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नागर खण्ड · अध्याय 215

श्राद्ध की आवश्यकता का प्रतिपादन

अध्याय 214अध्याय-सूचीअध्याय 216

श्लोक 1 (skanda.6.215.1)

ऋषय ऊचुः सांप्रतं वद नः सूत श्राद्धकल्पस्य यो विधिः विस्तरेण महाभाग यथा तच्चाक्षयं भवेत्

ṛṣaya ūcuḥ sāṁprataṁ vada naḥ sūta śrāddhakalpasya yo vidhiḥ vistareṇa mahābhāga yathā taccākṣayaṁ bhavet

ऋषियों ने कहा — हे सूत जी, हे महाभाग, अब हमें श्राद्धकल्प की जो विधि है वह विस्तार से बताइए, जिससे वह अक्षय फलदायी हो।

श्लोक 2 (skanda.6.215.2)

कस्मिन्काले प्रकर्तव्यं श्राद्धं पितृपरायणैः कीदृशैर्ब्राह्मणैस्तच्च तथा द्रव्यैर्महामते

kasminkāle prakartavyaṁ śrāddhaṁ pitṛparāyaṇaiḥ kīdṛśairbrāhmaṇaistacca tathā dravyairmahāmate

हे महामते, पितृभक्तों को श्राद्ध किस समय करना चाहिए, तथा कैसे ब्राह्मणों और किन द्रव्यों से करना चाहिए?

श्लोक 3 (skanda.6.215.3)

सूत उवाच एतदर्थं पुरा पृष्टो मार्कंडेयो महामुनिः रोहिताश्वेन विप्रेंद्रा हरिश्चन्द्रसुतेन सः

sūta uvāca etadarthaṁ purā pṛṣṭo mārkaṁḍeyo mahāmuniḥ rohitāśvena vipreṁdrā hariścandrasutena saḥ

सूत जी ने कहा — हे विप्रेन्द्रो, यही प्रश्न पूर्वकाल में हरिश्चंद्र-पुत्र रोहिताश्व ने महामुनि मार्कंडेय से पूछा था।

श्लोक 4 (skanda.6.215.4)

हरिश्चन्द्रे गते स्वर्गं रोहिताश्वे नृपे स्थिते तीर्थयात्राप्रसंगेन मार्कण्डो मुनिसत्तमः

hariścandre gate svargaṁ rohitāśve nṛpe sthite tīrthayātrāprasaṁgena mārkaṇḍo munisattamaḥ

हरिश्चंद्र के स्वर्ग चले जाने और रोहिताश्व के राजा बनने पर, मुनिश्रेष्ठ मार्कंडेय तीर्थयात्रा के प्रसंग में—

श्लोक 5 (skanda.6.215.5)

सरय्वाः संगमे पुण्ये स्नानार्थं समुपस्थितः तत्र स्नात्वा पितॄन्देवान्संतर्प्य विधिपूर्वकम्

sarayvāḥ saṁgame puṇye snānārthaṁ samupasthitaḥ tatra snātvā pitṝndevānsaṁtarpya vidhipūrvakam

—सरयू के पवित्र संगम पर स्नान के लिए पधारे; वहाँ स्नान कर, विधिपूर्वक पितरों और देवताओं का तर्पण कर—

श्लोक 6 (skanda.6.215.6)

प्रविष्टस्तां पुरीं रम्यामयोध्यां सत्यनामिकाम् रोहिताश्वोऽपि तं श्रुत्वा समायातं मुनीश्वरम् पदातिः प्रययौ तूर्णं दूरदेशं तु सम्मुखम्

praviṣṭastāṁ purīṁ ramyāmayodhyāṁ satyanāmikām rohitāśvo'pi taṁ śrutvā samāyātaṁ munīśvaram padātiḥ prayayau tūrṇaṁ dūradeśaṁ tu sammukham

—वे उस रमणीय नगरी अयोध्या में, जो अपने सत्य-नाम को सार्थक करती है, प्रविष्ट हुए। मुनीश्वर के आगमन की बात सुनकर रोहिताश्व भी पैदल ही दूर तक उनकी अगवानी के लिए तुरंत चल पड़े।

श्लोक 7 (skanda.6.215.7)

ततः प्रणम्य तं मूर्ध्ना कृतांजलिपुटः स्थितः प्रोवाच मधुरं वाक्यं विनयेन समन्वितः

tataḥ praṇamya taṁ mūrdhnā kṛtāṁjalipuṭaḥ sthitaḥ provāca madhuraṁ vākyaṁ vinayena samanvitaḥ

फिर सिर झुकाकर प्रणाम कर, हाथ जोड़े हुए खड़े होकर, विनम्रतापूर्वक उन्होंने मधुर वचन कहे।

श्लोक 8 (skanda.6.215.8)

