartuṁ na śakyate

और उनके देवालय भी संख्यारहित हैं, यहाँ तक कि सौ वर्षों में भी उन सब में स्नान कर पाना संभव नहीं है।

श्लोक 33 (skanda.6.199.33)

तेषु सर्वेषु मर्त्येन यथोक्तविधिना स्फुटम् देवतायतनान्येव तथा द्रष्टुं महामते

teṣu sarveṣu martyena yathoktavidhinā sphuṭam devatāyatanānyeva tathā draṣṭuṁ mahāmate

हे महामते, इसी प्रकार मर्त्य मनुष्य के लिए उन सब देवालयों को भी यथोक्त विधि से स्पष्ट रूप से देख पाना असंभव है।

श्लोक 34 (skanda.6.199.34)

यस्मिन्स्नातो दिने चैव तस्य व्युष्टिः प्रकीर्तिता अल्पायुषस्तदा मर्त्याः कृतेऽपि परिकीर्तिताः

yasminsnāto dine caiva tasya vyuṣṭiḥ prakīrtitā alpāyuṣastadā martyāḥ kṛte'pi parikīrtitāḥ

जिस दिन स्नान किया जाए, उसी दिन का फल कहा गया है। किंतु कृतयुग में भी मनुष्य अल्पायु ही कहे गए हैं,

श्लोक 35 (skanda.6.199.35)

त्रेतायां द्वापरे चापि किमु प्राप्ते कलौ युगे एवमल्पायुषो ज्ञात्वा मानवान्सूतनंदन

tretāyāṁ dvāpare cāpi kimu prāpte kalau yuge evamalpāyuṣo jñātvā mānavānsūtanaṁdana

फिर त्रेता और द्वापर में तो और भी, कलियुग की तो बात ही क्या! हे सूतनंदन, इस प्रकार मनुष्यों को अल्पायु जानकर,

श्लोक 36 (skanda.6.199.36)

लभेरंश्च कथं सर्वतीर्थानां स्नानजं फलम् देवदर्शनजं वापि विशेषान्निर्धनाश्च ये

labheraṁśca kathaṁ sarvatīrthānāṁ snānajaṁ phalam devadarśanajaṁ vāpi viśeṣānnirdhanāśca ye

वे समस्त तीर्थों के स्नान से उत्पन्न फल, अथवा देव-दर्शन से उत्पन्न फल कैसे प्राप्त कर सकते हैं — विशेषतः जो निर्धन हैं?

श्लोक 37 (skanda.6.199.37)

अस्ति कश्चिदुपायोऽत्र दैवो वा मानुषोऽपि वा येन तेषां भवेत्पुण्यं सर्वेषामेव हेलया

asti kaścidupāyo'tra daivo vā mānuṣo'pi vā yena teṣāṁ bhavetpuṇyaṁ sarveṣāmeva helayā

क्या यहाँ कोई दैवी अथवा मानवी उपाय है, जिससे उन सबका वह पुण्य सहज ही में प्राप्त हो सके?

श्लोक 38 (skanda.6.199.38)

सूत उवाच अस्मिन्नर्थे पुरा पृष्टो विश्वामित्रो महामुनिः समुपेत्याश्रमं तस्य आनर्तेन महीभुजा

sūta uvāca asminnarthe purā pṛṣṭo viśvāmitro mahāmuniḥ samupetyāśramaṁ tasya ānartena mahībhujā

सूत जी ने कहा — इसी विषय पर पूर्वकाल में, राजा आनर्त ने महामुनि विश्वामित्र के आश्रम में आकर उनसे यही प्रश्न पूछा था।

श्लोक 39 (skanda.6.199.39)

राजोवाच भगवन्नत्र तीर्थानि संख्यया रहितानि च तेषु स्नानविधिः प्रोक्तः सर्वेष्वेव पृथक्पृथक्

rājovāca bhagavannatra tīrthāni saṁkhyayā rahitāni ca teṣu snānavidhiḥ proktaḥ sarveṣveva pṛthakpṛthak

राजा ने कहा — 'हे भगवन्, यहाँ तीर्थ संख्यारहित हैं, और उन सबके लिए पृथक्-पृथक् स्नान-विधि कही गई है।'

श्लोक 40 (skanda.6.199.40)

मासे वारे दिने चैव कुत्रचिन्मुनिसत्तमैः दानानि च तथोक्तानि यथा स्नानविधिस्तथा

māse vāre dine caiva kutracinmunisattamaiḥ dānāni ca tathoktāni yathā snānavidhistathā

'किसी विशेष मास में, वार में, दिन में, मुनिश्रेष्ठों द्वारा दान भी उसी प्रकार बताए गए हैं जैसे स्नान की विधि।'

श्लोक 41 (skanda.6.199.41)

देवानां दर्शनं चापि पृथक्तेन प्रकीर्तितम् न शक्यते फलं प्राप्तुं सर्वेषां केनचिन्मुने

devānāṁ darśanaṁ cāpi pṛthaktena prakīrtitam na śakyate phalaṁ prāptuṁ sarveṣāṁ kenacinmune

'देवताओं के दर्शन का फल भी उन्होंने पृथक्-पृथक् बताया है। हे मुने, इस प्रकार किसी के लिए भी सबका फल प्राप्त करना संभव नहीं है।'

श्लोक 42 (skanda.6.199.42)

अपि वर्षशतेनापि किं पुनः स्तोकवासरैः तस्माद्वद महाभाग सुखोपायं च देहिनाम्

api varṣaśatenāpi kiṁ punaḥ stokavāsaraiḥ tasmādvada mahābhāga sukhopāyaṁ ca dehinām

'सौ वर्षों में भी नहीं, फिर थोड़े दिनों में तो और भी नहीं। अतः हे महाभाग, प्राणियों के लिए कोई सुगम उपाय बताइए,'

श्लोक 43 (skanda.6.199.43)

एकस्मिन्नपि च स्नातस्तीर्थे प्राप्नोति मानवः सर्वेषामेव तीर्थानां स्नानजं सकलं फलम्

ekasminnapi ca snātastīrthe prāpnoti mānavaḥ sarveṣāmeva tīrthānāṁ snānajaṁ sakalaṁ phalam

'जिससे मनुष्य किसी एक ही तीर्थ में स्नान करके, समस्त तीर्थों के स्नान से उत्पन्न सकल फल प्राप्त कर सके।'

श्लोक 44 (skanda.6.199.44)

तथैकस्मिन्सुरे दृष्टे सर्वदेवसमुद्भवम् फलं दर्शनजं भावि नराणां द्विजसत्तम

tathaikasminsure dṛṣṭe sarvadevasamudbhavam phalaṁ darśanajaṁ bhāvi narāṇāṁ dvijasattama

'तथा हे द्विजसत्तम, किसी एक ही देवता का दर्शन करने पर मनुष्यों को समस्त देवताओं के दर्शन से उत्पन्न फल प्राप्त हो सके।'

श्लोक 45 (skanda.6.199.45)

सूत उवाच तच्छ्रुत्वा सुचिरं ध्यात्वा विश्वामित्रो महामुनिः अब्रवीच्छृणु राजेंद्र सरहस्यं वदामि ते

sūta uvāca tacchrutvā suciraṁ dhyātvā viśvāmitro mahāmuniḥ abravīcchṛṇu rājeṁdra sarahasyaṁ vadāmi te

सूत जी ने कहा — यह सुनकर, महामुनि विश्वामित्र बहुत देर तक विचार करके बोले — 'हे राजेंद्र, सुनो, मैं तुम्हें रहस्यसहित यह बताता हूँ।'

श्लोक 46 (skanda.6.199.46)

चत्वार्यत्र प्रकृष्टानि मुख्यतीर्थानि पार्थिव येषु स्नाने कृते राजञ्छ्राद्धे च तदनंतरम् सर्वेषामेव तीर्थानां स्नानजं लभ्यते फलम्

catvāryatra prakṛṣṭāni mukhyatīrthāni pārthiva yeṣu snāne kṛte rājañchrāddhe ca tadanaṁtaram sarveṣāmeva tīrthānāṁ snānajaṁ labhyate phalam

'हे राजन्, यहाँ चार प्रमुख श्रेष्ठ तीर्थ हैं। हे राजन्, इनमें स्नान करने और उसके बाद श्राद्ध करने पर, समस्त तीर्थों के स्नान से उत्पन्न फल प्राप्त हो जाता है।'

श्लोक 47 (skanda.6.199.47)

सप्तविंशतिलिंगानि तथात्रैव स्थितानि च सिद्धेश्वरप्रपूर्वाणि सर्वपापहराणि च

saptaviṁśatiliṁgāni tathātraiva sthitāni ca siddheśvaraprapūrvāṇi sarvapāpaharāṇi ca

'और यहीं सत्ताईस लिंग भी स्थित हैं, जिनमें सिद्धेश्वर प्रमुख है, और जो समस्त पापों को हरने वाले हैं।'

श्लोक 48 (skanda.6.199.48)

तेषु सर्वेषु दृष्टेषु भक्त्या पूतेन चेतसा सर्वेषामेव देवानां भवेद्दर्शनजं फलम्

teṣu sarveṣu dṛṣṭeṣu bhaktyā pūtena cetasā sarveṣāmeva devānāṁ bhaveddarśanajaṁ phalam

'भक्तिपूर्वक तथा पवित्र चित्त से इन सबका दर्शन करने पर, समस्त देवताओं के दर्शन से उत्पन्न फल प्राप्त हो जाता है।'

श्लोक 49 (skanda.6.199.49)

एकस्मिन्नपि संदृष्टे पूजिते वा सुरोत्तमे सप्तविंशतिलिंगानां पूजा तेन कृता भवेत्

ekasminnapi saṁdṛṣṭe pūjite vā surottame saptaviṁśatiliṁgānāṁ pūjā tena kṛtā bhavet

'यहाँ तक कि किसी एक ही श्रेष्ठ देवता का दर्शन या पूजन करने पर भी, उसके द्वारा सत्ताईस लिंगों की पूजा हो जाती है।'

श्लोक 50 (skanda.6.199.50)

राजोवाच कानि चत्वारि तीर्थानि तत्र मुख्यानि सन्मुने येषु स्नातो नरः सम्यक्सर्वेषां लभते फलम्

rājovāca kāni catvāri tīrthāni tatra mukhyāni sanmune yeṣu snāto naraḥ samyaksarveṣāṁ labhate phalam

राजा ने कहा — 'हे सन्मुने, वे वहाँ चार प्रमुख तीर्थ कौन-से हैं, जिनमें स्नान करके मनुष्य भलीभाँति सबका फल प्राप्त कर लेता है?'

