नागर खण्ड · अध्याय 239
षोडशोपचार-पूजा एवं दीप-महिमा का वर्णन
श्लोक 1 (skanda.6.239.1)
नारद उवाच । उपचारैः षोडशभिः पूजनं क्रियते कथम् । ते के षोडश भावाः स्युर्नित्यं ये शयने हरेः
nārada uvāca upacāraiḥ ṣoḍaśabhiḥ pūjanaṁ kriyate katham te ke ṣoḍaśa bhāvāḥ syurnityaṁ ye śayane hareḥ
नारद जी ने कहा — सोलह उपचारों से पूजन कैसे किया जाता है? हरि के शयनकाल में नित्य उपयोग होने वाले वे सोलह भाव कौन-से हैं?
श्लोक 2 (skanda.6.239.2)
एतद्विस्तरतो ब्रूहि पृच्छतो मे प्रजापते । तव प्रसादमासाद्य जगत्पूज्यो भवाम्यहम्
etadvistarato brūhi pṛcchato me prajāpate tava prasādamāsādya jagatpūjyo bhavāmyaham
हे प्रजापति, पूछने वाले मुझे यह विस्तार से बताइए; आपकी कृपा पाकर मैं जगत् में पूज्य बनूँ।
श्लोक 3 (skanda.6.239.3)
ब्रह्मा उवाच । विष्णुभक्तिर्दृढा कार्या वेदशास्त्रविधानतः । वेदमूलमिदं सर्वं वेदो विष्णुः सनातनः
brahmā uvāca viṣṇubhaktirdṛḍhā kāryā vedaśāstravidhānataḥ vedamūlamidaṁ sarvaṁ vedo viṣṇuḥ sanātanaḥ
ब्रह्मा जी ने कहा — वेद और शास्त्र के विधान के अनुसार विष्णु में दृढ़ भक्ति करनी चाहिए। यह सब कुछ वेदमूलक है, और वेद स्वयं सनातन विष्णु ही हैं।
श्लोक 4 (skanda.6.239.4)
ते वेदा ब्राह्मणाधारा ब्राह्मणाश्चाग्निदैवताः । अग्नौ प्रास्ताहुतिर्विप्रो यज्ञे देवं यजन्सदा
te vedā brāhmaṇādhārā brāhmaṇāścāgnidaivatāḥ agnau prāstāhutirvipro yajñe devaṁ yajansadā
वे वेद ब्राह्मणों पर आधारित हैं, और ब्राह्मणों के अधिष्ठाता देव अग्नि हैं। यज्ञ में अग्नि में डाली गई आहुति द्वारा विप्र सदा देव का यजन करता है।
श्लोक 5 (skanda.6.239.5)
जगत्संधारयेत्सर्वं विष्णुपूजारतः सदा । नारायणः स्मृतो ध्यातः क्लेशदुःखादिनाशनः
jagatsaṁdhārayetsarvaṁ viṣṇupūjārataḥ sadā nārāyaṇaḥ smṛto dhyātaḥ kleśaduḥkhādināśanaḥ
विष्णु-पूजा में सदा रत रहने वाला मनुष्य सम्पूर्ण जगत् को धारण करता है; स्मरण और ध्यान किए गए नारायण क्लेश और दुःख आदि का नाश करते हैं।
श्लोक 6 (skanda.6.239.6)
चातुर्मास्ये विशेषेण जलरूपगतो हरिः । जलादन्नानि जायंते जगतां तृप्तिहेतवे
cāturmāsye viśeṣeṇa jalarūpagato hariḥ jalādannāni jāyaṁte jagatāṁ tṛptihetave
विशेषतः चातुर्मास्य में हरि जलरूप में स्थित रहते हैं; जल से ही अन्न उत्पन्न होते हैं, जो जगत् की तृप्ति के हेतु हैं।
श्लोक 7 (skanda.6.239.7)
विष्णुदेहांशसंभूतं तदन्नं ब्रह्म इष्यते । तदन्नं विष्णवे दत्त्वा ह्यावाहनपुरःसरम्
viṣṇudehāṁśasaṁbhūtaṁ tadannaṁ brahma iṣyate tadannaṁ viṣṇave dattvā hyāvāhanapuraḥsaram