स्वागतं ते मुनिश्रेष्ठ भूयः सुस्वागतं मुने धन्योऽहं कृतपुण्योऽहं संप्राप्तः परमां गतिम् यत्ते पादरजोभिर्मे मूर्द्धजा विमलीकृताः

svāgataṁ te muniśreṣṭha bhūyaḥ susvāgataṁ mune dhanyo'haṁ kṛtapuṇyo'haṁ saṁprāptaḥ paramāṁ gatim yatte pādarajobhirme mūrddhajā vimalīkṛtāḥ

उन्होंने कहा — हे मुनिश्रेष्ठ, आपका स्वागत है, बार-बार सुस्वागत है; मैं धन्य हूँ, पुण्यवान हूँ, परम गति को प्राप्त हो गया हूँ, क्योंकि आपके चरण-रज से मेरे केश पवित्र हो गए हैं।

श्लोक 9 (skanda.6.215.9)

एवमुक्त्वा गृहीत्वा तं स्वहस्तालंबनं तदा ययौ तत्र सभास्थानं बृहत्सिंहासनाश्रयम्

evamuktvā gṛhītvā taṁ svahastālaṁbanaṁ tadā yayau tatra sabhāsthānaṁ bṛhatsiṁhāsanāśrayam

ऐसा कहकर, अपने हाथ का सहारा देकर उन्हें लेकर, वे उस सभास्थान की ओर चले, जहाँ विशाल सिंहासन रखा था।

श्लोक 10 (skanda.6.215.10)

सिंहासने निवेश्याथ तं मुनिं पार्थिवोत्तमः उपविष्टो धरापृष्ठे कृतांजलिपुटः स्थितः

siṁhāsane niveśyātha taṁ muniṁ pārthivottamaḥ upaviṣṭo dharāpṛṣṭhe kṛtāṁjalipuṭaḥ sthitaḥ

उस श्रेष्ठ राजा ने उस मुनि को सिंहासन पर बिठाकर, स्वयं भूमि पर बैठकर हाथ जोड़े हुए बैठे रहे।

श्लोक 11 (skanda.6.215.11)

ततः प्रोवाच मधुरं विनयावनतः स्थितः निःस्पृहस्यापि विप्रेंद्र किं वाऽऽगमनकारणम्

tataḥ provāca madhuraṁ vinayāvanataḥ sthitaḥ niḥspṛhasyāpi vipreṁdra kiṁ vā''gamanakāraṇam

फिर विनम्रता से झुककर उन्होंने मधुरता से पूछा — हे विप्रेन्द्र, आप निःस्पृह होते हुए भी यहाँ किस प्रयोजन से पधारे हैं?

श्लोक 12 (skanda.6.215.12)

तद्ब्रवीहि यथातथ्यं करोमि तव सांप्रतम् अदेयमपि दास्यामि गृहायातस्य ते विभो

tadbravīhi yathātathyaṁ karomi tava sāṁpratam adeyamapi dāsyāmi gṛhāyātasya te vibho

उसे यथार्थ रूप में बताइए, मैं अभी उसे पूर्ण करूँगा; हे विभो, आप मेरे घर पधारे हैं, इसलिए जो अदेय भी हो, वह भी मैं दे दूँगा।

श्लोक 13 (skanda.6.215.13)

मार्कंडेय उवाच तीर्थयात्राप्रसंगेन वयमत्र समागताः सरय्वाः संगमे पुण्ये कल्ये यास्याम्यहे पुनः

mārkaṁḍeya uvāca tīrthayātrāprasaṁgena vayamatra samāgatāḥ sarayvāḥ saṁgame puṇye kalye yāsyāmyahe punaḥ

मार्कंडेय ने कहा — हम तो तीर्थयात्रा के प्रसंग में यहाँ आए हैं; कल हम पुनः सरयू के पवित्र संगम को चले जाएँगे।

श्लोक 14 (skanda.6.215.14)

निःस्पृहैरपि द्रष्टव्या धर्मवन्तो द्विजोत्तमाः ततः प्रोक्तं पुराणज्ञैर्ब्राह्मणैः शास्त्रदृष्टिभिः

niḥspṛhairapi draṣṭavyā dharmavanto dvijottamāḥ tataḥ proktaṁ purāṇajñairbrāhmaṇaiḥ śāstradṛṣṭibhiḥ

निःस्पृह पुरुषों को भी धर्मवान श्रेष्ठ ब्राह्मणों के दर्शन करने चाहिए; इसी कारण पुराणों के ज्ञाता और शास्त्रदृष्टि रखने वाले ब्राह्मणों ने कहा है।

श्लोक 15 (skanda.6.215.15)

धर्मवन्तं नृपं दृष्ट्वा लिंगं स्वायंभुवं तथा नदीं सागरगां चैव मुच्येत्पापाद्दिनोद्भवात्

dharmavantaṁ nṛpaṁ dṛṣṭvā liṁgaṁ svāyaṁbhuvaṁ tathā nadīṁ sāgaragāṁ caiva mucyetpāpāddinodbhavāt