श्लोक 51 (skanda.6.199.51)

विश्वामित्र उवाच अत्रास्ति कूपिका पुण्या यस्यां संश्रयते गया कृष्णपक्षे चतुर्दश्याममावास्यादिने तथा

viśvāmitra uvāca atrāsti kūpikā puṇyā yasyāṁ saṁśrayate gayā kṛṣṇapakṣe caturdaśyāmamāvāsyādine tathā

विश्वामित्र ने कहा — 'यहाँ एक पवित्र कूपिका है, जिसमें गया स्वयं आश्रय लेती है, विशेषतः कृष्णपक्ष की चतुर्दशी तथा अमावास्या के दिन,

श्लोक 52 (skanda.6.199.52)

विशेषेण महाभाग कन्यासंस्थे दिवाकरे निर्विण्णा भूमिलोकानां कृतैः श्राद्धैरनेकधा

viśeṣeṇa mahābhāga kanyāsaṁsthe divākare nirviṇṇā bhūmilokānāṁ kṛtaiḥ śrāddhairanekadhā

और हे महाभाग, विशेषतः जब सूर्य कन्या राशि में स्थित हो — मनुष्यलोक के लोगों द्वारा किए गए अनेक श्राद्धों से खिन्न होकर।'

श्लोक 53 (skanda.6.199.53)

यस्तस्यां कुरुते श्राद्धं सम्यक्छ्रद्धासमन्वितः

yastasyāṁ kurute śrāddhaṁ samyakchraddhāsamanvitaḥ

'जो पूर्ण श्रद्धा से युक्त होकर उस स्थान पर श्राद्ध करता है,'

श्लोक 54 (skanda.6.199.54)

तस्मिन्नहनि राजेंद्र स संतारयते पितॄन् तथा तीर्थं द्वितीयं तु शंखतीर्थमिति स्मृतम्

tasminnahani rājeṁdra sa saṁtārayate pitṝn tathā tīrthaṁ dvitīyaṁ tu śaṁkhatīrthamiti smṛtam

'हे राजेंद्र, वह उसी दिन अपने पितरों को तार देता है। दूसरा तीर्थ शंखतीर्थ कहा गया है।'

श्लोक 55 (skanda.6.199.55)

तत्र स्नात्वा नरो यस्तु पश्येच्छंखेश्वरं ततः सर्वेषां फलमाप्नोति माघस्य प्रथमेऽहनि

tatra snātvā naro yastu paśyecchaṁkheśvaraṁ tataḥ sarveṣāṁ phalamāpnoti māghasya prathame'hani

'वहाँ स्नान करके जो मनुष्य शंखेश्वर का दर्शन करता है, वह माघ मास के प्रथम दिन ही समस्त तीर्थों का फल प्राप्त कर लेता है।'

श्लोक 56 (skanda.6.199.56)

तथा मन्नामकं तीर्थे तृतीयं मुख्यतां गतम् अत्र स्नात्वा तु यः पश्येन्मया संस्थापितं हरम्

tathā mannāmakaṁ tīrthe tṛtīyaṁ mukhyatāṁ gatam atra snātvā tu yaḥ paśyenmayā saṁsthāpitaṁ haram

'और वह तीर्थ जो मेरे ही नाम से प्रसिद्ध है, प्रमुखता को प्राप्त तीसरा तीर्थ है। यहाँ स्नान करके जो मेरे द्वारा स्थापित हर का दर्शन करता है,'

श्लोक 57 (skanda.6.199.57)

विश्वामित्रेश्वरं नाम सर्वेषां स फलं लभेत् नभस्यस्य सिताष्टम्यां सर्वेषां लभते फलम्

viśvāmitreśvaraṁ nāma sarveṣāṁ sa phalaṁ labhet nabhasyasya sitāṣṭamyāṁ sarveṣāṁ labhate phalam

'नाम से विश्वामित्रेश्वर — वह सबका फल प्राप्त करता है, विशेषतः भाद्रपद मास की शुक्ल अष्टमी को वह सबका फल प्राप्त करता है।'

श्लोक 58 (skanda.6.199.58)

शक्रतीर्थमिति ख्यातं चतुर्थं बालमण्डनम् तत्र स्नात्वा च पंचाहं शक्रेश्वरमवेक्ष्य च आश्विनस्य सितेऽष्टम्यां सर्वेषां लभते फलम्

śakratīrthamiti khyātaṁ caturthaṁ bālamaṇḍanam tatra snātvā ca paṁcāhaṁ śakreśvaramavekṣya ca āśvinasya site'ṣṭamyāṁ sarveṣāṁ labhate phalam

'शक्रतीर्थ नाम से विख्यात बालमंडन चौथा तीर्थ है। वहाँ पाँच दिन स्नान करके तथा शक्रेश्वर का दर्शन करके, आश्विन मास की शुक्ल अष्टमी को व्यक्ति सबका फल प्राप्त कर लेता है।'

श्लोक 59 (skanda.6.199.59)

राजोवाच विधानं वद मे विप्र गयाकूप्याः समुद्भवम् विस्तरेण महाभाग श्रद्धा मे महती स्थिता

rājovāca vidhānaṁ vada me vipra gayākūpyāḥ samudbhavam vistareṇa mahābhāga śraddhā me mahatī sthitā

राजा ने कहा — 'हे विप्र, गयाकूपिका की उत्पत्ति का विधान मुझे विस्तार से बताइए। हे महाभाग, मुझमें इसके प्रति महती श्रद्धा है।'

श्लोक 60 (skanda.6.199.60)

विश्वामित्र उवाच अमावास्यादिने प्राप्ते तत्र कन्यागते रवौ यः श्राद्धं कुरुते भक्त्या स पितॄंस्तारयेन्निजान्

viśvāmitra uvāca amāvāsyādine prāpte tatra kanyāgate ravau yaḥ śrāddhaṁ kurute bhaktyā sa pitṝṁstārayennijān

विश्वामित्र ने कहा — 'अमावास्या के दिन, सूर्य के कन्या राशि में रहते हुए, जो वहाँ भक्तिपूर्वक श्राद्ध करता है, वह अपने पितरों को तार देता है,'

श्लोक 61 (skanda.6.199.61)

भर्तृयज्ञविधानेन शुद्धैः स्थानोद्भवैर्द्विजैः भर्तृयज्ञविधिं त्यक्त्वा योऽन्येन विधिना नरः

bhartṛyajñavidhānena śuddhaiḥ sthānodbhavairdvijaiḥ bhartṛyajñavidhiṁ tyaktvā yo'nyena vidhinā naraḥ

'— भर्तृयज्ञ की विधि के अनुसार, शुद्ध, उसी स्थान में उत्पन्न ब्राह्मणों के द्वारा। जो मनुष्य भर्तृयज्ञ की विधि त्यागकर किसी अन्य विधि से,'

श्लोक 62 (skanda.6.199.62)

श्राद्धं करोति मूढात्मा विहीनं स्थानजैर्द्विजैः स्थानजैरपि वाऽशुद्धैस्तस्य तद्व्यर्थतां व्रजेत्

śrāddhaṁ karoti mūḍhātmā vihīnaṁ sthānajairdvijaiḥ sthānajairapi vā'śuddhaistasya tadvyarthatāṁ vrajet

'उस मूर्ख आत्मा द्वारा किया गया श्राद्ध, जो स्थानीय ब्राह्मणों से रहित हो, अथवा अशुद्ध स्थानीय ब्राह्मणों के द्वारा किया गया हो, व्यर्थ हो जाता है।'

श्लोक 63 (skanda.6.199.63)

वृष्टिः स्यादूषरे यद्वत्सत्यमेतन्मयोदितम् अंधस्याग्रे यथा नृत्यं प्रगीतं बधिरस्य च तथा च व्यर्थतां याति अन्यस्थानोद्भवैर्द्विजैः

vṛṣṭiḥ syādūṣare yadvatsatyametanmayoditam aṁdhasyāgre yathā nṛtyaṁ pragītaṁ badhirasya ca tathā ca vyarthatāṁ yāti anyasthānodbhavairdvijaiḥ

'जैसे बंजर भूमि पर वर्षा हो, यह मेरा कहा हुआ सत्य वचन है। जैसे अंधे के आगे नृत्य और बहरे के आगे गान व्यर्थ है, वैसे ही अन्य स्थान में उत्पन्न ब्राह्मणों द्वारा किया गया श्राद्ध भी व्यर्थ हो जाता है।'

श्लोक 64 (skanda.6.199.64)

ब्राह्मणैः कारयेच्छ्राद्धं मूर्खैरपि द्विजोत्तमाः चतुर्वेदा अपि त्याज्या अन्यस्थानसमुद्भवाः

brāhmaṇaiḥ kārayecchrāddhaṁ mūrkhairapi dvijottamāḥ caturvedā api tyājyā anyasthānasamudbhavāḥ

'हे द्विजश्रेष्ठो, श्राद्ध उन्हीं (स्थानीय) ब्राह्मणों से कराना चाहिए, चाहे वे मूर्ख भी क्यों न हों। अन्य स्थान में उत्पन्न चारों वेदों के ज्ञाता ब्राह्मणों को भी त्याग देना चाहिए।'

श्लोक 65 (skanda.6.199.65)

दवे कर्मणि पित्र्ये वा सोमपाने विशेषतः देशांतरगतो यस्तु श्राद्धं च कुरुते नरः वैश्वानरपुरस्तेन कार्यं नान्यद्विजस्य च

dave karmaṇi pitrye vā somapāne viśeṣataḥ deśāṁtaragato yastu śrāddhaṁ ca kurute naraḥ vaiśvānarapurastena kāryaṁ nānyadvijasya ca

'दैव कर्म में, पितृ-कर्म में, अथवा विशेषतः सोमपान में, जो मनुष्य किसी अन्य देश में जाकर श्राद्ध करता है, उसे अग्नि को प्रधान बनाकर ही करना चाहिए, अन्य द्विज का सहारा नहीं लेना चाहिए।'

श्लोक 66 (skanda.6.199.66)

संनिवेश्य दर्भबटूञ्छ्राद्धं कुर्याद्द्विजोत्तमाः दक्षिणा भोजनं देयं स्थानिकानां चिरादपि

saṁniveśya darbhabaṭūñchrāddhaṁ kuryāddvijottamāḥ dakṣiṇā bhojanaṁ deyaṁ sthānikānāṁ cirādapi

'हे द्विजश्रेष्ठो, कुशा के पुतले बिठाकर श्राद्ध करना चाहिए; और स्थानीय ब्राह्मणों को दक्षिणा तथा भोजन, चाहे विलंब से ही सही, अवश्य देना चाहिए।'

श्लोक 67 (skanda.6.199.67)

पंचगव्यस्य संपूर्णो यथा कुम्भः प्रदुष्यति बिंदुनैकेन मद्यस्य पतितेन नृपोत्तम

paṁcagavyasya saṁpūrṇo yathā kumbhaḥ praduṣyati biṁdunaikena madyasya patitena nṛpottama

