नागर खण्ड · अध्याय 229
भृंगीरिट्युत्पत्तिवर्णन
श्लोक 1 (skanda.6.229.1)
सूत उवाच एतस्मिन्नंतरे शम्भुर्गणैः सर्वैः समावृतः इन्द्राद्यैश्च सुरैः सर्वेः क्रोधसंरक्तलोचनः जगाम वृषमारुह्य पुरीं चैवामरावतीम्
sūta uvāca etasminnaṁtare śambhurgaṇaiḥ sarvaiḥ samāvṛtaḥ indrādyaiśca suraiḥ sarveḥ krodhasaṁraktalocanaḥ jagāma vṛṣamāruhya purīṁ caivāmarāvatīm
सूत जी ने कहा — इसी बीच शंभु, समस्त गणों तथा इंद्रादि समस्त देवताओं से घिरे हुए, क्रोध से रक्तवर्ण नेत्रों वाले होकर, वृषभ पर आरूढ़ होकर अमरावती नगरी की ओर चल पड़े।
श्लोक 2 (skanda.6.229.2)
अंधकोऽपि समालोक्य संप्राप्तां देववाहिनीम् सगणां च महादेवं परितोषं परं गतः
aṁdhako'pi samālokya saṁprāptāṁ devavāhinīm sagaṇāṁ ca mahādevaṁ paritoṣaṁ paraṁ gataḥ
अंधक भी उस आई हुई देवसेना को तथा गणों सहित महादेव को देखकर अत्यंत हर्षित हो उठा।
श्लोक 3 (skanda.6.229.3)
निश्चक्रामाथ युद्धाय बलेन चतुरंगिणा वरं स्यंदनमारुह्य सुश्वेताश्ववहं शुभम्
niścakrāmātha yuddhāya balena caturaṁgiṇā varaṁ syaṁdanamāruhya suśvetāśvavahaṁ śubham
वह चतुरंगिणी सेना के साथ युद्ध के लिए निकल पड़ा, तथा शुभ, श्वेत अश्वों से युक्त उत्तम रथ पर सवार हो गया।
श्लोक 4 (skanda.6.229.4)
ततः समभवद्युद्धं देवानां दानवैः सह गणैश्च विकृताकारैर्मृत्युं कृत्वा निवर्तनम्
tataḥ samabhavadyuddhaṁ devānāṁ dānavaiḥ saha gaṇaiśca vikṛtākārairmṛtyuṁ kṛtvā nivartanam
तब देवताओं का दानवों तथा विकृत आकार वाले गणों के साथ युद्ध छिड़ गया, जिसमें मृत्यु ही निवृत्ति का साधन बनी।
श्लोक 5 (skanda.6.229.5)
एकवर्षसहस्रांतं यावद्युद्धमवर्तत दिनेदिने क्षयं यांति तत्र देवा न दानवाः ततो वर्षसहस्रांते संक्रुद्धः शशिशेखरः त्रिशूलेन समुद्यम्य स्वहस्तेन व्यभेदयत्
ekavarṣasahasrāṁtaṁ yāvadyuddhamavartata dinedine kṣayaṁ yāṁti tatra devā na dānavāḥ tato varṣasahasrāṁte saṁkruddhaḥ śaśiśekharaḥ triśūlena samudyamya svahastena vyabhedayat
वह युद्ध पूरे एक हज़ार वर्षों तक चलता रहा; उसमें प्रतिदिन देवता ही क्षीण होते गए, दानव नहीं। तब हज़ार वर्ष पूर्ण होने पर अत्यंत क्रुद्ध चंद्रशेखर ने अपने हाथ से त्रिशूल उठाकर उसे बींध डाला।
श्लोक 6 (skanda.6.229.6)
स विद्धोऽपि स्वयं तेन त्रिशूलेन महासुरः ब्रह्मणो वरमाहात्म्यान्नैव प्राणैर्वियुज्यते
sa viddho'pi svayaṁ tena triśūlena mahāsuraḥ brahmaṇo varamāhātmyānnaiva prāṇairviyujyate
उस त्रिशूल से बींधे जाने पर भी वह महासुर, ब्रह्मा के वरदान की महिमा से, अपने प्राणों से वियुक्त नहीं हुआ।
श्लोक 7 (skanda.6.229.7)
ततो भूयोऽपि चोत्थाय चक्रे युद्धं महात्मना जघान च स संक्रुद्धो विशेषेण बहून्गणान्
tato bhūyo'pi cotthāya cakre yuddhaṁ mahātmanā jaghāna ca sa saṁkruddho viśeṣeṇa bahūngaṇān