कि धर्मात्मा राजा का, स्वयंभू शिवलिंग का, और सागर में मिलने वाली नदी का दर्शन करने से मनुष्य उस दिन के पापों से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 16 (skanda.6.215.16)

एवमुक्त्वा ततश्चक्रे पृच्छां स मुनिसत्तमः तं दृष्ट्वा नृपशार्दूलं पुरःस्थं विनयान्वितम्

evamuktvā tataścakre pṛcchāṁ sa munisattamaḥ taṁ dṛṣṭvā nṛpaśārdūlaṁ puraḥsthaṁ vinayānvitam

ऐसा कहकर उस मुनिश्रेष्ठ ने अपने सामने विनम्रतापूर्वक खड़े उस राजशार्दूल को देखकर उससे प्रश्न पूछा।

श्लोक 17 (skanda.6.215.17)

कच्चित्ते सफला वेदाः कच्चित्ते सफलं श्रुतम् कच्चित्ते सफला दाराः कच्चित्ते सफलं धनम्

kaccitte saphalā vedāḥ kaccitte saphalaṁ śrutam kaccitte saphalā dārāḥ kaccitte saphalaṁ dhanam

क्या तुम्हारे वेदाध्ययन सफल हुए हैं? क्या तुम्हारा श्रवण-अध्ययन सफल हुआ है? क्या तुम्हारी पत्नी सफल है? क्या तुम्हारा धन सफल है?

श्लोक 18 (skanda.6.215.18)

रोहिताश्व उवाच कथं स्युः सफला वेदाः कथं स्यात्सफलं श्रुतम् कथं स्युः सफला दाराः कथं स्यात्सफलं धनम्

rohitāśva uvāca kathaṁ syuḥ saphalā vedāḥ kathaṁ syātsaphalaṁ śrutam kathaṁ syuḥ saphalā dārāḥ kathaṁ syātsaphalaṁ dhanam

रोहिताश्व ने कहा — वेद कैसे सफल होते हैं, श्रवण-अध्ययन कैसे सफल होता है, पत्नी कैसे सफल होती है, धन कैसे सफल होता है?

श्लोक 19 (skanda.6.215.19)

मार्कंडेय उवाच अग्निहोत्रफला वेदाः शीलवृत्तफलं श्रुतम् रतिपुत्रफला दारा दत्तभुक्तफलं धनम्

mārkaṁḍeya uvāca agnihotraphalā vedāḥ śīlavṛttaphalaṁ śrutam ratiputraphalā dārā dattabhuktaphalaṁ dhanam

मार्कंडेय ने कहा — वेदों का फल अग्निहोत्र है, श्रवण का फल शीलाचरण है, पत्नी का फल रति और पुत्र है, और धन का फल दान देना और भोगना है।

श्लोक 20 (skanda.6.215.20)

एवं ज्ञात्वा महाराज नान्यथा कर्तुमर्हसि

evaṁ jñātvā mahārāja nānyathā kartumarhasi

हे महाराज, यह जानकर तुम्हें इससे भिन्न आचरण नहीं करना चाहिए।

श्लोक 21 (skanda.6.215.21)

चत्वार्येतानि कृत्यानि मयोक्तानि च तानि ते यथा तानि प्रकृत्यानि लोकद्वयमभीप्सता

catvāryetāni kṛtyāni mayoktāni ca tāni te yathā tāni prakṛtyāni lokadvayamabhīpsatā

मैंने तुम्हें ये चार कर्तव्य बता दिए; इस लोक और परलोक दोनों की कामना करने वाले को इन्हें ठीक से करना चाहिए।

श्लोक 22 (skanda.6.215.22)

एवमुक्त्वा ततश्चक्रे कथाश्चित्राश्च तत्पुरः राजर्षीणां पुराणानां देवर्षीणां विशेषतः

evamuktvā tataścakre kathāścitrāśca tatpuraḥ rājarṣīṇāṁ purāṇānāṁ devarṣīṇāṁ viśeṣataḥ

ऐसा कहकर उन्होंने उसके सामने प्राचीन राजर्षियों और विशेषतः देवर्षियों की अनेक विचित्र कथाएँ सुनाईं।

श्लोक 23 (skanda.6.215.23)

ततः कथावसाने च कस्मिंश्चिद्द्विजसत्तमाः पप्रच्छ तं मुनिश्रेष्ठं रोहिताश्वो महीपतिः

tataḥ kathāvasāne ca kasmiṁściddvijasattamāḥ papraccha taṁ muniśreṣṭhaṁ rohitāśvo mahīpatiḥ

हे द्विजसत्तमो, फिर एक कथा के अंत में राजा रोहिताश्व ने उस मुनिश्रेष्ठ से पूछा।

श्लोक 24 (skanda.6.215.24)

