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नागर खण्ड · अध्याय 216

श्राद्ध की उत्पत्ति

अध्याय 215अध्याय-सूचीअध्याय 217

श्लोक 1 (skanda.6.216.1)

आनर्त उवाच अन्येऽपि विविधाः कालाः सन्ति पुण्यतमा द्विज कस्माच्चेंदुक्षये श्राद्धं विशेषात्समुदाहृतम्

ānarta uvāca anye'pi vividhāḥ kālāḥ santi puṇyatamā dvija kasmācceṁdukṣaye śrāddhaṁ viśeṣātsamudāhṛtam

आनर्त ने कहा — हे द्विज, अन्य भी अनेक प्रकार के पुण्यतम काल हैं; फिर चन्द्रक्षय (अमावस्या) में ही श्राद्ध का विशेष रूप से विधान क्यों किया गया है?

श्लोक 2 (skanda.6.216.2)

एतन्मे सर्वमाचक्ष्व विस्तरेण महामुने

etanme sarvamācakṣva vistareṇa mahāmune

हे महामुने, यह सब मुझे विस्तार से बताइए।

श्लोक 3 (skanda.6.216.3)

भर्तृयज्ञ उवाच सत्यमेतन्महाराज श्राद्धार्हाः संति भूरिशः कालाः पितृगणानां च तृप्तिदास्तुष्टिदाश्च ये

bhartṛyajña uvāca satyametanmahārāja śrāddhārhāḥ saṁti bhūriśaḥ kālāḥ pitṛgaṇānāṁ ca tṛptidāstuṣṭidāśca ye

भर्तृयज्ञ ने कहा — हे महाराज, यह सत्य है कि पितरों को तृप्ति और संतोष देने वाले, श्राद्ध के योग्य अनेक काल हैं।

श्लोक 4 (skanda.6.216.4)

मन्वाद्या वा युगाद्याश्च तेषां संक्रांतयोऽपराः व्यतीपातो गजच्छाया ग्रहणं सोमसूर्ययोः

manvādyā vā yugādyāśca teṣāṁ saṁkrāṁtayo'parāḥ vyatīpāto gajacchāyā grahaṇaṁ somasūryayoḥ

मन्वादि तिथियाँ, युगादि तिथियाँ, उनकी संक्रांतियाँ, व्यतीपात, गजच्छाया, तथा चन्द्र-सूर्य का ग्रहण—

श्लोक 5 (skanda.6.216.5)

एतेषु युज्यते श्राद्धं प्रकर्तुं पितृतृप्तये तथा तीर्थे विशेषेण पुण्य आयतने शुभे

eteṣu yujyate śrāddhaṁ prakartuṁ pitṛtṛptaye tathā tīrthe viśeṣeṇa puṇya āyatane śubhe

—इन सब अवसरों पर पितरों की तृप्ति के लिए श्राद्ध करना उचित है, तथा विशेष रूप से किसी पवित्र तीर्थ या शुभ पुण्य-स्थान में भी।

श्लोक 6 (skanda.6.216.6)

श्राद्धार्हैर्ब्राह्मणैः प्राप्तैर्द्रव्यैर्वा पितृवल्लभैः अपर्वण्यपि कर्तव्यं सदा श्राद्धं विचक्षणैः

śrāddhārhairbrāhmaṇaiḥ prāptairdravyairvā pitṛvallabhaiḥ aparvaṇyapi kartavyaṁ sadā śrāddhaṁ vicakṣaṇaiḥ

जब भी श्राद्ध के योग्य ब्राह्मण या पितरों को प्रिय द्रव्य मिल जाएँ, तब बुद्धिमान पुरुषों को बिना किसी विशेष पर्व के भी सदा श्राद्ध करना चाहिए।

श्लोक 7 (skanda.6.216.7)

सोमक्षये विशेषेण शृणुष्वैकमना नृप अमानाम रवेरश्मिसहस्रप्रमुखः स्थितः

somakṣaye viśeṣeṇa śṛṇuṣvaikamanā nṛpa amānāma raveraśmisahasrapramukhaḥ sthitaḥ

हे राजन्, चन्द्रक्षय के विशेष महत्व को एकाग्रचित्त होकर सुनो — सूर्य की सहस्र किरणों में से एक प्रमुख किरण का नाम 'अमा' है।

श्लोक 8 (skanda.6.216.8)

यस्य स्वतेजसा सूर्यः प्रोक्तस्त्रैलोक्यदीपकः तस्मिन्वसति येनेन्दुरमावस्या ततः स्मृता

yasya svatejasā sūryaḥ proktastrailokyadīpakaḥ tasminvasati yenenduramāvasyā tataḥ smṛtā

जिसके ही तेज से सूर्य को त्रैलोक्य का दीपक कहा गया है; चन्द्रमा उसी किरण में जिस दिन निवास करता है, उसे अमावस्या कहा जाता है।

श्लोक 9 (skanda.6.216.9)

अक्षया धर्मकृत्ये सा पितृकृत्ये विशेषतः अग्निष्वात्ता बर्हिषद आज्यपाः सोमपास्तथा

akṣayā dharmakṛtye sā pitṛkṛtye viśeṣataḥ agniṣvāttā barhiṣada ājyapāḥ somapāstathā

वह तिथि धार्मिक कार्यों में, विशेषतः पितृकार्य में, अक्षय फलदायी है। अग्निष्वात्त, बर्हिषद, आज्यप और सोमप—

श्लोक 10 (skanda.6.216.10)

रश्मिपा उपहूताश्च तथैवायंतुनाः परे तथा श्राद्धभुजश्चान्ये स्मृता नान्दीमुखा नृप

raśmipā upahūtāśca tathaivāyaṁtunāḥ pare tathā śrāddhabhujaścānye smṛtā nāndīmukhā nṛpa

—रश्मिप, उपहूत, तथा अन्य आयन्तुन नामक पितर, और श्राद्ध का भोग करने वाले अन्य पितर भी हैं, जो हे राजन्, नान्दीमुख कहलाते हैं।

श्लोक 11 (skanda.6.216.11)

एते पितृगणाः ख्याता नवदेवसमुद्भवाः आदित्या वसवो रुद्रा नासत्यावश्विनावपि

ete pitṛgaṇāḥ khyātā navadevasamudbhavāḥ ādityā vasavo rudrā nāsatyāvaśvināvapi

ये पितृगण नौ देव-समूहों से उत्पन्न माने गए हैं — आदित्य, वसु, रुद्र, तथा दोनों अश्विनीकुमार नासत्य भी।

श्लोक 12 (skanda.6.216.12)

सन्तर्पयन्ति ते चैतान्मुक्त्वा नान्दीमुखान्पितॄन् ब्रह्मणा ते समादिष्टाः पितरो नृपसत्तम

santarpayanti te caitānmuktvā nāndīmukhānpitṝn brahmaṇā te samādiṣṭāḥ pitaro nṛpasattama

हे नृपसत्तम, ये पितर नान्दीमुख पितरों को छोड़कर इन (देवगणों) को तृप्त करते हैं; ये पितर स्वयं ब्रह्मा जी द्वारा नियुक्त किए गए हैं।

श्लोक 13 (skanda.6.216.13)

तान्संतर्प्य ततः सृष्टिं कुरुते पद्मसंभवः

tānsaṁtarpya tataḥ sṛṣṭiṁ kurute padmasaṁbhavaḥ

उन्हें तृप्त करके ही कमलजन्मा ब्रह्मा सृष्टि-कार्य करते हैं।

श्लोक 14 (skanda.6.216.14)

पितरोऽन्येऽपि मर्त्या निवसन्ति त्रिविष्टपे द्विविधास्ते प्रदृश्यंते सुखिनोऽसुखिनः परे

pitaro'nye'pi martyā nivasanti triviṣṭape dvividhāste pradṛśyaṁte sukhino'sukhinaḥ pare

अन्य मर्त्य-पितर भी स्वर्गलोक में निवास करते हैं; वे दो प्रकार के दिखाई देते हैं — कुछ सुखी और कुछ दुःखी।

श्लोक 15 (skanda.6.216.15)

येभ्यः श्राद्धानि यच्छंति मर्त्यलोके स्ववंशजाः ते सर्वे तत्र संहृष्टा देववन्मुदिताः स्थिताः

yebhyaḥ śrāddhāni yacchaṁti martyaloke svavaṁśajāḥ te sarve tatra saṁhṛṣṭā devavanmuditāḥ sthitāḥ

जिन्हें उनके वंशज मृत्युलोक में श्राद्ध देते हैं, वे सब वहाँ अत्यंत प्रसन्न होकर देवताओं के समान हर्षित रहते हैं।

श्लोक 16 (skanda.6.216.16)

येषां यच्छन्ति ते नैव किंचित्किञ्चित्स्ववंशजाः क्षुत्पिपासाकुलास्ते च दृश्यन्ते बहुदुःखिताः

yeṣāṁ yacchanti te naiva kiṁcitkiñcitsvavaṁśajāḥ kṣutpipāsākulāste ca dṛśyante bahuduḥkhitāḥ

जिन्हें उनके वंशज कुछ भी नहीं देते, वे भूख-प्यास से व्याकुल होकर अत्यंत दुःखी दिखाई देते हैं।

श्लोक 17 (skanda.6.216.17)

कस्यचित्त्वथ कालस्य पितरः सुरपूजिताः अग्निष्वात्तादयः सर्वे त्रिदशेन्द्रमुपस्थिताः

kasyacittvatha kālasya pitaraḥ surapūjitāḥ agniṣvāttādayaḥ sarve tridaśendramupasthitāḥ

कालांतर में देवपूजित पितरगण, अग्निष्वात्त आदि सभी, इन्द्र के पास उपस्थित हुए।

श्लोक 18 (skanda.6.216.18)

भक्त्या दृष्टा महाराज सहस्राक्षेण पूजिताः तथान्यैर्विबुधैः सर्वैः प्रस्थिताः स्वे निकेतने

bhaktyā dṛṣṭā mahārāja sahasrākṣeṇa pūjitāḥ tathānyairvibudhaiḥ sarvaiḥ prasthitāḥ sve niketane

हे महाराज, सहस्राक्ष इन्द्र ने भक्तिपूर्वक उनके दर्शन कर उनकी पूजा की; और अन्य सभी देवताओं के साथ वे अपने-अपने निवासस्थान को चले गए।

श्लोक 19 (skanda.6.216.19)

