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नागर खण्ड · अध्याय 214

विश्वामित्र-प्रसंग में गणपति-पूजा-विधि

अध्याय 213अध्याय-सूचीअध्याय 215

श्लोक 1 (skanda.6.214.1)

सूत उवाच तथान्योपि च तत्रास्ति विश्वामित्रप्रतिष्ठितः गणनाथो द्विजश्रेष्ठाः सर्वसिद्धिप्रदो नृणाम्

sūta uvāca tathānyopi ca tatrāsti viśvāmitrapratiṣṭhitaḥ gaṇanātho dvijaśreṣṭhāḥ sarvasiddhiprado nṛṇām

सूत जी ने कहा — हे द्विजश्रेष्ठो, वहाँ विश्वामित्र द्वारा प्रतिष्ठापित एक और भी देव हैं — गणनाथ, जो मनुष्यों को सब सिद्धियाँ प्रदान करने वाले हैं।

श्लोक 2 (skanda.6.214.2)

माघमासे चतुर्थ्यां च शुक्लायां पूजयेत्तु यः स च संवत्सरं यावत्सर्वैर्विघ्नैर्विमुच्यते

māghamāse caturthyāṁ ca śuklāyāṁ pūjayettu yaḥ sa ca saṁvatsaraṁ yāvatsarvairvighnairvimucyate

जो कोई माघ मास के शुक्लपक्ष की चतुर्थी को उनकी पूजा करता है, वह एक वर्षभर सब विघ्नों से मुक्त रहता है।

श्लोक 3 (skanda.6.214.3)

ऋषय ऊचुः गणनाथस्य चोत्पत्तिं सांप्रतं सूत नो वद कथमेष समुत्पन्नः किं माहात्म्यः प्रकीर्तितः

ṛṣaya ūcuḥ gaṇanāthasya cotpattiṁ sāṁprataṁ sūta no vada kathameṣa samutpannaḥ kiṁ māhātmyaḥ prakīrtitaḥ

ऋषियों ने कहा — हे सूत जी, अब हमें गणनाथ की उत्पत्ति बताइए — यह कैसे उत्पन्न हुए, इनका क्या माहात्म्य कहा गया है?

श्लोक 4 (skanda.6.214.4)

सूत उवाच एष चोत्पादितो गौर्या निजांगमलतः स्वयम् क्रीडार्थं मानुषैरंगैर्मातंगाननशोभितः

sūta uvāca eṣa cotpādito gauryā nijāṁgamalataḥ svayam krīḍārthaṁ mānuṣairaṁgairmātaṁgānanaśobhitaḥ

सूत जी ने कहा — इन्हें गौरी माता ने स्वयं अपने शरीर के मैल से क्रीड़ा के लिए उत्पन्न किया, मानव अंगों से युक्त, किंतु हाथी के मुख से सुशोभित।

श्लोक 5 (skanda.6.214.5)

चतुर्हस्तसमोपेत आखुवाहनगस्तथा कुठारहस्तश्च तथा मोदकाशनतोषकृत्

caturhastasamopeta ākhuvāhanagastathā kuṭhārahastaśca tathā modakāśanatoṣakṛt

वे चार भुजाओं से युक्त थे, चूहे को वाहन बनाने वाले, हाथ में कुठार (फरसा) लिए हुए, तथा मोदक खाकर संतुष्ट होने वाले थे।

श्लोक 6 (skanda.6.214.6)

सर्वसिद्धिप्रदो लोके भक्तानां च विशेषतः एष पूर्वं प्रभोः कार्ये संग्रामे तारकामये

sarvasiddhiprado loke bhaktānāṁ ca viśeṣataḥ eṣa pūrvaṁ prabhoḥ kārye saṁgrāme tārakāmaye

वे संसार में सब सिद्धियाँ देने वाले हैं, विशेषतः अपने भक्तों को। ये पहले तारकासुर के संग्राम में प्रभु शिव के कार्य में—

श्लोक 7 (skanda.6.214.7)

संग्राममकरोद्रौद्रं न कृतं यच्च केनचित् निहता दानवाः सर्वे संख्यया परिवर्जिताः

saṁgrāmamakarodraudraṁ na kṛtaṁ yacca kenacit nihatā dānavāḥ sarve saṁkhyayā parivarjitāḥ

—उन्होंने ऐसा भयंकर युद्ध किया जो और किसी ने नहीं किया, जिसमें असंख्य दानव मारे गए।

श्लोक 8 (skanda.6.214.8)

ततः शक्रेण तुष्टेन प्रोक्तः संग्रामभूमिपः क्षतविक्षतसर्वांगो रुधिरेण परिप्लुतः

tataḥ śakreṇa tuṣṭena proktaḥ saṁgrāmabhūmipaḥ kṣatavikṣatasarvāṁgo rudhireṇa pariplutaḥ

तब प्रसन्न हुए इन्द्र ने रणभूमि में खड़े, समस्त अंगों में घायल तथा रक्त से लथपथ उन गणनाथ से कहा।

श्लोक 9 (skanda.6.214.9)

अस्मदर्थे त्वया युद्धं यत्कृतं सुगजानन निहता दानवाः सर्वे संख्यया परिवर्जिताः

asmadarthe tvayā yuddhaṁ yatkṛtaṁ sugajānana nihatā dānavāḥ sarve saṁkhyayā parivarjitāḥ

