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नागर खण्ड · अध्याय 232

चातुर्मास्यव्रतनियमवर्णन

अध्याय 231अध्याय-सूचीअध्याय 233

श्लोक 1 (skanda.6.232.1)

ऋषय ऊचुः प्रसुप्ते देवदेवेशे शंखचक्रगदाधरे यच्चान्यदपि कर्तव्यं नियमो व्रतमेव वा

ṛṣaya ūcuḥ prasupte devadeveśe śaṁkhacakragadādhare yaccānyadapi kartavyaṁ niyamo vratameva vā

ऋषियों ने कहा — शंख-चक्र-गदाधारी देवदेवेश के सोए रहने पर जो भी अन्य कर्तव्य है — नियम अथवा व्रत —

श्लोक 2 (skanda.6.232.2)

होमो वाथ जपो वाथ दानं वा तद्वदस्व नः सूत उवाच यः कश्चिन्नियमो विप्राः प्रसुप्ते गरुडध्वजे

homo vātha japo vātha dānaṁ vā tadvadasva naḥ sūta uvāca yaḥ kaścinniyamo viprāḥ prasupte garuḍadhvaje

— अथवा होम, जप या दान — वह हमें बताइए। सूत जी ने कहा — हे विप्रो, गरुड़ध्वज के सोए रहने पर जो भी नियम पालन किया जाता है,

श्लोक 3 (skanda.6.232.3)

अनंतफलदः स स्यादित्युवाच पितामहः तस्मात्सर्वप्रयत्नेन कश्चिद्बाह्यो विजानता

anaṁtaphaladaḥ sa syādityuvāca pitāmahaḥ tasmātsarvaprayatnena kaścidbāhyo vijānatā

वह अनंत फल देने वाला होता है — ऐसा पितामह ब्रह्मा ने कहा है। इसलिए ज्ञानी पुरुष को सर्वप्रयत्न से कोई-न-कोई बाह्य अनुशासन अवश्य पालना चाहिए।

श्लोक 4 (skanda.6.232.4)

नियमो वा जपो होमः स्वाध्यायो व्रतमेव वा कर्तव्यं ब्राह्मणश्रेष्ठास्तुष्ट्यर्थं चक्रपाणिनः

niyamo vā japo homaḥ svādhyāyo vratameva vā kartavyaṁ brāhmaṇaśreṣṭhāstuṣṭyarthaṁ cakrapāṇinaḥ

हे ब्राह्मणश्रेष्ठो, चक्रपाणि की प्रसन्नता के लिए नियम, जप, होम, स्वाध्याय अथवा व्रत — इनमें से कोई भी करना चाहिए।

श्लोक 5 (skanda.6.232.5)

चतुरो वार्षिकान्मासानेकभुक्तेन यो नयेत् वासुदेवं समुद्दिश्य स धनी जायते नरः

caturo vārṣikānmāsānekabhuktena yo nayet vāsudevaṁ samuddiśya sa dhanī jāyate naraḥ

जो वासुदेव को लक्ष्य करके वर्षा के चार महीनों को एक समय भोजन करके बिताता है, वह मनुष्य धनवान होता है।

श्लोक 6 (skanda.6.232.6)

नक्षत्रैर्भोजनं कुर्याद्यः प्रसुप्ते जनार्दने स धनी रूपसंपन्नः सुमतिश्च प्रजायते

nakṣatrairbhojanaṁ kuryādyaḥ prasupte janārdane sa dhanī rūpasaṁpannaḥ sumatiśca prajāyate

जो जनार्दन के सोए रहने पर तारों के उदय होने पर भोजन करता है, वह धनवान, रूपसंपन्न तथा सुबुद्धि वाला होता है।

श्लोक 7 (skanda.6.232.7)

एकांतरोपवासैश्च यो नयेद्द्विजसत्तमाः चतुरो वार्षिकान्मासान्वैकुंठे स सदा वसेत्

ekāṁtaropavāsaiśca yo nayeddvijasattamāḥ caturo vārṣikānmāsānvaikuṁṭhe sa sadā vaset

हे द्विजसत्तमो, जो एक दिन छोड़कर उपवास करते हुए वर्षा के चार महीने बिताता है, वह सदा वैकुंठ में निवास करता है।

श्लोक 8 (skanda.6.232.8)

षष्ठान्नकालभोजी स्याद्यः प्रसुप्ते जनार्दने राजसूयाश्वमेधाभ्यां स कृत्स्नं फलमाप्नुयात्

ṣaṣṭhānnakālabhojī syādyaḥ prasupte janārdane rājasūyāśvamedhābhyāṁ sa kṛtsnaṁ phalamāpnuyāt