भगवञ्छ्रोतुमिच्छामि श्राद्धकल्पमहं यतः दृश्यंते बहवो भेदा द्विजानां श्राद्धकर्मणि

bhagavañchrotumicchāmi śrāddhakalpamahaṁ yataḥ dṛśyaṁte bahavo bhedā dvijānāṁ śrāddhakarmaṇi

उसने कहा — हे भगवन्, मैं श्राद्धकल्प सुनना चाहता हूँ, क्योंकि ब्राह्मणों के श्राद्धकर्म में अनेक भेद देखे जाते हैं।

श्लोक 25 (skanda.6.215.25)

मार्कंडेय उवाच सत्यमेतन्महाभाग यत्पृष्टोऽस्मि नृपोत्तम श्राद्धस्य बहवो भेदाः शाखाभेदैर्व्यवस्थिताः

mārkaṁḍeya uvāca satyametanmahābhāga yatpṛṣṭo'smi nṛpottama śrāddhasya bahavo bhedāḥ śākhābhedairvyavasthitāḥ

मार्कंडेय ने कहा — हे महाभाग, हे नृपोत्तम, आपने जो पूछा है वह सत्य है; श्राद्ध के अनेक भेद विभिन्न वेद-शाखाओं के भेद के अनुसार स्थित हैं।

श्लोक 26 (skanda.6.215.26)

तस्मात्ते निर्णयं वच्मि भर्तृयज्ञेन यत्पुरा आनर्त्ताधिपतेः प्रोक्तं सम्यक्छ्राद्धस्य लक्षणम्

tasmātte nirṇayaṁ vacmi bhartṛyajñena yatpurā ānarttādhipateḥ proktaṁ samyakchrāddhasya lakṣaṇam

इसलिए मैं तुम्हें वह निर्णय बताता हूँ जो पूर्वकाल में भर्तृयज्ञ ने आनर्त देश के राजा को श्राद्ध का सम्यक् लक्षण बताया था।

श्लोक 27 (skanda.6.215.27)

भर्तृयज्ञं सुखासीनं निजाश्रमपदे नृपः आनर्ताधिपतिर्गत्वा प्रणिपत्य ततोऽब्रवीत्

bhartṛyajñaṁ sukhāsīnaṁ nijāśramapade nṛpaḥ ānartādhipatirgatvā praṇipatya tato'bravīt

आनर्त के राजा ने अपने ही आश्रमपद में सुखपूर्वक बैठे उन भर्तृयज्ञ के पास जाकर, प्रणाम कर, यह कहा।

श्लोक 28 (skanda.6.215.28)

आनर्त उवाच सांप्रतं वद मे ब्रह्मञ्छ्राद्धकल्पं पित्रीप्सितम् येन मे तुष्टिमायांति पितरः श्राद्धतर्पिताः

ānarta uvāca sāṁprataṁ vada me brahmañchrāddhakalpaṁ pitrīpsitam yena me tuṣṭimāyāṁti pitaraḥ śrāddhatarpitāḥ

आनर्त ने कहा — हे ब्रह्मन्, अब मुझे वह श्राद्धकल्प बताइए जो पितरों को अभीष्ट हो, जिससे श्राद्ध से तृप्त हुए मेरे पितर संतुष्ट हों।

श्लोक 29 (skanda.6.215.29)

कः कालो विहितः श्राद्धे कानि द्रव्याणि मे वद श्राद्धार्हाणि तथान्यानि मेध्यानि द्विजसत्तम यानि योज्यानि वांछद्भिः पितृणां तृप्तिमुत्तमाम्

kaḥ kālo vihitaḥ śrāddhe kāni dravyāṇi me vada śrāddhārhāṇi tathānyāni medhyāni dvijasattama yāni yojyāni vāṁchadbhiḥ pitṛṇāṁ tṛptimuttamām

श्राद्ध के लिए कौन-सा काल विहित है, मुझे बताइए; तथा हे द्विजसत्तम, श्राद्ध के योग्य और पवित्र वे कौन-सी वस्तुएँ हैं जिन्हें पितरों की परम तृप्ति चाहने वालों को अर्पित करना चाहिए?

श्लोक 30 (skanda.6.215.30)

कीदृशा ब्राह्मणा ब्रह्मञ्छ्राद्धार्हाः परिकीर्तिताः कीदृशा वर्जनीयाश्च सर्वं मे विस्तराद्वद

kīdṛśā brāhmaṇā brahmañchrāddhārhāḥ parikīrtitāḥ kīdṛśā varjanīyāśca sarvaṁ me vistarādvada

हे ब्रह्मन्, कैसे ब्राह्मण श्राद्ध के योग्य कहे गए हैं, और कैसे त्याज्य हैं? यह सब मुझे विस्तार से बताइए।

श्लोक 31 (skanda.6.215.31)

भर्तृयज्ञ उवाच अहं ते कीर्तयिष्यामि श्राद्धकल्पमनुत्तमम् यं श्रुत्वाऽपि महाराज लभेच्छ्राद्धफलं नरः

bhartṛyajña uvāca ahaṁ te kīrtayiṣyāmi śrāddhakalpamanuttamam yaṁ śrutvā'pi mahārāja labhecchrāddhaphalaṁ naraḥ