उन्होंने कहा — हे सुगजानन, तुमने हमारे लिए जो युद्ध किया, जिसमें असंख्य दानव मारे गए—

श्लोक 10 (skanda.6.214.10)

तस्मात्त्वं सर्वदेवानामपि पूज्यो भविष्यसि किंपुनर्मानुषाणां च ये नित्यं विघ्नसंप्लुताः

tasmāttvaṁ sarvadevānāmapi pūjyo bhaviṣyasi kiṁpunarmānuṣāṇāṁ ca ye nityaṁ vighnasaṁplutāḥ

—इसलिए अब से तुम सब देवताओं के भी पूज्य बनोगे; फिर मनुष्यों की तो बात ही क्या, जो नित्य विघ्नों से घिरे रहते हैं।

श्लोक 11 (skanda.6.214.11)

ये त्वां संपूजयिष्यंति कार्यारंभेषु सर्वतः कार्यसिद्धिर्न संदेहस्तेषां भूयाद्गिरा मम

ye tvāṁ saṁpūjayiṣyaṁti kāryāraṁbheṣu sarvataḥ kāryasiddhirna saṁdehasteṣāṁ bhūyādgirā mama

जो कोई भी अपने किसी कार्य के आरंभ में सब प्रकार से तुम्हारी पूजा करेगा, मेरे वचन से निःसंदेह उसे कार्यसिद्धि प्राप्त हो।

श्लोक 12 (skanda.6.214.12)

एवमुक्त्वा सहस्राक्षो विससर्जाथ तं तदा संमान्य बहुमानेन गौरीशंकरपार्श्वतः

evamuktvā sahasrākṣo visasarjātha taṁ tadā saṁmānya bahumānena gaurīśaṁkarapārśvataḥ

ऐसा कहकर सहस्राक्ष इन्द्र ने उन्हें अत्यंत सम्मानपूर्वक विदा किया, और वे गौरी-शंकर के पास चले गए।

श्लोक 13 (skanda.6.214.13)

अयमर्थः पुरा पृष्टो रोहिताश्वेन धीमता सर्वविप्रविनाशार्थं मार्कंडेयं महामुनिम्

ayamarthaḥ purā pṛṣṭo rohitāśvena dhīmatā sarvavipravināśārthaṁ mārkaṁḍeyaṁ mahāmunim

यही प्रश्न पूर्वकाल में बुद्धिमान राजा रोहिताश्व ने ब्राह्मणों के सर्वनाश से बचने के लिए महामुनि मार्कंडेय से पूछा था।

श्लोक 14 (skanda.6.214.14)

तमेवार्थं महाभागाः कथयिष्ये यथार्थतः तच्छृणुध्वं पुरावृत्तं सर्वं सर्वे समाहिताः

tamevārthaṁ mahābhāgāḥ kathayiṣye yathārthataḥ tacchṛṇudhvaṁ purāvṛttaṁ sarvaṁ sarve samāhitāḥ

हे महाभागो, वही कथा मैं तुम्हें यथार्थ रूप में कहता हूँ; उस समस्त पुरावृत्तांत को तुम सब सावधान होकर सुनो।

श्लोक 15 (skanda.6.214.15)

रोहिताश्व उवाच भगवन्नत्र ये मर्त्याः सर्वे विघ्नसमन्विताः शुभकृत्येषु सर्वेषु जायंते शुचयोऽपि च

rohitāśva uvāca bhagavannatra ye martyāḥ sarve vighnasamanvitāḥ śubhakṛtyeṣu sarveṣu jāyaṁte śucayo'pi ca

रोहिताश्व ने कहा — हे भगवन्, यहाँ जो मनुष्य पवित्र होते हुए भी सभी शुभ कार्यों में विघ्नों से घिर जाते हैं—

श्लोक 16 (skanda.6.214.16)

प्रारब्धेषु च कार्येषु धर्मजेषु विशेषतः तानि विघ्नानि जायन्ते यैस्तत्कार्यं न सिध्यति

prārabdheṣu ca kāryeṣu dharmajeṣu viśeṣataḥ tāni vighnāni jāyante yaistatkāryaṁ na sidhyati

—विशेषतः धर्म से उत्पन्न कार्यों के आरंभ होने पर ही ऐसे विघ्न उत्पन्न हो जाते हैं, जिनसे वह कार्य सिद्ध नहीं होता।

श्लोक 17 (skanda.6.214.17)

तस्माद्विघ्नविनाशाय किंचिन्मे व्रतमादिश व्रतं वा नियमो वाऽथ तपो वा दानमेव च

tasmādvighnavināśāya kiṁcinme vratamādiśa vrataṁ vā niyamo vā'tha tapo vā dānameva ca

इसलिए विघ्नों के नाश के लिए मुझे कोई व्रत बताइए — कोई व्रत, या नियम, या तप, या दान।

श्लोक 18 (skanda.6.214.18)

सकृच्चीर्णेन येनात्र यावज्जीवति मानवः तावन्न जायते विघ्नमाजन्ममरणांतिकम्

sakṛccīrṇena yenātra yāvajjīvati mānavaḥ tāvanna jāyate vighnamājanmamaraṇāṁtikam

जिसके एक बार आचरण मात्र से मनुष्य जीवनभर, जन्म से मृत्यु तक, किसी विघ्न को प्राप्त न हो।

