नागर खण्ड · अध्याय 204
शक्र-विष्णु संवाद में प्रेत-श्राद्ध का कथन
श्लोक 1 (skanda.6.204.1)
आनर्त उवाच प्रोक्ताऽस्माकं त्वया विप्र शुद्धिर्नागरसंभवा वंशजा विस्तरेणैव यथा पृष्टोऽसि सुव्रत
ānarta uvāca proktā'smākaṁ tvayā vipra śuddhirnāgarasaṁbhavā vaṁśajā vistareṇaiva yathā pṛṣṭo'si suvrata
आनर्त ने कहा — हे विप्र, हे सुव्रत, जैसा आपसे पूछा गया था, वैसे ही आपने हमें नागर-संबंधी वंशज शुद्धि विस्तारपूर्वक बता दी।
श्लोक 2 (skanda.6.204.2)
सांप्रतं शीलजां ब्रूहि नष्टवंशश्च यो भवेत् पितामहं न जानाति न च मातामहीं निजाम् तस्य शुद्धिः कथं कार्या नागरोऽस्मीति यो वदेत्
sāṁprataṁ śīlajāṁ brūhi naṣṭavaṁśaśca yo bhavet pitāmahaṁ na jānāti na ca mātāmahīṁ nijām tasya śuddhiḥ kathaṁ kāryā nāgaro'smīti yo vadet
अब वह शुद्धि बताइए जो शील से उत्पन्न होती है — जिसका वंश ज्ञात न हो, जो न अपने पितामह को जानता हो, न अपनी नानी को, किंतु स्वयं को नागर कहता हो — उसकी शुद्धि कैसे की जाए?
श्लोक 3 (skanda.6.204.3)
विश्वामित्र उवाच एतदर्थं पुरा पृष्टो भर्तृयज्ञश्च नागरैः नष्टवंशकृते राजन्यथा पृष्टोऽस्मि वै त्वया
viśvāmitra uvāca etadarthaṁ purā pṛṣṭo bhartṛyajñaśca nāgaraiḥ naṣṭavaṁśakṛte rājanyathā pṛṣṭo'smi vai tvayā
विश्वामित्र ने कहा — हे राजन्, इसी विषय पर पूर्वकाल में नागरों द्वारा भर्तृयज्ञ से भी वैसा ही पूछा गया था, जैसा आपने मुझसे वंशहीन के विषय में पूछा है।
श्लोक 4 (skanda.6.204.4)
भर्तृयज्ञ उवाच नष्टवंशस्तु यो ब्रूयान्नागरोऽस्मीति संसदि तस्य शीलं प्रविज्ञेयं ततः शुद्धिं समादिशेत्
bhartṛyajña uvāca naṣṭavaṁśastu yo brūyānnāgaro'smīti saṁsadi tasya śīlaṁ pravijñeyaṁ tataḥ śuddhiṁ samādiśet
भर्तृयज्ञ ने कहा — 'जिसका वंश ज्ञात न हो, वह यदि सभा में 'मैं नागर हूँ' कहे, तो पहले उसका शील भलीभाँति जान लेना चाहिए, तत्पश्चात् ही उसकी शुद्धि का आदेश देना चाहिए।'
श्लोक 5 (skanda.6.204.5)
नागराणां तु ये धर्मा व्यवहाराश्च केवलाः तेषु चेद्वर्तते नित्यं संभाव्यो नागरो हि सः
nāgarāṇāṁ tu ye dharmā vyavahārāśca kevalāḥ teṣu cedvartate nityaṁ saṁbhāvyo nāgaro hi saḥ
