नागर खण्ड · अध्याय 238
चातुर्मास्य में तप की महिमा का वर्णन
श्लोक 1 (skanda.6.238.1)
ब्रह्मा उवाच । तपः शृणुष्व विप्रेंद्र विस्तरेण महामते । यस्य श्रवणमात्रेण चातुर्मास्येऽघनाशनम्
brahmā uvāca tapaḥ śṛṇuṣva vipreṁdra vistareṇa mahāmate yasya śravaṇamātreṇa cāturmāsye'ghanāśanam
ब्रह्मा जी ने कहा — हे विप्रेन्द्र, हे महामते, तप को विस्तार से सुनो, जिसके श्रवणमात्र से चातुर्मास्य में पाप नष्ट हो जाता है।
श्लोक 2 (skanda.6.238.2)
षोडशैरुपचारैश्च विष्णोः पूजा सदा तपः । ततः सुप्ते जगन्नाथे महत्तप उदाहृतम्
ṣoḍaśairupacāraiśca viṣṇoḥ pūjā sadā tapaḥ tataḥ supte jagannāthe mahattapa udāhṛtam
सोलह उपचारों से विष्णु की पूजा सदा ही तप है; तथा जब जगन्नाथ शयन में हों, तब वह महान तप कहा गया है।
श्लोक 3 (skanda.6.238.3)
करणं पंचयज्ञानां सततं तप एव हि । तन्निवेद्य हरौ चैव चातुर्मास्ये महत्तपः
karaṇaṁ paṁcayajñānāṁ satataṁ tapa eva hi tannivedya harau caiva cāturmāsye mahattapaḥ
पंच-यज्ञों का निरंतर सम्पादन ही तप है; और उसे हरि को अर्पित करके चातुर्मास्य में करना महान तप है।
श्लोक 4 (skanda.6.238.4)
ऋतुयानं गृहस्थस्य तप एव सदैव हि । चातुर्मास्ये हरिप्रीत्यै तन्निषेव्यं महत्तपः
ṛtuyānaṁ gṛhasthasya tapa eva sadaiva hi cāturmāsye hariprītyai tanniṣevyaṁ mahattapaḥ
गृहस्थ के लिए ऋतुकाल तक ही संयम सदैव तप है; हरि की प्रीति के लिए चातुर्मास्य में उसका पालन महान तप है।
श्लोक 5 (skanda.6.238.5)
सत्यवादस्तपो नित्यं प्राणिनां भुवि दुर्लभम् । सुप्ते देवपतौ कुर्वन्ननंतफलभाग्भवेत्
satyavādastapo nityaṁ prāṇināṁ bhuvi durlabham supte devapatau kurvannanaṁtaphalabhāgbhavet
सत्यभाषण सदा तप है, जो प्राणियों के लिए इस भूमि पर दुर्लभ है; देवपति के शयन-काल में इसका पालन करने वाला अनंत फल का भागी होता है।
श्लोक 6 (skanda.6.238.6)
अहिंसादिगुणानां च पालनं सततं तपः । चातुर्मास्ये त्यक्तवैरं महत्तप उदारधीः
ahiṁsādiguṇānāṁ ca pālanaṁ satataṁ tapaḥ cāturmāsye tyaktavairaṁ mahattapa udāradhīḥ
अहिंसा आदि गुणों का निरंतर पालन ही तप है; चातुर्मास्य में वैर त्यागना उदार बुद्धि वालों का महान तप है।
श्लोक 7 (skanda.6.238.7)
तप एव महन्मर्त्यः पंचायतनपूजनम् । चातुर्मास्ये विशेषेण हरिप्रीत्या समाचरेत्
tapa eva mahanmartyaḥ paṁcāyatanapūjanam cāturmāsye viśeṣeṇa hariprītyā samācaret
पंचायतन-पूजन ही मनुष्यों के लिए महान तप है; इसे चातुर्मास्य में विशेष रूप से हरि की प्रीति के लिए करना चाहिए।
श्लोक 8 (skanda.6.238.8)
नारद उवाच । पंचायतनसंज्ञेयं कस्योक्ता सा कथं भवेत् । कथं पूजा च कर्तव्या विस्तरेणाशु तद्वद
nārada uvāca paṁcāyatanasaṁjñeyaṁ kasyoktā sā kathaṁ bhavet kathaṁ pūjā ca kartavyā vistareṇāśu tadvada
