नागर खण्ड · अध्याय 231
जलशाय्युपाख्याने एकादशीव्रतमाहात्म्यवर्णन
श्लोक 1 (skanda.6.231.1)
सूत उवाच वृकोऽपि तत्समासाद्य राज्यं त्रैलोक्यसंभवम् यदृच्छया जगत्सर्वं समाज्ञापयत्तदा
sūta uvāca vṛko'pi tatsamāsādya rājyaṁ trailokyasaṁbhavam yadṛcchayā jagatsarvaṁ samājñāpayattadā
सूत जी ने कहा — वृक भी त्रैलोक्य में विद्यमान उस राज्य को पाकर, अपनी इच्छानुसार समस्त जगत् पर शासन करने लगा।
श्लोक 2 (skanda.6.231.2)
सोऽन्धकस्य बले वीर्ये धैर्ये कोपे च दानवः सहस्रगुणितश्चासीद्रौद्रः परमदारुणः
so'ndhakasya bale vīrye dhairye kope ca dānavaḥ sahasraguṇitaścāsīdraudraḥ paramadāruṇaḥ
वह दानव बल, पराक्रम, धैर्य तथा क्रोध में अंधक से हज़ार गुना अधिक था — अत्यंत भयंकर और परम दारुण।
श्लोक 3 (skanda.6.231.3)
एतस्मिन्नंतरे कश्चिन्न मर्त्यो यजति क्षितौ न होमं नैव जाप्यं च दैत्याञ्ज्ञात्वा सुरास्पदे
etasminnaṁtare kaścinna martyo yajati kṣitau na homaṁ naiva jāpyaṁ ca daityāñjñātvā surāspade
इस बीच पृथ्वी पर कोई भी मनुष्य यज्ञ नहीं करता था, न होम करता था, न जप — क्योंकि सब जानते थे कि दैत्य ही देवपद पर विराजमान हैं।
श्लोक 4 (skanda.6.231.4)
अथ यः कुरुते धर्मं होमं वा जपमेव वा सुगुप्तस्थानमासाद्य करोत्यमरतुष्टये
atha yaḥ kurute dharmaṁ homaṁ vā japameva vā suguptasthānamāsādya karotyamaratuṣṭaye
जो कोई धर्मकार्य, होम अथवा जप करता, वह देवताओं की तुष्टि के लिए किसी सुरक्षित, गुप्त स्थान में जाकर ही करता था।
श्लोक 5 (skanda.6.231.5)
अथ स्वर्गस्थिता दैत्या यज्ञभागविवर्जिताः तथा मर्त्योद्भवैर्भागैः संदेहं परमं गताः
atha svargasthitā daityā yajñabhāgavivarjitāḥ tathā martyodbhavairbhāgaiḥ saṁdehaṁ paramaṁ gatāḥ
स्वर्ग में स्थित दैत्य यज्ञभागों से वंचित रह गए, तथा मनुष्यों से प्राप्त होने वाले भागों के विषय में भी अत्यंत संदेह में पड़ गए।
श्लोक 6 (skanda.6.231.6)
ततः कोपपरीतात्मा प्रेषयामास दानवः मर्त्यलोके चरान्गुप्तान्निपुणांश्चाब्रवीत्ततः
tataḥ kopaparītātmā preṣayāmāsa dānavaḥ martyaloke carānguptānnipuṇāṁścābravīttataḥ
तब क्रोध से भरे उस दानव ने मृत्युलोक में गुप्त तथा निपुण गुप्तचरों को भेजा, और उनसे कहा।
श्लोक 7 (skanda.6.231.7)
यः कश्चिद्देवतानां च प्रगृह्णाति करोति च तदर्थं यजनं होमं दानं वा पृथिवीतले स च वध्यश्च युष्माभिर्मम वाक्यादसंशयम्
yaḥ kaściddevatānāṁ ca pragṛhṇāti karoti ca tadarthaṁ yajanaṁ homaṁ dānaṁ vā pṛthivītale sa ca vadhyaśca yuṣmābhirmama vākyādasaṁśayam
'जो कोई भी पृथ्वी पर देवताओं के निमित्त यजन, होम अथवा दान ग्रहण करता या करवाता है, वह मेरी आज्ञा से तुम्हारे द्वारा निःसंदेह वध्य है।'
श्लोक 8 (skanda.6.231.8)
अथ ते तद्वचः श्रुत्वा दानवा बलवत्तराः गत्वा च मेदिनीपृष्ठं गुप्ताः सर्पंति सर्वतः
atha te tadvacaḥ śrutvā dānavā balavattarāḥ gatvā ca medinīpṛṣṭhaṁ guptāḥ sarpaṁti sarvataḥ
यह वचन सुनकर वे अत्यंत बलशाली दानव पृथ्वीतल पर जाकर गुप्त रूप से सर्वत्र विचरने लगे।
श्लोक 9 (skanda.6.231.9)
यं कञ्चिद्वीक्षयंति स्म जपहोमपरायणम् स्वाध्यायं वा प्रकुर्वाणं तं निघ्नंति शितासिभिः
yaṁ kañcidvīkṣayaṁti sma japahomaparāyaṇam svādhyāyaṁ vā prakurvāṇaṁ taṁ nighnaṁti śitāsibhiḥ
जिस किसी को भी वे जप-होम में लगा हुआ अथवा स्वाध्याय करता हुआ देख लेते, उसे तीक्ष्ण तलवारों से मार डालते थे।
श्लोक 10 (skanda.6.231.10)
एतस्मिन्नेव काले तु सांकृतिर्मुनिसत्तमः गुप्तश्चक्रे ततस्तस्यां गर्तायां छन्नवर्ष्मकः यत्र पूर्वं तपस्तप्तं वृकेण च द्विजाः पुरा
etasminneva kāle tu sāṁkṛtirmunisattamaḥ guptaścakre tatastasyāṁ gartāyāṁ channavarṣmakaḥ yatra pūrvaṁ tapastaptaṁ vṛkeṇa ca dvijāḥ purā
हे द्विजो, इसी समय मुनिश्रेष्ठ सांकृति ने अपने शरीर को छिपाकर उसी गर्त में गुप्त रूप से तप करना आरंभ किया, जहाँ पूर्वकाल में वृक ने स्वयं तप किया था।
श्लोक 11 (skanda.6.231.11)
अथ ते तं तदा दृष्ट्वा तद्गुहायां व्यवस्थितम् भर्त्समानास्तपस्तच्च प्रोचुश्च परुषाक्षरैः
atha te taṁ tadā dṛṣṭvā tadguhāyāṁ vyavasthitam bhartsamānāstapastacca procuśca paruṣākṣaraiḥ
उस गुफा में स्थित उसे देखकर, उन्होंने उसके तप की निंदा करते हुए कठोर वचनों से उससे कहा।
श्लोक 12 (skanda.6.231.12)
दृष्ट्वा तस्याग्रतः संस्थां गन्धपुष्पैश्च पूजिताम् वासुदेवात्मिकां मूर्तिं चतुर्हस्तां द्विजोत्तमाः
