नागर खण्ड · अध्याय 206
बालमण्डन-तीर्थ का माहात्म्य-वर्णन
श्लोक 1 (skanda.6.206.1)
विश्वामित्र उवाच इंद्रोऽपि विष्णुवाक्येन हिमवंतं समागतः ऐरावतं समारुह्य नागेद्रं पर्वतोपमम्
viśvāmitra uvāca iṁdro'pi viṣṇuvākyena himavaṁtaṁ samāgataḥ airāvataṁ samāruhya nāgedraṁ parvatopamam
विश्वामित्र ने कहा — इंद्र भी विष्णु के वचन से, पर्वत के समान विशाल गजराज ऐरावत पर आरूढ़ होकर, हिमालय पहुँचे।
श्लोक 2 (skanda.6.206.2)
तत्रापश्यदृषींस्तान्स चमत्कार समुद्भवान् नियमैः संयमैर्युक्तान्सदाचारपरायणान् वानप्रस्थाश्रमोपेतान्कामक्रोधविवर्जितान्
tatrāpaśyadṛṣīṁstānsa camatkāra samudbhavān niyamaiḥ saṁyamairyuktānsadācāraparāyaṇān vānaprasthāśramopetānkāmakrodhavivarjitān
वहाँ उन्होंने चमत्कारपुर से उत्पन्न उन ऋषियों को देखा, जो नियमों और संयम से युक्त, सदाचार में तत्पर, वानप्रस्थ आश्रम में स्थित, तथा काम-क्रोध से रहित थे।
श्लोक 3 (skanda.6.206.3)
एके विप्राः स्थितास्तेषामेकांतरितभोजनाः षष्ठकालाशिनश्चान्ये चांद्रायणपरायणाः
eke viprāḥ sthitāsteṣāmekāṁtaritabhojanāḥ ṣaṣṭhakālāśinaścānye cāṁdrāyaṇaparāyaṇāḥ
उनमें से कुछ ब्राह्मण एक दिन छोड़कर भोजन करते थे, अन्य छठे समय भोजन करते हुए चांद्रायण व्रत में तत्पर थे।
श्लोक 4 (skanda.6.206.4)
अश्मकुट्टाः स्थिताः केचिद्दंतोलूखलिनः परे शीर्णपर्णाशनाः केचिज्जलाहारास्तथा परे वायुभक्षास्तथैवान्ये तपस्तेपुः सुदारुणम्
aśmakuṭṭāḥ sthitāḥ keciddaṁtolūkhalinaḥ pare śīrṇaparṇāśanāḥ kecijjalāhārāstathā pare vāyubhakṣāstathaivānye tapastepuḥ sudāruṇam
कुछ पत्थर से अनाज कूटकर खाते थे, अन्य केवल दाँतों से ही अन्न पीसते थे; कुछ झरे पत्तों का, अन्य केवल जल का आहार करते थे; और अन्य केवल वायु का भक्षण करते हुए अत्यंत घोर तप करते थे।
श्लोक 5 (skanda.6.206.5)
अथ शक्रं समालोक्य तत्राऽऽयांतं द्विजोत्तमाः पूजितं चारणैः सिद्धैस्तैरदृष्टं कदाचन
atha śakraṁ samālokya tatrā''yāṁtaṁ dvijottamāḥ pūjitaṁ cāraṇaiḥ siddhaistairadṛṣṭaṁ kadācana
हे द्विजश्रेष्ठो, तब उन्होंने वहाँ आते हुए, चारणों और सिद्धों द्वारा पूजित, तथा उनके द्वारा पहले कभी न देखे गए इंद्र को देखा।
श्लोक 6 (skanda.6.206.6)
ते सर्वे ब्राह्मणाः प्रोक्तास्तदाश्रमसमीपगैः
te sarve brāhmaṇāḥ proktāstadāśramasamīpagaiḥ
आश्रम के समीपवासियों ने उन सभी ब्राह्मणों से यह कहा।
श्लोक 7 (skanda.6.206.7)
अयं शक्रः समायातो भवतामाश्रमे द्विजाः क्रियतामर्हणं चास्मै यच्चोक्तं शास्त्रचिंतकैः
ayaṁ śakraḥ samāyāto bhavatāmāśrame dvijāḥ kriyatāmarhaṇaṁ cāsmai yaccoktaṁ śāstraciṁtakaiḥ
'हे द्विजो, यह इंद्र आपके आश्रम में पधारे हैं। शास्त्रज्ञों द्वारा जो कहा गया है, उसके अनुसार इनका अर्घ्य-सत्कार कीजिए।'
श्लोक 8 (skanda.6.206.8)
ततस्ते ब्राह्मणाः सर्वे विस्मयोत्फुल्ललोचनाः संमुखाः प्रययुस्तूर्णं कृतांजलिपुटाः स्थिताः
tataste brāhmaṇāḥ sarve vismayotphullalocanāḥ saṁmukhāḥ prayayustūrṇaṁ kṛtāṁjalipuṭāḥ sthitāḥ
तब वे सभी ब्राह्मण, विस्मय से खिले हुए नेत्रों के साथ, तुरंत उनके सम्मुख गए और हाथ जोड़कर खड़े हो गए।
श्लोक 9 (skanda.6.206.9)
गृह्योक्तविधिना तस्मै संप्रहृष्टतनूरुहाः प्रोचुश्च विनयात्सर्वे किमागमनकारणम्
gṛhyoktavidhinā tasmai saṁprahṛṣṭatanūruhāḥ procuśca vinayātsarve kimāgamanakāraṇam
रोमांचित शरीर से, गृह्यसूत्र में कहे गए विधान से उनका सत्कार करके, सभी ने विनयपूर्वक पूछा — आगमन का क्या कारण है?
श्लोक 10 (skanda.6.206.10)
निरीहस्यापि देवेंद्र कौतुकं नो व्यवस्थितम्
nirīhasyāpi deveṁdra kautukaṁ no vyavasthitam
'हे देवेंद्र, आप निःस्पृह होते हुए भी, हमें इसके विषय में अत्यंत कुतूहल है।'
श्लोक 11 (skanda.6.206.11)
इन्द्र उवाच कुशलं वो द्विजश्रेष्ठा अनिहोत्रेषु कृत्स्नशः तपश्चर्यासु सर्वासु वेदाभ्यासे तथा श्रुते
indra uvāca kuśalaṁ vo dvijaśreṣṭhā anihotreṣu kṛtsnaśaḥ tapaścaryāsu sarvāsu vedābhyāse tathā śrute
इंद्र ने कहा — 'हे द्विजश्रेष्ठो, क्या आपके अग्निहोत्रों में, समस्त तपश्चर्याओं में, वेदाभ्यास में तथा श्रुति में सब कुशल है?'
श्लोक 12 (skanda.6.206.12)
हाटकेश्वरजं क्षेत्रं त्यक्त्वा तीर्थमयं शुभम् कस्मादत्र समायाता हिमार्तिजनके गिरौ
hāṭakeśvarajaṁ kṣetraṁ tyaktvā tīrthamayaṁ śubham kasmādatra samāyātā himārtijanake girau
'हाटकेश्वर से उत्पन्न उस शुभ, तीर्थमय क्षेत्र को छोड़कर, आप हिम की पीड़ा देने वाले इस पर्वत पर क्यों आ गए?'
श्लोक 13 (skanda.6.206.13)
तस्मात्सर्वे मया सार्धं समागच्छंतु सद्द्विजाः चमत्कारपुरे पुण्ये बहुविप्रसमाकुले
tasmātsarve mayā sārdhaṁ samāgacchaṁtu saddvijāḥ camatkārapure puṇye bahuviprasamākule
'अतः आप सभी सज्जन द्विज मेरे साथ पुण्यमय, अनेक ब्राह्मणों से भरे चमत्कारपुर को चलिए।'
श्लोक 14 (skanda.6.206.14)
वासुदेवसमादेशात्तत्र गत्वाथ सांप्रतम् गयाकूपे करिष्यामि श्राद्धं भक्त्या द्विजोत्तमाः
vāsudevasamādeśāttatra gatvātha sāṁpratam gayākūpe kariṣyāmi śrāddhaṁ bhaktyā dvijottamāḥ
'हे द्विजश्रेष्ठो, वासुदेव की आज्ञा से अभी वहाँ जाकर मैं गया-कूप में भक्तिपूर्वक श्राद्ध करूँगा।'
श्लोक 15 (skanda.6.206.15)
युष्मदग्रे चतुर्दश्यां प्रेतपक्ष उपस्थिते खेचरत्वं समायातं सर्वेषां भवतां स्फुटम्
yuṣmadagre caturdaśyāṁ pretapakṣa upasthite khecaratvaṁ samāyātaṁ sarveṣāṁ bhavatāṁ sphuṭam
'प्रेतपक्ष की चतुर्दशी को आपके समक्ष — यह स्पष्ट है कि आप सबको आकाशगमन की शक्ति प्राप्त हो चुकी है।'
श्लोक 16 (skanda.6.206.16)
सबालवृद्धपत्नीकाः साग्निहोत्रा मया सह तस्माद्गच्छत भद्रं वस्तत्र स्थानं भविष्यति
sabālavṛddhapatnīkāḥ sāgnihotrā mayā saha tasmādgacchata bhadraṁ vastatra sthānaṁ bhaviṣyati
'अपने बालकों, वृद्धों, पत्नियों तथा अग्निहोत्र सहित मेरे साथ चलिए। आपका कल्याण हो — वहाँ आपके लिए स्थान होगा।'
श्लोक 17 (skanda.6.206.17)
ब्राह्मणा ऊचुः न वयं तत्र यास्यामश्चमत्कारपुरं पुनः अन्येऽपि ब्राह्मणास्तत्र वेदवेदांगपारगाः
brāhmaṇā ūcuḥ na vayaṁ tatra yāsyāmaścamatkārapuraṁ punaḥ anye'pi brāhmaṇāstatra vedavedāṁgapāragāḥ
ब्राह्मणों ने कहा — 'हम पुनः चमत्कारपुर नहीं जाएँगे। वहाँ अन्य भी ब्राह्मण हैं जो वेद-वेदांग में पारंगत हैं,'
श्लोक 18 (skanda.6.206.18)
नागरा याज्ञिकाः संति स्मार्ताः श्रुतिपरायणाः तेषामग्रे कुरु श्राद्धं श्रद्धा चेच्छ्राद्धजा तव
nāgarā yājñikāḥ saṁti smārtāḥ śrutiparāyaṇāḥ teṣāmagre kuru śrāddhaṁ śraddhā cecchrāddhajā tava
'नागर, याज्ञिक, स्मार्त, श्रुतिपरायण। यदि आपको श्राद्ध की श्रद्धा है, तो उन्हीं के समक्ष श्राद्ध कीजिए।'
श्लोक 19 (skanda.6.206.19)
इन्द्र उवाच तत्र ये ब्राह्मणाः केचिद्भवद्भिः संप्रकीर्तिताः तथाविधाश्च ते सर्वे वेदवेदांगपारगाः
indra uvāca tatra ye brāhmaṇāḥ kecidbhavadbhiḥ saṁprakīrtitāḥ tathāvidhāśca te sarve vedavedāṁgapāragāḥ
इंद्र ने कहा — 'वहाँ जिन ब्राह्मणों का आपने वर्णन किया, वे सभी वैसे ही हैं — वेद-वेदांग में पारंगत,'
श्लोक 20 (skanda.6.206.20)
श्रुताध्ययनसंपन्ना याज्ञिकाश्च विशेषतः परं द्वेषपराः सर्वे तथा परुषवादिनः
śrutādhyayanasaṁpannā yājñikāśca viśeṣataḥ paraṁ dveṣaparāḥ sarve tathā paruṣavādinaḥ
'श्रुत-अध्ययन से संपन्न, विशेषतः याज्ञिक। किंतु वे सभी द्वेषपरायण हैं, तथा कठोर वचन बोलने वाले भी,'
श्लोक 21 (skanda.6.206.21)
अहंकारेण संयुक्ताः परस्परजिगीषवः तपसा विप्रयुक्ताश्च भोगसक्ता दिवानिशम्
ahaṁkāreṇa saṁyuktāḥ parasparajigīṣavaḥ tapasā viprayuktāśca bhogasaktā divāniśam
'अहंकार से युक्त, परस्पर विजय की कामना करने वाले, तप से रहित, तथा दिन-रात भोग में आसक्त हैं।'
श्लोक 22 (skanda.6.206.22)
यूयं सर्वगुणोपेता विष्णुना मे प्रकीर्तिताः तस्मादागमनं कार्यं मया सार्धं समस्तकैः
yūyaṁ sarvaguṇopetā viṣṇunā me prakīrtitāḥ tasmādāgamanaṁ kāryaṁ mayā sārdhaṁ samastakaiḥ
'आप सब गुणों से युक्त हैं, विष्णु ने मुझसे आपका ही वर्णन किया है। अतः आप सबको ही मेरे साथ आना चाहिए।'
श्लोक 23 (skanda.6.206.23)
ब्राह्मणा ऊचुः अस्माभिस्तेन दोषेण त्यक्तं स्थानं निजं हि तत् बहुतीर्थसमोपेतं स्वर्गमार्गप्रदर्शकम्
brāhmaṇā ūcuḥ asmābhistena doṣeṇa tyaktaṁ sthānaṁ nijaṁ hi tat bahutīrthasamopetaṁ svargamārgapradarśakam
ब्राह्मणों ने कहा — 'उसी दोष के कारण हमने अपना वह स्थान छोड़ दिया था, जो अनेक तीर्थों से युक्त तथा स्वर्ग-मार्ग दिखाने वाला था।'
श्लोक 24 (skanda.6.206.24)
यदि यास्यामहे तत्र त्वया सार्धं पुरंदर अस्माकं स्वजनाः सर्वे रागद्वेषपरायणाः
yadi yāsyāmahe tatra tvayā sārdhaṁ puraṁdara asmākaṁ svajanāḥ sarve rāgadveṣaparāyaṇāḥ
'हे पुरंदर, यदि हम आपके साथ वहाँ जाएँ, तो हमारे वहाँ के सभी स्वजन राग-द्वेष में परायण हैं,'
श्लोक 25 (skanda.6.206.25)
अपराधान्करिष्यंति नित्यमेव पदेपदे ईर्ष्याधर्मसमोपेताः परुषाक्षरजल्पकाः
aparādhānkariṣyaṁti nityameva padepade īrṣyādharmasamopetāḥ paruṣākṣarajalpakāḥ
'वे ईर्ष्या और अधर्म से युक्त, कठोर वचन बोलने वाले, सदा पग-पग पर हमारे प्रति अपराध करते रहेंगे।'
श्लोक 26 (skanda.6.206.26)
ततः संपत्स्यते क्रोधः क्रोधाच्च तपसः क्षयः ततो न प्राप्यते मुक्तिस्तद्गच्छामः कथं विभो
tataḥ saṁpatsyate krodhaḥ krodhācca tapasaḥ kṣayaḥ tato na prāpyate muktistadgacchāmaḥ kathaṁ vibho
'उससे क्रोध उत्पन्न होगा, क्रोध से तप का क्षय होगा, और तब मुक्ति प्राप्त नहीं होगी। तो हे प्रभो, हम वहाँ कैसे जाएँ?'