विष्णु के देहांश से उत्पन्न वह अन्न ब्रह्म ही माना जाता है; उस अन्न को पहले आवाहन करके विष्णु को अर्पित करके —
श्लोक 8 (skanda.6.239.8)
पुनर्जन्मजराक्लेशसंस्कारैर्नाभिभूयते । आकाशसंभवो वेद एक एव पुराऽभवत्
punarjanmajarākleśasaṁskārairnābhibhūyate ākāśasaṁbhavo veda eka eva purā'bhavat
— तत्पश्चात् मनुष्य पुनर्जन्म, जरा और क्लेश के संस्कारों से पराभूत नहीं होता। पूर्वकाल में आकाश से उत्पन्न वेद एक ही था।
श्लोक 9 (skanda.6.239.9)
ततो यजुःसामसंज्ञामृग्वेदः प्राप भूतये । ऋग्वेदोऽभिहितः पूर्वं यजुःसहस्रशीर्षेति च
tato yajuḥsāmasaṁjñāmṛgvedaḥ prāpa bhūtaye ṛgvedo'bhihitaḥ pūrvaṁ yajuḥsahasraśīrṣeti ca
उससे प्राणियों के कल्याण के लिए यजुः, साम और ऋग्वेद की संज्ञाएँ प्राप्त हुईं; पहले ऋग्वेद कहा गया, तथा यजुः को सहस्रशीर्ष भी कहा जाता है।
श्लोक 10 (skanda.6.239.10)
षोडशर्चं महासूक्तं नारायणमयं परम् । तस्यापि पाठमात्रेण ब्रह्महत्या निवर्तते
ṣoḍaśarcaṁ mahāsūktaṁ nārāyaṇamayaṁ param tasyāpi pāṭhamātreṇa brahmahatyā nivartate
सोलह ऋचाओं वाला वह महासूक्त सर्वथा नारायणमय है; उसका पाठ मात्र करने से भी ब्रह्महत्या का पाप निवृत्त हो जाता है।
श्लोक 11 (skanda.6.239.11)
विप्रः पूर्वं न्यसेद्देहे स्मृत्युक्तेन निजे बुधः । ततस्तु प्रतिमायां च शालग्रामे विशेषतः
vipraḥ pūrvaṁ nyaseddehe smṛtyuktena nije budhaḥ tatastu pratimāyāṁ ca śālagrāme viśeṣataḥ
बुद्धिमान् विप्र को पहले स्मृति-कथित विधि से अपने ही शरीर में न्यास करना चाहिए, और तत्पश्चात् प्रतिमा में तथा विशेषतः शालग्राम में।
श्लोक 12 (skanda.6.239.12)
क्रमेण च ततः कुर्यात्पश्चादावाहनादिकम् । आवाह्य सकलं रूपं वैकुण्ठस्थानसंस्थितम्
krameṇa ca tataḥ kuryātpaścādāvāhanādikam āvāhya sakalaṁ rūpaṁ vaikuṇṭhasthānasaṁsthitam
फिर क्रमपूर्वक आवाहन आदि करना चाहिए, वैकुण्ठ-धाम में स्थित उस सम्पूर्ण रूप का आवाहन करके —
श्लोक 13 (skanda.6.239.13)
कौस्तुभेन विराजंतं सूर्यकोटिसमप्रभम् । दंडहस्तं शिखासूत्रसहितं पीतवाससम्
kaustubhena virājaṁtaṁ sūryakoṭisamaprabham daṁḍahastaṁ śikhāsūtrasahitaṁ pītavāsasam
— जो कौस्तुभमणि से सुशोभित हैं, करोड़ों सूर्यों के समान प्रभा वाले हैं, हाथ में दण्ड लिए हुए हैं, शिखा-सूत्र सहित हैं, पीत वस्त्र धारण किए हैं,
श्लोक 14 (skanda.6.239.14)
महासंन्यासिनं ध्यायेच्चातुर्मास्ये विशेषतः । एवं रूपमयं विष्णुं सर्वपापौघहारिणम्
mahāsaṁnyāsinaṁ dhyāyeccāturmāsye viśeṣataḥ evaṁ rūpamayaṁ viṣṇuṁ sarvapāpaughahāriṇam
