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नागर खण्ड · अध्याय 228

जलशाय्युपाख्याने ब्रह्मदत्तवरप्रदानोद्धतान्धकासुरकृतशंकराज्ञावमाननवर्णन

अध्याय 227अध्याय-सूचीअध्याय 229

श्लोक 1 (skanda.6.228.1)

सूत उवाच तथान्यच्च बिलद्वारि शयनार्थे व्यवस्थितम् दृष्ट्वा प्रमुच्यते पापी देवं च जलशायिनम्

sūta uvāca tathānyacca biladvāri śayanārthe vyavasthitam dṛṣṭvā pramucyate pāpī devaṁ ca jalaśāyinam

सूत जी ने कहा — इसके अतिरिक्त बिल के द्वार पर शयन हेतु स्थापित उस जलशायी देव का दर्शन करके पापी भी मुक्त हो जाता है।

श्लोक 2 (skanda.6.228.2)

स्नात्वा तस्मिन्बिलद्वारे पवित्रे लोकसंश्रये यस्तं पूजयते भक्त्या शेषपर्यंकशायिनम् आजन्ममरणात्पापात्स च मुक्तिमवाप्नुयात्

snātvā tasminbiladvāre pavitre lokasaṁśraye yastaṁ pūjayate bhaktyā śeṣaparyaṁkaśāyinam ājanmamaraṇātpāpātsa ca muktimavāpnuyāt

उस पवित्र, लोकाश्रय बिलद्वार में स्नान करके जो भक्तिपूर्वक शेषशय्या पर शयन करने वाले उस देव की पूजा करता है, वह जन्म से मृत्युपर्यंत के पाप से मुक्ति पाता है।

श्लोक 3 (skanda.6.228.3)

चतुरो वार्षिकान्मासान्सुप्रसुप्तं सुरेश्वरम् संपूजयति यो भक्त्या न स भूयोऽत्र जायते

caturo vārṣikānmāsānsuprasuptaṁ sureśvaram saṁpūjayati yo bhaktyā na sa bhūyo'tra jāyate

जो चार वर्षा-मासों तक गहरी निद्रा में सोए हुए उस सुरेश्वर की भक्तिपूर्वक पूजा करता है, वह पुनः इस संसार में जन्म नहीं लेता।

श्लोक 4 (skanda.6.228.4)

तत्र पूर्वं महाभागा मुनयः सेव्य तं प्रभुम् मृत्तिकाग्रहणं कृत्वा तस्य चायतने शुभे

tatra pūrvaṁ mahābhāgā munayaḥ sevya taṁ prabhum mṛttikāgrahaṇaṁ kṛtvā tasya cāyatane śubhe

वहाँ पूर्वकाल में महाभाग मुनियों ने उस प्रभु की सेवा करके, उनके शुभ आयतन में पवित्र मृत्तिका ग्रहण की।

श्लोक 5 (skanda.6.228.5)

संप्राप्ताः परमं स्थानं तद्विष्णोः परमं पदम् यत्फलं सर्वतीर्थेषु सर्वयज्ञेषु यत्फलम् तत्फलं तस्य पूजायां चातुर्मास्यां प्रजायते

saṁprāptāḥ paramaṁ sthānaṁ tadviṣṇoḥ paramaṁ padam yatphalaṁ sarvatīrtheṣu sarvayajñeṣu yatphalam tatphalaṁ tasya pūjāyāṁ cāturmāsyāṁ prajāyate

...उस विष्णु के परम पद, परम स्थान को प्राप्त हुए। जो फल समस्त तीर्थों में और समस्त यज्ञों में मिलता है, वही फल चातुर्मास्य में उनकी पूजा से उत्पन्न होता है।

श्लोक 6 (skanda.6.228.6)

यत्फलं गोग्रहे मृत्युं संप्राप्ता यांति मानवाः तत्फलं चतुरो मासान्पूजया जलशायिनः

yatphalaṁ gograhe mṛtyuṁ saṁprāptā yāṁti mānavāḥ tatphalaṁ caturo māsānpūjayā jalaśāyinaḥ

गौओं की रक्षा करते हुए मृत्यु को प्राप्त होकर मनुष्य जिस फल को पाते हैं, वही फल जलशायी देव की चार मास तक पूजा करने से प्राप्त होता है।

