नागर खण्ड · अध्याय 201
नागर-प्रश्न-निर्णय का वर्णन
श्लोक 1 (skanda.6.201.1)
विश्वामित्र उवाच अथ ते ब्राह्मणाः सर्वे भर्तृयज्ञं महामतिम् कृतांजलिपुटा भूत्वा स्तुतिं कृत्वा वचोऽब्रुवन्
viśvāmitra uvāca atha te brāhmaṇāḥ sarve bhartṛyajñaṁ mahāmatim kṛtāṁjalipuṭā bhūtvā stutiṁ kṛtvā vaco'bruvan
विश्वामित्र ने कहा — तत्पश्चात् वे सभी ब्राह्मण, हाथ जोड़कर, महामति भर्तृयज्ञ की स्तुति करके यह वचन बोले।
श्लोक 2 (skanda.6.201.2)
यदेतद्भवता प्रोक्तं शोधितो यो भवेद्द्विजः श्राद्धस्य कन्यकायाश्च सोमपानस्य सोऽर्हति
yadetadbhavatā proktaṁ śodhito yo bhaveddvijaḥ śrāddhasya kanyakāyāśca somapānasya so'rhati
'आपने जो यह कहा कि जो ब्राह्मण शुद्ध घोषित हो जाता है, वह श्राद्ध का, कन्या-दान का, तथा सोमपान का अधिकारी होता है,'
श्लोक 3 (skanda.6.201.3)
कथं शुद्धिः प्रकर्तव्या तस्य सर्वं ब्रवीहि नः नागरस्य समस्तस्य देशांतरगतस्य च
kathaṁ śuddhiḥ prakartavyā tasya sarvaṁ bravīhi naḥ nāgarasya samastasya deśāṁtaragatasya ca
'तो उसकी शुद्धि कैसे की जानी चाहिए, यह सब हमें बताइए — प्रत्येक नागर के लिए, चाहे वह किसी अन्य देश को गया हो,'
श्लोक 4 (skanda.6.201.4)
देशांतरप्रजातस्य तत्र जातस्य वा पुनः अज्ञातपितृवर्गस्य सामान्यं पदमिच्छतः
deśāṁtaraprajātasya tatra jātasya vā punaḥ ajñātapitṛvargasya sāmānyaṁ padamicchataḥ
'अथवा किसी अन्य देश में उत्पन्न हुआ हो, अथवा यहीं उत्पन्न हुआ हो, जिसका पितृ-कुल अज्ञात हो, और जो सामान्य पद की इच्छा रखता हो।'
श्लोक 5 (skanda.6.201.5)
एतन्नः सर्वमाचक्ष्व विस्तरेण महामते
etannaḥ sarvamācakṣva vistareṇa mahāmate
'हे महामते, यह सब हमें विस्तार से बताइए।'
श्लोक 6 (skanda.6.201.6)
विश्वामित्र उवाच तेषां तद्वचनं श्रुत्वा ब्राह्मणानां नृपोत्तम अब्रवीद्भर्तृयज्ञस्तु स्वाभिप्रायं सुसंमतम्
viśvāmitra uvāca teṣāṁ tadvacanaṁ śrutvā brāhmaṇānāṁ nṛpottama abravīdbhartṛyajñastu svābhiprāyaṁ susaṁmatam
विश्वामित्र ने कहा — हे नृपोत्तम, उन ब्राह्मणों का यह वचन सुनकर भर्तृयज्ञ ने अपना सुविचारित मत बताया।
श्लोक 7 (skanda.6.201.7)
भर्तृयज्ञ उवाच प्रश्नभारो महानेष भवद्भिः समुदाहृतः तथापि कथयिष्यामि नमस्कृत्य स्वयंभुवम्
bhartṛyajña uvāca praśnabhāro mahāneṣa bhavadbhiḥ samudāhṛtaḥ tathāpi kathayiṣyāmi namaskṛtya svayaṁbhuvam
भर्तृयज्ञ ने कहा — 'आपने यह जो प्रश्न उठाया है, वह भारी है। फिर भी स्वयंभू को नमस्कार करके मैं इसे बताऊँगा।'
श्लोक 8 (skanda.6.201.8)