श्लोक 27 (skanda.6.206.27)
अपरं तत्र भूपोऽस्ति देशे दानपरः सदा आनर्ताधिपतिः ख्यातः सर्वभूमौ सदैव सः
aparaṁ tatra bhūpo'sti deśe dānaparaḥ sadā ānartādhipatiḥ khyātaḥ sarvabhūmau sadaiva saḥ
'इसके अतिरिक्त, उस देश में सदा दानपरायण एक राजा है — आनर्त का अधिपति, जो समस्त भूमि पर सदा विख्यात है।'
श्लोक 28 (skanda.6.206.28)
ददाति विविधं दानं हस्त्यश्वकनकादिकम् यदि तत्र न गृह्णीमस्तदा कोपं स गच्छति
dadāti vividhaṁ dānaṁ hastyaśvakanakādikam yadi tatra na gṛhṇīmastadā kopaṁ sa gacchati
'वह हाथी, घोड़े, स्वर्ण आदि विविध दान देता है। यदि हम वहाँ उसे स्वीकार न करें, तो वह क्रुद्ध हो जाता है,'
श्लोक 29 (skanda.6.206.29)
भूपाले कोपमापन्ने स्वजनेषु विरोधिषु सिद्धिर्नो तपसोऽस्माकं तेन त्यक्तं निजं पुरम्
bhūpāle kopamāpanne svajaneṣu virodhiṣu siddhirno tapaso'smākaṁ tena tyaktaṁ nijaṁ puram
'और राजा के क्रुद्ध होने पर तथा स्वजनों के विरोधी हो जाने पर, हमारे तप की सिद्धि नहीं होती। इसी कारण हमने अपना नगर त्याग दिया था।'
श्लोक 30 (skanda.6.206.30)
यदि गृह्णीमहे दानं तस्य भूपस्य देवप तपसः संप्रणाशः स्याद्यद्धि प्रोक्तं स्वयंभुवा
yadi gṛhṇīmahe dānaṁ tasya bhūpasya devapa tapasaḥ saṁpraṇāśaḥ syādyaddhi proktaṁ svayaṁbhuvā
'हे देवप, यदि हम उस राजा का दान स्वीकार करें, तो हमारे तप का सर्वथा नाश हो जाएगा — क्योंकि स्वयंभू ने ऐसा ही कहा है:'
श्लोक 31 (skanda.6.206.31)
दशसूनासमश्चक्री दशचक्रिसमो ध्वजी दशध्वजि समा वेश्या दशवेश्यासमो नृपः
daśasūnāsamaścakrī daśacakrisamo dhvajī daśadhvaji samā veśyā daśaveśyāsamo nṛpaḥ
'एक कुम्हार दस कसाइयों के समान है, एक रथकार दस कुम्हारों के समान है, एक वेश्या दस रथकारों के समान है, और एक राजा दस वेश्याओं के समान है।'
श्लोक 32 (skanda.6.206.32)
तत्कथं तस्य गृह्णीमो दानं पापरतस्य च यथाऽन्ये नागराः सर्वे लोभेन महतान्विताः
tatkathaṁ tasya gṛhṇīmo dānaṁ pāparatasya ca yathā'nye nāgarāḥ sarve lobhena mahatānvitāḥ
'तो हम उस पापरत राजा का दान कैसे स्वीकार करें, जैसे अन्य सभी नागर महालोभ से युक्त होकर करते हैं?'
श्लोक 33 (skanda.6.206.33)
इन्द्र उवाच प्रभावोऽयं द्विजश्रेष्ठास्तस्य क्षेत्रस्य संस्थितः हाटकेश्वरसंज्ञस्य सर्वदैव व्यवस्थितः
indra uvāca prabhāvo'yaṁ dvijaśreṣṭhāstasya kṣetrasya saṁsthitaḥ hāṭakeśvarasaṁjñasya sarvadaiva vyavasthitaḥ
इंद्र ने कहा — 'हे द्विजश्रेष्ठो, यह प्रभाव हाटकेश्वर नामक उस क्षेत्र में सदा से ही स्थित है,'
श्लोक 34 (skanda.6.206.34)
पितॄणां च सुतानां च बंधूनां च विशेषतः श्वश्रूणां च स्नुषाणां च भगिनीभ्रातृभार्ययोः
pitṝṇāṁ ca sutānāṁ ca baṁdhūnāṁ ca viśeṣataḥ śvaśrūṇāṁ ca snuṣāṇāṁ ca bhaginībhrātṛbhāryayoḥ
'जो पिता और पुत्रों को, विशेषतः बंधुओं को, सास और बहू को, तथा बहन और भाई की पत्नी को भी प्रभावित करता है,'
श्लोक 35 (skanda.6.206.35)
तस्याधस्तात्स्वयं देवो हाटकेश्वरसंज्ञितः पुरस्य विद्यते तस्य प्रतापेनाखिला जनाः
tasyādhastātsvayaṁ devo hāṭakeśvarasaṁjñitaḥ purasya vidyate tasya pratāpenākhilā janāḥ
'क्योंकि उसके नीचे स्वयं हाटकेश्वर नामक देव विराजमान हैं, और उस नगर के तेज के कारण समस्त जन,'
श्लोक 36 (skanda.6.206.36)
सन्तप्यंते ततो द्वेषं प्रकुर्वंति परस्परम् किं न श्रुतं भवद्भिस्तु यथा रामः सलक्ष्मणः सीतया सह संप्राप्तो विरोधं परमं गतः
santapyaṁte tato dveṣaṁ prakurvaṁti parasparam kiṁ na śrutaṁ bhavadbhistu yathā rāmaḥ salakṣmaṇaḥ sītayā saha saṁprāpto virodhaṁ paramaṁ gataḥ
'संतप्त हो जाते हैं और परस्पर द्वेष करने लगते हैं। क्या आपने नहीं सुना कि लक्ष्मण सहित राम, सीता के साथ वहाँ पहुँचकर परम विरोध को प्राप्त हो गए थे?'
श्लोक 37 (skanda.6.206.37)
सीतया लक्ष्मणेनैव सार्धं कोपेन संयुतः अवाच्यं प्रोक्तवान्विप्रास्तौ च तेन समं तदा
sītayā lakṣmaṇenaiva sārdhaṁ kopena saṁyutaḥ avācyaṁ proktavānviprāstau ca tena samaṁ tadā
'हे विप्रो, क्रोध से युक्त होकर उन्होंने सीता और लक्ष्मण से अवाच्य वचन कहे, और उन दोनों ने भी उस समय उनसे वैसा ही कहा।'
श्लोक 38 (skanda.6.206.38)
अपि मासं वसेत्तत्र यदि कोपविवर्जितः तदा मुक्तिमवाप्नोति स्वर्गभाक्पञ्चरात्रतः
api māsaṁ vasettatra yadi kopavivarjitaḥ tadā muktimavāpnoti svargabhākpañcarātrataḥ
'फिर भी, यदि कोई वहाँ क्रोध से रहित होकर एक मास भी निवास करे, तो वह मुक्ति प्राप्त कर लेता है; और मात्र पाँच रात्रियों से ही स्वर्ग का भागी होता है।'
श्लोक 39 (skanda.6.206.39)
तस्मात्तत्र प्रगंतव्यं युष्माभिस्तु मया सह ईर्ष्याधर्मं न युष्माभिस्ते करिष्यंति नागराः
tasmāttatra pragaṁtavyaṁ yuṣmābhistu mayā saha īrṣyādharmaṁ na yuṣmābhiste kariṣyaṁti nāgarāḥ
'अतः आपको मेरे साथ वहाँ अवश्य जाना चाहिए। वे नागर आपके प्रति ईर्ष्या और अधर्म नहीं करेंगे,'
श्लोक 40 (skanda.6.206.40)
न चैव भवतां कोपस्तत्रस्थानां भविष्यति प्रसादान्मम विप्रेंद्राः सत्यमेतन्मयोदितम्
na caiva bhavatāṁ kopastatrasthānāṁ bhaviṣyati prasādānmama vipreṁdrāḥ satyametanmayoditam
'और वहाँ रहते हुए आपको भी क्रोध नहीं आएगा — यह मेरी ही कृपा से होगा। हे विप्रेंद्रो, यह मेरा कहा हुआ सत्य वचन है।'
श्लोक 41 (skanda.6.206.41)
आनर्तः पार्थिवो दाने योजयिष्यति न क्वचित् युष्माकं पुत्रपौत्रेभ्यो ये दास्यंति च कन्यकाः
ānartaḥ pārthivo dāne yojayiṣyati na kvacit yuṣmākaṁ putrapautrebhyo ye dāsyaṁti ca kanyakāḥ
'राजा आनर्त आपको कभी भी दान लेने पर बाध्य नहीं करेगा। आपके पुत्र-पौत्रों को जो अपनी कन्याएँ देंगे,'
श्लोक 42 (skanda.6.206.42)
सहस्रगुणितं तेषां तत्फलं संभविष्यति अमावास्यादिने श्राद्धं कन्यासंस्थे दिवाकरे
sahasraguṇitaṁ teṣāṁ tatphalaṁ saṁbhaviṣyati amāvāsyādine śrāddhaṁ kanyāsaṁsthe divākare
'उनका वह फल सहस्रगुणित हो जाएगा। सूर्य के कन्या राशि में रहते हुए अमावास्या के दिन,'
श्लोक 43 (skanda.6.206.43)
युष्मदग्रे द्विजश्रेष्ठा गया कूप्यां करिष्यति यस्तस्य तत्फलं भावि सहस्रशतसंमितम्
yuṣmadagre dvijaśreṣṭhā gayā kūpyāṁ kariṣyati yastasya tatphalaṁ bhāvi sahasraśatasaṁmitam
'हे द्विजश्रेष्ठो, जो आपके समक्ष गया-कूपिका में श्राद्ध करेगा, उसका वह फल एक लाख गुना होगा।'
श्लोक 44 (skanda.6.206.44)
गयाश्राद्धान्न सन्देहः सत्यमेतन्मयोदितम् यदि श्राद्धकृते तत्र नायास्यथ द्विजोत्तमाः
gayāśrāddhānna sandehaḥ satyametanmayoditam yadi śrāddhakṛte tatra nāyāsyatha dvijottamāḥ
'निःसंदेह वह गया-श्राद्ध से भी बढ़कर होगा — यह मेरा कहा सत्य वचन है। किंतु हे द्विजश्रेष्ठो, यदि आप श्राद्ध के लिए वहाँ नहीं आएँगे,'
श्लोक 45 (skanda.6.206.45)
ततः शापं प्रदास्यामि तपोविघ्नकरं हि वः एवं ज्ञात्वा मया सार्धं तत्राऽऽगच्छत सत्वरम्
tataḥ śāpaṁ pradāsyāmi tapovighnakaraṁ hi vaḥ evaṁ jñātvā mayā sārdhaṁ tatrā''gacchata satvaram
'तो मैं आपको ऐसा शाप दूँगा जो आपके तप में विघ्न डाले। यह जानकर मेरे साथ शीघ्र वहाँ आइए।'
श्लोक 46 (skanda.6.206.46)
इत्युक्तास्तेन ते सर्वे शक्रेण सह तत्क्षणात् कश्यपश्चैव कौंडिन्य उक्ष्णाशः शार्कवो द्विषः
ityuktāstena te sarve śakreṇa saha tatkṣaṇāt kaśyapaścaiva kauṁḍinya ukṣṇāśaḥ śārkavo dviṣaḥ
उनसे ऐसा कहे जाने पर वे सब उसी क्षण इंद्र के साथ चल पड़े — कश्यप, कौंडिन्य, उक्ष्णाश, शार्कव, द्विष,
