नागर खण्ड · अध्याय 205
शक्र-विष्णु संवाद में गया-श्राद्ध के फल का माहात्म्य-वर्णन
श्लोक 1 (skanda.6.205.1)
विष्णुरुवाच एवं ज्ञात्वा सहस्राक्ष मम वाक्यं समाचर यदि ते वल्लभास्ते च ये हता रणमूर्धनि
viṣṇuruvāca evaṁ jñātvā sahasrākṣa mama vākyaṁ samācara yadi te vallabhāste ca ye hatā raṇamūrdhani
विष्णु ने कहा — हे सहस्राक्ष, यह जानकर मेरे वचन का पालन करो। यदि युद्ध के अग्रभाग में मारे गए वे लोग तुम्हें प्रिय हैं,
श्लोक 2 (skanda.6.205.2)
युध्यमानास्तवाग्रे च गयाश्राद्धेन तर्पय तान्सर्वान्प्रेतभावाच्च येन मुक्तिं भजंति ते
yudhyamānāstavāgre ca gayāśrāddhena tarpaya tānsarvānpretabhāvācca yena muktiṁ bhajaṁti te
जो तुम्हारे सामने युद्ध करते हुए मरे, तो उन सबको गया-श्राद्ध द्वारा तृप्त करो, जिससे वे प्रेत-भाव से मुक्ति को प्राप्त हो सकें,
श्लोक 3 (skanda.6.205.3)
पलायनपरा ये च पृष्ठदेशे हता मृताः
palāyanaparā ye ca pṛṣṭhadeśe hatā mṛtāḥ
और वे भी जो भागने के प्रयास में पीठ पर आघात लेकर मरे।
श्लोक 4 (skanda.6.205.4)
इन्द्र उवाच वर्षेवर्षे तदा श्राद्धं प्रकरोति पितामहः गयां गत्वा दिने तस्मिन्पितॄणां दिव्यरूपिणाम्
indra uvāca varṣevarṣe tadā śrāddhaṁ prakaroti pitāmahaḥ gayāṁ gatvā dine tasminpitṝṇāṁ divyarūpiṇām
इंद्र ने कहा — प्रतिवर्ष उसी दिन पितामह ब्रह्मा स्वयं गया जाकर, दिव्यरूपधारी पितरों का श्राद्ध करते हैं।
श्लोक 5 (skanda.6.205.5)
तत्कथं देव गच्छामि तत्राहं श्राद्धसिद्धये तस्मात्कथय मे तेषां किंचिच्छ्राद्धाय भूतले मुक्तिदं येन गच्छामि तव वाक्याज्जनार्दन
tatkathaṁ deva gacchāmi tatrāhaṁ śrāddhasiddhaye tasmātkathaya me teṣāṁ kiṁcicchrāddhāya bhūtale muktidaṁ yena gacchāmi tava vākyājjanārdana
तो हे देव, मैं श्राद्ध की सिद्धि के लिए वहाँ कैसे जाऊँ? अतः हे जनार्दन, इस पृथ्वी पर उनके श्राद्ध के लिए कोई मुक्तिदायी स्थान मुझे बताइए, जिससे मैं आपके वचन से वहाँ जा सकूँ।
श्लोक 6 (skanda.6.205.6)
विश्वामित्र उवाच ततः स सुचिरं ध्यात्वा तमुवाच जनार्दनः अस्ति तीर्थं महत्पुण्यं तस्मादप्यधिकं च यत्
viśvāmitra uvāca tataḥ sa suciraṁ dhyātvā tamuvāca janārdanaḥ asti tīrthaṁ mahatpuṇyaṁ tasmādapyadhikaṁ ca yat
विश्वामित्र ने कहा — तब जनार्दन बहुत देर तक विचार करके उससे बोले — 'एक महापुण्य तीर्थ है, जो उस (गया) से भी बढ़कर है।'
श्लोक 7 (skanda.6.205.7)
हाटकेश्वरजे क्षेत्रे कूपिकामध्यसंस्थितम् अमावास्यादिने तत्र चतुर्दश्याश्च देवप गया संक्रमते सम्यक्सर्वतीर्थसमन्विता
hāṭakeśvaraje kṣetre kūpikāmadhyasaṁsthitam amāvāsyādine tatra caturdaśyāśca devapa gayā saṁkramate samyaksarvatīrthasamanvitā
'हाटकेश्वर से उत्पन्न क्षेत्र में, एक कूपिका के मध्य में स्थित। हे देवप, वहाँ अमावास्या और चतुर्दशी के दिन, समस्त तीर्थों सहित गया स्वयं भलीभाँति संक्रमण करके आ जाती है।'
श्लोक 8 (skanda.6.205.8)