जनार्दन के सोए रहने पर जो छठे समय के भोजन पर रहता है, वह राजसूय और अश्वमेध यज्ञों का संपूर्ण फल पाता है।

श्लोक 9 (skanda.6.232.9)

त्रिरात्रोपोषितो यस्तु चतुर्मासान्सदा नयेत् न स भूयोऽपि जायेत संसारेऽत्र कथंचन

trirātropoṣito yastu caturmāsānsadā nayet na sa bhūyo'pi jāyeta saṁsāre'tra kathaṁcana

जो तीन-तीन रात्रि उपवास करके निरंतर चारों मास बिताता है, वह इस संसार में पुनः किसी भी प्रकार जन्म नहीं लेता।

श्लोक 10 (skanda.6.232.10)

सायंप्रातः परो भूत्वा चतुर्मासान्सदा नयेत् अग्निष्टोमस्य यज्ञस्य स फलं लभते नरः

sāyaṁprātaḥ paro bhūtvā caturmāsānsadā nayet agniṣṭomasya yajñasya sa phalaṁ labhate naraḥ

जो केवल संध्या और प्रातः भोजन करके निरंतर चारों मास बिताता है, वह मनुष्य अग्निष्टोम यज्ञ का फल पाता है।

श्लोक 11 (skanda.6.232.11)

अयाचितं चरेद्यस्तु प्रसुप्ते मधुसूदने न विच्छेदो भवेत्तस्य कदाचित्सह बंधुभिः

ayācitaṁ caredyastu prasupte madhusūdane na vicchedo bhavettasya kadācitsaha baṁdhubhiḥ

जो मधुसूदन के सोए रहने पर बिना माँगे प्राप्त भोजन पर रहता है, उसका अपने बंधुओं से कभी वियोग नहीं होता।

श्लोक 12 (skanda.6.232.12)

तैलाभ्यंगं च यो जह्याद्घृताभ्यंगं विशेषतः चतुरो वार्षिकान्मासान्स स्वर्गे भोगभाग्भवेत्

tailābhyaṁgaṁ ca yo jahyādghṛtābhyaṁgaṁ viśeṣataḥ caturo vārṣikānmāsānsa svarge bhogabhāgbhavet

जो वर्षा के चार महीनों तक तेल के उबटन का, विशेषतः घृत के उबटन का त्याग करता है, वह स्वर्ग में भोग का भागी होता है।

श्लोक 13 (skanda.6.232.13)

ब्रह्मचर्येण यो मासांश्चतुरोऽपि नयेन्नरः विमानवरमारूढः स स्वर्गे स्वेच्छया वसेत्

brahmacaryeṇa yo māsāṁścaturo'pi nayennaraḥ vimānavaramārūḍhaḥ sa svarge svecchayā vaset

जो मनुष्य ब्रह्मचर्य के साथ चारों महीने बिताता है, वह उत्तम विमान पर आरूढ़ होकर स्वर्ग में इच्छानुसार निवास करता है।

श्लोक 14 (skanda.6.232.14)

यः स्नानं चतुरो मासान्कुरुते तैलवर्जितम् मधुमांसपरित्यागी स भवेन्मुक्तिभाक्सदा

yaḥ snānaṁ caturo māsānkurute tailavarjitam madhumāṁsaparityāgī sa bhavenmuktibhāksadā

जो चार महीनों तक तेल रहित स्नान करता है और मधु-मांस का त्याग करता है, वह सदा मुक्ति का भागी होता है।

श्लोक 15 (skanda.6.232.15)

वर्जयेच्छ्रावणे शाकं दधि भाद्रपदे च यः क्षीरमाश्वयुजे मासि कार्तिके च सदामिषम्

varjayecchrāvaṇe śākaṁ dadhi bhādrapade ca yaḥ kṣīramāśvayuje māsi kārtike ca sadāmiṣam

जो श्रावण में साग का, भाद्रपद में दही का, आश्विन मास में दूध का, और कार्तिक में सदा मांस का त्याग करता है —

श्लोक 16 (skanda.6.232.16)

न स पापेन लिप्येत संवत्सरकृते पुनः एतत्प्राह द्विजश्रेष्ठा मनुः स्वायंभुवो वचः

na sa pāpena lipyeta saṁvatsarakṛte punaḥ etatprāha dvijaśreṣṭhā manuḥ svāyaṁbhuvo vacaḥ

— वह वर्ष भर में किए गए पाप से पुनः लिप्त नहीं होता। हे द्विजश्रेष्ठो, यह वचन स्वायंभुव मनु ने कहा है।