'हे नृपोत्तम, जैसे पंचगव्य से भरा हुआ घड़ा मद्य की एक बूँद गिर जाने मात्र से दूषित हो जाता है,'

श्लोक 68 (skanda.6.199.68)

एकेनापि च बाह्येन बहूनामपि भूपते मध्ये समुपविष्टेन तच्छ्राद्धं दोषमाप्नुयात्

ekenāpi ca bāhyena bahūnāmapi bhūpate madhye samupaviṣṭena tacchrāddhaṁ doṣamāpnuyāt

'हे भूपते, वैसे ही अनेक (शुद्ध ब्राह्मणों) के बीच बैठे हुए एक भी बाह्य (अनुचित) ब्राह्मण के कारण वह श्राद्ध दोषयुक्त हो जाता है।'

श्लोक 69 (skanda.6.199.69)

स्थानजोऽपि चतुर्वेदो यद्यपि स्यान्न शुद्धिभाक् बहूनामपि शुद्धानां मध्ये श्राद्धं विनाशयेत्

sthānajo'pi caturvedo yadyapi syānna śuddhibhāk bahūnāmapi śuddhānāṁ madhye śrāddhaṁ vināśayet

'यहाँ तक कि स्थानीय ही, चारों वेदों का ज्ञाता होते हुए भी, यदि वह शुद्धि से रहित हो, तो अनेक शुद्ध ब्राह्मणों के बीच रहकर भी वह श्राद्ध को नष्ट कर देता है।'

श्लोक 70 (skanda.6.199.70)

तस्मात्सर्वप्रयत्नेन शुद्धं ब्राह्मणमानयेत्

tasmātsarvaprayatnena śuddhaṁ brāhmaṇamānayet

'अतः सब प्रकार के प्रयत्न से शुद्ध ब्राह्मण को ही लाना चाहिए।'

श्लोक 71 (skanda.6.199.71)

स्थानिकं मूर्खमप्येवमलाभे गुणिनामपि हीनांगमधिकांगं वा दूषितं नो तथा परम्

sthānikaṁ mūrkhamapyevamalābhe guṇināmapi hīnāṁgamadhikāṁgaṁ vā dūṣitaṁ no tathā param

'गुणवान न मिलने पर भी स्थानीय मूर्ख को ही लेना चाहिए, किंतु अंगहीन, अंगाधिक अथवा दूषित को कभी नहीं, न ही किसी अन्य स्थान के व्यक्ति को।'

श्लोक 72 (skanda.6.199.72)

कन्यादाने तथा श्राद्धे कुलीनो ब्राह्मणः सदा आहर्तव्यः प्रयत्नेन य इच्छेच्छुभमात्मनः

kanyādāne tathā śrāddhe kulīno brāhmaṇaḥ sadā āhartavyaḥ prayatnena ya icchecchubhamātmanaḥ

'कन्यादान में तथा श्राद्ध में, जो अपना कल्याण चाहता है, उसे सदा प्रयत्नपूर्वक कुलीन ब्राह्मण को ही लाना चाहिए —

श्लोक 73 (skanda.6.199.73)

सोऽपि शुद्धिसमायुक्तो यदि स्यान्नृपसत्तम

so'pi śuddhisamāyukto yadi syānnṛpasattama

हे नृपसत्तम, और वह भी शुद्धि से युक्त हो, तभी काम बनता है।'

श्लोक 74 (skanda.6.199.74)

वृक्षाणां च यथाऽश्वत्थो देवतानां यथा हरिः श्रेष्ठस्थानजविप्राणां तथा चाष्टकुलोद्भवः

vṛkṣāṇāṁ ca yathā'śvattho devatānāṁ yathā hariḥ śreṣṭhasthānajaviprāṇāṁ tathā cāṣṭakulodbhavaḥ

'जैसे वृक्षों में अश्वत्थ श्रेष्ठ है, देवताओं में विष्णु श्रेष्ठ हैं, वैसे ही स्थानीय ब्राह्मणों में अष्टकुल से उत्पन्न ब्राह्मण श्रेष्ठ हैं।'

श्लोक 75 (skanda.6.199.75)

आयुधानां यथा वज्रं सरसां सागरो यथा श्रेष्ठस्थानजविप्राणां तथाष्टकुलसंभवः

āyudhānāṁ yathā vajraṁ sarasāṁ sāgaro yathā śreṣṭhasthānajaviprāṇāṁ tathāṣṭakulasaṁbhavaḥ

'जैसे शस्त्रों में वज्र श्रेष्ठ है, जलाशयों में सागर श्रेष्ठ है, वैसे ही स्थानीय ब्राह्मणों में अष्टकुल से उत्पन्न ब्राह्मण श्रेष्ठ है।'

श्लोक 76 (skanda.6.199.76)

उच्चैःश्रवा यथाऽश्वानां गजानां शक्रवाहनः श्रेष्ठस्थानजविप्राणां तथाष्टकुलसंभवः

uccaiḥśravā yathā'śvānāṁ gajānāṁ śakravāhanaḥ śreṣṭhasthānajaviprāṇāṁ tathāṣṭakulasaṁbhavaḥ

'जैसे घोड़ों में उच्चैःश्रवा श्रेष्ठ है, हाथियों में इंद्र का वाहन श्रेष्ठ है, वैसे ही स्थानीय ब्राह्मणों में अष्टकुल से उत्पन्न ब्राह्मण श्रेष्ठ है।'

श्लोक 77 (skanda.6.199.77)

नदीनां च यथा गंगा सतीनां चाप्यरुंधती तद्वत्स्थानजविप्राणां श्रेष्ठोऽष्टकुलिकः स्मृतः

nadīnāṁ ca yathā gaṁgā satīnāṁ cāpyaruṁdhatī tadvatsthānajaviprāṇāṁ śreṣṭho'ṣṭakulikaḥ smṛtaḥ

'जैसे नदियों में गंगा श्रेष्ठ है, सतियों में अरुंधती श्रेष्ठ है, वैसे ही स्थानीय ब्राह्मणों में अष्टकुलिक ब्राह्मण श्रेष्ठ माना गया है।'

श्लोक 78 (skanda.6.199.78)

ग्रहाणां भास्करो यद्वन्नक्षत्राणां निशाकरः तद्वत्स्थानजविप्राणां श्रेष्ठोऽष्टकुलिकः स्मृतः

grahāṇāṁ bhāskaro yadvannakṣatrāṇāṁ niśākaraḥ tadvatsthānajaviprāṇāṁ śreṣṭho'ṣṭakulikaḥ smṛtaḥ

'जैसे ग्रहों में सूर्य श्रेष्ठ है, नक्षत्रों में चंद्रमा श्रेष्ठ है, वैसे ही स्थानीय ब्राह्मणों में अष्टकुलिक ब्राह्मण श्रेष्ठ माना गया है।'

श्लोक 79 (skanda.6.199.79)

पर्वतानां यथा मेरुर्द्विपदानां द्विजोत्तमः स्थानजानां तु विप्राणां श्रेष्ठोऽष्टकुलिकस्तथा

parvatānāṁ yathā merurdvipadānāṁ dvijottamaḥ sthānajānāṁ tu viprāṇāṁ śreṣṭho'ṣṭakulikastathā

'जैसे पर्वतों में मेरु श्रेष्ठ है, द्विपदों में ब्राह्मण श्रेष्ठ है, वैसे ही स्थानीय ब्राह्मणों में अष्टकुलिक ब्राह्मण श्रेष्ठ है।'

श्लोक 80 (skanda.6.199.80)

पक्षिणां गरुडो यद्वत्सिंहोऽरण्यनिवासिनाम् स्थानजानां तु विप्राणां श्रेष्ठोऽष्टकुलिकस्तथा

pakṣiṇāṁ garuḍo yadvatsiṁho'raṇyanivāsinām sthānajānāṁ tu viprāṇāṁ śreṣṭho'ṣṭakulikastathā

'जैसे पक्षियों में गरुड़ श्रेष्ठ है, वनवासी प्राणियों में सिंह श्रेष्ठ है, वैसे ही स्थानीय ब्राह्मणों में अष्टकुलिक ब्राह्मण श्रेष्ठ है।'

श्लोक 81 (skanda.6.199.81)

एवं ज्ञात्वा प्रयत्नेन श्राद्धे यज्ञे च पार्थिव कन्यादाने विशेषेण योज्यश्चाष्टकुलोद्भवः

evaṁ jñātvā prayatnena śrāddhe yajñe ca pārthiva kanyādāne viśeṣeṇa yojyaścāṣṭakulodbhavaḥ

'हे राजन्, यह जानकर श्राद्ध में, यज्ञ में, और विशेषतः कन्यादान में, प्रयत्नपूर्वक अष्टकुल से उत्पन्न ब्राह्मण को ही नियुक्त करना चाहिए।'

श्लोक 82 (skanda.6.199.82)

नृत्यंति पितरस्तस्य गर्जंति च पितामहाः वेदिमूले समालोक्य प्राप्तमष्टकुलं नृप

nṛtyaṁti pitarastasya garjaṁti ca pitāmahāḥ vedimūle samālokya prāptamaṣṭakulaṁ nṛpa

'हे राजन्, वेदी के नीचे अष्टकुल से उत्पन्न ब्राह्मण को उपस्थित देखकर उसके पितर नाचने लगते हैं, और पितामह गर्जना करने लगते हैं।'

श्लोक 83 (skanda.6.199.83)

पुनर्वदंति संहृष्टाः किमस्माकं प्रदास्यति दौहित्रश्चापसव्येन जलं दर्भतिलान्वितम्

punarvadaṁti saṁhṛṣṭāḥ kimasmākaṁ pradāsyati dauhitraścāpasavyena jalaṁ darbhatilānvitam

'वे हर्षित होकर पुनः कहते हैं — यह हमारा दौहित्र अपसव्य विधि से कुशा और तिल सहित हमें जल क्या देगा!'

