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नागर खण्ड · अध्याय 200

भर्तृयज्ञकृत नागर-ज्ञाति-मर्यादा का वर्णन

अध्याय 199अध्याय-सूचीअध्याय 201

श्लोक 1 (skanda.6.200.1)

विश्वामित्र उवाच ततः प्रभाते संजाते प्रोद्गते रविमण्डले सा चापि दुहिता तस्य दीक्षितस्य महात्मनः

viśvāmitra uvāca tataḥ prabhāte saṁjāte prodgate ravimaṇḍale sā cāpi duhitā tasya dīkṣitasya mahātmanaḥ

विश्वामित्र ने कहा — तत्पश्चात् प्रातःकाल होने पर, सूर्यमंडल के उदित होने पर, उस महात्मा दीक्षित सुभद्र की वह पुत्री भी,

श्लोक 2 (skanda.6.200.2)

रोरूयमाणाऽभ्यगमत्पितरं मातरं प्रति प्रोवाच गद्गदं वाक्यं बाष्पव्याकुललोचना

rorūyamāṇā'bhyagamatpitaraṁ mātaraṁ prati provāca gadgadaṁ vākyaṁ bāṣpavyākulalocanā

रोती हुई अपने माता-पिता के पास पहुँची, और अश्रुओं से व्याकुल नेत्रों के साथ गद्गद वाणी में यह बोली।

श्लोक 3 (skanda.6.200.3)

ताताम्ब किमिदं पापं युवाभ्यां समनुष्ठितम् अन्त्यजस्य प्रदत्ताऽहं यत्पापस्य दुरात्मनः

tātāmba kimidaṁ pāpaṁ yuvābhyāṁ samanuṣṭhitam antyajasya pradattā'haṁ yatpāpasya durātmanaḥ

'हे तात, हे माता, आप दोनों से यह कैसा पाप हो गया कि मुझे उस पापी, दुरात्मा अंत्यज को दे दिया गया!'

श्लोक 4 (skanda.6.200.4)

स नष्टो रजनीवक्त्रे ममावेद्य निजं कुलम् तस्मादहं प्रवेक्ष्यामि प्रदीप्ते हव्यवाहने

sa naṣṭo rajanīvaktre mamāvedya nijaṁ kulam tasmādahaṁ pravekṣyāmi pradīpte havyavāhane

'वह अपना कुल मुझे बताकर रात्रि के मुख में ही भाग गया। अतः अब मैं प्रज्वलित अग्नि में प्रवेश करूँगी।'

श्लोक 5 (skanda.6.200.5)

तस्यास्तद्वचनं श्रुत्वा दीक्षितः स सुभद्रकः निश्चेष्टः पतितो भूमौ वातभग्न इव द्रुमः

tasyāstadvacanaṁ śrutvā dīkṣitaḥ sa subhadrakaḥ niśceṣṭaḥ patito bhūmau vātabhagna iva drumaḥ

उसका यह वचन सुनकर वह दीक्षित सुभद्रक निश्चेष्ट होकर पृथ्वी पर गिर पड़ा, जैसे वायु से टूटा हुआ वृक्ष।

श्लोक 6 (skanda.6.200.6)

ततः स शीततोयेन संसिक्तश्च पुनःपुनः लब्ध्वाशु चेतनां कृच्छ्रात्स्वजनैः परिवारितः प्रलापान्विविधांश्चक्रे ताडयन्स्वशिरो मुहुः

tataḥ sa śītatoyena saṁsiktaśca punaḥpunaḥ labdhvāśu cetanāṁ kṛcchrātsvajanaiḥ parivāritaḥ pralāpānvividhāṁścakre tāḍayansvaśiro muhuḥ

तत्पश्चात् बार-बार शीतल जल से सींचे जाने पर, कठिनाई से शीघ्र चेतना प्राप्त कर, अपने स्वजनों से घिरा हुआ वह, बार-बार अपने सिर को पीटते हुए विविध विलाप करने लगा।

श्लोक 7 (skanda.6.200.7)

अथ ते ब्राह्मणाः सर्वे तस्य संपर्कदूषिताः भर्तृयज्ञं समासाद्य तेनैव सहितास्ततः

atha te brāhmaṇāḥ sarve tasya saṁparkadūṣitāḥ bhartṛyajñaṁ samāsādya tenaiva sahitāstataḥ

तत्पश्चात् उसके संपर्क से दूषित हुए वे सभी ब्राह्मण, उसे साथ लेकर, भर्तृयज्ञ के पास गए,

श्लोक 8 (skanda.6.200.8)