श्लोक 47 (skanda.6.206.47)
बैजवापश्चैव षष्ठः कापिष्ठलो द्विकस्तथा एतत्कुलाष्टकं प्राप्तमिंद्रेण सह पार्थिव
baijavāpaścaiva ṣaṣṭhaḥ kāpiṣṭhalo dvikastathā etatkulāṣṭakaṁ prāptamiṁdreṇa saha pārthiva
बैजवाप, छठा, तथा कापिष्ठल आठवाँ — हे राजन्, यह अष्टकुल इंद्र के साथ चल पड़ा।
श्लोक 48 (skanda.6.206.48)
अग्निष्वात्तादिकान्सर्वान्पितॄनाहूय कृत्स्नशः विश्वेदेवांस्तथा चैव प्रस्थितः पाकशासनः
agniṣvāttādikānsarvānpitṝnāhūya kṛtsnaśaḥ viśvedevāṁstathā caiva prasthitaḥ pākaśāsanaḥ
अग्निष्वात्त आदि समस्त पितरों को, तथा विश्वेदेवों को भी आमंत्रित करके, इंद्र ने प्रस्थान किया,
श्लोक 49 (skanda.6.206.49)
सम्यक्छ्रद्धासमाविष्टश्चमत्कारपुरं प्रति एतस्मिन्नेव काले तु ब्रह्मा लोकपितामहः
samyakchraddhāsamāviṣṭaścamatkārapuraṁ prati etasminneva kāle tu brahmā lokapitāmahaḥ
पूर्ण श्रद्धा से युक्त होकर, चमत्कारपुर की ओर। इसी समय लोकपितामह ब्रह्मा भी,
श्लोक 50 (skanda.6.206.50)
गयायां प्रस्थितः सोऽपि श्राद्धार्थं तत्र वासरे विश्वेदेवाः प्रतिज्ञाय गयायां प्रस्थिता विधिम्
gayāyāṁ prasthitaḥ so'pi śrāddhārthaṁ tatra vāsare viśvedevāḥ pratijñāya gayāyāṁ prasthitā vidhim
उसी दिन श्राद्ध के लिए गया की ओर प्रस्थान कर चुके थे; और विश्वेदेव भी वचन देकर गया के विधि-कर्म की ओर प्रस्थान कर चुके थे,
श्लोक 51 (skanda.6.206.51)
शक्र श्राद्धं परित्यज्य गता यत्र पितामहः शक्रोऽपि तत्पुरं प्राप्य गयाकूप्यामुपागतः
śakra śrāddhaṁ parityajya gatā yatra pitāmahaḥ śakro'pi tatpuraṁ prāpya gayākūpyāmupāgataḥ
इंद्र का श्राद्ध छोड़कर, वहाँ जहाँ पितामह थे। इंद्र भी उस नगर में पहुँचकर गया-कूपिका के पास आ गए।
श्लोक 52 (skanda.6.206.52)
ततः स्नात्वाह्वयामास श्राद्धार्थं श्रद्धयान्वितः विश्वेदेवान्पितॄंश्चैव काले कुतपसंज्ञिते
tataḥ snātvāhvayāmāsa śrāddhārthaṁ śraddhayānvitaḥ viśvedevānpitṝṁścaiva kāle kutapasaṁjñite
तब स्नान करके, श्रद्धा से युक्त होकर, कुतप नामक समय पर उन्होंने श्राद्ध के लिए विश्वेदेवों तथा पितरों का आवाहन किया।
श्लोक 53 (skanda.6.206.53)
एतस्मिन्नंतरे प्राप्ताः समाहूताश्च तेन ये पितरो देवरूपा ये प्रेतरूपास्तथैव च
etasminnaṁtare prāptāḥ samāhūtāśca tena ye pitaro devarūpā ye pretarūpāstathaiva ca
इसी बीच उनके द्वारा बुलाए गए पितर वहाँ आए — जो देवरूपधारी थे, तथा जो प्रेतरूपधारी थे भी,
श्लोक 54 (skanda.6.206.54)
प्रत्यक्षरूपिणः सर्वे द्विजोपांते समाश्रिताः विश्वेदेवा न संप्राप्ता ये गयायां गतास्तदा
pratyakṣarūpiṇaḥ sarve dvijopāṁte samāśritāḥ viśvedevā na saṁprāptā ye gayāyāṁ gatāstadā
सभी साक्षात् रूप धारण करके ब्राह्मणों के समीप एकत्रित हुए। किंतु विश्वेदेव, जो उस समय गया गए हुए थे, नहीं आए।
श्लोक 55 (skanda.6.206.55)
ततो विलंबमकरोत्तदर्थं पाकशासनः विश्वेदेवा यतः श्राद्धे पूज्याः प्रथममेव च
tato vilaṁbamakarottadarthaṁ pākaśāsanaḥ viśvedevā yataḥ śrāddhe pūjyāḥ prathamameva ca
तब इंद्र ने उनके लिए प्रतीक्षा की, क्योंकि श्राद्ध में विश्वेदेव ही सर्वप्रथम पूज्य होते हैं।
श्लोक 56 (skanda.6.206.56)
एतस्मिन्नंतरे प्राप्तो नारदो मुनिसत्तमः शक्रं प्राह समागत्य विश्वेदेवाऽभिकांक्षिणम्
etasminnaṁtare prāpto nārado munisattamaḥ śakraṁ prāha samāgatya viśvedevā'bhikāṁkṣiṇam
इसी बीच मुनिश्रेष्ठ नारद आ पहुँचे, और विश्वेदेवों की प्रतीक्षा करते हुए इंद्र के पास आकर उनसे कहा।
श्लोक 57 (skanda.6.206.57)
नारद उवाच विश्वेदेवा गताः शक्र श्राद्धे पैतामहेऽधुना गयायां ते मया दृष्टा गच्छमानाः प्रहर्षिताः
nārada uvāca viśvedevā gatāḥ śakra śrāddhe paitāmahe'dhunā gayāyāṁ te mayā dṛṣṭā gacchamānāḥ praharṣitāḥ
नारद ने कहा — 'हे इंद्र, विश्वेदेव अभी पितामह के श्राद्ध में चले गए हैं। मैंने स्वयं उन्हें प्रसन्नतापूर्वक गया की ओर जाते हुए देखा है।'
श्लोक 58 (skanda.6.206.58)
तच्छ्रुत्वा तत्र कुपितस्तेषामुपरि तत्क्षणात् अब्रवीत्परुषं वाक्यं विप्राणां पुरतः स्थितः
tacchrutvā tatra kupitasteṣāmupari tatkṣaṇāt abravītparuṣaṁ vākyaṁ viprāṇāṁ purataḥ sthitaḥ
यह सुनकर, उसी क्षण उन पर क्रुद्ध होकर, ब्राह्मणों के समक्ष खड़े होकर उन्होंने कठोर वचन कहा।
श्लोक 59 (skanda.6.206.59)
विश्वेदेवान्विना श्राद्धं करिष्याम्यहमद्य भोः तथान्ये मानवाः सर्वे करिष्यंति धरातले
viśvedevānvinā śrāddhaṁ kariṣyāmyahamadya bhoḥ tathānye mānavāḥ sarve kariṣyaṁti dharātale
'हे लोगो, मैं आज विश्वेदेवों के बिना ही श्राद्ध करूँगा! और पृथ्वी पर अन्य सभी मनुष्य भी वैसा ही करेंगे।'
श्लोक 60 (skanda.6.206.60)
विश्वेदेवान्पुरः स्थाप्य योऽत्र श्राद्धं करिष्यति व्यर्थतां यास्यते तस्य ऊषरे वर्षितं यथा
viśvedevānpuraḥ sthāpya yo'tra śrāddhaṁ kariṣyati vyarthatāṁ yāsyate tasya ūṣare varṣitaṁ yathā
'अब से जो विश्वेदेवों को आगे रखकर श्राद्ध करेगा, उसका वह श्राद्ध बंजर भूमि पर हुई वर्षा के समान व्यर्थ हो जाएगा।'
श्लोक 61 (skanda.6.206.61)
एवमुक्त्वा सहस्राक्ष एकोद्दिष्टानि कृत्स्नशः चकार सर्वदेवानां ये हता रणमूर्धनि
evamuktvā sahasrākṣa ekoddiṣṭāni kṛtsnaśaḥ cakāra sarvadevānāṁ ye hatā raṇamūrdhani
ऐसा कहकर सहस्राक्ष इंद्र ने, युद्ध के अग्रभाग में मारे गए समस्त देवताओं के लिए, संपूर्ण एकोद्दिष्ट श्राद्ध किया।
श्लोक 62 (skanda.6.206.62)
एतस्मिन्नेव काले तु वागुवाचाशरीरिणी येषामुद्दिश्य तच्छ्राद्धं कृतं तेषां नृपोत्तम
etasminneva kāle tu vāguvācāśarīriṇī yeṣāmuddiśya tacchrāddhaṁ kṛtaṁ teṣāṁ nṛpottama
हे नृपोत्तम, इसी समय एक अशरीरी वाणी बोली, उन्हीं के विषय में जिनके उद्देश्य से वह श्राद्ध किया गया था।
श्लोक 63 (skanda.6.206.63)
शक्रशक्र महाबाहो येषां श्राद्धं कृतं त्वया प्रेतत्वे संस्थितानां च प्रेतत्वेन विवर्जिताः
śakraśakra mahābāho yeṣāṁ śrāddhaṁ kṛtaṁ tvayā pretatve saṁsthitānāṁ ca pretatvena vivarjitāḥ
'हे इंद्र, इंद्र, हे महाबाहो, जिनका श्राद्ध तुमने किया, वे प्रेत-भाव में स्थित लोग अब प्रेत-भाव से मुक्त हो गए हैं।'
श्लोक 64 (skanda.6.206.64)
गताः स्वर्गप्रसादात्ते दिव्यरूपवपुर्धराः ये पुनः स्वर्गताः पूर्वं युध्यमाना महाहवे
gatāḥ svargaprasādātte divyarūpavapurdharāḥ ye punaḥ svargatāḥ pūrvaṁ yudhyamānā mahāhave
'वे स्वर्ग की कृपा से दिव्य रूप धारण करके चले गए। और जो पहले महायुद्ध में लड़ते हुए स्वर्ग को प्राप्त हुए थे,'
श्लोक 65 (skanda.6.206.65)
ते च मोक्षं गताः सर्वे प्रसादात्तव वासव तच्छ्रुत्वा वासवो वाक्यं तोषेण महतान्वितः
te ca mokṣaṁ gatāḥ sarve prasādāttava vāsava tacchrutvā vāsavo vākyaṁ toṣeṇa mahatānvitaḥ
'हे वासव, वे सब भी तुम्हारी ही कृपा से मोक्ष को प्राप्त हो गए हैं।' यह वचन सुनकर वासव अत्यंत संतोष से भर गए।
श्लोक 66 (skanda.6.206.66)
अहो तीर्थमहो तीर्थं शंसमानः पुनःपुनः एतस्मिन्नन्तरे प्राप्ता विश्वे देवाः समुत्सुकाः
aho tīrthamaho tīrthaṁ śaṁsamānaḥ punaḥpunaḥ etasminnantare prāptā viśve devāḥ samutsukāḥ
वे बार-बार 'अहो तीर्थ! अहो तीर्थ!' कहकर उसकी प्रशंसा करने लगे। इसी बीच व्याकुल विश्वेदेव भी वहाँ आ पहुँचे,
श्लोक 67 (skanda.6.206.67)
निर्वृत्य ब्रह्मणः श्राद्धं गयायां तत्र पार्थिव प्रोचुश्च वृत्रहंतारं कुरु श्राद्धं शतक्रतो
nirvṛtya brahmaṇaḥ śrāddhaṁ gayāyāṁ tatra pārthiva procuśca vṛtrahaṁtāraṁ kuru śrāddhaṁ śatakrato