नारद जी ने कहा — यह 'पंचायतन' संज्ञा किसकी कही गई है, और यह कैसे होती है? तथा उसकी पूजा कैसे करनी चाहिए, यह मुझे शीघ्र ही विस्तार से बताइए।
श्लोक 9 (skanda.6.238.9)
ब्रह्मा उवाच । प्रातर्मध्याह्नपूजायां मध्ये पूज्यो रविः सदा । रात्रौ मध्ये भवेच्चंद्रस्तद्वर्णकुसुमैः शुभैः
brahmā uvāca prātarmadhyāhnapūjāyāṁ madhye pūjyo raviḥ sadā rātrau madhye bhaveccaṁdrastadvarṇakusumaiḥ śubhaiḥ
ब्रह्मा जी ने कहा — प्रातःकाल और मध्याह्न की पूजा में मध्य स्थान पर सदा सूर्य पूज्य हैं; रात्रि में मध्य स्थान पर चन्द्रमा को उन्हीं के वर्ण के शुभ पुष्पों से पूजना चाहिए।
श्लोक 10 (skanda.6.238.10)
वह्निकोणे तु हेरंबं सर्वविघ्नोपशांतये । रक्तचंदनपुष्पैश्च चातुर्मास्ये विशेषतः
vahnikoṇe tu heraṁbaṁ sarvavighnopaśāṁtaye raktacaṁdanapuṣpaiśca cāturmāsye viśeṣataḥ
अग्निकोण (आग्नेय) में सर्वविघ्न-शांति के लिए हेरम्ब (गणेश) को, विशेषतः चातुर्मास्य में, लाल चन्दन और पुष्पों से पूजना चाहिए।
श्लोक 11 (skanda.6.238.11)
नैर्ऋतं दलमास्थाय भगवान्दुष्टदर्पहा । गृहस्थस्य सदा शत्रुविनाशं विदधाति सः
nairṛtaṁ dalamāsthāya bhagavānduṣṭadarpahā gṛhasthasya sadā śatruvināśaṁ vidadhāti saḥ
नैऋत्य-दिशा के दल में स्थित होकर, दुष्टों का दर्प हरने वाले भगवान् गृहस्थ के शत्रुओं का सदा विनाश करते हैं।
श्लोक 12 (skanda.6.238.12)
नैर्ऋत्यकोणगं विष्णुं पूजयेत्सर्वदा बुधः । सुगन्धचंदनैः पुष्पैर्नैवेद्यैश्चातिशोभनैः
nairṛtyakoṇagaṁ viṣṇuṁ pūjayetsarvadā budhaḥ sugandhacaṁdanaiḥ puṣpairnaivedyaiścātiśobhanaiḥ
बुद्धिमान् पुरुष को नैऋत्य कोण में स्थित विष्णु को सुगन्धित चन्दन, पुष्पों तथा अत्यंत शोभन नैवेद्यों से सदा पूजना चाहिए।
श्लोक 13 (skanda.6.238.13)
गोत्रजा वायुकोणे तु पूजनीया सदा बुधैः । पुत्रपौत्रप्रवृद्ध्यर्थं सुमनोभिर्मनोहरैः
gotrajā vāyukoṇe tu pūjanīyā sadā budhaiḥ putrapautrapravṛddhyarthaṁ sumanobhirmanoharaiḥ
वायव्य कोण में गोत्र-देवता को बुद्धिमानों द्वारा सदा पूजनीय माना गया है, पुत्र-पौत्रों की वृद्धि के लिए मनोहर सुंदर पुष्पों से।
श्लोक 14 (skanda.6.238.14)
ऐशाने भगवान्रुद्रः श्वेतपुष्पैः सदाऽर्चितः । अपमृत्युविनाशाय सर्वदोषापनुत्तये
aiśāne bhagavānrudraḥ śvetapuṣpaiḥ sadā'rcitaḥ apamṛtyuvināśāya sarvadoṣāpanuttaye
ईशान कोण में भगवान् रुद्र को श्वेत पुष्पों से सदा अर्चित करना चाहिए, अपमृत्यु के नाश तथा समस्त दोषों की निवृत्ति के लिए।
श्लोक 15 (skanda.6.238.15)
जागर्ति महिमा यस्य ब्रह्माद्यैर्नैव लिख्यते । पंचायतनमेतद्धि पूज्यते गृहमेधिभिः
jāgarti mahimā yasya brahmādyairnaiva likhyate paṁcāyatanametaddhi pūjyate gṛhamedhibhiḥ