भर्तृयज्ञ ने कहा — हे महाराज, मैं तुम्हें वह अनुपम श्राद्धकल्प बताता हूँ, जिसे सुनने मात्र से भी मनुष्य श्राद्ध का फल प्राप्त कर लेता है।

श्लोक 32 (skanda.6.215.32)

श्राद्धमिदुक्षयेऽवश्यं सदा कार्यं विपश्चिता यदि ज्येष्ठतमः सर्गः सन्तानं च तथा नृप

śrāddhamidukṣaye'vaśyaṁ sadā kāryaṁ vipaścitā yadi jyeṣṭhatamaḥ sargaḥ santānaṁ ca tathā nṛpa

हे राजन्, बुद्धिमान पुरुष को चन्द्रमा के क्षय-दिन (अमावस्या) पर सदा अवश्य श्राद्ध करना चाहिए, यदि उसकी संतान में वह ज्येष्ठतम भी हो।

श्लोक 33 (skanda.6.215.33)

शीतार्ता यद्वदिच्छंति वह्निं प्रावरणानि च पितरस्तद्वदिच्छंति क्षुत्सामाश्चन्द्रसंक्षयम्

śītārtā yadvadicchaṁti vahniṁ prāvaraṇāni ca pitarastadvadicchaṁti kṣutsāmāścandrasaṁkṣayam

जैसे शीत से पीड़ित लोग अग्नि और वस्त्रों की कामना करते हैं, वैसे ही भूख से क्षीण हुए पितर चन्द्रक्षय (अमावस्या) की कामना करते हैं।

श्लोक 34 (skanda.6.215.34)

दरिद्रोपहता यद्वद्धनं वांछंति मानवाः पितरस्तद्वदिच्छंति क्षुत्क्षामाश्चन्द्रसंक्षयम्

daridropahatā yadvaddhanaṁ vāṁchaṁti mānavāḥ pitarastadvadicchaṁti kṣutkṣāmāścandrasaṁkṣayam

जैसे दरिद्रता से पीड़ित मनुष्य धन की कामना करते हैं, वैसे ही भूख से कृश हुए पितर चन्द्रक्षय की कामना करते हैं।

श्लोक 35 (skanda.6.215.35)

यथा वृष्टिं प्रवांछन्ति कर्षुकाः सस्यवृद्धये तथात्मप्रीतये तेऽपि प्रवांछन्तींदुसंक्षयम्

yathā vṛṣṭiṁ pravāṁchanti karṣukāḥ sasyavṛddhaye tathātmaprītaye te'pi pravāṁchantīṁdusaṁkṣayam

जैसे किसान फसल की वृद्धि के लिए वर्षा की कामना करते हैं, वैसे ही वे भी अपनी तृप्ति के लिए चन्द्रक्षय की कामना करते हैं।

श्लोक 36 (skanda.6.215.36)

यथोषश्चक्रवाक्यश्च वांछन्ति रविदर्शनम् पितरस्तद्वदिच्छंति श्राद्धं दर्शसमुद्भवम्

yathoṣaścakravākyaśca vāṁchanti ravidarśanam pitarastadvadicchaṁti śrāddhaṁ darśasamudbhavam

जैसे प्रातःकाल में चकवी सूर्य के दर्शन की कामना करती है, वैसे ही पितर अमावस्या को होने वाले श्राद्ध की कामना करते हैं।

श्लोक 37 (skanda.6.215.37)

जलेनापि च यः श्राद्धं शाकेनापि करोति वा दर्शस्य पितरस्तृप्तिं यांति पापं प्रणश्यति

jalenāpi ca yaḥ śrāddhaṁ śākenāpi karoti vā darśasya pitarastṛptiṁ yāṁti pāpaṁ praṇaśyati

जो कोई अमावस्या को जल से या शाक से भी श्राद्ध करता है, उससे भी पितर तृप्ति को प्राप्त होते हैं और उसका पाप नष्ट हो जाता है।

श्लोक 38 (skanda.6.215.38)

अमावास्यादिने प्राप्ते गृहद्वारं समाश्रिता वायुभूताः प्रवांछन्ति श्राद्धं पितृगणा नृणाम् यावदस्तमयं भानोः क्षुत्पिपासासमाकुलाः

amāvāsyādine prāpte gṛhadvāraṁ samāśritā vāyubhūtāḥ pravāṁchanti śrāddhaṁ pitṛgaṇā nṛṇām yāvadastamayaṁ bhānoḥ kṣutpipāsāsamākulāḥ

अमावस्या के दिन आने पर, मनुष्यों के पितृगण घर के द्वार पर वायुरूप होकर आ बैठते हैं, और सूर्यास्त तक भूख-प्यास से व्याकुल होकर श्राद्ध की कामना करते रहते हैं।