श्लोक 84 (skanda.6.199.84)

राजोवाच यदेतद्भवता प्रोक्तं श्रैष्ठ्यमष्टकुलोद्भवम् सर्वेषां नागराणां च तत्किं वद महामते

rājovāca yadetadbhavatā proktaṁ śraiṣṭhyamaṣṭakulodbhavam sarveṣāṁ nāgarāṇāṁ ca tatkiṁ vada mahāmate

राजा ने कहा — 'हे महामते, आपने अष्टकुल से उत्पन्न ब्राह्मणों की जो यह श्रेष्ठता सभी नागरों में बताई है, वह किस कारण है, यह बताइए।'

श्लोक 85 (skanda.6.199.85)

न ह्यत्र कारणं स्वल्पं भविष्यति द्विजोत्तम

na hyatra kāraṇaṁ svalpaṁ bhaviṣyati dvijottama

'हे द्विजोत्तम, इसका कारण निश्चय ही कोई साधारण नहीं होगा।'

श्लोक 86 (skanda.6.199.86)

विश्वामित्र उवाच सत्यमेतन्महाराज यत्त्वया व्याहृतं वचः अन्येऽपि नागराः संति वेदवेदांगपारगाः

viśvāmitra uvāca satyametanmahārāja yattvayā vyāhṛtaṁ vacaḥ anye'pi nāgarāḥ saṁti vedavedāṁgapāragāḥ

विश्वामित्र ने कहा — 'हे महाराज, आपने जो वचन कहा, वह सत्य है। अन्य नागर भी हैं, जो वेद-वेदांग में पारंगत हैं,'

श्लोक 87 (skanda.6.199.87)

श्राद्धार्हा यज्ञयोग्याश्च कन्यायोग्या विशेषतः परं ते स्थापिता राजन्स्वयमिंद्रेण तत्र च

śrāddhārhā yajñayogyāśca kanyāyogyā viśeṣataḥ paraṁ te sthāpitā rājansvayamiṁdreṇa tatra ca

'श्राद्ध के योग्य, यज्ञ के योग्य, और विशेषतः कन्यादान के योग्य भी। किंतु हे राजन्, वे (अष्टकुल) तो स्वयं इंद्र द्वारा वहाँ स्थापित किए गए थे,'

श्लोक 88 (skanda.6.199.88)

प्रधानत्वेन सर्वेषां नागरैश्चापि कृत्स्नशः तेन ते गौरवं प्राप्ताः स्थानेत्रैव विशेषतः

pradhānatvena sarveṣāṁ nāgaraiścāpi kṛtsnaśaḥ tena te gauravaṁ prāptāḥ sthānetraiva viśeṣataḥ

'सभी नागरों के प्रधान के रूप में — पूर्णतः। इसीलिए वे इस स्थान में विशेषतः गौरव को प्राप्त हुए हैं।'

श्लोक 89 (skanda.6.199.89)

तस्माच्छ्राद्धं प्रकर्तव्यं विप्रैश्चाष्टकुलोद्भवैः अप्राप्तौ चैव तेषां तु कार्यं नागरसंभवैः

tasmācchrāddhaṁ prakartavyaṁ vipraiścāṣṭakulodbhavaiḥ aprāptau caiva teṣāṁ tu kāryaṁ nāgarasaṁbhavaiḥ

'अतः श्राद्ध अष्टकुल से उत्पन्न ब्राह्मणों से ही कराना चाहिए। उनके न मिलने पर ही अन्य नागरों से कराना चाहिए,'

श्लोक 90 (skanda.6.199.90)

नान्यस्थानसमुद्भूतैश्चतुर्वेदैरपि द्विजैः भर्तृयज्ञेन मर्यादा कृता ह्येषा महात्मना

nānyasthānasamudbhūtaiścaturvedairapi dvijaiḥ bhartṛyajñena maryādā kṛtā hyeṣā mahātmanā

'— किंतु किसी भी हाल में अन्य स्थान में उत्पन्न, चारों वेदों के ज्ञाता ब्राह्मणों से नहीं। यह मर्यादा महात्मा भर्तृयज्ञ द्वारा ही स्थापित की गई है।'

श्लोक 91 (skanda.6.199.91)

मुक्त्वा तु नागरं विप्रं योऽन्येनात्र करिष्यति श्राद्धं वा यदि वा यज्ञं व्यर्थं तस्य भविष्यति

muktvā tu nāgaraṁ vipraṁ yo'nyenātra kariṣyati śrāddhaṁ vā yadi vā yajñaṁ vyarthaṁ tasya bhaviṣyati

'जो नागर ब्राह्मण को छोड़कर किसी अन्य से यहाँ श्राद्ध अथवा यज्ञ करवाएगा, उसका वह सब व्यर्थ हो जाएगा।'

श्लोक 92 (skanda.6.199.92)

राजोवाच संत्यन्ये विविधा विप्रा वेदवेदांगपारगाः मध्यदेशोद्भवाः शान्तास्तथान्ये तीर्थसंभवाः

rājovāca saṁtyanye vividhā viprā vedavedāṁgapāragāḥ madhyadeśodbhavāḥ śāntāstathānye tīrthasaṁbhavāḥ

राजा ने कहा — 'अन्य भी अनेक प्रकार के ब्राह्मण हैं, वेद-वेदांग में पारंगत, मध्यदेश में उत्पन्न, शांत, तथा अन्य तीर्थों में उत्पन्न भी।'

श्लोक 93 (skanda.6.199.93)

भर्तृयज्ञेन ये त्यक्ताः श्राद्धे यज्ञे विशेषतः हीनांगाश्चाधिकांगाश्च द्विर्नग्नाः श्यावदंतकाः

bhartṛyajñena ye tyaktāḥ śrāddhe yajñe viśeṣataḥ hīnāṁgāścādhikāṁgāśca dvirnagnāḥ śyāvadaṁtakāḥ

'जिन्हें भर्तृयज्ञ ने श्राद्ध और यज्ञ में विशेषतः त्याग दिया है — अंगहीन, अंगाधिक, दो बार जन्मे नग्न, तथा मलिन दाँतों वाले,'

श्लोक 94 (skanda.6.199.94)

कुनखाः कुष्ठसंयुक्ता मूर्खा अपि विगर्हिताः श्राद्धार्हाः सूचितास्तेन एतं मे संशयं वद

kunakhāḥ kuṣṭhasaṁyuktā mūrkhā api vigarhitāḥ śrāddhārhāḥ sūcitāstena etaṁ me saṁśayaṁ vada

'तथा दूषित नाखूनों वाले, कुष्ठ रोगयुक्त, मूर्ख और निंदित — इनके होते हुए भी उन (अष्टकुल) को ही श्राद्धयोग्य बताया गया है। मेरा यह संशय दूर कीजिए।'

श्लोक 95 (skanda.6.199.95)

विश्वामित्र उवाच कीर्तयिष्ये नरव्याघ्र कारणानि बहूनि च चमत्कारस्य पत्न्याश्च दानेन पतिता यतः

viśvāmitra uvāca kīrtayiṣye naravyāghra kāraṇāni bahūni ca camatkārasya patnyāśca dānena patitā yataḥ

विश्वामित्र ने कहा — 'हे नरव्याघ्र, मैं तुम्हें इसके अनेक कारण बताऊँगा — जिनके कारण चमत्कार की पत्नियों का दान के द्वारा पतन हुआ था,'

श्लोक 96 (skanda.6.199.96)

स्त्रीणां प्रतिग्रहेणैव विप्रेषु प्रोषितेषु च पृथक्त्वं च ततो जातं बाह्याभ्यन्तरसंज्ञकम्

strīṇāṁ pratigraheṇaiva vipreṣu proṣiteṣu ca pṛthaktvaṁ ca tato jātaṁ bāhyābhyantarasaṁjñakam

'— उन स्त्रियों के दान ग्रहण करने से ही, जब ब्राह्मण प्रवास पर गए हुए थे। इसी से 'बाह्य' और 'आभ्यंतर' के भेद उत्पन्न हुए।'

श्लोक 97 (skanda.6.199.97)

दुर्वाससा ततः शप्ता रुष्टेनेवाहिना यथा विद्याधनाभिमानेन शापेन पतिताः सदा

durvāsasā tataḥ śaptā ruṣṭenevāhinā yathā vidyādhanābhimānena śāpena patitāḥ sadā

'तत्पश्चात् दुर्वासा ऋषि ने, क्रुद्ध सर्प के समान, उन्हें शाप दे दिया। विद्या और धन के अभिमान के कारण वे उस शाप से सदा के लिए पतित हो गए।'

श्लोक 98 (skanda.6.199.98)

कुशे राज्यगते राजन्राक्षसानां महाभयम् प्रजयाऽऽवेदितं सर्वं तस्य राज्ञो महात्मनः

kuśe rājyagate rājanrākṣasānāṁ mahābhayam prajayā''veditaṁ sarvaṁ tasya rājño mahātmanaḥ

'हे राजन्, कुश के राज्य करते समय राक्षसों का महाभय उत्पन्न हुआ। प्रजा ने उस महात्मा राजा को यह सब निवेदित किया।'

श्लोक 99 (skanda.6.199.99)

विभीषणस्य लंकायां दूतश्च प्रेषितस्तदा सर्वं निवेदयामास प्रजानां भयसंभवम्

vibhīṣaṇasya laṁkāyāṁ dūtaśca preṣitastadā sarvaṁ nivedayāmāsa prajānāṁ bhayasaṁbhavam

'तब लंका में विभीषण के पास एक दूत भेजा गया, जिसने प्रजा में उत्पन्न इस भय का सारा वृत्तांत निवेदित किया।'

श्लोक 100 (skanda.6.199.100)

अभिवन्द्य कुशादेशं रामस्य चरितं स्मरन् पुर्यां विलोकयामास लङ्कायां रामशासनात्

abhivandya kuśādeśaṁ rāmasya caritaṁ smaran puryāṁ vilokayāmāsa laṅkāyāṁ rāmaśāsanāt

'कुश के आदेश का अभिनंदन करके, राम के चरित्र का स्मरण करते हुए, विभीषण ने राम की आज्ञा से लंका पुरी में खोजबीन की,'

श्लोक 101 (skanda.6.199.101)

उपप्लवस्य कर्तारो नष्टाः सर्वे दिशो दश गन्धर्वाणां च लोकं हि भयेन महता गताः

upaplavasya kartāro naṣṭāḥ sarve diśo daśa gandharvāṇāṁ ca lokaṁ hi bhayena mahatā gatāḥ

'किंतु उन उपद्रव करने वालों में से सब दसों दिशाओं में भाग चुके थे, और अत्यधिक भय के कारण गंधर्वों के लोक को चले गए थे।'

श्लोक 102 (skanda.6.199.102)

स्थातुं तत्र न शक्तास्ते विभीषणभयेन च पृथिव्यां समनुप्राप्ताः स्थानान्यपि बहूनि च

sthātuṁ tatra na śaktāste vibhīṣaṇabhayena ca pṛthivyāṁ samanuprāptāḥ sthānānyapi bahūni ca

'वहाँ भी विभीषण के भय से वे टिक नहीं सके, और पृथ्वी पर अनेक स्थानों में जा पहुँचे।'

श्लोक 103 (skanda.6.199.103)

भयेन महता तत्र कुशस्यैव तु शासने ब्राह्मणानां च रूपाणि कृत्वा तत्र समागताः

bhayena mahatā tatra kuśasyaiva tu śāsane brāhmaṇānāṁ ca rūpāṇi kṛtvā tatra samāgatāḥ

'अत्यंत भय के कारण, कुश के ही शासन में, उन्होंने ब्राह्मणों के रूप धारण करके वहाँ (चमत्कारपुर) प्रवेश किया।'