'यदि वह सदा केवल नागरों के ही धर्मों और व्यवहारों में स्थित रहता हो, तो वही निश्चय ही नागर माना जाना चाहिए।'
श्लोक 6 (skanda.6.204.6)
तस्य शुद्धिकृते देयं धटं ब्राह्मणसत्तमाः धटे तु शुद्धिमापन्ने ततोऽसौ शुद्धतां व्रजेत्
tasya śuddhikṛte deyaṁ dhaṭaṁ brāhmaṇasattamāḥ dhaṭe tu śuddhimāpanne tato'sau śuddhatāṁ vrajet
'हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो, उसकी शुद्धि के लिए घट-परीक्षा दी जानी चाहिए। घट-परीक्षा में शुद्धि प्राप्त होने पर, वह भलीभाँति शुद्धता को प्राप्त हो जाता है।'
श्लोक 7 (skanda.6.204.7)
श्राद्धार्हः कन्यकार्हश्च सोमार्हश्च विशेषतः सामान्यपदयोग्यश्च समस्ते स्थानकर्मणि
śrāddhārhaḥ kanyakārhaśca somārhaśca viśeṣataḥ sāmānyapadayogyaśca samaste sthānakarmaṇi
'वह श्राद्ध के योग्य, कन्यादान के योग्य, तथा विशेषतः सोमपान के योग्य हो जाता है; और समुदाय के समस्त कार्यों में सामान्य पद के योग्य हो जाता है।'
श्लोक 8 (skanda.6.204.8)
एतत्ते सर्वमाख्यातं यत्पृष्टोऽस्मि नरोत्तम द्वितीया जायते शुद्धिर्यथा नष्टान्वये द्विजे तस्माद्वद महाराज यद्भूयः श्रोतुमर्हसि
etatte sarvamākhyātaṁ yatpṛṣṭo'smi narottama dvitīyā jāyate śuddhiryathā naṣṭānvaye dvije tasmādvada mahārāja yadbhūyaḥ śrotumarhasi
हे नरोत्तम, आपने जो पूछा था, वह सब मैंने बता दिया — किस प्रकार वंशहीन ब्राह्मण के लिए यह द्वितीय शुद्धि होती है। अब हे महाराज, आप और जो कुछ सुनना चाहें, वह बताइए।
श्लोक 9 (skanda.6.204.9)
आनर्त उवाच तस्मात्ते नागरा भूत्वा विप्राश्चाष्टकुलोद्भवाः सर्वेषामुत्तमा जाताः प्राधान्येन व्यवस्थिताः
ānarta uvāca tasmātte nāgarā bhūtvā viprāścāṣṭakulodbhavāḥ sarveṣāmuttamā jātāḥ prādhānyena vyavasthitāḥ
आनर्त ने कहा — इस प्रकार वे अष्टकुल से उत्पन्न ब्राह्मण, नागर होकर, समस्त नागरों में श्रेष्ठ हुए, तथा प्रधानता से प्रतिष्ठित हुए।
श्लोक 10 (skanda.6.204.10)
तपसः किं प्रभावः स तेषां वा यजनोद्भवः विद्योद्भवोऽथवा विप्र किं वा दानसमुद्भवः
tapasaḥ kiṁ prabhāvaḥ sa teṣāṁ vā yajanodbhavaḥ vidyodbhavo'thavā vipra kiṁ vā dānasamudbhavaḥ
हे विप्र, क्या यह तप का प्रभाव है, अथवा यज्ञ से उत्पन्न है? अथवा यह विद्या से उत्पन्न है, या दान से उत्पन्न है?