श्लोक 7 (skanda.6.228.7)

अपि पापसमाचारः परदाररतोऽपिच ब्रह्मघ्नोऽपि सुरापोऽपि स्त्रीहन्ताऽपि विगर्हितः पूजया चतुरो मासांस्तस्य देवस्य मुच्यते

api pāpasamācāraḥ paradārarato'pica brahmaghno'pi surāpo'pi strīhantā'pi vigarhitaḥ pūjayā caturo māsāṁstasya devasya mucyate

पापाचरण करने वाला, परस्त्रीरत रहने वाला, ब्रह्महत्यारा, सुरापायी अथवा निंदित स्त्रीहत्यारा भी उस देव की चार मास पूजा से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 8 (skanda.6.228.8)

ऋषय ऊचुः यदेतद्भवता प्रोक्तं तत्रस्थं जलशायिनम् बिलद्वारे कथं सूत तत्र नः संशयो महान्

ṛṣaya ūcuḥ yadetadbhavatā proktaṁ tatrasthaṁ jalaśāyinam biladvāre kathaṁ sūta tatra naḥ saṁśayo mahān

ऋषियों ने कहा — आपने जो यह कहा कि जलशायी देव वहाँ बिल के द्वार पर स्थित हैं, हे सूत, यह कैसे है? इस विषय में हमें बड़ा संशय है।

श्लोक 9 (skanda.6.228.9)

स किल श्रूयते देवः क्षीराब्धौ मधुसूदनः सदैव भगवाञ्छेते योगनिद्रां समाश्रितः

sa kila śrūyate devaḥ kṣīrābdhau madhusūdanaḥ sadaiva bhagavāñchete yoganidrāṁ samāśritaḥ

वह देव मधुसूदन तो क्षीरसागर में सुना जाता है, जहाँ भगवान् सदा योगनिद्रा में लीन होकर शयन करते हैं।

श्लोक 10 (skanda.6.228.10)

कथं स भगवाञ्छेते बिलद्वारे व्यवस्थितः एतत्कीर्तय कार्त्स्न्येन परं कौतूहलं हि नः

kathaṁ sa bhagavāñchete biladvāre vyavasthitaḥ etatkīrtaya kārtsnyena paraṁ kautūhalaṁ hi naḥ

वह भगवान् बिल के द्वार पर स्थित होकर कैसे शयन करते हैं? यह हमें पूर्णरूप से बताइए, क्योंकि हमें इसके विषय में अत्यंत कौतूहल है।

श्लोक 11 (skanda.6.228.11)

सूत उवाच सत्यमेतन्महाभागाः क्षीराब्धौ मधुसूदनः योगनिद्रां गतः शेते शेषपर्यंकशायकः

sūta uvāca satyametanmahābhāgāḥ kṣīrābdhau madhusūdanaḥ yoganidrāṁ gataḥ śete śeṣaparyaṁkaśāyakaḥ

सूत जी ने कहा — हे महाभाग्यशालियो, यह सत्य है कि क्षीरसागर में मधुसूदन, योगनिद्रा को प्राप्त होकर, शेषशय्या पर शयन करते हैं।

श्लोक 12 (skanda.6.228.12)

स यथा तत्र क्षेत्रे तु संश्रितो भगवान्स्वयम् जलशायिस्वरूपेण तच्छृणुध्वं समाहिताः

sa yathā tatra kṣetre tu saṁśrito bhagavānsvayam jalaśāyisvarūpeṇa tacchṛṇudhvaṁ samāhitāḥ

वे भगवान् स्वयं उस क्षेत्र में जलशायी के रूप में किस प्रकार आश्रित हुए, उसे एकाग्रचित्त होकर सुनो।

श्लोक 13 (skanda.6.228.13)

यथा च चतुरो मासान्पूजितस्तत्र संस्थितः मुक्तिं ददाति पुंसां स तथा संकीर्तयाम्यहम्

yathā ca caturo māsānpūjitastatra saṁsthitaḥ muktiṁ dadāti puṁsāṁ sa tathā saṁkīrtayāmyaham

तथा वे वहाँ स्थित होकर चार मास तक पूजित होने पर पुरुषों को किस प्रकार मुक्ति प्रदान करते हैं, वह भी मैं तुम्हें बताता हूँ।