जिनकी महिमा सदा जागृत रहती है, जिसे ब्रह्मा आदि भी पूर्णतः वर्णित नहीं कर सकते, इस पंचायतन का पूजन गृहस्थों द्वारा किया जाता है।
श्लोक 16 (skanda.6.238.16)
तप एतत्सदा कार्यं चातुर्मास्ये महाफलम् । पर्वकालेषु सर्वेषु दानं देयं तपः सदा । चातुर्मास्ये विशेषेण तदनंतं प्रजायते
tapa etatsadā kāryaṁ cāturmāsye mahāphalam parvakāleṣu sarveṣu dānaṁ deyaṁ tapaḥ sadā cāturmāsye viśeṣeṇa tadanaṁtaṁ prajāyate
यह तप सदा करने योग्य है, चातुर्मास्य में यह महाफलदायक है। समस्त पर्व-कालों में दान देना भी सदा तप है; विशेषतः चातुर्मास्य में वह अनंत हो जाता है।
श्लोक 17 (skanda.6.238.17)
शौचं तु द्विविधं ग्राह्यं बाह्यमाभ्यंतरं सदा । जलशौचं तथा बाह्यं श्रद्धया चांतरं भवेत्
śaucaṁ tu dvividhaṁ grāhyaṁ bāhyamābhyaṁtaraṁ sadā jalaśaucaṁ tathā bāhyaṁ śraddhayā cāṁtaraṁ bhavet
शौच को दो प्रकार का जानना चाहिए — सदा बाह्य और आभ्यंतर; जल से किया गया शौच बाह्य है, तथा श्रद्धा से जो शौच होता है वह आभ्यंतर है।
श्लोक 18 (skanda.6.238.18)
इन्द्रियाणां ग्रहः कार्यस्तपसो लक्षणं परम् । निवृत्त्येंद्रियलौल्यं च चातुर्मास्ये महत्तपः
indriyāṇāṁ grahaḥ kāryastapaso lakṣaṇaṁ param nivṛttyeṁdriyalaulyaṁ ca cāturmāsye mahattapaḥ
इन्द्रियों का संयम करना ही तप का सर्वोच्च लक्षण है; चातुर्मास्य में इन्द्रियों की चंचलता से निवृत्त होना महान तप है।
श्लोक 19 (skanda.6.238.19)
इन्द्रियाश्वान्सन्नियम्य सततं सुखमेधते । नरके पात्यते प्राणैस्तैरेवोत्पथगामिभिः
indriyāśvānsanniyamya satataṁ sukhamedhate narake pātyate prāṇaistairevotpathagāmibhiḥ
इन्द्रियरूपी अश्वों को नियंत्रित करके मनुष्य निरंतर सुख में वृद्धि करता है; किंतु कुमार्गगामी उन्हीं इन्द्रियों के कारण प्राणी नरक में गिरा दिया जाता है।
श्लोक 20 (skanda.6.238.20)
ममतारूपिणीं ग्राहीं दुष्टां निर्भर्त्स्य निग्रहेत् । तप एव सदा पुंसां चातुर्मास्येऽधिगौरवम्
mamatārūpiṇīṁ grāhīṁ duṣṭāṁ nirbhartsya nigrahet tapa eva sadā puṁsāṁ cāturmāsye'dhigauravam
ममतारूपी दुष्ट मगरमच्छ को धिक्कार कर उसका निग्रह करना चाहिए; पुरुषों के लिए यही सदा तप है, जो चातुर्मास्य में विशेष गौरव वाला होता है।
श्लोक 21 (skanda.6.238.21)
काम एष महाशत्रुस्तमेकं निर्जयेद्दृढम् । जितकामा महात्मानस्तैर्जितं निखिलं जगत्
kāma eṣa mahāśatrustamekaṁ nirjayeddṛḍham jitakāmā mahātmānastairjitaṁ nikhilaṁ jagat
यह काम महाशत्रु है, इसे अकेले ही दृढ़तापूर्वक जीतना चाहिए; जिन महात्माओं ने काम को जीत लिया है, उनके द्वारा मानो सम्पूर्ण जगत् ही जीत लिया गया है।
श्लोक 22 (skanda.6.238.22)
एतच्च तपसो मूलं तपसो मूलमेव तत् । सर्वदा कामविजयः संकल्पविजयस्तथा
etacca tapaso mūlaṁ tapaso mūlameva tat sarvadā kāmavijayaḥ saṁkalpavijayastathā
