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नागर खण्ड · अध्याय 237

चातुर्मास्य-व्रत की महिमा का वर्णन

अध्याय 236अध्याय-सूचीअध्याय 238

श्लोक 1 (skanda.6.237.1)

नारद उवाच । कदा विधिनिषेधौ च कर्तव्यौ विष्णुसन्निधौ । युष्मद्वाक्यामृतं पीत्वा तृप्तिर्मम न विद्यते

nārada uvāca kadā vidhiniṣedhau ca kartavyau viṣṇusannidhau yuṣmadvākyāmṛtaṁ pītvā tṛptirmama na vidyate

नारद जी ने कहा — विष्णु की उपस्थिति में विधि और निषेध कब पालन करने चाहिए? आपके वचनामृत का पान करके भी मुझे तृप्ति नहीं होती।

श्लोक 2 (skanda.6.237.2)

ब्रह्मा उवाच । कर्कसंक्रांतिदिवसे विष्णुं संपूज्य भक्तितः । फलैरर्घ्यः प्रदातव्यः शस्तजंबूफलैः शुभैः

brahmā uvāca karkasaṁkrāṁtidivase viṣṇuṁ saṁpūjya bhaktitaḥ phalairarghyaḥ pradātavyaḥ śastajaṁbūphalaiḥ śubhaiḥ

ब्रह्मा जी ने कहा — कर्क संक्रांति के दिन भक्तिपूर्वक विष्णु का पूजन करके, उत्तम एवं शुभ जामुन के फलों सहित अर्घ्य अर्पित करना चाहिए।

श्लोक 3 (skanda.6.237.3)

जंबूद्वीपस्य संज्ञेयं फलेन च विजायते । मन्त्रेणानेन विप्रेंद्र श्रद्धाधर्मसुसंयतैः

jaṁbūdvīpasya saṁjñeyaṁ phalena ca vijāyate mantreṇānena vipreṁdra śraddhādharmasusaṁyataiḥ

जम्बूद्वीप की यह संज्ञा उसी फल से उत्पन्न हुई है; हे विप्रेन्द्र, श्रद्धा और धर्म में सुसंयत पुरुषों द्वारा इस मन्त्र से —

श्लोक 4 (skanda.6.237.4)

षण्मासाभ्यंतरे मृत्युर्यत्र क्वापि भवेन्मम । तन्मया वासुदेवाय स्वयमात्मा निवेदितः

ṣaṇmāsābhyaṁtare mṛtyuryatra kvāpi bhavenmama tanmayā vāsudevāya svayamātmā niveditaḥ

(मन्त्र का भाव) — यदि इन छह महीनों के भीतर मेरी मृत्यु कहीं भी हो जाए, तो मैंने स्वयं अपनी आत्मा वासुदेव को अर्पित कर दी है।

श्लोक 5 (skanda.6.237.5)

इति मन्त्रेणार्घ्यम् । ततो विधिनिषेधौ च ग्राह्यौ भक्त्या हरेः पुरः । चातुर्मास्ये समायाते सर्वलोकमहासुखे

iti mantreṇārghyam tato vidhiniṣedhau ca grāhyau bhaktyā hareḥ puraḥ cāturmāsye samāyāte sarvalokamahāsukhe

(इस प्रकार यह अर्घ्य का मन्त्र है।) तत्पश्चात्, जब चातुर्मास्य आता है — जो समस्त लोकों के लिए महासुखकारी है — तब हरि के समक्ष भक्तिपूर्वक विधि और निषेध दोनों ग्रहण करने चाहिए।

श्लोक 6 (skanda.6.237.6)

विधिर्वेदविधिः कार्यो निषेधो नियमो मतः । विधिश्चैव निषेधश्च द्वावेतौ विष्णुरेव हि

vidhirvedavidhiḥ kāryo niṣedho niyamo mataḥ vidhiścaiva niṣedhaśca dvāvetau viṣṇureva hi

विधि का अर्थ है वेदविहित कर्तव्य, और निषेध का अर्थ है नियम अर्थात् संयम। ये विधि और निषेध दोनों ही साक्षात् विष्णु स्वरूप हैं।

श्लोक 7 (skanda.6.237.7)

तस्मात्सर्वप्रयत्नेन सेव्य एव जनार्दनः । विष्णोः कथा विष्णुपूजा ध्यानं विष्णोर्नतिस्तथा

tasmātsarvaprayatnena sevya eva janārdanaḥ viṣṇoḥ kathā viṣṇupūjā dhyānaṁ viṣṇornatistathā