हे राजन्, गया में ब्रह्मा का श्राद्ध पूर्ण करके। उन्होंने वृत्रासुर के वधकर्ता से कहा — 'हे शतक्रतो, अब श्राद्ध करो।'
श्लोक 68 (skanda.6.206.68)
भूयोऽपि न विनाऽस्माभिर्लभ्यते श्राद्धजं फलम् वयं दूरात्समायातास्तव श्राद्धस्य कारणात् निर्वर्त्य ब्रह्मणः श्राद्धं येन पूर्वं निमंत्रिताः
bhūyo'pi na vinā'smābhirlabhyate śrāddhajaṁ phalam vayaṁ dūrātsamāyātāstava śrāddhasya kāraṇāt nirvartya brahmaṇaḥ śrāddhaṁ yena pūrvaṁ nimaṁtritāḥ
'हमारे बिना श्राद्ध का फल कभी प्राप्त नहीं होता। हम तुम्हारे ही श्राद्ध के कारण, जिसमें पहले हमें आमंत्रित किया गया था, ब्रह्मा का श्राद्ध पूर्ण करके दूर से यहाँ आए हैं।'
श्लोक 69 (skanda.6.206.69)
तच्छ्रुत्वा वचनं तेषां कुपितः पाकशासनः अब्रवीत्परुषं वाक्यं मेघगम्भीरया गिरा
tacchrutvā vacanaṁ teṣāṁ kupitaḥ pākaśāsanaḥ abravītparuṣaṁ vākyaṁ meghagambhīrayā girā
उनका यह वचन सुनकर, क्रुद्ध होकर इंद्र ने मेघ के समान गंभीर वाणी में यह कठोर वचन कहा।
श्लोक 70 (skanda.6.206.70)
अद्यप्रभृति यः श्राद्धं मर्त्यलोके करिष्यति अन्योऽपि यो भवत्पूर्वं वृथा तस्य भविष्यति
adyaprabhṛti yaḥ śrāddhaṁ martyaloke kariṣyati anyo'pi yo bhavatpūrvaṁ vṛthā tasya bhaviṣyati
'आज से जो भी मृत्युलोक में श्राद्ध करेगा — तथा जिसने भी तुम्हारे आने से पहले किया — वह उसके लिए व्यर्थ हो जाएगा।'
श्लोक 71 (skanda.6.206.71)
एकोद्दिष्टानि श्राद्धानि करिष्यंत्यखिला जनाः सांप्रतं मर्त्यलोकेऽत्र मर्यादेयं कृता मया
ekoddiṣṭāni śrāddhāni kariṣyaṁtyakhilā janāḥ sāṁprataṁ martyaloke'tra maryādeyaṁ kṛtā mayā
'सभी मनुष्य अब केवल एकोद्दिष्ट श्राद्ध ही करेंगे। अभी मैंने इस मृत्युलोक में यह मर्यादा स्थापित की है।'
श्लोक 72 (skanda.6.206.72)
भूताः प्रेताः पिशाचाश्च ये चान्ये श्राद्धहारकाः विश्वेदेवैः प्ररक्ष्यंते रक्षयिष्यामि तानहम्
bhūtāḥ pretāḥ piśācāśca ye cānye śrāddhahārakāḥ viśvedevaiḥ prarakṣyaṁte rakṣayiṣyāmi tānaham
'भूत, प्रेत, पिशाच तथा अन्य जो भी श्राद्ध को हर लेने वाले हैं, वे विश्वेदेवों से रक्षित रहते हैं — अब मैं स्वयं उनसे रक्षा करूँगा।'
श्लोक 73 (skanda.6.206.73)
यजमानस्य काये च श्राद्धं संयोज्य यत्नतः मया हताः प्रयास्यंति सर्वे ते दूरतो द्रुतम्
yajamānasya kāye ca śrāddhaṁ saṁyojya yatnataḥ mayā hatāḥ prayāsyaṁti sarve te dūrato drutam
'श्राद्ध को यत्नपूर्वक यजमान के शरीर से जोड़कर, मेरे द्वारा प्रताड़ित होकर वे सभी दूर भाग जाएँगे।'
श्लोक 74 (skanda.6.206.74)
एवमुक्त्वा सहस्राक्षो विश्वेदेवांस्ततः परम् प्रोवाच ब्राह्मणान्सर्वान्विश्वेदेवैर्विना कृतम् श्राद्धकर्म भवद्भिस्तु कार्यमन्यैश्च मानवैः
evamuktvā sahasrākṣo viśvedevāṁstataḥ param provāca brāhmaṇānsarvānviśvedevairvinā kṛtam śrāddhakarma bhavadbhistu kāryamanyaiśca mānavaiḥ
विश्वेदेवों से ऐसा कहकर, सहस्राक्ष ने फिर समस्त ब्राह्मणों से कहा — 'अब से आपको तथा अन्य सभी मनुष्यों को विश्वेदेवों के बिना ही श्राद्ध-कर्म करना चाहिए।'
श्लोक 75 (skanda.6.206.75)
तथेत्युक्ते द्विजेंद्रैश्च विश्वेदेवाः सुदुःखिताः रुरुदुर्बाष्पपूरेण प्लावयन्तो वसुन्धराम्
tathetyukte dvijeṁdraiśca viśvedevāḥ suduḥkhitāḥ rurudurbāṣpapūreṇa plāvayanto vasundharām
द्विजेंद्रों के 'तथास्तु' कहने पर, अत्यंत दुःखी विश्वेदेव पृथ्वी को आँसुओं की धारा से प्लावित करते हुए रो पड़े।
श्लोक 76 (skanda.6.206.76)
तेषामुष्णाश्रुणा तेन यत्पृथ्वी प्लाविता नृप भूतान्यंडान्यनेकानि संख्यया रहितानि च
teṣāmuṣṇāśruṇā tena yatpṛthvī plāvitā nṛpa bhūtānyaṁḍānyanekāni saṁkhyayā rahitāni ca
हे राजन्, उनके उष्ण अश्रुओं से जो पृथ्वी प्लावित हुई, उससे संख्यारहित अनेक अंडे उत्पन्न हो गए।
श्लोक 77 (skanda.6.206.77)
ततोंऽडेभ्यो विनिष्क्रांताः प्राणिनो रौद्ररूपिणः कृष्णदंताः शंकुकर्णा ऊर्ध्वकेशा भयावहाः रक्ताक्षाश्च ततः प्रोचुर्विश्वेदेवांश्च ते नृप
tatoṁ'ḍebhyo viniṣkrāṁtāḥ prāṇino raudrarūpiṇaḥ kṛṣṇadaṁtāḥ śaṁkukarṇā ūrdhvakeśā bhayāvahāḥ raktākṣāśca tataḥ procurviśvedevāṁśca te nṛpa
हे राजन्, तब उन अंडों से भयंकर रूप वाले प्राणी निकले — काले दाँतों वाले, नुकीले कानों वाले, खड़े केशों वाले, भयावह, लाल आँखों वाले। उन्होंने विश्वेदेवों से कहा,
श्लोक 78 (skanda.6.206.78)
वयं बुभुक्षिताः सर्वे भोजनं दीयतां ध्रुवम् भवद्भिर्विहिता यस्माद्याचयामो न चापरम्
vayaṁ bubhukṣitāḥ sarve bhojanaṁ dīyatāṁ dhruvam bhavadbhirvihitā yasmādyācayāmo na cāparam
'हम सब भूखे हैं, हमें अवश्य भोजन दीजिए। चूँकि हम आपके द्वारा ही रचे गए हैं, अतः हम आपसे ही माँगते हैं, किसी अन्य से नहीं।'
श्लोक 79 (skanda.6.206.79)
विश्वेदेवा ऊचुः अस्माभी रहितं श्राद्धं किञ्चित्संजायते क्षितौ श्रद्धया परया यच्च युष्माकं भावि भोजनम्
viśvedevā ūcuḥ asmābhī rahitaṁ śrāddhaṁ kiñcitsaṁjāyate kṣitau śraddhayā parayā yacca yuṣmākaṁ bhāvi bhojanam
विश्वेदेवों ने कहा — 'इस पृथ्वी पर हमारे बिना जो भी श्राद्ध परम श्रद्धा से किया जाएगा, वही तुम्हारा भोजन होगा।'
श्लोक 80 (skanda.6.206.80)
एवमुक्त्वा तु ते श्राद्धं विश्वेदेवा नृपोत्तम ब्रह्मलोकं गताः सर्वे दुःखेन महताऽन्विताः प्रोचुश्च दीनया वाचा प्रणिपत्य पितामहम्
evamuktvā tu te śrāddhaṁ viśvedevā nṛpottama brahmalokaṁ gatāḥ sarve duḥkhena mahatā'nvitāḥ procuśca dīnayā vācā praṇipatya pitāmaham
हे नृपोत्तम, इस प्रकार श्राद्ध के विषय में कहकर, अत्यंत दुःखी वे सभी विश्वेदेव ब्रह्मलोक को गए, और पितामह को प्रणाम करके दीन वाणी में यह बोले।
श्लोक 81 (skanda.6.206.81)
वयं बाह्याः कृता देव श्राद्धानां बलविद्विषा तव श्राद्धे गता यस्माद्गयायां प्राङ्निमंत्रिताः
vayaṁ bāhyāḥ kṛtā deva śrāddhānāṁ balavidviṣā tava śrāddhe gatā yasmādgayāyāṁ prāṅnimaṁtritāḥ
'हे देव, बलशाली इंद्र ने हमें श्राद्धों से बाहर कर दिया है, क्योंकि हम आपके ही निमंत्रण पर गया में आपके श्राद्ध में गए थे।'
श्लोक 82 (skanda.6.206.82)
तेन रुष्टः सहस्राक्षस्तव चांते समागताः तस्मात्कुरु प्रसादं नः श्राद्धार्हाः स्याम वै यथा
tena ruṣṭaḥ sahasrākṣastava cāṁte samāgatāḥ tasmātkuru prasādaṁ naḥ śrāddhārhāḥ syāma vai yathā
'इसी से रुष्ट होकर सहस्राक्ष ने ऐसा किया। अब हम आपके ही पास आए हैं। अतः हम पर कृपा कीजिए, जिससे हम पुनः श्राद्ध के योग्य हो सकें।'
श्लोक 83 (skanda.6.206.83)
तच्छ्रुत्वा सत्वरं ब्रह्मा कृपया परयान्वितः विश्वेदेवान्समादाय कूप्माण्डैस्तैः समन्वितान्
tacchrutvā satvaraṁ brahmā kṛpayā parayānvitaḥ viśvedevānsamādāya kūpmāṇḍaistaiḥ samanvitān
यह सुनकर ब्रह्मा तुरंत परम कृपा से युक्त होकर, उन कूष्मांडों सहित विश्वेदेवों को साथ लेकर,
श्लोक 84 (skanda.6.206.84)
शक्रोऽपि श्राद्धकर्माणि कृत्वा तेषां दिवौकसाम् तीर्थयात्रापरो भूत्वा तथैव च व्यवस्थितः
śakro'pi śrāddhakarmāṇi kṛtvā teṣāṁ divaukasām tīrthayātrāparo bhūtvā tathaiva ca vyavasthitaḥ
इस बीच इंद्र भी उन देवताओं के श्राद्ध-कर्म पूर्ण करके, तीर्थयात्रा में तत्पर होकर वहीं स्थित रहे।
श्लोक 85 (skanda.6.206.85)
एतस्मिन्नेव काले तु ब्रह्मा तत्र समागतः विश्वेदेवसमायुक्तो हंसयानसमाश्रितः
etasminneva kāle tu brahmā tatra samāgataḥ viśvedevasamāyukto haṁsayānasamāśritaḥ