तब वह फिर उठकर उस महात्मा शिव से युद्ध करने लगा, और क्रोध में भरकर उसने विशेष रूप से बहुत से गणों का वध कर दिया।
श्लोक 8 (skanda.6.229.8)
शंकरं ताडयामास गदाघातैर्मुहुर्मुहुः
śaṁkaraṁ tāḍayāmāsa gadāghātairmuhurmuhuḥ
वह बार-बार गदा के प्रहारों से शंकर पर आघात करने लगा।
श्लोक 9 (skanda.6.229.9)
एवं वर्षसहस्रांतमभूत्सार्द्धं पिनाकिना रौद्रं युद्धमन्धकस्य सर्वलोकभयावहम्
evaṁ varṣasahasrāṁtamabhūtsārddhaṁ pinākinā raudraṁ yuddhamandhakasya sarvalokabhayāvaham
इस प्रकार पिनाकधारी शिव के साथ अंधक का वह भयंकर युद्ध हज़ार वर्षों तक चलता रहा, जो समस्त लोकों के लिए भयावह था।
श्लोक 10 (skanda.6.229.10)
त्रिशूलभिन्नो दैत्यः स यदा मृत्युं न गच्छति उत्थायोत्थाय कुरुते प्रहारान्गदया बली
triśūlabhinno daityaḥ sa yadā mṛtyuṁ na gacchati utthāyotthāya kurute prahārāngadayā balī
जब त्रिशूल से बिंधा हुआ वह दैत्य मृत्यु को प्राप्त नहीं हुआ, तब वह बलशाली बार-बार उठकर गदा से प्रहार करता रहा।
श्लोक 11 (skanda.6.229.11)
तथा तं शंकरो ज्ञात्वा मृत्युना परिवर्जितम् ब्रह्मणो वरदानेन सर्वेषां च दिवौकसाम्
tathā taṁ śaṁkaro jñātvā mṛtyunā parivarjitam brahmaṇo varadānena sarveṣāṁ ca divaukasām
तब शंकर ने जान लिया कि ब्रह्मा के वरदान से वह मृत्यु से रहित हो गया है — यह बात समस्त देवताओं के सामने प्रकट हुई।
श्लोक 12 (skanda.6.229.12)
ततो निर्भिद्य शूलाग्रैः प्रोत्क्षिप्य गगनांगणे छत्रवद्धारयामास लंबमानमधोमुखम् अक्षरद्रुधिरं भूमौ गात्रेभ्यो वर्ष्मसंभवम्
tato nirbhidya śūlāgraiḥ protkṣipya gaganāṁgaṇe chatravaddhārayāmāsa laṁbamānamadhomukham akṣaradrudhiraṁ bhūmau gātrebhyo varṣmasaṁbhavam
तब उसे त्रिशूल की नोकों से बींधकर आकाश-आँगन में उछाल दिया, और छत्र के समान उसे नीचे मुख किए हुए लटकाए रखा। उसके अंगों से उत्पन्न रक्त भूमि पर बहने लगा।
श्लोक 13 (skanda.6.229.13)
यावद्वर्षसहस्रांते चर्मास्थि स्नायुरेव च धातुत्रयं स्थितं तस्य नष्टमन्यच्चतुष्टयम्
yāvadvarṣasahasrāṁte carmāsthi snāyureva ca dhātutrayaṁ sthitaṁ tasya naṣṭamanyaccatuṣṭayam
यहाँ तक कि सहस्र वर्ष पूर्ण होने पर उसमें केवल चर्म, अस्थि और स्नायु — ये तीन धातुएँ ही शेष रहीं, शेष चार नष्ट हो गईं।
श्लोक 14 (skanda.6.229.14)
स ज्ञात्वा बल संहीनमात्मानं धातुसंक्षयात् सामोपायं ततश्चके स्तुत्वा सार्धं पिनाकिना
sa jñātvā bala saṁhīnamātmānaṁ dhātusaṁkṣayāt sāmopāyaṁ tataścake stutvā sārdhaṁ pinākinā
धातुओं के क्षय से स्वयं को बलहीन जानकर, उसने पिनाकधारी शिव की स्तुति करते हुए सामोपाय (सुलह का उपाय) अपनाया।
श्लोक 15 (skanda.6.229.15)
अन्धक उवाच न त्वं देवो मया ज्ञातो वाग्दुष्टेन दुरात्मना ईदृग्वीर्यसमोपेतस्तद्युक्तं भवता कृतम्