प्रोचुर्विनयसंयुक्ताः प्रोच्चैस्तत्सुतया सह सुभद्रेण निजे हर्म्ये सुतां दत्त्वा निवेशितः

procurvinayasaṁyuktāḥ proccaistatsutayā saha subhadreṇa nije harmye sutāṁ dattvā niveśitaḥ

और उसकी पुत्री सहित, विनयपूर्वक ऊँचे स्वर में उनसे कहा — 'सुभद्र ने अपनी पुत्री देकर, अपने ही भवन में स्थापित कर लिया था —

श्लोक 9 (skanda.6.200.9)

चण्डालो द्विजरूपोत्र चंद्रप्रभ इति स्मृतः

caṇḍālo dvijarūpotra caṁdraprabha iti smṛtaḥ

यहाँ द्विज का रूप धारण किए हुए एक चांडाल को, जो चंद्रप्रभ नाम से जाना जाता था।'

श्लोक 10 (skanda.6.200.10)

यावत्संवत्सरं सार्धं दैवे पित्र्ये च योजितः पापकर्मा न विज्ञातः सोऽधुना प्रकटोऽभवत्

yāvatsaṁvatsaraṁ sārdhaṁ daive pitrye ca yojitaḥ pāpakarmā na vijñātaḥ so'dhunā prakaṭo'bhavat

'एक पूरे वर्ष तक वह देव और पितृ-कर्मों में लगा रहा। वह पापकर्मा किसी को ज्ञात न हो सका, किंतु अब वह प्रकट हो गया है।'

श्लोक 11 (skanda.6.200.11)

सुभद्रस्यानुषंगेण स्थानं सर्वं प्रदूषितम् अन्त्यजेन महाभाग तत्कुरुष्व विनिग्रहम्

subhadrasyānuṣaṁgeṇa sthānaṁ sarvaṁ pradūṣitam antyajena mahābhāga tatkuruṣva vinigraham

'सुभद्र के संबंध के कारण उस अंत्यज ने यह समूचा स्थान दूषित कर दिया है। हे महाभाग, इसका उचित निग्रह कीजिए।'

श्लोक 12 (skanda.6.200.12)

कैश्चित्तस्य गृहे भुक्तं जलं पीतं तथा परैः अन्यैश्च गृहमानीय प्रदत्तं भोजनं तथा

kaiścittasya gṛhe bhuktaṁ jalaṁ pītaṁ tathā paraiḥ anyaiśca gṛhamānīya pradattaṁ bhojanaṁ tathā

'किन्हीं ने उसके घर भोजन किया, अन्य ने जल पिया, तथा कुछ लोगों ने वहाँ से भोजन लाकर अपने घरों में परोसा भी है।'

श्लोक 13 (skanda.6.200.13)

किं वा ते बहुनोक्तेन न स कोऽस्ति द्विजोत्तम संकरो यस्य नो जातस्तस्य पापस्य संभवः

kiṁ vā te bahunoktena na sa ko'sti dvijottama saṁkaro yasya no jātastasya pāpasya saṁbhavaḥ

'हे द्विजोत्तम, अधिक कहने से क्या लाभ — यहाँ कोई भी ऐसा नहीं है जिसमें इस पाप से उत्पन्न संकर न हुआ हो।'

श्लोक 14 (skanda.6.200.14)

त्वया स्थानमिदं पुण्यं कृतं पूर्वं महामते सर्वेषां च गुरुस्त्वं हि तस्माच्छुद्धिं वदस्व नः

tvayā sthānamidaṁ puṇyaṁ kṛtaṁ pūrvaṁ mahāmate sarveṣāṁ ca gurustvaṁ hi tasmācchuddhiṁ vadasva naḥ

'हे महामते, यह पवित्र स्थान पहले आपके ही द्वारा बनाया गया था, और आप ही हम सबके गुरु हैं। अतः हमें शुद्धि का उपाय बताइए।'

श्लोक 15 (skanda.6.200.15)

ततः संचिन्त्य सुचिरं स्मृतिशास्त्राण्यनेकशः प्रायश्चित्तं ददौ तेषां सर्वेषां स द्विजन्मनाम्

tataḥ saṁcintya suciraṁ smṛtiśāstrāṇyanekaśaḥ prāyaścittaṁ dadau teṣāṁ sarveṣāṁ sa dvijanmanām

तब अनेक स्मृतिशास्त्रों पर बहुत देर तक विचार करके, उन्होंने उन सभी ब्राह्मणों के लिए प्रायश्चित्त निर्धारित किया।