dṛṣṭvā tasyāgrataḥ saṁsthāṁ gandhapuṣpaiśca pūjitām vāsudevātmikāṁ mūrtiṁ caturhastāṁ dvijottamāḥ
हे द्विजोत्तमो, उन्होंने उसके सामने गंध-पुष्पों से पूजित, चतुर्भुज वासुदेव की मूर्ति स्थापित देखी।
श्लोक 13 (skanda.6.231.13)
ततस्ते शस्त्रमुद्यम्य निर्जघ्नुस्तं क्रुधान्विताः न शेकुस्ते यदा हंतुं संवृतं विष्णुतेजसा कुण्ठतां सर्वशस्त्राणि गतानि विमलान्यपि
tataste śastramudyamya nirjaghnustaṁ krudhānvitāḥ na śekuste yadā haṁtuṁ saṁvṛtaṁ viṣṇutejasā kuṇṭhatāṁ sarvaśastrāṇi gatāni vimalānyapi
तब वे क्रोध में भरकर शस्त्र उठाकर उस पर टूट पड़े, परंतु विष्णु के तेज से आवृत उस मूर्ति को जब वे नष्ट नहीं कर सके, तब उनके समस्त निर्मल शस्त्र भी कुंठित हो गए।
श्लोक 14 (skanda.6.231.14)
अथ वैलक्ष्यमापन्ना निर्विण्णाः सर्व एव ते तां वार्तां दानवेन्द्राय वृकायोचुश्च ते तदा
atha vailakṣyamāpannā nirviṇṇāḥ sarva eva te tāṁ vārtāṁ dānavendrāya vṛkāyocuśca te tadā
तब लज्जित और खिन्न होकर वे सब दानवेंद्र वृक के पास गए और उसे यह समाचार सुनाया।
श्लोक 15 (skanda.6.231.15)
कश्चिद्विप्रः समाधाय वैष्णवीं प्रतिमां पुरः तपस्तेपे महाभाग क्षेत्रे वै हाटकेश्वरे
kaścidvipraḥ samādhāya vaiṣṇavīṁ pratimāṁ puraḥ tapastepe mahābhāga kṣetre vai hāṭakeśvare
'हे महाभाग, कोई ब्राह्मण अपने सामने विष्णु की मूर्ति स्थापित करके हाटकेश्वर क्षेत्र में तप कर रहा है —'
श्लोक 16 (skanda.6.231.16)
यत्र त्वया तपस्तप्तं भीत्या सर्वदिवौकसाम् अपि चौर्येण चास्माकं तपस्तपति तादृशम्
yatra tvayā tapastaptaṁ bhītyā sarvadivaukasām api cauryeṇa cāsmākaṁ tapastapati tādṛśam
'— उसी स्थान पर, जहाँ आपने समस्त देवताओं को भयभीत करने वाला तप किया था; मानो हमसे चुराकर वह वैसा ही तप कर रहा है।'
श्लोक 17 (skanda.6.231.17)
येन सर्वाणि शस्त्राणि कुण्ठतां प्रगतानि च तस्य गात्रे प्रहारैश्च तस्मात्कुरु यथोचितम्
yena sarvāṇi śastrāṇi kuṇṭhatāṁ pragatāni ca tasya gātre prahāraiśca tasmātkuru yathocitam
'जिसके शरीर पर प्रहार करने से हमारे समस्त शस्त्र कुंठित हो गए, उसके प्रति अब आप जो उचित हो वह कीजिए।'
श्लोक 18 (skanda.6.231.18)
तेषां तद्वचनं श्रुत्वा वृकः कोपसमन्वितः जगाम सत्वरं तत्र यत्रासौ सांकृतिः स्थितः
teṣāṁ tadvacanaṁ śrutvā vṛkaḥ kopasamanvitaḥ jagāma satvaraṁ tatra yatrāsau sāṁkṛtiḥ sthitaḥ
उनका वह वचन सुनकर क्रोध से भरा हुआ वृक शीघ्रता से वहाँ पहुँचा, जहाँ वह सांकृति स्थित था।
श्लोक 19 (skanda.6.231.19)
स गत्वा वैष्णवीं मूर्तिं तामुत्क्षिप्य सुदूरतः श्वभ्राद्बहिः प्रचिक्षेप भर्त्समानः पुनः पुनः
sa gatvā vaiṣṇavīṁ mūrtiṁ tāmutkṣipya sudūrataḥ śvabhrādbahiḥ pracikṣepa bhartsamānaḥ punaḥ punaḥ
वहाँ जाकर उसने विष्णु की उस मूर्ति को उठाकर, बार-बार धिक्कारते हुए, गर्त से बाहर बहुत दूर फेंक दिया।
श्लोक 20 (skanda.6.231.20)
जघान पादघातेन दक्षिणेनेतरेण तम् अब्रवीन्मम वध्यस्त्वं यन्मच्छत्रुं जनार्दनम्
jaghāna pādaghātena dakṣiṇenetareṇa tam abravīnmama vadhyastvaṁ yanmacchatruṁ janārdanam
उसने दाहिने और बाएँ दोनों पैरों से उस पर प्रहार किया, और कहा — 'तू मेरे शत्रु जनार्दन की पूजा करता है, इसलिए मेरे द्वारा वध्य है —'
श्लोक 21 (skanda.6.231.21)
संपूजयसि चौर्येण तेन प्राणान्हराम्यहम् एवमुक्त्वाथ खड्गेन तं जघान स दैत्यपः
saṁpūjayasi cauryeṇa tena prāṇānharāmyaham evamuktvātha khaḍgena taṁ jaghāna sa daityapaḥ
'— और छिपकर उसकी पूजा करता है, इसलिए मैं तेरे प्राण हर लूँगा।' ऐसा कहकर उस दैत्यराज ने तलवार से उस पर प्रहार किया।
श्लोक 22 (skanda.6.231.22)
ततस्तस्य स खड्गस्तु तीक्ष्णोऽपि द्विजसत्तमाः तस्य काये प्रहीणस्तु शतधा समपद्यत
tatastasya sa khaḍgastu tīkṣṇo'pi dvijasattamāḥ tasya kāye prahīṇastu śatadhā samapadyata
हे द्विजसत्तमो, परंतु तीक्ष्ण होते हुए भी उसकी वह तलवार, मूर्ति के शरीर पर पड़ते ही सौ टुकड़ों में टूट गई।
श्लोक 23 (skanda.6.231.23)
ततः कोपपरीतात्मा तं शशाप स सांकृतिः
tataḥ kopaparītātmā taṁ śaśāpa sa sāṁkṛtiḥ
तब क्रोध से भरे हुए उस सांकृति ने उसे शाप दे दिया।
श्लोक 24 (skanda.6.231.24)
यस्मात्पाप त्वयाहं च पादघातैः प्रताडितः तस्मात्ते पततां पादौ सद्य एव धरातले