श्लोक 19 (skanda.6.214.19)

मार्कण्डेय उवाच अत्र ते कीर्तयिष्यामि सर्वविघ्नविनाशनम् व्रतं सर्वगुणोपेतं सर्वपापप्रणाशनम् विश्वामित्रेण सञ्चीर्णं यत्पुरा भावितात्मना

mārkaṇḍeya uvāca atra te kīrtayiṣyāmi sarvavighnavināśanam vrataṁ sarvaguṇopetaṁ sarvapāpapraṇāśanam viśvāmitreṇa sañcīrṇaṁ yatpurā bhāvitātmanā

मार्कंडेय ने कहा — मैं तुम्हें वह सर्वविघ्ननाशक, सर्वगुणसंपन्न, सर्वपापनाशक व्रत बताता हूँ, जिसका आचरण पूर्वकाल में भावितात्मा विश्वामित्र ने किया था।

श्लोक 20 (skanda.6.214.20)

विश्वामित्र इति ख्यातो गाधिपुत्रः प्रतापवान् वसिष्ठेन समं तस्य वैरमासीन्महात्मनः

viśvāmitra iti khyāto gādhiputraḥ pratāpavān vasiṣṭhena samaṁ tasya vairamāsīnmahātmanaḥ

गाधि के पुत्र, प्रतापी विश्वामित्र नाम से विख्यात उस महात्मा का वसिष्ठ जी के साथ वैर था।

श्लोक 21 (skanda.6.214.21)

ब्राह्मण्यार्थे न सम्प्रोक्तः कथंचित्स महातपाः ब्राह्मणस्त्वं वसिष्ठेन ततो वैरमजायत

brāhmaṇyārthe na samproktaḥ kathaṁcitsa mahātapāḥ brāhmaṇastvaṁ vasiṣṭhena tato vairamajāyata

उस महान तपस्वी को वसिष्ठ जी ने कभी भी 'तुम ब्राह्मण हो' नहीं कहा, इसी से उनके बीच वैर उत्पन्न हुआ था।

श्लोक 22 (skanda.6.214.22)

रोहिताश्व उवाच कस्मान्न प्रोक्तवान्विप्रो वसिष्ठस्तु कथंचन ब्राह्मणः स परं प्रोक्तो ब्रह्मादिभिरपि स्वयम्

rohitāśva uvāca kasmānna proktavānvipro vasiṣṭhastu kathaṁcana brāhmaṇaḥ sa paraṁ prokto brahmādibhirapi svayam

रोहिताश्व ने कहा — विप्र वसिष्ठ ने किसी भी प्रकार उन्हें ब्राह्मण क्यों नहीं कहा, जबकि वे स्वयं ब्रह्मा आदि द्वारा भी सर्वश्रेष्ठ ब्राह्मण कहे गए थे?

श्लोक 23 (skanda.6.214.23)

मार्कण्डेय उवाच क्षत्रियश्च स्थितः पूर्वं विश्वामित्रो महीपतिः मृगयासु परिभ्रांतो वसिष्ठस्य तदाऽऽश्रमम् प्रविष्टः क्षुत्पिपासार्त्तः स तेनाथ प्रपूजितः

mārkaṇḍeya uvāca kṣatriyaśca sthitaḥ pūrvaṁ viśvāmitro mahīpatiḥ mṛgayāsu paribhrāṁto vasiṣṭhasya tadā''śramam praviṣṭaḥ kṣutpipāsārttaḥ sa tenātha prapūjitaḥ

मार्कंडेय ने कहा — पूर्वकाल में विश्वामित्र एक क्षत्रिय राजा थे; शिकार में भटकते हुए, भूख-प्यास से व्याकुल होकर वे वसिष्ठ जी के आश्रम में प्रविष्ट हुए, जहाँ वसिष्ठ जी ने उनका आदरपूर्वक सत्कार किया।

श्लोक 24 (skanda.6.214.24)

तस्यासीन्नन्दिनीनाम धेनुः कामदुघा सदा सा सूते वाञ्छितं सद्यो यद्वसिष्ठोऽभिवाञ्छति

tasyāsīnnandinīnāma dhenuḥ kāmadughā sadā sā sūte vāñchitaṁ sadyo yadvasiṣṭho'bhivāñchati

उन वसिष्ठ के पास नंदिनी नामक एक कामधेनु गाय थी, जो वसिष्ठ की जो भी इच्छा हो, उसे तत्काल दे देती थी।

श्लोक 25 (skanda.6.214.25)

तत्प्रभावात्स भूपालः सभृत्यबलवाहनः तेन तृप्तिपरा नीतो मिष्टान्नैर्विविधैस्ततः

tatprabhāvātsa bhūpālaḥ sabhṛtyabalavāhanaḥ tena tṛptiparā nīto miṣṭānnairvividhaistataḥ

उसी के प्रभाव से वसिष्ठ जी ने उस राजा को अपने सेवकों, सेना और वाहनों सहित नाना प्रकार के मिष्टान्नों से पूर्ण तृप्त कर दिया।

श्लोक 26 (skanda.6.214.26)

