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नागर खण्ड · अध्याय 202

भर्तृयज्ञ-वाक्य-निर्णय का वर्णन

अध्याय 201अध्याय-सूचीअध्याय 203

श्लोक 1 (skanda.6.202.1)

विश्वामित्र उवाच तच्छ्रुत्वा ब्राह्मणाः सर्वे विनयावनताः स्थिताः तं पप्रच्छुर्नरश्रेष्ठ कौतुकाविष्टचेतसः

viśvāmitra uvāca tacchrutvā brāhmaṇāḥ sarve vinayāvanatāḥ sthitāḥ taṁ papracchurnaraśreṣṭha kautukāviṣṭacetasaḥ

विश्वामित्र ने कहा — हे नरश्रेष्ठ, यह सुनकर सभी ब्राह्मण विनयपूर्वक झुककर खड़े हुए, और कुतूहल से भरे चित्त से उनसे यह पूछने लगे।

श्लोक 2 (skanda.6.202.2)

कस्यचिन्निर्णयो देयो मध्यस्थस्य द्विजोत्तमैः वेदवाक्येन संत्यज्य वाक्यं मनुजसंभवम्

kasyacinnirṇayo deyo madhyasthasya dvijottamaiḥ vedavākyena saṁtyajya vākyaṁ manujasaṁbhavam

'किसी के विषय में निर्णय, श्रेष्ठ ब्राह्मणों द्वारा मध्यस्थ को क्यों देना चाहिए — मनुष्य के सामान्य वचन को त्यागकर, केवल वेदवाक्य द्वारा ही?'

श्लोक 3 (skanda.6.202.3)

कस्मात्तालत्रयं देयं मध्यगेन महात्मना एतन्नः सर्वमाचक्ष्व परं कौतूहलं हि नः

kasmāttālatrayaṁ deyaṁ madhyagena mahātmanā etannaḥ sarvamācakṣva paraṁ kautūhalaṁ hi naḥ

'महात्मा मध्यस्थ द्वारा तीन बार ताली क्यों बजाई जानी चाहिए? यह सब हमें बताइए, क्योंकि हमें इसमें अत्यंत कुतूहल है।'

श्लोक 4 (skanda.6.202.4)

तच्छ्रुत्वा भर्तृयज्ञस्तु तानुवाच द्विजोत्तमान् श्रूयतामभिधास्यामि यदेतत्कारणं स्थितम्

tacchrutvā bhartṛyajñastu tānuvāca dvijottamān śrūyatāmabhidhāsyāmi yadetatkāraṇaṁ sthitam

यह सुनकर भर्तृयज्ञ ने उन श्रेष्ठ ब्राह्मणों से कहा — 'सुनो, मैं बताता हूँ कि इसका क्या कारण है।'

श्लोक 5 (skanda.6.202.5)

नासत्यं जायते वाक्यं नागराणां कथंचन ब्रह्मशालास्थितानां च शुभं वा यदि वाऽशुभम्

nāsatyaṁ jāyate vākyaṁ nāgarāṇāṁ kathaṁcana brahmaśālāsthitānāṁ ca śubhaṁ vā yadi vā'śubham

'ब्रह्मशाला में स्थित नागरों का वचन, चाहे शुभ हो या अशुभ, किसी भी प्रकार असत्य नहीं होता।'

श्लोक 6 (skanda.6.202.6)

वेदोक्तेः सवनैस्तस्माद्दर्शयंति द्विजोत्तमाः इष्टं वा यदि वानिष्टं पृच्छमानस्य चार्थिनः

vedokteḥ savanaistasmāddarśayaṁti dvijottamāḥ iṣṭaṁ vā yadi vāniṣṭaṁ pṛcchamānasya cārthinaḥ

'अतः श्रेष्ठ ब्राह्मण वेदोक्त सवनों (मंत्रोच्चारण) द्वारा ही, प्रश्न पूछने वाले याचक के लिए इष्ट अथवा अनिष्ट को प्रकट करते हैं।'