श्लोक 16 (skanda.6.200.16)

चांद्रायणशतं प्रादात्सुभद्रायाहिताग्नये सर्वभंडपरित्यागं पुनराधानमेव च

cāṁdrāyaṇaśataṁ prādātsubhadrāyāhitāgnaye sarvabhaṁḍaparityāgaṁ punarādhānameva ca

अग्निहोत्री सुभद्र को उन्होंने सौ चांद्रायण व्रत, घर के समस्त बर्तनों के त्याग, तथा अग्नि के पुनः स्थापन का प्रायश्चित्त दिया।

श्लोक 17 (skanda.6.200.17)

लक्षहोमविधानं च गृहमध्यविशुद्धये वह्निप्रवेशनं तस्यास्तत्सुतायाः प्रकीर्तितम्

lakṣahomavidhānaṁ ca gṛhamadhyaviśuddhaye vahnipraveśanaṁ tasyāstatsutāyāḥ prakīrtitam

घर की शुद्धि के लिए एक लाख आहुतियों के होम की विधि बताई गई, तथा उसकी पुत्री के लिए अग्नि-प्रवेश का प्रायश्चित्त कहा गया।

श्लोक 18 (skanda.6.200.18)

येन यावंति भोज्यानि तस्य भुक्तानि मंदिरे तस्य तावंति कृच्छ्राणि तेनोक्तानि महात्मना

yena yāvaṁti bhojyāni tasya bhuktāni maṁdire tasya tāvaṁti kṛcchrāṇi tenoktāni mahātmanā

जिस-जिसने उस घर में जितने भोजन किए थे, उतने ही कृच्छ्र व्रत उस महात्मा द्वारा उसे बताए गए।

श्लोक 19 (skanda.6.200.19)

यैर्जलानि प्रपीतानि यावन्मात्राणि तद्गृहे प्राजापत्यानि दत्तानि तेभ्यस्तावंति पार्थिव

yairjalāni prapītāni yāvanmātrāṇi tadgṛhe prājāpatyāni dattāni tebhyastāvaṁti pārthiva

हे राजन्, जिन-जिन लोगों ने उस घर में जितनी मात्रा में जल पिया था, उन्हें उतने ही प्राजापत्य व्रत दिए गए।

श्लोक 20 (skanda.6.200.20)

ब्राह्मणानां तथान्येषां तत्र स्थाने निवासिनाम् तत्स्पर्शदूषितानां च प्राजापत्यं पृथक्पृथक्

brāhmaṇānāṁ tathānyeṣāṁ tatra sthāne nivāsinām tatsparśadūṣitānāṁ ca prājāpatyaṁ pṛthakpṛthak

उस स्थान में रहने वाले अन्य ब्राह्मणों तथा उसके स्पर्श से दूषित हुए अन्य लोगों को भी, पृथक्-पृथक् प्राजापत्य व्रत दिया गया।

श्लोक 21 (skanda.6.200.21)

स्त्रीशूद्राणां तदर्धं च तदर्ध बालवृद्धयोः मृन्मयानां च भांडानां परित्यागो निवेदितः

strīśūdrāṇāṁ tadardhaṁ ca tadardha bālavṛddhayoḥ mṛnmayānāṁ ca bhāṁḍānāṁ parityāgo niveditaḥ

स्त्रियों और शूद्रों के लिए उसका आधा, तथा बालकों और वृद्धों के लिए उसका भी आधा बताया गया। मिट्टी के बर्तनों के त्याग की भी आज्ञा दी गई।

श्लोक 22 (skanda.6.200.22)

सर्वेषामेव लोकानां रसत्यागस्तथैव च कोटिहोमस्तु निर्दिष्टो ब्रह्मस्थाने यथोदितः सर्वस्थानविशुद्ध्यर्थं स्थानवित्तेन केवलम्

sarveṣāmeva lokānāṁ rasatyāgastathaiva ca koṭihomastu nirdiṣṭo brahmasthāne yathoditaḥ sarvasthānaviśuddhyarthaṁ sthānavittena kevalam

समस्त लोगों के लिए कुछ रसों के त्याग का भी विधान किया गया। तथा संपूर्ण स्थान की शुद्धि के लिए, केवल स्थानीय समुदाय के धन से ही, ब्रह्मस्थान में एक करोड़ आहुतियों के होम का निर्देश दिया गया।

श्लोक 23 (skanda.6.200.23)