यही तप का मूल है, यही निश्चय ही तप का मूल है — काम पर सदा विजय, और उसी प्रकार संकल्प (कामना) पर विजय।
श्लोक 23 (skanda.6.238.23)
तदेव हि परं ज्ञानं कामो येन प्रजायते । महत्तपस्तदेवाहुश्चातुर्मास्ये फलोत्तमम्
tadeva hi paraṁ jñānaṁ kāmo yena prajāyate mahattapastadevāhuścāturmāsye phalottamam
वही परम ज्ञान है, जिससे काम का उन्मूलन होता है; उसे ही महान तप कहा गया है, जो चातुर्मास्य में उत्तम फल देने वाला है।
श्लोक 24 (skanda.6.238.24)
लोभः सदा परित्याज्यः पापं लोभे समास्थितम् । तपस्तस्यैव विजयश्चातुर्मास्ये विशेषतः
lobhaḥ sadā parityājyaḥ pāpaṁ lobhe samāsthitam tapastasyaiva vijayaścāturmāsye viśeṣataḥ
लोभ को सदा त्याग देना चाहिए; पाप लोभ में ही दृढ़तापूर्वक स्थित रहता है। उसी की विजय तप है, विशेषतः चातुर्मास्य में।
श्लोक 25 (skanda.6.238.25)
मोहः सदाऽविवेकश्च वर्जनीयः प्रयत्नतः । तेन त्यक्तो नरो ज्ञानी न ज्ञानी मोहसंश्रयात्
mohaḥ sadā'vivekaśca varjanīyaḥ prayatnataḥ tena tyakto naro jñānī na jñānī mohasaṁśrayāt
मोह और अविवेक को सदा प्रयत्नपूर्वक त्याग देना चाहिए। जिस पुरुष ने मोह को त्याग दिया वह ज्ञानी है; जो मोह का आश्रय लेता है वह ज्ञानी नहीं है।
श्लोक 26 (skanda.6.238.26)
मद एव मनुष्याणां शरीरस्थो महारिपुः । सदा स एव निग्राह्यः सुप्ते देवे विशेषतः
mada eva manuṣyāṇāṁ śarīrastho mahāripuḥ sadā sa eva nigrāhyaḥ supte deve viśeṣataḥ
मद ही मनुष्यों के शरीर में स्थित महाशत्रु है; उसी का सदा निग्रह करना चाहिए, विशेषतः जब देव शयन में हों।
श्लोक 27 (skanda.6.238.27)
मानः सर्वेषु भूतेषु वसत्येव भयावहः । क्षमया तं विनिर्जित्य चातुर्मास्ये गुणाधिकः
mānaḥ sarveṣu bhūteṣu vasatyeva bhayāvahaḥ kṣamayā taṁ vinirjitya cāturmāsye guṇādhikaḥ
अभिमान समस्त प्राणियों में निवास करने वाला भयंकर है; क्षमा से उसे जीतकर मनुष्य चातुर्मास्य में गुणों में अधिक हो जाता है।
श्लोक 28 (skanda.6.238.28)
मात्सर्यं निर्जयेत्प्राज्ञो महापातककारणम् । चातुर्मास्ये जितं तेन त्रैलोक्यममरैः सह
mātsaryaṁ nirjayetprājño mahāpātakakāraṇam cāturmāsye jitaṁ tena trailokyamamaraiḥ saha
बुद्धिमान् पुरुष को ईर्ष्या को जीतना चाहिए, जो महापाप का कारण है; चातुर्मास्य में उसे जीतकर उसने मानो देवताओं सहित त्रैलोक्य को ही जीत लिया।
श्लोक 29 (skanda.6.238.29)
अहंकारसमाक्रांता मुनयो विजितेंद्रियाः । धर्ममार्गं परित्यज्य कुर्वत्युन्मार्गजां क्रियाम्
ahaṁkārasamākrāṁtā munayo vijiteṁdriyāḥ dharmamārgaṁ parityajya kurvatyunmārgajāṁ kriyām
इन्द्रियों को जीत चुके मुनि भी यदि अहंकार से अभिभूत हो जाएँ, तो धर्म-मार्ग को त्यागकर कुमार्ग से उत्पन्न क्रिया करने लगते हैं।