पार्थिवोऽयमिति ज्ञात्वा ह्यर्घ्याद्यैर्भोजनैः स च सोऽपि दृष्ट्वा प्रभावं तं सर्वं धेनोश्च संभवम् प्रार्थयामास तां मूल्यैर्गजवाजिसमुद्भवैः

pārthivo'yamiti jñātvā hyarghyādyairbhojanaiḥ sa ca so'pi dṛṣṭvā prabhāvaṁ taṁ sarvaṁ dhenośca saṁbhavam prārthayāmāsa tāṁ mūlyairgajavājisamudbhavaiḥ

उन्हें राजा जानकर वसिष्ठ जी ने अर्घ्य आदि तथा भोजन से उनका सत्कार किया; राजा ने भी उस गाय का सम्पूर्ण प्रभाव देखकर हाथी-घोड़ों के मूल्य देकर उसे माँगा।

श्लोक 27 (skanda.6.214.27)

न ददौ स तदा विप्रः साम्ना दानेन वा पुनः भेदेन च ततो दण्डं योजयामास वै नृपः

na dadau sa tadā vipraḥ sāmnā dānena vā punaḥ bhedena ca tato daṇḍaṁ yojayāmāsa vai nṛpaḥ

उस विप्र ने न तो सामनीति से और न ही दान से उसे दिया; तब उस राजा ने भेदनीति के बाद दण्डनीति का सहारा लिया।

श्लोक 28 (skanda.6.214.28)

कालयामास तां धेनुं ततः कोपात्स पार्थिवः

kālayāmāsa tāṁ dhenuṁ tataḥ kopātsa pārthivaḥ

तब क्रोधवश उस राजा ने उस गाय को बलपूर्वक हाँक कर ले जाना आरंभ कर दिया।

श्लोक 29 (skanda.6.214.29)

साऽब्रवीन्नीयमानाऽथ वसिष्ठं किं त्वया विभो दत्ताहमस्य नृपतेर्यन्मां नयति यत्नतः

sā'bravīnnīyamānā'tha vasiṣṭhaṁ kiṁ tvayā vibho dattāhamasya nṛpateryanmāṁ nayati yatnataḥ

इस प्रकार ले जाई जाती हुई उसने वसिष्ठ जी से कहा — हे प्रभो, क्या आपने मुझे इस राजा को दे दिया है, जो मुझे इस प्रकार बलपूर्वक ले जा रहा है?

श्लोक 30 (skanda.6.214.30)

वसिष्ठ उवाच न मया त्वं महाभागे दत्ता चास्य महीपतेः बलान्नयति यद्येष तस्माद्युक्तं समाचर

vasiṣṭha uvāca na mayā tvaṁ mahābhāge dattā cāsya mahīpateḥ balānnayati yadyeṣa tasmādyuktaṁ samācara

वसिष्ठ ने कहा — हे महाभागे, मैंने तुम्हें इस राजा को नहीं दिया; यदि यह तुम्हें बलपूर्वक ले जा रहा है, तो जो उचित हो वह करो।

श्लोक 31 (skanda.6.214.31)

तच्छ्रुत्वा कोपसंयुक्ता नन्दिनी धेनुरुत्तमा जृंभां चकार तत्सैन्यं समुद्दिश्य नृपोद्भवम्

tacchrutvā kopasaṁyuktā nandinī dhenuruttamā jṛṁbhāṁ cakāra tatsainyaṁ samuddiśya nṛpodbhavam

यह सुनकर क्रोध से भरी हुई उस उत्तम गाय नंदिनी ने उस राजा की सेना की ओर लक्ष्य करके एक जृंभा (जँभाई/गर्जना) की।

श्लोक 32 (skanda.6.214.32)

धूमावर्तिस्ततो जाता तस्या वक्त्रात्ततः परम् ततो ज्वाला महारौद्रास्ततो योधाः सहस्रशः

dhūmāvartistato jātā tasyā vaktrāttataḥ param tato jvālā mahāraudrāstato yodhāḥ sahasraśaḥ

उसके मुख से पहले धुएँ की एक भँवर उत्पन्न हुई, फिर उससे अत्यंत भयंकर ज्वालाएँ, फिर उनसे सहस्रों योद्धा।

श्लोक 33 (skanda.6.214.33)

नानाशस्त्रधरा रौद्रा यमदूता यथा च ते पुलिन्दा बर्बराभीराः किराता यवनाः शकाः

nānāśastradharā raudrā yamadūtā yathā ca te pulindā barbarābhīrāḥ kirātā yavanāḥ śakāḥ

वे नाना शस्त्र धारण किए हुए, यमदूतों के समान भयंकर, पुलिन्द, बर्बर, आभीर, किरात, यवन और शक जातियों के योद्धा थे।

श्लोक 34 (skanda.6.214.34)

ते प्रोचुस्तां वदास्माकं कस्मात्सृष्टा वयं शुभे

te procustāṁ vadāsmākaṁ kasmātsṛṣṭā vayaṁ śubhe

उन्होंने उस गाय से कहा — हे शुभे, बताओ, किस प्रयोजन के लिए हम उत्पन्न किए गए हैं?