श्लोक 39 (skanda.6.215.39)

ततश्चास्तं गते भानौ निराशा दुःखसंयुताः निःश्वस्य सुचिरं यांति गर्हयंति स्ववंशजम्

tataścāstaṁ gate bhānau nirāśā duḥkhasaṁyutāḥ niḥśvasya suciraṁ yāṁti garhayaṁti svavaṁśajam

फिर सूर्यास्त हो जाने पर, निराश और दुःखी होकर, बहुत देर तक निःश्वास लेते हुए, अपने वंशजों को धिक्कारते हुए वे चले जाते हैं।

श्लोक 40 (skanda.6.215.40)

आनर्त उवाच किमर्थं क्रियते श्राद्धममावास्यादिने द्विज विशेषेण ममाचक्ष्य विस्तरेण यथातथम्

ānarta uvāca kimarthaṁ kriyate śrāddhamamāvāsyādine dvija viśeṣeṇa mamācakṣya vistareṇa yathātatham

आनर्त ने कहा — हे द्विज, अमावस्या के दिन श्राद्ध क्यों किया जाता है? यह मुझे विशेष रूप से विस्तार से यथार्थतः बताइए।

श्लोक 41 (skanda.6.215.41)

मृताश्च पुरुषा विप्र स्वकर्मजनितां गतिम् गच्छन्ति ते कथं तस्य सुतस्याश्रयमाययुः

mṛtāśca puruṣā vipra svakarmajanitāṁ gatim gacchanti te kathaṁ tasya sutasyāśrayamāyayuḥ

हे विप्र, मृत मनुष्य अपने-अपने कर्मों से उत्पन्न गति को प्राप्त होते हैं; तो फिर वे अपने पुत्र के आश्रय (श्राद्ध) में कैसे आ पहुँचते हैं?

श्लोक 42 (skanda.6.215.42)

एष नः संशयो विप्र सुमहान्हृदि संस्थितः

eṣa naḥ saṁśayo vipra sumahānhṛdi saṁsthitaḥ

हे विप्र, यह हमारा एक अत्यंत बड़ा संशय है, जो हृदय में स्थित है।

श्लोक 43 (skanda.6.215.43)

भर्तृयज्ञ उवाच सत्यमेतन्महाभाग यत्त्वया व्याहृतं वचः स्वकर्मार्हां गतिं यांति मृताः सर्वत्र मानवाः

bhartṛyajña uvāca satyametanmahābhāga yattvayā vyāhṛtaṁ vacaḥ svakarmārhāṁ gatiṁ yāṁti mṛtāḥ sarvatra mānavāḥ

भर्तृयज्ञ ने कहा — हे महाभाग, तुमने जो कहा है वह सत्य है; मृत मनुष्य सर्वत्र अपने-अपने कर्मों के अनुरूप गति को प्राप्त होते हैं।

श्लोक 44 (skanda.6.215.44)

परं यथा समायांति वंशजस्याश्रयं प्रति तथा तेऽहं प्रवक्ष्यामि न तथा संशयो भवेत्

paraṁ yathā samāyāṁti vaṁśajasyāśrayaṁ prati tathā te'haṁ pravakṣyāmi na tathā saṁśayo bhavet

किंतु वे किस प्रकार अपने वंशज के आश्रय की ओर आते हैं, वह मैं तुम्हें बताता हूँ, जिससे तुम्हारा संशय दूर हो जाए।

श्लोक 45 (skanda.6.215.45)

मृता यांति तथा राजन्येऽत्र केचिन्महीतले ते जायंते न मर्त्येऽत्र यावद्वंशस्य संस्थितिः

mṛtā yāṁti tathā rājanye'tra kecinmahītale te jāyaṁte na martye'tra yāvadvaṁśasya saṁsthitiḥ

हे राजन्, इस पृथ्वी पर जो कोई मृत होकर उस गति को प्राप्त होते हैं, वे तब तक इस मृत्युलोक में पुनः जन्म नहीं लेते जब तक उनका वंश बना रहता है।

श्लोक 46 (skanda.6.215.46)

परं शुभात्मका ये च ते तिष्ठंति सुरालये पापात्मानो नरा ये च वैवस्वतनिवासिनः

paraṁ śubhātmakā ye ca te tiṣṭhaṁti surālaye pāpātmāno narā ye ca vaivasvatanivāsinaḥ

जो शुभात्मा होते हैं वे देवलोक में निवास करते हैं, और जो पापात्मा मनुष्य होते हैं वे वैवस्वत यम के निवास में रहते हैं।

श्लोक 47 (skanda.6.215.47)

अन्यदेहं समाश्रित्य भुंजानाः कर्मणः फलम् शुभं वा यदि वा पापं स्वयं विहितमात्मनः

anyadehaṁ samāśritya bhuṁjānāḥ karmaṇaḥ phalam śubhaṁ vā yadi vā pāpaṁ svayaṁ vihitamātmanaḥ