श्लोक 30 (skanda.6.238.30)
अहंकारं परित्यज्य सततं सुखमाप्नुयात् । चातुर्मास्ये विशेषेण तस्य त्यागे महाफलम्
ahaṁkāraṁ parityajya satataṁ sukhamāpnuyāt cāturmāsye viśeṣeṇa tasya tyāge mahāphalam
अहंकार को त्यागकर मनुष्य निरंतर सुख प्राप्त करता है; विशेषतः चातुर्मास्य में उसके त्याग में महान फल है।
श्लोक 31 (skanda.6.238.31)
एतद्धि तपसो मूलं यदेतन्मनसस्त्यजेत् । त्यक्तेष्वेतेषु सर्वेषु परब्रह्ममयो भवेत्
etaddhi tapaso mūlaṁ yadetanmanasastyajet tyakteṣveteṣu sarveṣu parabrahmamayo bhavet
यही तप का मूल है कि इन (छहों शत्रुओं) को मन से त्याग दिया जाए; इन सबके त्याग हो जाने पर मनुष्य परब्रह्ममय हो जाता है।
श्लोक 32 (skanda.6.238.32)
प्रथमं कायशुद्ध्यर्थं प्राजापत्यं समाचरेत् । शयने देवदेवस्य विशेषेण महत्तपः
prathamaṁ kāyaśuddhyarthaṁ prājāpatyaṁ samācaret śayane devadevasya viśeṣeṇa mahattapaḥ
पहले शरीर की शुद्धि के लिए प्राजापत्य व्रत का आचरण करना चाहिए; देवाधिदेव के शयन-काल में यह विशेष रूप से महान तप है।
श्लोक 33 (skanda.6.238.33)
हरेस्तु शयने नित्यमेकांतरमुपोषणम् । यः करोति नरो भक्त्या न स गच्छेद्यमालयम्
harestu śayane nityamekāṁtaramupoṣaṇam yaḥ karoti naro bhaktyā na sa gacchedyamālayam
हरि के शयन-काल में जो मनुष्य भक्तिपूर्वक निरंतर एक दिन छोड़कर उपवास करता है, वह यमलोक को नहीं जाता।
श्लोक 34 (skanda.6.238.34)
हरिस्वापे नरो नित्यमेकभक्तं समाचरेत् । दिवसेदिवसे तस्य द्वादशाहफलं लभेत्
harisvāpe naro nityamekabhaktaṁ samācaret divasedivase tasya dvādaśāhaphalaṁ labhet
हरि के शयनकाल में जो मनुष्य नित्य एक समय भोजन करता है, उसे प्रत्येक दिन बारह दिनों के व्रत का फल प्राप्त होता है।
श्लोक 35 (skanda.6.238.35)
चातुर्मास्ये नरो यस्तु शाकाहारपरो यदि । पुण्यं क्रतुसहस्राणां जायते नात्र संशयः
cāturmāsye naro yastu śākāhāraparo yadi puṇyaṁ kratusahasrāṇāṁ jāyate nātra saṁśayaḥ
चातुर्मास्य में जो मनुष्य शाकाहार-परायण रहता है, उसे सहस्रों यज्ञों का पुण्य प्राप्त होता है, इसमें कोई संशय नहीं है।
श्लोक 36 (skanda.6.238.36)
चातुर्मास्ये नरो नित्यं चांद्रायणव्रतं चरेत् । एकैकमासे तत्पुण्यं वर्णितुं नैव शक्यते
cāturmāsye naro nityaṁ cāṁdrāyaṇavrataṁ caret ekaikamāse tatpuṇyaṁ varṇituṁ naiva śakyate
जो मनुष्य चातुर्मास्य में नित्य चांद्रायण-व्रत का आचरण करता है, उसका पुण्य एक-एक मास में भी वर्णन करना संभव नहीं है।
श्लोक 37 (skanda.6.238.37)
सुप्ते देवे च पाराकं यः करोति विशुद्धधीः । नारी वा श्रद्धया युक्ता शतजन्माघनाशनम्
supte deve ca pārākaṁ yaḥ karoti viśuddhadhīḥ nārī vā śraddhayā yuktā śatajanmāghanāśanam