andhaka uvāca na tvaṁ devo mayā jñāto vāgduṣṭena durātmanā īdṛgvīryasamopetastadyuktaṁ bhavatā kṛtam
अंधक ने कहा — दुर्वचनी, दुरात्मा मैंने आपको ऐसे पराक्रम से युक्त देव के रूप में नहीं पहचाना; आपने मेरे साथ जो किया, वह उचित ही है।
श्लोक 16 (skanda.6.229.16)
अनुरूपं मदांधस्याविवेकस्य सुरोत्तम स्ववीर्यमदयुक्तस्य विवेकरहितस्य च
anurūpaṁ madāṁdhasyāvivekasya surottama svavīryamadayuktasya vivekarahitasya ca
हे सुरोत्तम, अपने बल के मद से युक्त, विवेकहीन तथा अहंकार से अंधे मुझ जैसे के लिए यह उपयुक्त ही है।
श्लोक 17 (skanda.6.229.17)
दुर्विनीतः श्रियं प्राप्य विद्यामैश्वर्यमेवच न तिष्ठति चिरं कालं यथाऽहं मदगर्वितः
durvinītaḥ śriyaṁ prāpya vidyāmaiśvaryamevaca na tiṣṭhati ciraṁ kālaṁ yathā'haṁ madagarvitaḥ
अविनीत मनुष्य लक्ष्मी, विद्या अथवा ऐश्वर्य को पाकर भी चिरकाल तक स्थिर नहीं रहता, जैसे मैं मद और गर्व से भर गया था।
श्लोक 18 (skanda.6.229.18)
पापोऽहं पापकर्माऽहं पापात्मा पापसंभवः त्राहि मां देव ईशान सर्वपापहरो भव
pāpo'haṁ pāpakarmā'haṁ pāpātmā pāpasaṁbhavaḥ trāhi māṁ deva īśāna sarvapāpaharo bhava
मैं पापी हूँ, मेरे कर्म पाप हैं, मेरी आत्मा पापमय है, मेरा जन्म ही पाप से हुआ है — हे ईशान देव, मेरी रक्षा कीजिए, आप समस्त पापों के हर्ता बनिए।
श्लोक 19 (skanda.6.229.19)
दुःखितोऽहं वराकोऽहं दीनोऽहं शक्तिवर्जितः त्रातुमर्हसि मां देव प्रपन्नं शरणं विभो
duḥkhito'haṁ varāko'haṁ dīno'haṁ śaktivarjitaḥ trātumarhasi māṁ deva prapannaṁ śaraṇaṁ vibho
मैं दुःखी हूँ, बेचारा हूँ, दीन हूँ, शक्तिहीन हूँ — हे देव, हे विभो, शरण में आए हुए मेरी रक्षा करने योग्य आप ही हैं।
श्लोक 20 (skanda.6.229.20)
दुष्टोऽहं पापयुक्तोऽहं सांप्रतं परमेश्वर तेन बुद्धिरियं जाता तवोपरि ममानघ
duṣṭo'haṁ pāpayukto'haṁ sāṁprataṁ parameśvara tena buddhiriyaṁ jātā tavopari mamānagha
हे परमेश्वर, मैं अभी भी दुष्ट हूँ, पापयुक्त हूँ — इसीलिए, हे निष्पाप, आपके प्रति यह बुद्धि मेरे भीतर उत्पन्न हुई है।
श्लोक 21 (skanda.6.229.21)
सर्वपापक्षये जाते शिवे भवति भावना
sarvapāpakṣaye jāte śive bhavati bhāvanā
समस्त पापों के नष्ट हो जाने पर ही शिव के प्रति भक्ति-भावना उत्पन्न होती है।
श्लोक 22 (skanda.6.229.22)
नाममात्रमपि त्र्यक्ष यस्ते कीर्तयति प्रभो सोऽपि मुक्तिमवाप्नोति किं पुनः पूजने रतः
nāmamātramapi tryakṣa yaste kīrtayati prabho so'pi muktimavāpnoti kiṁ punaḥ pūjane rataḥ
हे त्रिनेत्र प्रभो, जो आपके नाम का मात्र कीर्तन भी करता है, वह भी मुक्ति पाता है — फिर आपकी पूजा में तत्पर व्यक्ति के विषय में क्या कहना।
श्लोक 23 (skanda.6.229.23)
तव पूजा विहीनानां दिनान्यायांति यांति च यानि देव मृतानां च तानि यांति न जीवताम्
tava pūjā vihīnānāṁ dinānyāyāṁti yāṁti ca yāni deva mṛtānāṁ ca tāni yāṁti na jīvatām