श्लोक 17 (skanda.6.232.17)

शाके संक्रमते ब्रह्मा श्रावणे मासि संस्थिते दध्नि भाद्रपदे विष्णुः क्षीरे चाश्वयुजे हरः

śāke saṁkramate brahmā śrāvaṇe māsi saṁsthite dadhni bhādrapade viṣṇuḥ kṣīre cāśvayuje haraḥ

श्रावण मास आने पर ब्रह्मा साग में संक्रमित होते हैं, भाद्रपद में विष्णु दही में, तथा आश्विन में हर दूध में।

श्लोक 18 (skanda.6.232.18)

त्रयोऽपि कार्तिके मासि संक्रमंति तथाऽऽमिषे तस्मादेतान्स देवेषु सर्वथा परिवर्जयेत्

trayo'pi kārtike māsi saṁkramaṁti tathā''miṣe tasmādetānsa deveṣu sarvathā parivarjayet

तीनों ही देव कार्तिक मास में मांस में संक्रमित होते हैं; इसलिए देवताओं के प्रति आदरवश इनका सर्वथा त्याग करना चाहिए।

श्लोक 19 (skanda.6.232.19)

यः कांस्यं वर्जयेन्मर्त्यः प्रसुप्ते गरुडध्वजे स फलं प्राप्नुयात्कृत्स्नं वाजपेयातिरात्रयोः

yaḥ kāṁsyaṁ varjayenmartyaḥ prasupte garuḍadhvaje sa phalaṁ prāpnuyātkṛtsnaṁ vājapeyātirātrayoḥ

गरुड़ध्वज के सोए रहने पर जो मनुष्य कांस्य पात्र का त्याग करता है, वह वाजपेय और अतिरात्र यज्ञों का संपूर्ण फल पाता है।

श्लोक 20 (skanda.6.232.20)

अक्षारलवणाशी च यो भवेद्ब्राह्मणोत्तमः तस्यापि सकलाः पूर्ताः प्रभवंति सदा ततः

akṣāralavaṇāśī ca yo bhavedbrāhmaṇottamaḥ tasyāpi sakalāḥ pūrtāḥ prabhavaṁti sadā tataḥ

जो ब्राह्मणश्रेष्ठ बिना क्षार-लवण के भोजन करता है, उसके लिए भी सदा समस्त पूर्तधर्मों के फल प्राप्त होते हैं।

श्लोक 21 (skanda.6.232.21)

यो होमं चतुरो मासान्प्रकरोति तिलाक्षतैः स्वाहांतैर्वैष्णवैर्मंत्रैर्न स रोगेण युज्यते

yo homaṁ caturo māsānprakaroti tilākṣataiḥ svāhāṁtairvaiṣṇavairmaṁtrairna sa rogeṇa yujyate

जो चार महीनों तक तिल और अक्षत से, स्वाहा-अंत वैष्णव मंत्रों द्वारा होम करता है, वह रोग से कभी युक्त नहीं होता।

श्लोक 22 (skanda.6.232.22)

यो जपेत्पौरुषं सूक्तं स्नात्वा विष्णोः स्थितोऽग्रतः मतिस्तस्य विवर्धेत शुक्लपक्षे यथोडुराट्

yo japetpauruṣaṁ sūktaṁ snātvā viṣṇoḥ sthito'grataḥ matistasya vivardheta śuklapakṣe yathoḍurāṭ

जो स्नान करके विष्णु के सम्मुख खड़े होकर पुरुषसूक्त का जप करता है, उसकी बुद्धि शुक्लपक्ष के चंद्रमा के समान बढ़ती जाती है।

श्लोक 23 (skanda.6.232.23)

शतमष्टोत्तरं यावत्फलहस्तः प्रदक्षिणाम् करोति विष्णोर्मौनेन न स पापेन लिप्यते

śatamaṣṭottaraṁ yāvatphalahastaḥ pradakṣiṇām karoti viṣṇormaunena na sa pāpena lipyate

जो हाथ में फल लेकर मौनपूर्वक विष्णु की एक सौ आठ प्रदक्षिणा करता है, वह पाप से कभी लिप्त नहीं होता।

श्लोक 24 (skanda.6.232.24)

मिष्टान्नं ब्राह्मणेंद्राणां यो ददाति स्वशक्तितः विशेषात्कार्तिके मासि सोऽग्निष्टोमफलं लभेत्

miṣṭānnaṁ brāhmaṇeṁdrāṇāṁ yo dadāti svaśaktitaḥ viśeṣātkārtike māsi so'gniṣṭomaphalaṁ labhet

