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नागर खण्ड · अध्याय 22

बालमण्डनतीर्थमाहात्म्य

अध्याय 21अध्याय-सूचीअध्याय 23

श्लोक 1 (skanda.6.22.1)

ऋषय ऊचुः। यदेतद्भवता प्रोक्तं तीर्थे शक्रसमुद्भवम्। स्वामिद्रोहकृतात्पापान्निर्मुक्तो यत्र लक्ष्मणः

ṛṣaya ūcuḥ| yadetadbhavatā proktaṁ tīrthe śakrasamudbhavam| svāmidrohakṛtātpāpānnirmukto yatra lakṣmaṇaḥ

ऋषियों ने कहा -- आपने जिस शक्र-संबंधी तीर्थ की बात कही, जहाँ इंद्र स्वामि-द्रोह (माता के प्रति किए गए द्रोह) के पाप से मुक्त हुआ था --

श्लोक 2 (skanda.6.22.2)

कथं तत्र पुरा शक्रः स्वामिद्रोहसमुद्भवात्। पातकादेव निर्मुक्तः कस्मिन्काले च सूतज

kathaṁ tatra purā śakraḥ svāmidrohasamudbhavāt| pātakādeva nirmuktaḥ kasminkāle ca sūtaja

हे सूतनंदन! वहाँ पूर्वकाल में शक्र उस स्वामि-द्रोह से उत्पन्न पाप से किस प्रकार और किस समय मुक्त हुआ था?

श्लोक 3 (skanda.6.22.3)

कस्माद्दितेर्महेन्द्रेण कृतं कृत्यं तथाविधम्। येन संसूदितो गर्भः सर्वं विस्तरतो वद

kasmādditermahendreṇa kṛtaṁ kṛtyaṁ tathāvidham| yena saṁsūdito garbhaḥ sarvaṁ vistarato vada

महेंद्र ने दिति के साथ ऐसा कार्य क्यों किया जिससे उसका गर्भ नष्ट हो गया? यह सब विस्तार से बताइए।

श्लोक 4 (skanda.6.22.4)

सूत उवाच। ब्रह्मणो दक्षिणांगुष्ठाज्जज्ञे दक्षः प्रजापतिः। स च संजनयामास पञ्चाशत्कन्यकाः शुभाः

sūta uvāca| brahmaṇo dakṣiṇāṁguṣṭhājjajñe dakṣaḥ prajāpatiḥ| sa ca saṁjanayāmāsa pañcāśatkanyakāḥ śubhāḥ

सूत जी ने कहा -- ब्रह्मा के दाहिने अंगूठे से प्रजापति दक्ष उत्पन्न हुए; उन्होंने पचास सुंदर कन्याओं को जन्म दिया।

श्लोक 5 (skanda.6.22.5)

ददौ च दश धर्माय कश्यपाय त्रयोदश। दिव्येन विधिना दक्षः सप्तविंशतिमिंदवे

dadau ca daśa dharmāya kaśyapāya trayodaśa| divyena vidhinā dakṣaḥ saptaviṁśatimiṁdave

दक्ष ने दस कन्याएँ धर्म को, तेरह कश्यप को और सत्ताईस दिव्य विधि से चंद्रमा को दे दीं।

श्लोक 6 (skanda.6.22.6)

अदितिश्च दितिश्चैव द्वे भार्ये मुख्यतां गते। कश्यपस्य द्विजश्रेष्ठाः प्राणेभ्योऽपि प्रिये सदा

aditiśca ditiścaiva dve bhārye mukhyatāṁ gate| kaśyapasya dvijaśreṣṭhāḥ prāṇebhyo'pi priye sadā

हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! अदिति और दिति -- ये दो कश्यप की मुख्य पत्नियाँ हुईं, जो उन्हें सदा अपने प्राणों से भी अधिक प्रिय थीं।

श्लोक 7 (skanda.6.22.7)

ततः स जनयामास देवाञ्छक्रपुरःसरान्। अदित्यां चैव दैत्यांश्च दित्यां स बलवत्तरान्

tataḥ sa janayāmāsa devāñchakrapuraḥsarān| adityāṁ caiva daityāṁśca dityāṁ sa balavattarān

तब उन्होंने अदिति से इंद्र आदि देवताओं को जन्म दिया, और दिति से उनसे भी अधिक बलवान दैत्यों को जन्म दिया।

