नागर खण्ड · अध्याय 203
नागर-विशुद्धि-प्रकार का वर्णन
श्लोक 1 (skanda.6.203.1)
आनर्त उवाच एवं शुद्ध्यर्थमायातो नागराणां पुरः स्थितः नागरः शुद्धिमाप्रोति यथा तन्मे वद द्विजः
ānarta uvāca evaṁ śuddhyarthamāyāto nāgarāṇāṁ puraḥ sthitaḥ nāgaraḥ śuddhimāproti yathā tanme vada dvijaḥ
आनर्त ने कहा — हे द्विज, इस प्रकार शुद्धि के लिए आया हुआ नागर, नागरों के समक्ष खड़े होकर, जिस प्रकार शुद्धि प्राप्त करता है, वह मुझे बताइए।
श्लोक 2 (skanda.6.203.2)
विश्वामित्र उवाच एवं मध्यस्थवचनात्समुदाये स्थिरे सति स प्रष्टव्यः पितुर्माता कतमा ते वदस्व नः
viśvāmitra uvāca evaṁ madhyasthavacanātsamudāye sthire sati sa praṣṭavyaḥ piturmātā katamā te vadasva naḥ
विश्वामित्र ने कहा — इस प्रकार मध्यस्थ के वचन से समुदाय स्थिर हो जाने पर, उससे पूछा जाना चाहिए — 'तुम्हारे पिता की माता कौन थी, यह हमें बताओ।'
श्लोक 3 (skanda.6.203.3)
किं गोत्रः कतमस्तस्याः पिता किंप्रवरः स्मृतः एवं तस्यान्वयं ज्ञात्वा गोत्रप्रवरसंयुतम्
kiṁ gotraḥ katamastasyāḥ pitā kiṁpravaraḥ smṛtaḥ evaṁ tasyānvayaṁ jñātvā gotrapravarasaṁyutam
'उसका गोत्र क्या था, उसके पिता कौन थे, और उनका प्रवर क्या माना जाता है?' इस प्रकार उसके गोत्र-प्रवर सहित वंश को जानकर,
श्लोक 4 (skanda.6.203.4)
प्रष्टव्या च ततो माता तस्याश्चापि च या भवेत् जननी चापि प्रष्टव्या तस्याश्चापि च या भवेत्
praṣṭavyā ca tato mātā tasyāścāpi ca yā bhavet jananī cāpi praṣṭavyā tasyāścāpi ca yā bhavet
तत्पश्चात् उसकी माता के विषय में तथा उसकी भी माता के विषय में पूछना चाहिए; और उसकी जननी के विषय में तथा उसकी भी माता के विषय में पूछना चाहिए।
श्लोक 5 (skanda.6.203.5)
ज्ञातव्या सापि यत्नेन ब्राह्मणैः शुद्धिकर्मणि
jñātavyā sāpi yatnena brāhmaṇaiḥ śuddhikarmaṇi
इस शुद्धि-कर्म में लगे ब्राह्मणों को उसे भी प्रयत्नपूर्वक जानना चाहिए।
श्लोक 6 (skanda.6.203.6)
पिता पितामहश्चैव तथैव प्रपितामहः शोधनीयाः प्रयत्नेन त्रयश्चैतेऽपि तस्य च
pitā pitāmahaścaiva tathaiva prapitāmahaḥ śodhanīyāḥ prayatnena trayaścaite'pi tasya ca
पिता, पितामह, तथा वैसे ही प्रपितामह — उसके ये तीनों भी प्रयत्नपूर्वक जाँचे जाने चाहिए।
श्लोक 7 (skanda.6.203.7)
तथा पितामहीपक्षे त्रय एते द्विजोत्तमाः मातामहस्ततस्तस्य पिता तस्यापि यः पिता
tathā pitāmahīpakṣe traya ete dvijottamāḥ mātāmahastatastasya pitā tasyāpi yaḥ pitā
हे द्विजश्रेष्ठो, वैसे ही पितामही के पक्ष में भी ये तीनों; तत्पश्चात् उसका नाना, तथा उसके भी पिता,
श्लोक 8 (skanda.6.203.8)
माता मातामही चैव तथैवान्या प्रपूर्विका पितामह्याश्च या माता सापि शोध्या सभर्तृका
mātā mātāmahī caiva tathaivānyā prapūrvikā pitāmahyāśca yā mātā sāpi śodhyā sabhartṛkā
उसकी माता, नानी, तथा वैसे ही उससे पहले की एक और स्त्री; और पितामही की जो माता हो, वह भी अपने पति सहित जाँची जानी चाहिए।
श्लोक 9 (skanda.6.203.9)
एवं शाखाऽगमं ज्ञात्वा तस्य सर्वं यथाक्रमम् मूलवंशादधिष्ठानं न्यग्रोधस्येव सर्वतः
evaṁ śākhā'gamaṁ jñātvā tasya sarvaṁ yathākramam mūlavaṁśādadhiṣṭhānaṁ nyagrodhasyeva sarvataḥ
इस प्रकार वटवृक्ष के समान, मूल वंश से चारों ओर फैली उसकी संपूर्ण शाखाओं को क्रमशः जानकर,
श्लोक 10 (skanda.6.203.10)
ततः शुद्धिः प्रदातव्या सिन्दूरति लकेन तु चातुश्चरणमंत्रैश्च दत्त्वाशीर्वचनं क्रमात्