वे किसी अन्य देह का आश्रय लेकर, अपने ही द्वारा किए गए शुभ या अशुभ कर्म का फल भोगते रहते हैं।

श्लोक 48 (skanda.6.215.48)

यमलोके स्थितानां हि स्वर्गस्थानामपि क्षुधा पिपासा च तथा राजंस्तेषां संजायतेऽधिका

yamaloke sthitānāṁ hi svargasthānāmapi kṣudhā pipāsā ca tathā rājaṁsteṣāṁ saṁjāyate'dhikā

हे राजन्, यमलोक में स्थित लोगों को, तथा स्वर्ग में स्थित लोगों को भी, भूख और प्यास अत्यंत अधिक उत्पन्न होती है।

श्लोक 49 (skanda.6.215.49)

यावन्नरत्रयं राजन्मातृतः पितृतस्तथा तेषां च परतो ये च ते स्वकर्म शुभाशुभम् भुंजते क्षुत्पिपासा च न तेषां जायते क्वचित्

yāvannaratrayaṁ rājanmātṛtaḥ pitṛtastathā teṣāṁ ca parato ye ca te svakarma śubhāśubham bhuṁjate kṣutpipāsā ca na teṣāṁ jāyate kvacit

हे राजन्, माता की ओर से तीन पीढ़ियों तक और पिता की ओर से भी तीन पीढ़ियों तक, तथा उनसे आगे की जो पीढ़ियाँ हैं — वे अपने-अपने शुभ-अशुभ कर्मों का फल भोगते हैं, किंतु उन्हें भूख-प्यास कभी उत्पन्न नहीं होती।

श्लोक 50 (skanda.6.215.50)

तत्रापि पतनं तस्मात्स्थानाद्भवति भूमिप वंशोच्छेदान्पुनः सर्वे निपतंति महीतले त्रुटद्रज्जुनिबद्धं हि भांडं यद्वन्निराश्रयम्

tatrāpi patanaṁ tasmātsthānādbhavati bhūmipa vaṁśocchedānpunaḥ sarve nipataṁti mahītale truṭadrajjunibaddhaṁ hi bhāṁḍaṁ yadvannirāśrayam

हे भूमिप, वहाँ से भी उस स्थान से उनका पतन हो जाता है, और वंश के उच्छेद हो जाने पर वे सब पुनः पृथ्वीतल पर गिर पड़ते हैं, जैसे टूटती रस्सी से बंधा हुआ आश्रयहीन पात्र गिर जाता है।

श्लोक 51 (skanda.6.215.51)

एतस्मात्कारणाद्यत्नः सन्तानाय विचक्षणैः प्रकर्तव्यो मनुष्येंद्र वंशस्य स्थितये सदा

etasmātkāraṇādyatnaḥ santānāya vicakṣaṇaiḥ prakartavyo manuṣyeṁdra vaṁśasya sthitaye sadā

इसी कारण, हे मनुष्येन्द्र, बुद्धिमान पुरुषों को वंश की स्थिरता के लिए संतान प्राप्ति का प्रयत्न सदा करते रहना चाहिए।

श्लोक 52 (skanda.6.215.52)

अपि द्वादशधा राजन्नौरसादिसमुद्भवाः तेषामेकतमोऽप्यत्र न दैवाज्जायते सुतः

api dvādaśadhā rājannaurasādisamudbhavāḥ teṣāmekatamo'pyatra na daivājjāyate sutaḥ

हे राजन्, यद्यपि औरस आदि बारह प्रकार के पुत्र होते हैं, फिर भी दैवयोग से कभी उनमें से एक भी पुत्र नहीं मिल पाता।

श्लोक 53 (skanda.6.215.53)

पितॄणां गुप्तये तेन स्थाप्योऽश्वत्थः समाधिना पुत्रवत्परिपाल्यश्च निर्विशेषं नराधिप

pitṝṇāṁ guptaye tena sthāpyo'śvatthaḥ samādhinā putravatparipālyaśca nirviśeṣaṁ narādhipa

इसलिए हे नराधिप, पितरों की रक्षा के लिए एक पीपल का वृक्ष विधिपूर्वक लगाना चाहिए, और उसका पालन पुत्र के समान बिना किसी भेद के करना चाहिए।

श्लोक 54 (skanda.6.215.54)

यावत्संधारयेद्भूमिस्तमश्वत्थं नराधिप कृतोद्वाहं समं शम्या तावद्वंशोऽपि तिष्ठति

yāvatsaṁdhārayedbhūmistamaśvatthaṁ narādhipa kṛtodvāhaṁ samaṁ śamyā tāvadvaṁśo'pi tiṣṭhati

हे नराधिप, जब तक पृथ्वी उस पीपल को धारण करती है, जिसका विवाह-संस्कार शमी वृक्ष के साथ किया गया हो, तब तक उसका वंश भी बना रहता है।