इसी समय ब्रह्मा भी, विश्वेदेवों सहित, हंसयान पर आरूढ़ होकर वहाँ आ पहुँचे।
श्लोक 86 (skanda.6.206.86)
शक्रोऽपि सहसा दृष्ट्वा संप्राप्तं कमलासनम् अर्घ्यमादाय पाद्यं च सत्वरं सम्मुखो ययौ
śakro'pi sahasā dṛṣṭvā saṁprāptaṁ kamalāsanam arghyamādāya pādyaṁ ca satvaraṁ sammukho yayau
इंद्र भी अचानक कमलासन को आया हुआ देखकर, अर्घ्य और पाद्य लेकर तुरंत उनके सम्मुख गए।
श्लोक 87 (skanda.6.206.87)
ततः प्रणम्य शिरसा साष्टांगं विनयान्वितः प्रोवाच प्रांजलिर्भूत्वा स्वागतं ते पितामह
tataḥ praṇamya śirasā sāṣṭāṁgaṁ vinayānvitaḥ provāca prāṁjalirbhūtvā svāgataṁ te pitāmaha
तब सिर झुकाकर साष्टांग प्रणाम करके, विनयपूर्वक हाथ जोड़कर उन्होंने कहा — 'हे पितामह, आपका स्वागत है।'
श्लोक 88 (skanda.6.206.88)
तव संदर्शनादेव ज्ञातं जन्मत्रयं मया द्रुतं पूर्वं शुभं कर्म करोमि च यथाऽधुना
tava saṁdarśanādeva jñātaṁ janmatrayaṁ mayā drutaṁ pūrvaṁ śubhaṁ karma karomi ca yathā'dhunā
'आपके दर्शन मात्र से ही मुझे तीन जन्मों का ज्ञान हो गया है। अभी जो शुभ कर्म पहले करना चाहिए, वह मैं शीघ्र करता हूँ,'
श्लोक 89 (skanda.6.206.89)
करिष्यामि परे लोके व्यक्तमेतदसंशयम्
kariṣyāmi pare loke vyaktametadasaṁśayam
'और परलोक के लिए भी यह स्पष्ट रूप से, निःसंदेह करूँगा।'
श्लोक 90 (skanda.6.206.90)
निःस्पृहस्यापि ते देव यदागमनकारणम् तन्मे द्रुततरं ब्रूहि येन सर्वं करोम्यहम्
niḥspṛhasyāpi te deva yadāgamanakāraṇam tanme drutataraṁ brūhi yena sarvaṁ karomyaham
'हे देव, आप निःस्पृह होते हुए भी जिस कारण से यहाँ पधारे हैं, वह मुझे शीघ्र बताइए, जिससे मैं सब कुछ कर सकूँ।'
श्लोक 91 (skanda.6.206.91)
ब्रह्मोवाच यैर्विना न भवेच्छ्राद्धं ममापि सुरसत्तम विश्वेदेवास्त्वया तेऽद्य श्राद्धबाह्या विनिर्मिताः
brahmovāca yairvinā na bhavecchrāddhaṁ mamāpi surasattama viśvedevāstvayā te'dya śrāddhabāhyā vinirmitāḥ
ब्रह्मा ने कहा — 'हे सुरसत्तम, जिनके बिना मेरा भी श्राद्ध संपन्न नहीं होता, उन विश्वेदेवों को तुमने आज श्राद्ध से बाहर कर दिया है।'
श्लोक 92 (skanda.6.206.92)
तत्त्वया न कृतं भद्रं तेन कर्म वितन्वता अप्रमाणं कृता वेदा यतश्च स्मृतयस्तथा
tattvayā na kṛtaṁ bhadraṁ tena karma vitanvatā apramāṇaṁ kṛtā vedā yataśca smṛtayastathā
'यह कर्म करते हुए तुमने अच्छा नहीं किया, क्योंकि इससे वेद तथा स्मृतियाँ भी अप्रमाण हो गई हैं।'
श्लोक 93 (skanda.6.206.93)
एते पूर्वं मया शक्र श्राद्धार्थं विनिमंत्रिताः पश्चात्त्वया न दोषोऽस्ति तस्माच्चैषां महात्मनाम्
ete pūrvaṁ mayā śakra śrāddhārthaṁ vinimaṁtritāḥ paścāttvayā na doṣo'sti tasmāccaiṣāṁ mahātmanām
'हे इंद्र, इन्हें पहले मैंने ही श्राद्ध के लिए आमंत्रित किया था। इसलिए इन महात्माओं का इसमें कोई दोष नहीं है, तुम्हारे यहाँ बाद में आने से।'
श्लोक 94 (skanda.6.206.94)
तस्माच्छापप्रमोक्षार्थं त्वं यतस्व सुरेश्वर येन स्युः श्राद्धयोग्याश्च सर्वेऽमी दुःखिता भृशम्
tasmācchāpapramokṣārthaṁ tvaṁ yatasva sureśvara yena syuḥ śrāddhayogyāśca sarve'mī duḥkhitā bhṛśam
'अतः हे सुरेश्वर, शाप से मुक्ति के लिए प्रयत्न करो, जिससे अत्यंत दुःखी हुए ये सभी पुनः श्राद्ध के योग्य हो सकें।'
श्लोक 95 (skanda.6.206.95)
पुरा ह्येतन्मया प्रोक्तं सर्वेषां च द्विजन्मनाम् एतत्पूर्वं च यच्छ्राद्धं सफलं तद्भविष्यति
purā hyetanmayā proktaṁ sarveṣāṁ ca dvijanmanām etatpūrvaṁ ca yacchrāddhaṁ saphalaṁ tadbhaviṣyati
'यह पहले मैंने ही समस्त ब्राह्मणों से कहा था कि इनके साथ किया गया श्राद्ध सदा सफल होगा।'
श्लोक 96 (skanda.6.206.96)
तत्कथं मम वाक्यं त्वमसत्यं प्रकरोषि च
tatkathaṁ mama vākyaṁ tvamasatyaṁ prakaroṣi ca
'तो फिर तुम मेरे वचन को असत्य क्यों कर रहे हो?'
श्लोक 97 (skanda.6.206.97)
इंद्र उवाच मयाऽपि कोपयुक्तेन शप्ता एते पितामह तद्यथा सत्यवाक्योऽहं प्रभवामि तथा कुरु
iṁdra uvāca mayā'pi kopayuktena śaptā ete pitāmaha tadyathā satyavākyo'haṁ prabhavāmi tathā kuru
इंद्र ने कहा — 'हे पितामह, क्रोध में आकर मैंने भी इन्हें शाप दे दिया है। ऐसा कीजिए जिससे मेरा वचन भी सत्य ही रहे।'
श्लोक 98 (skanda.6.206.98)
ब्रह्मोवाच तव वाक्यं यथा सत्यं प्रभविष्यति वासव तथाऽहं संविधास्यामि विश्वेदेवार्थमेव ह
brahmovāca tava vākyaṁ yathā satyaṁ prabhaviṣyati vāsava tathā'haṁ saṁvidhāsyāmi viśvedevārthameva ha
ब्रह्मा ने कहा — 'हे वासव, मैं ऐसी व्यवस्था करूँगा जिससे तुम्हारा वचन भी सत्य रहे, और यह विश्वेदेवों के हित में भी हो।'
श्लोक 99 (skanda.6.206.99)
विश्वेदेवैर्विना श्राद्धं यत्त्वया समुदाहृतम् एकोद्दिष्टं नराः सर्वे करिष्यंति धरातले
viśvedevairvinā śrāddhaṁ yattvayā samudāhṛtam ekoddiṣṭaṁ narāḥ sarve kariṣyaṁti dharātale
'विश्वेदेवों के बिना जो एकोद्दिष्ट श्राद्ध तुमने बताया है, पृथ्वी पर सभी मनुष्य वही करेंगे।'
श्लोक 100 (skanda.6.206.100)
तस्मिन्नहनि देवेंद्र त्वया यत्र विनिर्मितम् प्रेतपक्षे चतुर्दश्यां शस्त्रेण निहतस्य च
tasminnahani deveṁdra tvayā yatra vinirmitam pretapakṣe caturdaśyāṁ śastreṇa nihatasya ca
'किंतु हे देवेंद्र, जिस दिन तुमने स्वयं निश्चित किया है — प्रेतपक्ष की चतुर्दशी को, शस्त्र से मारे गए व्यक्ति के लिए,'
श्लोक 101 (skanda.6.206.101)
क्षयाहे चाऽपि संजाते विश्वेदेवैर्विना कृतम् नागरस्य शुभं श्राद्धं वचनान्मे भविष्यति
kṣayāhe cā'pi saṁjāte viśvedevairvinā kṛtam nāgarasya śubhaṁ śrāddhaṁ vacanānme bhaviṣyati
'तथा क्षयाह के दिन भी, विश्वेदेवों के बिना किया गया नागर का शुभ श्राद्ध मेरे वचन से मान्य होगा।'
श्लोक 102 (skanda.6.206.102)
शेषकाले तु यः श्राद्धं प्रकरिष्यति तैर्विना व्यर्थं संपत्स्यते तस्य मम वाक्यादसंशयम्
śeṣakāle tu yaḥ śrāddhaṁ prakariṣyati tairvinā vyarthaṁ saṁpatsyate tasya mama vākyādasaṁśayam
'किंतु शेष समय में जो उनके बिना श्राद्ध करेगा, वह मेरे वचन से निःसंदेह व्यर्थ हो जाएगा।'
श्लोक 103 (skanda.6.206.103)
मुक्त्वा शस्त्रहतं चैकं तस्मिन्नहनि यो नरः करिष्यति तथा श्राद्धं भूतभोज्यं भविष्यति
muktvā śastrahataṁ caikaṁ tasminnahani yo naraḥ kariṣyati tathā śrāddhaṁ bhūtabhojyaṁ bhaviṣyati
'शस्त्र से मारे गए व्यक्ति को छोड़कर, जो कोई भी उस दिन [अन्य कारण से] श्राद्ध करेगा, वह भूतों का भोज्य ही बन जाएगा।'
श्लोक 104 (skanda.6.206.104)
विश्वामित्र उवाच तथेत्युक्ते तु शक्रेण ब्रह्मा लोकपितामहः विश्वेदेवैस्ततः प्रोक्तो विनयावनतैः स्थितैः
viśvāmitra uvāca tathetyukte tu śakreṇa brahmā lokapitāmahaḥ viśvedevaistataḥ prokto vinayāvanataiḥ sthitaiḥ
विश्वामित्र ने कहा — इंद्र के 'तथास्तु' कहने पर, विनयपूर्वक झुककर खड़े हुए विश्वेदेवों ने लोकपितामह ब्रह्मा से यह कहा।
श्लोक 105 (skanda.6.206.105)
एते पुत्राः समुत्पन्ना अस्मदश्रुभ्य एव च तेषां तु भोजनं दत्तं क्षुधार्तानां मया विभो
ete putrāḥ samutpannā asmadaśrubhya eva ca teṣāṁ tu bhojanaṁ dattaṁ kṣudhārtānāṁ mayā vibho
'हे प्रभो, ये पुत्र हमारे ही आँसुओं से उत्पन्न हुए हैं। इन भूख से पीड़ितों को मैंने भोजन दे दिया है —'
श्लोक 106 (skanda.6.206.106)
अस्मद्विवर्जितं श्राद्धं कुपितैर्वासवोपरि तद्यथा जायते सत्यं वाक्यमस्मदुदीरितम्
asmadvivarjitaṁ śrāddhaṁ kupitairvāsavopari tadyathā jāyate satyaṁ vākyamasmadudīritam