श्लोक 14 (skanda.6.228.14)

चत्वारोऽपि यथा मासा गर्हणीया धरातले सर्वकर्मसु मुख्येषु यज्ञोद्वाहादिषु द्विजाः

catvāro'pi yathā māsā garhaṇīyā dharātale sarvakarmasu mukhyeṣu yajñodvāhādiṣu dvijāḥ

हे द्विजो, ये चारों मास यज्ञ, विवाह आदि समस्त प्रमुख कर्मों के लिए पृथ्वी पर किस प्रकार निंदित माने जाते हैं, यह भी मैं कहूँगा।

श्लोक 15 (skanda.6.228.15)

तद्वोऽहं कीर्तयिष्यामि नमस्कृत्य द्विजोत्तमाः तस्मै देवाधिदेवाय निर्गुणाय गुणात्मने

tadvo'haṁ kīrtayiṣyāmi namaskṛtya dvijottamāḥ tasmai devādhidevāya nirguṇāya guṇātmane

हे द्विजोत्तमो, उस देवाधिदेव को, जो गुणरहित होते हुए भी गुणस्वरूप हैं, नमस्कार करके मैं वह सब तुम्हें बताऊँगा।

श्लोक 16 (skanda.6.228.16)

अव्यक्तायाऽप्रमेयाय सर्वदेवमयाय च सर्वज्ञाय कवीशाय सर्वभूतात्मने तथा

avyaktāyā'prameyāya sarvadevamayāya ca sarvajñāya kavīśāya sarvabhūtātmane tathā

अव्यक्त, अप्रमेय, समस्त देवस्वरूप, सर्वज्ञ, कविश्रेष्ठ तथा सर्वभूतों की आत्मा उन प्रभु को नमस्कार करके।

श्लोक 17 (skanda.6.228.17)

पुरासीद्दानवो रौद्रो हिरण्यकशिपुर्महान् नारसिंहं वपुः कृत्वा विष्णुना यो निपातितः

purāsīddānavo raudro hiraṇyakaśipurmahān nārasiṁhaṁ vapuḥ kṛtvā viṣṇunā yo nipātitaḥ

पूर्वकाल में हिरण्यकशिपु नामक एक भयंकर महादानव था, जिसे विष्णु ने नृसिंह का शरीर धारण करके मार गिराया था।

श्लोक 18 (skanda.6.228.18)

तस्य पुत्रद्वयं जज्ञे सर्वलक्षणलक्षितम् प्रह्लादश्चांधकश्चैव वीर्येणाप्रतिमौ युधि

tasya putradvayaṁ jajñe sarvalakṣaṇalakṣitam prahlādaścāṁdhakaścaiva vīryeṇāpratimau yudhi

उसके सभी शुभ लक्षणों से युक्त दो पुत्र उत्पन्न हुए — प्रह्लाद और अंधक — जो युद्ध में पराक्रम में अनुपम थे।

श्लोक 19 (skanda.6.228.19)

हिरण्यकशिपौ प्राप्ते परं लोकं महासुरे अमात्यैरभिषेकाय प्रह्लादः स नियोजितः

hiraṇyakaśipau prāpte paraṁ lokaṁ mahāsure amātyairabhiṣekāya prahlādaḥ sa niyojitaḥ

जब महासुर हिरण्यकशिपु परलोक को प्राप्त हो गया, तब मंत्रियों ने अभिषेक के लिए प्रह्लाद को नियुक्त किया।

श्लोक 20 (skanda.6.228.20)

स नैच्छत तदा राज्यं पितृपैतामहं महत् समागतमपि प्राज्ञो यस्मात्तद्वो वदाम्यहम्

sa naicchata tadā rājyaṁ pitṛpaitāmahaṁ mahat samāgatamapi prājño yasmāttadvo vadāmyaham

वह बुद्धिमान प्रह्लाद अपने पिता-पितामह के उस विशाल राज्य को, प्राप्त होने पर भी, नहीं चाहता था — इसका कारण मैं तुम्हें बताता हूँ।

श्लोक 21 (skanda.6.228.21)