— उस महासंन्यासी रूप का विशेषतः चातुर्मास्य में ध्यान करना चाहिए, इस प्रकार विष्णु का, जो समस्त पापों के प्रवाह को हरने वाले हैं।
श्लोक 15 (skanda.6.239.15)
आवाहयेच्च पुरतो ध्यानसंस्थं द्विजोत्तम । ऋचा प्रथमया चास्योंकारादिसमुदीर्णया
āvāhayecca purato dhyānasaṁsthaṁ dvijottama ṛcā prathamayā cāsyoṁkārādisamudīrṇayā
हे द्विजोत्तम, ध्यान में स्थित उन्हें अपने समक्ष आवाहन करना चाहिए, ओंकार आदि से युक्त प्रथम ऋचा के द्वारा,
श्लोक 16 (skanda.6.239.16)
द्वितीयया चासनं च पार्षदैश्च समन्वितम् । सौवर्णान्यासनान्येषां मनसा परिचिन्तयेत्
dvitīyayā cāsanaṁ ca pārṣadaiśca samanvitam sauvarṇānyāsanānyeṣāṁ manasā paricintayet
तथा दूसरी ऋचा से आसन अर्पित करना चाहिए, पार्षदों सहित; उनके लिए मन से स्वर्णिम आसनों का चिंतन करना चाहिए।
श्लोक 17 (skanda.6.239.17)
चिन्तनैर्भक्तियोगेन परिपूर्णं च तद्भवेत् । पाद्यं तृतीयया कार्यं गंगां तत्र स्मरेद्बुधः
cintanairbhaktiyogena paripūrṇaṁ ca tadbhavet pādyaṁ tṛtīyayā kāryaṁ gaṁgāṁ tatra smaredbudhaḥ
भक्तियोग से युक्त इन चिंतनों से वह अर्पण परिपूर्ण हो जाता है। तीसरी ऋचा से पाद्य अर्पित करना चाहिए; बुद्धिमान् को उसमें गंगा का स्मरण करना चाहिए।
श्लोक 18 (skanda.6.239.18)
अर्घ्यः कार्यस्ततो विष्णोः सरिद्भिः सप्तसागरैः । पुनराचमनं कार्यममृतेन जगत्पतेः
arghyaḥ kāryastato viṣṇoḥ saridbhiḥ saptasāgaraiḥ punarācamanaṁ kāryamamṛtena jagatpateḥ
तत्पश्चात् नदियों और सप्तसागरों का स्मरण करते हुए विष्णु को अर्घ्य अर्पित करना चाहिए; पुनः जगत्पति को अमृत के समान आचमन अर्पित करना चाहिए।
श्लोक 19 (skanda.6.239.19)
त्रिभिराचमनैः शुद्धिर्ब्राह्मणस्य निगद्यते । अद्भिस्तु प्रकृतिस्थाभिर्हीनाभिः फेनबुद्बुदैः
tribhirācamanaiḥ śuddhirbrāhmaṇasya nigadyate adbhistu prakṛtisthābhirhīnābhiḥ phenabudbudaiḥ
तीन आचमनों से ब्राह्मण की शुद्धि कही गई है; किंतु जल अपनी स्वाभाविक अवस्था में, फेन और बुद्बुदों से रहित होना चाहिए।
श्लोक 20 (skanda.6.239.20)
हृत्कण्ठतालुगाभिश्च यथावर्णं द्विजातयः । शुध्येरन्स्त्री च शूद्रश्च सकृत्स्पृष्टाभिरंततः
hṛtkaṇṭhatālugābhiśca yathāvarṇaṁ dvijātayaḥ śudhyeranstrī ca śūdraśca sakṛtspṛṣṭābhiraṁtataḥ
— अपने-अपने वर्ण के अनुसार हृदय, कण्ठ अथवा तालु तक पहुँचने वाले जल से द्विजाति शुद्ध होते हैं; स्त्री और शूद्र अंततः एक ही बार स्पर्श किए गए जल से शुद्ध हो जाते हैं।
श्लोक 21 (skanda.6.239.21)
पञ्चम्याऽऽचमनं कार्यं भक्तियुक्तेन चेतसा । भक्तिग्राह्यो हृषीकेशो भक्त्याऽऽत्मानं प्रयच्छति