श्लोक 7 (skanda.6.202.7)

भूयोभूयस्ततः कुर्यान्मध्यस्थः स द्विजन्मनाम् प्रश्नं तस्य निमित्तं च यावत्तस्य विनिर्णयः

bhūyobhūyastataḥ kuryānmadhyasthaḥ sa dvijanmanām praśnaṁ tasya nimittaṁ ca yāvattasya vinirṇayaḥ

'उसी हेतु से मध्यस्थ ब्राह्मणों से बार-बार प्रश्न पूछता है, जब तक कि उसका निर्णय पूर्ण न हो जाए।'

श्लोक 8 (skanda.6.202.8)

ब्रह्मशालोपविष्टानां यदि वाक्यं वृथा भवेत् माहात्म्यं नश्यते तेषां ततः क्रोधः प्रजायते

brahmaśālopaviṣṭānāṁ yadi vākyaṁ vṛthā bhavet māhātmyaṁ naśyate teṣāṁ tataḥ krodhaḥ prajāyate

'यदि ब्रह्मशाला में बैठे लोगों का वचन व्यर्थ हो जाए, तो उनका माहात्म्य नष्ट हो जाता है, और उससे क्रोध उत्पन्न होता है।'

श्लोक 9 (skanda.6.202.9)

क्रोधात्सञ्जायते द्रोहो द्रोहात्पापस्य संगमः एतस्मात्कारणाद्विप्रा मध्यस्थः पृच्छ्यते मुहुः

krodhātsañjāyate droho drohātpāpasya saṁgamaḥ etasmātkāraṇādviprā madhyasthaḥ pṛcchyate muhuḥ

'क्रोध से द्रोह उत्पन्न होता है, और द्रोह से पाप का संयोग होता है। हे विप्रो, इसी कारण मध्यस्थ बार-बार प्रश्न पूछता है।'

श्लोक 10 (skanda.6.202.10)

समुदायः समस्तानां यथा चैव प्रजायते तदा तालत्रयं यच्च मध्यस्थः संप्रयच्छति

samudāyaḥ samastānāṁ yathā caiva prajāyate tadā tālatrayaṁ yacca madhyasthaḥ saṁprayacchati

'जब सबकी एकमत सहमति उत्पन्न हो जाती है, तभी मध्यस्थ तीन बार ताली बजाता है।'

श्लोक 11 (skanda.6.202.11)

तासां तु पूर्वया कामं हंति पृच्छाप्रदायिनाम् द्वितीयया तथा क्रोधं हंति लोभं तृतीयया

tāsāṁ tu pūrvayā kāmaṁ haṁti pṛcchāpradāyinām dvitīyayā tathā krodhaṁ haṁti lobhaṁ tṛtīyayā

'उनमें से पहली ताली प्रश्नकर्ताओं की कामना को नष्ट करती है, दूसरी उनके क्रोध को, और तीसरी उनके लोभ को नष्ट करती है।'

श्लोक 12 (skanda.6.202.12)

एतस्मात्कारणाद्देयं तेन तालत्रयं द्विजाः

etasmātkāraṇāddeyaṁ tena tālatrayaṁ dvijāḥ

'इसी कारण, हे ब्राह्मणो, उसे तीन बार ताली अवश्य बजानी चाहिए।'

श्लोक 13 (skanda.6.202.13)

ब्राह्मणा ऊचुः आथर्वणश्चतुर्थस्तु ब्राह्मणः परिकीर्तितः स कस्मात्प्रथमः प्रश्नो नागराणां प्रकीर्तितः

brāhmaṇā ūcuḥ ātharvaṇaścaturthastu brāhmaṇaḥ parikīrtitaḥ sa kasmātprathamaḥ praśno nāgarāṇāṁ prakīrtitaḥ

ब्राह्मणों ने कहा — 'अथर्ववेदी ब्राह्मण को तो चौथा कहा गया है। फिर वह नागरों में प्रथम प्रश्न के अधिकारी के रूप में क्यों कहा गया है?'