जो अपनी शक्ति के अनुसार श्रेष्ठ ब्राह्मणों को मिष्टान्न देता है, विशेषतः कार्तिक मास में, वह अग्निष्टोम यज्ञ का फल पाता है।

श्लोक 25 (skanda.6.232.25)

यः स्वाध्यायं चतुर्वेदैर्विष्णोरायतने चरेत् चतुरो वार्षिकान्मासान्स विद्वान्सर्वदा भवेत्

yaḥ svādhyāyaṁ caturvedairviṣṇorāyatane caret caturo vārṣikānmāsānsa vidvānsarvadā bhavet

जो विष्णु के मंदिर में वर्षा के चार महीनों तक चारों वेदों का स्वाध्याय करता है, वह सदा के लिए विद्वान हो जाता है।

श्लोक 26 (skanda.6.232.26)

नृत्यगीतादिकं यश्च कुर्याद्विष्णोः सदा गृहे अप्सरसोऽस्य कुर्वंति पुरतः स्वर्गतस्य च

nṛtyagītādikaṁ yaśca kuryādviṣṇoḥ sadā gṛhe apsaraso'sya kurvaṁti purataḥ svargatasya ca

जो विष्णु के मंदिर में सदा नृत्य-गीत आदि कराता है, स्वर्ग में जाने पर अप्सराएँ उसके सामने वही करती हैं।

श्लोक 27 (skanda.6.232.27)

यस्तु रात्रिदिनं विप्रो नृत्यगीतादिकं ददेत् चतुरो वार्षिकान्मासान्स गन्धर्वत्वमाप्नुयात्

yastu rātridinaṁ vipro nṛtyagītādikaṁ dadet caturo vārṣikānmāsānsa gandharvatvamāpnuyāt

जो ब्राह्मण रात-दिन नृत्य-गीत आदि की व्यवस्था करता है, वह चार महीनों में गंधर्वत्व को प्राप्त होता है।

श्लोक 28 (skanda.6.232.28)

एते च नियमाः सर्वे शक्यंते यदि भो द्विजाः कर्तुं च चतुरो मासानेकस्मिन्वाऽपि कार्त्तिके

ete ca niyamāḥ sarve śakyaṁte yadi bho dvijāḥ kartuṁ ca caturo māsānekasminvā'pi kārttike

हे द्विजो, यदि ये सब नियम चारों महीनों में, अथवा केवल कार्तिक मास में भी करना संभव हो —

श्लोक 29 (skanda.6.232.29)

तथापि चैव कर्तव्यं लोकद्वयमभीप्सता कार्तिक्यां ब्राह्मणश्रेष्ठा वैष्णवैः पुरुषैरिह

tathāpi caiva kartavyaṁ lokadvayamabhīpsatā kārtikyāṁ brāhmaṇaśreṣṭhā vaiṣṇavaiḥ puruṣairiha

— तो भी, हे ब्राह्मणश्रेष्ठो, दोनों लोकों की कामना रखने वाले वैष्णव पुरुषों को यहाँ कार्तिक में यह अवश्य करना चाहिए।

श्लोक 30 (skanda.6.232.30)

कांस्यं मांसं क्षुरं क्षौद्रं पुनर्भोजनमैथुने कार्तिके वर्जयेद्यस्तु य एतान्ब्राह्मणः सदा

kāṁsyaṁ māṁsaṁ kṣuraṁ kṣaudraṁ punarbhojanamaithune kārtike varjayedyastu ya etānbrāhmaṇaḥ sadā

जो ब्राह्मण कार्तिक में सदा कांस्य, मांस, क्षुर (मुंडन), मधु, पुनर्भोजन तथा मैथुन का त्याग करता है —

श्लोक 31 (skanda.6.232.31)

पूर्वोक्तानां तु सर्वेषां नियमानां फलं लभेत्

pūrvoktānāṁ tu sarveṣāṁ niyamānāṁ phalaṁ labhet

— वह पूर्वोक्त समस्त नियमों का फल प्राप्त कर लेता है।

श्लोक 32 (skanda.6.232.32)

अथ यः कार्तिके मासि प्रासादस्योपरि द्विजाः जलशाय्याख्यदेवस्य कलशे दीपकं ददेत् पूर्वोक्तनियमानां च स षण्णां फलभाग्भवेत्

atha yaḥ kārtike māsi prāsādasyopari dvijāḥ jalaśāyyākhyadevasya kalaśe dīpakaṁ dadet pūrvoktaniyamānāṁ ca sa ṣaṇṇāṁ phalabhāgbhavet