श्लोक 8 (skanda.6.22.8)

तेषां त्रैलोक्यराज्यार्थं मिथो जज्ञे महाहवः। तत्र शक्रेण ते दैत्याः संग्रामे विनिपातिताः

teṣāṁ trailokyarājyārthaṁ mitho jajñe mahāhavaḥ| tatra śakreṇa te daityāḥ saṁgrāme vinipātitāḥ

त्रैलोक्य के राज्य के लिए उनके बीच परस्पर महायुद्ध हुआ, जिसमें शक्र ने उन दैत्यों को संग्राम में मार गिराया।

श्लोक 9 (skanda.6.22.9)

ततः शोकपरा चक्रे दितिर्व्रतमनुत्तमम्। पुत्रार्थं नियमोपेता क्षेत्रेऽत्रैव समाहिता

tataḥ śokaparā cakre ditirvratamanuttamam| putrārthaṁ niyamopetā kṣetre'traiva samāhitā

तब शोक से भरी दिति ने पुत्र-प्राप्ति के लिए नियमपूर्वक और मन को एकाग्र करके इसी क्षेत्र में एक सर्वोत्तम व्रत धारण किया।

श्लोक 10 (skanda.6.22.10)

ततो वर्षसहस्रांते तस्यास्तुष्टो महेश्वरः। उवाच परितुष्टोऽस्मि वरं प्रार्थय वांछितम्

tato varṣasahasrāṁte tasyāstuṣṭo maheśvaraḥ| uvāca parituṣṭo'smi varaṁ prārthaya vāṁchitam

तब एक हजार वर्ष बीतने पर महेश्वर उससे प्रसन्न हुए और बोले -- मैं संतुष्ट हूँ, तू अपना इच्छित वर माँग।

श्लोक 11 (skanda.6.22.11)

साऽब्रवीद्यदि मे तुष्टस्त्वं देव शशिशेखर। तत्पुत्रं देहि देवानां सर्वेषां बलवत्तरम्। यज्ञभागप्रभोक्तारं देवानां दर्पनाशनम्

sā'bravīdyadi me tuṣṭastvaṁ deva śaśiśekhara| tatputraṁ dehi devānāṁ sarveṣāṁ balavattaram| yajñabhāgaprabhoktāraṁ devānāṁ darpanāśanam

उसने कहा -- हे चंद्रशेखर देव! यदि आप मुझसे प्रसन्न हैं, तो मुझे ऐसा पुत्र दीजिए जो समस्त देवताओं से भी बलवान हो, यज्ञ-भाग का भोक्ता हो और देवताओं के अभिमान का नाश करने वाला हो।

श्लोक 12 (skanda.6.22.12)

अवध्यं संगरे पूर्वैः सर्वैदेवैः सवासवैः। स तथेति प्रतिज्ञाय जगामादर्शनं हरः

avadhyaṁ saṁgare pūrvaiḥ sarvaidevaiḥ savāsavaiḥ| sa tatheti pratijñāya jagāmādarśanaṁ haraḥ

जो युद्ध में इंद्र सहित समस्त पूर्व देवताओं के लिए भी अवध्य हो। 'ऐसा ही होगा' कहकर हर वहाँ से अदृश्य हो गए।

श्लोक 13 (skanda.6.22.13)

दितिश्चैवाऽदधाद्गर्भं कश्यपान्मुनिपुंगवात्। ततः शक्रो भयं चक्रे ज्ञात्वा तं गर्भसंभवम्। वदतो मुनिमुख्यस्य नारदस्य महात्मनः

ditiścaivā'dadhādgarbhaṁ kaśyapānmunipuṁgavāt| tataḥ śakro bhayaṁ cakre jñātvā taṁ garbhasaṁbhavam| vadato munimukhyasya nāradasya mahātmanaḥ

तब दिति ने मुनिश्रेष्ठ कश्यप से गर्भ धारण किया; महामुनि नारद के वचनों से उस गर्भ की उत्पत्ति को जानकर शक्र को भय हुआ।

श्लोक 14 (skanda.6.22.14)

ततो दुष्टां मतिं कृत्वा तस्य गर्भस्य नाशने। चक्रे तस्याः स शुश्रूषां दिवारात्रमतंद्रितः

tato duṣṭāṁ matiṁ kṛtvā tasya garbhasya nāśane| cakre tasyāḥ sa śuśrūṣāṁ divārātramataṁdritaḥ