'हमारे बिना किया गया, इंद्र पर क्रुद्ध होकर कहा गया श्राद्ध — जिससे हमारा कहा वचन सत्य हो सके।'
श्लोक 107 (skanda.6.206.107)
अस्माकं वासवस्यापि तथा कुरु पितामह निरूपय शुभाहारं येन स्यात्तृप्तिरुत्तमा
asmākaṁ vāsavasyāpi tathā kuru pitāmaha nirūpaya śubhāhāraṁ yena syāttṛptiruttamā
'हे पितामह, हमारे और इंद्र, दोनों के लिए ऐसी ही व्यवस्था कीजिए। इनके लिए शुभ आहार निश्चित कीजिए, जिससे इन्हें उत्तम तृप्ति मिल सके —'
श्लोक 108 (skanda.6.206.108)
एतेषामेव सर्वेषां प्रसादात्तव पद्मज
eteṣāmeva sarveṣāṁ prasādāttava padmaja
'— हे पद्मज, केवल आपकी ही कृपा से।'
श्लोक 109 (skanda.6.206.109)
पद्मज उवाच श्राद्धकाले तु विप्राणां भोज्यपात्रेषु कृत्स्नशः भस्मरेखां प्रदास्यंति ह्येतैस्तत्त्याज्यमेव हि
padmaja uvāca śrāddhakāle tu viprāṇāṁ bhojyapātreṣu kṛtsnaśaḥ bhasmarekhāṁ pradāsyaṁti hyetaistattyājyameva hi
पद्मज ने कहा — 'श्राद्ध के समय ब्राह्मणों के भोजन-पात्रों पर सर्वत्र भस्म की रेखा खींची जाएगी; उससे बाहर जो गिरे, वही इनके लिए त्याज्य होगा।'
श्लोक 110 (skanda.6.206.110)
भस्मरक्षां विना यत्र किंचिच्छ्राद्धं भविप्यति एकोद्दिष्टं पार्वणं च वृद्धिश्राद्धमथापि वा
bhasmarakṣāṁ vinā yatra kiṁcicchrāddhaṁ bhavipyati ekoddiṣṭaṁ pārvaṇaṁ ca vṛddhiśrāddhamathāpi vā
'जहाँ भी इस भस्म-रक्षा के बिना कोई भी श्राद्ध किया जाएगा — चाहे वह एकोद्दिष्ट हो, पार्वण हो, अथवा वृद्धिश्राद्ध हो —'
श्लोक 111 (skanda.6.206.111)
एतेभ्यश्चैव तद्दत्तं मया तुष्टेन सांप्रतम् एवमुक्त्वा ततो नाम तेषां चक्रे पितामहः
etebhyaścaiva taddattaṁ mayā tuṣṭena sāṁpratam evamuktvā tato nāma teṣāṁ cakre pitāmahaḥ
'— वह भाग अब मेरे द्वारा, प्रसन्न होकर, इन्हीं को दिया गया है।' ऐसा कहकर पितामह ने तत्पश्चात् उनका नामकरण किया।',
श्लोक 112 (skanda.6.206.112)
कुशब्देन स्मृता भूमिः संसिक्ता चाश्रुणा यतः ततोंऽडानि च जातानि तेभ्यो जाता अमी घनाः कूष्मांडा इति विख्याता भविष्यंति जगत्त्रये
kuśabdena smṛtā bhūmiḥ saṁsiktā cāśruṇā yataḥ tatoṁ'ḍāni ca jātāni tebhyo jātā amī ghanāḥ kūṣmāṁḍā iti vikhyātā bhaviṣyaṁti jagattraye
'चूँकि 'कु' शब्द से स्मरण की जाने वाली पृथ्वी आँसुओं से सिंचित हुई, और उससे अंडे उत्पन्न हुए, और उनसे ये सघन प्राणी उत्पन्न हुए, अतः ये तीनों लोकों में 'कूष्मांड' नाम से विख्यात होंगे।'
श्लोक 113 (skanda.6.206.113)
ततस्तांश्च त्रिधा कृत्वा क्रमेणैवार्पयत्तदा अग्नेर्वायोस्तथार्कस्य वाक्यमेतदुवाच ह
tatastāṁśca tridhā kṛtvā krameṇaivārpayattadā agnervāyostathārkasya vākyametaduvāca ha
तत्पश्चात् उन्हें तीन भागों में बाँटकर, क्रमशः अग्नि, वायु तथा सूर्य को सौंपते हुए, उन्होंने यह वचन कहा।
श्लोक 114 (skanda.6.206.114)
यजुर्वेदे प्रविख्यातं यद्देवति ऋचां त्रयम् तेन भागः प्रदातव्य एतेषां भक्तिहोमतः
yajurvede pravikhyātaṁ yaddevati ṛcāṁ trayam tena bhāgaḥ pradātavya eteṣāṁ bhaktihomataḥ
'यजुर्वेद में विख्यात जो त्रिऋचा इन देवताओं को समर्पित है, उसके द्वारा, भक्तिपूर्वक होम करके इन्हें भाग देना चाहिए।'
श्लोक 115 (skanda.6.206.115)
कोटिहोमोद्भवे चैव निजभागस्य मध्यतः तेन तृप्तिं प्रयास्यंति मम वाक्यादसंशयम्
koṭihomodbhave caiva nijabhāgasya madhyataḥ tena tṛptiṁ prayāsyaṁti mama vākyādasaṁśayam
'तथा कोटि-होम से उत्पन्न अपने ही भाग के मध्य से भी। इससे वे मेरे वचन से निःसंदेह तृप्त होंगे।'
श्लोक 116 (skanda.6.206.116)
एवमुक्त्वा चतुर्वक्त्रस्ततश्चादर्शनं गतः विश्वेदेवास्तथा हृष्टाः कूष्माण्डाश्च विशेषतः
evamuktvā caturvaktrastataścādarśanaṁ gataḥ viśvedevāstathā hṛṣṭāḥ kūṣmāṇḍāśca viśeṣataḥ
ऐसा कहकर चतुर्मुख ब्रह्मा तत्पश्चात् अदृश्य हो गए। विश्वेदेव तथा विशेषतः कूष्मांड भी अत्यंत प्रसन्न हुए।
श्लोक 117 (skanda.6.206.117)
एतस्मात्कारणाद्रक्षा क्रियते भस्मसम्भवा विप्राणां भोज्यपात्रेषु श्राद्धे कूष्मांडजाद्भयात् नागराणां न वांछंति श्राद्धे छिद्रं यतः शृणु
etasmātkāraṇādrakṣā kriyate bhasmasambhavā viprāṇāṁ bhojyapātreṣu śrāddhe kūṣmāṁḍajādbhayāt nāgarāṇāṁ na vāṁchaṁti śrāddhe chidraṁ yataḥ śṛṇu
इसी कारण श्राद्ध में ब्राह्मणों के भोजन-पात्रों पर, कूष्मांड से उत्पन्न भय के कारण, भस्म से रक्षा की जाती है। नागर श्राद्ध में त्रुटि क्यों नहीं चाहते, यह सुनो —
श्लोक 118 (skanda.6.206.118)
तेषां स्थाने यतो जाता दाक्षिण्येन समन्विताः निषिद्धा भस्मजा रक्षा भर्तृयज्ञेन तेजसा
teṣāṁ sthāne yato jātā dākṣiṇyena samanvitāḥ niṣiddhā bhasmajā rakṣā bhartṛyajñena tejasā
क्योंकि वे उसी स्थान में उत्पन्न हुए, दाक्षिण्य से युक्त होकर; और भर्तृयज्ञ ने अपने तेज से उनके लिए भस्म-रक्षा का निषेध कर दिया था।
श्लोक 119 (skanda.6.206.119)
तदर्थं नागराः सर्वे न कुर्वन्ति हि कर्हिचित् इन्द्रोऽपि च गते तस्मिंश्चतुर्वक्त्रे निजालयम्
tadarthaṁ nāgarāḥ sarve na kurvanti hi karhicit indro'pi ca gate tasmiṁścaturvaktre nijālayam
इसी कारण समस्त नागर उसे कभी नहीं करते। और वह चतुर्मुख अपने लोक को चले जाने पर, इंद्र भी,
श्लोक 120 (skanda.6.206.120)
अब्रवीद्ब्राह्मणान्सर्वांश्चमत्कारपुरोद्भवान् कृतांजलिपुटो भूत्वा विनयावनतः स्थितः
abravīdbrāhmaṇānsarvāṁścamatkārapurodbhavān kṛtāṁjalipuṭo bhūtvā vinayāvanataḥ sthitaḥ
हाथ जोड़कर, विनयपूर्वक झुककर खड़े होकर, चमत्कारपुर में उत्पन्न समस्त ब्राह्मणों से बोले।
श्लोक 121 (skanda.6.206.121)
श्रूयतां मद्वचो विप्राः करिष्यथ ततः परम् स्थापयिष्याम्यहं लिंगं देवदेवस्य शूलिनः
śrūyatāṁ madvaco viprāḥ kariṣyatha tataḥ param sthāpayiṣyāmyahaṁ liṁgaṁ devadevasya śūlinaḥ
'हे विप्रो, मेरा वचन सुनिए और उसके पश्चात् वैसा ही कीजिए — मैं देवदेव शूलधारी शिव का एक लिंग स्थापित करूँगा।'
श्लोक 122 (skanda.6.206.122)
ततस्तैर्ब्राह्मणैस्तस्य दर्शितं स्थानमुत्तमम् सोऽपि लिंगं च संस्थाप्य प्रहृष्टस्त्रिदिवं ययौ
tatastairbrāhmaṇaistasya darśitaṁ sthānamuttamam so'pi liṁgaṁ ca saṁsthāpya prahṛṣṭastridivaṁ yayau
तब उन ब्राह्मणों ने उन्हें उत्तम स्थान दिखाया। उन्होंने भी लिंग की स्थापना करके, अत्यंत प्रसन्न होकर स्वर्गलोक को प्रस्थान किया।
श्लोक 123 (skanda.6.206.123)
विश्वामित्र उवाच एतत्ते सर्वमाख्यातं यत्पृष्टोऽस्मि नराधिप गयाकूप्याश्च माहात्म्यं सर्वकामप्रदायकम्
viśvāmitra uvāca etatte sarvamākhyātaṁ yatpṛṣṭo'smi narādhipa gayākūpyāśca māhātmyaṁ sarvakāmapradāyakam
विश्वामित्र ने कहा — हे नराधिप, आपने जो पूछा था, वह सब मैंने बता दिया — गया-कूपिका का सर्वकामप्रद माहात्म्य।
श्लोक 124 (skanda.6.206.124)
आनर्त उवाच गयाकूप्याश्च माहात्म्यं भवता मे प्रकीर्तितम् बालमंडनजं वापि सांप्रतं वक्तुमर्हसि
ānarta uvāca gayākūpyāśca māhātmyaṁ bhavatā me prakīrtitam bālamaṁḍanajaṁ vāpi sāṁprataṁ vaktumarhasi
आनर्त ने कहा — गया-कूपिका का माहात्म्य आपने मुझे बता दिया। अब बालमंडन से संबंधित माहात्म्य भी बताने योग्य हैं।
श्लोक 125 (skanda.6.206.125)
कस्मिन्स्थाने च शक्रेण तच्च लिंगं प्रतिष्ठितम वदास्माकं महाभाग तस्मिन्दृष्टे तु किं फलम्
kasminsthāne ca śakreṇa tacca liṁgaṁ pratiṣṭhitama vadāsmākaṁ mahābhāga tasmindṛṣṭe tu kiṁ phalam
इंद्र ने वह लिंग किस स्थान में प्रतिष्ठित किया था? हे महाभाग, हमें बताइए, और उसके दर्शन का क्या फल है?