अतः सम्पूर्ण प्रयत्न से जनार्दन की ही सेवा करनी चाहिए — विष्णु-कथा, विष्णु-पूजा, विष्णु-ध्यान तथा विष्णु को प्रणाम, इन सबके द्वारा।

श्लोक 8 (skanda.6.237.8)

सर्वमेव हरिप्रीत्या यः करोति स मुक्तिभाक् । वर्णाश्रमविधेर्मूर्तिः सत्यो विष्णुः सनातनः

sarvameva hariprītyā yaḥ karoti sa muktibhāk varṇāśramavidhermūrtiḥ satyo viṣṇuḥ sanātanaḥ

जो कुछ भी करता है, हरि की प्रसन्नता के लिए ही करता है, वह मुक्ति का भागी होता है। वर्णाश्रम-विधि की साक्षात् मूर्ति सत्यस्वरूप सनातन विष्णु ही हैं।

श्लोक 9 (skanda.6.237.9)

चातुर्मास्ये विशेषेण जन्मकष्टादिनाशनम् । हरिरेव व्रताद्ग्राह्यो व्रतं देहेन कारयेत् । देहोऽयं तपसा शोध्यः सुप्ते देवे तपोनिधौ

cāturmāsye viśeṣeṇa janmakaṣṭādināśanam harireva vratādgrāhyo vrataṁ dehena kārayet deho'yaṁ tapasā śodhyaḥ supte deve taponidhau

विशेषतः चातुर्मास्य में जन्म से उत्पन्न कष्टादि नष्ट हो जाते हैं। व्रत के माध्यम से हरि को ही ग्रहण करना चाहिए, और व्रत को शरीर से सम्पन्न करना चाहिए। जब तपोनिधि देव शयन में हों, तब यह शरीर तपस्या से शुद्ध करने योग्य है।

श्लोक 10 (skanda.6.237.10)

नारद उवाच । किं व्रतं किं तपः प्रोक्तं ब्रह्मन्ब्रूहि सविस्तरम् । सुप्ते देवे मया कार्यं कृतं यच्च महाफलम्

nārada uvāca kiṁ vrataṁ kiṁ tapaḥ proktaṁ brahmanbrūhi savistaram supte deve mayā kāryaṁ kṛtaṁ yacca mahāphalam

नारद जी ने कहा — हे ब्रह्मन्, व्रत क्या कहलाता है और तप क्या कहलाता है, यह मुझे विस्तार से बताइए, कि जब देव शयन में हों तब मुझे क्या करना चाहिए जो महाफलदायक हो।

श्लोक 11 (skanda.6.237.11)

ब्रह्मा उवाच । व्रतं विष्णुव्रतं विद्धि विष्णुभक्तिसमन्वितम् । तपश्च धर्मवर्तित्वं कृच्छ्रादिकमथापि वा

brahmā uvāca vrataṁ viṣṇuvrataṁ viddhi viṣṇubhaktisamanvitam tapaśca dharmavartitvaṁ kṛcchrādikamathāpi vā

ब्रह्मा जी ने कहा — व्रत को विष्णु-व्रत जानो, जो विष्णु-भक्ति से युक्त है; और तप को धर्म में स्थिरता जानो, अथवा कृच्छ्र आदि व्रतों का पालन भी तप है।

श्लोक 12 (skanda.6.237.12)

शृणु व्रतस्य माहात्म्यं वक्ष्यामि प्रथमं तव । ब्रह्मचर्यव्रतं सारं व्रतानामुत्तमं व्रतम्

śṛṇu vratasya māhātmyaṁ vakṣyāmi prathamaṁ tava brahmacaryavrataṁ sāraṁ vratānāmuttamaṁ vratam

व्रत की महिमा सुनो, मैं तुम्हें सर्वप्रथम यही बताऊँगा। ब्रह्मचर्य-व्रत ही समस्त व्रतों का सार और सर्वोत्तम व्रत है।

श्लोक 13 (skanda.6.237.13)

ब्रह्मचर्यं तपः सारं ब्रह्मचर्यं महत्फलम् । क्रियासु सकलास्वेव ब्रह्मचर्यं विवर्द्धयेत्

brahmacaryaṁ tapaḥ sāraṁ brahmacaryaṁ mahatphalam kriyāsu sakalāsveva brahmacaryaṁ vivarddhayet