श्लोक 11 (skanda.6.204.11)
विश्वामित्र उवाच ते सर्वे गुणसंपन्ना यथान्ये नागरास्तथा विशेषश्चापरस्तेषां ते शक्रेण प्रतिष्ठिताः
viśvāmitra uvāca te sarve guṇasaṁpannā yathānye nāgarāstathā viśeṣaścāparasteṣāṁ te śakreṇa pratiṣṭhitāḥ
विश्वामित्र ने कहा — वे सभी उतने ही गुणसंपन्न हैं जितने अन्य नागर। किंतु उनमें एक विशेषता और है — वे स्वयं इंद्र द्वारा प्रतिष्ठित किए गए थे।
श्लोक 12 (skanda.6.204.12)
तेन ते गौरवं प्राप्ताः सर्वेषां तु द्विजन्मनाम्
tena te gauravaṁ prāptāḥ sarveṣāṁ tu dvijanmanām
इसी कारण उन्हें समस्त ब्राह्मणों में गौरव प्राप्त हुआ है।
श्लोक 13 (skanda.6.204.13)
आनर्त उवाच कस्मिन्काले तु ते विप्राः शक्रेणात्र प्रतिष्ठिताः किमर्थं च वदास्माकं विस्तरेण महामते
ānarta uvāca kasminkāle tu te viprāḥ śakreṇātra pratiṣṭhitāḥ kimarthaṁ ca vadāsmākaṁ vistareṇa mahāmate
आनर्त ने कहा — वे ब्राह्मण किस समय इंद्र द्वारा यहाँ प्रतिष्ठित किए गए, और किस कारण से — हे महामते, यह हमें विस्तार से बताइए।
श्लोक 14 (skanda.6.204.14)
विश्वामित्र उवाच हिरण्याक्ष इति ख्यातः पुराऽऽसीद्दानवोत्तमः अभवत्तस्य संग्रामः शक्रेण सह दारुणः
viśvāmitra uvāca hiraṇyākṣa iti khyātaḥ purā''sīddānavottamaḥ abhavattasya saṁgrāmaḥ śakreṇa saha dāruṇaḥ
विश्वामित्र ने कहा — पूर्वकाल में हिरण्याक्ष नामक विख्यात एक श्रेष्ठ दानव था। उसका इंद्र के साथ भयंकर युद्ध हुआ।
श्लोक 15 (skanda.6.204.15)
तत्र देवासुरे युद्धे मृता भूरिदिवौकसः दानवाश्च महाराज परस्परजिगीषवः
tatra devāsure yuddhe mṛtā bhūridivaukasaḥ dānavāśca mahārāja parasparajigīṣavaḥ
हे महाराज, उस देवासुर युद्ध में, परस्पर विजय की कामना करते हुए, अनेक देवगण तथा दानव भी मारे गए।
श्लोक 16 (skanda.6.204.16)
अथ ते दानवाः संख्ये शक्रेण विनिपातिताः विद्याबलेन ताञ्छुक्रः सजीवान्कुरुते पुनः
atha te dānavāḥ saṁkhye śakreṇa vinipātitāḥ vidyābalena tāñchukraḥ sajīvānkurute punaḥ
तत्पश्चात् इंद्र द्वारा युद्ध में गिराए गए उन दानवों को शुक्राचार्य ने अपनी विद्या के बल से पुनः जीवित कर दिया।
श्लोक 17 (skanda.6.204.17)
देवाश्च निधनं प्राप्ता न जीवंति कथंचन कस्यचित्त्वथ कालस्य विष्णुं प्रोवाच वृत्रहा
devāśca nidhanaṁ prāptā na jīvaṁti kathaṁcana kasyacittvatha kālasya viṣṇuṁ provāca vṛtrahā
किंतु मृत्यु को प्राप्त देवगण किसी भी प्रकार जीवित नहीं हो सके। तब कुछ समय बाद वृत्रासुर के वधकर्ता इंद्र ने विष्णु से कहा।
श्लोक 18 (skanda.6.204.18)
धारातीर्थमृतानां च प्रहारैः सन्मुखैः प्रभो या गतिश्च समादिष्टा तां मे वद जनार्दन
dhārātīrthamṛtānāṁ ca prahāraiḥ sanmukhaiḥ prabho yā gatiśca samādiṣṭā tāṁ me vada janārdana
