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नागर खण्ड · अध्याय 207

इन्द्र का शाप और पंचरात्रोत्सव की उत्पत्ति

अध्याय 206अध्याय-सूचीअध्याय 208

श्लोक 1 (skanda.6.207.1)

विश्वामित्र उवाच एतत्ते सर्वमाख्यातं यत्पृष्टोऽस्मि नराधिप बालमंडनमाहात्म्यं सर्वपातकनाशनम्

viśvāmitra uvāca etatte sarvamākhyātaṁ yatpṛṣṭo'smi narādhipa bālamaṁḍanamāhātmyaṁ sarvapātakanāśanam

विश्वामित्र जी ने कहा — हे राजन्, आपने जो पूछा था वह बालमण्डन-तीर्थ का सर्वपापनाशक माहात्म्य मैंने आपसे सम्पूर्ण रूप से कह दिया।

श्लोक 2 (skanda.6.207.2)

यत्रैकस्मिन्नपि स्नाने कृते पार्थिवसत्तम सर्वेषां लभ्यते पुण्यं तीर्थानां स्नानसंभवम् माघमासे त्रयोदश्यां शुक्लपक्ष उपस्थिते

yatraikasminnapi snāne kṛte pārthivasattama sarveṣāṁ labhyate puṇyaṁ tīrthānāṁ snānasaṁbhavam māghamāse trayodaśyāṁ śuklapakṣa upasthite

हे श्रेष्ठ राजन्, माघ मास के शुक्लपक्ष की त्रयोदशी को यहाँ एक बार भी स्नान करने से समस्त तीर्थों में स्नान करने का पुण्य प्राप्त हो जाता है।

श्लोक 3 (skanda.6.207.3)

आनर्त उवाच कस्माच्छक्रस्य संस्थानं पंचरात्रं धरातले नाधिकं जायते तेषां यथान्येषां दिवौकसाम्

ānarta uvāca kasmācchakrasya saṁsthānaṁ paṁcarātraṁ dharātale nādhikaṁ jāyate teṣāṁ yathānyeṣāṁ divaukasām

आनर्त ने कहा — पृथ्वी पर इन्द्र का निवास पाँच रात्रि तक ही क्यों होता है, अन्य देवताओं के समान उससे अधिक क्यों नहीं होता?

श्लोक 4 (skanda.6.207.4)

वर्षांते कानि चाहानि येषु शक्रो धरातले समागच्छति को मास एतत्सर्वं ब्रवीहि मे

varṣāṁte kāni cāhāni yeṣu śakro dharātale samāgacchati ko māsa etatsarvaṁ bravīhi me

वर्ष के अंत में वे कौन-से दिन हैं जिनमें इन्द्र पृथ्वी पर आते हैं, और वह कौन-सा मास है? यह सब मुझसे कहिए।

श्लोक 5 (skanda.6.207.5)

विश्वामित्र उवाच श्रूयतामभिधास्यामि कथा मेनां धराधिप पंचरात्रात्परं शक्रो यथा न स्याद्धरातले

viśvāmitra uvāca śrūyatāmabhidhāsyāmi kathā menāṁ dharādhipa paṁcarātrātparaṁ śakro yathā na syāddharātale

विश्वामित्र जी ने कहा — हे राजन्, सुनिए, मैं यह कथा कहता हूँ कि किस कारण इन्द्र पाँच रात्रि से अधिक पृथ्वी पर नहीं रहते।

श्लोक 6 (skanda.6.207.6)

आसीत्पूर्वं बृहत्कल्पे जयत्सेनः सुरेश्वरः त्रैलोक्यस्य समस्तस्य स्वामी दानवदर्पहा

āsītpūrvaṁ bṛhatkalpe jayatsenaḥ sureśvaraḥ trailokyasya samastasya svāmī dānavadarpahā

पूर्वकाल में बृहत्कल्प में जयत्सेन नामक देवेश्वर थे, जो समस्त त्रिलोक के स्वामी और दानवों के गर्व को नष्ट करने वाले थे।

श्लोक 7 (skanda.6.207.7)

त्रैलोक्ये सकले पूजां भजमानः सदैव हि कस्यचित्त्वथ कालस्य गौतमस्य मुनेः प्रिया

trailokye sakale pūjāṁ bhajamānaḥ sadaiva hi kasyacittvatha kālasya gautamasya muneḥ priyā

वे सम्पूर्ण त्रिलोक में सदा पूजित रहते थे। किसी समय गौतम मुनि की प्रिय पत्नी—

श्लोक 8 (skanda.6.207.8)

अहिल्यानाम भार्याऽभूद्रूपेणाप्रतिमा भुवि तां दृष्ट्वा चकमे शक्रः कामदेववशं गतः

ahilyānāma bhāryā'bhūdrūpeṇāpratimā bhuvi tāṁ dṛṣṭvā cakame śakraḥ kāmadevavaśaṁ gataḥ

—अहिल्या नामक थी, जो रूप में पृथ्वी पर अनुपम थी। उसे देखकर इन्द्र कामदेव के वशीभूत होकर उस पर मोहित हो गए।

श्लोक 9 (skanda.6.207.9)

नित्यमेव समागत्य स्वर्गलोकात्स कामभाक् गौतमे निर्गते राजन्समिदिध्मार्थमेव हि दर्भार्थं फलमूलार्थं स्वयमेव महात्मभिः

nityameva samāgatya svargalokātsa kāmabhāk gautame nirgate rājansamididhmārthameva hi darbhārthaṁ phalamūlārthaṁ svayameva mahātmabhiḥ

हे राजन्, वह कामासक्त इन्द्र स्वर्गलोक से नित्य ही आ जाता था, जब महात्मा गौतम स्वयं समिधा, ईंधन, कुश तथा फल-मूल लाने के लिए आश्रम से बाहर जाते थे।