pañcamyā''camanaṁ kāryaṁ bhaktiyuktena cetasā bhaktigrāhyo hṛṣīkeśo bhaktyā''tmānaṁ prayacchati
पाँचवीं ऋचा से भक्तियुक्त चित्त से आचमन अर्पित करना चाहिए; भक्ति से ही ग्राह्य हृषीकेश भक्ति से ही अपना आत्मस्वरूप प्रदान करते हैं।
श्लोक 22 (skanda.6.239.22)
ततः सुवासितैस्तोयैः सर्वोषधिसमन्वितैः । शेषोदकैः स्वर्णघटैः स्नानं देवस्य कारयेत्
tataḥ suvāsitaistoyaiḥ sarvoṣadhisamanvitaiḥ śeṣodakaiḥ svarṇaghaṭaiḥ snānaṁ devasya kārayet
तत्पश्चात् सुगन्धित जलों से, जो समस्त औषधियों से युक्त हों, तथा शेष जलों को स्वर्णकलशों में लेकर देव का स्नान कराना चाहिए।
श्लोक 23 (skanda.6.239.23)
तीर्थोदकैः श्रद्धया च मनसा समुपाहृतैः । अश्रद्धया रत्नराशिः प्रदत्तो निष्फलो भवेत्
tīrthodakaiḥ śraddhayā ca manasā samupāhṛtaiḥ aśraddhayā ratnarāśiḥ pradatto niṣphalo bhavet
श्रद्धा और मन से समर्पित तीर्थों के जल से (स्नान कराना चाहिए); क्योंकि अश्रद्धा से दिया गया रत्नों का ढेर भी निष्फल हो जाता है।
श्लोक 24 (skanda.6.239.24)
वार्यपि श्रद्धया दत्तमनंतत्वाय कल्पते । चातुर्मास्ये विशेषेण श्रद्धया पूयते नरः
vāryapi śraddhayā dattamanaṁtatvāya kalpate cāturmāsye viśeṣeṇa śraddhayā pūyate naraḥ
मात्र जल भी यदि श्रद्धा से दिया जाए तो वह अनन्त फल के लिए समर्थ हो जाता है। विशेषतः चातुर्मास्य में श्रद्धा से ही मनुष्य पवित्र होता है।
श्लोक 25 (skanda.6.239.25)
षष्ठ्या स्नानं ततः कार्यं पुनराचमनं भवेत् । दद्याच्च वाससी स्वर्णसहिते भक्तिशक्तितः
ṣaṣṭhyā snānaṁ tataḥ kāryaṁ punarācamanaṁ bhavet dadyācca vāsasī svarṇasahite bhaktiśaktitaḥ
छठी ऋचा से स्नान कराना चाहिए, फिर पुनः आचमन कराना चाहिए; तथा अपनी भक्ति और शक्ति के अनुसार स्वर्ण सहित दो वस्त्र अर्पित करने चाहिए।
श्लोक 26 (skanda.6.239.26)
आच्छादितं जगत्सर्वं वस्त्रेणाच्छादितो हरिः । चातुर्मास्ये विशेषेण वस्त्रदानं महाफलम्
ācchāditaṁ jagatsarvaṁ vastreṇācchādito hariḥ cāturmāsye viśeṣeṇa vastradānaṁ mahāphalam
हरि को वस्त्र से आच्छादित करने पर मानो सम्पूर्ण जगत् ही आच्छादित हो जाता है; विशेषतः चातुर्मास्य में वस्त्रदान महाफलदायक है।
श्लोक 27 (skanda.6.239.27)
पुनराचमनं देयं यतये विष्णुरूपिणे । वस्त्रदानं च सप्तम्या कार्यं विष्णोर्मुनीश्वर
punarācamanaṁ deyaṁ yataye viṣṇurūpiṇe vastradānaṁ ca saptamyā kāryaṁ viṣṇormunīśvara
साक्षात् विष्णुस्वरूप उस यति को पुनः आचमन देना चाहिए; और हे मुनीश्वर, सातवीं ऋचा से विष्णु को वस्त्रदान करना चाहिए।
श्लोक 28 (skanda.6.239.28)