ब्रह्मचर्य ही तप का सार है, ब्रह्मचर्य ही महान फलदायक है। समस्त क्रियाओं में मनुष्य को ब्रह्मचर्य की ही वृद्धि करनी चाहिए।

श्लोक 14 (skanda.6.237.14)

ब्रह्मचर्यप्रभावेण तप उग्रं प्रवर्त्तते । ब्रह्मचर्यात्परं नास्ति धर्मसाधनमुत्तमम्

brahmacaryaprabhāveṇa tapa ugraṁ pravarttate brahmacaryātparaṁ nāsti dharmasādhanamuttamam

ब्रह्मचर्य के प्रभाव से ही उग्र तप सिद्ध होता है। ब्रह्मचर्य से बढ़कर धर्म-साधन का कोई श्रेष्ठ उपाय नहीं है।

श्लोक 15 (skanda.6.237.15)

चातुर्मास्ये विशेषेण सुप्ते देवे गुणोत्तरम् । महाव्रतमिदं लोके तन्निबोध सदा द्विज

cāturmāsye viśeṣeṇa supte deve guṇottaram mahāvratamidaṁ loke tannibodha sadā dvija

विशेषतः चातुर्मास्य में, जब देव शयन में हों, यह गुणों में श्रेष्ठ महाव्रत लोक में सर्वोत्तम है — हे द्विज, इसे सदा समझो।

श्लोक 16 (skanda.6.237.16)

नारायणमिदं कर्म यः करोति न लिप्यते । शतत्रयं षष्टियुतं दिनमाहुश्च वत्सरे

nārāyaṇamidaṁ karma yaḥ karoti na lipyate śatatrayaṁ ṣaṣṭiyutaṁ dinamāhuśca vatsare

जो इस कर्म को नारायण को अर्पित करते हुए करता है, वह लिप्त नहीं होता। कहते हैं कि वर्ष में तीन सौ साठ दिन होते हैं।

श्लोक 17 (skanda.6.237.17)

तत्र नारायणो देवः पूज्यते व्रतकारिभिः । सत्क्रियाममुकीं देव कारयिष्यामि निश्चयः

tatra nārāyaṇo devaḥ pūjyate vratakāribhiḥ satkriyāmamukīṁ deva kārayiṣyāmi niścayaḥ

उसमें व्रती पुरुषों द्वारा भगवान् नारायण की पूजा की जाती है, यह संकल्प करते हुए — हे देव, मैं निश्चय ही अमुक सत्कर्म करूँगा।

श्लोक 18 (skanda.6.237.18)

कुरुते तद्व्रतं प्राहुः सुप्ते देवे गुणोत्तरम् । वह्निहोमो विप्रभक्तिः श्रद्धा धर्मे मतिः शुभा

kurute tadvrataṁ prāhuḥ supte deve guṇottaram vahnihomo viprabhaktiḥ śraddhā dharme matiḥ śubhā

जो व्रत करता है, उसे — जब देव शयन में हों — श्रेष्ठ कहा गया है: अग्निहोम, ब्राह्मण-भक्ति, श्रद्धा, तथा धर्म में शुभ बुद्धि।

श्लोक 19 (skanda.6.237.19)

सत्संगो विष्णुपूजा च सत्यवादो दया हृदि । आर्जवं मधुरा वाणी सच्चरित्रे सदा रतिः

satsaṁgo viṣṇupūjā ca satyavādo dayā hṛdi ārjavaṁ madhurā vāṇī saccaritre sadā ratiḥ

सत्संग, विष्णु-पूजा, सत्यभाषण, हृदय में दया, सरलता, मधुर वाणी, तथा सच्चरित्र में सदा अनुराग —

श्लोक 20 (skanda.6.237.20)

वेदपाठस्तथाऽस्तेयमहिंसा ह्रीः क्षमा दमः । निर्लोभताऽक्रोधता च निर्मोहोऽममताऽरतिः

vedapāṭhastathā'steyamahiṁsā hrīḥ kṣamā damaḥ nirlobhatā'krodhatā ca nirmoho'mamatā'ratiḥ

वेदपाठ, अस्तेय, अहिंसा, लज्जा, क्षमा, दम, निर्लोभता, अक्रोध, मोहरहितता, ममतारहितता तथा विरक्ति —