श्लोक 10 (skanda.6.207.10)

अथ तस्य समाचख्यौ नारदो मुनिसत्तमः शक्रस्य चेष्टितं सर्वं तथाहिल्यासमुद्भवम्

atha tasya samācakhyau nārado munisattamaḥ śakrasya ceṣṭitaṁ sarvaṁ tathāhilyāsamudbhavam

तब मुनिश्रेष्ठ नारद ने गौतम को इन्द्र की सारी चेष्टा तथा अहिल्या से संबंधित सब कुछ बता दिया।

श्लोक 11 (skanda.6.207.11)

तच्छ्रुत्वा सहसा तूर्णं गौतमो गृहमभ्यगात् यावत्पश्यति देवेशं सह पत्न्या समागतम्

tacchrutvā sahasā tūrṇaṁ gautamo gṛhamabhyagāt yāvatpaśyati deveśaṁ saha patnyā samāgatam

यह सुनकर गौतम तुरंत वेग से अपने घर लौट आए, और जब वे वहाँ पहुँचे तो देखा कि इन्द्र उनकी पत्नी के साथ है।

श्लोक 12 (skanda.6.207.12)

शक्रोऽपि गौतमं दृष्ट्वा पलायनपरायणः निर्जगामाश्रमात्तस्माद्विवस्त्रोऽपि भयाकुलः

śakro'pi gautamaṁ dṛṣṭvā palāyanaparāyaṇaḥ nirjagāmāśramāttasmādvivastro'pi bhayākulaḥ

गौतम को देखते ही इन्द्र भय से व्याकुल होकर, वस्त्रहीन ही, भागते हुए उस आश्रम से बाहर निकल गया।

श्लोक 13 (skanda.6.207.13)

अहिल्यापि भयत्रस्ता दृष्ट्वा भर्तारमागतम् अधोमुखी स्थिता राजंस्तदा व्याकुलितेंद्रिया

ahilyāpi bhayatrastā dṛṣṭvā bhartāramāgatam adhomukhī sthitā rājaṁstadā vyākuliteṁdriyā

हे राजन्, अपने पति को आया देखकर भयभीत अहिल्या भी अपनी इन्द्रियों में व्याकुल होकर सिर झुकाए खड़ी रह गई।

श्लोक 14 (skanda.6.207.14)

गौतमोऽपि च तद्दृष्ट्वा सम्यग्भार्याविचेष्टितम् ददौ शापं महाराज कोपसंरक्तलोचनः

gautamo'pi ca taddṛṣṭvā samyagbhāryāviceṣṭitam dadau śāpaṁ mahārāja kopasaṁraktalocanaḥ

हे महाराज, गौतम ने अपनी पत्नी का यह आचरण भलीभाँति देखकर, क्रोध से लाल हुए नेत्रों वाले होकर, शाप दे दिया।

श्लोक 15 (skanda.6.207.15)

यस्माच्छक्र पापकर्म कृतमीदृग्विगर्हितम् भार्या मे दूषिता साध्वी तस्मादवृषणो भव

yasmācchakra pāpakarma kṛtamīdṛgvigarhitam bhāryā me dūṣitā sādhvī tasmādavṛṣaṇo bhava

उन्होंने कहा — हे इन्द्र, चूँकि तूने ऐसा निन्दनीय पापकर्म किया है और मेरी सती पत्नी को दूषित किया है, इसलिए तू वृषणहीन हो जा।

श्लोक 16 (skanda.6.207.16)

सहस्रं च भगानां ते वक्त्रे भवतु मा चिरम् येन त्वं विप्लवं यासि त्रैलोक्ये सचराचरे

sahasraṁ ca bhagānāṁ te vaktre bhavatu mā ciram yena tvaṁ viplavaṁ yāsi trailokye sacarācare

और शीघ्र ही तेरे मुख पर सहस्र भग (योनि-चिह्न) प्रकट हो जाएँ, जिससे तू चराचर सहित तीनों लोकों में उपहास का पात्र बने।

श्लोक 17 (skanda.6.207.17)

अपरं मर्त्यलोकेऽत्र यद्यागच्छसि वासव पूजाकृते ततो मूर्धा शतधा ते भविष्यति

aparaṁ martyaloke'tra yadyāgacchasi vāsava pūjākṛte tato mūrdhā śatadhā te bhaviṣyati

और हे वासव, यदि तू पूजा पाने के लिए इस मृत्युलोक में आएगा, तो तेरा मस्तक सौ टुकड़ों में फट जाएगा।

श्लोक 18 (skanda.6.207.18)

एवं शप्त्वा च तं शक्रं ततोऽहिल्यामुवाच सः कोपसंरक्तनेत्रस्तु भर्त्सयित्वा मुहुर्मुहुः

evaṁ śaptvā ca taṁ śakraṁ tato'hilyāmuvāca saḥ kopasaṁraktanetrastu bhartsayitvā muhurmuhuḥ

इस प्रकार इन्द्र को शाप देकर, वे बार-बार क्रोध से लाल नेत्रों से उसे धिक्कारते हुए अहिल्या से बोले।

श्लोक 19 (skanda.6.207.19)

यस्मात्पापे त्वया कर्म कृतमेतद्विगर्हितम् तस्माच्छिलामयी भूत्वा त्वं तिष्ठ वसुधातले

yasmātpāpe tvayā karma kṛtametadvigarhitam tasmācchilāmayī bhūtvā tvaṁ tiṣṭha vasudhātale

हे पापिनी, चूँकि तूने यह निन्दनीय कर्म किया है, इसलिए तू शिलामयी होकर इस पृथ्वीतल पर पड़ी रह।

श्लोक 20 (skanda.6.207.20)