श्लोक 104 (skanda.6.199.104)

वाडवानां महिम्ना च मध्ये स्थातुं न तेऽशकन् पतितानां च संस्थानं चमत्कारपुरं गताः

vāḍavānāṁ mahimnā ca madhye sthātuṁ na te'śakan patitānāṁ ca saṁsthānaṁ camatkārapuraṁ gatāḥ

'किंतु सच्चे ब्राह्मणों की महिमा के कारण वे उनके मध्य टिक नहीं सके, और पतितों के निवासस्थान के रूप में चमत्कारपुर चले गए।'

श्लोक 105 (skanda.6.199.105)

मायाविशारदैस्तैश्च धनेन विद्यया ततः अध जग्धं ततस्तैस्तु तेषां मध्ये स्थितं च तैः

māyāviśāradaistaiśca dhanena vidyayā tataḥ adha jagdhaṁ tatastaistu teṣāṁ madhye sthitaṁ ca taiḥ

'मायाविद्या में निपुण उन राक्षसों ने धन और विद्या से उन (पतित ब्राह्मणों) के बीच स्थान पाकर उन्हें भ्रष्ट कर दिया,'

श्लोक 106 (skanda.6.199.106)

ततःप्रभृति ते सर्वे राक्षसत्वं प्रपेदिरे क्रूराण्यपि च कर्माणि कुर्वंति च पदेपदे

tataḥprabhṛti te sarve rākṣasatvaṁ prapedire krūrāṇyapi ca karmāṇi kurvaṁti ca padepade

'और तभी से वे सब भी राक्षसत्व को प्राप्त हो गए, और अब पग-पग पर क्रूर कर्म करते हैं।'

श्लोक 107 (skanda.6.199.107)

ततस्ते सर्वथा राजन्वर्जनीयाः प्रयत्नतः श्राद्धे यज्ञे नरव्याघ्र नरके पातयंति च

tataste sarvathā rājanvarjanīyāḥ prayatnataḥ śrāddhe yajñe naravyāghra narake pātayaṁti ca

'अतः हे राजन्, हे नरव्याघ्र, उन्हें सर्वथा प्रयत्नपूर्वक श्राद्ध और यज्ञ से दूर रखना चाहिए, क्योंकि वे नरक में गिराते हैं।'

श्लोक 108 (skanda.6.199.108)

अन्यच्च दूषणं तेषां कीर्तयिष्ये तवाऽनघ त्रिजाताः स्थापिता राजन्सर्पाणां गरनाशनात्

anyacca dūṣaṇaṁ teṣāṁ kīrtayiṣye tavā'nagha trijātāḥ sthāpitā rājansarpāṇāṁ garanāśanāt

'हे निष्पाप, उनका एक और दोष मैं तुम्हें बताऊँगा। हे राजन्, सर्पों के विष का नाश करने वाले त्रिजात लोग वहाँ स्थापित किए गए थे,'

श्लोक 109 (skanda.6.199.109)

नगरत्वं ततो जातं चमत्कार पुरस्य तु त्रिजातत्वं तु सर्वेषां जातं तत्र विशेषतः

nagaratvaṁ tato jātaṁ camatkāra purasya tu trijātatvaṁ tu sarveṣāṁ jātaṁ tatra viśeṣataḥ

'और उन्हीं से चमत्कारपुर को नगर-भाव प्राप्त हुआ। किंतु वहाँ विशेषतः सभी में त्रिजातपन उत्पन्न हो गया।'

श्लोक 110 (skanda.6.199.110)

एतेभ्यः कारणेभ्यश्च भर्तृयज्ञेन वर्जिताः पुनश्च कारणं तेषां स्पर्शादपि न शुद्धिभाक्

etebhyaḥ kāraṇebhyaśca bhartṛyajñena varjitāḥ punaśca kāraṇaṁ teṣāṁ sparśādapi na śuddhibhāk

'इन्हीं कारणों से भर्तृयज्ञ ने उन्हें वर्जित कर दिया। और उनका एक अन्य कारण भी है — उनका स्पर्श भी शुद्धिकारक नहीं है।'

श्लोक 111 (skanda.6.199.111)

कुम्भकोत्थं च संप्राप्तं महच्चण्डालसंभवम्

kumbhakotthaṁ ca saṁprāptaṁ mahaccaṇḍālasaṁbhavam

'यह एक महान दोष है जो कुम्भक से उत्पन्न, चांडाल-कुल से प्राप्त हुआ है।'

श्लोक 112 (skanda.6.199.112)

राजोवाच एतच्च कारणं विप्र कथयस्व प्रसादतः स्थावरस्य चरस्यैव जगतो ज्ञानमस्ति ते

rājovāca etacca kāraṇaṁ vipra kathayasva prasādataḥ sthāvarasya carasyaiva jagato jñānamasti te

राजा ने कहा — 'हे विप्र, कृपा करके यह कारण भी बताइए। इस स्थावर-जंगम संपूर्ण जगत का ज्ञान आपको है।'

श्लोक 113 (skanda.6.199.113)

विश्वामित्र उवाच अत्र ते कीर्तयिष्यामि पूर्ववृत्तकथांतरम् भर्तृयजेन ये त्यक्ताः सर्वेन्ये ब्राह्मणोत्तमाः

viśvāmitra uvāca atra te kīrtayiṣyāmi pūrvavṛttakathāṁtaram bhartṛyajena ye tyaktāḥ sarvenye brāhmaṇottamāḥ

विश्वामित्र ने कहा — 'यहाँ मैं तुम्हें एक अन्य पुरातन कथा सुनाऊँगा, जिसके कारण भर्तृयज्ञ ने अन्य समस्त ब्राह्मणश्रेष्ठों को भी वर्जित कर दिया था।'

श्लोक 114 (skanda.6.199.114)

वर्धमाने पुरे पूर्वमासीदंत्यजजातिजः चण्डालः कुंभकोनाम निर्दयः पापकर्मकृत्

vardhamāne pure pūrvamāsīdaṁtyajajātijaḥ caṇḍālaḥ kuṁbhakonāma nirdayaḥ pāpakarmakṛt

'पूर्वकाल में वर्धमान नगर में अंत्यज जाति में उत्पन्न कुम्भक नामक एक चांडाल था, जो निर्दयी और पापकर्मी था।'

श्लोक 115 (skanda.6.199.115)

कस्यचित्त्वथ कालस्य तस्य पुत्रो बभूव ह विरूपस्यापि रूपाढ्यः पूर्वकर्मप्रभावतः

kasyacittvatha kālasya tasya putro babhūva ha virūpasyāpi rūpāḍhyaḥ pūrvakarmaprabhāvataḥ

'कुछ समय बाद, उस कुरूप पुरुष को भी, पूर्वजन्म के कर्मों के प्रभाव से, एक रूपवान पुत्र उत्पन्न हुआ।'

श्लोक 116 (skanda.6.199.116)

पिंगाक्षस्य सुकृष्णस्य वयोमध्यस्य पार्थिव दक्षः सर्वेषु कृत्येषु सर्वलक्षणलक्षितः

piṁgākṣasya sukṛṣṇasya vayomadhyasya pārthiva dakṣaḥ sarveṣu kṛtyeṣu sarvalakṣaṇalakṣitaḥ

'हे राजन्, वह भूरी आँखों वाला, अत्यंत काला, मध्यम आयु का, समस्त कार्यों में निपुण तथा सभी शुभ लक्षणों से युक्त था।'

श्लोक 117 (skanda.6.199.117)

स वृद्धिं द्रुतमभ्येति शुक्लपक्षे यथोडुराट् तथाऽसौ शंस्यमानस्तु सर्वलोकैः सुरूपभाक् दृष्ट्वा कुटुंबकं नित्यं वैराग्यं परमं गतः

sa vṛddhiṁ drutamabhyeti śuklapakṣe yathoḍurāṭ tathā'sau śaṁsyamānastu sarvalokaiḥ surūpabhāk dṛṣṭvā kuṭuṁbakaṁ nityaṁ vairāgyaṁ paramaṁ gataḥ

'वह ऐसे तीव्र गति से बढ़ने लगा जैसे शुक्लपक्ष में चंद्रमा। सर्वत्र लोगों द्वारा प्रशंसित तथा रूपवान वह, अपने कुटुंब को देखकर सदा परम वैराग्य को प्राप्त हुआ।'

श्लोक 118 (skanda.6.199.118)

ततो देशांतरं दुःखाद्भ्रममाण इतस्ततः चमत्कारपुरं प्राप्तो द्विजरूपं समाश्रितः स स्नाति सर्वकृत्येषु भिक्षान्नकृतभोजनः

tato deśāṁtaraṁ duḥkhādbhramamāṇa itastataḥ camatkārapuraṁ prāpto dvijarūpaṁ samāśritaḥ sa snāti sarvakṛtyeṣu bhikṣānnakṛtabhojanaḥ

'तब वह दुःखवश दूसरे देश की ओर, इधर-उधर भटकते हुए, चमत्कारपुर आ पहुँचा, और द्विज का रूप धारण कर लिया। वह समस्त कर्मों में स्नान करता, तथा भिक्षा के अन्न से भोजन करता था।'

श्लोक 119 (skanda.6.199.119)

एतस्मिन्नेव काले तु ब्राह्मणः शंसितव्रतः छांदोग्यगोत्रविख्यातः सुभद्रोनाम पार्थिवः

etasminneva kāle tu brāhmaṇaḥ śaṁsitavrataḥ chāṁdogyagotravikhyātaḥ subhadronāma pārthivaḥ

'इसी समय एक व्रतधारी ब्राह्मण था, हे राजन्, छांदोग्य गोत्र में विख्यात, सुभद्र नाम का,'

श्लोक 120 (skanda.6.199.120)

नागरो वर्षयाजी च वेदवेदांगपारगः तत्रासीत्तस्य सञ्जाता कन्यका द्विगुणैरदैः

nāgaro varṣayājī ca vedavedāṁgapāragaḥ tatrāsīttasya sañjātā kanyakā dviguṇairadaiḥ

'एक नागर ब्राह्मण, वार्षिक यज्ञ करने वाला, वेद-वेदांग में पारंगत। वहाँ उसे एक कन्या उत्पन्न हुई, जिसके दाँत दुगुने थे,'

श्लोक 121 (skanda.6.199.121)

तथा त्रिभिःस्तनै रौद्रा पृष्ठ्यावर्तकसंयुता दरिद्रोऽपि सुदुःस्थोऽपि कुलहीनोपि पार्थिव

tathā tribhiḥstanai raudrā pṛṣṭhyāvartakasaṁyutā daridro'pi suduḥstho'pi kulahīnopi pārthiva

'और तीन स्तनों वाली, भयंकर, तथा पृष्ठावर्तक (चक्रचिह्न) से युक्त। हे राजन्, ऐसी कन्या को दरिद्र, दुःस्थ अथवा कुलहीन कोई भी,'