तब उस गर्भ को नष्ट करने का दुष्ट विचार बनाकर, वह दिन-रात बिना आलस्य के उसकी सेवा करने लगा।

श्लोक 15 (skanda.6.22.15)

छिद्रमन्वेषमाणस्तु सुसूक्ष्ममपि च द्विजाः। न तस्या लभते क्वाऽपि गता मासा नवैव तु

chidramanveṣamāṇastu susūkṣmamapi ca dvijāḥ| na tasyā labhate kvā'pi gatā māsā navaiva tu

हे ब्राह्मणो! अत्यंत सूक्ष्म-सा भी कोई छिद्र (अवसर) खोजते हुए भी उसे कहीं न मिला, और इस प्रकार नौ महीने बीत गए।

श्लोक 16 (skanda.6.22.16)

ततश्च दशमे मासि संप्राप्ते प्रसवोद्भवे। गर्भालसा निशावक्त्रे सुप्ता सा दक्षिणामुखी

tataśca daśame māsi saṁprāpte prasavodbhave| garbhālasā niśāvaktre suptā sā dakṣiṇāmukhī

फिर दसवें महीने में, जब प्रसव का समय निकट आया, गर्भ से थकी हुई वह रात्रि के प्रारंभ में दक्षिण दिशा की ओर मुख करके सो गई।

श्लोक 17 (skanda.6.22.17)

निद्रावशं तु संप्राप्ता विसंज्ञा समपद्यत। शक्रहस्तावमर्दोत्थपादसौख्येन निश्चला

nidrāvaśaṁ tu saṁprāptā visaṁjñā samapadyata| śakrahastāvamardotthapādasaukhyena niścalā

नींद के वशीभूत होकर वह अचेत हो गई, और शक्र द्वारा पैर दबाए जाने के सुख से निश्चल पड़ी रही।

श्लोक 18 (skanda.6.22.18)

तां विसंज्ञामथो वीक्ष्य त्यक्त्वा पादौ शतक्रतुः। प्रविवेशोदरं तस्यास्तीक्ष्णं शस्त्रं करे दधत्। तेनाऽसौ सप्तधा चके गर्भं शस्त्रेण देवपः

tāṁ visaṁjñāmatho vīkṣya tyaktvā pādau śatakratuḥ| praviveśodaraṁ tasyāstīkṣṇaṁ śastraṁ kare dadhat| tenā'sau saptadhā cake garbhaṁ śastreṇa devapaḥ

उसे अचेत देखकर शतक्रतु ने उसके पैर छोड़ दिए और हाथ में तीक्ष्ण शस्त्र लेकर उसके गर्भ में प्रवेश किया; उस देवराज ने उस शस्त्र से गर्भ के सात टुकड़े कर दिए।

श्लोक 19 (skanda.6.22.19)

अथाऽपश्यत्क्षणात्सप्त बालकान्पूर्णविग्रहान्। ततस्तानपि सप्तैव सप्तधा कृतवान्हरिः

athā'paśyatkṣaṇātsapta bālakānpūrṇavigrahān| tatastānapi saptaiva saptadhā kṛtavānhariḥ

तभी उसने तुरंत सात पूर्ण-शरीर वाले बालक देखे; तब हरि (इंद्र) ने उन सातों को भी पुनः सात-सात टुकड़ों में काट डाला।

श्लोक 20 (skanda.6.22.20)

जाता एकोनपञ्चाशदथ तत्रैव बालकाः। तान्दृष्ट्वा वृद्धिमापन्नांस्ततो भीतः शतक्रतुः। निश्चक्रामोदरातूर्णं दित्या यावन्न लक्षितः

jātā ekonapañcāśadatha tatraiva bālakāḥ| tāndṛṣṭvā vṛddhimāpannāṁstato bhītaḥ śatakratuḥ| niścakrāmodarātūrṇaṁ dityā yāvanna lakṣitaḥ

इस प्रकार वहीं उनतालीस (उनचास) बालक उत्पन्न हो गए; उन्हें बढ़ता हुआ देखकर भयभीत शतक्रतु दिति के जानने से पहले ही शीघ्रता से उसके गर्भ से बाहर निकल आया।

श्लोक 21 (skanda.6.22.21)