'हे प्रभो, हे जनार्दन, जो लोग तलवार की धार से, सम्मुख होकर हुए प्रहारों से मरते हैं, उनकी जो गति निर्धारित है, वह मुझे बताइए।'
श्लोक 19 (skanda.6.204.19)
पराङ्मुखा मृता ये च पलायनपरायणाः तेषामपि गतिं ब्रूहि यादृग्जायेतवाच्युत
parāṅmukhā mṛtā ye ca palāyanaparāyaṇāḥ teṣāmapi gatiṁ brūhi yādṛgjāyetavācyuta
'और हे अच्युत, जो पीठ फेरकर भाग जाने में तत्पर होकर मरते हैं, उनकी भी जैसी गति होती हो, वह मुझे बताइए।'
श्लोक 20 (skanda.6.204.20)
विष्णुरुवाच धारातीर्थमृतानां च सन्मुखानां महाहवे यथा चोच्छिन्नबीजानां पुनर्जन्म न विद्यते
viṣṇuruvāca dhārātīrthamṛtānāṁ ca sanmukhānāṁ mahāhave yathā cocchinnabījānāṁ punarjanma na vidyate
विष्णु ने कहा — महायुद्ध में तलवार की धार से, सम्मुख होकर मरने वालों का, बीज नष्ट हो जाने पर जैसे पुनर्जन्म नहीं होता, वैसे ही पुनर्जन्म नहीं होता।
श्लोक 21 (skanda.6.204.21)
ये पुनः पृष्ठदेशे तु हन्यते भयविक्लवाः भुज्यमानाः परैस्ते च प्रेताः स्युस्त्रिदशाधिप
ye punaḥ pṛṣṭhadeśe tu hanyate bhayaviklavāḥ bhujyamānāḥ paraiste ca pretāḥ syustridaśādhipa
किंतु हे त्रिदशाधिप, जो भय से व्याकुल होकर पीठ पर आघात सहते हुए शत्रु द्वारा काटे जाते हैं, वे प्रेत हो जाते हैं।
श्लोक 22 (skanda.6.204.22)
इन्द्र उवाच केचिद्देवा मृता युद्धे युध्यमानाश्च सन्मुखाः तथैवान्ये मया दृष्टा हन्यमानाः पराङ्मुखाः प्रेतत्वं दानवानां च सर्वेषां स्यान्न वा प्रभो
indra uvāca keciddevā mṛtā yuddhe yudhyamānāśca sanmukhāḥ tathaivānye mayā dṛṣṭā hanyamānāḥ parāṅmukhāḥ pretatvaṁ dānavānāṁ ca sarveṣāṁ syānna vā prabho
इंद्र ने कहा — 'कुछ देवता युद्ध में सम्मुख होकर लड़ते हुए मरे, और वैसे ही अन्य कुछ को मैंने पीठ फेरकर मारे जाते देखा। हे प्रभो, क्या दानवों को भी सबको प्रेतत्व प्राप्त होता है, या नहीं?'
श्लोक 23 (skanda.6.204.23)
विष्णुरुवाच असंशयं सहस्राक्ष हता युद्धे पराङ्मुखाः प्रेतत्वे यांति ते सर्वे देवा वा मानुषा यदि
viṣṇuruvāca asaṁśayaṁ sahasrākṣa hatā yuddhe parāṅmukhāḥ pretatve yāṁti te sarve devā vā mānuṣā yadi
विष्णु ने कहा — 'हे सहस्राक्ष, युद्ध में पीठ फेरकर मारे गए वे सभी निःसंदेह प्रेतत्व को प्राप्त होते हैं, चाहे वे देवता हों या मनुष्य।'
श्लोक 24 (skanda.6.204.24)
विषादग्नेः कुलघ्नानां तया चैवात्मघातिनाम् दंष्ट्रिभिर्हतदेहानां शृंगिभिश्च सुरेश्वर प्रेतत्वं जायते नूनं सत्यमेतदसंशयम्
viṣādagneḥ kulaghnānāṁ tayā caivātmaghātinām daṁṣṭribhirhatadehānāṁ śṛṁgibhiśca sureśvara pretatvaṁ jāyate nūnaṁ satyametadasaṁśayam