अथोवाच पुनर्विप्रान्स कृत्वा चोच्छ्रितं भुजम् तारनादेन महता सर्वांस्तान्नागरोद्भवान्

athovāca punarviprānsa kṛtvā cocchritaṁ bhujam tāranādena mahatā sarvāṁstānnāgarodbhavān

तत्पश्चात् उन्होंने अपनी भुजा ऊँची उठाकर, ऊँचे स्वर में पुनः उन समस्त नागर-समुदाय के ब्राह्मणों को संबोधित किया।

श्लोक 24 (skanda.6.200.24)

सुभद्रेण च सर्वस्वं देयं विप्रेभ्य एव च चतुर्थांशश्च यैर्भुक्तं तद्गृहे स्वधनस्य च

subhadreṇa ca sarvasvaṁ deyaṁ viprebhya eva ca caturthāṁśaśca yairbhuktaṁ tadgṛhe svadhanasya ca

'सुभद्र को अपना संपूर्ण धन ब्राह्मणों को देना चाहिए। जिन्होंने उस घर में भोजन किया है, उन्हें अपने धन का चौथाई भाग देना चाहिए।'

श्लोक 25 (skanda.6.200.25)

अष्टांशं यैर्जलं पीतं गोदानं स्पर्शसंभवम् शेषाणामपि लोकानां यथाशक्त्या तु दक्षिणा

aṣṭāṁśaṁ yairjalaṁ pītaṁ godānaṁ sparśasaṁbhavam śeṣāṇāmapi lokānāṁ yathāśaktyā tu dakṣiṇā

'जिन्होंने जल पिया है, वे आठवाँ भाग दें। स्पर्शमात्र से हुए दोष के लिए गौदान करना चाहिए। शेष लोगों को अपनी सामर्थ्य के अनुसार दक्षिणा देनी चाहिए।'

श्लोक 26 (skanda.6.200.26)

दीक्षितेन जपः कार्यो लक्षगायत्रिसंभवः शेषैर्विप्रैर्यथा वित्तं तथा कार्यो जपोऽखिलः

dīkṣitena japaḥ kāryo lakṣagāyatrisaṁbhavaḥ śeṣairviprairyathā vittaṁ tathā kāryo japo'khilaḥ

'दीक्षित सुभद्र को एक लाख गायत्री-जप करना चाहिए। शेष ब्राह्मणों को अपनी-अपनी सामर्थ्य के अनुसार संपूर्ण जप करना चाहिए।'

श्लोक 27 (skanda.6.200.27)

अहं चैव करिष्यामि प्राणायामशतत्रयम् नित्यमेव द्विजश्रेष्ठाः षष्ठकालकृताशनः

ahaṁ caiva kariṣyāmi prāṇāyāmaśatatrayam nityameva dvijaśreṣṭhāḥ ṣaṣṭhakālakṛtāśanaḥ

'और मैं स्वयं भी, हे द्विजश्रेष्ठो, नित्य तीन सौ प्राणायाम करूँगा तथा छठे समय ही भोजन करूँगा,'

श्लोक 28 (skanda.6.200.28)

यावत्संवत्सरस्यांतं ततः शुद्धिर्भविष्यति जनसंपर्कसंजाता सैवं तस्य दुरात्मनः

yāvatsaṁvatsarasyāṁtaṁ tataḥ śuddhirbhaviṣyati janasaṁparkasaṁjātā saivaṁ tasya durātmanaḥ

'वर्ष के अंत तक, जिससे उस दुरात्मा के संपर्क से उत्पन्न यह दोष इस प्रकार शुद्ध हो सके।'

श्लोक 29 (skanda.6.200.29)

एवमुक्त्वा ततो भूयः स प्रोवाच द्विजोत्तमान् अथाऽऽद्यान्मध्यगास्येन ब्रह्मस्थानसमाश्रयान्

evamuktvā tato bhūyaḥ sa provāca dvijottamān athā''dyānmadhyagāsyena brahmasthānasamāśrayān

इस प्रकार कहकर, उन्होंने फिर से मध्यस्थ के मुख द्वारा, ब्रह्मस्थान में एकत्रित उन श्रेष्ठ ब्राह्मणों को संबोधित किया।

श्लोक 30 (skanda.6.200.30)

अद्यप्रभृति यः कन्यामविदित्वा तु नागरम् नागरो दास्यति क्वापि पतितः स भविष्यति

adyaprabhṛti yaḥ kanyāmaviditvā tu nāgaram nāgaro dāsyati kvāpi patitaḥ sa bhaviṣyati

'आज से जो भी नागर, बिना यह जाने कि वर वास्तव में नागर है, अपनी कन्या कहीं भी दे देगा, वह पतित हो जाएगा।'