ततः प्रभाते विमले प्रोद्गते रविमंडले। दितिः संजनयामास सप्तधा सप्त बालकान्

tataḥ prabhāte vimale prodgate ravimaṁḍale| ditiḥ saṁjanayāmāsa saptadhā sapta bālakān

फिर स्वच्छ प्रातःकाल में सूर्यमंडल के उदय होने पर, दिति ने सात-सात करके उन सात गुना बालकों को जन्म दिया।

श्लोक 22 (skanda.6.22.22)

ततोऽभ्येत्य सहस्राक्षो दुर्गंधेन समावृतः। निस्तेजा म्लानवक्त्रश्च लज्जयाऽधोमुखः स्थितः

tato'bhyetya sahasrākṣo durgaṁdhena samāvṛtaḥ| nistejā mlānavaktraśca lajjayā'dhomukhaḥ sthitaḥ

तब सहस्राक्ष इंद्र दुर्गंध से घिरा हुआ, तेजहीन और म्लान मुख लिए, लज्जा से सिर झुकाए हुए वहाँ आ खड़ा हुआ।

श्लोक 23 (skanda.6.22.23)

तं दृष्ट्वा तादृशं शक्रं दितिः प्रोवाच सादरम्। प्रणतं संस्थितं पार्श्वे भयव्याकुलचेतसम्

taṁ dṛṣṭvā tādṛśaṁ śakraṁ ditiḥ provāca sādaram| praṇataṁ saṁsthitaṁ pārśve bhayavyākulacetasam

उस अवस्था में खड़े, भय से व्याकुल-चित्त और पास में झुके हुए शक्र को देखकर दिति ने आदरपूर्वक कहा --

श्लोक 24 (skanda.6.22.24)

किं त्वं शक्र निरुत्साहस्तेजोद्युतिविवर्जितः। शरीरात्तव दुर्गन्धः कस्मादीदृक्प्रजायते

kiṁ tvaṁ śakra nirutsāhastejodyutivivarjitaḥ| śarīrāttava durgandhaḥ kasmādīdṛkprajāyate

हे शक्र! तुम इस प्रकार उत्साहहीन और तेज-कांति से रहित क्यों हो? तुम्हारे शरीर से ऐसी दुर्गंध क्यों निकल रही है?

श्लोक 25 (skanda.6.22.25)

किं त्वया निहतो विप्रो गुरुर्वा बालकोऽथवा। नारी वा येन ते नष्टं तेजो गात्रसमुद्भवम्

kiṁ tvayā nihato vipro gururvā bālako'thavā| nārī vā yena te naṣṭaṁ tejo gātrasamudbhavam

क्या तुमने किसी ब्राह्मण, गुरु, बालक या स्त्री का वध किया है, जिससे तुम्हारे शरीर का तेज नष्ट हो गया?

श्लोक 26 (skanda.6.22.26)

हतो नखांभसा वा त्वं घृष्टः शूर्पानिलेन च। अजामार्जनिकोत्थैश्च रजोभिर्वा समाश्रितः

hato nakhāṁbhasā vā tvaṁ ghṛṣṭaḥ śūrpānilena ca| ajāmārjanikotthaiśca rajobhirvā samāśritaḥ

या तुम नाखून के जल से आहत हुए हो, सूप की हवा से रगड़े गए हो, या बकरी अथवा झाड़ू से उठी हुई धूल से आश्रित हुए हो?

श्लोक 27 (skanda.6.22.27)

शक्र उवाच। सत्यमेतन्महाभागे यत्त्वयोक्तोऽस्मि सांप्रतम्। रात्रौ प्रविष्टः सुप्ताया जठरे तव पापकृत्

śakra uvāca| satyametanmahābhāge yattvayokto'smi sāṁpratam| rātrau praviṣṭaḥ suptāyā jaṭhare tava pāpakṛt

शक्र ने कहा -- हे महाभागे! तुमने अभी जो कहा, वह सत्य है; रात्रि में, तुम्हारे सोते समय, मैं पापी तुम्हारे गर्भ में प्रविष्ट हुआ था।

श्लोक 28 (skanda.6.22.28)

कृन्तश्चैकोनपञ्चाशत्कृत्वो गर्भो मया शुभे। तावन्मात्रास्ततो जाता बालकाः सर्व एव ते

kṛntaścaikonapañcāśatkṛtvo garbho mayā śubhe| tāvanmātrāstato jātā bālakāḥ sarva eva te