श्लोक 122 (skanda.6.199.122)

दीयमानामपि न तां प्रतिगृह्णाति कश्चन यद्भक्षयति भर्तारं षण्मासाभ्यंतरे हि सा

dīyamānāmapi na tāṁ pratigṛhṇāti kaścana yadbhakṣayati bhartāraṁ ṣaṇmāsābhyaṁtare hi sā

'कोई भी स्वीकार नहीं करता था, क्योंकि ऐसी कन्या छह महीनों के भीतर ही अपने पति को खा जाती है, ऐसा कहा जाता है।'

श्लोक 123 (skanda.6.199.123)

यस्याः स्युर्द्विगुणा दंता एवं सामुद्रिका जगुः त्रिस्तनी कन्यका या तु श्वशुरस्य कुलक्षयम् संधत्ते नात्र सन्देहस्तस्मात्तां दूरतस्त्यजेत्

yasyāḥ syurdviguṇā daṁtā evaṁ sāmudrikā jaguḥ tristanī kanyakā yā tu śvaśurasya kulakṣayam saṁdhatte nātra sandehastasmāttāṁ dūratastyajet

'सामुद्रिक शास्त्र में ऐसा कहा गया है कि जिसके दुगुने दाँत हों, तथा जो कन्या त्रिस्तनी हो, वह अपने ससुराल के कुल का नाश कर देती है — इसमें कोई संदेह नहीं। अतः उसे दूर से ही त्याग देना चाहिए।'

श्लोक 124 (skanda.6.199.124)

पृष्ठ्यावर्तो भवेद्यस्या असती सा भवेद्द्रुतम् बहुपापसमाचारा तस्मात्तां परिवर्जयेत्

pṛṣṭhyāvarto bhavedyasyā asatī sā bhaveddrutam bahupāpasamācārā tasmāttāṁ parivarjayet

'जिसके पीठ पर चक्रचिह्न हो, वह शीघ्र ही असती और अनेक पापों में लिप्त हो जाती है। अतः उसे भी त्याग देना चाहिए।'

श्लोक 125 (skanda.6.199.125)

अथ तां वृद्धिमापन्नां दृष्ट्वा विप्रः सुभद्रकः चिन्ताचक्रं समारूढो न शांतिमधिगच्छति

atha tāṁ vṛddhimāpannāṁ dṛṣṭvā vipraḥ subhadrakaḥ cintācakraṁ samārūḍho na śāṁtimadhigacchati

'उस बढ़ती हुई कन्या को देखकर सुभद्र ब्राह्मण चिंता के चक्र में पड़ गया और उसे कहीं भी शांति नहीं मिलती थी।'

श्लोक 126 (skanda.6.199.126)

किं करोमि क्व गच्छामि कथमस्याः पतिर्भवेत् न कश्चित्प्रतिगृह्णाति प्रार्थितोऽपि मुहुर्मुहुः

kiṁ karomi kva gacchāmi kathamasyāḥ patirbhavet na kaścitpratigṛhṇāti prārthito'pi muhurmuhuḥ

'क्या करूँ, कहाँ जाऊँ, इसका पति कैसे बने? बार-बार प्रार्थना करने पर भी कोई इसे स्वीकार नहीं करता।'

श्लोक 127 (skanda.6.199.127)

दरिद्रो व्याधितो वाऽपि वृद्धोऽपि ब्राह्मणो हि सः स्मृतौ यस्मादिदं प्रोक्तं कन्यार्थे प्राङ्महर्षिभिः

daridro vyādhito vā'pi vṛddho'pi brāhmaṇo hi saḥ smṛtau yasmādidaṁ proktaṁ kanyārthe prāṅmaharṣibhiḥ

'चाहे वह ब्राह्मण दरिद्र हो, रोगी हो, अथवा वृद्ध ही क्यों न हो — क्योंकि स्मृति में महर्षियों ने कन्या के विषय में यह पहले ही कहा है:'

श्लोक 128 (skanda.6.199.128)

अष्टवर्षा भवेद्गौरी नववर्षा च रोहिणी दशवर्षा भवेत्कन्या अत ऊर्ध्वं रजस्वला

aṣṭavarṣā bhavedgaurī navavarṣā ca rohiṇī daśavarṣā bhavetkanyā ata ūrdhvaṁ rajasvalā

'आठ वर्ष की गौरी, नौ वर्ष की रोहिणी, दस वर्ष की कन्या कहलाती है, और उसके बाद वह रजस्वला हो जाती है।'

श्लोक 129 (skanda.6.199.129)

माता चैव पिता चैव ज्येष्ठो भ्राता तथैव च त्रयस्ते नरकं यांति दृष्ट्वा कन्यां रजस्वलाम्

mātā caiva pitā caiva jyeṣṭho bhrātā tathaiva ca trayaste narakaṁ yāṁti dṛṣṭvā kanyāṁ rajasvalām

'माता, पिता, तथा ज्येष्ठ भ्राता — ये तीनों, यदि कन्या को रजस्वला होते हुए देखें, तो नरक को जाते हैं।'

श्लोक 130 (skanda.6.199.130)

एवं चिन्तयतस्तस्य सोंऽत्यजो द्विजरूपधृक् भिक्षार्थं तद्गृहं प्राप्तो दृष्टस्तेन महात्मना

evaṁ cintayatastasya soṁ'tyajo dvijarūpadhṛk bhikṣārthaṁ tadgṛhaṁ prāpto dṛṣṭastena mahātmanā

इस प्रकार वह चिंता कर ही रहा था, कि द्विज-रूप धारण किए हुए वह अंत्यज भिक्षा के लिए उसके घर आ पहुँचा, और उस महात्मा ने उसे देखा।

श्लोक 131 (skanda.6.199.131)

पृष्टश्च विस्मयात्तेन दृष्ट्वा रूपं तथाविधम् कुतस्त्वमिह सम्प्राप्तः क्व यास्यसि च भिक्षुक

pṛṣṭaśca vismayāttena dṛṣṭvā rūpaṁ tathāvidham kutastvamiha samprāptaḥ kva yāsyasi ca bhikṣuka

उसका ऐसा रूप देखकर, विस्मित होकर सुभद्र ने पूछा — 'हे भिक्षुक, तुम यहाँ कहाँ से आए हो, और कहाँ जाओगे?'

श्लोक 132 (skanda.6.199.132)

ईदृग्भव्यतरो भूत्वा कस्मान्माधुकरीं गतः किं गोत्रं तव मे ब्रूहि कतमः प्रवरश्च ते

īdṛgbhavyataro bhūtvā kasmānmādhukarīṁ gataḥ kiṁ gotraṁ tava me brūhi katamaḥ pravaraśca te

'ऐसा सुंदर होते हुए तुम भिक्षा माँगने क्यों निकले हो? मुझे अपना गोत्र बताओ, और तुम्हारा प्रवर क्या है?'

श्लोक 133 (skanda.6.199.133)

सोऽब्रवीद्गौडदेशीयं स्थानं मे सुमहत्तरम् नाम्ना भोजकटं ख्यातं नानाद्विजसमाश्रितम्

so'bravīdgauḍadeśīyaṁ sthānaṁ me sumahattaram nāmnā bhojakaṭaṁ khyātaṁ nānādvijasamāśritam

उसने कहा — 'गौड़ देश में मेरा एक अत्यंत महान स्थान है, भोजकट नाम से विख्यात, अनेक ब्राह्मणों से आश्रित।'

श्लोक 134 (skanda.6.199.134)

तत्रासीन्माधवोनाम ब्राह्मणो वेदपारगः वसिष्ठगोत्रविख्यात एकप्रवरसूचितः

tatrāsīnmādhavonāma brāhmaṇo vedapāragaḥ vasiṣṭhagotravikhyāta ekapravarasūcitaḥ

'वहाँ माधव नामक एक वेदपारंगत ब्राह्मण था, वसिष्ठ गोत्र में विख्यात, एक-प्रवर से चिह्नित।'

श्लोक 135 (skanda.6.199.135)

तस्याहं तनयो नाम्ना चंद्रप्रभ इति स्मृतः

tasyāhaṁ tanayo nāmnā caṁdraprabha iti smṛtaḥ

'मैं उसी का पुत्र हूँ, नाम से चंद्रप्रभ कहलाता हूँ।'

श्लोक 136 (skanda.6.199.136)

ततोऽहमष्टमे वर्षे यदा व्रतधरः स्थितः तदा पंचत्वमापन्नः पिता मे वेदपारगः

tato'hamaṣṭame varṣe yadā vratadharaḥ sthitaḥ tadā paṁcatvamāpannaḥ pitā me vedapāragaḥ

'जब मैं आठवें वर्ष में व्रतधारी हुआ, तभी मेरे वेदपारंगत पिता का देहांत हो गया।'

श्लोक 137 (skanda.6.199.137)

माता मे सह तेनैव प्रविष्टा हव्यवाहनम् ततो वैराग्यमापन्नो निष्क्रांतोऽहं निजालयात्

mātā me saha tenaiva praviṣṭā havyavāhanam tato vairāgyamāpanno niṣkrāṁto'haṁ nijālayāt

'मेरी माता भी उसी के साथ अग्नि में प्रविष्ट हो गई। तत्पश्चात् वैराग्य को प्राप्त होकर मैं अपने घर से निकल पड़ा।'

श्लोक 138 (skanda.6.199.138)

तीर्थानि भ्रममाणोऽत्र संप्राप्तस्तु पुरं तव अधुना संप्रयास्यामि प्रभासं क्षेत्रमुत्तमम्

tīrthāni bhramamāṇo'tra saṁprāptastu puraṁ tava adhunā saṁprayāsyāmi prabhāsaṁ kṣetramuttamam

'तीर्थों में भ्रमण करते हुए मैं यहाँ तुम्हारी इस नगरी में आ पहुँचा हूँ। अब मैं प्रभास नामक उत्तम क्षेत्र की ओर जाऊँगा,'

श्लोक 139 (skanda.6.199.139)

यत्र सोमेश्वरो देवस्त्यक्त्वा कैलासमागतः न मया पठिता वेदा न च शास्त्रं नृपोत्तम तीर्थयात्राप्रसंगेन तेन भिक्षां चराम्यहम्

yatra someśvaro devastyaktvā kailāsamāgataḥ na mayā paṭhitā vedā na ca śāstraṁ nṛpottama tīrthayātrāprasaṁgena tena bhikṣāṁ carāmyaham

'जहाँ भगवान सोमेश्वर कैलास त्यागकर आए हुए हैं। हे नृपोत्तम, मैंने न तो वेद पढ़े हैं, न शास्त्र सीखा है; तीर्थयात्रा में लगे रहने के कारण ही मैं भिक्षाटन करता हूँ।'