yasmātpāpa tvayāhaṁ ca pādaghātaiḥ pratāḍitaḥ tasmātte patatāṁ pādau sadya eva dharātale
'हे पापी, चूँकि तूने मुझे पैरों की चोटों से पीटा है, इसलिए तेरे दोनों पैर अभी इसी क्षण भूमि पर गिर जाएँ।'
श्लोक 25 (skanda.6.231.25)
सूत उवाच उक्तमात्रे ततस्तेन पादौ तस्य द्विजोत्तमाः पतितौ मेदिनीपृष्ठे पंचशीर्षाविवोरगौ
sūta uvāca uktamātre tatastena pādau tasya dvijottamāḥ patitau medinīpṛṣṭhe paṁcaśīrṣāvivoragau
सूत जी ने कहा — हे द्विजोत्तमो, ऐसा कहते ही उसके दोनों पैर, पंचमुखी सर्पों के समान, पृथ्वीतल पर गिर पड़े।
श्लोक 26 (skanda.6.231.26)
एतस्मिन्नेव काले तु आक्रन्दः सुमहानभूत् वृकस्य सैनिकानां च नारीणां च विशेषतः
etasminneva kāle tu ākrandaḥ sumahānabhūt vṛkasya sainikānāṁ ca nārīṇāṁ ca viśeṣataḥ
उसी समय वृक के सैनिकों और विशेषतः स्त्रियों का बहुत बड़ा विलाप हुआ।
श्लोक 27 (skanda.6.231.27)
अथ देवाः परिज्ञाय तं तदा पंगुतां गतम् आगत्य मेरुपृष्ठं च निजघ्नुस्तत्परिग्रहम्
atha devāḥ parijñāya taṁ tadā paṁgutāṁ gatam āgatya merupṛṣṭhaṁ ca nijaghnustatparigraham
तब देवताओं ने यह जानकर कि वह लंगड़ा हो गया है, मेरु पर्वत के शिखर पर आकर उसके अनुचरों का वध कर डाला।
श्लोक 28 (skanda.6.231.28)
हतशेषाश्च दैत्यास्ते पातालांतःसमा गताः वृकोऽपि पंगुतां प्राप्तस्तस्थौ तपसि सुस्थिरम्
hataśeṣāśca daityāste pātālāṁtaḥsamā gatāḥ vṛko'pi paṁgutāṁ prāptastasthau tapasi susthiram
जो दैत्य वध से बच गए, वे पाताल में जा घुसे; वृक भी लंगड़ा होकर वहीं दृढ़ता से तप में स्थित हो गया।
श्लोक 29 (skanda.6.231.29)
सर्वैरंतःपुरैः सार्धं दुःखशोकसमन्वितः इन्द्रोऽपि प्राप्तवान्राज्यं तदा निहतकंटकम्
sarvairaṁtaḥpuraiḥ sārdhaṁ duḥkhaśokasamanvitaḥ indro'pi prāptavānrājyaṁ tadā nihatakaṁṭakam
वह अपने समस्त अंतःपुर सहित दुःख-शोक से युक्त रहने लगा; उधर इंद्र ने भी अपना कंटकरहित राज्य पुनः प्राप्त कर लिया।
श्लोक 30 (skanda.6.231.30)
धर्मक्रियाः प्रवृत्ताश्च ततो भूयो रसातले
dharmakriyāḥ pravṛttāśca tato bhūyo rasātale
तब पृथ्वी पर और रसातल में भी पुनः धर्मकार्य चलने लगे।
श्लोक 31 (skanda.6.231.31)
अथ दीर्घेण कालेन तस्य तुष्टः पितामहः उवाच तत्र चागत्य गर्त्तामध्ये द्विजोत्तमाः
atha dīrgheṇa kālena tasya tuṣṭaḥ pitāmahaḥ uvāca tatra cāgatya garttāmadhye dvijottamāḥ
हे द्विजोत्तमो, तत्पश्चात् दीर्घकाल बीतने पर उससे प्रसन्न हुए पितामह ब्रह्मा ने वहाँ आकर, उस गर्त के भीतर ही उससे कहा।
श्लोक 32 (skanda.6.231.32)
वृक तुष्टोऽस्मि ते वत्स वरं वरय सुव्रत अहं दास्यामि ते नूनं यद्यपि स्यात्सुदुर्लभम्
vṛka tuṣṭo'smi te vatsa varaṁ varaya suvrata ahaṁ dāsyāmi te nūnaṁ yadyapi syātsudurlabham
'हे वृक, हे सुव्रत, मैं तुझसे प्रसन्न हूँ; वर माँग, मैं निश्चय ही तुझे वह दूँगा, चाहे वह अत्यंत दुर्लभ ही क्यों न हो।'
श्लोक 33 (skanda.6.231.33)
वृक उवाच यदि तुष्टोऽसि मे देव यदि देयो वरो मम पाददानं तदा देव मम ब्रह्मन्समाचर पंगुता याति शीघ्रं मे येनेयं ते प्रसादतः
vṛka uvāca yadi tuṣṭo'si me deva yadi deyo varo mama pādadānaṁ tadā deva mama brahmansamācara paṁgutā yāti śīghraṁ me yeneyaṁ te prasādataḥ
वृक ने कहा — हे देव, यदि आप मुझसे प्रसन्न हैं, और यदि मुझे वर देना है, तो हे ब्रह्मन्, मुझे मेरे पैर लौटा दीजिए, जिससे आपकी कृपा से मेरी यह लंगड़ाहट शीघ्र दूर हो जाए।
श्लोक 34 (skanda.6.231.34)
तच्छ्रुत्वा तं समानीय सांकृतिं तत्र पद्मजः प्रोवाच सांत्वपूर्वं च वृकस्यास्य द्विजोत्तम
tacchrutvā taṁ samānīya sāṁkṛtiṁ tatra padmajaḥ provāca sāṁtvapūrvaṁ ca vṛkasyāsya dvijottama
यह सुनकर पद्मजन्मा ब्रह्मा ने सांकृति को वहाँ बुलाकर, हे द्विजोत्तम, वृक के हित में उससे सांत्वनापूर्वक कहा।
श्लोक 35 (skanda.6.231.35)
मद्वाक्यात्पंगुता याति येनास्य त्वं तथा कुरु
madvākyātpaṁgutā yāti yenāsya tvaṁ tathā kuru
'मेरे कहने से इसकी लंगड़ाहट दूर हो जाए, ऐसा तुम कुछ करो।'
श्लोक 36 (skanda.6.231.36)
सांकृतिरुवाच अनृतं नोक्तपूर्वं मे स्वैरेष्वपि पितामह ज्ञायते देवदेवेश तत्कथं तत्करोम्यहम्
sāṁkṛtiruvāca anṛtaṁ noktapūrvaṁ me svaireṣvapi pitāmaha jñāyate devadeveśa tatkathaṁ tatkaromyaham
सांकृति ने कहा — हे पितामह, हे देवदेवेश, यह सर्वविदित है कि मैंने साधारण बातों में भी कभी असत्य नहीं बोला — फिर मैं यह कैसे करूँ?