हे शुभे! मैंने उस गर्भ को उनचास बार काटा, और उतनी ही संख्या में ये सभी बालक उत्पन्न हुए।

श्लोक 29 (skanda.6.22.29)

ततो भीत्या विनिष्क्रान्तस्त्वया देवि न लक्षितः। एतस्मात्कारणाज्जाता तेजोहानिरनिन्दिते

tato bhītyā viniṣkrāntastvayā devi na lakṣitaḥ| etasmātkāraṇājjātā tejohāniranindite

तब भय से मैं तुम्हारे न देखते हुए बाहर निकल आया, हे देवी! इसी कारण से हे अनिंदिते! मेरे तेज की हानि हुई है।

श्लोक 30 (skanda.6.22.30)

दितिरुवाच। यस्मात्सत्यं त्वया प्रोक्तं पुरतो मम देवप। तस्मात्प्रार्थय मत्तस्त्वं वरं यन्मनसेप्सितम्

ditiruvāca| yasmātsatyaṁ tvayā proktaṁ purato mama devapa| tasmātprārthaya mattastvaṁ varaṁ yanmanasepsitam

दिति ने कहा -- हे देवपति! चूँकि तुमने मेरे सामने सत्य कहा है, इसलिए तुम मुझसे वह वर माँगो जो तुम्हारे मन को इष्ट हो।

श्लोक 31 (skanda.6.22.31)

शक्र उवाच। एते तव सुता देवि च्छिद्यमाना मयासिना। रुदन्तो वारिता मन्दं मा रुदन्तु मुहुर्मुहुः

śakra uvāca| ete tava sutā devi cchidyamānā mayāsinā| rudanto vāritā mandaṁ mā rudantu muhurmuhuḥ

शक्र ने कहा -- हे देवी! मेरी तलवार से काटे जाने पर रोते हुए तुम्हारे ये पुत्र धीरे-धीरे शांत हुए थे -- ये बार-बार अब न रोएँ।

श्लोक 32 (skanda.6.22.32)

मरुतो नामविख्यातास्तस्मात्संतु जगत्त्रये। दैत्यभावविनिर्मुक्ता मद्विधेया मम प्रियाः

maruto nāmavikhyātāstasmātsaṁtu jagattraye| daityabhāvavinirmuktā madvidheyā mama priyāḥ

वे तीनों लोकों में 'मरुत' नाम से प्रसिद्ध हों, दैत्य-स्वभाव से मुक्त होकर मेरे अधीन और मुझे प्रिय बनें।

श्लोक 33 (skanda.6.22.33)

यज्ञभागभुजः सर्वे भविष्यंति मया सह। यस्मादेतन्मया तीर्थं बालकैस्तव मंडितम्

yajñabhāgabhujaḥ sarve bhaviṣyaṁti mayā saha| yasmādetanmayā tīrthaṁ bālakaistava maṁḍitam

वे सभी मेरे साथ यज्ञ-भाग के भोक्ता होंगे; और चूँकि यह तीर्थ मेरे द्वारा तुम्हारे इन बालकों से अलंकृत किया गया है --

श्लोक 34 (skanda.6.22.34)

बहुभिर्यास्यति ख्यातिं बालमंडनमित्यतः। या च स्त्री गर्भसंयुक्ता स्नानं भक्त्या करिष्यति। न भविष्यंति छिद्राणि तस्या गर्भे कथंचन

bahubhiryāsyati khyātiṁ bālamaṁḍanamityataḥ| yā ca strī garbhasaṁyuktā snānaṁ bhaktyā kariṣyati| na bhaviṣyaṁti chidrāṇi tasyā garbhe kathaṁcana

यह इसीलिए बहुतों में 'बालमंडन' नाम से प्रसिद्ध होगा; और जो गर्भवती स्त्री यहाँ भक्तिपूर्वक स्नान करेगी, उसके गर्भ में कभी कोई दोष नहीं होगा।

श्लोक 35 (skanda.6.22.35)

प्राप्ते प्रसवकाले तु या जलं प्राशयिष्यति। तीर्थस्यास्य सुखेनैव प्रसविष्यति सा सुतम्

prāpte prasavakāle tu yā jalaṁ prāśayiṣyati| tīrthasyāsya sukhenaiva prasaviṣyati sā sutam

जो स्त्री प्रसव का समय आने पर इस तीर्थ का जल पिएगी, वह सुखपूर्वक ही पुत्र को जन्म देगी।