अज्ञातपितृवंशो यो दूरादपि समागतः सामान्यं वांछते पद्यं नागरोऽस्मीति कीर्तयन्
ajñātapitṛvaṁśo yo dūrādapi samāgataḥ sāmānyaṁ vāṁchate padyaṁ nāgaro'smīti kīrtayan
'जो पितृवंश से अज्ञात होते हुए भी दूर से आया हो, और स्वयं को नागर कहते हुए सामान्य पद की इच्छा रखता हो,'
श्लोक 9 (skanda.6.201.9)
तस्य शुद्धिः प्रदा तव्या मुख्यैः शांतैः शुभैर्द्विजैः गर्तातीर्थोद्भवं विप्रं कृत्वा चैव पुरःसरम्
tasya śuddhiḥ pradā tavyā mukhyaiḥ śāṁtaiḥ śubhairdvijaiḥ gartātīrthodbhavaṁ vipraṁ kṛtvā caiva puraḥsaram
'उसकी शुद्धि प्रमुख, शांत, शुभ ब्राह्मणों द्वारा प्रदान की जानी चाहिए, गर्ता-तीर्थ से उत्पन्न ब्राह्मण को उनमें अग्रणी बनाकर।'
श्लोक 10 (skanda.6.201.10)
विशुद्धिं याचमानस्य यदि यच्छंति नो द्विजाः कामाद्वा यदि वा क्रोधात्प्रद्वेषाद्वा च्युतेर्भयात्
viśuddhiṁ yācamānasya yadi yacchaṁti no dvijāḥ kāmādvā yadi vā krodhātpradveṣādvā cyuterbhayāt
'यदि विशुद्धि माँगने वाले को ब्राह्मण, काम, क्रोध, द्वेष, अथवा अपनी प्रतिष्ठा-हानि के भय से, वह शुद्धि नहीं देते,'
श्लोक 11 (skanda.6.201.11)
ब्रह्महत्योद्भवं पापं सर्वेषां तत्र जायते तस्मादभ्यागतो यस्तु दूरादपि विशेषतः
brahmahatyodbhavaṁ pāpaṁ sarveṣāṁ tatra jāyate tasmādabhyāgato yastu dūrādapi viśeṣataḥ
'तो उन सबको वहाँ ब्रह्महत्या से उत्पन्न पाप लगता है। अतः जो भी विशेषतः दूर से आया हो,'
श्लोक 12 (skanda.6.201.12)
तस्य शुद्धिः प्रदातव्या प्रयत्नेन द्विजोत्तमैः शुद्धिं तु त्रिविधां प्राप्तो मम वाक्यसमुद्भवाम्
tasya śuddhiḥ pradātavyā prayatnena dvijottamaiḥ śuddhiṁ tu trividhāṁ prāpto mama vākyasamudbhavām
'उसकी शुद्धि श्रेष्ठ ब्राह्मणों द्वारा प्रयत्नपूर्वक प्रदान की जानी चाहिए। मेरे इस कथन से उत्पन्न त्रिविध शुद्धि को प्राप्त करके,'
श्लोक 13 (skanda.6.201.13)
स शुद्धो नागरो ज्ञेयो जातो देशांतरेष्वपि पूर्वं विशोधयेद्वंशं ततो मातृकुलं स्मृतम्
sa śuddho nāgaro jñeyo jāto deśāṁtareṣvapi pūrvaṁ viśodhayedvaṁśaṁ tato mātṛkulaṁ smṛtam
'वह अन्य देश में उत्पन्न होने पर भी शुद्ध नागर माना जाता है। पहले वंश की शुद्धि करनी चाहिए, फिर मातृकुल की — ऐसा कहा गया है।'
श्लोक 14 (skanda.6.201.14)
ततः शीलं त्रिभिः शुद्धः सामान्यं पदमर्हति
tataḥ śīlaṁ tribhiḥ śuddhaḥ sāmānyaṁ padamarhati
'तत्पश्चात् शील (आचरण) — इन तीनों से शुद्ध होकर वह सामान्य पद का अधिकारी हो जाता है।'
श्लोक 15 (skanda.6.201.15)
सर्वेषामपि विप्राणां वर्षांते समुपस्थिते शुद्धिः कार्या प्रयत्नेन स्वस्थानस्य विशुद्धये