देव के शयन-काल में जो विशुद्ध बुद्धि वाला पुरुष, अथवा श्रद्धायुक्त स्त्री, पाराक (निरंतर उपवास) करता है, वह सौ जन्मों के पाप का नाश कर देता है।
श्लोक 38 (skanda.6.238.38)
कृच्छ्रसेवी भवेद्यस्तु सुप्ते देवे जनार्दने । पापराशिं विनिर्धूय वैकुण्ठे गणतां व्रजेत्
kṛcchrasevī bhavedyastu supte deve janārdane pāparāśiṁ vinirdhūya vaikuṇṭhe gaṇatāṁ vrajet
जो जनार्दन के शयनकाल में कृच्छ्र-व्रत का सेवन करता है, वह पापों की राशि को झाड़कर वैकुण्ठ में गणपद को प्राप्त होता है।
श्लोक 39 (skanda.6.238.39)
तप्तकृच्छ्रपरो यस्तु सुप्ते देवे जनार्दने । कीर्तिं संप्राप्य वा पुत्रं विष्णुसायुज्यतां व्रजेत्
taptakṛcchraparo yastu supte deve janārdane kīrtiṁ saṁprāpya vā putraṁ viṣṇusāyujyatāṁ vrajet
जो जनार्दन के शयनकाल में तप्तकृच्छ्र-व्रत में तत्पर रहता है, वह कीर्ति अथवा पुत्र प्राप्त कर अंततः विष्णु के सायुज्य को प्राप्त होता है।
श्लोक 40 (skanda.6.238.40)
दुग्धाहारपरो यस्तु चातुर्मास्येऽभिजायते । तस्य पापसहस्राणि विलयं यांति देहिनः
dugdhāhāraparo yastu cāturmāsye'bhijāyate tasya pāpasahasrāṇi vilayaṁ yāṁti dehinaḥ
जो चातुर्मास्य में केवल दुग्धाहार पर रहता है, उस प्राणी के सहस्रों पाप विलीन हो जाते हैं।
श्लोक 41 (skanda.6.238.41)
मितान्नाशनकृद्धीरश्चातुर्मास्ये नरो यदि । निर्धूय सकलं पापं वैकुण्ठपदमाप्नुयात्
mitānnāśanakṛddhīraścāturmāsye naro yadi nirdhūya sakalaṁ pāpaṁ vaikuṇṭhapadamāpnuyāt
यदि धीर मनुष्य चातुर्मास्य में मित (नियंत्रित) आहार करता है, तो वह सम्पूर्ण पाप को झाड़कर वैकुण्ठ-पद को प्राप्त करता है।
श्लोक 42 (skanda.6.238.42)
एकान्नाशनकृन्मर्त्यो न रोगैरभिभूयते । अक्षारलवणाशी च चातुर्मास्ये न पापभाक्
ekānnāśanakṛnmartyo na rogairabhibhūyate akṣāralavaṇāśī ca cāturmāsye na pāpabhāk
एक ही प्रकार का अन्न खाने वाला मनुष्य रोगों से पराभूत नहीं होता; और चातुर्मास्य में क्षार-लवण-रहित भोजन करने वाला पाप का भागी नहीं होता।
श्लोक 43 (skanda.6.238.43)
कृताहारो महापापैर्निर्मुक्तो जायते ध्रुवम् । हरिमुद्दिश्य मासेषु चतुर्षु च न संशयः
kṛtāhāro mahāpāpairnirmukto jāyate dhruvam harimuddiśya māseṣu caturṣu ca na saṁśayaḥ
हरि का ध्यान करते हुए चारों महीनों में जो एक बार भोजन करता है, वह निश्चय ही महापापों से मुक्त हो जाता है, इसमें संशय नहीं है।
श्लोक 44 (skanda.6.238.44)
कन्दमूलाशनकरः पूर्वजान्सह चात्मना । उद्धृत्य नरकाद्घोराद्याति विष्णुसलोकताम्
kandamūlāśanakaraḥ pūrvajānsaha cātmanā uddhṛtya narakādghorādyāti viṣṇusalokatām
कन्द-मूल का आहार करने वाला मनुष्य अपने पूर्वजों को अपने साथ भयंकर नरक से उद्धार करके विष्णु के लोक को प्राप्त करता है।
श्लोक 45 (skanda.6.238.45)