श्लोक 21 (skanda.6.237.21)

श्रुतिक्रियापरं ज्ञानं कृष्णार्पितमनोगतिः । एतानि यस्य तिष्ठंति व्रतानि ब्रह्मवित्तम

śrutikriyāparaṁ jñānaṁ kṛṣṇārpitamanogatiḥ etāni yasya tiṣṭhaṁti vratāni brahmavittama

श्रुति-विहित क्रियाओं में तत्पर ज्ञान, तथा कृष्ण में अर्पित मनोगति — हे ब्रह्मविदों में श्रेष्ठ, जिस पुरुष में ये सब व्रत स्थित हों,

श्लोक 22 (skanda.6.237.22)

जीवन्मुक्तो नरः प्रोक्तो नैव लिप्यति पातकैः । व्रतं कृतं सकृदपि सदैव हि महाफलम्

jīvanmukto naraḥ prokto naiva lipyati pātakaiḥ vrataṁ kṛtaṁ sakṛdapi sadaiva hi mahāphalam

वह पुरुष जीवन्मुक्त कहा गया है, वह पापों से कभी लिप्त नहीं होता। एक बार भी किया गया व्रत सदा ही महान फलदायक होता है।

श्लोक 23 (skanda.6.237.23)

चातुर्मास्ये विशेषेण ब्रह्मचर्यादिसेवनम् । अव्रतेन गतं येषां चातुर्मास्यं सदा नृणाम्

cāturmāsye viśeṣeṇa brahmacaryādisevanam avratena gataṁ yeṣāṁ cāturmāsyaṁ sadā nṛṇām

विशेषतः चातुर्मास्य में ब्रह्मचर्य आदि का पालन करना चाहिए। जिन मनुष्यों का चातुर्मास्य सदा व्रत के बिना ही व्यतीत हो जाता है,

श्लोक 24 (skanda.6.237.24)

धर्मस्तेषां वृथा सद्भिस्तत्त्वज्ञैः परिकीर्तितः । सर्वेषामेव वर्णानां व्रतचर्या महाफलम्

dharmasteṣāṁ vṛthā sadbhistattvajñaiḥ parikīrtitaḥ sarveṣāmeva varṇānāṁ vratacaryā mahāphalam

उनका शेष धर्म भी सत्पुरुषों और तत्त्वज्ञों द्वारा व्यर्थ बताया गया है। समस्त वर्णों के लिए व्रत का आचरण महाफलदायक है।

श्लोक 25 (skanda.6.237.25)

स्वल्पापि विहिता वत्स चातुर्मास्ये सुखप्रदा । सर्वत्र दृश्यते विष्णुर्व्रतसेवापरैर्नृभिः

svalpāpi vihitā vatsa cāturmāsye sukhapradā sarvatra dṛśyate viṣṇurvratasevāparairnṛbhiḥ

हे वत्स, चातुर्मास्य में की गई अल्प वस्तु भी सुखदायिनी होती है। व्रत-सेवा में तत्पर पुरुषों को विष्णु सर्वत्र दिखाई देते हैं।

श्लोक 26 (skanda.6.237.26)

चातुर्मास्ये समायाते पालयेत्तत्प्रयत्नतः

cāturmāsye samāyāte pālayettatprayatnataḥ

चातुर्मास्य के आने पर, मनुष्य को उसका प्रयत्नपूर्वक पालन करना चाहिए।

श्लोक 27 (skanda.6.237.27)

भजस्व विष्णुं द्विजवह्नितीर्थवेदप्रभेदमयमूर्तिमजं विराजम् । यत्प्रसादाद्भवति मोक्षमहातरुस्थस्तापं न यास्यति भवार्कसमुद्भवं तम्

bhajasva viṣṇuṁ dvijavahnitīrthavedaprabhedamayamūrtimajaṁ virājam yatprasādādbhavati mokṣamahātarusthastāpaṁ na yāsyati bhavārkasamudbhavaṁ tam

उस विष्णु का भजन करो, जो अजन्मा और तेजस्वी हैं, तथा जिनका स्वरूप ब्राह्मण, अग्नि, तीर्थ और वेद के भेदों में समान रूप से व्याप्त है — जिनकी कृपा से मनुष्य मोक्षरूपी महावृक्ष पर स्थित हो जाता है, और संसाररूपी सूर्य से उत्पन्न संताप को नहीं पाता।

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