ततः सा तत्क्षणाज्जाता तस्य भार्या शिलात्मिका इन्द्रोऽपि च परित्यक्तो वृषणाभ्यां तथाऽभवत्

tataḥ sā tatkṣaṇājjātā tasya bhāryā śilātmikā indro'pi ca parityakto vṛṣaṇābhyāṁ tathā'bhavat

तत्क्षण ही उनकी पत्नी शिलारूप हो गई, और इन्द्र भी उसी क्षण वृषणों से रहित हो गया।

श्लोक 21 (skanda.6.207.21)

सहस्रभगचिह्नस्तु वक्त्रदेशे बभूव ह

sahasrabhagacihnastu vaktradeśe babhūva ha

उसके मुख पर सहस्र भग के चिह्न प्रकट हो गए।

श्लोक 22 (skanda.6.207.22)

अथ मेरोः समासाद्य कंदरं विजनं हरिः सव्रीडः सेवते नित्यं न जगाम निजां पुरीम्

atha meroḥ samāsādya kaṁdaraṁ vijanaṁ hariḥ savrīḍaḥ sevate nityaṁ na jagāma nijāṁ purīm

तब इन्द्र मेरु पर्वत की एक निर्जन कन्दरा में जाकर लज्जावश वहीं सदा रहने लगा और अपनी नगरी को न लौटा।

श्लोक 23 (skanda.6.207.23)

ततो देवगणाः सर्वे सोद्वेगास्तेन वर्जिताः नो जानंति च तत्रस्थं कन्दरान्वेषणे रताः

tato devagaṇāḥ sarve sodvegāstena varjitāḥ no jānaṁti ca tatrasthaṁ kandarānveṣaṇe ratāḥ

तब उससे रहित हुए सारे देवगण व्याकुल हो गए; वे उसे उस कन्दरा में ढूँढ़ते रहे किंतु उसका पता न लगा सके।

श्लोक 24 (skanda.6.207.24)

पीड्यंते दानवैः रौद्रैः स्वर्गे जाते विराजके

pīḍyaṁte dānavaiḥ raudraiḥ svarge jāte virājake

स्वर्ग के राजाविहीन हो जाने पर वे भयंकर दानवों द्वारा पीड़ित होने लगे।

श्लोक 25 (skanda.6.207.25)

एतस्मिन्नन्तरे जीवः शक्राण्या भयभीतया सोद्वेगया परिपृष्टः क्व गतोऽथ पुरंदरः

etasminnantare jīvaḥ śakrāṇyā bhayabhītayā sodvegayā paripṛṣṭaḥ kva gato'tha puraṁdaraḥ

इसी बीच भयभीत और व्याकुल इन्द्राणी ने बृहस्पति (जीव) से पूछा कि पुरन्दर कहाँ चले गए हैं।

श्लोक 26 (skanda.6.207.26)

अथ जीवश्चिरं ध्यात्वा दृष्ट्वा तं ज्ञानचक्षुषा जगाम सहितो देवैः प्रोवाचाथ सुनिष्ठुरम्

atha jīvaściraṁ dhyātvā dṛṣṭvā taṁ jñānacakṣuṣā jagāma sahito devaiḥ provācātha suniṣṭhuram

तब बृहस्पति ने बहुत देर ध्यान करके अपने ज्ञान-नेत्र से उसे देख लिया, और देवताओं सहित वहाँ जाकर उससे कठोर वचन कहे।

श्लोक 27 (skanda.6.207.27)

किमित्थं राज्यभोगांस्त्वं त्यक्त्वा विजनमाश्रितः किं त्वया विहितं ध्यानं किं रौद्रं संश्रितं तपः

kimitthaṁ rājyabhogāṁstvaṁ tyaktvā vijanamāśritaḥ kiṁ tvayā vihitaṁ dhyānaṁ kiṁ raudraṁ saṁśritaṁ tapaḥ

उन्होंने कहा — तुमने राज्य और भोगों को त्यागकर इस निर्जन स्थान का आश्रय क्यों लिया है? क्या तुमने कोई ध्यान किया है या कोई घोर तप धारण किया है?

श्लोक 28 (skanda.6.207.28)

बृहस्पतेर्वचः श्रुत्वा भगवक्त्रः पुरंदरः प्रोवाच लज्जया युक्तो दीनो बाष्पपरिप्लुतः

bṛhaspatervacaḥ śrutvā bhagavaktraḥ puraṁdaraḥ provāca lajjayā yukto dīno bāṣpapariplutaḥ

बृहस्पति के वचन सुनकर, भगरूप मुख वाला दीन पुरन्दर लज्जा से भर उठा और आँसुओं से भरकर बोला।

श्लोक 29 (skanda.6.207.29)

नाहं राज्यं करिष्यामि त्रैलोक्येऽपि कथंचन पश्य मे यादृशी जाता ह्यवस्था गौतमान्मुनेः

nāhaṁ rājyaṁ kariṣyāmi trailokye'pi kathaṁcana paśya me yādṛśī jātā hyavasthā gautamānmuneḥ

उसने कहा — मैं अब त्रैलोक्य का राज्य कभी भी नहीं करूँगा; देखो, गौतम मुनि के शाप से मेरी कैसी दशा हो गई है।

श्लोक 30 (skanda.6.207.30)

सहस्रभगचिह्नेन कथं वक्त्रेण तानहम् देवान्संभावयिष्यामि पौलोमीं च तथा शिवम्

sahasrabhagacihnena kathaṁ vaktreṇa tānaham devānsaṁbhāvayiṣyāmi paulomīṁ ca tathā śivam

इस सहस्र-भग-चिह्नित मुख के साथ मैं देवताओं का, इन्द्राणी का और शिव जी का सामना कैसे करूँगा?