sarveṣāmapi viprāṇāṁ varṣāṁte samupasthite śuddhiḥ kāryā prayatnena svasthānasya viśuddhaye
'समस्त ब्राह्मणों के लिए भी, वर्ष का अंत आने पर, अपने स्थान की शुद्धि के लिए प्रयत्नपूर्वक शुद्धि-कर्म करना चाहिए।'
श्लोक 16 (skanda.6.201.16)
तदर्थं शरदश्चांते शुभर्त्तौ ब्राह्मणोत्तमाः चातुश्चरणसंपन्नाः संस्थाप्याः षोडशैव तु
tadarthaṁ śaradaścāṁte śubharttau brāhmaṇottamāḥ cātuścaraṇasaṁpannāḥ saṁsthāpyāḥ ṣoḍaśaiva tu
'हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो, इसके लिए शरद ऋतु के अंत में, शुभ ऋतु में, चारों वेदशाखाओं में निपुण सोलह ब्राह्मणों को ही बिठाना चाहिए।'
श्लोक 17 (skanda.6.201.17)
ब्राह्मणाः पुरतः सर्वे शांता दांता जितेंद्रियाः गर्त्तातीर्थोद्भवं विप्रं तेषां मध्ये निवेशयेत्
brāhmaṇāḥ purataḥ sarve śāṁtā dāṁtā jiteṁdriyāḥ garttātīrthodbhavaṁ vipraṁ teṣāṁ madhye niveśayet
'सभी शांत, संयमी, जितेंद्रिय ब्राह्मणों को आगे बिठाना चाहिए, और उनके मध्य गर्ता-तीर्थ से उत्पन्न ब्राह्मण को स्थापित करना चाहिए।'
श्लोक 18 (skanda.6.201.18)
तदग्रे पीठिका देयाश्चतस्रो लक्षणान्विताः यावत्कार्त्तिकपर्यंतं चातुश्चरणकल्पिताः
tadagre pīṭhikā deyāścatasro lakṣaṇānvitāḥ yāvatkārttikaparyaṁtaṁ cātuścaraṇakalpitāḥ
'उसके सामने, कार्तिक मास तक, चारों वेदशाखाओं के लिए निर्धारित, शुभ लक्षणों से युक्त चार पीठिकाएँ रखनी चाहिए।'
श्लोक 19 (skanda.6.201.19)
प्रथमा बह्वृचस्यार्थे याजुषस्य तथाऽपरा सामगस्य तथैवान्या तथाऽऽद्यस्य चतुर्थिका
prathamā bahvṛcasyārthe yājuṣasya tathā'parā sāmagasya tathaivānyā tathā''dyasya caturthikā
'पहली ऋग्वेदी के लिए, दूसरी यजुर्वेदी के लिए, तीसरी वैसे ही सामवेदी के लिए, और चौथी प्रथम (सामान्य आचार्य) के लिए।'
श्लोक 20 (skanda.6.201.20)
मुद्रिकार्थं तथैवान्या पंचमी परिकीर्तिता श्रीसूक्तं पावमानं च शाकुनं विष्णुदैवतम्
mudrikārthaṁ tathaivānyā paṁcamī parikīrtitā śrīsūktaṁ pāvamānaṁ ca śākunaṁ viṣṇudaivatam
'और वैसे ही मुद्रिका (सील) के लिए पाँचवीं पीठिका कही गई है। वह श्रीसूक्त, पावमान सूक्त, तथा विष्णु-देवता वाला शाकुन सूक्त,'
श्लोक 21 (skanda.6.201.21)
पारावतं तथा सूक्तं जीवसूक्तेन संयुतम् बह्वृचः कीर्तयेत्तत्र शांतिकं च तथापरम्
pārāvataṁ tathā sūktaṁ jīvasūktena saṁyutam bahvṛcaḥ kīrtayettatra śāṁtikaṁ ca tathāparam
'तथा पारावत सूक्त, जीव-सूक्त के साथ मिलाकर — इन्हें ऋग्वेदी पाठ करे, तथा अन्य शांतिक सूक्तों को भी।'
श्लोक 22 (skanda.6.201.22)