यज्ञोपवीतमष्टम्या तच्चाध्यात्मतया शृणु । सूर्यकोटिसमस्पर्शं तेजसा भास्वरं तथा
yajñopavītamaṣṭamyā taccādhyātmatayā śṛṇu sūryakoṭisamasparśaṁ tejasā bhāsvaraṁ tathā
आठवीं ऋचा से यज्ञोपवीत अर्पित करना चाहिए; उसका आध्यात्मिक रहस्य सुनो — वह करोड़ों सूर्यों के स्पर्श के समान तेज से देदीप्यमान है,
श्लोक 29 (skanda.6.239.29)
क्रोधाभिभूते विप्रे तु तडित्कोटिसभप्रभम् । सूर्येन्दुवह्निसंयोगाद्गुणत्रयसमन्वितम्
krodhābhibhūte vipre tu taḍitkoṭisabhaprabham sūryenduvahnisaṁyogādguṇatrayasamanvitam
तथा जब विप्र क्रोध से अभिभूत होता है, तब वह करोड़ों बिजलियों के समूह के समान प्रकाशित होता है; सूर्य, चन्द्र और अग्नि के संयोग से यह त्रिगुणों से युक्त है,
श्लोक 30 (skanda.6.239.30)
त्रयीमयं ब्रह्मविष्णुरुद्ररूपं त्रिविष्टपम् । यस्य प्रभावाद्विप्रेंद्र मानवो द्विज उच्यते
trayīmayaṁ brahmaviṣṇurudrarūpaṁ triviṣṭapam yasya prabhāvādvipreṁdra mānavo dvija ucyate
त्रयीमय है, ब्रह्मा-विष्णु-रुद्र के रूप वाला है, त्रिलोकव्यापी है — हे विप्रेन्द्र, जिसके प्रभाव से मनुष्य 'द्विज' कहलाता है।
श्लोक 31 (skanda.6.239.31)
जन्मना जायते शूद्रः संस्काराद्द्विज उच्यते । शापानुग्रहसामर्थ्यं तथा क्रोधः प्रसन्नता
janmanā jāyate śūdraḥ saṁskārāddvija ucyate śāpānugrahasāmarthyaṁ tathā krodhaḥ prasannatā
जन्म से मनुष्य शूद्र ही उत्पन्न होता है, संस्कार से ही वह द्विज कहलाता है। शाप और अनुग्रह की सामर्थ्य, तथा क्रोध और प्रसन्नता,
श्लोक 32 (skanda.6.239.32)
त्रैलोक्यप्रवरत्वं च ब्राह्मणादेव जायते । न ब्राह्मणसमो बन्धुर्न ब्राह्मणसमा गतिः
trailokyapravaratvaṁ ca brāhmaṇādeva jāyate na brāhmaṇasamo bandhurna brāhmaṇasamā gatiḥ
तथा त्रैलोक्य में श्रेष्ठता — ये सब ब्राह्मण से ही उत्पन्न होते हैं। ब्राह्मण के समान कोई बंधु नहीं है, ब्राह्मण के समान कोई गति नहीं है।
श्लोक 33 (skanda.6.239.33)
न ब्राह्मणसमः कश्चित्त्रैलोक्ये सचराचरे । दत्तोपवीते ब्रह्मण्ये सुप्ते देवे जनार्दने
na brāhmaṇasamaḥ kaścittrailokye sacarācare dattopavīte brahmaṇye supte deve janārdane
चराचर सहित त्रैलोक्य में ब्राह्मण के समान कोई नहीं है। जनार्दन के शयनकाल में जब ब्रह्मण्य देव को यज्ञोपवीत अर्पित किया जाता है,
श्लोक 34 (skanda.6.239.34)
सर्वजगद्ब्रह्ममयं संजातं नात्र संशयः । नवम्या च सुलेपश्च कर्तव्यो यज्ञमूर्तये
sarvajagadbrahmamayaṁ saṁjātaṁ nātra saṁśayaḥ navamyā ca sulepaśca kartavyo yajñamūrtaye
तब सम्पूर्ण जगत् ब्रह्ममय हो जाता है, इसमें संशय नहीं है। नवीं ऋचा से यज्ञ-स्वरूप देव को उत्तम लेप अर्पित करना चाहिए।