श्लोक 36 (skanda.6.22.36)

दितिरुवाच। तवोच्छेदाय देवेश याचितः प्राङ्मया हरः। एकं देव सुतं देहि सर्वदेवनिबर्हणम्

ditiruvāca| tavocchedāya deveśa yācitaḥ prāṅmayā haraḥ| ekaṁ deva sutaṁ dehi sarvadevanibarhaṇam

दिति ने कहा -- हे देवेश! तुम्हारे विनाश के लिए मैंने पहले हर से याचना की थी -- हे देव! मुझे एक ऐसा पुत्र दो जो समस्त देवताओं का नाशक हो।

श्लोक 37 (skanda.6.22.37)

त्वया चैकोनपंचाशत्प्रकारः स विनिर्मितः। यस्मादृतं त्वया प्रोक्तं तस्मादेतद्भविष्यति

tvayā caikonapaṁcāśatprakāraḥ sa vinirmitaḥ| yasmādṛtaṁ tvayā proktaṁ tasmādetadbhaviṣyati

तुमने ही उसे उनचास रूपों में बाँट दिया; किंतु चूँकि तुमने सत्य कहा है, इसलिए यह वैसा ही होगा (जैसा तुमने कहा)।

श्लोक 38 (skanda.6.22.38)

सूत उवाच। ततः प्रभृति ते जाता मरुतो विबुधैः समम्। यज्ञभागस्य भोक्तारो दितेः शक्रस्य शासनात्

sūta uvāca| tataḥ prabhṛti te jātā maruto vibudhaiḥ samam| yajñabhāgasya bhoktāro diteḥ śakrasya śāsanāt

सूत जी ने कहा -- तभी से वे उत्पन्न हुए (बालक) दिति और शक्र की आज्ञा से देवताओं के साथ यज्ञ-भाग के भोक्ता मरुत बने।

श्लोक 39 (skanda.6.22.39)

अथ प्राह सहस्राक्षो देवाचार्यं बृहस्पतिम्। मातुर्द्रोहकृतं पापं कथं यास्यति संक्षयम्

atha prāha sahasrākṣo devācāryaṁ bṛhaspatim| māturdrohakṛtaṁ pāpaṁ kathaṁ yāsyati saṁkṣayam

तब सहस्राक्ष इंद्र ने देवगुरु बृहस्पति से पूछा -- माता के प्रति किए गए द्रोह का यह पाप किस प्रकार नष्ट होगा?

श्लोक 40 (skanda.6.22.40)

बृहस्पतिरुवाच। अत्रैव कुरु देवेन्द्र तपः पापविशुद्धये। तीर्थे यत्र कृतं पापं सर्वपातकनाशने

bṛhaspatiruvāca| atraiva kuru devendra tapaḥ pāpaviśuddhaye| tīrthe yatra kṛtaṁ pāpaṁ sarvapātakanāśane

बृहस्पति ने कहा -- हे देवेंद्र! पाप की शुद्धि के लिए यहीं, उसी तीर्थ में तप करो जहाँ यह पाप हुआ था -- यह सब पापों का नाशक है।

श्लोक 41 (skanda.6.22.41)

न यज्ञैर्न च दानेन नान्यैस्तीर्थसमाश्रयैः। मातुर्द्रोहकृतं पापं नाशं याति पुरंदर। एवमेतत्परित्यज्य तीर्थं मातुस्तवाऽऽश्रयम्

na yajñairna ca dānena nānyaistīrthasamāśrayaiḥ| māturdrohakṛtaṁ pāpaṁ nāśaṁ yāti puraṁdara| evametatparityajya tīrthaṁ mātustavā''śrayam

हे पुरंदर! न यज्ञों से, न दान से, न अन्य तीर्थों के आश्रय से माता के प्रति किए गए द्रोह का पाप नष्ट होता है -- इसे छोड़कर तुम्हारी माता का यह तीर्थ ही उसका आश्रय है।

श्लोक 42 (skanda.6.22.42)

सूत उवाच। ततस्तूर्णं सहस्राक्षः सहस्राक्षेशसंज्ञितम्। लिंगं संस्थापयामास स्वयमेव द्विजोत्तमाः

sūta uvāca| tatastūrṇaṁ sahasrākṣaḥ sahasrākṣeśasaṁjñitam| liṁgaṁ saṁsthāpayāmāsa svayameva dvijottamāḥ