श्लोक 31 (skanda.6.200.31)

अश्राद्धेयो ह्यपांक्तेयो नागराणां विशेषतः

aśrāddheyo hyapāṁkteyo nāgarāṇāṁ viśeṣataḥ

'वह विशेषतः नागरों में श्राद्ध के अयोग्य और पंक्ति-बहिष्कृत हो जाएगा।'

श्लोक 32 (skanda.6.200.32)

यः श्राद्धं नागरं मुक्त्वा ह्यन्यस्मै संप्रदास्यति विमुखास्तस्य यास्यंति पितरो विबुधैः सह

yaḥ śrāddhaṁ nāgaraṁ muktvā hyanyasmai saṁpradāsyati vimukhāstasya yāsyaṁti pitaro vibudhaiḥ saha

'जो नागर को छोड़कर किसी अन्य को श्राद्ध का भार सौंपेगा, उसके पितर देवताओं सहित उससे विमुख हो जाएँगे।'

श्लोक 33 (skanda.6.200.33)

नागरेण विना यस्तु सोमपानं करिष्यति स करिष्यत्यसंदिग्धं मद्यपानं तु नागरः तन्मतेन विना यस्तु श्राद्धकर्म करिष्यति

nāgareṇa vinā yastu somapānaṁ kariṣyati sa kariṣyatyasaṁdigdhaṁ madyapānaṁ tu nāgaraḥ tanmatena vinā yastu śrāddhakarma kariṣyati

'जो नागर के बिना सोमपान करेगा, वह निःसंदेह मद्यपान के समान ही कर्म करेगा। जो नागर की सम्मति के बिना श्राद्धकर्म करेगा,'

श्लोक 34 (skanda.6.200.34)

ततः सर्वं वृथा तस्य भविष्यति न संशयः विशुद्धिरहितं यस्तु नागरं भोजयिष्यति

tataḥ sarvaṁ vṛthā tasya bhaviṣyati na saṁśayaḥ viśuddhirahitaṁ yastu nāgaraṁ bhojayiṣyati

'उसका वह सब कर्म निःसंदेह व्यर्थ हो जाएगा। और जो शुद्धि से रहित नागर को भोजन कराएगा,'

श्लोक 35 (skanda.6.200.35)

श्राद्धे तस्यापि तत्सर्वं व्यर्थतां संप्रयास्यति सर्वेषां नागराणां च मर्यादेयं कृता मया

śrāddhe tasyāpi tatsarvaṁ vyarthatāṁ saṁprayāsyati sarveṣāṁ nāgarāṇāṁ ca maryādeyaṁ kṛtā mayā

'उसका भी वह संपूर्ण श्राद्ध व्यर्थ हो जाएगा। यह मर्यादा मेरे द्वारा समस्त नागरों के लिए स्थापित की गई है।'

श्लोक 36 (skanda.6.200.36)

तस्मात्सर्वप्रयत्नेन शुद्धिः कार्या द्विजोत्तमैः वर्षेवर्षे तु संप्राप्ते स्वस्थानस्य विशुद्धये

tasmātsarvaprayatnena śuddhiḥ kāryā dvijottamaiḥ varṣevarṣe tu saṁprāpte svasthānasya viśuddhaye

'अतः श्रेष्ठ ब्राह्मणों को सर्वप्रकार के प्रयत्न से, वर्ष-वर्ष अपने स्थान की शुद्धि के लिए यह शुद्धि-कर्म करना चाहिए।'

श्लोक 37 (skanda.6.200.37)

विश्वामित्र उवाच एतत्ते सर्वमाख्यातं यत्पृष्टोऽस्मि नृपोत्तम श्राद्धार्हा नागरा येन नागराणां व्यवस्थिताः भर्तृयज्ञेन मर्यादा कृता तेषां यथा पुरा

viśvāmitra uvāca etatte sarvamākhyātaṁ yatpṛṣṭo'smi nṛpottama śrāddhārhā nāgarā yena nāgarāṇāṁ vyavasthitāḥ bhartṛyajñena maryādā kṛtā teṣāṁ yathā purā

विश्वामित्र ने कहा — हे नृपोत्तम, आपने जो पूछा था, वह सब मैंने बता दिया — किस प्रकार अष्टकुल के नागर, नागरों में श्राद्ध के योग्य के रूप में स्थापित हुए, और भर्तृयज्ञ द्वारा पूर्वकाल में उनके लिए यह मर्यादा किस प्रकार बनाई गई।

अध्याय 199अध्याय-सूचीअध्याय 201