पितृलोकं महाराज दुर्लभं त्रिदशैरपि तान्दृष्ट्वा प्रस्थितान्राजन्पितरो मर्त्यसंभवाः

pitṛlokaṁ mahārāja durlabhaṁ tridaśairapi tāndṛṣṭvā prasthitānrājanpitaro martyasaṁbhavāḥ

हे राजन्, देवताओं के लिए भी दुर्लभ उस पितृलोक की ओर उन्हें जाते देखकर, मर्त्यलोक से उत्पन्न (मानव) पितरों ने—

श्लोक 20 (skanda.6.216.20)

क्षुत्पिपासार्दिता ये च त ऊचुर्दैन्यमाश्रिताः स्तुत्वाऽथ सुस्तवैर्दिव्यैः पितृसूक्तैश्च पार्थिव

kṣutpipāsārditā ye ca ta ūcurdainyamāśritāḥ stutvā'tha sustavairdivyaiḥ pitṛsūktaiśca pārthiva

—जो भूख-प्यास से पीड़ित थे, हे राजन्, दीनतापूर्वक दिव्य स्तोत्रों और पितृसूक्तों से उनकी स्तुति कर यह बोले।

श्लोक 21 (skanda.6.216.21)

वेदोक्तैरपरैश्चैव पितृतुष्टिकरैः परैः ततः प्रोचुश्च संहृष्टाः पितरस्तान्सुरोद्भवाः

vedoktairaparaiścaiva pitṛtuṣṭikaraiḥ paraiḥ tataḥ procuśca saṁhṛṣṭāḥ pitarastānsurodbhavāḥ

तथा अन्य वेदोक्त और पितरों को संतुष्ट करने वाले श्रेष्ठ स्तोत्रों से भी उनकी स्तुति की; तब वे देवगण-रूप पितर प्रसन्न होकर उन (मानव-पितरों) से बोले।

श्लोक 22 (skanda.6.216.22)

प्रसन्नाः स्मो वयं सर्वे युष्माकं शंसितव्रताः तस्माद्ब्रूत वयं येन यच्छामो वो हृदि स्थितम्

prasannāḥ smo vayaṁ sarve yuṣmākaṁ śaṁsitavratāḥ tasmādbrūta vayaṁ yena yacchāmo vo hṛdi sthitam

उन्होंने कहा — हे उत्तम व्रतधारियों, हम सब तुम्हारे इस स्तवन से प्रसन्न हुए हैं; इसलिए कहो, जिससे हम तुम्हारे हृदय में स्थित इच्छा को पूर्ण कर सकें।

श्लोक 23 (skanda.6.216.23)

पितर ऊचुः वयं हि पितरः ख्याता मनुष्याणामिहागताः स्वर्गे स्वकर्मणा नित्यं निवसाम सुरैः सह

pitara ūcuḥ vayaṁ hi pitaraḥ khyātā manuṣyāṇāmihāgatāḥ svarge svakarmaṇā nityaṁ nivasāma suraiḥ saha

पितरों ने कहा — हम वे पितर हैं जो मनुष्यों के कहलाते हैं, इस स्वर्ग में आए हुए; हम अपने ही कर्मों से यहाँ नित्य देवताओं के साथ निवास करते हैं।

श्लोक 24 (skanda.6.216.24)

विमानेषु विचित्रेषु संस्थिताः सर्वतोदिशम् वांछितेषु च लोकेषु यामो ध्वजपताकिषु

vimāneṣu vicitreṣu saṁsthitāḥ sarvatodiśam vāṁchiteṣu ca lokeṣu yāmo dhvajapatākiṣu

हम विचित्र विमानों में सब दिशाओं में स्थित रहते हैं, और ध्वज-पताकाओं से सुशोभित मनचाहे लोकों में विचरण करते हैं।

श्लोक 25 (skanda.6.216.25)

हंसबर्हिणजुष्टेषु संसेव्येष्वप्सरोगणैः गन्धर्वैर्गीयमानाश्च स्तूयमानाश्च गुह्यकैः

haṁsabarhiṇajuṣṭeṣu saṁsevyeṣvapsarogaṇaiḥ gandharvairgīyamānāśca stūyamānāśca guhyakaiḥ

वे लोक हंसों और मयूरों से सेवित हैं, अप्सराओं के समूहों द्वारा भी सेवित हैं; वहाँ गंधर्व हमारे लिए गान करते हैं और गुह्यक हमारी स्तुति करते हैं।

श्लोक 26 (skanda.6.216.26)

परं सन्तिष्ठमानानामस्माकं त्रिदशैः सह अत्यर्थं जायते तीव्रा क्षुत्पिपासा सुदारुणा

paraṁ santiṣṭhamānānāmasmākaṁ tridaśaiḥ saha atyarthaṁ jāyate tīvrā kṣutpipāsā sudāruṇā

किंतु देवताओं के साथ इस प्रकार रहते हुए भी हमें अत्यंत तीव्र और भयंकर भूख-प्यास उत्पन्न होती है।

श्लोक 27 (skanda.6.216.27)

यस्या मन्यामहे चित्ते वह्निमध्यगता वयम् भक्षयामः किमेतान्हि पक्षिणो विविधानपि हंसादीन्मधुरालापान्किं वा चाप्सरसां गणान्

yasyā manyāmahe citte vahnimadhyagatā vayam bhakṣayāmaḥ kimetānhi pakṣiṇo vividhānapi haṁsādīnmadhurālāpānkiṁ vā cāpsarasāṁ gaṇān

उससे हम अपने मन में यह सोचने लगते हैं मानो अग्नि के बीच बैठे हों — क्या हम इन नाना पक्षियों को खा जाएँ, मीठी बोली वाले हंस आदि को, या अप्सराओं के समूहों को?

श्लोक 28 (skanda.6.216.28)

यदि कश्चित्क्षुधाविष्टः कञ्चिदादाय पक्षिणम् गुप्तो गृह्णाति भक्षार्थं हन्तुं शक्तोऽपि सोऽपि न

yadi kaścitkṣudhāviṣṭaḥ kañcidādāya pakṣiṇam gupto gṛhṇāti bhakṣārthaṁ hantuṁ śakto'pi so'pi na

यदि क्षुधाग्रस्त कोई पितर छिपकर किसी पक्षी को खाने के लिए पकड़ना चाहे, तो मारने में समर्थ होते हुए भी वह उसे नहीं मार पाता।

श्लोक 29 (skanda.6.216.29)

अजराश्चामराश्चैव स्वर्गे ये स्वर्गगाः खगाः तथा मनोरमा वृक्षा नन्दनादि वनेषु च

ajarāścāmarāścaiva svarge ye svargagāḥ khagāḥ tathā manoramā vṛkṣā nandanādi vaneṣu ca

स्वर्ग में विचरने वाले पक्षी अजर-अमर हैं, तथा नंदनादि वनों में जो मनोरम वृक्ष हैं—

श्लोक 30 (skanda.6.216.30)

फलिता ये प्रदृश्यंते प्राप्यांश्चापि मनोरमाः तत्फलानि वयं सर्वे गृह्णीमः पितरो यदि

phalitā ye pradṛśyaṁte prāpyāṁścāpi manoramāḥ tatphalāni vayaṁ sarve gṛhṇīmaḥ pitaro yadi

—जो फलों से लदे और प्राप्य दिखाई देते हैं, यदि हम पितर उन मनोरम वृक्षों के फल तोड़ना भी चाहें—

श्लोक 31 (skanda.6.216.31)

न त्रुटंत्यपि यत्नेन समाकृष्टानि तान्यपि एतल्लेखापगातोयं तृषार्त्ता यदि यत्नतः प्रपिबामो न हस्तेषु तच्च तोयं पुनः स्पृशेत्

na truṭaṁtyapi yatnena samākṛṣṭāni tānyapi etallekhāpagātoyaṁ tṛṣārttā yadi yatnataḥ prapibāmo na hasteṣu tacca toyaṁ punaḥ spṛśet

—तो वे यत्नपूर्वक खींचने पर भी टूटते नहीं। यही दशा उस नदी के जल की भी है — प्यास से पीड़ित होकर यत्नपूर्वक पीने का प्रयास करें भी, तो वह जल हाथों में आते ही पुनः दूर हो जाता है।

श्लोक 32 (skanda.6.216.32)

भुंजानश्च न कोऽप्यत्र दृश्यतेऽत्र पिबन्नपि तस्मात्त्रिविष्टपावासो ह्यस्माकं घोरदारुणः

bhuṁjānaśca na ko'pyatra dṛśyate'tra pibannapi tasmāttriviṣṭapāvāso hyasmākaṁ ghoradāruṇaḥ

यहाँ न तो कोई भोजन करता हुआ दिखाई देता है, न कोई पीता हुआ; इसीलिए हमारे लिए यह स्वर्गवास अत्यंत भयंकर और कष्टकारी है।

श्लोक 33 (skanda.6.216.33)

एते सुरगणाः सर्वे ये चान्ये गुह्यकादयः दृश्यंतेऽत्र विमानस्था सर्वे संहृष्टमानसाः

ete suragaṇāḥ sarve ye cānye guhyakādayaḥ dṛśyaṁte'tra vimānasthā sarve saṁhṛṣṭamānasāḥ

ये सारे देवगण, और अन्य गुह्यक आदि भी, यहाँ विमानों में स्थित सभी हर्षितमन दिखाई देते हैं।

श्लोक 34 (skanda.6.216.34)

क्षुत्पिपासापरित्यक्ता नानाभोगसमाश्रयाः कदाचिच्च वयं सर्वे भवामस्तादृशा इव

kṣutpipāsāparityaktā nānābhogasamāśrayāḥ kadācicca vayaṁ sarve bhavāmastādṛśā iva

वे सब भूख-प्यास से रहित होकर नाना भोगों का आश्रय लिए रहते हैं; हम भी कभी-कभी उन्हीं के समान हो जाते हैं—

श्लोक 35 (skanda.6.216.35)

क्षुत्पिपासापरित्यक्ताः सतोषं परमं गताः तत्किं कारणमेतद्यत्क्षुत्पिपासा प्रजायते

kṣutpipāsāparityaktāḥ satoṣaṁ paramaṁ gatāḥ tatkiṁ kāraṇametadyatkṣutpipāsā prajāyate

—भूख-प्यास से रहित होकर परम संतोष को प्राप्त करते हैं। तो फिर यह क्या कारण है कि हमें (शेष समय) भूख-प्यास उत्पन्न होती रहती है?