शांतिकं शिवसंकल्पमृषिकल्पं चतुर्विधम् मंडलंब्राह्मणं चैव गायत्रीब्राह्मणं तथा
śāṁtikaṁ śivasaṁkalpamṛṣikalpaṁ caturvidham maṁḍalaṁbrāhmaṇaṁ caiva gāyatrībrāhmaṇaṁ tathā
'शांतिक शिवसंकल्प सूक्त, चतुर्विध ऋषिकल्प, मंडल-ब्राह्मण, तथा गायत्री-ब्राह्मण —
श्लोक 23 (skanda.6.201.23)
तथा पुरुषसूक्तं च मधुब्राह्मणमेव च अध्वर्युः कीर्तयेत्तत्र रुद्रान्पंचांगसंयुतान्
tathā puruṣasūktaṁ ca madhubrāhmaṇameva ca adhvaryuḥ kīrtayettatra rudrānpaṁcāṁgasaṁyutān
और पुरुषसूक्त तथा मधु-ब्राह्मण — इन्हें अध्वर्यु पाठ करे, रुद्राध्याय को उसके पाँचों अंगों सहित।
श्लोक 24 (skanda.6.201.24)
देवव्रतं च गायत्रं सोमसूर्यव्रते तथा एकविंशतिपर्यंतं तथान्यच्च रथंतरम्
devavrataṁ ca gāyatraṁ somasūryavrate tathā ekaviṁśatiparyaṁtaṁ tathānyacca rathaṁtaram
'देवव्रत, गायत्र-साम, सोम और सूर्य-व्रत, इक्कीसवें तक, तथा अन्य रथंतर-साम भी —
श्लोक 25 (skanda.6.201.25)
सौव्रतं संहिता विष्णोर्ज्येष्ठसाम तथैव च सामवेदोक्तरुद्रांश्च भारुंडैः सामभिर्युतान्
sauvrataṁ saṁhitā viṣṇorjyeṣṭhasāma tathaiva ca sāmavedoktarudrāṁśca bhāruṁḍaiḥ sāmabhiryutān
सौव्रत, विष्णु-संहिता, वैसे ही ज्येष्ठ-साम, तथा सामवेद में कहे गए रुद्रों को भारुंड-सामों सहित —
श्लोक 26 (skanda.6.201.26)
छंदोगः कीर्तयेत्तत्र यच्चान्यच्छांतिकं भवेत् गर्भोपनिषदं चैव स्कंदसूक्तं तथापरम्
chaṁdogaḥ kīrtayettatra yaccānyacchāṁtikaṁ bhavet garbhopaniṣadaṁ caiva skaṁdasūktaṁ tathāparam
इन्हें छंदोग पाठ करे, और अन्य जो भी शांतिक हो, गर्भोपनिषद तथा स्कंद-सूक्त भी।
श्लोक 27 (skanda.6.201.27)
नीलरुद्रैः समोपेतान्प्राणरुद्रांस्तथापरान् नवरुद्रांश्च क्षुरिकानाद्यस्तत्र प्रकीर्तयेत्
nīlarudraiḥ samopetānprāṇarudrāṁstathāparān navarudrāṁśca kṣurikānādyastatra prakīrtayet
नीलरुद्रों सहित, अन्य प्राणरुद्रों को, तथा नवरुद्र और क्षुरिका सूक्तों को — इन्हें वहाँ प्रथम आचार्य पाठ करे।
श्लोक 28 (skanda.6.201.28)
ततः पुण्याहघोषेण गीतवादित्रनिस्वनैः शुक्लमाल्यांबरधरः शुक्लचंदनचर्चितः
tataḥ puṇyāhaghoṣeṇa gītavāditranisvanaiḥ śuklamālyāṁbaradharaḥ śuklacaṁdanacarcitaḥ
तत्पश्चात्, 'पुण्याहम्' की घोषणा के साथ, गीत-वाद्य के स्वरों के साथ, श्वेत माला-वस्त्र धारण किए हुए, श्वेत चंदन से चर्चित,
श्लोक 29 (skanda.6.201.29)
शुद्धिकामो व्रजेत्तत्र यत्र ते ब्राह्मणाः स्थिताः प्रणम्य शिरसा तेषां ततोवाच्यस्तु मध्यगः
śuddhikāmo vrajettatra yatra te brāhmaṇāḥ sthitāḥ praṇamya śirasā teṣāṁ tatovācyastu madhyagaḥ