हे द्विजो, जो कार्तिक मास में जलशायी देव के मंदिर-शिखर के कलश पर दीपक रखता है, वह पूर्वोक्त छहों नियमों के फल का भागी होता है।

श्लोक 33 (skanda.6.232.33)

यद्यदिष्टतमं किंचित्सुप्राप्यं चैव यद्भवेत् नियमस्तस्य कर्तव्यश्चातुर्मास्ये शुभार्थिभिः

yadyadiṣṭatamaṁ kiṁcitsuprāpyaṁ caiva yadbhavet niyamastasya kartavyaścāturmāsye śubhārthibhiḥ

जो-जो वस्तु अत्यंत प्रिय हो और सुलभ भी हो, कल्याण चाहने वालों को चातुर्मास्य में उसी के त्याग का नियम लेना चाहिए।

श्लोक 34 (skanda.6.232.34)

नियमे च कृते दद्याद्ब्राह्मणाय तदेव हि नियमस्तु कृतो यस्य स्वशक्त्या स्यात्फलं ततः

niyame ca kṛte dadyādbrāhmaṇāya tadeva hi niyamastu kṛto yasya svaśaktyā syātphalaṁ tataḥ

नियम पूर्ण होने पर वही वस्तु ब्राह्मण को दान करनी चाहिए; जिसका नियम अपनी शक्ति के अनुसार किया जाता है, उसी से फल प्राप्त होता है।

श्लोक 35 (skanda.6.232.35)

यो विना नियमं मर्त्यो व्रतं वा जाप्यमेव वा चतुर्मासान्नयेन्मूर्खो जीवन्नपि मृतो हि सः

yo vinā niyamaṁ martyo vrataṁ vā jāpyameva vā caturmāsānnayenmūrkho jīvannapi mṛto hi saḥ

जो मूर्ख मनुष्य बिना किसी नियम, व्रत अथवा जप के चारों महीने बिता देता है, वह जीवित रहते हुए भी मृतक के समान है।

श्लोक 36 (skanda.6.232.36)

यथा काकयवाः प्रोक्ता यथारण्यास्तिलोद्भवाः नाममात्रप्रसिद्धाश्च तथा ते मानवा भुवि

yathā kākayavāḥ proktā yathāraṇyāstilodbhavāḥ nāmamātraprasiddhāśca tathā te mānavā bhuvi

जैसे 'काकयव' (व्यर्थ अन्न) कहा जाता है, अथवा जैसे वन में उगे तिल — जो केवल नाममात्र से ही प्रसिद्ध हैं — वैसे ही ऐसे मनुष्य पृथ्वी पर होते हैं।

श्लोक 37 (skanda.6.232.37)

तस्मात्सर्वप्रयत्नेन कार्यो यत्नेन कार्तिके एकोऽपि नियमः कश्चित्सुसूक्ष्मोऽपि द्विजोत्तमाः

tasmātsarvaprayatnena kāryo yatnena kārtike eko'pi niyamaḥ kaścitsusūkṣmo'pi dvijottamāḥ

इसलिए, हे द्विजोत्तमो, कार्तिक मास में सर्वप्रयत्न से कोई-न-कोई नियम, चाहे वह अत्यंत सूक्ष्म ही क्यों न हो, अवश्य पालन करना चाहिए।

श्लोक 38 (skanda.6.232.38)

एतद्वः सर्वमाख्यातं चातुर्मासीसमुद्भवम् व्रतानां नियमानां च माहात्म्यं विस्तराद्द्विजाः

etadvaḥ sarvamākhyātaṁ cāturmāsīsamudbhavam vratānāṁ niyamānāṁ ca māhātmyaṁ vistarāddvijāḥ

हे द्विजो, चातुर्मास्य से उत्पन्न होने वाले व्रतों और नियमों का यह संपूर्ण माहात्म्य मैंने तुम्हें विस्तारपूर्वक बता दिया।

श्लोक 39 (skanda.6.232.39)

यश्चैतच्छृणुयान्नित्यं पठेद्वापि समाहितः चातुर्मासी कृतात्पापात्सोऽपि मुक्तिमवाप्नुयात्

yaścaitacchṛṇuyānnityaṁ paṭhedvāpi samāhitaḥ cāturmāsī kṛtātpāpātso'pi muktimavāpnuyāt

जो इसे नित्य सुनता है, अथवा एकाग्रचित्त होकर पढ़ता है, वह भी चातुर्मास्य में किए गए पाप से मुक्ति पा लेता है।

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