श्लोक 36 (skanda.6.216.36)

आकस्मिकी च बाधा नः कदाचिन्न प्रणश्यति तथा कुरुत भद्रं वो यथा तुष्टिः प्रजायते

ākasmikī ca bādhā naḥ kadācinna praṇaśyati tathā kuruta bhadraṁ vo yathā tuṣṭiḥ prajāyate

यह आकस्मिक पीड़ा हमारी कभी नष्ट नहीं होती। हे कल्याणस्वरूपो, ऐसा उपाय कीजिए जिससे हमें संतोष प्राप्त हो सके।

श्लोक 37 (skanda.6.216.37)

शाश्वती नो यथाऽन्येषां देवानां स्वर्गवासिनाम् यूयं हि पितरो यस्माद्देवानां भावितात्मनाम्

śāśvatī no yathā'nyeṣāṁ devānāṁ svargavāsinām yūyaṁ hi pitaro yasmāddevānāṁ bhāvitātmanām

जैसे अन्य स्वर्गवासी देवताओं की तृप्ति शाश्वत रहती है, वैसे ही हमारी भी शाश्वत हो; क्योंकि आप तो भावितात्मा देवताओं के भी पितर हैं—

श्लोक 38 (skanda.6.216.38)

वयं चैव मनुष्याणां तेन वः शरणं गताः पितर ऊचुः अस्माकमपि चैवैषा कष्टावस्था प्रजायते

vayaṁ caiva manuṣyāṇāṁ tena vaḥ śaraṇaṁ gatāḥ pitara ūcuḥ asmākamapi caivaiṣā kaṣṭāvasthā prajāyate

—और हम मनुष्यों के पितर हैं; इसीलिए हम आपकी शरण में आए हैं। (मानव-)पितरों ने कहा — हमें भी यही कष्टपूर्ण दशा प्राप्त होती है।

श्लोक 39 (skanda.6.216.39)

शक्राद्या विबुधा व्यग्राः श्राद्धं यच्छंति नो यदा ततश्चागत्य तान्सर्वे देवान्संप्रार्थयामहे

śakrādyā vibudhā vyagrāḥ śrāddhaṁ yacchaṁti no yadā tataścāgatya tānsarve devānsaṁprārthayāmahe

जब इन्द्र आदि व्यस्त देवता हमें श्राद्ध नहीं देते, तब हम सब आकर उन देवताओं से प्रार्थना करते हैं।

श्लोक 40 (skanda.6.216.40)

ततस्तृप्तिं प्रगच्छामस्तैर्देवैस्तर्पिता वयम् युष्माकं वंशजा ये च प्रयच्छंति समाहिताः

tatastṛptiṁ pragacchāmastairdevaistarpitā vayam yuṣmākaṁ vaṁśajā ye ca prayacchaṁti samāhitāḥ

तब उन देवताओं द्वारा तृप्त किए जाकर हम तृप्ति प्राप्त करते हैं; परंतु आपके जो वंशज सावधानीपूर्वक श्राद्ध देते हैं—

श्लोक 41 (skanda.6.216.41)

कथं न तृप्तिमायातास्ते सर्वे तैः प्रतर्पिताः यत्र प्रमादिभिर्वंश्यैर्न तर्प्यंते कथंचन

kathaṁ na tṛptimāyātāste sarve taiḥ pratarpitāḥ yatra pramādibhirvaṁśyairna tarpyaṁte kathaṁcana

—उनके द्वारा तृप्त हुए (देव-पितर) तृप्ति क्यों नहीं प्राप्त करते? जबकि जिनके वंशज प्रमादी होकर उन्हें (मानव-पितरों को) किसी भी प्रकार तृप्त नहीं करते—

श्लोक 42 (skanda.6.216.42)

क्षुत्पिपासाकुलाः सर्वे ते तदा स्युर्न संशयः किं पुनर्नरकस्था ये धर्मराजनिवेशने

kṣutpipāsākulāḥ sarve te tadā syurna saṁśayaḥ kiṁ punarnarakasthā ye dharmarājaniveśane

—वे सब निःसंदेह भूख-प्यास से व्याकुल रहते हैं; फिर जो पितर धर्मराज के निवास, नरक में स्थित हैं, उनकी तो बात ही क्या।

श्लोक 43 (skanda.6.216.43)

एतद्धि कारणं प्रोक्तं युष्माकं च कथंचन क्षुत्पिपासोद्भवं रौद्रं युष्माभिर्यदुदीरितम्

etaddhi kāraṇaṁ proktaṁ yuṣmākaṁ ca kathaṁcana kṣutpipāsodbhavaṁ raudraṁ yuṣmābhiryadudīritam

यही कारण हमने बता दिया कि आपने भी क्यों उस भयंकर भूख-प्यास से उत्पन्न पीड़ा का वर्णन किया है।

श्लोक 44 (skanda.6.216.44)

तदस्माकं विभागं चेद्यूयं यच्छत सत्तमाः सर्वे कव्यस्य दत्तस्य तत्कुर्मो वै हितं शुभम्

tadasmākaṁ vibhāgaṁ cedyūyaṁ yacchata sattamāḥ sarve kavyasya dattasya tatkurmo vai hitaṁ śubham

अतः हे सत्तमो, यदि आप हमें अपना भाग (कव्य का हिस्सा) दें, तो हम सब मिलकर उस दिए हुए कव्य का उचित शुभ प्रबंध करेंगे।

श्लोक 45 (skanda.6.216.45)

ब्रह्माणं प्रार्थयित्वा च स्वयं गत्वा तदंतिकम् बाढमित्येव तैरुक्ते तत आदाय तानपि

brahmāṇaṁ prārthayitvā ca svayaṁ gatvā tadaṁtikam bāḍhamityeva tairukte tata ādāya tānapi

उन्होंने ब्रह्मा जी से प्रार्थना करने के लिए स्वयं उनके समीप जाकर उनसे विनती की; 'हाँ, ऐसा ही होगा' यह कहने पर, फिर उन्हें साथ लेकर—

श्लोक 46 (skanda.6.216.46)

दिव्याः पितृगणाः प्राप्ता विधेः सदनमुत्तमम् नांदीमुखान्पुरस्कृत्य पितॄन्यांस्तर्पयेद्विधिः

divyāḥ pitṛgaṇāḥ prāptā vidheḥ sadanamuttamam nāṁdīmukhānpuraskṛtya pitṝnyāṁstarpayedvidhiḥ

—वे दिव्य पितृगण ब्रह्मा जी के उत्तम भवन में पहुँचे, जहाँ नान्दीमुख पितरों को आगे कर ब्रह्मा जी उनका तर्पण करते हैं।

श्लोक 47 (skanda.6.216.47)

सृष्टिकाले तु संप्राप्ते वृद्धिकामः सुरेश्वरः अथ तैः सह ते सर्वे स्तुत्वा तं कमलासनम् प्रणिपत्य स्थिताः सर्वे पितरो विनयान्विताः

sṛṣṭikāle tu saṁprāpte vṛddhikāmaḥ sureśvaraḥ atha taiḥ saha te sarve stutvā taṁ kamalāsanam praṇipatya sthitāḥ sarve pitaro vinayānvitāḥ

सृष्टिकाल आने पर वृद्धि की कामना करने वाले देवेश्वर ब्रह्मा उनका तर्पण करते हैं; तब वे सारे पितर उनके साथ मिलकर कमलासन ब्रह्मा की स्तुति कर, प्रणाम कर, विनम्रतापूर्वक खड़े हो गए।

श्लोक 48 (skanda.6.216.48)

पितॄंस्तान्विनयोपेतान्प्रणिपातपुरःसरान् विधिः प्रोवाच राजेंद्र सांत्वयञ्श्लक्ष्णया गिरा

pitṝṁstānvinayopetānpraṇipātapuraḥsarān vidhiḥ provāca rājeṁdra sāṁtvayañślakṣṇayā girā

हे राजेन्द्र, विनम्रतापूर्वक प्रणाम करके खड़े हुए उन पितरों से ब्रह्मा जी मृदु वाणी से सांत्वना देते हुए बोले।

श्लोक 49 (skanda.6.216.49)

ब्रह्मोवाच किमर्थं पितरः सर्वे समायाता ममांतिकम् देवतानां मया सार्धं संपूज्याः सर्वदा स्थिताः

brahmovāca kimarthaṁ pitaraḥ sarve samāyātā mamāṁtikam devatānāṁ mayā sārdhaṁ saṁpūjyāḥ sarvadā sthitāḥ

ब्रह्मा जी ने कहा — हे पितरो, तुम सब मेरे पास किस प्रयोजन से आए हो, जो मेरे साथ देवताओं द्वारा भी सदा पूज्य रहे हो?

श्लोक 50 (skanda.6.216.50)

तथान्येऽपि च दृश्यंते युष्माभिः सह संगताः य एते मानवाकाराः स्वल्पतेजोन्विताः स्थिताः

tathānye'pi ca dṛśyaṁte yuṣmābhiḥ saha saṁgatāḥ ya ete mānavākārāḥ svalpatejonvitāḥ sthitāḥ

और तुम्हारे साथ ये अन्य भी कौन दिखाई दे रहे हैं, जो मानव-आकार के और अल्प तेज से युक्त हैं?