सूत जी ने कहा -- हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! तब सहस्राक्ष इंद्र ने स्वयं ही शीघ्रता से 'सहस्राक्षेश' नामक लिंग की स्थापना की।

श्लोक 43 (skanda.6.22.43)

त्रिकालं पूजयामास पुष्पधूपानुलेपनैः। तथान्यैर्बलिसत्कारैर्गीतैर्नृत्यैःपृथग्विधैः

trikālaṁ pūjayāmāsa puṣpadhūpānulepanaiḥ| tathānyairbalisatkārairgītairnṛtyaiḥpṛthagvidhaiḥ

वह उसे फूलों, धूप और चंदन के लेपों से, तथा अन्य नाना प्रकार के बलि-सत्कार, गीत और नृत्यों से तीनों संध्याओं में पूजता था।

श्लोक 44 (skanda.6.22.44)

ततो वर्षसहस्रांते तुष्टस्तस्य महेश्वरः। प्रोवाच वरदोऽस्मीति शक्र प्रार्थय वांछितम्

tato varṣasahasrāṁte tuṣṭastasya maheśvaraḥ| provāca varado'smīti śakra prārthaya vāṁchitam

तब एक हजार वर्ष बीतने पर महेश्वर उससे प्रसन्न हुए और बोले -- हे शक्र! मैं वरदाता हूँ, अपना इच्छित वर माँगो।

श्लोक 45 (skanda.6.22.45)

शक्र उवाच। मातुर्द्रोहकृतं पापं यातु मे त्रिपुरांतक। तथाऽन्येषां मनुष्याणां येऽत्र त्वां श्रद्धयान्विताः। पूजयिष्यंति सद्भक्त्या स्नानं कृत्वा समाहिताः

śakra uvāca| māturdrohakṛtaṁ pāpaṁ yātu me tripurāṁtaka| tathā'nyeṣāṁ manuṣyāṇāṁ ye'tra tvāṁ śraddhayānvitāḥ| pūjayiṣyaṁti sadbhaktyā snānaṁ kṛtvā samāhitāḥ

शक्र ने कहा -- हे त्रिपुरांतक! मेरा माता-द्रोह का पाप नष्ट हो जाए, और उन अन्य मनुष्यों का भी जो यहाँ श्रद्धा से स्नान कर, मन को एकाग्र कर, सच्ची भक्ति से आपकी पूजा करेंगे।

श्लोक 46 (skanda.6.22.46)

सूत उवाच। स तथेति प्रतिज्ञाय जगामादर्शनं हरः। शक्रोऽपि रहितः पापैर्जगाम त्रिदशालयम्

sūta uvāca| sa tatheti pratijñāya jagāmādarśanaṁ haraḥ| śakro'pi rahitaḥ pāpairjagāma tridaśālayam

सूत जी ने कहा -- 'ऐसा ही होगा' कहकर हर अदृश्य हो गए; और शक्र भी पापों से मुक्त होकर देवलोक चला गया।

श्लोक 47 (skanda.6.22.47)

एवं तत्र समुत्पन्नं तीर्थं तद्बालमंडनम्। स्वामिद्रोहकृतात्पापान्मुच्यंते यत्र मानवाः

evaṁ tatra samutpannaṁ tīrthaṁ tadbālamaṁḍanam| svāmidrohakṛtātpāpānmucyaṁte yatra mānavāḥ

इस प्रकार वहाँ वह बालमंडन नामक तीर्थ उत्पन्न हुआ, जहाँ मनुष्य स्वामि-द्रोह के पाप से मुक्त हो जाते हैं।

श्लोक 48 (skanda.6.22.48)

एतद्वः सर्वमाख्यातं बालमंडनसंभवम्। माहात्म्यं तु द्विजश्रेष्ठाः शृणुध्वमथ सादरम्

etadvaḥ sarvamākhyātaṁ bālamaṁḍanasaṁbhavam| māhātmyaṁ tu dvijaśreṣṭhāḥ śṛṇudhvamatha sādaram

यह सब मैंने तुम्हें बालमंडन की उत्पत्ति सुनाई; हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! अब उसका माहात्म्य आदरपूर्वक सुनो।

श्लोक 49 (skanda.6.22.49)

आश्विनस्य सिते पक्षे दशम्यादि यथाक्रमम्। यस्तत्र कुरुते श्राद्धं यावत्पंचदशी तिथिः