श्लोक 37 (skanda.6.231.37)
ब्रह्मोवाच मम भक्तिपरो नित्यं वृकोऽयं दैत्यसत्तमः पौत्रस्त्वं दयितो नित्यं तेन त्वां प्रार्थयाम्यहम्
brahmovāca mama bhaktiparo nityaṁ vṛko'yaṁ daityasattamaḥ pautrastvaṁ dayito nityaṁ tena tvāṁ prārthayāmyaham
ब्रह्मा ने कहा — यह दैत्यश्रेष्ठ वृक सदा मेरा भक्त है, और तुम मेरे प्रिय पौत्र हो — इसीलिए मैं तुमसे यह प्रार्थना करता हूँ।
श्लोक 38 (skanda.6.231.38)
तव वाक्यं च नो मिथ्या कर्तुं शक्नोमि सन्मुने
tava vākyaṁ ca no mithyā kartuṁ śaknomi sanmune
हे सन्मुने, मैं तुम्हारे वचन को भी मिथ्या नहीं कर सकता।
श्लोक 39 (skanda.6.231.39)
सांकृतिरुवाच एष दैत्यः सुदुष्टात्मा देवानामहिते स्थितः विशेषाद्वासुदेवस्य पुरोर्मम महात्मनः
sāṁkṛtiruvāca eṣa daityaḥ suduṣṭātmā devānāmahite sthitaḥ viśeṣādvāsudevasya purormama mahātmanaḥ
सांकृति ने कहा — यह दैत्य अत्यंत दुष्टात्मा है, सदा देवताओं के अहित में लगा रहता है, और विशेषरूप से मेरे रक्षक महात्मा वासुदेव के भी।
श्लोक 40 (skanda.6.231.40)
पंगुतामर्हति प्रायः पापात्मा द्विजदूषकः बलेन महता युक्तो जरामरणवर्जितः
paṁgutāmarhati prāyaḥ pāpātmā dvijadūṣakaḥ balena mahatā yukto jarāmaraṇavarjitaḥ
इतने महान बल से युक्त, जरा-मृत्यु से रहित, ब्राह्मणों को दूषित करने वाला यह पापात्मा प्रायः लंगड़ेपन के ही योग्य है।
श्लोक 41 (skanda.6.231.41)
पुरा कृतस्त्वया देव स चेत्पादाववाप्स्यति हनिष्यति जगत्सर्वं सदेवासुरमानुषम्
purā kṛtastvayā deva sa cetpādāvavāpsyati haniṣyati jagatsarvaṁ sadevāsuramānuṣam
हे देव, आपके द्वारा पूर्वकाल में जैसा बनाया गया है, यदि यह अपने पैर पुनः पा जाए, तो देव-असुर-मनुष्य सहित समस्त जगत् का विनाश कर देगा।
श्लोक 42 (skanda.6.231.42)
तस्मात्तिष्ठतु तद्रूपो न कल्पं कर्तुमर्हसि त्वयापि चिन्ता कर्तव्या त्रैलोक्यस्य यतः प्रभो
tasmāttiṣṭhatu tadrūpo na kalpaṁ kartumarhasi tvayāpi cintā kartavyā trailokyasya yataḥ prabho
इसलिए यह इसी रूप में रहे, आपको ऐसा विधान नहीं करना चाहिए; हे प्रभो, आपको भी त्रैलोक्य का विचार करना चाहिए।
श्लोक 43 (skanda.6.231.43)
ब्रह्मोवाच प्रावृट्काले तु सञ्जाते यानं कर्तुं न युज्यते विजिगीषोर्विशेषेण मुक्त्वा शीतातपागमम्
brahmovāca prāvṛṭkāle tu sañjāte yānaṁ kartuṁ na yujyate vijigīṣorviśeṣeṇa muktvā śītātapāgamam
ब्रह्मा ने कहा — वर्षाकाल आने पर यात्रा करना उचित नहीं होता, विशेषतः विजय की इच्छा रखने वाले के लिए — केवल शीत और ग्रीष्म ऋतुओं को छोड़कर।
श्लोक 44 (skanda.6.231.44)
तस्माच्च चतुरो मासान्वार्षिकान्पादसंयुतः अगम्यः सर्वलोकानां कुर्यात्कर्माणि धैर्यतः
tasmācca caturo māsānvārṣikānpādasaṁyutaḥ agamyaḥ sarvalokānāṁ kuryātkarmāṇi dhairyataḥ
इसलिए वर्षा के चार महीनों तक यह अपने पैरों सहित समस्त लोकों के लिए अगम्य रहकर धैर्यपूर्वक अपने कार्य करे।
श्लोक 45 (skanda.6.231.45)
तद्भूयात्पादसंयुक्तः स वृको दानवोत्तमः येन क्षेमं च देवानां द्विजानां जायते द्विज
tadbhūyātpādasaṁyuktaḥ sa vṛko dānavottamaḥ yena kṣemaṁ ca devānāṁ dvijānāṁ jāyate dvija
हे द्विज, ऐसा हो कि वह दानवश्रेष्ठ वृक अपने पैरों सहित रहे, इस प्रकार कि देवताओं और ब्राह्मणों का कल्याण भी बना रहे।
श्लोक 46 (skanda.6.231.46)
एवं कृते न मिथ्या ते वाक्यं विप्र भविष्यति फलं च तपसस्तस्य न वृथा संभविष्यति
evaṁ kṛte na mithyā te vākyaṁ vipra bhaviṣyati phalaṁ ca tapasastasya na vṛthā saṁbhaviṣyati
ऐसा करने पर, हे विप्र, तुम्हारा वचन भी मिथ्या नहीं होगा, और उसकी तपस्या का फल भी व्यर्थ नहीं जाएगा।
श्लोक 47 (skanda.6.231.47)
सूत उवाच बाढमित्येव तेनोक्ते सांकृतेन महात्मना उत्थितौ सहसा पादौ तस्य गात्रात्पुनर्नवौ
sūta uvāca bāḍhamityeva tenokte sāṁkṛtena mahātmanā utthitau sahasā pādau tasya gātrātpunarnavau
सूत जी ने कहा — महात्मा सांकृति के 'ऐसा ही हो' कहते ही, उसके शरीर से उसके दोनों पैर पुनः नए होकर तत्क्षण निकल आए।
श्लोक 48 (skanda.6.231.48)
पुनश्च दानवो रौद्रः पशुत्वं समपद्यत तस्यामेव तु गर्तायां संतिष्ठति द्विजोत्तमाः
punaśca dānavo raudraḥ paśutvaṁ samapadyata tasyāmeva tu gartāyāṁ saṁtiṣṭhati dvijottamāḥ
हे द्विजोत्तमो, परंतु वह भयंकर दानव पुनः पशुत्व को प्राप्त हो गया और उसी गर्त में रहने लगा।