श्लोक 140 (skanda.6.199.140)

विश्वामित्र उवाच तस्य तद्वचनं श्रुत्वा चिन्तयामास चेतसि ब्राह्मणोऽयं सुदेशीयस्तथा भव्यतमाकृतिः यदि गृह्णाति मे कन्यां तदस्मै प्रददाम्यहम्

viśvāmitra uvāca tasya tadvacanaṁ śrutvā cintayāmāsa cetasi brāhmaṇo'yaṁ sudeśīyastathā bhavyatamākṛtiḥ yadi gṛhṇāti me kanyāṁ tadasmai pradadāmyaham

विश्वामित्र ने कहा — उसका यह वचन सुनकर सुभद्र मन में सोचने लगा — 'यह ब्राह्मण उत्तम देश से आया है, और अत्यंत सुंदर आकृति वाला है। यदि यह मेरी कन्या को स्वीकार करे, तो मैं इसे दे दूँगा।'

श्लोक 141 (skanda.6.199.141)

यावद्रजस्वला नैव जायते सा निरूपिता कृत्स्नं दूषयति क्षिप्रं नैव वंशं ममाधमा

yāvadrajasvalā naiva jāyate sā nirūpitā kṛtsnaṁ dūṣayati kṣipraṁ naiva vaṁśaṁ mamādhamā

'जब तक वह देखी हुई (निंदित) कन्या रजस्वला नहीं होती, तब तक ही ठीक है — अन्यथा वह नीच कन्या शीघ्र ही मेरे संपूर्ण वंश को दूषित कर देगी।'

श्लोक 142 (skanda.6.199.142)

ततः प्रोवाच तं म्लेच्छं संमंत्र्य सह भार्यया यदि गृह्णासि मे कन्यां तव यच्छाम्यहं द्विज

tataḥ provāca taṁ mlecchaṁ saṁmaṁtrya saha bhāryayā yadi gṛhṇāsi me kanyāṁ tava yacchāmyahaṁ dvija

तब अपनी पत्नी से सलाह करके उसने उस म्लेच्छ से कहा — 'हे द्विज, यदि तुम मेरी कन्या को स्वीकार करो, तो मैं तुम्हें उसे दे दूँगा,'

श्लोक 143 (skanda.6.199.143)

भरणं पोषणं द्वाभ्यां करिष्यामि सदैव हि

bharaṇaṁ poṣaṇaṁ dvābhyāṁ kariṣyāmi sadaiva hi

'और मैं तुम दोनों का भरण-पोषण सदैव करता रहूँगा।'

श्लोक 144 (skanda.6.199.144)

तच्छ्रुत्वा हर्षितः प्राह सोंऽत्यजो नृपसत्तमम् तवादेशं करिष्यामि यच्छ मे कन्यकां नृप

tacchrutvā harṣitaḥ prāha soṁ'tyajo nṛpasattamam tavādeśaṁ kariṣyāmi yaccha me kanyakāṁ nṛpa

यह सुनकर वह अंत्यज हर्षित होकर बोला — 'हे राजसत्तम, मैं तुम्हारी आज्ञा का पालन करूँगा; हे राजन्, अपनी कन्या मुझे दे दो।'

श्लोक 145 (skanda.6.199.145)

तथेत्युक्त्वा गतस्तेन तस्मै दत्ता निजा सुता गृह्योक्तेन विधानेन विवाहो विहितस्ततः

tathetyuktvā gatastena tasmai dattā nijā sutā gṛhyoktena vidhānena vivāho vihitastataḥ

'तथास्तु' कहकर सुभद्र ने अपनी पुत्री उसे दे दी, और गृह्यसूत्र में कहे गए विधान के अनुसार विवाह संपन्न कराया।

श्लोक 146 (skanda.6.199.146)

ततो ददौ धनं धान्यं गृहं क्षेत्रं च गोधनम् तस्मै तुष्टिसमायुक्तो मन्यमानः कृतार्थताम्

tato dadau dhanaṁ dhānyaṁ gṛhaṁ kṣetraṁ ca godhanam tasmai tuṣṭisamāyukto manyamānaḥ kṛtārthatām

तत्पश्चात् उसने उसे धन, धान्य, घर, खेत तथा गौओं का धन दिया, अत्यंत संतुष्ट होकर, स्वयं को कृतार्थ मानते हुए।

श्लोक 147 (skanda.6.199.147)

अथ सोऽपि च तां प्राप्य विलासानकरोद्बहून् खाद्यैः पानैः सुवस्त्रैश्च गन्धमाल्यैर्विभूषणैः

atha so'pi ca tāṁ prāpya vilāsānakarodbahūn khādyaiḥ pānaiḥ suvastraiśca gandhamālyairvibhūṣaṇaiḥ

वह भी उसे पाकर, स्वादिष्ट भोजन, पेय, सुंदर वस्त्र, सुगंध, माला और आभूषणों से युक्त अनेक विलास करने लगा।

श्लोक 148 (skanda.6.199.148)

परं स व्रजति प्रायो येन मार्गेण केनचित् सारमेयाः सशब्दाश्च पृष्ठतोऽनुव्रजंति वै

paraṁ sa vrajati prāyo yena mārgeṇa kenacit sārameyāḥ saśabdāśca pṛṣṭhato'nuvrajaṁti vai

किंतु प्रायः वह जिस किसी भी मार्ग से जाता, कुत्ते भौंकते हुए उसके पीछे-पीछे चल पड़ते थे,

श्लोक 149 (skanda.6.199.149)

अन्येषामंत्यजात्यानां यद्वत्तस्य विशेषतः वेदाभ्यासपरश्चैव यदि संजायते क्वचित् रक्तं पतति वक्त्रेण तत्क्षणात्तस्य दुर्मतेः

anyeṣāmaṁtyajātyānāṁ yadvattasya viśeṣataḥ vedābhyāsaparaścaiva yadi saṁjāyate kvacit raktaṁ patati vaktreṇa tatkṣaṇāttasya durmateḥ

जैसे वे अन्य अंत्यज जातियों के पीछे-पीछे चलते हैं, वैसे ही विशेष रूप से उसके पीछे भी। और यदि वह दुर्मति कभी वेदाभ्यास में प्रवृत्त होता, तो उसी क्षण उसके मुख से रक्त गिरने लगता।

श्लोक 150 (skanda.6.199.150)

एतस्मिन्नंतरे लोकः सर्व एव प्रशंकितः अब्रवीच्च मिथोऽभ्येत्य चंडालोऽयमसंशयम्

etasminnaṁtare lokaḥ sarva eva praśaṁkitaḥ abravīcca mitho'bhyetya caṁḍālo'yamasaṁśayam

इसी बीच सारा नगर संदेह में पड़ गया, और लोग आपस में एकत्र होकर कहने लगे — 'यह निःसंदेह कोई चांडाल है,'

श्लोक 151 (skanda.6.199.151)

यदेते पृष्ठतो यांति भषमाणाः शुनीसुताः सुभद्रोऽपि च तत्तेषां श्रुत्वा चिन्तापरोऽभवत्

yadete pṛṣṭhato yāṁti bhaṣamāṇāḥ śunīsutāḥ subhadro'pi ca tatteṣāṁ śrutvā cintāparo'bhavat

'क्योंकि ये कुत्ते भौंकते हुए इसके पीछे चलते हैं।' सुभद्र भी उनका यह वचन सुनकर चिंतित हो गया।

श्लोक 152 (skanda.6.199.152)

मन्यमानश्च तत्सत्यं दुःखेन महतान्वितः नूनमंत्यजजातीयो भविष्यति सुतापतिः

manyamānaśca tatsatyaṁ duḥkhena mahatānvitaḥ nūnamaṁtyajajātīyo bhaviṣyati sutāpatiḥ

उसे सत्य मानते हुए, अत्यंत दुःखी होकर वह सोचने लगा — 'निश्चय ही मेरी पुत्री का पति अंत्यज जाति का ही होगा,'

श्लोक 153 (skanda.6.199.153)

ज्ञायते चेष्टितैः सर्वैर्यथाऽयं जल्पते जनः

jñāyate ceṣṭitaiḥ sarvairyathā'yaṁ jalpate janaḥ

'क्योंकि उसकी सभी चेष्टाओं से यह पहचाना जाता है, जैसा कि लोग कह रहे हैं।'

श्लोक 154 (skanda.6.199.154)

एवं रात्रिंदिवं तस्य चिन्तयानस्य भूपतेः लोकापवादयुक्तस्य कियान्कालोऽभ्यवर्तत

evaṁ rātriṁdivaṁ tasya cintayānasya bhūpateḥ lokāpavādayuktasya kiyānkālo'bhyavartata

इस प्रकार लोकनिंदा से युक्त होकर वह दिन-रात चिंता करता रहा, और इसी में कुछ समय बीत गया।

श्लोक 155 (skanda.6.199.155)

अन्यस्मिन्नहनि प्राप्ते आद्याद्या द्विजसत्तमाः मध्यगेन समायुक्ता ब्रह्मस्थानं समागताः तस्य शुद्धिकृते प्रोचुर्येन शंका प्रणश्यति

anyasminnahani prāpte ādyādyā dvijasattamāḥ madhyagena samāyuktā brahmasthānaṁ samāgatāḥ tasya śuddhikṛte procuryena śaṁkā praṇaśyati

फिर एक दिन, वे परम श्रेष्ठ ब्राह्मण, मध्यस्थ के साथ, ब्रह्मस्थान में एकत्र हुए, और उसकी शुद्धि के लिए उन्होंने ऐसा वचन कहा जिससे संशय दूर हो सके।

श्लोक 156 (skanda.6.199.156)

अथोचुस्तं द्विजश्रेष्ठा ब्रह्मस्थानस्य मध्यगम् मध्यगस्य तु वक्त्रेण विवर्णवदनं स्थितम्

athocustaṁ dvijaśreṣṭhā brahmasthānasya madhyagam madhyagasya tu vaktreṇa vivarṇavadanaṁ sthitam

उन श्रेष्ठ ब्राह्मणों ने उस मध्यस्थ के मुख से, उस विवर्णमुख होकर खड़े हुए (चंद्रप्रभ) से कहलवाया —

श्लोक 157 (skanda.6.199.157)

कुलं गोत्रं निजं ब्रूहि प्रवरांश्च विशेषतः स्थानं देशं च विप्राणां येन शुद्धिः प्रदीयते

kulaṁ gotraṁ nijaṁ brūhi pravarāṁśca viśeṣataḥ sthānaṁ deśaṁ ca viprāṇāṁ yena śuddhiḥ pradīyate

'अपना कुल, गोत्र, और विशेषतः अपने प्रवर बताओ, तथा अपना स्थान और देश भी, जिससे ब्राह्मणों को शुद्धि प्रदान की जा सके।'