श्लोक 55 (skanda.6.215.55)

अश्वत्थजनका मर्त्या निपत्य जगतीतले पापामुक्ताः समायांति योनिं श्रेष्ठां शुभान्विताः

aśvatthajanakā martyā nipatya jagatītale pāpāmuktāḥ samāyāṁti yoniṁ śreṣṭhāṁ śubhānvitāḥ

जो मनुष्य पीपल के रोपणकर्ता होते हैं, वे मृत्युलोक में गिरकर भी पाप से मुक्त होकर शुभ श्रेष्ठ योनि को प्राप्त होते हैं।

श्लोक 56 (skanda.6.215.56)

एतस्मात्कारणादन्नं नित्यं देयं तथोदकम् समुद्दिश्य पितॄन्राजन्यतस्ते तन्मयाः स्मृताः

etasmātkāraṇādannaṁ nityaṁ deyaṁ tathodakam samuddiśya pitṝnrājanyataste tanmayāḥ smṛtāḥ

इसी कारण, हे राजन्, पितरों के उद्देश्य से नित्य अन्न और जल देना चाहिए, क्योंकि पितर उन्हीं (अन्न-जल) के तन्मय माने गए हैं।

श्लोक 57 (skanda.6.215.57)

अदत्त्वा सलिलं सस्यं पितॄणां यो नराधिप स्वयमश्नाति वा तोयं पिवेत्स स्यात्पितृद्रुहः स्वर्गेऽपि च न ते तोयं लभंते नान्नमेव च

adattvā salilaṁ sasyaṁ pitṝṇāṁ yo narādhipa svayamaśnāti vā toyaṁ pivetsa syātpitṛdruhaḥ svarge'pi ca na te toyaṁ labhaṁte nānnameva ca

हे नराधिप, जो पितरों को जल और अन्न दिए बिना ही स्वयं भोजन करता है या जल पीता है, वह पितृद्रोही होता है; स्वर्ग में भी उन पितरों को न जल मिलता है और न अन्न।

श्लोक 58 (skanda.6.215.58)

न दत्तं वंशजैर्मर्त्यैश्चेद्व्यथां यांति दारुणाम् क्षुत्पिपासासमुद्भूतां तस्मात्संतर्पयेत्पितॄन्

na dattaṁ vaṁśajairmartyaiścedvyathāṁ yāṁti dāruṇām kṣutpipāsāsamudbhūtāṁ tasmātsaṁtarpayetpitṝn

यदि वंशजों द्वारा यह नहीं दिया जाता, तो वे भूख-प्यास से उत्पन्न भयंकर पीड़ा को प्राप्त होते हैं; इसलिए पितरों को अवश्य तर्पण देना चाहिए।

श्लोक 59 (skanda.6.215.59)

नित्यं शक्त्या नरो राजन्पयोऽन्नैश्च पृथग्विधैः तथान्यैर्वस्त्रनैवेद्यैः पुष्पगन्धानुलेपनैः

nityaṁ śaktyā naro rājanpayo'nnaiśca pṛthagvidhaiḥ tathānyairvastranaivedyaiḥ puṣpagandhānulepanaiḥ

हे राजन्, मनुष्य को नित्य अपनी शक्ति के अनुसार दूध, नाना प्रकार के अन्न, तथा वस्त्र, नैवेद्य, पुष्प, गंध और अनुलेपनों से—

श्लोक 60 (skanda.6.215.60)

पितृमेधादिभिः पुण्यैः श्राद्धैरुच्चावचैरपि तर्पितास्ते प्रयच्छंति कामानिष्टान्हृदि स्थितान् त्रिवर्गं च महाराज पितरः श्राद्धतर्पिताः

pitṛmedhādibhiḥ puṇyaiḥ śrāddhairuccāvacairapi tarpitāste prayacchaṁti kāmāniṣṭānhṛdi sthitān trivargaṁ ca mahārāja pitaraḥ śrāddhatarpitāḥ

—तथा पितृमेध आदि पुण्यकर्मों और छोटे-बड़े श्राद्धों से पितरों को तृप्त करना चाहिए। हे महाराज, इस प्रकार श्राद्ध से तृप्त हुए पितर हृदय में स्थित अभीष्ट कामनाओं और धर्म-अर्थ-काम रूपी त्रिवर्ग को प्रदान करते हैं।

श्लोक 61 (skanda.6.215.61)

तर्पयंति न ये पापाः स्वपितॄन्नित्यशो नृप पशवस्ते सदा ज्ञेया द्विपदाः शृंगवर्जिताः

tarpayaṁti na ye pāpāḥ svapitṝnnityaśo nṛpa paśavaste sadā jñeyā dvipadāḥ śṛṁgavarjitāḥ

हे राजन्, जो पापी मनुष्य नित्य अपने पितरों का तर्पण नहीं करते, उन्हें सदा सींगरहित दो पैरों वाले पशु ही समझना चाहिए।

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