श्लोक 14 (skanda.6.202.14)

भर्तृयज्ञ उवाच आथर्वः प्रथमः प्रश्नो यस्मात्प्रोक्तो मया द्विजाः तदहं संप्रवक्ष्यामि शृणुध्वं सुसमाहिताः

bhartṛyajña uvāca ātharvaḥ prathamaḥ praśno yasmātprokto mayā dvijāḥ tadahaṁ saṁpravakṣyāmi śṛṇudhvaṁ susamāhitāḥ

भर्तृयज्ञ ने कहा — 'हे ब्राह्मणो, मैंने अथर्ववेदी को प्रथम प्रश्न का अधिकारी क्यों बताया है, वह कारण मैं तुम्हें बताता हूँ; एकाग्रचित्त होकर सुनो।'

श्लोक 15 (skanda.6.202.15)

नेर्ष्या चैवात्र कर्तव्या स्वस्थानस्य विनाशनी निरूपितं मया सम्यक्स्थानस्थस्य विशुद्धये

nerṣyā caivātra kartavyā svasthānasya vināśanī nirūpitaṁ mayā samyaksthānasthasya viśuddhaye

'यहाँ अपने ही स्थान का विनाश करने वाली ईर्ष्या कभी नहीं करनी चाहिए। यह नियम मैंने स्थान के निवासियों की शुद्धि के लिए भलीभाँति स्थापित किया है।'

श्लोक 16 (skanda.6.202.16)

ऋग्यजुःसामसंज्ञाख्या अग्निष्टोमादिका मखाः पारत्रिकाः प्रवर्तंते नैहिकाश्चाभिचारिकाः

ṛgyajuḥsāmasaṁjñākhyā agniṣṭomādikā makhāḥ pāratrikāḥ pravartaṁte naihikāścābhicārikāḥ

'ऋक्, यजुः, साम नामक वेदों से संबंधित अग्निष्टोम आदि यज्ञ परलोक-संबंधी फल देते हैं, जबकि लौकिक और आभिचारिक कर्म इसी लोक से संबंधित होते हैं।'

श्लोक 17 (skanda.6.202.17)

अथर्ववेदे तच्चोक्तं सर्वं चैवाभिचारिकम् हिताय सर्वलोकानां ब्रह्मणा लोककारिणा

atharvavede taccoktaṁ sarvaṁ caivābhicārikam hitāya sarvalokānāṁ brahmaṇā lokakāriṇā

'वह समस्त आभिचारिक विद्या अथर्ववेद में ही कही गई है, लोक-रचयिता ब्रह्मा द्वारा समस्त लोगों के हित के लिए।'

श्लोक 18 (skanda.6.202.18)

अथर्ववेदः प्रथमं द्रष्टव्यः कार्यसिद्धये एतस्मात्कारणादाद्यः स चतुर्थोऽपि संस्थितः

atharvavedaḥ prathamaṁ draṣṭavyaḥ kāryasiddhaye etasmātkāraṇādādyaḥ sa caturtho'pi saṁsthitaḥ

'किसी भी कार्य की सिद्धि के लिए अथर्ववेद का ही पहले अवलोकन करना चाहिए। इसी कारण, चौथा होते हुए भी, वह यहाँ प्रथम स्थान पर रखा गया है।'

श्लोक 19 (skanda.6.202.19)

एतद्वः सर्वमाख्यातं यत्पृष्टोऽस्मि द्विजोत्तमाः पृच्छा संबंधजं सर्वमेकं कार्यं सदैव हि

etadvaḥ sarvamākhyātaṁ yatpṛṣṭo'smi dvijottamāḥ pṛcchā saṁbaṁdhajaṁ sarvamekaṁ kāryaṁ sadaiva hi

हे द्विजश्रेष्ठो, आपने जो पूछा था, वह सब मैंने बता दिया — क्योंकि इस प्रश्न से संबंधित सब कुछ सदैव एक ही कार्य है।

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