श्लोक 35 (skanda.6.214.35)

नन्दिन्युवाच एते मां ये बलात्पापा नयंति नृपसेवकाः तान्निघ्नन्तु समादेशान्नान्यद्वांछामि किंचन

nandinyuvāca ete māṁ ye balātpāpā nayaṁti nṛpasevakāḥ tānnighnantu samādeśānnānyadvāṁchāmi kiṁcana

नंदिनी ने कहा — यह राजा के जो पापी सेवक मुझे बलपूर्वक ले जा रहे हैं, उन्हें मेरे आदेश से मार डालो; इसके अतिरिक्त मैं और कुछ नहीं चाहती।

श्लोक 36 (skanda.6.214.36)

ततस्तैस्तस्य तत्सैन्यं विश्वामित्रस्य सूदितम् युध्यमानं महाराज दशरात्रेण संयुगे

tatastaistasya tatsainyaṁ viśvāmitrasya sūditam yudhyamānaṁ mahārāja daśarātreṇa saṁyuge

तब उन योद्धाओं ने विश्वामित्र की उस सेना को, दस रात्रि तक चले युद्ध में लड़ते हुए भी, पूर्णतः नष्ट कर डाला।

श्लोक 37 (skanda.6.214.37)

विश्वामित्रोऽपि तद्दृष्ट्वा ब्राह्म्यं बलमनुत्तमम् प्रतिज्ञामकरोत्तत्र तारेण सुस्वरेण च

viśvāmitro'pi taddṛṣṭvā brāhmyaṁ balamanuttamam pratijñāmakarottatra tāreṇa susvareṇa ca

विश्वामित्र भी उस ब्राह्मण-बल की अनुपम शक्ति देखकर वहाँ ऊँचे और स्पष्ट स्वर में यह प्रतिज्ञा करने लगे।

श्लोक 38 (skanda.6.214.38)

अथाहं संभविष्यामि ब्राह्मणो नात्र संशयः ममापि जायते येन प्रभावश्चेदृशोऽद्भुतः

athāhaṁ saṁbhaviṣyāmi brāhmaṇo nātra saṁśayaḥ mamāpi jāyate yena prabhāvaścedṛśo'dbhutaḥ

उन्होंने कहा — अब मैं निःसंदेह ब्राह्मण बनकर रहूँगा, जिससे मुझमें भी ऐसा ही अद्भुत प्रभाव उत्पन्न हो।

श्लोक 39 (skanda.6.214.39)

तस्मात्तपः करिष्यामि यदसाध्यं सुरैरपि स्वपुत्रं स्वे पदे धृत्वा ततश्चक्रे तपो महत्

tasmāttapaḥ kariṣyāmi yadasādhyaṁ surairapi svaputraṁ sve pade dhṛtvā tataścakre tapo mahat

इसलिए मैं ऐसा तप करूँगा जो देवताओं के लिए भी असाध्य है; फिर अपने पुत्र को अपने पद पर बिठाकर उन्होंने महान तप आरंभ किया।

श्लोक 40 (skanda.6.214.40)

ब्राह्मण्यार्थं महारौद्रं सुमहद्दुष्करं तपः ब्राह्मण्यं तेन नैवाप्तं वैलक्ष्यं परमं गतः

brāhmaṇyārthaṁ mahāraudraṁ sumahadduṣkaraṁ tapaḥ brāhmaṇyaṁ tena naivāptaṁ vailakṣyaṁ paramaṁ gataḥ

ब्राह्मणत्व की प्राप्ति के लिए अत्यंत भयंकर और दुष्कर तप करने पर भी उन्हें ब्राह्मणत्व प्राप्त न हुआ; इससे वे परम विषाद को प्राप्त हुए।

श्लोक 41 (skanda.6.214.41)

ततः कैलासमासाद्य देवदेवं महेश्वरम् सम्यगाराधयामास गौरीयुक्तं महेश्वरम्

tataḥ kailāsamāsādya devadevaṁ maheśvaram samyagārādhayāmāsa gaurīyuktaṁ maheśvaram

तब कैलास पर्वत पर जाकर उन्होंने देवदेव, गौरीयुक्त महेश्वर की भलीभाँति आराधना की।

श्लोक 42 (skanda.6.214.42)

अहं तपः करिष्यामि ब्राह्मण्यस्य कृते प्रभो त्वदीये पर्वतश्रेष्ठे कैलासे शरणं गतः

ahaṁ tapaḥ kariṣyāmi brāhmaṇyasya kṛte prabho tvadīye parvataśreṣṭhe kailāse śaraṇaṁ gataḥ

उन्होंने कहा — हे प्रभु, ब्राह्मणत्व की प्राप्ति के लिए मैं आपके इस श्रेष्ठ कैलास पर्वत की शरण में आकर तप करूँगा।

श्लोक 43 (skanda.6.214.43)

तस्माद्विघ्नस्य मे रक्षां देवदेवः प्रयच्छतु यथा नो नाशमायाति तपः सर्वं कृतं महत्

tasmādvighnasya me rakṣāṁ devadevaḥ prayacchatu yathā no nāśamāyāti tapaḥ sarvaṁ kṛtaṁ mahat

इसलिए हे देवदेव, मुझे विघ्नों से बचाइए, जिससे मेरा यह सारा किया हुआ महान तप नष्ट न हो जाए।

श्लोक 44 (skanda.6.214.44)

श्रीभगवानुवाच शुद्ध्यर्थं चैव यत्कार्यं कार्येस्मिन्नृपसत्तम विनायकसमुद्भूतां तत्त्वं पूजां समाचर

śrībhagavānuvāca śuddhyarthaṁ caiva yatkāryaṁ kāryesminnṛpasattama vināyakasamudbhūtāṁ tattvaṁ pūjāṁ samācara