श्लोक 31 (skanda.6.207.31)

मर्त्यलोकोद्भवा पूजा नष्टा मम बृहस्पते गौतमस्य मुनेः शापात्कस्मिंश्चित्कारणांतरे

martyalokodbhavā pūjā naṣṭā mama bṛhaspate gautamasya muneḥ śāpātkasmiṁścitkāraṇāṁtare

हे बृहस्पते, किसी कारणवश गौतम मुनि के शाप से मृत्युलोक से मुझे प्राप्त होने वाली पूजा भी नष्ट हो गई है।

श्लोक 32 (skanda.6.207.32)

तच्छ्रुत्वा देवराजस्य बृहस्पतिरुवाचह दुःखेन महता युक्तः सर्वैर्देवैः समावृतः गौतमस्य समीपे च गत्वा प्रोवाच तं स्वयम्

tacchrutvā devarājasya bṛhaspatiruvācaha duḥkhena mahatā yuktaḥ sarvairdevaiḥ samāvṛtaḥ gautamasya samīpe ca gatvā provāca taṁ svayam

यह सुनकर बृहस्पति, अत्यंत दुःखी होकर, समस्त देवताओं के साथ गौतम के समीप गए और स्वयं उनसे बोले।

श्लोक 33 (skanda.6.207.33)

एतच्छक्रपरित्यक्तं त्रैलोक्यमपि चाखिलम् पीड्यते दानवैर्विप्र नष्टयज्ञोत्सवक्रियम्

etacchakraparityaktaṁ trailokyamapi cākhilam pīḍyate dānavairvipra naṣṭayajñotsavakriyam

उन्होंने कहा — हे विप्र, इन्द्र के त्याग देने से यह सारा त्रिलोक दानवों द्वारा पीड़ित हो रहा है, और यज्ञ-उत्सव के कार्य नष्ट हो गए हैं।

श्लोक 34 (skanda.6.207.34)

नैष वांछति राज्यं स्वं लज्जया परया युतः तस्मादस्य प्रसादं त्वं यथावत्कर्तुमर्हसि अनुग्रहेण शापस्य मम वाक्याद्द्विजोत्तम

naiṣa vāṁchati rājyaṁ svaṁ lajjayā parayā yutaḥ tasmādasya prasādaṁ tvaṁ yathāvatkartumarhasi anugraheṇa śāpasya mama vākyāddvijottama

वह अत्यंत लज्जा से भरा हुआ अब अपना राज्य भी नहीं चाहता। हे द्विजोत्तम, इसलिए मेरे कहने से आप उस पर कृपा करें और अपने शाप में कुछ अनुग्रह करें, जैसा उचित हो।

श्लोक 35 (skanda.6.207.35)

तच्छ्रुत्वा गौतमः प्राह न मे वाक्यं भवेन्मृषा न वाक्यं लोपयिष्यामि यदुक्तं स्वयमेव हि

tacchrutvā gautamaḥ prāha na me vākyaṁ bhavenmṛṣā na vākyaṁ lopayiṣyāmi yaduktaṁ svayameva hi

यह सुनकर गौतम बोले — मेरा वचन असत्य नहीं हो सकता; मैंने स्वयं जो कहा है, उसे मैं लुप्त नहीं करूँगा।

श्लोक 36 (skanda.6.207.36)

ततः प्रोवाच ते विष्णुः स्वयं चापि महेश्वरः तथा देवगणाः सर्वे विनयावनता स्थिताः

tataḥ provāca te viṣṇuḥ svayaṁ cāpi maheśvaraḥ tathā devagaṇāḥ sarve vinayāvanatā sthitāḥ

तब स्वयं विष्णु जी और महेश्वर जी भी वहाँ आकर बोले, और समस्त देवगण विनम्रतापूर्वक झुके खड़े रहे।

श्लोक 37 (skanda.6.207.37)

अन्यथा ब्रह्मणो वाक्यं न ते कर्तुं प्रयुज्यते तस्मात्कुरुष्व विप्रेन्द्र शापस्यानुग्रहं हरेः

anyathā brahmaṇo vākyaṁ na te kartuṁ prayujyate tasmātkuruṣva viprendra śāpasyānugrahaṁ hareḥ

उन्होंने कहा — ब्रह्मा जी के वचन को अन्यथा करना आपके लिए उचित नहीं। इसलिए हे विप्रेन्द्र, विष्णु के कहने से आप अपने शाप में कुछ अनुग्रह कीजिए।

श्लोक 38 (skanda.6.207.38)

दृष्ट्वा तन्मनसो दार्ढ्यं सुरा विष्णुपुरोगमाः ब्रह्मणोंऽतिकमभ्येत्य तस्मै सर्वं न्यवेदयन्

dṛṣṭvā tanmanaso dārḍhyaṁ surā viṣṇupurogamāḥ brahmaṇoṁ'tikamabhyetya tasmai sarvaṁ nyavedayan

गौतम के मन की दृढ़ता देखकर विष्णु आदि देवता ब्रह्मा जी के पास गए और उन्हें सब कुछ निवेदन किया।

श्लोक 39 (skanda.6.207.39)

शापं शक्रस्य संजातं तथा तस्मान्महामुनेः

śāpaṁ śakrasya saṁjātaṁ tathā tasmānmahāmuneḥ

उन्होंने बताया कि उस महामुनि से इन्द्र को कैसा शाप प्राप्त हुआ था।

श्लोक 40 (skanda.6.207.40)

यथा विडंबना जाता देवराजस्य गर्हिता तथा च दानवैः सर्वं त्रैलोक्यं व्याकुलीकृतम्

yathā viḍaṁbanā jātā devarājasya garhitā tathā ca dānavaiḥ sarvaṁ trailokyaṁ vyākulīkṛtam