हे देव, आपकी पूजा से रहित लोगों के जो दिन आते-जाते हैं, वे मृतकों के दिनों के समान हैं, जीवितों के नहीं।
श्लोक 24 (skanda.6.229.24)
कुष्ठी वा रोगयुक्तो वा पंगुर्वा बधिरोऽपि वा मा भूत्तस्य कुले जन्म शंभुर्यत्र न देवता
kuṣṭhī vā rogayukto vā paṁgurvā badhiro'pi vā mā bhūttasya kule janma śaṁbhuryatra na devatā
कोढ़ी हो, रोगी हो, लंगड़ा हो अथवा बहरा ही क्यों न हो — पर उस कुल में जन्म न हो, जहाँ शंभु आराध्य देवता न हों।
श्लोक 25 (skanda.6.229.25)
तस्मान्मोचय मां देव स्वागतं कुरु सांप्रतम् गतो मे दानवो भावस्त्यक्तं राज्यं तथा विभो
tasmānmocaya māṁ deva svāgataṁ kuru sāṁpratam gato me dānavo bhāvastyaktaṁ rājyaṁ tathā vibho
इसलिए, हे देव, मुझे मुक्त कीजिए, अब मेरा स्वागत कीजिए; मेरा दानव-भाव जाता रहा और, हे विभो, मैंने अपने राज्य को भी त्याग दिया है।
श्लोक 26 (skanda.6.229.26)
त्यक्ताः पुत्राश्च पौत्राश्च पत्न्यश्च विभवैः सह त्रिः सत्येन सुरश्रेष्ठ तव पादौ स्पृशाम्यहम्
tyaktāḥ putrāśca pautrāśca patnyaśca vibhavaiḥ saha triḥ satyena suraśreṣṭha tava pādau spṛśāmyaham
मैंने अपने पुत्रों, पौत्रों तथा पत्नियों को वैभव सहित त्याग दिया है; हे सुरश्रेष्ठ, तीन बार सत्य की शपथ लेकर मैं आपके चरण स्पर्श करता हूँ।
श्लोक 27 (skanda.6.229.27)
तस्य तद्वचनं श्रुत्वा ज्ञात्वा तं गतकल्मषम् उत्तार्य शनकैः शूलाद्विनयावनतं स्थितम्
tasya tadvacanaṁ śrutvā jñātvā taṁ gatakalmaṣam uttārya śanakaiḥ śūlādvinayāvanataṁ sthitam
उसके उन वचनों को सुनकर और उसे कल्मषरहित जानकर, विनयपूर्वक झुके हुए खड़े उस अंधक को उन्होंने धीरे-धीरे त्रिशूल से नीचे उतार दिया।
श्लोक 28 (skanda.6.229.28)
ततो नाम स्वयं चक्रे भृंगिरीटिरिति प्रभुः अब्रवीच्च सदा मे त्वं वल्लभः संभविष्यसि
tato nāma svayaṁ cakre bhṛṁgirīṭiriti prabhuḥ abravīcca sadā me tvaṁ vallabhaḥ saṁbhaviṣyasi
तब प्रभु ने स्वयं उसका नाम भृंगिरीटि रखा और कहा — तुम सदा मेरे प्रिय बने रहोगे।
श्लोक 29 (skanda.6.229.29)
नन्दिनोऽपि गजास्यस्य महाकालस्य पुत्रक तिष्ठ सौम्य मया सौख्यं न स्मरिष्यसि बांधवान्
nandino'pi gajāsyasya mahākālasya putraka tiṣṭha saumya mayā saukhyaṁ na smariṣyasi bāṁdhavān
तुम नंदी, गजमुख गणेश तथा महाकाल के पुत्र के समान रहोगे। हे सौम्य, यहीं ठहरो, मेरे साथ सुख भोगोगे और अपने बांधवों का स्मरण नहीं करोगे।
श्लोक 30 (skanda.6.229.30)
स तथेति प्रतिज्ञाय प्रणम्य शशिशेखरम् तस्थौ सर्वगणैर्युक्तः प्रभुसंश्रयसंयुतः
sa tatheti pratijñāya praṇamya śaśiśekharam tasthau sarvagaṇairyuktaḥ prabhusaṁśrayasaṁyutaḥ
वह 'तथास्तु' कहकर प्रतिज्ञा करके तथा चंद्रशेखर को प्रणाम करके, समस्त गणों के साथ प्रभु का आश्रय लेकर वहीं ठहर गया।