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नागर खण्ड · अध्याय 227

नरकयातना-निरसनोपाय-वर्णन

अध्याय 226अध्याय-सूचीअध्याय 228

श्लोक 1 (skanda.6.227.1)

युधिष्ठिर उवाच नरकाणां स्वरूपं च श्रुत्वा मे भयमागतम् कथं मुक्तिर्भवेत्तेषां पापानामपि पार्थिव व्रतैर्वा नियमैर्वापि होमैर्वा तीर्थसंश्रयैः

yudhiṣṭhira uvāca narakāṇāṁ svarūpaṁ ca śrutvā me bhayamāgatam kathaṁ muktirbhavetteṣāṁ pāpānāmapi pārthiva vratairvā niyamairvāpi homairvā tīrthasaṁśrayaiḥ

युधिष्ठिर ने कहा — हे पृथ्वीपते, नरकों का स्वरूप सुनकर मुझे भय हो आया है। पापी मनुष्यों की भी मुक्ति व्रतों से, नियमों से, होमों से अथवा तीर्थों के आश्रय से कैसे हो सकती है?

श्लोक 2 (skanda.6.227.2)

भीष्म उवाच गंगायामस्थिपातोऽत्र येषां संजायते नृणाम् न तेषां नारको वह्निः प्रभवेन्मध्यवर्तिनाम्

bhīṣma uvāca gaṁgāyāmasthipāto'tra yeṣāṁ saṁjāyate nṛṇām na teṣāṁ nārako vahniḥ prabhavenmadhyavartinām

भीष्म ने कहा — जिन मनुष्यों की अस्थियाँ गंगा में गिरकर उसके मध्य में स्थित हो जाती हैं, उनके ऊपर नरक की अग्नि का प्रभाव नहीं होता।

श्लोक 3 (skanda.6.227.3)

गंगायां क्रियते श्राद्धं येषां नाम्ना स्वकैः सुतैः ते विमानं समाश्रित्य प्रयांति नरकोपरि

gaṁgāyāṁ kriyate śrāddhaṁ yeṣāṁ nāmnā svakaiḥ sutaiḥ te vimānaṁ samāśritya prayāṁti narakopari

जिनके नाम से उनके अपने पुत्रों द्वारा गंगा में श्राद्ध किया जाता है, वे विमान पर आरूढ़ होकर नरक के ऊपर से होकर चले जाते हैं।

श्लोक 4 (skanda.6.227.4)

पापं कृत्वा प्रकुर्वंति प्रायश्चित्तं यथोदितम् हेम यच्छंति वा भूप न तेषां नरको भवेत्

pāpaṁ kṛtvā prakurvaṁti prāyaścittaṁ yathoditam hema yacchaṁti vā bhūpa na teṣāṁ narako bhavet

पाप करके भी जो यथोक्त विधि से प्रायश्चित्त करते हैं, अथवा हे राजन्, जो स्वर्ण दान करते हैं, उनके लिए नरक नहीं होता।

श्लोक 5 (skanda.6.227.5)

शेषाः स्वकर्मणः प्राप्त्या सेवंते च यथोचितम् स्वर्ग वा नरकं वापि सेवन्ते ते नराधिप

śeṣāḥ svakarmaṇaḥ prāptyā sevaṁte ca yathocitam svarga vā narakaṁ vāpi sevante te narādhipa

शेष सभी लोग अपने-अपने कर्मों की प्राप्ति के अनुसार यथोचित फल भोगते हैं — हे नराधिप, वे स्वर्ग अथवा नरक का सेवन करते हैं।

श्लोक 6 (skanda.6.227.6)

धारातीर्थे म्रियंते ये स्वामिनः पुरतः स्थिताः ते गच्छंति परं स्थानं नरकाणां सुदूरतः

dhārātīrthe mriyaṁte ye svāminaḥ purataḥ sthitāḥ te gacchaṁti paraṁ sthānaṁ narakāṇāṁ sudūrataḥ

जो लोग स्वामी (शिव) के सम्मुख खड़े होकर धारातीर्थ में मरते हैं, वे नरकों से अत्यंत दूर स्थित परम स्थान को प्राप्त होते हैं।

श्लोक 7 (skanda.6.227.7)

वाराणस्यां कुरुक्षेत्रे नैमिषे नागरे पुरे प्रयागे वा प्रभासे वा यस्त्यजेत्तनुमात्मनः महापातकयुक्तोऽपि नरकं न स पश्यति

vārāṇasyāṁ kurukṣetre naimiṣe nāgare pure prayāge vā prabhāse vā yastyajettanumātmanaḥ mahāpātakayukto'pi narakaṁ na sa paśyati

जो कोई वाराणसी में, कुरुक्षेत्र में, नैमिष में, नागर नगर में, प्रयाग में अथवा प्रभास में अपने शरीर का त्याग करता है, वह महापातकों से युक्त होकर भी नरक नहीं देखता।

श्लोक 8 (skanda.6.227.8)

नीलो वा वृषभो यस्य विवाहे संनियुज्यते स्वपुत्रेण न संपश्येन्नरकं ब्रह्महाऽपि सः

nīlo vā vṛṣabho yasya vivāhe saṁniyujyate svaputreṇa na saṁpaśyennarakaṁ brahmahā'pi saḥ

जिसके विवाह में नीला वृषभ नियोजित किया जाता है, वह अपने पुत्र के साथ नरक नहीं देखता, भले ही वह ब्रह्महत्यारा ही क्यों न हो।

श्लोक 9 (skanda.6.227.9)

प्रायोपवेशनं कृत्वा हृदयस्थे जनार्दने यस्त्यजेत्पुरुषः प्राणान्नरकं न स पश्यति

prāyopaveśanaṁ kṛtvā hṛdayasthe janārdane yastyajetpuruṣaḥ prāṇānnarakaṁ na sa paśyati