श्लोक 51 (skanda.6.216.51)

पितर ऊचुः पितरो मानवा ह्येते स्वर्गं प्राप्ताः स्वकर्मभिः देवानां मध्यसंस्थाश्च पीड्यंते क्षुत्पिपासया

pitara ūcuḥ pitaro mānavā hyete svargaṁ prāptāḥ svakarmabhiḥ devānāṁ madhyasaṁsthāśca pīḍyaṁte kṣutpipāsayā

पितरों ने कहा — ये मानव-पितर हैं, जो अपने-अपने कर्मों से स्वर्ग प्राप्त कर देवताओं के मध्य स्थित रहते हैं, किंतु भूख-प्यास से पीड़ित रहते हैं।

श्लोक 52 (skanda.6.216.52)

यदा यच्छंति नो वंश्याः कव्यं चैव प्रमादतः तदा गच्छंति नो तृप्तिं यानैर्यांति यथा सुराः

yadā yacchaṁti no vaṁśyāḥ kavyaṁ caiva pramādataḥ tadā gacchaṁti no tṛptiṁ yānairyāṁti yathā surāḥ

जब इनके वंशज प्रमादवश इन्हें कव्य नहीं देते, तब ये तृप्ति को प्राप्त नहीं होते, जैसे देवता अपने विमानों में विचरण करते हैं वैसे ये भी विचरण तो करते हैं (पर तृप्त नहीं होते)।

श्लोक 53 (skanda.6.216.53)

तदैतैः प्रार्थनाऽस्माकं कृता शाश्वततृप्तये न च शक्ता वयं दातुं तेन त्वां समुपस्थिताः

tadaitaiḥ prārthanā'smākaṁ kṛtā śāśvatatṛptaye na ca śaktā vayaṁ dātuṁ tena tvāṁ samupasthitāḥ

इसीलिए इन्होंने हमसे शाश्वत तृप्ति के लिए प्रार्थना की है; किंतु हम भी वह देने में समर्थ नहीं हैं, इसीलिए हम आपके पास आए हैं।

श्लोक 54 (skanda.6.216.54)

यथा स्युर्देवता व्यग्रास्तदाऽस्माकमपि प्रभो कव्यं विना भवेदेषा दशा कष्टा सुरेश्वर

yathā syurdevatā vyagrāstadā'smākamapi prabho kavyaṁ vinā bhavedeṣā daśā kaṣṭā sureśvara

हे प्रभो, हे सुरेश्वर, जिस प्रकार देवता व्यस्त होने पर हमें भी कव्य के बिना यह कष्टपूर्ण दशा प्राप्त होती है—

श्लोक 55 (skanda.6.216.55)

तस्मात्कुरु प्रसादं नः समेमेतैः सुरेश्वर यथा स्याच्छाश्वती तृप्तिः स्वस्थानस्थायिनामपि

tasmātkuru prasādaṁ naḥ samemetaiḥ sureśvara yathā syācchāśvatī tṛptiḥ svasthānasthāyināmapi

—इसलिए हे सुरेश्वर, इन सबके साथ हम पर भी कृपा कीजिए, जिससे अपने-अपने स्थान में स्थित रहने वालों को भी शाश्वत तृप्ति प्राप्त हो सके।

श्लोक 56 (skanda.6.216.56)

एतेऽस्माकं प्रदास्यंति कव्यं यन्निजवंशजैः प्रदत्तं तेन संप्राप्ता वयं देव त्वदन्तिकम्

ete'smākaṁ pradāsyaṁti kavyaṁ yannijavaṁśajaiḥ pradattaṁ tena saṁprāptā vayaṁ deva tvadantikam

इनके अपने वंशजों द्वारा दिया गया जो कव्य ये हमें देंगे, हे देव, उसी के लिए हम आपके समीप आए हैं।

श्लोक 57 (skanda.6.216.57)

देवानां चैव यत्कव्यं तन्नास्माकं प्रतृप्तये यतः क्रियाविहीनं तन्न तेषां विद्यते क्रिया

devānāṁ caiva yatkavyaṁ tannāsmākaṁ pratṛptaye yataḥ kriyāvihīnaṁ tanna teṣāṁ vidyate kriyā

किंतु देवताओं का जो कव्य होता है, वह हमारी तृप्ति के लिए नहीं है, क्योंकि वह क्रियारहित होता है — उन देवताओं के लिए कोई ऐसी (श्राद्ध) क्रिया विद्यमान नहीं है।

श्लोक 58 (skanda.6.216.58)

पितॄनुद्दिश्य यत्कव्यं ब्राह्मणेभ्यः प्रदीयते स्नातैर्धौतांबरैर्मर्त्यैस्तद्भवेत्तृप्तिदं महत्

pitṝnuddiśya yatkavyaṁ brāhmaṇebhyaḥ pradīyate snātairdhautāṁbarairmartyaistadbhavettṛptidaṁ mahat

पितरों के उद्देश्य से जो कव्य स्नान किए और धुले वस्त्र पहने हुए मनुष्यों द्वारा ब्राह्मणों को दिया जाता है, वही महान तृप्तिदायक होता है।

श्लोक 59 (skanda.6.216.59)

पितॄणां सर्वदेवेश इत्येषा वैदिकी श्रुतिः न स्नातस्याधिकारोऽस्ति देवानां च द्विजातिवत्

pitṝṇāṁ sarvadeveśa ityeṣā vaidikī śrutiḥ na snātasyādhikāro'sti devānāṁ ca dvijātivat

हे सर्वदेवेश, यही वैदिक श्रुति है कि पितरों के लिए स्नात मनुष्य द्वारा दिया गया अन्न ही ग्राह्य है; देवताओं का ब्राह्मणों के समान इसमें कोई अधिकार नहीं है।

श्लोक 60 (skanda.6.216.60)

पीयूषमपि तैर्दत्तं तेन नः स्यान्न तृप्तये

pīyūṣamapi tairdattaṁ tena naḥ syānna tṛptaye

इसीलिए उन देवताओं द्वारा दिया गया अमृत भी हमारी तृप्ति के लिए नहीं होता।

श्लोक 61 (skanda.6.216.61)

तस्मान्मानुषदत्तैर्नो यथा कव्ये प्रजायते स्वर्गस्थानां परा तृप्तिः सममेतैस्तथा कुरु

tasmānmānuṣadattairno yathā kavye prajāyate svargasthānāṁ parā tṛptiḥ samametaistathā kuru

इसलिए जैसे मनुष्यों द्वारा दिए गए कव्य से हमें तृप्ति प्राप्त होती है, वैसे ही स्वर्गस्थ इन (मानव-पितरों) को भी परम तृप्ति प्राप्त हो, ऐसा कीजिए।

श्लोक 62 (skanda.6.216.62)

भर्तृयज्ञ उवाच तच्छ्रुत्वा सुचिरं ध्यात्वा ब्रह्मा लोकपितामहः तानुवाच ततः सर्वान्पितॄन्पार्थिवसत्तम

bhartṛyajña uvāca tacchrutvā suciraṁ dhyātvā brahmā lokapitāmahaḥ tānuvāca tataḥ sarvānpitṝnpārthivasattama

भर्तृयज्ञ ने कहा — हे राजश्रेष्ठ, यह सुनकर लोकपितामह ब्रह्मा जी बहुत देर तक विचार कर, फिर उन सभी पितरों से बोले।

श्लोक 63 (skanda.6.216.63)

ब्रह्मोवाच अस्मिंस्त्रेतायुगे संज्ञा हव्यकव्यसमुद्भवा संप्रयाता युगे युग्मे कलौ न प्रभविष्यति

brahmovāca asmiṁstretāyuge saṁjñā havyakavyasamudbhavā saṁprayātā yuge yugme kalau na prabhaviṣyati

ब्रह्मा जी ने कहा — इस त्रेतायुग में हव्य-कव्य से उत्पन्न वह ज्ञान चला जाएगा; द्वापर युग में भी यह घटता जाएगा, और कलियुग में तो यह प्रभावशाली ही नहीं रह पाएगा।

श्लोक 64 (skanda.6.216.64)

यथायथा युगानां च ह्रास एष भविष्यति तथातथा जना दुष्टा भविष्यंत्यन्यभक्तिकाः

yathāyathā yugānāṁ ca hrāsa eṣa bhaviṣyati tathātathā janā duṣṭā bhaviṣyaṁtyanyabhaktikāḥ

जैसे-जैसे युगों का ह्रास होता जाएगा, वैसे-वैसे ही मनुष्य दुष्ट और अन्यत्र आसक्त होते जाएँगे।

श्लोक 65 (skanda.6.216.65)

न दास्यंति यथोक्तानि ते कव्यानि कथंचन ततः कष्टतराऽवस्था पितॄणां संभविष्यति

na dāsyaṁti yathoktāni te kavyāni kathaṁcana tataḥ kaṣṭatarā'vasthā pitṝṇāṁ saṁbhaviṣyati

वे यथोक्त कव्य किसी भी प्रकार नहीं देंगे; उससे पितरों की और भी अधिक कष्टकर दशा हो जाएगी।

श्लोक 66 (skanda.6.216.66)

तस्मादहं करिष्यामि सुखोपायं शरीरिणाम् येन सन्तर्पिता यूयं परां तृप्तिमवाप्स्यथ

tasmādahaṁ kariṣyāmi sukhopāyaṁ śarīriṇām yena santarpitā yūyaṁ parāṁ tṛptimavāpsyatha

इसलिए मैं देहधारियों के लिए एक सरल उपाय बताऊँगा, जिसके द्वारा तृप्त होकर तुम सब परम तृप्ति को प्राप्त करोगे।

श्लोक 67 (skanda.6.216.67)

पितुः पितामहस्यैव तत्पितुश्च ततः परम् समुद्देशेन दत्तेन ब्राह्मणेभ्यः प्रभक्तितः

pituḥ pitāmahasyaiva tatpituśca tataḥ param samuddeśena dattena brāhmaṇebhyaḥ prabhaktitaḥ

पिता, पितामह और उससे आगे प्रपितामह के नाम पर, भक्तिपूर्वक ब्राह्मणों को उद्देश्य कर दिए गए दान से—

श्लोक 68 (skanda.6.216.68)

सर्वेषां स्यात्परा तृप्तिर्यावन्मां पितरोऽधुना तथा मातामहानां च पक्षे नास्त्यत्र संशयः

sarveṣāṁ syātparā tṛptiryāvanmāṁ pitaro'dhunā tathā mātāmahānāṁ ca pakṣe nāstyatra saṁśayaḥ

—उन सबको परम तृप्ति प्राप्त होगी, जो मुझ तक (सृष्टि के आरंभ तक) के सभी पितर हैं; और इसी प्रकार मातामह पक्ष में भी इसमें कोई संदेह नहीं है।

श्लोक 69 (skanda.6.216.69)

त्रिभिः सन्तर्पितास्तेऽपि तर्पिताः स्युर्ममावधि युष्माकं तृप्तये यश्च सुखोपायो भविष्यति

tribhiḥ santarpitāste'pi tarpitāḥ syurmamāvadhi yuṣmākaṁ tṛptaye yaśca sukhopāyo bhaviṣyati

उन तीनों (पिता, पितामह, प्रपितामह) के तृप्त होने से मेरे तक के सभी तृप्त हो जाएँगे। तुम्हारी तृप्ति के लिए जो सरल उपाय होगा—

श्लोक 70 (skanda.6.216.70)