शुद्धि का इच्छुक वहाँ जाए जहाँ वे ब्राह्मण स्थित हों, और उन्हें सिर झुकाकर प्रणाम करे; तत्पश्चात् मध्यस्थ द्वारा उससे यह कहा जाना चाहिए —
श्लोक 30 (skanda.6.201.30)
मदर्थं प्रार्थय त्वं हि सर्वानेतान्द्विजोत्तमान् यतः शुद्धिं प्रयच्छंति प्रसादं कर्तुमर्हसि
madarthaṁ prārthaya tvaṁ hi sarvānetāndvijottamān yataḥ śuddhiṁ prayacchaṁti prasādaṁ kartumarhasi
'तुम मेरी ओर से इन सभी श्रेष्ठ ब्राह्मणों से प्रार्थना करो, जिससे वे कृपा करके शुद्धि प्रदान करें।'
श्लोक 31 (skanda.6.201.31)
ततस्तु प्रार्थयेद्विप्रांस्तदर्थं च विशुद्धये गर्तातीर्थोद्भवो विप्रो विनयावनतः स्थितः
tatastu prārthayedviprāṁstadarthaṁ ca viśuddhaye gartātīrthodbhavo vipro vinayāvanataḥ sthitaḥ
तब गर्ता-तीर्थ से उत्पन्न वह ब्राह्मण, विनयपूर्वक झुककर, उस विशुद्धि के लिए ब्राह्मणों से प्रार्थना करे।
श्लोक 32 (skanda.6.201.32)
गोचर्मणि समालग्नः शुद्धिकामस्य तस्य च प्रष्टव्यास्तु ततस्तेन सर्व एव द्विजोत्तमाः
gocarmaṇi samālagnaḥ śuddhikāmasya tasya ca praṣṭavyāstu tatastena sarva eva dvijottamāḥ
गोचर्म पर खड़े होकर, उस शुद्धि के इच्छुक की ओर से, वह उन समस्त श्रेष्ठ ब्राह्मणों से यह पूछे —
श्लोक 33 (skanda.6.201.33)
एष शुद्धिकृते प्राप्तः सुदूरान्नागरो द्विजः अस्य शुद्धिः प्रदातव्या युष्माकं रोचते यदि
eṣa śuddhikṛte prāptaḥ sudūrānnāgaro dvijaḥ asya śuddhiḥ pradātavyā yuṣmākaṁ rocate yadi
'यह नागर ब्राह्मण अत्यंत दूर से शुद्धि के लिए यहाँ आया है। यदि आपको स्वीकार हो, तो इसे शुद्धि प्रदान करें।'
श्लोक 34 (skanda.6.201.34)
अथ तैर्वेदसूक्तेन निषेधो वा प्रवर्तनम् वक्तव्यं वचसा नैव मम वाक्यमिदं स्थितम्
atha tairvedasūktena niṣedho vā pravartanam vaktavyaṁ vacasā naiva mama vākyamidaṁ sthitam
'तत्पश्चात् उनके द्वारा निषेध अथवा स्वीकृति वेद-सूक्त द्वारा ही व्यक्त की जानी चाहिए, [सामान्य] वचन से कदापि नहीं — यह मेरा निश्चित नियम है।'
श्लोक 35 (skanda.6.201.35)
ततश्च बहुलान्दृष्ट्वा ऋगध्वर्यूंस्ततः परम् छादोग्यांश्च तथाद्यांश्च क्रमेण तु द्विजोत्तमाः
tataśca bahulāndṛṣṭvā ṛgadhvaryūṁstataḥ param chādogyāṁśca tathādyāṁśca krameṇa tu dvijottamāḥ
'हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो, तत्पश्चात् बहुसंख्यक ऋग्वेदियों को, फिर अध्वर्युओं को, फिर छांदोग्यों तथा प्रथम आचार्यों को, क्रमशः देखकर,'
श्लोक 36 (skanda.6.201.36)