नित्यांबुप्राशनकरश्चातुर्मास्ये यदा भवेत् । दिनेदिनेऽश्वमेधस्य फलमाप्नोत्यसंशयम्
nityāṁbuprāśanakaraścāturmāsye yadā bhavet dinedine'śvamedhasya phalamāpnotyasaṁśayam
जब मनुष्य चातुर्मास्य में नित्य केवल जल पीकर रहता है, तो उसे प्रत्येक दिन अश्वमेध यज्ञ का फल प्राप्त होता है, इसमें संशय नहीं है।
श्लोक 46 (skanda.6.238.46)
शीतवृष्टिसहो यस्तु चातुर्मास्ये नरो भवेत् । हरिप्रीत्यै जगन्नाथस्तस्यात्मानं प्रयच्छति
śītavṛṣṭisaho yastu cāturmāsye naro bhavet hariprītyai jagannāthastasyātmānaṁ prayacchati
जो मनुष्य चातुर्मास्य में हरि की प्रीति के लिए शीत और वर्षा को सहन करता है, उसे जगन्नाथ अपना ही आत्मस्वरूप प्रदान कर देते हैं।
श्लोक 47 (skanda.6.238.47)
महापाराकसंज्ञं तु महत्तप उदाहृतम् । मासैकमुपवासेन सर्वं पूर्णं प्रजायते
mahāpārākasaṁjñaṁ tu mahattapa udāhṛtam māsaikamupavāsena sarvaṁ pūrṇaṁ prajāyate
महापाराक नामक तप महान तप कहा गया है; एक ही मास के उपवास से सब कुछ पूर्ण हो जाता है।
श्लोक 48 (skanda.6.238.48)
देवस्वापदिनादौ तु यावत्पवित्रद्वादशी । पवित्रद्वादशीपूर्वं यावच्छ्रवणद्वादशी
devasvāpadinādau tu yāvatpavitradvādaśī pavitradvādaśīpūrvaṁ yāvacchravaṇadvādaśī
देव के शयन-दिन से लेकर पवित्र-द्वादशी तक — तथा पवित्र-द्वादशी से पूर्व श्रवण-द्वादशी तक —
श्लोक 49 (skanda.6.238.49)
महापाराकमेतद्धि द्वितीयं परिकीर्तितम् । श्रवणद्वादशीपूर्वं प्राप्ता चाश्विनद्वादशी
mahāpārākametaddhi dvitīyaṁ parikīrtitam śravaṇadvādaśīpūrvaṁ prāptā cāśvinadvādaśī
यह द्वितीय महापाराक कहा गया है। श्रवण-द्वादशी से पूर्व, आश्विन-द्वादशी के प्राप्त होने तक —
श्लोक 50 (skanda.6.238.50)
महापाराक तृतीयं प्राज्ञैश्च समुदाहृतम् । आश्विनद्वादशी चादौ प्राप्ता देवसुबोधिनी
mahāpārāka tṛtīyaṁ prājñaiśca samudāhṛtam āśvinadvādaśī cādau prāptā devasubodhinī
— यह विद्वानों द्वारा तृतीय महापाराक कहा गया है। आश्विन-द्वादशी के आरम्भ से देव-प्रबोधिनी (देवोत्थान) की प्राप्ति तक —
श्लोक 51 (skanda.6.238.51)
महापाराकमेतद्धि चतुर्थं परिकथ्यते । एतेषामेकमपि च नारी वा पुरुषोऽपि वा
mahāpārākametaddhi caturthaṁ parikathyate eteṣāmekamapi ca nārī vā puruṣo'pi vā
— यह ही चतुर्थ महापाराक कहा जाता है। इनमें से कोई एक भी, चाहे स्त्री हो या पुरुष,
श्लोक 52 (skanda.6.238.52)
यः करोति नरो भक्त्या स च विष्णुः सनातनः । इदं च सर्वतपसां महत्तप उदाहृतम्
yaḥ karoti naro bhaktyā sa ca viṣṇuḥ sanātanaḥ idaṁ ca sarvatapasāṁ mahattapa udāhṛtam
जो व्यक्ति भक्तिपूर्वक करता है, वह मानो साक्षात् सनातन विष्णु ही हो जाता है। यह सभी तपों में महान तप कहा गया है।
श्लोक 53 (skanda.6.238.53)
दुष्करं दुर्लभं लोके चातुर्मास्ये मखाधिकम् । दिवसेदिवसे तस्य यज्ञायुतफलं स्मृतम्