तं शृणुध्वं महाभागा गदतो मम सांप्रतम् पितॄनन्नेन येनैव समुद्दिश्य द्विजोत्तमान्

taṁ śṛṇudhvaṁ mahābhāgā gadato mama sāṁpratam pitṝnannena yenaiva samuddiśya dvijottamān

—हे महाभागो, उसे अब मुझसे सुनो — जिस प्रकार श्रेष्ठ ब्राह्मणों को पितरों के उद्देश्य से अन्न देकर—

श्लोक 71 (skanda.6.216.71)

तर्पयिष्यंति तेनैव पिण्डान्दास्यंति भक्तितः तन्नाम्ना तेन वस्तृप्तिः शाश्वती संभविष्यति

tarpayiṣyaṁti tenaiva piṇḍāndāsyaṁti bhaktitaḥ tannāmnā tena vastṛptiḥ śāśvatī saṁbhaviṣyati

—लोग उनका तर्पण करेंगे और भक्तिपूर्वक पिण्ड देंगे, उसी नाम से तुम्हें शाश्वत तृप्ति प्राप्त होगी।

श्लोक 72 (skanda.6.216.72)

तस्माद्गच्छत सन्तुष्टाः स्वानि स्थानानि पूर्वजाः

tasmādgacchata santuṣṭāḥ svāni sthānāni pūrvajāḥ

इसलिए हे पूर्वजो, अब संतुष्ट होकर अपने-अपने स्थानों को लौट जाओ।

श्लोक 73 (skanda.6.216.73)

ततस्ते सहितास्तैस्तु स्वानि स्थानानि भेजिरे विमानैः सूर्यसंकाशैर्गत्वा पार्थिवसत्तम

tataste sahitāstaistu svāni sthānāni bhejire vimānaiḥ sūryasaṁkāśairgatvā pārthivasattama

हे राजश्रेष्ठ, तब वे (मानव-पितर) उन (देव-पितरों) सहित सूर्य के समान तेजस्वी विमानों में सवार होकर अपने-अपने स्थानों को चले गए।

श्लोक 74 (skanda.6.216.74)

अथ संगच्छता राजन्कालेन महता ततः तच्चापि न ददुः श्राद्धं मर्त्यास्त्रिपुरुषं च यत्

atha saṁgacchatā rājankālena mahatā tataḥ taccāpi na daduḥ śrāddhaṁ martyāstripuruṣaṁ ca yat

हे राजन्, फिर दीर्घकाल बीतने पर मनुष्यों ने वह त्रि-पुरुष-निर्दिष्ट श्राद्ध भी देना छोड़ दिया।

श्लोक 75 (skanda.6.216.75)

नित्यं पितॄन्समुद्दिश्य बहवोऽत्र नराधिप कव्यभागान्पुनस्तेषां तथा पूर्वं यथा नृप

nityaṁ pitṝnsamuddiśya bahavo'tra narādhipa kavyabhāgānpunasteṣāṁ tathā pūrvaṁ yathā nṛpa

हे नराधिप, यहाँ बहुत से लोग नित्य पितरों के उद्देश्य से कव्यभाग देना छोड़ बैठे, जैसा पूर्वकाल में हुआ था।

श्लोक 76 (skanda.6.216.76)

क्षुत्पिपासोद्भवापीडा महती समजायत तेषां च दैविकानां च पितॄणां नृपसत्तम

kṣutpipāsodbhavāpīḍā mahatī samajāyata teṣāṁ ca daivikānāṁ ca pitṝṇāṁ nṛpasattama

हे नृपसत्तम, इससे उन (मानव) पितरों की, और उन दिव्य पितरों की भी, भूख-प्यास से उत्पन्न महान पीड़ा फिर से उत्पन्न हो गई।

श्लोक 77 (skanda.6.216.77)

समेत्याथ पुनः सर्वे ब्रह्माणं शरणं गताः प्रोचुश्च प्रणिपत्योच्चैः सुदीनाः प्रपितामहम्

sametyātha punaḥ sarve brahmāṇaṁ śaraṇaṁ gatāḥ procuśca praṇipatyoccaiḥ sudīnāḥ prapitāmaham

तब वे सब फिर एकत्रित होकर ब्रह्मा जी की शरण में गए, और अत्यंत दीन होकर उन प्रपितामह के सामने प्रणाम कर ऊँची वाणी में बोले।

श्लोक 78 (skanda.6.216.78)

भगवन्न प्रयच्छंति नित्यं नो वंशसंभवाः श्राद्धानि दौःस्थ्यमापन्नास्तेन सीदामहे विभो

bhagavanna prayacchaṁti nityaṁ no vaṁśasaṁbhavāḥ śrāddhāni dauḥsthyamāpannāstena sīdāmahe vibho

उन्होंने कहा — हे भगवन्, हे विभो, हमारे वंशज नित्य श्राद्ध नहीं देते, इसीलिए हम दुर्दशा को प्राप्त होकर पीड़ित हो रहे हैं।

श्लोक 79 (skanda.6.216.79)

यथा पूर्वं तथा देव तदुपायं प्रचिन्तय कंचिद्येन दरिद्रा वै प्रीणयंति च ते पितॄन्

yathā pūrvaṁ tathā deva tadupāyaṁ pracintaya kaṁcidyena daridrā vai prīṇayaṁti ca te pitṝn

हे देव, जैसा पहले किया था, वैसा ही कोई उपाय अब भी सोचिए, जिससे दरिद्र लोग भी अपने पितरों को प्रसन्न कर सकें।

श्लोक 80 (skanda.6.216.80)

भर्तृयज्ञ उवाच तेषां तद्वचनं श्रुत्वा तानाह प्रपितामहः कृपाविष्टो महाराज सर्वान्पितृगणांस्तथा

bhartṛyajña uvāca teṣāṁ tadvacanaṁ śrutvā tānāha prapitāmahaḥ kṛpāviṣṭo mahārāja sarvānpitṛgaṇāṁstathā

भर्तृयज्ञ ने कहा — हे महाराज, उनकी यह बात सुनकर प्रपितामह ब्रह्मा जी कृपा से भरकर उन समस्त पितृगणों से बोले।

श्लोक 81 (skanda.6.216.81)

सत्यमेतन्महाभागा दौःस्थ्यं यांति दिनेदिने जना यथायथा याति युगं श्रेष्ठं च पृष्ठतः

satyametanmahābhāgā dauḥsthyaṁ yāṁti dinedine janā yathāyathā yāti yugaṁ śreṣṭhaṁ ca pṛṣṭhataḥ

उन्होंने कहा — हे महाभागो, यह सत्य है कि दिन-प्रतिदिन दुर्दशा बढ़ती जा रही है, ज्यों-ज्यों उत्तम युग पीछे छूटता जाता है।

श्लोक 82 (skanda.6.216.82)

तथापि च करिष्यामि युष्मदर्थमसंशयम् उपायं लघु सन्तृप्तिर्येन वोऽत्र भविष्यति

tathāpi ca kariṣyāmi yuṣmadarthamasaṁśayam upāyaṁ laghu santṛptiryena vo'tra bhaviṣyati

फिर भी मैं तुम्हारे लिए निःसंदेह एक सरल उपाय बताऊँगा, जिससे तुम्हें यहाँ (शीघ्र) तृप्ति प्राप्त होगी।

श्लोक 83 (skanda.6.216.83)

अमानाम रवेरश्मिसहस्रप्रमुखः स्थितः तस्मिन्वसति येनेन्दुरमावास्या ततः स्मृता

amānāma raveraśmisahasrapramukhaḥ sthitaḥ tasminvasati yenenduramāvāsyā tataḥ smṛtā

सूर्य की सहस्र किरणों में प्रमुख किरण का नाम 'अमा' है; उसी में चन्द्रमा जिस दिन निवास करता है, वह अमावस्या कहलाती है।

श्लोक 84 (skanda.6.216.84)

तस्मिन्नहनि ये श्राद्धं पितॄनुद्दिश्य चात्मनः करिष्यंति नरा भक्त्या ते भविष्यंति सुस्थिताः

tasminnahani ye śrāddhaṁ pitṝnuddiśya cātmanaḥ kariṣyaṁti narā bhaktyā te bhaviṣyaṁti susthitāḥ

उस दिन जो मनुष्य अपने पितरों के उद्देश्य से भक्तिपूर्वक श्राद्ध करेंगे, वे सुखी और स्थिर रहेंगे।

श्लोक 85 (skanda.6.216.85)

धनधान्यसमोपेता सर्वशत्रुविवर्जिताः अपमृत्युपरित्यक्ता मम वाक्यादसंशयम्

dhanadhānyasamopetā sarvaśatruvivarjitāḥ apamṛtyuparityaktā mama vākyādasaṁśayam

मेरे वचन से निःसंदेह वे धन-धान्य से युक्त, सर्वशत्रुरहित, और अकाल मृत्यु से रहित होंगे।

श्लोक 86 (skanda.6.216.86)

भर्तृयज्ञ उवाच तस्य तद्वचनं श्रुत्वा बभूवुर्हृष्टमानसाः पितरः कव्यमासाद्य प्रहृष्टेनांतरात्मना

bhartṛyajña uvāca tasya tadvacanaṁ śrutvā babhūvurhṛṣṭamānasāḥ pitaraḥ kavyamāsādya prahṛṣṭenāṁtarātmanā

भर्तृयज्ञ ने कहा — उनकी यह बात सुनकर पितरगण हर्षितमन हो गए, और कव्य प्राप्त कर परम प्रसन्न अंतःकरण से रहने लगे।

श्लोक 87 (skanda.6.216.87)

ययुः स्वानि निकेतानि प्रेषिताः पद्मयोनिना अमावास्यादिनं प्राप्य श्राद्धं दत्तं स्ववंशजैः

yayuḥ svāni niketāni preṣitāḥ padmayoninā amāvāsyādinaṁ prāpya śrāddhaṁ dattaṁ svavaṁśajaiḥ

कमलजन्मा ब्रह्मा द्वारा विदा किए जाकर वे अपने-अपने स्थानों को चले गए; अमावस्या का दिन आने पर उनके वंशजों ने श्राद्ध दिया।

श्लोक 88 (skanda.6.216.88)