यदि तेषां मनस्तुष्टिर्जायते द्विजसत्तमाः ततः सूक्तानि वाक्यानि सौम्यानि सुशुभानि च वारुणानि तथैंद्राणि मांगल्यप्रभवाणि च
yadi teṣāṁ manastuṣṭirjāyate dvijasattamāḥ tataḥ sūktāni vākyāni saumyāni suśubhāni ca vāruṇāni tathaiṁdrāṇi māṁgalyaprabhavāṇi ca
'हे द्विजसत्तमो, यदि उनके मन में संतोष उत्पन्न होता है, तो उनके द्वारा उच्चारित सूक्त और वाक्य सौम्य और अत्यंत शुभ होंगे — वरुण और इंद्र संबंधी, मंगल से उत्पन्न,'
श्लोक 37 (skanda.6.201.37)
श्रेष्ठानि मंत्रलिंगानि वृद्धितुष्टिकराणि च यदि नो मानसी तुष्टिस्तेषां चैव प्रजायते
śreṣṭhāni maṁtraliṁgāni vṛddhituṣṭikarāṇi ca yadi no mānasī tuṣṭisteṣāṁ caiva prajāyate
'श्रेष्ठ मंत्र-लक्षणों वाले, वृद्धि और संतोष देने वाले। किंतु यदि उनके मन में संतोष उत्पन्न न हो,'
श्लोक 38 (skanda.6.201.38)
तदा रौद्राणि याम्यानि नैर्ऋत्यानि विशेषतः आग्नेयानि त्वनिष्टानि तथा नाशकराणि च
tadā raudrāṇi yāmyāni nairṛtyāni viśeṣataḥ āgneyāni tvaniṣṭāni tathā nāśakarāṇi ca
'तो तब रुद्र, यम, तथा विशेषतः निर्ऋति संबंधी, तथा अग्नि संबंधी अनिष्टकारी और नाशकारी सूक्त उच्चारित होंगे।'
श्लोक 39 (skanda.6.201.39)
अथ ये तत्र मूर्खाः स्युर्न वेदपठने रताः पुष्पदानं तु वक्तव्यं तैः संतुष्टैर्द्विजोत्तमैः
atha ye tatra mūrkhāḥ syurna vedapaṭhane ratāḥ puṣpadānaṁ tu vaktavyaṁ taiḥ saṁtuṣṭairdvijottamaiḥ
'और जो श्रेष्ठ ब्राह्मण वहाँ वेदपाठ में अनभिज्ञ हों, उन्हें संतुष्ट होने पर पुष्प अर्पित करके अपनी स्वीकृति व्यक्त करनी चाहिए।'
श्लोक 40 (skanda.6.201.40)
सीत्कारः कुपितैः कार्यः संतोषेण विवर्जितैः एवं सर्वेषु कृत्येषु न च कार्यो विनिर्णयः
sītkāraḥ kupitaiḥ kāryaḥ saṁtoṣeṇa vivarjitaiḥ evaṁ sarveṣu kṛtyeṣu na ca kāryo vinirṇayaḥ
'और जो असंतुष्ट, क्रुद्ध हों, उन्हें केवल सीत्कार (अस्वीकृति की ध्वनि) करनी चाहिए। इस प्रकार, इन समस्त कृत्यों में साधारण वचनों से निर्णय कभी नहीं करना चाहिए —'
श्लोक 41 (skanda.6.201.41)
प्राकृतैर्वचनैश्चैव यथा कुर्वंति मानवाः तथैव निर्णयस्यांते मध्यगेन विपश्चिता
prākṛtairvacanaiścaiva yathā kurvaṁti mānavāḥ tathaiva nirṇayasyāṁte madhyagena vipaścitā
'— जैसा साधारण मनुष्य करते हैं। इसी प्रकार [संकेतों के आधार पर ही], अंत में विद्वान मध्यस्थ द्वारा निर्णय सुनाया जाना चाहिए।'
श्लोक 42 (skanda.6.201.42)
देयं तालत्रयं सम्यक्सर्वेषां निर्णयोद्भवे
deyaṁ tālatrayaṁ samyaksarveṣāṁ nirṇayodbhave
'और जब सबकी सम्मति से यह निर्णय भलीभाँति निकल आए, तब तीन बार ताली बजाई जानी चाहिए।'