श्लोक 49 (skanda.6.231.49)
मासानष्टौ स दुःखेन सकलत्रः सबांधवः स्मरमाणो महद्वैरं दैवैः सार्धं दिवानिशम्
māsānaṣṭau sa duḥkhena sakalatraḥ sabāṁdhavaḥ smaramāṇo mahadvairaṁ daivaiḥ sārdhaṁ divāniśam
वह अपनी पत्नी और बंधुओं सहित आठ महीने तक दुःखपूर्वक वहीं रहता है, दिन-रात देवताओं के साथ अपने महान वैर का स्मरण करता हुआ।
श्लोक 50 (skanda.6.231.50)
अन्यांश्च चतुरो मासान्निष्क्रम्य स रुषान्वितः सदा पीडयते देवान्सहेंद्रान्मानुषानपि
anyāṁśca caturo māsānniṣkramya sa ruṣānvitaḥ sadā pīḍayate devānsaheṁdrānmānuṣānapi
शेष चार महीनों में बाहर निकलकर वह क्रोध से भरा हुआ इंद्र सहित देवताओं तथा मनुष्यों को भी सदा पीड़ित करता रहता है।
श्लोक 51 (skanda.6.231.51)
विध्वंसयति सर्वाणि धर्मस्थानानि यानि च
vidhvaṁsayati sarvāṇi dharmasthānāni yāni ca
वह धर्म के समस्त स्थानों को नष्ट कर डालता है।
श्लोक 52 (skanda.6.231.52)
विध्वंसयति देवानां स्त्रियो मासचतुष्टयम् उद्यानानि च सर्वाणि सपुराणि गृहाणि च
vidhvaṁsayati devānāṁ striyo māsacatuṣṭayam udyānāni ca sarvāṇi sapurāṇi gṛhāṇi ca
उन चार महीनों में वह देवताओं की स्त्रियों को, समस्त उद्यानों को, नगरों तथा घरों को भी विध्वस्त कर देता है।
श्लोक 53 (skanda.6.231.53)
ततो देवाः समभ्येत्य देवदेवं जनार्दनम् क्षीराब्धौ संस्थितं नित्यं शेषपर्यंकशायिनम्
tato devāḥ samabhyetya devadevaṁ janārdanam kṣīrābdhau saṁsthitaṁ nityaṁ śeṣaparyaṁkaśāyinam
तब देवता एकत्र होकर देवदेव जनार्दन के पास जाते हैं, जो क्षीरसागर में सदा शेषशय्या पर शयन करते रहते हैं।
श्लोक 54 (skanda.6.231.54)
चतुरो वार्षिकान्मासांस्तत्र स्थित्वा तदंतिके मासानष्टौ पुनर्जग्मुस्त्रिदिवं प्रति निर्भयाः
caturo vārṣikānmāsāṁstatra sthitvā tadaṁtike māsānaṣṭau punarjagmustridivaṁ prati nirbhayāḥ
वहाँ उनके समीप वर्षा के चार महीने बिताकर, शेष आठ महीनों के लिए वे निर्भय होकर पुनः स्वर्ग को लौट जाते हैं।
श्लोक 55 (skanda.6.231.55)
तस्मिन्पंगुत्वमापन्ने दैत्ये परमदारुणे कस्यचित्त्वथ कालस्य देवराजो बृहस्पतिम् प्रोवाच दुःखसंतप्त आषाढांते सुरोत्तमः
tasminpaṁgutvamāpanne daitye paramadāruṇe kasyacittvatha kālasya devarājo bṛhaspatim provāca duḥkhasaṁtapta āṣāḍhāṁte surottamaḥ
एक बार जब वह अत्यंत भयंकर दैत्य पुनः लंगड़ेपन को प्राप्त हो चुका था, तब कुछ काल पश्चात्, आषाढ़ मास के अंत में, दुःख से संतप्त देवराज इंद्र ने बृहस्पति से कहा।
श्लोक 56 (skanda.6.231.56)
गुरो स मासः संप्राप्तः प्रावृट्कालो भयावहः आगमिष्यति यत्रासौ लब्धपादो वृकासुरः
guro sa māsaḥ saṁprāptaḥ prāvṛṭkālo bhayāvahaḥ āgamiṣyati yatrāsau labdhapādo vṛkāsuraḥ
'हे गुरु, वह भयावह वर्षाकाल का महीना आ पहुँचा है, जिसमें पैर पुनः प्राप्त करके वह वृकासुर आ धमकेगा।'
श्लोक 57 (skanda.6.231.57)
गन्तव्यं च ततोऽस्माभिः क्षीरोदे केशवालये मैवं दीनैस्तथा भाव्यं पराश्रयनिवासिभिः
gantavyaṁ ca tato'smābhiḥ kṣīrode keśavālaye maivaṁ dīnaistathā bhāvyaṁ parāśrayanivāsibhiḥ
'इसलिए हमें क्षीरसागर में केशव के धाम को जाना होगा। ऐसा न हो कि हमें सदा दीन होकर पराश्रय में ही रहना पड़े।'
श्लोक 58 (skanda.6.231.58)
स्वगृहाणि परित्यज्य शयनान्यासनानि च वाहनानि विचित्राणि यच्चान्यद्दयितं गृहे
svagṛhāṇi parityajya śayanānyāsanāni ca vāhanāni vicitrāṇi yaccānyaddayitaṁ gṛhe
'अपने घरों को, शय्याओं और आसनों को, विचित्र वाहनों को तथा घर की अन्य प्रिय वस्तुओं को त्यागकर।'
श्लोक 59 (skanda.6.231.59)
तस्मात्कथय चास्माकमुपायं कञ्चिदेव हि व्रतं वा नियमं वाथ होमं वा मुनिसत्तम
tasmātkathaya cāsmākamupāyaṁ kañcideva hi vrataṁ vā niyamaṁ vātha homaṁ vā munisattama
'इसलिए, हे मुनिश्रेष्ठ, हमें कोई उपाय बताइए — कोई व्रत, नियम अथवा होम।'
श्लोक 60 (skanda.6.231.60)
अशून्यं शयनं येन स्वकलत्रेण जायते तथा न गृहसंत्यागः स्वकीयस्य प्रजायते
aśūnyaṁ śayanaṁ yena svakalatreṇa jāyate tathā na gṛhasaṁtyāgaḥ svakīyasya prajāyate
'— जिससे हमारी शय्या अपनी पत्नी से रहित न हो, तथा अपने घर का त्याग भी न करना पड़े।'
श्लोक 61 (skanda.6.231.61)
निर्विण्णोऽहं निजस्थानभ्रंशाद्द्विजवरोत्तम वर्षेवर्षे च सम्प्राप्ते स्थानकस्य च्युतिर्भवेत्
nirviṇṇo'haṁ nijasthānabhraṁśāddvijavarottama varṣevarṣe ca samprāpte sthānakasya cyutirbhavet