āśvinasya site pakṣe daśamyādi yathākramam| yastatra kurute śrāddhaṁ yāvatpaṁcadaśī tithiḥ

जो व्यक्ति आश्विन मास के शुक्ल पक्ष में दशमी से लेकर पूर्णिमा तिथि तक, क्रमशः वहाँ श्राद्ध करता है --

श्लोक 50 (skanda.6.22.50)

तीर्थानां स हि सर्वेषां स्नानजं लभते फलम्। श्राद्धस्य करणाद्वापि वाजिमेधफलं द्विजाः

tīrthānāṁ sa hi sarveṣāṁ snānajaṁ labhate phalam| śrāddhasya karaṇādvāpi vājimedhaphalaṁ dvijāḥ

वह सभी तीर्थों में स्नान करने का फल पाता है, और हे ब्राह्मणो! श्राद्ध करने से अश्वमेध यज्ञ का फल भी पाता है।

श्लोक 51 (skanda.6.22.51)

तस्मिन्काले सहस्राक्षः समागच्छति भूतले। भागानां मर्त्यजातानां सेवनाय सदैव हि

tasminkāle sahasrākṣaḥ samāgacchati bhūtale| bhāgānāṁ martyajātānāṁ sevanāya sadaiva hi

उस समय सहस्राक्ष इंद्र सदा मनुष्यों द्वारा अर्पित भागों को ग्रहण करने के लिए पृथ्वी पर आते हैं।

श्लोक 52 (skanda.6.22.52)

यावद्भूमितले शक्रस्तिष्ठत्येवं द्विजोत्तमाः। तीर्थे तीर्थानि सर्वाणि तावत्तिष्ठन्ति तत्र वै

yāvadbhūmitale śakrastiṣṭhatyevaṁ dvijottamāḥ| tīrthe tīrthāni sarvāṇi tāvattiṣṭhanti tatra vai

हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! जब तक शक्र इस प्रकार पृथ्वी पर रहते हैं, तब तक सभी तीर्थ उसी तीर्थ में उपस्थित रहते हैं।

श्लोक 53 (skanda.6.22.53)

तस्मात्सर्वप्रयत्नेन तस्मिन्काले विशेषतः। स्नात्वा तत्र शुभे तीर्थे शक्रेश्वरमथाऽर्चयेत्

tasmātsarvaprayatnena tasminkāle viśeṣataḥ| snātvā tatra śubhe tīrthe śakreśvaramathā'rcayet

अतः पूरे प्रयत्न से, विशेषतः उस समय, उस शुभ तीर्थ में स्नान कर शक्रेश्वर की पूजा करनी चाहिए।

श्लोक 54 (skanda.6.22.54)

अत्र श्लोकौ पुरा गीतौ नारदेन सुरर्षिणा। शृण्वंतु मुनयः सर्वे कीर्त्यमानौ मया हि तौ

atra ślokau purā gītau nāradena surarṣiṇā| śṛṇvaṁtu munayaḥ sarve kīrtyamānau mayā hi tau

यहाँ पूर्वकाल में देवर्षि नारद द्वारा गाए गए दो श्लोक हैं; मेरे द्वारा कहे जाते हुए उन्हें सभी मुनि सुनें।

श्लोक 55 (skanda.6.22.55)

बालमंडनके स्नात्वा शक्रेश्वरमथेक्षयेत्। यः पुमानाश्विने मासि प्राप्ते श्रवणपञ्चके। स पापैर्मुच्यते सर्वैराजन्ममरणाद्भुवि

bālamaṁḍanake snātvā śakreśvaramathekṣayet| yaḥ pumānāśvine māsi prāpte śravaṇapañcake| sa pāpairmucyate sarvairājanmamaraṇādbhuvi

जो पुरुष आश्विन मास में श्रवण-पंचक (श्रवण नक्षत्र से जुड़े पाँच दिनों) के आगमन पर बालमंडन में स्नान कर शक्रेश्वर का दर्शन करता है, वह पृथ्वी पर जन्म से मृत्यु तक के सब पापों से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 56 (skanda.6.22.56)

प्रभावात्तस्य तीर्थस्य सत्यमेतद्द्विजोत्तमाः

prabhāvāttasya tīrthasya satyametaddvijottamāḥ

हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! यह उस तीर्थ के प्रभाव से सत्य है।

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