भगवान ने कहा — हे नृपसत्तम, इस कार्य की सिद्धि और शुद्धि के लिए तुम्हें जो करना चाहिए, वह है विनायक की पूजा — उसका आचरण करो।

श्लोक 45 (skanda.6.214.45)

येन ते जायते सिद्धिः सम्यग्ब्राह्मण्यसंभवा

yena te jāyate siddhiḥ samyagbrāhmaṇyasaṁbhavā

इससे तुम्हें ब्राह्मणत्व की प्राप्ति रूपी सिद्धि पूर्णतः प्राप्त होगी।

श्लोक 46 (skanda.6.214.46)

विश्वामित्र उवाच तद्वदस्व सुरश्रेष्ठ तथा तस्य करोम्यहम् पूर्वं पूजां गणेशस्य सर्वविघ्नप्रशान्तये

viśvāmitra uvāca tadvadasva suraśreṣṭha tathā tasya karomyaham pūrvaṁ pūjāṁ gaṇeśasya sarvavighnapraśāntaye

विश्वामित्र ने कहा — हे देवश्रेष्ठ, वह विधि मुझे बताइए, वैसे ही मैं सब विघ्नों की शांति के लिए पहले गणेश जी की पूजा करूँगा।

श्लोक 47 (skanda.6.214.47)

श्रीभगवानुवाच एष गौर्या पुरा कृत्वा निजांगोद्वर्तनं कृतः निर्मलेन कृतः पश्चान्नराकारश्चतुर्भुजः

śrībhagavānuvāca eṣa gauryā purā kṛtvā nijāṁgodvartanaṁ kṛtaḥ nirmalena kṛtaḥ paścānnarākāraścaturbhujaḥ

भगवान ने कहा — इसे पहले गौरी ने अपने शरीर के उबटन से बनाया, फिर उस निर्मल पदार्थ से इसे मनुष्याकार और चतुर्भुज रूप दिया गया।

श्लोक 48 (skanda.6.214.48)

क्रीडार्थं मम पुत्रोऽयं बालभावः प्रकल्पितः गजवक्त्रो महाकायो लंबोदरलघूरुकः

krīḍārthaṁ mama putro'yaṁ bālabhāvaḥ prakalpitaḥ gajavaktro mahākāyo laṁbodaralaghūrukaḥ

क्रीड़ा के लिए इसे मेरे पुत्र के रूप में बालरूप में रचा गया — गजमुख, विशालकाय, लंबोदर और छोटी जाँघों वाला।

श्लोक 49 (skanda.6.214.49)

ततोऽहमनया प्रोक्तः सजीवः क्रियतामयम् पुत्रको मे यथा भावी लोके पूज्यतमो विभो

tato'hamanayā proktaḥ sajīvaḥ kriyatāmayam putrako me yathā bhāvī loke pūjyatamo vibho

तब उसने मुझसे कहा — इसे सजीव कर दीजिए, जिससे यह मेरा पुत्र बनकर संसार में परम पूज्य हो, हे विभो।

श्लोक 50 (skanda.6.214.50)

ततो मयापि संस्पृष्टः सृष्टिसूक्तेन पार्थिव जीवसूक्तेन सम्यक्स प्राणवान्समजायत

tato mayāpi saṁspṛṣṭaḥ sṛṣṭisūktena pārthiva jīvasūktena samyaksa prāṇavānsamajāyata

हे राजन्, तब मैंने भी सृष्टिसूक्त से उसका स्पर्श किया, और जीवसूक्त के प्रभाव से वह भलीभाँति प्राणवान हो गया।

श्लोक 51 (skanda.6.214.51)

ततो मया प्रहृष्टेन प्रोक्ता देवी हिमाद्रिजा चतुर्थीदिवसे प्राप्ते मयाऽद्यायं विनिर्मितः

tato mayā prahṛṣṭena proktā devī himādrijā caturthīdivase prāpte mayā'dyāyaṁ vinirmitaḥ

तब मैंने प्रसन्न होकर हिमालय-पुत्री देवी से कहा — चतुर्थी के दिन आज ही मैंने इसे इस प्रकार जीवित किया है।

श्लोक 52 (skanda.6.214.52)

पुत्रस्तव महाभागे जीवसूक्तप्रभावतः एष सर्वागणानां च मदीयानां सुरेश्वरि भविष्यति सदाऽध्यक्षस्तस्माच्च गणनायकः

putrastava mahābhāge jīvasūktaprabhāvataḥ eṣa sarvāgaṇānāṁ ca madīyānāṁ sureśvari bhaviṣyati sadā'dhyakṣastasmācca gaṇanāyakaḥ

हे महाभागे, हे सुरेश्वरि, जीवसूक्त के प्रभाव से उत्पन्न यह तुम्हारा पुत्र मेरे सब गणों का सदा अध्यक्ष बनेगा, इसीलिए इसे गणनायक कहा जाएगा।

श्लोक 53 (skanda.6.214.53)

पठ्यमानेन यश्चैनं जीवसूक्तेन सुन्दरि पूजयिष्यति सद्भक्त्या चतुर्थीदिवसे शुभे

paṭhyamānena yaścainaṁ jīvasūktena sundari pūjayiṣyati sadbhaktyā caturthīdivase śubhe