'हे द्विजवरोत्तम, मैं अपने स्थान से बार-बार भ्रष्ट होने से विरक्त हो चुका हूँ; प्रतिवर्ष यह अपने पद से च्युति होती रहती है।'
श्लोक 62 (skanda.6.231.62)
पुनर्भूमौ शयिष्यामि यावन्मासचतुष्टयम् निष्कलत्रो भयोद्विग्नो ब्रह्मचर्यपरायणः
punarbhūmau śayiṣyāmi yāvanmāsacatuṣṭayam niṣkalatro bhayodvigno brahmacaryaparāyaṇaḥ
'मुझे फिर से चार महीनों तक भूमि पर सोना पड़ेगा, पत्नी से रहित, भय से व्याकुल, ब्रह्मचर्य में तत्पर होकर।'
श्लोक 63 (skanda.6.231.63)
तस्य तद्वचनं श्रुत्वा भयार्तस्य बृहस्पतिः प्रोवाच सुचिरं ध्यात्वा ततो देवं शतक्रतुम्
tasya tadvacanaṁ śrutvā bhayārtasya bṛhaspatiḥ provāca suciraṁ dhyātvā tato devaṁ śatakratum
भय से व्याकुल उसके वे वचन सुनकर, बृहस्पति ने दीर्घकाल विचार करके तब देवराज इंद्र से कहा।
श्लोक 64 (skanda.6.231.64)
अशून्यशयनं नाम व्रतमस्ति महत्तपः विष्णोराराधनार्थाय तत्कुरुष्व समाहितः
aśūnyaśayanaṁ nāma vratamasti mahattapaḥ viṣṇorārādhanārthāya tatkuruṣva samāhitaḥ
'अशून्यशयन नामक एक महान तपस्यामय व्रत है; विष्णु की आराधना के लिए एकाग्रचित्त होकर उसे करो।'
श्लोक 65 (skanda.6.231.65)
देवो यत्रास्ति विष्णुः स क्षीराब्धौ मधुसूदनः जलशायी जगद्योनिः स दास्यति हितं च ते
devo yatrāsti viṣṇuḥ sa kṣīrābdhau madhusūdanaḥ jalaśāyī jagadyoniḥ sa dāsyati hitaṁ ca te
'जो देव विष्णु, मधुसूदन, क्षीरसागर में जलशायी और जगत् के मूल कारण के रूप में विद्यमान हैं, वे ही तुम्हारा हित करेंगे।'
श्लोक 66 (skanda.6.231.66)
यथा न शून्यं शयनं गृहभंगः प्रजायते सर्वशत्रुविनाशश्च तत्प्रसादेन वासव
yathā na śūnyaṁ śayanaṁ gṛhabhaṁgaḥ prajāyate sarvaśatruvināśaśca tatprasādena vāsava
'हे वासव, उनकी कृपा से तुम्हारी शय्या शून्य नहीं होगी, घर का विनाश नहीं होगा, और समस्त शत्रुओं का नाश हो जाएगा।'
श्लोक 67 (skanda.6.231.67)
सूत उवाच तस्मिन्व्रते ततश्चीर्णे ह्यशून्यशयनात्मके तुतोष भगवान्विष्णुस्ततः प्रोवाच देवपम्
sūta uvāca tasminvrate tataścīrṇe hyaśūnyaśayanātmake tutoṣa bhagavānviṣṇustataḥ provāca devapam
सूत जी ने कहा — जब वह अशून्यशयन नामक व्रत पूर्ण हो गया, तब भगवान् विष्णु प्रसन्न हुए और देवराज से कहा।
श्लोक 68 (skanda.6.231.68)
शक्र तुष्टोऽस्मि भद्रं ते वरं वरय सुव्रत व्रतेनानेन चीर्णेन चातुर्मास्योद्भवेन च तस्मात्प्रार्थय देवेन्द्र नित्यं यन्मनसि स्थितम्
śakra tuṣṭo'smi bhadraṁ te varaṁ varaya suvrata vratenānena cīrṇena cāturmāsyodbhavena ca tasmātprārthaya devendra nityaṁ yanmanasi sthitam
'हे शक्र, हे सुव्रत, मैं तुमसे प्रसन्न हूँ, तुम्हारा कल्याण हो; चातुर्मास्य से उत्पन्न इस व्रत के पालन से — हे देवेंद्र, जो तुम्हारे मन में सदा स्थित है, वह माँग लो।'
श्लोक 69 (skanda.6.231.69)
इन्द्र उवाच कृष्ण जानासि त्वं चापि यश्च मेऽत्र पराभवः क्रियते दानवेन्द्रेण वृकेण सुदुरात्मना
indra uvāca kṛṣṇa jānāsi tvaṁ cāpi yaśca me'tra parābhavaḥ kriyate dānavendreṇa vṛkeṇa sudurātmanā
इंद्र ने कहा — हे कृष्ण, आप स्वयं भी जानते हैं कि यहाँ अत्यंत दुरात्मा दानवेंद्र वृक द्वारा मेरा कैसा पराभव किया जाता है।
श्लोक 70 (skanda.6.231.70)
ममाष्टमासिकं राज्यं त्रैलोक्येऽपि व्यवस्थितम् शेषांश्च चतुरो मासान्वर्षेवर्षे समेति सः
mamāṣṭamāsikaṁ rājyaṁ trailokye'pi vyavasthitam śeṣāṁśca caturo māsānvarṣevarṣe sameti saḥ
त्रैलोक्य में विद्यमान मेरा राज्य केवल आठ महीनों तक ही रहता है; शेष चार महीनों में प्रतिवर्ष वही उसे छीन लेता है।
श्लोक 71 (skanda.6.231.71)
एवं ज्ञात्वा सुरश्रेष्ठ दयां कृत्वा ममोपरि तथा कुरु यथा राज्यं मम स्यात्सार्वकालिकम्
evaṁ jñātvā suraśreṣṭha dayāṁ kṛtvā mamopari tathā kuru yathā rājyaṁ mama syātsārvakālikam
हे सुरश्रेष्ठ, यह जानकर मुझ पर दया करके ऐसा कीजिए कि मेरा राज्य सदा-सर्वदा के लिए मेरा ही बना रहे।
श्लोक 72 (skanda.6.231.72)
विष्णुरुवाच अजरश्चामरश्चापि स कृतः पद्मयोनिना तत्कथं जीवमानेन तेन राज्यं भवेत्तव
viṣṇuruvāca ajaraścāmaraścāpi sa kṛtaḥ padmayoninā tatkathaṁ jīvamānena tena rājyaṁ bhavettava
विष्णु ने कहा — कमलजन्मा ब्रह्मा ने उसे जरा-मृत्युरहित बना दिया है; तो फिर उसके जीवित रहते तुम्हारा राज्य कैसे हो सकता है?