संतृप्ता मासमात्रं च तस्थुः संतुष्टमानसाः गच्छता त्वथकालेन दौःस्थ्यं प्राप्य नरा भुवि दर्शेऽस्मिन्नपि नो श्राद्धं प्रायः कुर्वंति केचन

saṁtṛptā māsamātraṁ ca tasthuḥ saṁtuṣṭamānasāḥ gacchatā tvathakālena dauḥsthyaṁ prāpya narā bhuvi darśe'sminnapi no śrāddhaṁ prāyaḥ kurvaṁti kecana

तृप्त होकर वे एक मासभर संतुष्टमन रहे; किंतु समय बीतने पर पृथ्वी पर मनुष्य दुर्दशा को प्राप्त होकर, इस अमावस्या पर भी प्रायः कोई-कोई ही श्राद्ध करने लगे।

श्लोक 89 (skanda.6.216.89)

ततः पितृगणाः सर्वे ये दिव्या ये च मानुषाः क्षुत्पिपासाकुला भूयो ब्रह्माणं शरणं गताः

tataḥ pitṛgaṇāḥ sarve ye divyā ye ca mānuṣāḥ kṣutpipāsākulā bhūyo brahmāṇaṁ śaraṇaṁ gatāḥ

तब वे सभी पितृगण, दिव्य भी और मानव भी, फिर से भूख-प्यास से व्याकुल होकर ब्रह्मा जी की शरण में गए।

श्लोक 90 (skanda.6.216.90)

प्रोचुश्च प्रणिपत्योच्चैस्ते समेताः पितामहम् परमं दैन्यमास्थाय बाष्पगद्गदया गिरा

procuśca praṇipatyoccaiste sametāḥ pitāmaham paramaṁ dainyamāsthāya bāṣpagadgadayā girā

वे सब एकत्रित होकर, प्रणाम कर, परम दीनता को धारण कर, आँसुओं से गद्गद स्वर में पितामह ब्रह्मा से ऊँची वाणी में बोले।

श्लोक 91 (skanda.6.216.91)

भगवन्निंदुक्षये श्राद्धं प्रोक्तं मासं त्वया विभो अस्माकं प्रीणनार्थाय यत्करिष्यंति मानवाः

bhagavanniṁdukṣaye śrāddhaṁ proktaṁ māsaṁ tvayā vibho asmākaṁ prīṇanārthāya yatkariṣyaṁti mānavāḥ

उन्होंने कहा — हे भगवन्, हे विभो, आपने चन्द्रक्षय (अमावस्या) को मासभर के लिए हमारी तृप्ति हेतु जो श्राद्ध बताया था, जिसे मनुष्य करेंगे—

श्लोक 92 (skanda.6.216.92)

दौःस्थात्तदपि नो कुर्युः प्रायशस्तु पितामह तेनास्माकं परा पीडा क्षुत्पिपासासमुद्भवा

dauḥsthāttadapi no kuryuḥ prāyaśastu pitāmaha tenāsmākaṁ parā pīḍā kṣutpipāsāsamudbhavā

—हे पितामह, अपनी दुर्दशा के कारण अब उसे भी प्रायः वे नहीं करते; इसी से हमें भूख-प्यास से उत्पन्न परम पीड़ा हो रही है।

श्लोक 93 (skanda.6.216.93)

तस्मात्कुरु प्रसादं नो यथा पूर्वं सुरेश्वर तथापि दुःस्थताभाजस्तर्पयिष्यंति नोऽधुना

tasmātkuru prasādaṁ no yathā pūrvaṁ sureśvara tathāpi duḥsthatābhājastarpayiṣyaṁti no'dhunā

इसलिए हे सुरेश्वर, हम पर पूर्ववत् कृपा कीजिए, जिससे दुर्दशा में पड़े हुए लोग भी अब हमारा तर्पण कर सकें।

श्लोक 94 (skanda.6.216.94)

भर्तृयज्ञ उवाच अथ ब्रह्मापि संचिन्त्य तानुवाच कृपान्वितः युष्मदर्थं मयोपायश्चिंतितः पितरो लघुः

bhartṛyajña uvāca atha brahmāpi saṁcintya tānuvāca kṛpānvitaḥ yuṣmadarthaṁ mayopāyaściṁtitaḥ pitaro laghuḥ

भर्तृयज्ञ ने कहा — तब ब्रह्मा जी भी सोच-विचार कर, कृपा से भरकर उनसे बोले — हे पितरो, मैंने तुम्हारे लिए एक और सरल उपाय सोच लिया है।

श्लोक 95 (skanda.6.216.95)

येन तृप्तिं परां यूयं गमिष्यथ पित्रीश्वराः अमावास्योद्भवं श्राद्धमलब्ध्वापि च वत्सरम्

yena tṛptiṁ parāṁ yūyaṁ gamiṣyatha pitrīśvarāḥ amāvāsyodbhavaṁ śrāddhamalabdhvāpi ca vatsaram

हे पितृश्रेष्ठो, जिससे तुम अमावस्या को होने वाला श्राद्ध पूरे वर्षभर न मिलने पर भी परम तृप्ति को प्राप्त कर सकोगे।

श्लोक 96 (skanda.6.216.96)

यथा मम प्रसादेन तच्छृणुध्वं समाहिताः आषाढ्याः पंचमे पक्षे कन्यासंस्थे दिवाकरे

yathā mama prasādena tacchṛṇudhvaṁ samāhitāḥ āṣāḍhyāḥ paṁcame pakṣe kanyāsaṁsthe divākare

मेरी कृपा से वह उपाय कैसे है, इसे समाहितचित्त होकर सुनो — आषाढ़ के पंचम पक्ष में, सूर्य के कन्या राशि में स्थित होने पर—

श्लोक 97 (skanda.6.216.97)

मृताहनि पुनर्यो वै श्राद्धं दास्यति मानवः तस्य संवत्सरं यावत्तृप्ताः स्युः पितरो ध्रुवम्

mṛtāhani punaryo vai śrāddhaṁ dāsyati mānavaḥ tasya saṁvatsaraṁ yāvattṛptāḥ syuḥ pitaro dhruvam

—जो मनुष्य अपने पितर के मृत्यु-दिवस पर श्राद्ध देगा, उसके पितर एक वर्षभर तक निश्चय ही तृप्त रहेंगे।

श्लोक 98 (skanda.6.216.98)

एवं ज्ञात्वा करिष्यंति प्रेतपक्षे नरा भुवि श्राद्धं यूयं न संदेहो भविष्यथ सुतर्पिताः

evaṁ jñātvā kariṣyaṁti pretapakṣe narā bhuvi śrāddhaṁ yūyaṁ na saṁdeho bhaviṣyatha sutarpitāḥ

यह जानकर पृथ्वी पर मनुष्य प्रेतपक्ष में श्राद्ध करेंगे, और उससे तुम निःसंदेह भलीभाँति तृप्त हो जाओगे।

श्लोक 99 (skanda.6.216.99)

यावत्संवत्सरं तेन एकेनापि तु सत्तमाः तस्मिन्नपि च यः श्राद्धं युष्माकं न प्रदास्यति

yāvatsaṁvatsaraṁ tena ekenāpi tu sattamāḥ tasminnapi ca yaḥ śrāddhaṁ yuṣmākaṁ na pradāsyati

हे सत्तमो, उस एक ही (श्राद्ध) से एक वर्षभर के लिए तृप्ति होगी; किंतु उस समय भी जो कोई तुम्हारा श्राद्ध नहीं देगा—

श्लोक 100 (skanda.6.216.100)

शाकेनाऽपि दरिद्रोऽसावंत्यजत्वमुपेष्यति आसनं शयनं भोज्यं स्पर्शं संभाषणं तथा

śākenā'pi daridro'sāvaṁtyajatvamupeṣyati āsanaṁ śayanaṁ bhojyaṁ sparśaṁ saṁbhāṣaṇaṁ tathā

—वह दरिद्र होने पर भी यदि शाक-मात्र से भी श्राद्ध नहीं करता, तो वह अंत्यजत्व (चांडालत्व) को प्राप्त होगा; तथा आसन, शयन, भोजन, स्पर्श और वार्तालाप में भी (उसके साथ ऐसा ही व्यवहार होना चाहिए)—

श्लोक 101 (skanda.6.216.101)

ये करिष्यंति तैः सार्धं तेऽपि पापतमा नराः न तेषां संततिर्वृद्धिं संप्रयास्यति कर्हिचित्

ye kariṣyaṁti taiḥ sārdhaṁ te'pi pāpatamā narāḥ na teṣāṁ saṁtatirvṛddhiṁ saṁprayāsyati karhicit

—जो लोग भी उसके साथ ऐसा (आसन आदि साझा करना) करेंगे, वे भी अत्यंत पापी मनुष्य होंगे; उनकी संतान भी कभी वृद्धि को प्राप्त नहीं होगी।

श्लोक 102 (skanda.6.216.102)

न सुखं धनधान्यं च तेषां भावि कथंचन तस्माद्गच्छत चाव्यग्राः स्वस्थानं पितरो द्रुतम्

na sukhaṁ dhanadhānyaṁ ca teṣāṁ bhāvi kathaṁcana tasmādgacchata cāvyagrāḥ svasthānaṁ pitaro drutam

उन्हें सुख और धन-धान्य भी कभी प्राप्त नहीं होंगे। इसलिए हे पितरो, अब निश्चिंत होकर शीघ्र अपने-अपने स्थानों को जाओ।

श्लोक 103 (skanda.6.216.103)

कलिकालेऽपि संप्राप्ते दारुणे निर्धने जने वर्षांते श्राद्धमेकं हि प्रकरिष्यंति मानवाः

kalikāle'pi saṁprāpte dāruṇe nirdhane jane varṣāṁte śrāddhamekaṁ hi prakariṣyaṁti mānavāḥ

कलियुग के भयंकर आने पर और प्रजा के निर्धन हो जाने पर भी, मनुष्य वर्ष के अंत में एक श्राद्ध तो अवश्य करेंगे—

श्लोक 104 (skanda.6.216.104)

येनाखिलं भवेद्वर्षं युष्माकं प्रीतिरुत्तमा

yenākhilaṁ bhavedvarṣaṁ yuṣmākaṁ prītiruttamā

—जिससे तुम्हें सम्पूर्ण वर्षभर उत्तम प्रीति प्राप्त होगी।

श्लोक 105 (skanda.6.216.105)

भर्तृयज्ञ उवाच तच्छ्रुत्वा पितरो हृष्टा जग्मुः स्वंस्वं निकेतनम् वर्षांतेऽपि समासाद्य श्राद्धं न स्युर्बुभुक्षिताः

bhartṛyajña uvāca tacchrutvā pitaro hṛṣṭā jagmuḥ svaṁsvaṁ niketanam varṣāṁte'pi samāsādya śrāddhaṁ na syurbubhukṣitāḥ