उन्होंने बताया कि किस प्रकार देवराज की घोर विडम्बना हुई और किस प्रकार दानवों ने सारे त्रिलोक को व्याकुल कर दिया है।

श्लोक 41 (skanda.6.207.41)

यथा न कुरुते राज्यं व्रीडितः स शचीपतिः तच्छ्रुत्वा पद्मजस्तूर्णं हरिशंभुसमन्वितः

yathā na kurute rājyaṁ vrīḍitaḥ sa śacīpatiḥ tacchrutvā padmajastūrṇaṁ hariśaṁbhusamanvitaḥ

और यह भी कि लज्जित इन्द्र अब राज्य करना भी नहीं चाहता। यह सुनकर ब्रह्मा जी शीघ्र ही विष्णु और शिव के साथ चल पड़े।

श्लोक 42 (skanda.6.207.42)

जगाम तत्र यत्रास्ते दुःखितः पाकशासनः गौतमं च समानीय तत्रैव च पितामहः

jagāma tatra yatrāste duḥkhitaḥ pākaśāsanaḥ gautamaṁ ca samānīya tatraiva ca pitāmahaḥ

वे वहाँ गए जहाँ दुःखी इन्द्र बैठा था, और पितामह गौतम को भी वहीं ले आए।

श्लोक 43 (skanda.6.207.43)

ततः प्रोवाच प्रत्यक्षं देवानां वासवस्य च अयुक्तं देवराजेन विहितं मुनिसत्तम

tataḥ provāca pratyakṣaṁ devānāṁ vāsavasya ca ayuktaṁ devarājena vihitaṁ munisattama

तब उन्होंने देवताओं और इन्द्र दोनों के समक्ष कहा — हे मुनिश्रेष्ठ, देवराज ने जो किया वह निःसंदेह अनुचित था।

श्लोक 44 (skanda.6.207.44)

यत्ते प्रदूषिता भार्या कामोपहतचेतसा न ते दोषोऽस्ति यच्छप्तश्छिद्रे चास्मिन्पुरंदरः परं प्रशस्यते नित्यं मुनीनां परमा क्षमा

yatte pradūṣitā bhāryā kāmopahatacetasā na te doṣo'sti yacchaptaśchidre cāsminpuraṁdaraḥ paraṁ praśasyate nityaṁ munīnāṁ paramā kṣamā

कामवश उसने आपकी पत्नी को दूषित किया, इसमें आपका कोई दोष नहीं कि आपने इस अवसर पर इन्द्र को शाप दिया; किंतु मुनियों की परम क्षमा सदा प्रशंसनीय मानी जाती है।

श्लोक 45 (skanda.6.207.45)

यथा त्रैलोक्यराज्यं स्वं प्रकरोति शतक्रतुः त्वया स्वयं प्रसादेन तथा नीतिर्विधीयताम्

yathā trailokyarājyaṁ svaṁ prakaroti śatakratuḥ tvayā svayaṁ prasādena tathā nītirvidhīyatām

अतः आप स्वयं अपनी कृपा से ऐसी व्यवस्था कीजिए जिससे शतक्रतु इन्द्र पुनः अपने त्रिलोक-राज्य को कर सकें।

श्लोक 46 (skanda.6.207.46)

दत्त्वाऽस्य वृषणौ भूयो नाशयित्वा भगानिमान् मर्त्यलोके गतिश्चास्य यथा स्यात्तत्समाचर

dattvā'sya vṛṣaṇau bhūyo nāśayitvā bhagānimān martyaloke gatiścāsya yathā syāttatsamācara

उसे पुनः वृषण प्रदान कीजिए और इन भग-चिह्नों को मिटा दीजिए, तथा ऐसी व्यवस्था कीजिए कि इसे मृत्युलोक में भी गति (आने-जाने का अधिकार) प्राप्त हो सके।

श्लोक 47 (skanda.6.207.47)

तच्छ्रुत्वा वचनं तेषां स मुनिर्देवगौरवात् वृषणौ मेषसंभूतौ योजयामास तौ तदा

tacchrutvā vacanaṁ teṣāṁ sa munirdevagauravāt vṛṣaṇau meṣasaṁbhūtau yojayāmāsa tau tadā

उनका यह वचन सुनकर वे मुनि देवताओं के आदर के कारण उसे मेष (मेढ़े) के वृषण जोड़ने लगे।

श्लोक 48 (skanda.6.207.48)

तान्भगान्पाणिना स्पृष्ट्वा चक्रे नेत्राणि सन्मुनिः ततः प्रोवाच तान्देवान्गौतमश्च महातपाः

tānbhagānpāṇinā spṛṣṭvā cakre netrāṇi sanmuniḥ tataḥ provāca tāndevāngautamaśca mahātapāḥ

फिर उन भग-चिह्नों को अपने हाथ से स्पर्श कर सन्मुनि ने उन्हें नेत्रों में बदल दिया। तब महातपस्वी गौतम ने उन देवताओं से कहा।

श्लोक 49 (skanda.6.207.49)

सहस्राक्षो मया शक्रो निर्मितोयं सुरोत्तमाः स मेषवृषणश्चापि स्वं च राज्यं करिष्यति शोभाऽस्य नेत्रजा वक्त्रे सुरम्या संभविष्यति

sahasrākṣo mayā śakro nirmitoyaṁ surottamāḥ sa meṣavṛṣaṇaścāpi svaṁ ca rājyaṁ kariṣyati śobhā'sya netrajā vaktre suramyā saṁbhaviṣyati

हे देवश्रेष्ठों, मैंने इस इन्द्र को सहस्राक्ष (सहस्र नेत्रों वाला) बना दिया है। यह मेष-वृषण होते हुए भी अपने राज्य को कर सकेगा, और इसके मुख पर नेत्रों से उत्पन्न सुंदर शोभा होगी।