जनार्दन को हृदय में स्थापित कर जो पुरुष प्रायोपवेशन (आमरण अनशन) करके अपने प्राणों का त्याग करता है, वह नरक नहीं देखता।

श्लोक 10 (skanda.6.227.10)

प्रायोपवेशनं यो च चित्रेश्वरनिवेशने कुर्वन्ति नरकं नैव ते गच्छंति कदाचन

prāyopaveśanaṁ yo ca citreśvaraniveśane kurvanti narakaṁ naiva te gacchaṁti kadācana

जो लोग चित्रेश्वर के निवास-स्थान में प्रायोपवेशन करते हैं, वे कभी भी नरक को नहीं जाते।

श्लोक 11 (skanda.6.227.11)

दीनांधकृपणानां च पथिश्रममुपेयुषाम् तीर्थयात्रापराणां च यो यच्छति सदाऽशनम् काले वा यदि वाऽकाले नरकं न स पश्यति

dīnāṁdhakṛpaṇānāṁ ca pathiśramamupeyuṣām tīrthayātrāparāṇāṁ ca yo yacchati sadā'śanam kāle vā yadi vā'kāle narakaṁ na sa paśyati

जो व्यक्ति दीनों, अंधों, दरिद्रों, मार्ग के श्रम से थके हुओं तथा तीर्थयात्रा में लगे लोगों को समय पर अथवा असमय में भी सदा भोजन देता है, वह नरक नहीं देखता।

श्लोक 12 (skanda.6.227.12)

जलधेनुं च यो दद्याद्धृषसंस्थे दिवाकरे तिलधेनुं मृगस्थे च नरकं न स पश्यति

jaladhenuṁ ca yo dadyāddhṛṣasaṁsthe divākare tiladhenuṁ mṛgasthe ca narakaṁ na sa paśyati

जो सूर्य के वृष राशि में स्थित होने पर जलधेनु का दान करता है, तथा सूर्य के मृग (मकर) राशि में स्थित होने पर तिलधेनु का दान करता है, वह नरक नहीं देखता।

श्लोक 13 (skanda.6.227.13)

सोमे सोमग्रहे चैव सोमनाथस्य दर्शनात् समुद्रे च सरस्वत्यां स्नात्वा न नरकं व्रजेत्

some somagrahe caiva somanāthasya darśanāt samudre ca sarasvatyāṁ snātvā na narakaṁ vrajet

सोमवार के दिन चंद्रग्रहण में सोमनाथ के दर्शन से, तथा समुद्र में और सरस्वती में स्नान करके मनुष्य नरक को प्राप्त नहीं होता।

श्लोक 14 (skanda.6.227.14)

सन्निहित्यां कुरुक्षेत्रे राहुग्रस्ते दिवाकरे सूर्यवारेण यः याति नरकं न स पश्यति

sannihityāṁ kurukṣetre rāhugraste divākare sūryavāreṇa yaḥ yāti narakaṁ na sa paśyati

कुरुक्षेत्र में सन्निहित्या तीर्थ पर, सूर्य के राहु द्वारा ग्रस्त होने पर, जो रविवार के दिन जाता है, वह नरक नहीं देखता।

श्लोक 15 (skanda.6.227.15)

कार्तिक्यां कृत्तिकायोगे यः करोति प्रदक्षिणाम् त्रिपुष्करस्य मौनेन नरकं न स पश्यति

kārtikyāṁ kṛttikāyoge yaḥ karoti pradakṣiṇām tripuṣkarasya maunena narakaṁ na sa paśyati

कार्तिकी में कृत्तिका-योग के समय जो मौनपूर्वक त्रिपुष्कर की प्रदक्षिणा करता है, वह नरक नहीं देखता।

श्लोक 16 (skanda.6.227.16)

मृगसंक्रमणे ये तु सूर्यवारेण संस्थिते चण्डीशं वीक्षयंति स्म न ते नरकगामिनः

mṛgasaṁkramaṇe ye tu sūryavāreṇa saṁsthite caṇḍīśaṁ vīkṣayaṁti sma na te narakagāminaḥ

जो लोग मृग-संक्रांति के रविवार को पड़ने पर चण्डीश के दर्शन करते हैं, वे नरकगामी नहीं होते।

श्लोक 17 (skanda.6.227.17)

गां पंकाद्ब्राह्मणीं दास्यात्साधून्स्तेनाद्द्विजं वधात् मोचयन्ति च ये राजन्न ते नरकगामिनः

gāṁ paṁkādbrāhmaṇīṁ dāsyātsādhūnstenāddvijaṁ vadhāt mocayanti ca ye rājanna te narakagāminaḥ

हे राजन्, जो लोग गाय को कीचड़ से, ब्राह्मणी को दासत्व से, साधुओं को चोरों से तथा ब्राह्मण को वध से मुक्त करते हैं, वे नरकगामी नहीं होते।

श्लोक 18 (skanda.6.227.18)

एतत्ते सर्वमाख्यातं यत्पृष्टोऽस्मि नराधिप यथा न नरकं याति पुरुषस्तु स्वकर्मणा यथा च नरकं याति स्वल्पपापोऽपि मानवः

etatte sarvamākhyātaṁ yatpṛṣṭo'smi narādhipa yathā na narakaṁ yāti puruṣastu svakarmaṇā yathā ca narakaṁ yāti svalpapāpo'pi mānavaḥ

हे नराधिप, आपने जो मुझसे पूछा था, वह सब मैंने बता दिया — जिस प्रकार पुरुष अपने कर्मों से नरक को नहीं जाता, और जिस प्रकार अल्प पाप वाला मनुष्य भी नरक को चला जाता है।

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