श्लोक 73 (skanda.6.231.73)
परं तथापि देवेन्द्र करिष्यामि हितं तव
paraṁ tathāpi devendra kariṣyāmi hitaṁ tava
फिर भी, हे देवेंद्र, मैं तुम्हारा हित करूँगा।
श्लोक 74 (skanda.6.231.74)
क्षीरार्णवं परित्यज्य हाटकेश्वरसंज्ञिते क्षेत्रे गत्वा समं लक्ष्म्या तस्योपरि ततः परम्
kṣīrārṇavaṁ parityajya hāṭakeśvarasaṁjñite kṣetre gatvā samaṁ lakṣmyā tasyopari tataḥ param
क्षीरसागर को छोड़कर, लक्ष्मी सहित हाटकेश्वर नामक क्षेत्र में जाकर, उसके ऊपर ही —
श्लोक 75 (skanda.6.231.75)
करिष्यामि त्वहं शक्र शयनं यत्नमास्थितः यावच्च चतुरो मासान्यथा स न चलिष्यति
kariṣyāmi tvahaṁ śakra śayanaṁ yatnamāsthitaḥ yāvacca caturo māsānyathā sa na caliṣyati
— हे शक्र, मैं स्वयं वहाँ चार महीनों तक प्रयत्नपूर्वक शयन करूँगा, इस प्रकार कि वह हिल भी न सके।
श्लोक 76 (skanda.6.231.76)
तस्मात्स्थानात्सहस्राक्ष मद्भारेण प्रपीडितः वर्षेवर्षे सदा कार्यं मया तत्सुहितं तव
tasmātsthānātsahasrākṣa madbhāreṇa prapīḍitaḥ varṣevarṣe sadā kāryaṁ mayā tatsuhitaṁ tava
हे सहस्राक्ष, उस स्थान से मेरे भार से पीड़ित होकर वह वहीं दबा रहेगा; यह मेरे द्वारा तुम्हारे हित के लिए प्रतिवर्ष सदा किया जाएगा।
श्लोक 77 (skanda.6.231.77)
तस्माद्गच्छाधुना स्वर्गे कुरु राज्यमकंटकम् प्रावृट्काले तु संप्राप्ते न भीः कार्या तदुद्भवा
tasmādgacchādhunā svarge kuru rājyamakaṁṭakam prāvṛṭkāle tu saṁprāpte na bhīḥ kāryā tadudbhavā
इसलिए अब तुम स्वर्ग जाओ, और निष्कंटक राज्य करो; वर्षाकाल आने पर उससे उत्पन्न भय भी नहीं करना चाहिए।
श्लोक 78 (skanda.6.231.78)
यो मां तत्र शयानं तु व्रतेनानेन देवप पूजयिष्यति सद्भक्त्या तस्य दास्यामि वांछितम्
yo māṁ tatra śayānaṁ tu vratenānena devapa pūjayiṣyati sadbhaktyā tasya dāsyāmi vāṁchitam
हे देवेश, जो कोई इस व्रत के द्वारा वहाँ शयन करते हुए मुझे सच्ची भक्ति से पूजेगा, उसे मैं इच्छित वस्तु प्रदान करूँगा।
श्लोक 79 (skanda.6.231.79)
सूत उवाच एवमुक्त्वा हृषीकेशो विससर्ज शतक्रतुम् निःशेषभयनिर्मुक्तं स्वराज्यपरिवृद्धये
sūta uvāca evamuktvā hṛṣīkeśo visasarja śatakratum niḥśeṣabhayanirmuktaṁ svarājyaparivṛddhaye
सूत जी ने कहा — ऐसा कहकर हृषीकेश ने इंद्र को, समस्त भय से मुक्त करके, अपने राज्य की वृद्धि के लिए विदा किया।
श्लोक 80 (skanda.6.231.80)
आषाढस्य सिते पक्ष एकादश्या दिने सदा हाटकेश्वरजे क्षेत्रे तत्रागत्य स्वयं विभुः
āṣāḍhasya site pakṣa ekādaśyā dine sadā hāṭakeśvaraje kṣetre tatrāgatya svayaṁ vibhuḥ
आषाढ़ के शुक्ल पक्ष की एकादशी के दिन सदा वे प्रभु स्वयं हाटकेश्वर क्षेत्र में वहाँ पधारते हैं।
श्लोक 81 (skanda.6.231.81)
वृकोपरि ततश्चक्रे शयनं यत्नमास्थितः तेनाक्रांतस्ततः सोऽपि शक्नोति चलितुं न हि
vṛkopari tataścakre śayanaṁ yatnamāsthitaḥ tenākrāṁtastataḥ so'pi śaknoti calituṁ na hi
तब वे वृक के ऊपर प्रयत्नपूर्वक शयन करते हैं; उससे दबा हुआ वह हिल भी नहीं सकता।
श्लोक 82 (skanda.6.231.82)
मृतप्रायस्ततो नित्यं तद्भारेण प्रपीडितः कार्तिकस्य सिते पक्ष एकादश्या दिने स्थिते
mṛtaprāyastato nityaṁ tadbhāreṇa prapīḍitaḥ kārtikasya site pakṣa ekādaśyā dine sthite
उस भार से पीड़ित होकर वह सदा मृतप्राय रहता है, यहाँ तक कि कार्तिक शुक्ल पक्ष की एकादशी आ जाती है।
श्लोक 83 (skanda.6.231.83)
उत्थानं कुरुते विष्णुः क्षीरोदं प्रति गच्छति सोऽपि सांकृतिशापेन वृकः पंगुत्वमाप्नुयात्
utthānaṁ kurute viṣṇuḥ kṣīrodaṁ prati gacchati so'pi sāṁkṛtiśāpena vṛkaḥ paṁgutvamāpnuyāt
तब विष्णु उठकर क्षीरसागर की ओर चले जाते हैं, और सांकृति के शाप से वृक पुनः लंगड़ेपन को प्राप्त हो जाता है।
श्लोक 84 (skanda.6.231.84)
एवं च चतुरो मासान्न त्यजेच्छयनं हरिः भयात्तस्यासुरेंद्रस्य दानवस्य दुरात्मनः
evaṁ ca caturo māsānna tyajecchayanaṁ hariḥ bhayāttasyāsureṁdrasya dānavasya durātmanaḥ
इस प्रकार चार महीनों तक हरि उस दुरात्मा दानवेंद्र के भय से अपना वह शयन नहीं त्यागते।
श्लोक 85 (skanda.6.231.85)
तत्र मर्त्यैः क्रिया सर्वाः क्रियते न मखोद्भवाः यस्मात्स यज्ञपुरुषो न सुप्तो भागमश्नुते
tatra martyaiḥ kriyā sarvāḥ kriyate na makhodbhavāḥ yasmātsa yajñapuruṣo na supto bhāgamaśnute
उस काल में मनुष्यों द्वारा यज्ञ से उत्पन्न होने वाले कर्म नहीं किए जाते, क्योंकि सोए हुए वे यज्ञपुरुष अपना भाग ग्रहण नहीं कर सकते।
श्लोक 86 (skanda.6.231.86)
तथा यज्ञाश्च ये सर्वे विवाहादानादिकाः शुभाः ते सर्वे न क्रियंते च चूडाकरणपूर्वकाः
tathā yajñāśca ye sarve vivāhādānādikāḥ śubhāḥ te sarve na kriyaṁte ca cūḍākaraṇapūrvakāḥ