श्लोक 50 (skanda.6.207.50)

पुंस्त्वं च मेषजोत्थाभ्यां वृषणाभ्यां भविष्यति न च मर्त्ये गतिश्चास्य पूजार्थं संभविष्यति

puṁstvaṁ ca meṣajotthābhyāṁ vṛṣaṇābhyāṁ bhaviṣyati na ca martye gatiścāsya pūjārthaṁ saṁbhaviṣyati

उसका पुरुषत्व मेष से उत्पन्न वृषणों द्वारा सिद्ध होगा, किंतु पूजा पाने के लिए उसे मृत्युलोक में जाने का अधिकार नहीं होगा।

श्लोक 51 (skanda.6.207.51)

एतस्मिन्नन्तरे जातः सहस्राक्षः पुरंदरः शोभया परया युक्तो मुनेस्तस्य प्रभावतः

etasminnantare jātaḥ sahasrākṣaḥ puraṁdaraḥ śobhayā parayā yukto munestasya prabhāvataḥ

इसी बीच उस मुनि के प्रभाव से पुरन्दर सहस्राक्ष होकर परम शोभा से युक्त हो गया।

श्लोक 52 (skanda.6.207.52)

ततः संगृह्य पादौ च गौतमस्य महात्मनः प्रोवाच वचनं शक्रः सर्वदेवसमागमे

tataḥ saṁgṛhya pādau ca gautamasya mahātmanaḥ provāca vacanaṁ śakraḥ sarvadevasamāgame

तब महात्मा गौतम के दोनों चरण पकड़कर इन्द्र ने समस्त देवताओं की सभा में यह वचन कहा।

श्लोक 53 (skanda.6.207.53)

दुर्लभा मर्त्यलोकोत्था पूजा ब्राह्मणसत्तम सा मे तव प्रसादेन यथा स्यात्तत्समाचर

durlabhā martyalokotthā pūjā brāhmaṇasattama sā me tava prasādena yathā syāttatsamācara

हे ब्राह्मणश्रेष्ठ, मृत्युलोक से प्राप्त होने वाली पूजा अत्यंत दुर्लभ है; कृपा करके ऐसा उपाय कीजिए कि वह आपकी कृपा से मुझे पुनः प्राप्त हो सके।

श्लोक 54 (skanda.6.207.54)

त्रैलोक्यपतिजा संज्ञा मा नाशं यातु मे द्विज प्रसादात्तव सा नित्यं यथा स्यात्तद्विधीयताम्

trailokyapatijā saṁjñā mā nāśaṁ yātu me dvija prasādāttava sā nityaṁ yathā syāttadvidhīyatām

हे द्विज, मेरी त्रैलोक्यपति की पदवी नष्ट न हो, आपकी कृपा से वह सदा बनी रहे, ऐसा प्रबंध कीजिए।

श्लोक 55 (skanda.6.207.55)

तच्छ्रुत्वा लज्जयाविष्टः कृपया चाथ सन्मुनिः तमूचे सर्वदेवानां प्रत्यक्षं पाकशासनम्

tacchrutvā lajjayāviṣṭaḥ kṛpayā cātha sanmuniḥ tamūce sarvadevānāṁ pratyakṣaṁ pākaśāsanam

यह सुनकर सन्मुनि गौतम, लज्जा और कृपा दोनों से भरकर, समस्त देवताओं के समक्ष इन्द्र से बोले।

श्लोक 56 (skanda.6.207.56)

पंचरात्रं च ते पूजा मर्त्यलोके भविष्यति अनन्यां तृप्तिमभ्येषि यथा चैव तु वत्सरम्

paṁcarātraṁ ca te pūjā martyaloke bhaviṣyati ananyāṁ tṛptimabhyeṣi yathā caiva tu vatsaram

उन्होंने कहा — तुम्हें मृत्युलोक में पाँच रात्रि तक पूजा प्राप्त होगी, जिससे तुम्हें ऐसी तृप्ति मिलेगी मानो वह पूरे वर्ष भर की हो।

श्लोक 57 (skanda.6.207.57)

यत्र देशे पुरे ग्रामे पंचरात्रं महोत्सवः तत्र संवत्सरं यावन्नीरोगो भविता जनः

yatra deśe pure grāme paṁcarātraṁ mahotsavaḥ tatra saṁvatsaraṁ yāvannīrogo bhavitā janaḥ

जिस देश, नगर या गाँव में यह पंचरात्र महोत्सव मनाया जाएगा, वहाँ के लोग वर्षभर रोगरहित रहेंगे।

श्लोक 58 (skanda.6.207.58)

आधयो व्याधयो नैव न दुर्भिक्षं कथंचन न च राज्ञो विनाशः स्यान्नैव लोकेऽसुखं क्वचित्

ādhayo vyādhayo naiva na durbhikṣaṁ kathaṁcana na ca rājño vināśaḥ syānnaiva loke'sukhaṁ kvacit

वहाँ न मानसिक कष्ट होंगे, न शारीरिक रोग, न कहीं दुर्भिक्ष होगा; न राजा का विनाश होगा और न लोगों में कहीं दुःख होगा।

श्लोक 59 (skanda.6.207.59)

यत्र स्थाने महो भावी तावकश्च पुरंदर प्रभूतपयसो गावः प्रभविष्यंति तत्र च सुभिक्षं सुखिनो लोकाः सर्वोपद्रववर्जिताः

yatra sthāne maho bhāvī tāvakaśca puraṁdara prabhūtapayaso gāvaḥ prabhaviṣyaṁti tatra ca subhikṣaṁ sukhino lokāḥ sarvopadravavarjitāḥ