हे सुंदरि, जो कोई भी जीवसूक्त का पाठ करते हुए, शुभ चतुर्थी के दिन इसकी सद्भक्तिपूर्वक पूजा करेगा—

श्लोक 54 (skanda.6.214.54)

तस्य सर्वेषु कृत्येषु सर्वविघ्नानि कृत्स्नशः प्रयास्यंति क्षयं देवि तमः सूर्योदये यथा

tasya sarveṣu kṛtyeṣu sarvavighnāni kṛtsnaśaḥ prayāsyaṁti kṣayaṁ devi tamaḥ sūryodaye yathā

—हे देवि, उसके सभी कार्यों में सब विघ्न पूर्णतः उसी प्रकार नष्ट हो जाएँगे जैसे सूर्योदय होते ही अंधकार नष्ट हो जाता है।

श्लोक 55 (skanda.6.214.55)

नमो लंबोदरायेति नमो गणविभो तथा कुठारधारिणे नित्यं तथा वाक्संगताय च

namo laṁbodarāyeti namo gaṇavibho tathā kuṭhāradhāriṇe nityaṁ tathā vāksaṁgatāya ca

'लंबोदर को नमस्कार, हे गणविभो को नमस्कार, कुठारधारी को सदा नमस्कार, तथा वाणी से युक्त को नमस्कार'—

श्लोक 56 (skanda.6.214.56)

नमो मोदकभक्षाय नमो दन्तैकधारिणे

namo modakabhakṣāya namo dantaikadhāriṇe

'मोदक खाने वाले को नमस्कार, एक ही दाँत धारण करने वाले को नमस्कार'—

श्लोक 57 (skanda.6.214.57)

एभिर्मन्त्रैः समभ्यर्च्य पश्चान्मोदकजंशुभम् नैवेद्यं च प्रदातव्यं ततश्चार्घ्यं निवेदयेत्

ebhirmantraiḥ samabhyarcya paścānmodakajaṁśubham naivedyaṁ ca pradātavyaṁ tataścārghyaṁ nivedayet

—इन मंत्रों से भलीभाँति पूजा कर, फिर मोदक से बना शुभ नैवेद्य अर्पित करना चाहिए, और उसके बाद अर्घ्य निवेदन करना चाहिए।

श्लोक 58 (skanda.6.214.58)

अहं कर्म करिष्यामि यत्किचिच्छंभुसंभवम् अविघ्नं तत्र कर्तव्यं सर्वदैव त्वया विभो

ahaṁ karma kariṣyāmi yatkicicchaṁbhusaṁbhavam avighnaṁ tatra kartavyaṁ sarvadaiva tvayā vibho

'हे विभो, शिव-संबंधी जो भी कार्य मैं करूँगा, उसमें आपको सदा ही विघ्नरहित करना चाहिए' — ऐसी प्रार्थना करनी चाहिए।

श्लोक 59 (skanda.6.214.59)

ततस्तु ब्राह्मणानां च भोजनं मोदकोद्भवम् यथाशक्त्या प्रदातव्यं वित्तशाठ्यं विवर्जयेत्

tatastu brāhmaṇānāṁ ca bhojanaṁ modakodbhavam yathāśaktyā pradātavyaṁ vittaśāṭhyaṁ vivarjayet

फिर ब्राह्मणों को मोदक से बना भोजन अपनी शक्ति के अनुसार देना चाहिए, और धन के प्रति कंजूसी नहीं करनी चाहिए।

श्लोक 60 (skanda.6.214.60)

एवमुक्तं मया पूर्वं स्वयमेव नृपोत्तम गणनाथं समुद्दिश्य गौर्याः पुरत एव च

evamuktaṁ mayā pūrvaṁ svayameva nṛpottama gaṇanāthaṁ samuddiśya gauryāḥ purata eva ca

हे नृपोत्तम, यह विधि मैंने ही पूर्वकाल में गणनाथ को लक्ष्य कर, गौरी के समक्ष स्वयं कही थी।

श्लोक 61 (skanda.6.214.61)

ततः प्रहृष्टा सा देवी वाक्यमेतदुवाच ह अद्यप्रभृति यः पुत्रं मदीयं गणनायकम्

tataḥ prahṛṣṭā sā devī vākyametaduvāca ha adyaprabhṛti yaḥ putraṁ madīyaṁ gaṇanāyakam

तब वह देवी प्रसन्न होकर यह वचन बोलीं — आज से जो कोई मेरे पुत्र गणनायक की—

श्लोक 62 (skanda.6.214.62)

अनेन विधिना सम्यक्चतुर्थ्यां पूजयिष्यति तस्य विघ्नानि सर्वाणि नाशं यास्यंत्यसंशयम्

anena vidhinā samyakcaturthyāṁ pūjayiṣyati tasya vighnāni sarvāṇi nāśaṁ yāsyaṁtyasaṁśayam

—इस विधि से चतुर्थी को भलीभाँति पूजा करेगा, उसके सब विघ्न निःसंदेह नष्ट हो जाएँगे।

श्लोक 63 (skanda.6.214.63)

स्मृत्वा वा पूजयित्वा वा यः कार्याणि करिष्यति भविष्यंति न संदेहस्ततोस्याविचलानि च

smṛtvā vā pūjayitvā vā yaḥ kāryāṇi kariṣyati bhaviṣyaṁti na saṁdehastatosyāvicalāni ca