'हे सुरेश्वर, विष से, अग्नि से, कुलघातकों के लिए, आत्महत्या करने वालों के लिए, तथा दाढ़ों और सींगों वाले प्राणियों द्वारा मारे गए शरीरों के लिए भी, निश्चय ही प्रेतत्व उत्पन्न होता है — यह सत्य है, इसमें कोई संशय नहीं।'
श्लोक 25 (skanda.6.204.25)
इन्द्र उवाच कथं तेषां भवेन्मुक्तिः प्रेतत्वाद्दारुणाद्विभो एतन्मे सर्वमाचक्ष्व येन यत्नं करोम्यहम्
indra uvāca kathaṁ teṣāṁ bhavenmuktiḥ pretatvāddāruṇādvibho etanme sarvamācakṣva yena yatnaṁ karomyaham
इंद्र ने कहा — 'हे प्रभो, उस भयंकर प्रेतत्व से उनकी मुक्ति कैसे हो सकती है? यह सब मुझे बताइए, जिससे मैं उसके लिए प्रयत्न करूँ।'
श्लोक 26 (skanda.6.204.26)
श्रीभगवानुवाच तेषां संयुज्यते श्राद्धं कन्यासंस्थे दिवाकरे कृष्णपक्षे चतुर्दश्यां नभस्यस्य सुरेश्वर
śrībhagavānuvāca teṣāṁ saṁyujyate śrāddhaṁ kanyāsaṁsthe divākare kṛṣṇapakṣe caturdaśyāṁ nabhasyasya sureśvara
श्रीभगवान ने कहा — 'हे सुरेश्वर, जब सूर्य के कन्या राशि में रहते हुए, भाद्रपद मास की कृष्णपक्ष चतुर्दशी को उनके लिए श्राद्ध संपन्न किया जाता है,'
श्लोक 27 (skanda.6.204.27)
गयायां भक्तिपूर्वं तु पितामहवचो यथा ततः प्रयांति ते मोक्षं सत्यमेतदसंशयम्
gayāyāṁ bhaktipūrvaṁ tu pitāmahavaco yathā tataḥ prayāṁti te mokṣaṁ satyametadasaṁśayam
'गया में भक्तिपूर्वक, ठीक जैसा पितामह ब्रह्मा ने कहा है — तब वे मोक्ष को प्राप्त होते हैं। यह सत्य है, इसमें कोई संशय नहीं।'
श्लोक 28 (skanda.6.204.28)
इन्द्र उवाच कस्मात्तत्र दिने श्राद्धं क्रियते मधुसूदन शस्त्रैर्विनिहतानां च सर्वं मे विस्तराद्वद
indra uvāca kasmāttatra dine śrāddhaṁ kriyate madhusūdana śastrairvinihatānāṁ ca sarvaṁ me vistarādvada
इंद्र ने कहा — 'हे मधुसूदन, शस्त्रों से मारे गए लोगों का श्राद्ध उसी दिन क्यों किया जाता है? यह सब मुझे विस्तार से बताइए।'
श्लोक 29 (skanda.6.204.29)
श्रीभगवानुवाच भूतप्रेतपिशाचैश्च कूष्मांडै राक्षसैरपि पुरा संप्रार्थितः शंभुर्दिने तत्र समागते अद्यैकं दिवसं देव कन्यासंस्थे दिवाकरे
śrībhagavānuvāca bhūtapretapiśācaiśca kūṣmāṁḍai rākṣasairapi purā saṁprārthitaḥ śaṁbhurdine tatra samāgate adyaikaṁ divasaṁ deva kanyāsaṁsthe divākare
श्रीभगवान ने कहा — 'पूर्वकाल में उस दिन के आने पर, भूत, प्रेत, पिशाच, कूष्मांड, तथा राक्षसों ने शंभु से प्रार्थना की — हे देव, आज इस एक दिन, सूर्य के कन्या राशि में रहते हुए,'
श्लोक 30 (skanda.6.204.30)
अस्माकं देहि येन स्यात्तृप्तिर्वर्षसमुद्भवा प्रदत्ते वंशजैः श्राद्धे दीनानां त्वं दयां कुरु
asmākaṁ dehi yena syāttṛptirvarṣasamudbhavā pradatte vaṁśajaiḥ śrāddhe dīnānāṁ tvaṁ dayāṁ kuru
'हमें वह दीजिए, जिससे हमारे वंशजों द्वारा दिया गया श्राद्ध हमें वर्षभर की तृप्ति दे सके। हम दीनों पर आप दया कीजिए।'