श्लोक 126 (skanda.6.206.126)
विश्वामित्र उवाच सहस्राक्षेण ते विप्रा लिंगार्थं याचिता यदा स्थानं शुभं पवित्रं च सर्वक्षेत्रस्य मध्यगम्
viśvāmitra uvāca sahasrākṣeṇa te viprā liṁgārthaṁ yācitā yadā sthānaṁ śubhaṁ pavitraṁ ca sarvakṣetrasya madhyagam
विश्वामित्र ने कहा — जब सहस्राक्ष ने उन ब्राह्मणों से लिंग के लिए, समस्त क्षेत्र के मध्य में स्थित शुभ और पवित्र स्थान माँगा,
श्लोक 127 (skanda.6.206.127)
ततस्तैर्दर्शितं लिंगं सुपुण्यं बालमंडनम् यत्र बालाः पुरा जाता मरुदाख्या दितेः सुताः
tatastairdarśitaṁ liṁgaṁ supuṇyaṁ bālamaṁḍanam yatra bālāḥ purā jātā marudākhyā diteḥ sutāḥ
तब उन्होंने अत्यंत पवित्र बालमंडन दिखाया, जहाँ पूर्वकाल में दिति के पुत्र, मरुत नाम के बालक उत्पन्न हुए थे,
श्लोक 128 (skanda.6.206.128)
तेनैव च पुरा ध्वस्ता न च मृत्युमुपागताः तच्च मेध्यतमं ज्ञात्वा स्थानं दृष्टं पुरा च यत्
tenaiva ca purā dhvastā na ca mṛtyumupāgatāḥ tacca medhyatamaṁ jñātvā sthānaṁ dṛṣṭaṁ purā ca yat
और उन्हीं इंद्र के द्वारा पूर्वकाल में विनष्ट किए गए थे, फिर भी मृत्यु को प्राप्त नहीं हुए थे। उस अत्यंत पवित्र स्थान को, जो पहले भी देखा गया था, यह जानकर,
श्लोक 129 (skanda.6.206.129)
यत्र दित्या तपस्तप्तं सुसुतं कांक्षमाणया तद्दृष्ट्वा परमं स्थानं जीवं प्रोवाच देवपः
yatra dityā tapastaptaṁ susutaṁ kāṁkṣamāṇayā taddṛṣṭvā paramaṁ sthānaṁ jīvaṁ provāca devapaḥ
जहाँ दिति ने उत्तम पुत्र की कामना करते हुए तप किया था — उस परम स्थान को देखकर, देवताओं के स्वामी ने बृहस्पति से कहा।
श्लोक 130 (skanda.6.206.130)
गुरो ब्रूहि ममाशु त्वं सुमुहूर्तं च सांप्रतम् दिवसं यत्र सल्लिंगं स्थापयामि हरोद्भवम् प्रलयेऽपि समुत्पन्ने न नाशो यत्र जायते
guro brūhi mamāśu tvaṁ sumuhūrtaṁ ca sāṁpratam divasaṁ yatra salliṁgaṁ sthāpayāmi harodbhavam pralaye'pi samutpanne na nāśo yatra jāyate
'हे गुरो, मुझे शीघ्र उत्तम मुहूर्त तथा दिन बताइए, जिससे मैं हर से उत्पन्न सत्य-लिंग की स्थापना कर सकूँ — ऐसा लिंग जो प्रलय होने पर भी नष्ट न हो।'
श्लोक 131 (skanda.6.206.131)
ततः सोऽपि चिरं ध्यात्वा तं प्रोवाच शचीपतिम् माघमासे सिते पक्षे पुष्यर्क्षे रविवासरे
tataḥ so'pi ciraṁ dhyātvā taṁ provāca śacīpatim māghamāse site pakṣe puṣyarkṣe ravivāsare
तब उन्होंने भी बहुत देर तक विचार करके शचीपति इंद्र से कहा — 'माघ मास के शुक्लपक्ष में, पुष्य नक्षत्र में, रविवार को,'
श्लोक 132 (skanda.6.206.132)
त्रयोदश्यामभीष्टे तु संजातेऽ भ्युदये शुभे संस्थापय विभो लिंगं मम वाक्येन सांप्रतम्
trayodaśyāmabhīṣṭe tu saṁjāte' bhyudaye śubhe saṁsthāpaya vibho liṁgaṁ mama vākyena sāṁpratam
'इस अभीष्ट त्रयोदशी को, शुभ अभ्युदय होने पर, हे प्रभो, मेरे वचन से अभी लिंग की स्थापना कीजिए।'
श्लोक 133 (skanda.6.206.133)
आकल्पांतसमं दिव्यं स्थिरं ते तद्भविष्यति तच्छ्रुत्वा देवराजस्तु हर्षेण महताऽन्वितः
ākalpāṁtasamaṁ divyaṁ sthiraṁ te tadbhaviṣyati tacchrutvā devarājastu harṣeṇa mahatā'nvitaḥ
'वह कल्प के अंत तक दिव्य और स्थिर बना रहेगा।' यह सुनकर देवराज अत्यंत हर्ष से भर गए,
श्लोक 134 (skanda.6.206.134)
बालमंडनसांनिध्ये स्थापयामास तत्तदा विप्रपुण्याहघोषेण गीतवादित्रनिस्वनैः
bālamaṁḍanasāṁnidhye sthāpayāmāsa tattadā viprapuṇyāhaghoṣeṇa gītavāditranisvanaiḥ
और तब उन्होंने बालमंडन के समीप, ब्राह्मणों की पुण्याह-घोषणा तथा गीत-वाद्य की ध्वनियों के साथ उस लिंग की स्थापना की।
श्लोक 135 (skanda.6.206.135)
ततो होमावसाने तु तर्पयित्वा द्विजोत्तमान् दक्षिणायां ददौ तेषामाघाटं स्थानमुत्तमम्
tato homāvasāne tu tarpayitvā dvijottamān dakṣiṇāyāṁ dadau teṣāmāghāṭaṁ sthānamuttamam
तत्पश्चात् होम की समाप्ति पर, श्रेष्ठ ब्राह्मणों को तृप्त करके, उन्हें दक्षिणा में आघाट नामक उत्तम स्थान दिया,
श्लोक 136 (skanda.6.206.136)
मांकूले संस्थितं यच्च दिव्यप्राकारभूषितम् सर्वेषामेव विप्राणां सामान्येन नृपोत्तम
māṁkūle saṁsthitaṁ yacca divyaprākārabhūṣitam sarveṣāmeva viprāṇāṁ sāmānyena nṛpottama
हे नृपोत्तम, जो मांकूल में स्थित, दिव्य प्राचीर से सुशोभित, तथा समस्त ब्राह्मणों के साझे अधिकार का था।
श्लोक 137 (skanda.6.206.137)
ततोऽष्टकुलिकान्विप्रान्समाहूयाब्रवीदिदम् युष्माभिस्तु सदा कार्या चिंता लिंगसमुद्भवा
tato'ṣṭakulikānviprānsamāhūyābravīdidam yuṣmābhistu sadā kāryā ciṁtā liṁgasamudbhavā
तत्पश्चात् अष्टकुलिक ब्राह्मणों को बुलाकर उन्होंने यह कहा — 'आपको सदा इस लिंग से संबंधित चिंता (देखभाल) करनी चाहिए।'
श्लोक 138 (skanda.6.206.138)
अस्य यस्मान्मया दत्ता वृत्तिश्चन्द्रार्ककालिका सा च ग्राह्या तदर्थे च द्वादशग्रामसंभवा
asya yasmānmayā dattā vṛttiścandrārkakālikā sā ca grāhyā tadarthe ca dvādaśagrāmasaṁbhavā
'इसके लिए मेरे द्वारा दी गई चंद्र-सूर्य के रहने तक की वृत्ति, जो बारह ग्रामों से उत्पन्न होती है, वह इसी प्रयोजन के लिए आप ग्रहण करें।'
श्लोक 139 (skanda.6.206.139)
ब्राह्मणा ऊचुः न वयं विबुधश्रेष्ठ करिष्यामो वचस्तव लिंगचिंतासमुद्भूतं श्रूयतामत्र कारणम्
brāhmaṇā ūcuḥ na vayaṁ vibudhaśreṣṭha kariṣyāmo vacastava liṁgaciṁtāsamudbhūtaṁ śrūyatāmatra kāraṇam
ब्राह्मणों ने कहा — 'हे देवश्रेष्ठ, हम आपका वचन नहीं मानेंगे। इस लिंग-चिंता को न स्वीकार करने का कारण सुनिए —'
श्लोक 140 (skanda.6.206.140)
ब्रह्मस्वं विबुधस्वं च तडागोत्थं विशेषतः भक्षितं स्वल्पमप्यत्र नाश येत्सर्वपूर्वजान्
brahmasvaṁ vibudhasvaṁ ca taḍāgotthaṁ viśeṣataḥ bhakṣitaṁ svalpamapyatra nāśa yetsarvapūrvajān
'ब्राह्मण का धन, देवता का धन, विशेषतः तालाब से उत्पन्न धन — यहाँ उसका थोड़ा-सा भी भक्षण किया जाए तो वह समस्त पूर्वजों का नाश कर देता है।'
श्लोक 141 (skanda.6.206.141)
यदि कश्चित्कुलेऽस्माकं जातस्तद्भक्षयिष्यति पातयिष्यति नः सर्वांस्तदस्माकं महद्भयम्
yadi kaścitkule'smākaṁ jātastadbhakṣayiṣyati pātayiṣyati naḥ sarvāṁstadasmākaṁ mahadbhayam
'यदि हमारे कुल में जन्मा कोई उसका भक्षण करेगा, तो वह हम सबको पतित कर देगा — यही हमारा महाभय है।'
श्लोक 142 (skanda.6.206.142)
अथ तं मध्यगः प्राह कृतांजलिर्द्विजोत्तमः दृष्ट्वाऽन्यमनसं शक्रं कृतपूर्वोपकारिणम्
atha taṁ madhyagaḥ prāha kṛtāṁjalirdvijottamaḥ dṛṣṭvā'nyamanasaṁ śakraṁ kṛtapūrvopakāriṇam
तब पूर्व में महान उपकार करने वाले इंद्र को उदास मन देखकर, मध्यस्थ श्रेष्ठ ब्राह्मण ने हाथ जोड़कर उनसे कहा।
श्लोक 143 (skanda.6.206.143)
देवशर्माभिधानस्तु विख्यातः प्रवरैस्त्रिभिः अहं चिंतां करिष्यामि तव लिंगसमुद्भवाम्
devaśarmābhidhānastu vikhyātaḥ pravaraistribhiḥ ahaṁ ciṁtāṁ kariṣyāmi tava liṁgasamudbhavām
तीन प्रवरों से विख्यात, देवशर्मा नामक उस ब्राह्मण ने कहा — 'मैं ही आपके इस लिंग की चिंता (देखभाल) करूँगा,'
श्लोक 144 (skanda.6.206.144)
अपुत्रस्य तु मे पुत्रं यदि यच्छसि वासव यस्मात्संजायते वंशो यावदाभूतसंप्लवम्
aputrasya tu me putraṁ yadi yacchasi vāsava yasmātsaṁjāyate vaṁśo yāvadābhūtasaṁplavam
'यदि, हे वासव, आप मुझ पुत्रहीन को ऐसा पुत्र दें, जिससे प्रलय-काल तक चलने वाला वंश उत्पन्न हो सके,'
श्लोक 145 (skanda.6.206.145)
धर्मज्ञस्तु कृतज्ञस्तु देवस्वपरिवर्जकः तच्छ्रुत्वा वासवो हृष्टस्तमुवाच द्विजोत्तमम्
dharmajñastu kṛtajñastu devasvaparivarjakaḥ tacchrutvā vāsavo hṛṣṭastamuvāca dvijottamam
'जो धर्मज्ञ हो, कृतज्ञ हो, तथा देवस्व से दूर रहने वाला हो।' यह सुनकर वासव प्रसन्न होकर उस श्रेष्ठ ब्राह्मण से बोले —
श्लोक 146 (skanda.6.206.146)
इन्द्र उवाच भविष्यति शुभस्तुभ्यं पुत्रो वंशधरः परः धर्मात्मा सत्यवादी च देवस्वपरिवर्जकः
indra uvāca bhaviṣyati śubhastubhyaṁ putro vaṁśadharaḥ paraḥ dharmātmā satyavādī ca devasvaparivarjakaḥ
इंद्र ने कहा — 'तुम्हें एक श्रेष्ठ, शुभ, वंशधर पुत्र प्राप्त होगा, जो धर्मात्मा, सत्यवादी, और देवस्व से दूर रहने वाला होगा।'
श्लोक 147 (skanda.6.206.147)
तस्यान्वये तु ये पुत्रा भविष्यंति महात्मनः ते सर्वेऽत्र भविष्यंति तद्रूपा वेदपारगाः
tasyānvaye tu ye putrā bhaviṣyaṁti mahātmanaḥ te sarve'tra bhaviṣyaṁti tadrūpā vedapāragāḥ
'उसके वंश में जो भी महात्मा पुत्र होंगे, वे सभी वैसे ही स्वभाव वाले तथा वेदपारंगत होंगे।'
श्लोक 148 (skanda.6.206.148)
अपरं शृणु मे वाक्यं यत्ते वक्ष्यामि सद्द्विज तथा शृण्वंतु विप्रेंद्राः सर्वे येऽत्र समागताः
aparaṁ śṛṇu me vākyaṁ yatte vakṣyāmi saddvija tathā śṛṇvaṁtu vipreṁdrāḥ sarve ye'tra samāgatāḥ
'हे सज्जन द्विज, मेरा एक अन्य वचन भी सुनो, जो मैं तुमसे कहूँगा; और यहाँ एकत्रित समस्त श्रेष्ठ ब्राह्मण भी इसे सुनें।'
श्लोक 149 (skanda.6.206.149)
बालमण्डनके तीर्थे मयैतल्लिंगमुत्तमम् चतुर्वक्त्र समादेशाच्चतुर्वक्त्रं प्रतिष्ठितम्
bālamaṇḍanake tīrthe mayaitalliṁgamuttamam caturvaktra samādeśāccaturvaktraṁ pratiṣṭhitam