tataḥ śuddhiḥ pradātavyā sindūrati lakena tu cātuścaraṇamaṁtraiśca dattvāśīrvacanaṁ kramāt
तत्पश्चात् सिंदूर के तिलक से शुद्धि प्रदान की जानी चाहिए, तथा चारों वेदशाखाओं के मंत्रों से क्रमशः आशीर्वचन देकर,
श्लोक 11 (skanda.6.203.11)
ततो वाच्यं नृपश्रेष्ठ मध्यस्थेन तदग्रतः दत्त्वा तालत्रयं राजञ्छुद्धोऽयं नागरो द्विजः सामान्यपदयोग्यश्च संजातः सांप्रतं द्विजः
tato vācyaṁ nṛpaśreṣṭha madhyasthena tadagrataḥ dattvā tālatrayaṁ rājañchuddho'yaṁ nāgaro dvijaḥ sāmānyapadayogyaśca saṁjātaḥ sāṁprataṁ dvijaḥ
हे नृपश्रेष्ठ, तत्पश्चात् उसके सामने खड़े होकर मध्यस्थ द्वारा, तीन बार ताली बजाकर यह कहा जाना चाहिए — 'हे राजन्, यह नागर ब्राह्मण अब शुद्ध हो गया है, और अब सामान्य पद के योग्य हो गया है।'
श्लोक 12 (skanda.6.203.12)
ततोऽग्निशरणं गत्वा संतर्प्य च हुताशनम् पञ्चवक्त्रेण मंत्रेण दत्त्वा पूर्णाहुतिं ततः विप्रेभ्यो दक्षिणां दद्यात्स्वशक्त्या भोजनान्विताम्
tato'gniśaraṇaṁ gatvā saṁtarpya ca hutāśanam pañcavaktreṇa maṁtreṇa dattvā pūrṇāhutiṁ tataḥ viprebhyo dakṣiṇāṁ dadyātsvaśaktyā bhojanānvitām
तत्पश्चात् अग्निशाला में जाकर, अग्नि को तृप्त करके, पंचवक्त्र मंत्र से पूर्णाहुति देकर, वह अपनी सामर्थ्य के अनुसार भोजन सहित ब्राह्मणों को दक्षिणा दे।
श्लोक 13 (skanda.6.203.13)
सिन्दूरतिलके जाते ब्रह्माग्रे द्विजवाक्यतः पितॄणां जायते तुष्टिर्वंशो नोऽद्य प्रतिष्ठि तः
sindūratilake jāte brahmāgre dvijavākyataḥ pitṝṇāṁ jāyate tuṣṭirvaṁśo no'dya pratiṣṭhi taḥ
ब्रह्मशाला में ब्राह्मणों के वचन से सिंदूर-तिलक हो जाने पर, पितरों को संतोष होता है — 'आज हमारा वंश प्रतिष्ठित हुआ!'
श्लोक 14 (skanda.6.203.14)
यस्य नो जायते शुद्धिः शाखाभिर्मूलवंशगा निग्रहस्तस्य कर्तव्यो द्विजार्हो द्विजसत्तमैः
yasya no jāyate śuddhiḥ śākhābhirmūlavaṁśagā nigrahastasya kartavyo dvijārho dvijasattamaiḥ
जिसकी मूल वंश तक की शाखाओं द्वारा शुद्धि न हो सके, हे द्विजसत्तमो, उसका ब्राह्मणोचित निग्रह करना चाहिए,
श्लोक 15 (skanda.6.203.15)
यथा नान्यो हि जायेत शुद्धि स्तस्य प्रकल्पिता एवं संशोधितो विप्रः श्राद्धार्हो जायते ततः
yathā nānyo hi jāyeta śuddhi stasya prakalpitā evaṁ saṁśodhito vipraḥ śrāddhārho jāyate tataḥ
जिससे कोई और उसके लिए झूठी शुद्धि की व्यवस्था न कर सके। इस प्रकार भलीभाँति शुद्ध हुआ ब्राह्मण ही श्राद्ध के योग्य होता है।
श्लोक 16 (skanda.6.203.16)
अपि चाष्टकुलोत्पन्नः सामान्यः किं पुनर्हि यः अशुद्धेन तु विप्रेण यः श्राद्धा द्यं करोति हि तस्य भस्महुतं यद्वत्सर्वं तज्जायते वृथा
api cāṣṭakulotpannaḥ sāmānyaḥ kiṁ punarhi yaḥ aśuddhena tu vipreṇa yaḥ śrāddhā dyaṁ karoti hi tasya bhasmahutaṁ yadvatsarvaṁ tajjāyate vṛthā
यह अष्टकुल में उत्पन्न सामान्य नागर के लिए भी लागू होता है, फिर अन्य के लिए तो कहना ही क्या! जो कोई अशुद्ध ब्राह्मण से श्राद्ध आदि कराता है, उसका वह सब कर्म राख में डाली गई आहुति के समान व्यर्थ हो जाता है।
श्लोक 17 (skanda.6.203.17)
तस्मात्सर्वप्रयत्नेन शोध्योऽयं नागरो द्विजः स्वस्थानस्य विशुद्ध्यर्थं तथैव स्वकु लस्य च
tasmātsarvaprayatnena śodhyo'yaṁ nāgaro dvijaḥ svasthānasya viśuddhyarthaṁ tathaiva svaku lasya ca
अतः सर्वप्रकार के प्रयत्न से इस नागर ब्राह्मण की शुद्धि करानी चाहिए, अपने स्थान की तथा अपने कुल की विशुद्धि के लिए भी।