जो कोई उसका स्मरण करके या उसकी पूजा करके अपने कार्य करेगा, वे कार्य निःसंदेह उसके लिए अटल हो जाएँगे।

श्लोक 64 (skanda.6.214.64)

न सन्देहस्ततोऽस्य श्रीरचलैव भविष्यति

na sandehastato'sya śrīracalaiva bhaviṣyati

इसमें कोई संदेह नहीं कि उसकी लक्ष्मी भी सदा अचल बनी रहेगी।

श्लोक 65 (skanda.6.214.65)

श्रीभगवानुवाच तस्मात्त्वं हि महाभाग चतुर्थ्यां सम्यगाचर विनायकोद्भवां पूजां येनाभीष्टेन युज्यसे

śrībhagavānuvāca tasmāttvaṁ hi mahābhāga caturthyāṁ samyagācara vināyakodbhavāṁ pūjāṁ yenābhīṣṭena yujyase

भगवान ने कहा — इसलिए हे महाभाग, चतुर्थी को विनायक की यह पूजा भलीभाँति करो, जिससे तुम्हारी अभीष्ट कामना पूर्ण हो।

श्लोक 66 (skanda.6.214.66)

मार्कण्डेय उवाच तस्य तद्वचनं श्रुत्वा विश्वामित्रो महीपतिः गणनाथसमुद्भूतां पूजां कृत्वा यथोचिताम्

mārkaṇḍeya uvāca tasya tadvacanaṁ śrutvā viśvāmitro mahīpatiḥ gaṇanāthasamudbhūtāṁ pūjāṁ kṛtvā yathocitām

मार्कंडेय ने कहा — उनका यह वचन सुनकर राजा विश्वामित्र ने गणनाथ-संबंधी वह पूजा यथोचित रीति से की।

श्लोक 67 (skanda.6.214.67)

तपश्चचार विपुलं सर्वविघ्नविवर्जितम् ब्राह्मण्यं च ततः प्राप्तं सर्वेषामपि दुर्लभम्

tapaścacāra vipulaṁ sarvavighnavivarjitam brāhmaṇyaṁ ca tataḥ prāptaṁ sarveṣāmapi durlabham

उन्होंने विपुल तप किया, जो सब विघ्नों से रहित था, और उससे उन्हें वह ब्राह्मणत्व प्राप्त हुआ जो सबके लिए दुर्लभ है।

श्लोक 68 (skanda.6.214.68)

तस्मात्त्वं हि महाभाग विनायकसमुद्भवाम् पूजां कुरु चतुर्थ्यां च संप्राप्तायां विशेषतः संप्राप्नोषि महाभोगान्हृदिस्थान्नात्र संशयः

tasmāttvaṁ hi mahābhāga vināyakasamudbhavām pūjāṁ kuru caturthyāṁ ca saṁprāptāyāṁ viśeṣataḥ saṁprāpnoṣi mahābhogānhṛdisthānnātra saṁśayaḥ

इसलिए हे महाभाग, तुम भी चतुर्थी आने पर विशेष रूप से विनायक की यह पूजा करो; निःसंदेह तुम अपने हृदय में स्थित महाभोगों को प्राप्त करोगे।

श्लोक 69 (skanda.6.214.69)

यो यं काममभिध्याय गणनाथं प्रपूजयेत् स तं सर्वमवाप्नोति महेश्वरवचो यथा

yo yaṁ kāmamabhidhyāya gaṇanāthaṁ prapūjayet sa taṁ sarvamavāpnoti maheśvaravaco yathā

जो कोई भी मन में कोई कामना रखकर गणनाथ की पूजा करता है, महेश्वर के वचन के अनुसार वह उस कामना को सम्पूर्ण रूप से प्राप्त करता है।

श्लोक 70 (skanda.6.214.70)

अपुत्रो लभते पुत्रं धनहीनो महद्धनम् शत्रूञ्जयति संग्रामे स्मृत्वा तं गणनायकम्

aputro labhate putraṁ dhanahīno mahaddhanam śatrūñjayati saṁgrāme smṛtvā taṁ gaṇanāyakam

पुत्रहीन पुत्र पाता है, धनहीन महाधन पाता है; उस गणनायक का स्मरण कर मनुष्य संग्राम में शत्रुओं पर विजय पाता है।

श्लोक 71 (skanda.6.214.71)

या नारी पतिना त्यक्ता दुर्भगा च विरूपिता सा सौभाग्यमवाप्नोति गणनाथस्य पूजया

yā nārī patinā tyaktā durbhagā ca virūpitā sā saubhāgyamavāpnoti gaṇanāthasya pūjayā

जो नारी पति द्वारा त्यागी गई हो, अभागिनी हो या कुरूप हो, वह गणनाथ की पूजा से सौभाग्य प्राप्त करती है।

श्लोक 72 (skanda.6.214.72)

य इदं पठते नित्यं शृणुयाद्वा समाहितः न विघ्नं जायते तस्य सर्वकृत्येषु सर्वदा

ya idaṁ paṭhate nityaṁ śṛṇuyādvā samāhitaḥ na vighnaṁ jāyate tasya sarvakṛtyeṣu sarvadā

जो कोई इसे नित्य पढ़ता है या समाहितचित्त होकर सुनता है, उसे कभी भी अपने किसी कार्य में विघ्न उत्पन्न नहीं होता।

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