भर्तृयज्ञ ने कहा — यह सुनकर पितर हर्षित होकर अपने-अपने निवासस्थान को चले गए; वर्ष के अंत में भी श्राद्ध पाकर वे भूखे न रहे।

श्लोक 106 (skanda.6.216.106)

अथ येऽत्र दुरात्मानो निःशंकाः कृपणात्मकाः कलिना मोहिताः श्राद्धं वत्सरांतेऽपि नो ददुः

atha ye'tra durātmāno niḥśaṁkāḥ kṛpaṇātmakāḥ kalinā mohitāḥ śrāddhaṁ vatsarāṁte'pi no daduḥ

किंतु जो कोई यहाँ निःशंक और कृपण दुरात्मा थे, वे कलि के प्रभाव से मोहित होकर वर्ष के अंत में भी श्राद्ध नहीं देते थे।

श्लोक 107 (skanda.6.216.107)

तेषां तु पितरो भूयो दिव्यैः पितृभिरन्विताः ब्रह्माणं शरणं जग्मुः प्रोचुस्ते दीनमानसाः

teṣāṁ tu pitaro bhūyo divyaiḥ pitṛbhiranvitāḥ brahmāṇaṁ śaraṇaṁ jagmuḥ procuste dīnamānasāḥ

उनके पितर, दिव्य पितरों सहित, फिर से ब्रह्मा जी की शरण में गए, और दीनमन होकर बोले।

श्लोक 108 (skanda.6.216.108)

भगवन्वत्सरांतेऽपि कन्यासंस्थे दिवाकरे नास्माकं वंशजाः श्राद्धं प्रयच्छंति दुरात्मकाः

bhagavanvatsarāṁte'pi kanyāsaṁsthe divākare nāsmākaṁ vaṁśajāḥ śrāddhaṁ prayacchaṁti durātmakāḥ

उन्होंने कहा — हे भगवन्, वर्ष के अंत में, सूर्य के कन्या राशि में होने पर भी, हमारे वे दुरात्मा वंशज श्राद्ध नहीं देते।

श्लोक 109 (skanda.6.216.109)

तेन संपीडिता देव क्षुत्पिपासासमाकुलाः वयं शरणमापन्नास्तत्प्रतीकारमाचर

tena saṁpīḍitā deva kṣutpipāsāsamākulāḥ vayaṁ śaraṇamāpannāstatpratīkāramācara

हे देव, उससे पीड़ित और भूख-प्यास से व्याकुल होकर हम शरण में आए हैं; इसका प्रतिकार कीजिए।

श्लोक 110 (skanda.6.216.110)

यथा पूर्वं महाभाग वदोपायं लघूत्तमम् एकाहिकेन श्राद्धेन येनास्माकं हि शाश्वती प्रीतिः संजायते देव त्वत्प्रसादात्सुरेश्वर

yathā pūrvaṁ mahābhāga vadopāyaṁ laghūttamam ekāhikena śrāddhena yenāsmākaṁ hi śāśvatī prītiḥ saṁjāyate deva tvatprasādātsureśvara

हे महाभाग, हे सुरेश्वर, पहले की तरह अब भी कोई सरलतम उपाय बताइए, जिससे केवल एक दिन के श्राद्ध से ही, हे देव, आपकी कृपा से हमें शाश्वत प्रीति प्राप्त हो सके।

श्लोक 111 (skanda.6.216.111)

वंशक्षयेऽपि संजाते ह्यस्माकं पतनं भवेत्

vaṁśakṣaye'pi saṁjāte hyasmākaṁ patanaṁ bhavet

अन्यथा वंश का उच्छेद हो जाने पर हमारा पतन ही होगा।

श्लोक 112 (skanda.6.216.112)

भर्तृयज्ञ उवाच तेषां तद्वचनं श्रुत्वा चिरं ध्यात्वा पितामहः कृपया परयाविष्टस्ततः प्रोवाच सादरम्

bhartṛyajña uvāca teṣāṁ tadvacanaṁ śrutvā ciraṁ dhyātvā pitāmahaḥ kṛpayā parayāviṣṭastataḥ provāca sādaram

भर्तृयज्ञ ने कहा — उनकी यह बात सुनकर पितामह ब्रह्मा जी बहुत देर तक विचार कर, परम कृपा से भरकर आदरपूर्वक बोले।

श्लोक 113 (skanda.6.216.113)

ब्रह्मोवाच अन्यो युष्मत्प्रतुष्ट्यर्थमुपायश्चिंतितो मया स लघुर्येन वोऽत्यंतं तृप्तिर्भवति शाश्वती

brahmovāca anyo yuṣmatpratuṣṭyarthamupāyaściṁtito mayā sa laghuryena vo'tyaṁtaṁ tṛptirbhavati śāśvatī

ब्रह्मा जी ने कहा — मैंने तुम्हारी संतुष्टि के लिए एक और उपाय सोचा है, जो अत्यंत सरल है और जिससे तुम्हें शाश्वत परम तृप्ति प्राप्त होगी।

श्लोक 114 (skanda.6.216.114)

गयाशिरः समासाद्य श्राद्धं दास्यंति येऽत्र वः अप्येकं तत्प्रभावेन दिव्यां गतिमवाप्स्यथ

gayāśiraḥ samāsādya śrāddhaṁ dāsyaṁti ye'tra vaḥ apyekaṁ tatprabhāvena divyāṁ gatimavāpsyatha

गयाशिर तीर्थ में जाकर जो कोई भी तुम्हारे लिए एक ही बार श्राद्ध देगा, उसके प्रभाव से तुम दिव्य गति को प्राप्त कर लोगे।

श्लोक 115 (skanda.6.216.115)

अपि पापात्मनः पुंसो ब्रह्मघ्नस्यापि देहिनः अपि रौरवसंस्थस्य कुम्भीपाकगतस्य च

api pāpātmanaḥ puṁso brahmaghnasyāpi dehinaḥ api rauravasaṁsthasya kumbhīpākagatasya ca

चाहे वह पापात्मा हो, ब्रह्महत्यारा हो, चाहे रौरव नरक में पड़ा हो या कुंभीपाक में—

श्लोक 116 (skanda.6.216.116)

प्रेतभावगतस्यापि यस्य श्राद्धं प्रदास्यति गयाशिरसि वंशस्थस्तस्य मुक्तिर्भविष्यति

pretabhāvagatasyāpi yasya śrāddhaṁ pradāsyati gayāśirasi vaṁśasthastasya muktirbhaviṣyati

—चाहे वह प्रेतभाव को प्राप्त हुआ हो, जिसके लिए भी उसका वंशज गयाशिर में श्राद्ध देगा, उसकी मुक्ति हो जाएगी।

श्लोक 117 (skanda.6.216.117)

एतन्मम वचः श्रुत्वा सांप्रतं भुवि मानवाः निःस्वा अपि करिष्यंति श्राद्धमेकं हि तत्र च गयाशिरसि सुव्यक्तं युष्माकं मुक्तिदायकम्

etanmama vacaḥ śrutvā sāṁprataṁ bhuvi mānavāḥ niḥsvā api kariṣyaṁti śrāddhamekaṁ hi tatra ca gayāśirasi suvyaktaṁ yuṣmākaṁ muktidāyakam

मेरा यह वचन सुनकर अब पृथ्वी पर धनहीन मनुष्य भी वहाँ केवल एक ही बार श्राद्ध करेंगे; गयाशिर में किया गया यह श्राद्ध निश्चित रूप से तुम्हें मुक्ति देने वाला होगा।

श्लोक 118 (skanda.6.216.118)

भर्तृयज्ञ उवाच तच्छ्रुत्वा पितरस्तस्य वचनं परमेष्ठिनः अनुज्ञातास्ततस्तेन स्वानि स्थानानि भेजिरे

bhartṛyajña uvāca tacchrutvā pitarastasya vacanaṁ parameṣṭhinaḥ anujñātāstatastena svāni sthānāni bhejire

भर्तृयज्ञ ने कहा — परमेष्ठी ब्रह्मा जी का यह वचन सुनकर, उनसे विदा लेकर पितर अपने-अपने स्थानों को चले गए।

श्लोक 119 (skanda.6.216.119)

ततःप्रभृति श्राद्धानि प्रवृत्तानि धरातले पिंडदानसमे तानि यावदापुरुषत्रयम्

tataḥprabhṛti śrāddhāni pravṛttāni dharātale piṁḍadānasame tāni yāvadāpuruṣatrayam

तभी से पृथ्वी पर पिण्डदान के समान ये श्राद्ध प्रचलित हो गए, जो तीन पीढ़ियों तक किए जाते हैं।

श्लोक 120 (skanda.6.216.120)

पूर्वं ब्रह्मादितः कृत्वा ये केचित्पुरुषा गताः परलोकं समुद्दिश्य तान्नराञ्छक्तितो नृप

pūrvaṁ brahmāditaḥ kṛtvā ye kecitpuruṣā gatāḥ paralokaṁ samuddiśya tānnarāñchaktito nṛpa

हे राजन्, ब्रह्मा जी से लेकर पहले जो भी मनुष्य परलोक को चले गए, उन सबको लक्ष्य करके, अपनी शक्ति के अनुसार—

श्लोक 121 (skanda.6.216.121)

तत्संख्यानां द्विजेंद्राणां दत्तवंतोऽपि वांछितम् अदैवत्यमिदं श्राद्धं दरिद्राणां सुखावहम्

tatsaṁkhyānāṁ dvijeṁdrāṇāṁ dattavaṁto'pi vāṁchitam adaivatyamidaṁ śrāddhaṁ daridrāṇāṁ sukhāvaham

—उतनी ही संख्या में श्रेष्ठ ब्राह्मणों को अभीष्ट दान देने से भी वही फल मिलता है; यह देवतारहित श्राद्ध दरिद्रों के लिए भी सुखदायक है।

श्लोक 122 (skanda.6.216.122)

पितॄणां देवतानां च मनुष्याणां सुतृप्तिदम् तस्माच्छ्राद्धं प्रकर्तव्यं पुरुषेण विजानता

pitṝṇāṁ devatānāṁ ca manuṣyāṇāṁ sutṛptidam tasmācchrāddhaṁ prakartavyaṁ puruṣeṇa vijānatā