दानवानां सदा द्वेषो देवेन सह चक्रिणा न करोति पुनर्द्वेषं तं समुद्दिश्य सर्वदा

dānavānāṁ sadā dveṣo devena saha cakriṇā na karoti punardveṣaṁ taṁ samuddiśya sarvadā

दानवों का चक्रधारी देव के प्रति सदा द्वेष रहता है, परंतु प्रह्लाद उनके प्रति कभी भी द्वेष नहीं करता था।

श्लोक 22 (skanda.6.228.22)

एतस्मात्कारणात्सर्वे तेन त्यक्ता दितेः सुताः स्वराज्यमपि संत्यज्य विष्णुस्तेन समाश्रितः

etasmātkāraṇātsarve tena tyaktā diteḥ sutāḥ svarājyamapi saṁtyajya viṣṇustena samāśritaḥ

इसी कारण दिति के समस्त पुत्रों ने उसे त्याग दिया, और अपने राज्य को भी त्यागकर उसने विष्णु का आश्रय ग्रहण किया।

श्लोक 23 (skanda.6.228.23)

ततस्तैर्दानवैः क्षुद्रैर्विष्णुद्वेषपरायणैः अन्धकः स्थापितो राज्ये पितृपैतामहे तदा

tatastairdānavaiḥ kṣudrairviṣṇudveṣaparāyaṇaiḥ andhakaḥ sthāpito rājye pitṛpaitāmahe tadā

तब उन क्षुद्र, विष्णुद्वेष में तत्पर दानवों ने अंधक को उस पितृ-पितामह के राज्य पर स्थापित कर दिया।

श्लोक 24 (skanda.6.228.24)

अन्धकोऽपि समाराध्य देवदेवं चतुर्मुखम् अमरत्वं ततो लेभे यावच्चन्द्रार्कतारकम्

andhako'pi samārādhya devadevaṁ caturmukham amaratvaṁ tato lebhe yāvaccandrārkatārakam

अंधक ने भी देवदेव चतुर्मुख ब्रह्मा की आराधना करके, चंद्र-सूर्य-तारों के रहने तक अमरत्व प्राप्त कर लिया।

श्लोक 25 (skanda.6.228.25)

वरपुष्टस्ततः सोऽपि चक्रे शक्रेण विग्रहम्

varapuṣṭastataḥ so'pi cakre śakreṇa vigraham

उस वर से बलशाली होकर उसने इंद्र से युद्ध छेड़ दिया।

श्लोक 26 (skanda.6.228.26)

जित्वा शक्रं महासंख्ये यज्ञांशाञ्जगृहे स्वयम् गत्वाऽमरावतीं दैत्यो निःसार्य च शतक्रतुम् स्ववर्गेण समोपेतः स्वर्गं समहरत्तदा

jitvā śakraṁ mahāsaṁkhye yajñāṁśāñjagṛhe svayam gatvā'marāvatīṁ daityo niḥsārya ca śatakratum svavargeṇa samopetaḥ svargaṁ samaharattadā

महासंग्राम में इंद्र को जीतकर उसने स्वयं यज्ञभाग ग्रहण कर लिए; अमरावती जाकर और शतक्रतु इंद्र को बाहर निकालकर, वह दैत्य अपने कुटुंब सहित स्वर्ग को हर ले गया।

श्लोक 27 (skanda.6.228.27)

शक्रोऽपि च समाराध्य शंकरं लोकशंकरम् सर्वदेवसमोपेतो भृत्यवत्परिवर्तते

śakro'pi ca samārādhya śaṁkaraṁ lokaśaṁkaram sarvadevasamopeto bhṛtyavatparivartate

इंद्र भी लोकों के कल्याणकारी शंकर की आराधना करके, समस्त देवताओं सहित सेवक के समान उनके पास रहने लगा।

श्लोक 28 (skanda.6.228.28)

ततः कालेन महता तस्य तुष्टः पिनाकधृक् तं प्राह वरदोऽस्मीति वद शक्र करोमि किम्

tataḥ kālena mahatā tasya tuṣṭaḥ pinākadhṛk taṁ prāha varado'smīti vada śakra karomi kim

तब बहुत समय पश्चात् उससे प्रसन्न होकर पिनाकधारी शिव ने उससे कहा — मैं वरदाता हूँ, कहो शक्र, मैं क्या करूँ?