हे पुरन्दर, जहाँ भी तुम्हारा यह उत्सव मनाया जाएगा, वहाँ गायें प्रचुर दूध देने वाली होंगी, अन्न-समृद्धि रहेगी, लोग सुखी रहेंगे और सब उपद्रवों से रहित होंगे।

श्लोक 60 (skanda.6.207.60)

इन्द्र उवाच यद्येवं शरदि प्राप्ते सर्वसत्त्वमनोहरे सप्तच्छदसमाकीर्णे बन्धूकसुविराजिते

indra uvāca yadyevaṁ śaradi prāpte sarvasattvamanohare saptacchadasamākīrṇe bandhūkasuvirājite

इन्द्र ने कहा — यदि ऐसा है, तो सप्तच्छद के वृक्षों और बन्धूक पुष्पों से सुशोभित, समस्त प्राणियों को मनोहर लगने वाली शरद ऋतु आने पर—

श्लोक 61 (skanda.6.207.61)

मालतीगन्धसंकीर्णे नवसस्यसमाकुले चंद्रज्योत्स्नाकृतोद्द्योते षट्पदारावसंकुले

mālatīgandhasaṁkīrṇe navasasyasamākule caṁdrajyotsnākṛtoddyote ṣaṭpadārāvasaṁkule

—मालती के सुगंध से युक्त, नए धान्य से भरी, चन्द्रमा की चाँदनी से प्रकाशित तथा भ्रमरों की गुंजार से गूँजती हुई—

श्लोक 62 (skanda.6.207.62)

कुमुदोत्पलसंयुक्ते तत्र स्यात्सुमहोत्सवः येन बालोऽपि वृद्धोऽपि संहृष्टस्तत्समाचर

kumudotpalasaṁyukte tatra syātsumahotsavaḥ yena bālo'pi vṛddho'pi saṁhṛṣṭastatsamācara

—और कुमुद-उत्पल कमलों से युक्त उस ऋतु में एक महान उत्सव हो, जिससे बालक और वृद्ध सभी हर्षित हों — ऐसा ही कीजिए।

श्लोक 63 (skanda.6.207.63)

गौतम उवाच अद्य श्रवणनक्षत्रे तव दत्तो महोत्सवः वैष्णवे पुण्यनक्षत्रे सर्वपापविवर्जिते

gautama uvāca adya śravaṇanakṣatre tava datto mahotsavaḥ vaiṣṇave puṇyanakṣatre sarvapāpavivarjite

गौतम ने कहा — आज श्रवण नक्षत्र में, जो विष्णु का पवित्र और सर्वपापरहित नक्षत्र है, मैंने तुम्हें यह महोत्सव प्रदान किया है।

श्लोक 64 (skanda.6.207.64)

त्वया मे धर्षिता भार्या पौष्णे नक्षत्रसंज्ञिते तस्मिन्भविष्यति व्यक्तं तव पातः पुरंदर

tvayā me dharṣitā bhāryā pauṣṇe nakṣatrasaṁjñite tasminbhaviṣyati vyaktaṁ tava pātaḥ puraṁdara

तुमने पौष्ण नक्षत्र में मेरी पत्नी का भंग किया था; इसलिए हे पुरन्दर, उसी नक्षत्र में तुम्हारा पतन स्पष्ट रूप से हुआ था।

श्लोक 65 (skanda.6.207.65)

येनैषा मामकी कीर्तिस्तावकं वक्तु कर्म तत् विख्यातिं यातु लोकेऽत्र न कश्चित्पापमाचरेत्

yenaiṣā māmakī kīrtistāvakaṁ vaktu karma tat vikhyātiṁ yātu loke'tra na kaścitpāpamācaret

इस घटना से मेरी कीर्ति और तुम्हारा वह कर्म संसार में इस प्रकार विख्यात हो कि कोई भी फिर ऐसा पाप न करे।

श्लोक 66 (skanda.6.207.66)

श्रवणादीनि पंचैव नक्षत्राणि पृथक्पृथक् तव पूजाकृते पंच क्रतुतुल्यानि तानि च भविष्यंति न संदेहः सर्वतीर्थमयानि च

śravaṇādīni paṁcaiva nakṣatrāṇi pṛthakpṛthak tava pūjākṛte paṁca kratutulyāni tāni ca bhaviṣyaṁti na saṁdehaḥ sarvatīrthamayāni ca

श्रवण से आरंभ होने वाले पाँच अलग-अलग नक्षत्र तुम्हारी पूजा के लिए पाँच यज्ञों के समान फलदायी होंगे, और वे निःसंदेह सभी तीर्थों के समान पुण्यमय होंगे।

श्लोक 67 (skanda.6.207.67)

यो यं काममभिध्याय पूजां तव करिष्यति विशेषात्फलपुष्पैश्च स तं कृत्स्नमवाप्नुयात्

yo yaṁ kāmamabhidhyāya pūjāṁ tava kariṣyati viśeṣātphalapuṣpaiśca sa taṁ kṛtsnamavāpnuyāt

जो कोई भी अपनी कोई कामना मन में रखकर, विशेषतः फल-पुष्पों से तुम्हारी पूजा करेगा, वह उस अपनी कामना को पूर्ण रूप से प्राप्त करेगा।

श्लोक 68 (skanda.6.207.68)

परं मूर्तिर्न ते पूज्या कुत्रापि च भविष्यति त्वया मे दूषिता भार्या ब्राह्मणी प्राणसंमता

paraṁ mūrtirna te pūjyā kutrāpi ca bhaviṣyati tvayā me dūṣitā bhāryā brāhmaṇī prāṇasaṁmatā

किंतु तुम्हारी कोई मूर्ति कहीं भी पूज्य नहीं होगी, क्योंकि तुमने मेरी प्राणों के समान प्रिय ब्राह्मणी पत्नी को दूषित किया है।

श्लोक 69 (skanda.6.207.69)