श्लोक 31 (skanda.6.204.31)
श्रीभगवानुवाच यः करिष्यति वै श्राद्धमस्मिन्नहनि संस्थिते कृष्णपक्षे चतुर्दश्यां नभस्यस्य च वंशजः भविष्यति परा प्रीतिर्यावत्संवत्सरः स्थितः
śrībhagavānuvāca yaḥ kariṣyati vai śrāddhamasminnahani saṁsthite kṛṣṇapakṣe caturdaśyāṁ nabhasyasya ca vaṁśajaḥ bhaviṣyati parā prītiryāvatsaṁvatsaraḥ sthitaḥ
श्रीभगवान ने कहा — 'भाद्रपद कृष्णपक्ष की इस निश्चित चतुर्दशी को जो भी वंशज श्राद्ध करेगा, उसके पितरों को पूरे वर्ष तक परम प्रीति प्राप्त होगी।'
श्लोक 32 (skanda.6.204.32)
यः पुनस्तु गयां गत्वा युष्मद्वंशसमुद्भवः करिष्यति तथा श्राद्धं तेन मुक्तिमवाप्स्यथ
yaḥ punastu gayāṁ gatvā yuṣmadvaṁśasamudbhavaḥ kariṣyati tathā śrāddhaṁ tena muktimavāpsyatha
'और तुम्हारे वंश में उत्पन्न जो कोई गया जाकर वहाँ भी श्राद्ध करेगा, उससे तुम मुक्ति प्राप्त करोगे।'
श्लोक 33 (skanda.6.204.33)
शस्त्रेण निहतानां च स्वर्गस्थानामपि ध्रुवम् न करिष्यति यः श्राद्धं तस्मिन्नहनि संस्थिते
śastreṇa nihatānāṁ ca svargasthānāmapi dhruvam na kariṣyati yaḥ śrāddhaṁ tasminnahani saṁsthite
'और जो शस्त्र से मारे गए, स्वर्ग में स्थित होने पर भी, उस निश्चित दिन श्राद्ध नहीं करेगा,'
श्लोक 34 (skanda.6.204.34)
क्षुत्पिपासार्तदेहाश्च पितरस्तस्य दुःखिताः स्थास्यंति वत्सरं यावदेतदाह पितामहः
kṣutpipāsārtadehāśca pitarastasya duḥkhitāḥ sthāsyaṁti vatsaraṁ yāvadetadāha pitāmahaḥ
'— उसके पितर भूख-प्यास से पीड़ित शरीर लिए, दुःखी होकर, एक वर्ष तक ऐसे ही रहेंगे — यह पितामह ब्रह्मा ने स्वयं कहा है।'
श्लोक 35 (skanda.6.204.35)
तस्मात्सर्वप्रयत्नेन तस्मिन्नहनि कारयेत् अन्यमुद्दिश्य तत्सर्वं प्रेतानामिह जायते
tasmātsarvaprayatnena tasminnahani kārayet anyamuddiśya tatsarvaṁ pretānāmiha jāyate
'अतः सर्वप्रकार से प्रयत्नपूर्वक उस दिन यह कर्म कराना चाहिए। यह सब, दूसरे की ओर से किया गया होने पर भी, यहाँ प्रेतों के लिए ही फलदायी होता है।'
श्लोक 36 (skanda.6.204.36)
ततो भगवता दत्ता तेषां चैव तु सा तिथिः श्राद्धकर्मणि संजाते विना शस्त्रहतं जनम्
tato bhagavatā dattā teṣāṁ caiva tu sā tithiḥ śrāddhakarmaṇi saṁjāte vinā śastrahataṁ janam
तत्पश्चात् भगवान द्वारा उन्हें वह तिथि श्राद्ध-कर्म के लिए दी गई, शस्त्र से मारे गए लोगों के अतिरिक्त भी।
श्लोक 37 (skanda.6.204.37)
संमुखस्यापि संग्रामे युध्यमानस्य देहिनः कदाचिच्चलते चित्तं तीक्ष्णशस्त्रहतस्य च
saṁmukhasyāpi saṁgrāme yudhyamānasya dehinaḥ kadāciccalate cittaṁ tīkṣṇaśastrahatasya ca
क्योंकि संग्राम में सम्मुख होकर लड़ने वाले प्राणी का भी, तीक्ष्ण शस्त्र से आहत होने पर, कभी-कभी चित्त विचलित हो सकता है।