श्लोक 29 (skanda.6.228.29)

इन्द्र उवाच अंधकेन हृतं राज्यं मम वीर्यात्सुरेश्वर यज्ञभागैः समोपेतं हत्वाऽऽशु तत्प्रयच्छ मे

indra uvāca aṁdhakena hṛtaṁ rājyaṁ mama vīryātsureśvara yajñabhāgaiḥ samopetaṁ hatvā''śu tatprayaccha me

इंद्र ने कहा — हे सुरेश्वर, अंधक ने अपने बल से मेरा राज्य, यज्ञभागों सहित, छीन लिया है; उसे शीघ्र मारकर वह मुझे लौटा दीजिए।

श्लोक 30 (skanda.6.228.30)

तच्छ्रुत्वा तस्य दीनस्य भगवाञ्छशिशेखरः प्रोवाच तव दास्यामि राज्यं त्रैलोक्यसंभवम्

tacchrutvā tasya dīnasya bhagavāñchaśiśekharaḥ provāca tava dāsyāmi rājyaṁ trailokyasaṁbhavam

उस दीन इंद्र की बात सुनकर चंद्रशेखर भगवान् ने कहा — मैं तुम्हें त्रैलोक्य में विद्यमान वह राज्य लौटा दूँगा।

श्लोक 31 (skanda.6.228.31)

ततः संप्रेषयामास दूतं तस्य विचक्षणम् गणेशं वीरभद्राख्यं गत्वा तं ब्रूहि चांधकम्

tataḥ saṁpreṣayāmāsa dūtaṁ tasya vicakṣaṇam gaṇeśaṁ vīrabhadrākhyaṁ gatvā taṁ brūhi cāṁdhakam

तब उन्होंने वीरभद्र नामक अपने कुशल गणनायक को दूत बनाकर भेजा — जाकर अंधक से कहो।

श्लोक 32 (skanda.6.228.32)

ममादेशात्परित्यज्य स्वर्गं गच्छ धरातलम् पितृपैतामहं स्थानं राज्यं तत्र समाचर

mamādeśātparityajya svargaṁ gaccha dharātalam pitṛpaitāmahaṁ sthānaṁ rājyaṁ tatra samācara

मेरी आज्ञा से स्वर्ग को त्यागकर पृथ्वी पर जाओ, और वहाँ अपने पितृ-पितामह के स्थान पर राज्य करो।

श्लोक 33 (skanda.6.228.33)

परित्यजस्व यज्ञांशान्नो चेद्धंतास्मि सत्वरम् स गत्वा चांधकं प्राह यथोक्तं शंभुना स्फुटम्

parityajasva yajñāṁśānno ceddhaṁtāsmi satvaram sa gatvā cāṁdhakaṁ prāha yathoktaṁ śaṁbhunā sphuṭam

यज्ञभागों को छोड़ दो, अन्यथा मैं तुम्हें शीघ्र मार डालूँगा — वह जाकर अंधक से शंभु द्वारा कहे गए वचन स्पष्ट रूप से बोला।

श्लोक 34 (skanda.6.228.34)

सविशेषमहाबुद्धिः स्वामिकार्यप्रसिद्धये अथ तं चाधकः प्राह प्रविहस्य महाबलः

saviśeṣamahābuddhiḥ svāmikāryaprasiddhaye atha taṁ cādhakaḥ prāha pravihasya mahābalaḥ

वह विशेष बुद्धिमान दूत अपने स्वामी के कार्य की सिद्धि के लिए वहाँ गया। तब महाबली अंधक ने ठहाका मारकर उससे कहा।

श्लोक 35 (skanda.6.228.35)

अवध्यो हि यथा दूतस्तेन त्वां न निहन्म्यहम् क स्याद्वै शंकरोनाम यो मामेवं प्रभाषते

avadhyo hi yathā dūtastena tvāṁ na nihanmyaham ka syādvai śaṁkaronāma yo māmevaṁ prabhāṣate

चूँकि दूत अवध्य होता है, इसलिए मैं तुम्हें नहीं मारूँगा। परंतु यह शंकर नाम का कौन है, जो मुझसे इस प्रकार बोलता है?