तस्माद्वृक्षोद्भवां यष्टिं ब्राह्मणा वेदपारगाः तावकैः सकलैर्मंत्रैः स्थापयिष्यंति शक्तितः

tasmādvṛkṣodbhavāṁ yaṣṭiṁ brāhmaṇā vedapāragāḥ tāvakaiḥ sakalairmaṁtraiḥ sthāpayiṣyaṁti śaktitaḥ

इसलिए वेदपारंगत ब्राह्मण वृक्ष से बनी एक यष्टि (दंड) को अपनी शक्ति के अनुसार तुम्हारे सभी मंत्रों के साथ स्थापित करेंगे।

श्लोक 70 (skanda.6.207.70)

पंचरात्रविधानेन यथान्येषां दिवौकसाम् ततः संक्रमणं कृत्वा पूजा मर्त्यसमुद्भवा त्वया ग्राह्या सहस्राक्ष तृप्तिश्चैव भविष्यति

paṁcarātravidhānena yathānyeṣāṁ divaukasām tataḥ saṁkramaṇaṁ kṛtvā pūjā martyasamudbhavā tvayā grāhyā sahasrākṣa tṛptiścaiva bhaviṣyati

हे सहस्राक्ष, जैसे अन्य देवताओं का पंचरात्र-विधान होता है वैसे ही उस यष्टि में तुम्हारा संक्रमण करके, उस मृत्युलोक से उत्पन्न पूजा को तुम्हें ग्रहण करना होगा, तभी तुम्हें तृप्ति प्राप्त होगी।

श्लोक 71 (skanda.6.207.71)

यो यथा चैव ते यष्टिं सुप्तामुत्थापयिष्यति तस्य तस्याधिका सिद्धिः संभविष्यंति वासव

yo yathā caiva te yaṣṭiṁ suptāmutthāpayiṣyati tasya tasyādhikā siddhiḥ saṁbhaviṣyaṁti vāsava

हे वासव, जो कोई भी विधिपूर्वक तुम्हारी सोई हुई यष्टि को उठाएगा (स्थापित करेगा), उसे उतनी ही अधिक सिद्धि प्राप्त होगी।

श्लोक 72 (skanda.6.207.72)

पंचरात्रव्रतरतो यो ब्रह्मचर्यपरायणः प्रकरिष्यति ते पूजां फलपुष्पैर्यथोदितैः

paṁcarātravratarato yo brahmacaryaparāyaṇaḥ prakariṣyati te pūjāṁ phalapuṣpairyathoditaiḥ

जो कोई पंचरात्र-व्रत में तत्पर और ब्रह्मचर्य में निष्ठ होकर, यथोक्त फल-पुष्पों से तुम्हारी पूजा करेगा—

श्लोक 73 (skanda.6.207.73)

परदारकृतात्पापात्स सर्वान्मुक्तिमेष्यति

paradārakṛtātpāpātsa sarvānmuktimeṣyati

—वह परस्त्री-गमन से उत्पन्न सभी पापों से मुक्त हो जाएगा।

श्लोक 74 (skanda.6.207.74)

नमः शक्राय देवाय शुनासीराय ते नमः नमस्ते वज्रहस्ताय नमस्ते वज्रपाणये

namaḥ śakrāya devāya śunāsīrāya te namaḥ namaste vajrahastāya namaste vajrapāṇaye

देव शक्र को नमस्कार है, हे शुनासीर तुम्हें नमस्कार है; हे वज्रहस्त तुम्हें नमस्कार है, हे वज्रपाणि तुम्हें नमस्कार है।

श्लोक 75 (skanda.6.207.75)

मन्त्रेणानेन यश्चार्घ्यं तव शक्र प्रदास्यति परदारकृतं पापं तस्य सर्वं प्रयास्यति

mantreṇānena yaścārghyaṁ tava śakra pradāsyati paradārakṛtaṁ pāpaṁ tasya sarvaṁ prayāsyati

हे शक्र, जो कोई इस मंत्र से तुम्हें अर्घ्य देगा, उसका परस्त्री-गमन से उत्पन्न समस्त पाप नष्ट हो जाएगा।

श्लोक 76 (skanda.6.207.76)

यश्चेदं तव संवादं मया सार्धं पुरंदर कीर्तयिष्यति सद्भक्त्या तथैवाकर्णयिष्यति

yaścedaṁ tava saṁvādaṁ mayā sārdhaṁ puraṁdara kīrtayiṣyati sadbhaktyā tathaivākarṇayiṣyati

हे पुरन्दर, जो कोई भी मेरे साथ हुए तुम्हारे इस संवाद को सद्भक्तिपूर्वक कीर्तन करेगा या सुनेगा—

श्लोक 77 (skanda.6.207.77)

तस्य संवत्सरं यावन्नैव रोगो भविष्यति तच्छ्रुत्वा विबुधाः सर्वे तथेत्युक्त्वा प्रहर्षिताः

tasya saṁvatsaraṁ yāvannaiva rogo bhaviṣyati tacchrutvā vibudhāḥ sarve tathetyuktvā praharṣitāḥ

—उसे एक वर्षभर कोई रोग नहीं होगा। यह सुनकर समस्त देवगण 'ऐसा ही हो' कहकर अत्यंत हर्षित हुए।

श्लोक 78 (skanda.6.207.78)

जग्मुः शक्रं समादाय पुनरेवामरावतीम् गौतमोऽपि निजावासं गतः कोपसमाश्रितः

jagmuḥ śakraṁ samādāya punarevāmarāvatīm gautamo'pi nijāvāsaṁ gataḥ kopasamāśritaḥ

वे इन्द्र को साथ लेकर पुनः अमरावती को चले गए, और गौतम भी क्रोध से युक्त होकर अपने आश्रम को लौट गए।

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