'बालमंडन तीर्थ में मेरे द्वारा स्थापित यह उत्तम लिंग, चतुर्मुख ब्रह्मा के आदेश से 'चतुर्वक्त्र' नाम से प्रतिष्ठित किया गया है।'
श्लोक 150 (skanda.6.206.150)
योऽत्र स्नानविधिं कृत्वा तीर्थेऽत्र पितृतर्पणम् आजन्म पितरस्तेन प्रभविष्यंति तर्पिताः
yo'tra snānavidhiṁ kṛtvā tīrthe'tra pitṛtarpaṇam ājanma pitarastena prabhaviṣyaṁti tarpitāḥ
'जो यहाँ स्नान-विधि करके इस तीर्थ में पितृ-तर्पण करेगा, उसके पितर जीवनभर तृप्त रहेंगे।'
श्लोक 151 (skanda.6.206.151)
ग्रामा द्वादश ये दत्ता मया देवस्य चास्य भोः वसिष्यंति च ये विप्रा वृद्धिश्राद्ध उपस्थिते
grāmā dvādaśa ye dattā mayā devasya cāsya bhoḥ vasiṣyaṁti ca ye viprā vṛddhiśrāddha upasthite
'हे भोः, मेरे द्वारा इस देव को दिए गए बारह ग्रामों में जो ब्राह्मण निवास करेंगे, वृद्धि-श्राद्ध का अवसर आने पर,'
श्लोक 152 (skanda.6.206.152)
ते श्राद्धं प्रथमं चास्य कृत्वा श्राद्धं ततः परम्
te śrāddhaṁ prathamaṁ cāsya kṛtvā śrāddhaṁ tataḥ param
'वे पहले इस देव का श्राद्ध करके, तत्पश्चात् ही अपना श्राद्ध करें।'
श्लोक 153 (skanda.6.206.153)
तत्कृत्यानि करिष्यन्ति ते विघ्नेन विवर्जिताः वृद्धिः संपत्स्यते तेषां नो चेद्विघ्नं भविष्यति
tatkṛtyāni kariṣyanti te vighnena vivarjitāḥ vṛddhiḥ saṁpatsyate teṣāṁ no cedvighnaṁ bhaviṣyati
'तब वे अपने कार्य विघ्नरहित होकर संपन्न करेंगे, और उनकी वृद्धि होगी; अन्यथा विघ्न उत्पन्न होगा।'
श्लोक 154 (skanda.6.206.154)
माघमासे सिते पक्षे त्रयो दश्यां दिने स्थिते तद्ग्रामसंस्थिता लोका येऽत्रागत्य समाहिताः
māghamāse site pakṣe trayo daśyāṁ dine sthite tadgrāmasaṁsthitā lokā ye'trāgatya samāhitāḥ
'माघ मास के शुक्लपक्ष की त्रयोदशी के दिन, उन ग्रामों में रहने वाले लोग जो यहाँ आकर एकाग्रचित्त होते हैं,'
श्लोक 155 (skanda.6.206.155)
बालमण्डनके स्नात्वा लिंगमेतत्समाहिताः पूजयिष्यंति सद्भक्त्या ते यास्यंति परां गतिम्
bālamaṇḍanake snātvā liṁgametatsamāhitāḥ pūjayiṣyaṁti sadbhaktyā te yāsyaṁti parāṁ gatim
'बालमंडन में स्नान करके, एकाग्रचित्त होकर सच्ची भक्ति से इस लिंग की पूजा करेंगे — वे परम गति को प्राप्त होंगे।'
श्लोक 156 (skanda.6.206.156)
ग्रामाणां मम लिंगस्य ये करिष्यंति पीडनम् कालांतरेऽपि संप्राप्तास्ते यास्यंति च संक्षयम्
grāmāṇāṁ mama liṁgasya ye kariṣyaṁti pīḍanam kālāṁtare'pi saṁprāptāste yāsyaṁti ca saṁkṣayam
'जो भी इन ग्रामों को अथवा मेरे इस लिंग को पीड़ा पहुँचाएँगे, वे काल बीतने पर भी अवश्य विनाश को प्राप्त होंगे।'
श्लोक 157 (skanda.6.206.157)
पृथिव्यां यानि तीर्थानि ह्यासमुद्रसरांसि च बालमण्डनके तीर्थ आगमिष्यंति तद्दिने
pṛthivyāṁ yāni tīrthāni hyāsamudrasarāṁsi ca bālamaṇḍanake tīrtha āgamiṣyaṁti taddine
'पृथ्वी पर जितने भी तीर्थ हैं, तथा समुद्र तक के सरोवर हैं, वे सब उसी दिन बालमंडन के तीर्थ में आ जाएँगे।'
श्लोक 158 (skanda.6.206.158)
विश्वामित्र उवाच एतदुक्त्वा सहस्राक्षस्ततश्चाष्टकुलान्द्विजान् अग्रतः कोपसंयुक्तस्ततोवचनमब्रवीत्
viśvāmitra uvāca etaduktvā sahasrākṣastataścāṣṭakulāndvijān agrataḥ kopasaṁyuktastatovacanamabravīt
विश्वामित्र ने कहा — यह कहकर, सहस्राक्ष ने तत्पश्चात् अष्टकुल ब्राह्मणों के समक्ष क्रोधित होकर यह वचन कहा।
श्लोक 159 (skanda.6.206.159)
एतैः सप्तकुलैर्विप्रैर्यत्कृतं वचनं न मे कृतघ्नैस्ता ञ्छपिष्यामि कृतघ्नत्वान्न संशयः
etaiḥ saptakulairviprairyatkṛtaṁ vacanaṁ na me kṛtaghnaistā ñchapiṣyāmi kṛtaghnatvānna saṁśayaḥ
'इन सात कुलों के ब्राह्मणों ने मेरा वचन नहीं माना। मैं इन कृतघ्नों को शाप दूँगा — इनकी कृतघ्नता में कोई संदेह नहीं है।'
श्लोक 160 (skanda.6.206.160)
यस्मादिदंपुरा प्रोक्तं मनुना सत्यवादिना स्वायंभुवेन प्रोद्दिश्य कृतघ्नं सकलं जनम्
yasmādidaṁpurā proktaṁ manunā satyavādinā svāyaṁbhuvena proddiśya kṛtaghnaṁ sakalaṁ janam
'क्योंकि यह पहले सत्यवादी स्वायंभुव मनु ने, समस्त कृतघ्न जनों के विषय में, यह कहा है —'
श्लोक 161 (skanda.6.206.161)
ब्रह्मघ्ने च सुरापे च चौरे भग्नवते शठे निष्कृतिर्विहिता सद्भिः कृतघ्ने नास्ति निष्कृतिः
brahmaghne ca surāpe ca caure bhagnavate śaṭhe niṣkṛtirvihitā sadbhiḥ kṛtaghne nāsti niṣkṛtiḥ
'ब्रह्महत्यारे, सुरापायी, चोर, व्रतभंगी, तथा शठ के लिए भी सज्जनों ने प्रायश्चित्त बताया है, किंतु कृतघ्न के लिए कोई प्रायश्चित्त नहीं है।'
श्लोक 162 (skanda.6.206.162)
अवध्या ब्राह्मणा गावः स्त्रियो बालास्तपस्विनः तेनाऽहं न वधाम्येताञ्छिद्रेऽपि महति स्थिते
avadhyā brāhmaṇā gāvaḥ striyo bālāstapasvinaḥ tenā'haṁ na vadhāmyetāñchidre'pi mahati sthite
'ब्राह्मण, गौएँ, स्त्रियाँ, बालक तथा तपस्वी अवध्य हैं। इसीलिए, महान अपराध होते हुए भी, मैं इनका वध नहीं करूँगा —'
श्लोक 163 (skanda.6.206.163)
ततस्तोयं समादाय सदर्भं निजपाणिना शशाप तान्द्विजश्रेष्ठान्कृतघ्नान्पाकशासनः
tatastoyaṁ samādāya sadarbhaṁ nijapāṇinā śaśāpa tāndvijaśreṣṭhānkṛtaghnānpākaśāsanaḥ
फिर अपने हाथ में कुशा सहित जल लेकर, इंद्र ने उन कृतघ्न किंतु श्रेष्ठ ब्राह्मणों को शाप दिया।
श्लोक 164 (skanda.6.206.164)
मम वाक्यादपि प्राप्य एते लक्ष्मीं द्विजोत्तमाः निर्धनाः संभविष्यंति नीत्वा यद्द्वारतो ऽखिलम्
mama vākyādapi prāpya ete lakṣmīṁ dvijottamāḥ nirdhanāḥ saṁbhaviṣyaṁti nītvā yaddvārato 'khilam
'मेरे इस वचन से, ये श्रेष्ठ ब्राह्मण धन पाकर भी निर्धन हो जाएँगे, उनका सारा धन द्वार-द्वार से हरण होता रहेगा।'
श्लोक 165 (skanda.6.206.165)
भक्तानां च पीरत्यागमेतेषां वंशजा द्विजाः करिष्यंति न सन्देहो यथा मम सुनिष्ठुराः दाक्षिण्यरहिताः सर्वे तथा बह्वाशिनः सदा
bhaktānāṁ ca pīratyāgameteṣāṁ vaṁśajā dvijāḥ kariṣyaṁti na sandeho yathā mama suniṣṭhurāḥ dākṣiṇyarahitāḥ sarve tathā bahvāśinaḥ sadā
'इनके वंशज ब्राह्मण अपने भक्तों का त्याग करेंगे, इसमें संदेह नहीं — जैसे मैं ही अत्यंत निष्ठुर हूँ। वे सभी सदा दाक्षिण्यहीन तथा अत्यधिक आहार करने वाले होंगे।'
श्लोक 166 (skanda.6.206.166)
एवमुक्त्वाऽथ तान्विप्रान्सप्तवंशसमुद्भवान् पुनः प्रोवाच तान्विप्राञ्छेषान्नगरसंभवान्
evamuktvā'tha tānviprānsaptavaṁśasamudbhavān punaḥ provāca tānviprāñcheṣānnagarasaṁbhavān
सात वंशों से उत्पन्न उन ब्राह्मणों से ऐसा कहकर, उन्होंने फिर नगर में उत्पन्न शेष ब्राह्मणों से यह कहा।
श्लोक 167 (skanda.6.206.167)
ममात्र दीयतां स्थानं स्थानेऽत्रैव द्विजोत्तमाः येन संवत्सरस्यांते पंचरात्रं वसाम्यहम्
mamātra dīyatāṁ sthānaṁ sthāne'traiva dvijottamāḥ yena saṁvatsarasyāṁte paṁcarātraṁ vasāmyaham
'हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो, मुझे यहीं इसी स्थान में एक स्थान दिया जाए, जिससे मैं वर्ष के अंत में पाँच रातों तक यहाँ निवास कर सकूँ,'
श्लोक 168 (skanda.6.206.168)
देवस्यास्य प्रपूजार्थं मर्त्यलोकसु खाय च ब्राह्मणानां प्रपूजार्थं सर्वेषां भवतामिह
devasyāsya prapūjārthaṁ martyalokasu khāya ca brāhmaṇānāṁ prapūjārthaṁ sarveṣāṁ bhavatāmiha
'इस देव की भलीभाँति पूजा के लिए, मर्त्यलोक के सुख के लिए, तथा यहाँ स्थित आप सभी ब्राह्मणों की भलीभाँति पूजा के लिए।'
श्लोक 169 (skanda.6.206.169)
विश्वामित्र उवाच ततस्ते ब्राह्मणाः सर्वे तदर्थं स्थानमुत्तमम् दर्शयामासुः संहृष्टाः प्रोचुश्च तदनंतरम्
viśvāmitra uvāca tataste brāhmaṇāḥ sarve tadarthaṁ sthānamuttamam darśayāmāsuḥ saṁhṛṣṭāḥ procuśca tadanaṁtaram
विश्वामित्र ने कहा — तब वे सभी ब्राह्मण, अत्यंत प्रसन्न होकर, उस प्रयोजन के लिए उत्तम स्थान दिखाकर, तत्पश्चात् यह बोले।
श्लोक 170 (skanda.6.206.170)
ब्रह्मस्थाने त्वया शक्र पंचरात्रमुपेत्य च स्थातव्यं मर्त्यलोकस्य सुखमासेव्यतां प्रभो
brahmasthāne tvayā śakra paṁcarātramupetya ca sthātavyaṁ martyalokasya sukhamāsevyatāṁ prabho
'हे इंद्र, इस ब्रह्मस्थान में आकर पाँच रातों तक निवास कीजिए। हे प्रभो, मर्त्यलोक के इस सुख का सेवन कीजिए।'
श्लोक 171 (skanda.6.206.171)
अत्र स्थाने तवाऽग्रे तु करिष्यामो महोत्सवम् गीतवादित्रनिर्घोषैर्गंधमाल्यानुलेपनैः द्विजानां तर्पणैश्चैव सर्वकामसमृद्धिदम्
atra sthāne tavā'gre tu kariṣyāmo mahotsavam gītavāditranirghoṣairgaṁdhamālyānulepanaiḥ dvijānāṁ tarpaṇaiścaiva sarvakāmasamṛddhidam
'इस स्थान में, आपके समक्ष, हम एक महोत्सव मनाएँगे — गीत-वाद्य की ध्वनियों से, गंध-माला-अनुलेपन से, तथा ब्राह्मणों के तर्पण से युक्त, जो समस्त कामनाओं की समृद्धि देने वाला होगा।'
श्लोक 172 (skanda.6.206.172)
विश्वामित्र उवाच तच्छ्रुत्वा वचनं तेषां प्रहृष्टः पाकशासनः पूजयित्वा द्विजान्सर्वान्गतोऽथ त्रिदिवालयम्
viśvāmitra uvāca tacchrutvā vacanaṁ teṣāṁ prahṛṣṭaḥ pākaśāsanaḥ pūjayitvā dvijānsarvāngato'tha tridivālayam
विश्वामित्र ने कहा — उनका यह वचन सुनकर, अत्यंत प्रसन्न होकर इंद्र ने समस्त ब्राह्मणों की पूजा करके, तत्पश्चात् स्वर्गलोक को प्रस्थान किया।