श्लोक 36 (skanda.6.228.36)

न मां वेत्ति स किं मूढः किं वा मृत्युमभीप्सते

na māṁ vetti sa kiṁ mūḍhaḥ kiṁ vā mṛtyumabhīpsate

क्या वह मूर्ख मुझे नहीं जानता, अथवा क्या वह मृत्यु की कामना करता है?

श्लोक 37 (skanda.6.228.37)

अथवा सत्यमेवैतान्निर्विण्णो जीविताच्च सः दरिद्रोपहतो नित्यं सर्वभोगविवर्जितः

athavā satyamevaitānnirviṇṇo jīvitācca saḥ daridropahato nityaṁ sarvabhogavivarjitaḥ

अथवा यह भी सत्य हो सकता है कि वह जीवन से विरक्त हो चुका है, सदा दरिद्रता से पीड़ित तथा समस्त भोगों से रहित है।

श्लोक 38 (skanda.6.228.38)

स्मशाने क्रीडनं यस्य भस्म गात्रविलेपनम् भूषणं चाहयो वस्त्रं दिशो यस्य जटालका

smaśāne krīḍanaṁ yasya bhasma gātravilepanam bhūṣaṇaṁ cāhayo vastraṁ diśo yasya jaṭālakā

जिसकी क्रीड़ा श्मशान में होती है, जिसके शरीर का लेप भस्म है, जिसके आभूषण सर्प हैं, जिसका वस्त्र दिशाएँ हैं, और जिसकी जटाएँ हैं।

श्लोक 39 (skanda.6.228.39)

कस्तस्य जीवितेनार्थस्तेनेदं मां ब्रवीति सः तस्माद्गत्वा द्रुतं ब्रूहि मद्वाक्यं दूत स्फुटम्

kastasya jīvitenārthastenedaṁ māṁ bravīti saḥ tasmādgatvā drutaṁ brūhi madvākyaṁ dūta sphuṭam

...उसे जीवन से क्या प्रयोजन, कि वह मुझसे ऐसा कहता है? इसलिए, हे दूत, शीघ्र जाकर मेरी बात स्पष्ट रूप से कह देना।

श्लोक 40 (skanda.6.228.40)

त्यक्त्वा कैलासमेनं त्वं वाराणस्यां तपः कुरु मया स्थानमिदं दत्तं कैलासं स्वसुतस्य च

tyaktvā kailāsamenaṁ tvaṁ vārāṇasyāṁ tapaḥ kuru mayā sthānamidaṁ dattaṁ kailāsaṁ svasutasya ca

तुम इस कैलास को त्यागकर वाराणसी में तपस्या करो; यह कैलास स्थान मैंने अपने पुत्र को दे दिया है।

श्लोक 41 (skanda.6.228.41)

वृकस्यापि न सन्देहो विभवेन समन्वितम् नो चेत्प्राणान्हरिष्यामि सेंद्रस्य तव शंकर

vṛkasyāpi na sandeho vibhavena samanvitam no cetprāṇānhariṣyāmi seṁdrasya tava śaṁkara

इसमें कोई संदेह नहीं कि वृक इस वैभव से युक्त होगा। अन्यथा, हे शंकर, मैं इंद्र सहित तुम्हारे प्राण हर लूँगा।

श्लोक 42 (skanda.6.228.42)

तच्छ्रुत्वा वीरभद्रस्तु निर्भर्त्स्य च मुहुर्मुहुः क्रोधेन महताविष्टः कैलासं समुपाविशत्

tacchrutvā vīrabhadrastu nirbhartsya ca muhurmuhuḥ krodhena mahatāviṣṭaḥ kailāsaṁ samupāviśat

यह सुनकर वीरभद्र ने बार-बार उसे धिक्कारा, और अत्यंत क्रोध से भर उठकर कैलास पर जा बैठा।

श्लोक 43 (skanda.6.228.43)

ततः स कथयामास तद्वाक्यं च पिनाकिनः अतिक्रूरं विशेषेण ततः क्रुद्धः पिनाकधृक्

tataḥ sa kathayāmāsa tadvākyaṁ ca pinākinaḥ atikrūraṁ viśeṣeṇa tataḥ kruddhaḥ pinākadhṛk

तब उसने पिनाकधारी शिव को वह अत्यंत क्रूर वचन कह सुनाया, जिससे पिनाकधारी शिव अत्यंत क्रुद्ध हो उठे।

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