इसी प्रकार विवाह, दान आदि जितने भी शुभ यज्ञ हैं, वे सब, चूडाकरण संस्कार सहित, नहीं किए जाते।
श्लोक 87 (skanda.6.231.87)
मुक्त्वान्नप्राशनं नाम सीमंतोन्नयनं तथा तस्मात्सुप्ते जगन्नाथे ताः सर्वाः स्युर्वृथा द्विजाः
muktvānnaprāśanaṁ nāma sīmaṁtonnayanaṁ tathā tasmātsupte jagannāthe tāḥ sarvāḥ syurvṛthā dvijāḥ
हे द्विजो, अन्नप्राशन तथा सीमंतोन्नयन संस्कार भी छोड़ दिए जाते हैं, क्योंकि जगन्नाथ के सोए रहने पर वे सभी संस्कार व्यर्थ हो जाएँगे।
श्लोक 88 (skanda.6.231.88)
व्रतं वा नियमं वाथ तस्मिन्यः कुरुते नरः प्रसुप्ते देवदेवेशे तत्सर्वं निष्फलं भवेत्
vrataṁ vā niyamaṁ vātha tasminyaḥ kurute naraḥ prasupte devadeveśe tatsarvaṁ niṣphalaṁ bhavet
देवदेवेश के सोए रहने पर उस समय जो मनुष्य कोई व्रत अथवा नियम करता है, वह सब निष्फल हो जाता है।
श्लोक 89 (skanda.6.231.89)
तस्मात्सर्वप्रयत्नेन संप्रसुप्ते जनार्दने व्रतस्थैर्मानवैर्भाव्यं तस्य देवस्य तुष्टये
tasmātsarvaprayatnena saṁprasupte janārdane vratasthairmānavairbhāvyaṁ tasya devasya tuṣṭaye
इसलिए जनार्दन के सोए रहने पर सर्वप्रयत्न से मनुष्यों को उस देव की प्रसन्नता के लिए व्रतस्थ रहना चाहिए।
श्लोक 90 (skanda.6.231.90)
एकादश्यां दिने प्राप्ते शयने बोधने हरेः यत्किंचित्क्रियते कर्म श्रेष्ठं तच्चाक्षयं भवेत्
ekādaśyāṁ dine prāpte śayane bodhane hareḥ yatkiṁcitkriyate karma śreṣṭhaṁ taccākṣayaṁ bhavet
हरि के शयन अथवा जागरण की एकादशी के दिन जो भी उत्तम कर्म किया जाता है, वह अक्षय हो जाता है।
श्लोक 91 (skanda.6.231.91)
किंवात्र बहुनोक्तेन क्रियते यद्व्रतं नरैः तेन तुष्टिं परां याति दैत्योपरि स्थितो हरिः
kiṁvātra bahunoktena kriyate yadvrataṁ naraiḥ tena tuṣṭiṁ parāṁ yāti daityopari sthito hariḥ
यहाँ अधिक कहने से क्या लाभ — मनुष्यों द्वारा जो भी व्रत किया जाता है, उससे दैत्य के ऊपर स्थित हरि परम संतोष को प्राप्त होते हैं।
श्लोक 92 (skanda.6.231.92)
एवं स भगवान्प्राह सुप्तस्तत्र जनार्दनः किं वा तस्य ज्वरो जातो महती वेदनापि च
evaṁ sa bhagavānprāha suptastatra janārdanaḥ kiṁ vā tasya jvaro jāto mahatī vedanāpi ca
इस प्रकार वहाँ सोए हुए वे भगवान् जनार्दन मानो कहते हैं — क्या उन्हें ज्वर हो गया है, अथवा उन्हें कोई बड़ी पीड़ा है?
श्लोक 93 (skanda.6.231.93)
तस्मिन्नहनि पापात्मा योन्नमश्नाति मानवः तस्मात्सर्वप्रयत्नेन संप्राप्ते हरिवासरे
tasminnahani pāpātmā yonnamaśnāti mānavaḥ tasmātsarvaprayatnena saṁprāpte harivāsare
जो पापात्मा मनुष्य उस दिन अन्न खाता है, वह पापी होता है — इसलिए हरि के दिन आने पर सर्वप्रयत्न से।
श्लोक 94 (skanda.6.231.94)
अन्यस्मिन्नपि भोक्तव्यं न नरेण विजानता किं पुनः शयनं यत्र कुरुते यत्र बोधनम्
anyasminnapi bhoktavyaṁ na nareṇa vijānatā kiṁ punaḥ śayanaṁ yatra kurute yatra bodhanam
— समझदार मनुष्य को उसके निकटवर्ती किसी अन्य दिन भी भोजन नहीं करना चाहिए, फिर जिस दिन शयन होता है और जिस दिन जागरण होता है, उस दिन तो कहना ही क्या।
श्लोक 95 (skanda.6.231.95)
सूत उवाच एतद्वः सर्वमाख्यातं यत्पृष्टोऽस्मि द्विजोत्तमाः हाटकेश्वरजे क्षेत्रे यस्माच्छेते जनार्दनः
sūta uvāca etadvaḥ sarvamākhyātaṁ yatpṛṣṭo'smi dvijottamāḥ hāṭakeśvaraje kṣetre yasmācchete janārdanaḥ
सूत जी ने कहा — हे द्विजोत्तमो, तुमने जो पूछा था, वह सब मैंने बता दिया — क्यों जनार्दन हाटकेश्वर क्षेत्र में शयन करते हैं।
श्लोक 96 (skanda.6.231.96)
क्षीराब्धिं संपरित्यज्य सदा मासचतुष्टयम् श्रूयतां च फलं यत्स्यात्तस्मिन्नाराधिते विभो
kṣīrābdhiṁ saṁparityajya sadā māsacatuṣṭayam śrūyatāṁ ca phalaṁ yatsyāttasminnārādhite vibho
— क्षीरसागर को सदा चार महीनों के लिए छोड़कर। अब सुनो कि उन प्रभु की वहाँ आराधना करने से क्या फल मिलता है।
श्लोक 97 (skanda.6.231.97)
चतुरो वार्षिकान्मासान्यस्तं पूजयते विभुम् व्रतस्थः स नरो याति यत्र देवः स संस्थितः
caturo vārṣikānmāsānyastaṁ pūjayate vibhum vratasthaḥ sa naro yāti yatra devaḥ sa saṁsthitaḥ
जो व्रत में स्थित रहकर वर्षा के चार महीनों तक उन प्रभु की पूजा करता है, वह मनुष्य वहीं जाता है, जहाँ वह देव स्वयं स्थित हैं।
श्लोक 98 (skanda.6.231.98)
किं दानैर्बहुभिर्दत्तैः किं व्रतैः किमुपोषितैः तत्र यः पुंडरीकाक्षं सुप्तं पूजयति ध्रुवम्
kiṁ dānairbahubhirdattaiḥ kiṁ vrataiḥ kimupoṣitaiḥ tatra yaḥ puṁḍarīkākṣaṁ suptaṁ pūjayati dhruvam
जो वहाँ सोए हुए पुंडरीकाक्ष भगवान् की निरंतर पूजा करता है, उसके लिए अनेक दान देने से, व्रतों से, अथवा उपवासों से भला क्या प्रयोजन?