यह पितरों, देवताओं और मनुष्यों — सभी को भलीभाँति तृप्ति देने वाला है; इसलिए ज्ञानी पुरुष को श्राद्ध अवश्य करना चाहिए।

श्लोक 123 (skanda.6.216.123)

पितॄणां वांछता तृप्तिं कालेष्वेतेषु यत्नतः गयायां च विशेषेण लोकद्वयमभीप्सता

pitṝṇāṁ vāṁchatā tṛptiṁ kāleṣveteṣu yatnataḥ gayāyāṁ ca viśeṣeṇa lokadvayamabhīpsatā

पितरों की तृप्ति चाहने वाले को इन सब कालों में यत्नपूर्वक श्राद्ध करना चाहिए, और दोनों लोकों की कामना करने वाले को विशेष रूप से गया में।

श्लोक 124 (skanda.6.216.124)

न ददाति नरः श्राद्धं पितॄणां चन्द्रसंक्षये क्षुत्पिपासापरीतांगाः पितरस्तस्य दुःखिताः

na dadāti naraḥ śrāddhaṁ pitṝṇāṁ candrasaṁkṣaye kṣutpipāsāparītāṁgāḥ pitarastasya duḥkhitāḥ

यदि मनुष्य चन्द्रक्षय (अमावस्या) पर अपने पितरों को श्राद्ध नहीं देता, तो उसके पितर भूख-प्यास से घिरे हुए दुःखी होते हैं।

श्लोक 125 (skanda.6.216.125)

प्रेतपक्षं प्रतीक्षंते गुरुवांछासमन्विताः कर्षुका जलदं यद्वद्दिवानक्तमतंद्रिताः

pretapakṣaṁ pratīkṣaṁte guruvāṁchāsamanvitāḥ karṣukā jaladaṁ yadvaddivānaktamataṁdritāḥ

वे उस समय गहन इच्छा से युक्त होकर प्रेतपक्ष की प्रतीक्षा करते हैं, जैसे किसान दिन-रात अथक होकर वर्षा के बादल की प्रतीक्षा करते हैं।

श्लोक 126 (skanda.6.216.126)

प्रेतपक्षे व्यतिक्रांते यावत्कन्यां गतो रविः तावच्छ्राद्धं च वांछंति दत्तं स्वैः पितरः सुतैः

pretapakṣe vyatikrāṁte yāvatkanyāṁ gato raviḥ tāvacchrāddhaṁ ca vāṁchaṁti dattaṁ svaiḥ pitaraḥ sutaiḥ

प्रेतपक्ष के भी बीत जाने पर, जब तक सूर्य कन्या राशि में रहता है, तब तक पितर अपने पुत्रों द्वारा दिए गए श्राद्ध की कामना करते रहते हैं।

श्लोक 127 (skanda.6.216.127)

ततस्तुलागतेप्येके सूर्ये वांछंति पार्थिव श्राद्धं स्ववंशजैर्दत्तं क्षुत्पिपासासमाकुलाः

tatastulāgatepyeke sūrye vāṁchaṁti pārthiva śrāddhaṁ svavaṁśajairdattaṁ kṣutpipāsāsamākulāḥ

हे राजन्, फिर सूर्य के तुला राशि में जाने पर भी कुछ पितर, भूख-प्यास से व्याकुल होकर, अपने वंशजों द्वारा दिए गए श्राद्ध की कामना करते रहते हैं।

श्लोक 128 (skanda.6.216.128)

तस्मिन्नपि व्यतिक्रांते काले चांलिं गते रवौ निराशाः पितरो दीनास्ततो यांति निजालयम्

tasminnapi vyatikrāṁte kāle cāṁliṁ gate ravau nirāśāḥ pitaro dīnāstato yāṁti nijālayam

उस काल के भी बीत जाने पर, सूर्य के तुला राशि से भी आगे जाने पर, निराश और दीन पितर तब अपने-अपने निवास को चले जाते हैं।

श्लोक 129 (skanda.6.216.129)

मासद्वयं प्रतीक्षंते गृहद्वारं समाश्रिताः वायुभूताः पिपासार्ताः क्षुत्क्षामाः पितरो नृणाम्

māsadvayaṁ pratīkṣaṁte gṛhadvāraṁ samāśritāḥ vāyubhūtāḥ pipāsārtāḥ kṣutkṣāmāḥ pitaro nṛṇām

मनुष्यों के वे पितर वायुरूप होकर, प्यास से व्याकुल और भूख से कृश होकर, घर के द्वार पर आश्रय लिए दो मासभर प्रतीक्षा करते रहते हैं।

श्लोक 130 (skanda.6.216.130)

यावत्कन्यागतः सूर्यस्तुलास्थश्च महीपते तथा दर्शदिने तद्वद्ब्रह्मणो वचनान्नृप

yāvatkanyāgataḥ sūryastulāsthaśca mahīpate tathā darśadine tadvadbrahmaṇo vacanānnṛpa

हे राजन्, हे महीपते, जब तक सूर्य कन्या और तुला राशि में रहता है, तथा अमावस्या के दिन भी, ब्रह्मा जी के वचन के अनुसार यही स्थिति रहती है।

श्लोक 131 (skanda.6.216.131)

तस्माच्छ्राद्धं सदा कार्यं पितॄणां तृप्तिमिच्छता तिलोदकं विशेषेण यथा ब्रह्मवचो नृप

tasmācchrāddhaṁ sadā kāryaṁ pitṝṇāṁ tṛptimicchatā tilodakaṁ viśeṣeṇa yathā brahmavaco nṛpa

हे राजन्, इसलिए पितरों की तृप्ति चाहने वाले को सदा श्राद्ध करना चाहिए, और विशेषतः तिलोदक (तिल-मिश्रित जलांजलि) देना चाहिए, जैसा ब्रह्मा जी का वचन है।

श्लोक 132 (skanda.6.216.132)

वित्ताभावेऽपि दर्शायां श्राद्धं देयं विपश्चिता तदभावे च कन्यायां संस्थिते दिवसाधिपे

vittābhāve'pi darśāyāṁ śrāddhaṁ deyaṁ vipaścitā tadabhāve ca kanyāyāṁ saṁsthite divasādhipe

धन के अभाव में भी बुद्धिमान पुरुष को अमावस्या को श्राद्ध देना चाहिए; उसके भी अभाव में, सूर्य के कन्या राशि में स्थित होने पर देना चाहिए।

श्लोक 133 (skanda.6.216.133)

तदभावे गयायां च सकृच्छ्राद्धं हि निर्वपेत् येन नित्यं प्रदत्तस्य श्राद्धस्य फलमश्नुते

tadabhāve gayāyāṁ ca sakṛcchrāddhaṁ hi nirvapet yena nityaṁ pradattasya śrāddhasya phalamaśnute

उसके भी अभाव में गया में एक बार श्राद्ध कर देना चाहिए, जिससे नित्य दिए गए श्राद्ध का फल मिल जाता है।

श्लोक 134 (skanda.6.216.134)

एतत्ते सर्वमाख्यातं यत्पृष्टोऽस्मि नराधिप येनैतत्क्रियते श्राद्धं जनैः पितृपरायणैः

etatte sarvamākhyātaṁ yatpṛṣṭo'smi narādhipa yenaitatkriyate śrāddhaṁ janaiḥ pitṛparāyaṇaiḥ

हे नराधिप, आपने जो पूछा था, वह सब मैंने बता दिया — जिस विधि से पितृभक्त लोगों द्वारा यह श्राद्ध किया जाता है।

श्लोक 135 (skanda.6.216.135)

अमावास्यां विशेषेण प्रेतपक्षे च पार्थिव

amāvāsyāṁ viśeṣeṇa pretapakṣe ca pārthiva

हे राजन्, विशेषतः अमावस्या को और प्रेतपक्ष में भी (यह किया जाता है)।

श्लोक 136 (skanda.6.216.136)

यश्चैतां शृणुयात्पुण्यां श्राद्धोत्पत्तिं पठेच्च वा स सर्वदोषनिर्मुक्तः श्राद्धदानफलं लभेत्

yaścaitāṁ śṛṇuyātpuṇyāṁ śrāddhotpattiṁ paṭhecca vā sa sarvadoṣanirmuktaḥ śrāddhadānaphalaṁ labhet

जो कोई भी इस पवित्र श्राद्धोत्पत्ति-कथा को सुनता है या पढ़ता है, वह सब दोषों से मुक्त होकर श्राद्धदान का फल प्राप्त करता है।

श्लोक 137 (skanda.6.216.137)

श्राद्धकाले पठेद्यस्तु श्राद्धोत्पत्तिमिमां नरः अक्षयं तद्भवेच्छ्राद्धं सर्वच्छिद्रविवर्जितम्

śrāddhakāle paṭhedyastu śrāddhotpattimimāṁ naraḥ akṣayaṁ tadbhavecchrāddhaṁ sarvacchidravivarjitam

श्राद्ध के समय जो मनुष्य इस श्राद्धोत्पत्ति-कथा को पढ़ता है, उसका वह श्राद्ध सब त्रुटियों से रहित होकर अक्षय हो जाता है।

श्लोक 138 (skanda.6.216.138)

असद्द्रव्येण वा चीर्णमनर्हैर्ब्राह्मणैरपि अभुक्तं कामहीनं वा मन्त्रहीनमथापि वा

asaddravyeṇa vā cīrṇamanarhairbrāhmaṇairapi abhuktaṁ kāmahīnaṁ vā mantrahīnamathāpi vā

चाहे वह अशुद्ध द्रव्यों से किया गया हो, अयोग्य ब्राह्मणों द्वारा किया गया हो, अधूरा भोजन कराया गया हो, इच्छारहित हो, या मंत्ररहित भी हो—

श्लोक 139 (skanda.6.216.139)

सर्वं संपूर्णतां याति कीर्तनात्पार्थिवोत्तम अस्याः श्राद्धसमुत्पत्तेः कीर्तनाच्छ्रवणादपि

sarvaṁ saṁpūrṇatāṁ yāti kīrtanātpārthivottama asyāḥ śrāddhasamutpatteḥ kīrtanācchravaṇādapi

हे राजोत्तम, इस श्राद्धोत्पत्ति की कथा के कीर्तन मात्र से, अथवा उसके श्रवण मात्र से भी, वह सब कुछ पूर्णता को प्राप्त हो जाता है।

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