श्लोक 158 (skanda.6.199.158)

अथासौ वेपमानस्तु प्रस्विन्नवदनस्तथा अधोदृष्टिरुवाचेदं गद्गदं विहिताञ्जलिः

athāsau vepamānastu prasvinnavadanastathā adhodṛṣṭiruvācedaṁ gadgadaṁ vihitāñjaliḥ

तब वह काँपते हुए, मुख पर पसीना छाए, नीचे दृष्टि किए हुए, हाथ जोड़कर, गद्गद वाणी में यह बोला।

श्लोक 159 (skanda.6.199.159)

गर्भाष्टमे पिता मह्यं वर्षे मृत्युं गतस्ततः ततः सा तं समादाय जननी मे पतिव्रता मां त्यक्त्वा दुःखितं दीनं प्रविष्टा हव्यवाहनम्

garbhāṣṭame pitā mahyaṁ varṣe mṛtyuṁ gatastataḥ tataḥ sā taṁ samādāya jananī me pativratā māṁ tyaktvā duḥkhitaṁ dīnaṁ praviṣṭā havyavāhanam

'मेरे गर्भ के आठवें वर्ष में मेरे पिता का देहांत हो गया था। उसके बाद मेरी पतिव्रता माता, दुःखी और दीन मुझे छोड़कर, उन्हीं के साथ अग्नि में प्रविष्ट हो गई।'

श्लोक 160 (skanda.6.199.160)

अहं वैराग्यमापन्नस्तीर्थयात्रां समाश्रितः बालभावे पितुर्दुःखात्तापसैरपरैः सह

ahaṁ vairāgyamāpannastīrthayātrāṁ samāśritaḥ bālabhāve piturduḥkhāttāpasairaparaiḥ saha

'मैं बचपन में ही पिता के दुःख से वैराग्य को प्राप्त होकर, अन्य तपस्वियों के साथ तीर्थयात्रा में लग गया।'

श्लोक 161 (skanda.6.199.161)

न मया पठितो वेदो न च शास्त्रं निरूपितम् तीर्थयात्रापरोऽहं च समायातो भवत्पुरम्

na mayā paṭhito vedo na ca śāstraṁ nirūpitam tīrthayātrāparo'haṁ ca samāyāto bhavatpuram

'मैंने न वेद पढ़ा, न किसी शास्त्र का अध्ययन किया। तीर्थयात्रा में लगा हुआ मैं आपके नगर में आ पहुँचा।'

श्लोक 162 (skanda.6.199.162)

अभद्रेण सुभद्रेण श्वशुरेण दुरात्मना एतज्जानाम्यहं विप्रा गोत्रं वासिष्ठमेव वा

abhadreṇa subhadreṇa śvaśureṇa durātmanā etajjānāmyahaṁ viprā gotraṁ vāsiṣṭhameva vā

'— जहाँ दुष्ट सुभद्र, जो नाम से ही अच्छा किंतु आचरण से दुरात्मा है, ने मुझे अपना दामाद बना लिया। हे विप्रो, मैं केवल इतना ही जानता हूँ कि गोत्र वासिष्ठ है,'

श्लोक 163 (skanda.6.199.163)

अथैकप्रवरो देशो गौडो मधुपुरं पुरम्

athaikapravaro deśo gauḍo madhupuraṁ puram

'और उसका एक प्रवर है, हमारा देश गौड़ है, और नगर मधुपुर है।'

श्लोक 164 (skanda.6.199.164)

ततस्ते ब्राह्मणाः प्रोचुर्यस्य नो ज्ञायते कुलम् तस्य शुद्धिः प्रदातव्या धटद्वारेण केवला

tataste brāhmaṇāḥ procuryasya no jñāyate kulam tasya śuddhiḥ pradātavyā dhaṭadvāreṇa kevalā

तब उन ब्राह्मणों ने कहा — 'जिसका कुल इस प्रकार निश्चित रूप से ज्ञात नहीं होता, उसे शुद्धि केवल घट-द्वारा (जल-भरे घड़े में डुबकर) की परीक्षा से ही दी जा सकती है।'

श्लोक 165 (skanda.6.199.165)

स त्वं धटं समारुह्य ब्राह्मण्यार्थं च केवलम् शुद्धिं प्राप्य ततो भोगान्भुंक्ष्वात्रस्थोऽपि केवलम्

sa tvaṁ dhaṭaṁ samāruhya brāhmaṇyārthaṁ ca kevalam śuddhiṁ prāpya tato bhogānbhuṁkṣvātrastho'pi kevalam

'अतः तुम केवल ब्राह्मण्य-सिद्धि के लिए घट-परीक्षा में उतरो; शुद्धि प्राप्त कर, तत्पश्चात् ही यहाँ रहकर भोगों का उपभोग करो।'

श्लोक 166 (skanda.6.199.166)

सोऽब्रवीत्साहसं कृत्वा सर्वानेव द्विजोत्तमान् प्रतिगृह्णाम्यहं कामं तप्तमाषकमेव च

so'bravītsāhasaṁ kṛtvā sarvāneva dvijottamān pratigṛhṇāmyahaṁ kāmaṁ taptamāṣakameva ca

उसने साहस दिखाकर उन सब श्रेष्ठ ब्राह्मणों से कहा — 'मैं इच्छापूर्वक तपाया हुआ माषक भी स्वीकार करूँगा,'

श्लोक 167 (skanda.6.199.167)

प्रविशामि हुताशं वा भक्षयिष्याम्यहं विषम्

praviśāmi hutāśaṁ vā bhakṣayiṣyāmyahaṁ viṣam

'अथवा अग्नि में प्रवेश करूँगा, अथवा विष का भक्षण करूँगा।'

श्लोक 168 (skanda.6.199.168)

किं पुनर्धटदिव्यं च क्रियमाणे सुखावहम् ब्राह्मणस्य कृते विप्राश्चित्ते नो मामके घृणा

kiṁ punardhaṭadivyaṁ ca kriyamāṇe sukhāvaham brāhmaṇasya kṛte viprāścitte no māmake ghṛṇā

'फिर तो यह सुखकर घट-दिव्य करना तो कोई कठिन बात ही नहीं। हे विप्रो, ब्राह्मणत्व के प्रमाण हेतु मेरे मन में कोई घृणा नहीं है।'

श्लोक 169 (skanda.6.199.169)

अथ ते ब्राह्मणास्तस्य धटारोहणसंभवम् शुद्धिं निर्दिश्य वारं च सूर्यस्य च ततः परम् जग्मुः स्वंस्वं गृहं सर्वे सोऽपि विप्रोंऽत्यजो द्विजाः

atha te brāhmaṇāstasya dhaṭārohaṇasaṁbhavam śuddhiṁ nirdiśya vāraṁ ca sūryasya ca tataḥ param jagmuḥ svaṁsvaṁ gṛhaṁ sarve so'pi viproṁ'tyajo dvijāḥ

तब उन ब्राह्मणों ने उसकी घट-आरोहण द्वारा होने वाली शुद्धि की तिथि और दिन निश्चित करके, सब अपने-अपने घर लौट गए, और वह विप्र-वेषधारी अंत्यज भी अपने घर लौट गया।

श्लोक 170 (skanda.6.199.170)

ततः प्राह निजां भार्यां रहस्ये नृपसत्तम ज्ञातोऽहं ब्राह्मणैः सर्वैरंत्यजातिसमुद्भवः देशातरं गमिष्यामि त्वमागच्छ मया सह

tataḥ prāha nijāṁ bhāryāṁ rahasye nṛpasattama jñāto'haṁ brāhmaṇaiḥ sarvairaṁtyajātisamudbhavaḥ deśātaraṁ gamiṣyāmi tvamāgaccha mayā saha

हे नृपसत्तम, तब उसने एकांत में अपनी पत्नी से कहा — 'मैं समस्त ब्राह्मणों द्वारा अंत्यज-जाति में उत्पन्न होने के रूप में पहचान लिया गया हूँ। अब मैं दूसरे देश को जाऊँगा; तुम भी मेरे साथ चलो।'

श्लोक 171 (skanda.6.199.171)

भार्योवाच अहमग्निं प्रवेक्ष्यामि न यास्यामि त्वया सह पापबुद्धे पतिष्यामि न चाहं नरकाग्निषु

bhāryovāca ahamagniṁ pravekṣyāmi na yāsyāmi tvayā saha pāpabuddhe patiṣyāmi na cāhaṁ narakāgniṣu

उसकी पत्नी ने कहा — 'मैं अग्नि में प्रवेश कर जाऊँगी, किंतु तुम्हारे साथ नहीं जाऊँगी। हे पापबुद्धि, मैं नरक की अग्नि में नहीं गिरूँगी।'

श्लोक 172 (skanda.6.199.172)

बुध्यमाना न सेविष्ये त्वामंत्यजसमुद्भवम् पापसंदूषितं सर्वं त्वयैतत्स्थानमुत्तमम्

budhyamānā na seviṣye tvāmaṁtyajasamudbhavam pāpasaṁdūṣitaṁ sarvaṁ tvayaitatsthānamuttamam

'अब जानते हुए मैं तुम्हारी सेवा नहीं करूँगी, जो अंत्यज-कुल से उत्पन्न हो। तुमने पाप से इस संपूर्ण उत्तम स्थान को दूषित कर दिया है,'

श्लोक 173 (skanda.6.199.173)

तथा मम पितुर्हर्म्यं संवत्सरप्रयाजिनः तस्माद्द्रुततरं गच्छ यावन्नो वेत्ति कश्चन

tathā mama piturharmyaṁ saṁvatsaraprayājinaḥ tasmāddrutataraṁ gaccha yāvanno vetti kaścana

'और वार्षिक यज्ञ करने वाले मेरे पिता के घर को भी। अतः तुम शीघ्रतम यहाँ से चले जाओ, जब तक कोई और नहीं जानता।'

श्लोक 174 (skanda.6.199.174)

नो चेत्पापसमाचार संप्राप्स्यसि महाऽऽपदम्

no cetpāpasamācāra saṁprāpsyasi mahā''padam

'अन्यथा, हे पापाचारी, तुम भारी विपत्ति में पड़ोगे।'

श्लोक 175 (skanda.6.199.175)

ततो निशामुखे प्राप्ते कौपीनावरणान्वितः नष्टोऽभीष्टां दिशं प्राप्य तदा जीवितजाद्भयात्

tato niśāmukhe prāpte kaupīnāvaraṇānvitaḥ naṣṭo'bhīṣṭāṁ diśaṁ prāpya tadā jīvitajādbhayāt

तब रात्रि होते ही, केवल एक लंगोटी धारण किए हुए, अपने प्राणों के भय से, वह उस समय अपनी इच्छित दिशा में भाग गया, और लुप्त हो गया।

अध्याय 198अध्याय-सूचीअध्याय 200