कन्यासंस्थे रवौ तत्र यः श्राद्धं कुरुते नरः अष्टवंशोद्भवैर्विप्रैः स पितॄंस्तारयेन्निजान्
kanyāsaṁsthe ravau tatra yaḥ śrāddhaṁ kurute naraḥ aṣṭavaṁśodbhavairvipraiḥ sa pitṝṁstārayennijān
'सूर्य के कन्या राशि में रहते हुए, वहाँ जो मनुष्य अष्टवंश से उत्पन्न ब्राह्मणों द्वारा श्राद्ध करता है, वह अपने पितरों को तार देता है —'
श्लोक 9 (skanda.6.205.9)
अपि प्रेतत्वमापन्नान्किं पुनः स्वर्गसंस्थितान् तत्क्षेत्रप्रभवा विप्रा अष्टवंशसमुद्भवाः
api pretatvamāpannānkiṁ punaḥ svargasaṁsthitān tatkṣetraprabhavā viprā aṣṭavaṁśasamudbhavāḥ
'— यहाँ तक कि प्रेत-भाव को प्राप्त पितरों को भी, फिर स्वर्गस्थ पितरों की तो बात ही क्या! उस क्षेत्र में उत्पन्न, अष्टवंश से उद्भूत ब्राह्मण,'
श्लोक 10 (skanda.6.205.10)
तप उग्रं समास्थाय वर्तंते हिमपर्वते आनर्ताधिपतेर्दानाद्भीतास्तत्र समागताः
tapa ugraṁ samāsthāya vartaṁte himaparvate ānartādhipaterdānādbhītāstatra samāgatāḥ
'— अभी उग्र तप का आश्रय लेकर हिमपर्वत पर निवास कर रहे हैं, आनर्त के राजा के दान (देने के आग्रह) से भयभीत होकर वहाँ जा पहुँचे हैं।'
श्लोक 11 (skanda.6.205.11)
तान्गृहीत्वा द्रुतं गच्छ तत्र संबोध्य गौरवात् सामपूर्वैरुपायैस्तैस्तेषामग्रे समाचर
tāngṛhītvā drutaṁ gaccha tatra saṁbodhya gauravāt sāmapūrvairupāyaistaisteṣāmagre samācara
'वहाँ शीघ्र जाओ, आदरपूर्वक समझाकर उन्हें साथ ले आओ; सामनीति आदि उपायों से उनके सामने आचरण करो,'
श्लोक 12 (skanda.6.205.12)
श्राद्धं चैव यथान्यायं ततः प्राप्स्यसि वांछितम् ते चाऽपि सुखिनः सर्वे भविष्यंति समागताः
śrāddhaṁ caiva yathānyāyaṁ tataḥ prāpsyasi vāṁchitam te cā'pi sukhinaḥ sarve bhaviṣyaṁti samāgatāḥ
'और विधिपूर्वक श्राद्ध करके तुम अपनी इच्छित वस्तु प्राप्त करोगे; और वे भी, यहाँ आकर, सभी सुखी हो जाएँगे।'
श्लोक 13 (skanda.6.205.13)
त्वया सह प्रपूज्याश्च ह्यस्माभिः श्राद्धकारणात् तच्छ्रुत्वा सहसा शक्रः सन्तोषं परमं गतः
tvayā saha prapūjyāśca hyasmābhiḥ śrāddhakāraṇāt tacchrutvā sahasā śakraḥ santoṣaṁ paramaṁ gataḥ
'वे तुम्हारे साथ हम सबके द्वारा भी श्राद्ध के प्रयोजन से पूजनीय हैं।' यह सुनकर इंद्र तुरंत परम संतोष को प्राप्त हुए।
श्लोक 14 (skanda.6.205.14)
हिमवंतं समुद्दिश्य प्रस्थितस्त्वरयाऽन्वितः वासुदेवोऽपि राजेंद्र क्षीराब्धिमगमत्तदा
himavaṁtaṁ samuddiśya prasthitastvarayā'nvitaḥ vāsudevo'pi rājeṁdra kṣīrābdhimagamattadā
वे शीघ्रतापूर्वक हिमालय की ओर चल पड़े; और हे राजेंद्र, वासुदेव भी तब क्षीरसागर को चले गए।
श्लोक 15 (skanda.6.205.15)
हिमवन्तं समाश्रित्य शक्रोऽपि ददृशे द्विजान् अष्टवंशसमुद्भूतान्विष्णुना समुदाहृतान्
himavantaṁ samāśritya śakro'pi dadṛśe dvijān aṣṭavaṁśasamudbhūtānviṣṇunā samudāhṛtān
हिमालय पहुँचकर इंद्र ने विष्णु द्वारा बताए गए, अष्टवंश से उत्पन्न उन ब्राह्मणों को देखा।