duṣkaraṁ durlabhaṁ loke cāturmāsye makhādhikam divasedivase tasya yajñāyutaphalaṁ smṛtam
यह करना कठिन और लोक में दुर्लभ है, चातुर्मास्य में यह यज्ञ से भी अधिक फलदायक है; इसके प्रत्येक दिन के लिए दस सहस्र यज्ञों का फल कहा गया है।
श्लोक 54 (skanda.6.238.54)
महत्तप इदं येन कृतं जगति दुर्लभम् । इदमेव महापुण्यमिदमेव महत्सुखम् । इदमेव परं श्रेयो महापाराकसेवनम्
mahattapa idaṁ yena kṛtaṁ jagati durlabham idameva mahāpuṇyamidameva mahatsukham idameva paraṁ śreyo mahāpārākasevanam
यह महान तप, जिसे संसार में करना दुर्लभ है — यही महापुण्य है, यही महासुख है; यही परम श्रेय है — महापाराक का सेवन।
श्लोक 55 (skanda.6.238.55)
नारायणो वसेद्देहे ज्ञानं तस्य प्रजायते । जीवन्मुक्तः स भवति महापातककारकः
nārāyaṇo vaseddehe jñānaṁ tasya prajāyate jīvanmuktaḥ sa bhavati mahāpātakakārakaḥ
नारायण उसके देह में निवास करते हैं और उसे ज्ञान की प्राप्ति होती है; वह जीवन्मुक्त हो जाता है, चाहे वह पहले महापापों का करने वाला ही क्यों न रहा हो।
श्लोक 56 (skanda.6.238.56)
तावद्गर्जंति पापानि नरकास्तावदेव हि । तावन्मायासहस्राणि यावन्मासोपवासकः
tāvadgarjaṁti pāpāni narakāstāvadeva hi tāvanmāyāsahasrāṇi yāvanmāsopavāsakaḥ
जब तक मनुष्य एक मास के उपवास का व्रती नहीं बनता, तभी तक पाप गरजते रहते हैं, तभी तक नरक भी, और तभी तक माया के सहस्रों जाल भी।
श्लोक 57 (skanda.6.238.57)
चातुर्मास्युपवासी यो यस्य प्रांगणिको भवेत् । सोऽपि हत्यासहस्राणि त्यक्त्वा निष्कल्मषो भवेत्
cāturmāsyupavāsī yo yasya prāṁgaṇiko bhavet so'pi hatyāsahasrāṇi tyaktvā niṣkalmaṣo bhavet
चातुर्मास्य में उपवास करने वाला जिसके आँगन में भी निवास करे, वह भी सहस्रों हत्याओं को त्यागकर निष्कलंक हो जाता है।
श्लोक 58 (skanda.6.238.58)
य इदं श्रावयेन्मर्त्यो यः पठेत्सततं स्वयम्
ya idaṁ śrāvayenmartyo yaḥ paṭhetsatataṁ svayam
जो मनुष्य इसे दूसरों को सुनाता है, अथवा जो स्वयं निरंतर इसका पाठ करता है —
श्लोक 59 (skanda.6.238.59)
सोऽपि वाचस्पतिसमः फलं प्राप्नोत्यसंशयम्
so'pi vācaspatisamaḥ phalaṁ prāpnotyasaṁśayam
वह भी वाचस्पति के समान हो जाता है और निःसंदेह वह फल प्राप्त करता है।
श्लोक 60 (skanda.6.238.60)
इदं पुराणं परमं पवित्रं शृण्वन्गृणन्पापविशुद्धिहेतु । नारायणं तं मनसा विचिन्त्य मृतोऽभिगच्छत्यमृतं सुराधिकम्
idaṁ purāṇaṁ paramaṁ pavitraṁ śṛṇvangṛṇanpāpaviśuddhihetu nārāyaṇaṁ taṁ manasā vicintya mṛto'bhigacchatyamṛtaṁ surādhikam
यह पुराण परम पवित्र है, जो इसे सुनता या कहता है, उसके पापों की शुद्धि का कारण बनता है। नारायण का मन से चिंतन करते हुए मरने वाला, देवताओं से भी बढ़कर, अमृतत्व को प्राप्त करता है।