श्लोक 35 (skanda.6.239.35)
सुयक्षकर्दमैर्लिप्तो विष्णुर्येन जगद्गुरुः । तेनाप्यायितमेतद्धि वासितं यशसा जगत्
suyakṣakardamairlipto viṣṇuryena jagadguruḥ tenāpyāyitametaddhi vāsitaṁ yaśasā jagat
जगद्गुरु विष्णु जिस उत्तम सुगन्धित कर्दम से लिप्त किए जाते हैं, उसी से यह सम्पूर्ण जगत् पुष्ट होकर यश से सुवासित हो जाता है।
श्लोक 36 (skanda.6.239.36)
तेजसा भास्करो लोके देवत्वं प्राप्य मानवः । ब्रह्मलोकादिके लोके मोदते चंदनप्रदः
tejasā bhāskaro loke devatvaṁ prāpya mānavaḥ brahmalokādike loke modate caṁdanapradaḥ
चन्दन अर्पित करने वाला मनुष्य तेज से सूर्य के समान इस लोक में देवत्व प्राप्त करके ब्रह्मलोक आदि लोकों में आनंदित होता है।
श्लोक 37 (skanda.6.239.37)
चंदनालेपसुभगं विष्णुं पश्यंति मानवाः । न ते यमपुरं यांति चातुर्मास्ये विशेषतः
caṁdanālepasubhagaṁ viṣṇuṁ paśyaṁti mānavāḥ na te yamapuraṁ yāṁti cāturmāsye viśeṣataḥ
जो मनुष्य चन्दन के लेप से सुशोभित विष्णु का दर्शन करते हैं, वे यमपुरी को नहीं जाते, विशेषतः यदि यह चातुर्मास्य में हो।
श्लोक 38 (skanda.6.239.38)
दशम्या पुष्पपूजा च भक्तिपूजा तथैव च । पुष्पे चैव सदा लक्ष्मीर्वसत्येव निरंतरम्
daśamyā puṣpapūjā ca bhaktipūjā tathaiva ca puṣpe caiva sadā lakṣmīrvasatyeva niraṁtaram
दसवीं ऋचा से पुष्प-पूजा की जाती है, जो भक्ति-पूजा भी है; पुष्प में ही सदा लक्ष्मी निरंतर निवास करती हैं।
श्लोक 39 (skanda.6.239.39)
लक्ष्म्याः सर्वत्र गामिन्या दोषो नैव प्रजायते । यथा सर्वमयो विष्णुर्न दोषैरनुभूयते
lakṣmyāḥ sarvatra gāminyā doṣo naiva prajāyate yathā sarvamayo viṣṇurna doṣairanubhūyate
सर्वत्र संचरण करने वाली लक्ष्मी को कोई दोष स्पर्श नहीं करता; जैसे सर्वस्वरूप विष्णु दोषों से कभी अनुभूत नहीं होते —
श्लोक 40 (skanda.6.239.40)
तथा सर्वमयी लक्ष्मीः सतीत्वान्नैव हीयते । प्रतिमासु च सर्वासु सर्वभूतेषु नित्यदा
tathā sarvamayī lakṣmīḥ satītvānnaiva hīyate pratimāsu ca sarvāsu sarvabhūteṣu nityadā
— उसी प्रकार सर्वस्वरूपा लक्ष्मी भी अपने सतीत्व के कारण कभी हीन नहीं होतीं। समस्त प्रतिमाओं में तथा समस्त प्राणियों में सदा —
श्लोक 41 (skanda.6.239.41)
मनुष्यदेवपितृषु पुष्पपूजा विधीयते । पुष्पैः संपूजितो येन हरिरेकः श्रिया सह
manuṣyadevapitṛṣu puṣpapūjā vidhīyate puṣpaiḥ saṁpūjito yena harirekaḥ śriyā saha
— मनुष्यों, देवों और पितरों में पुष्प-पूजा विहित है। जिस किसी के द्वारा भी लक्ष्मी सहित हरि की पुष्पों से पूजा की जाती है,
श्लोक 42 (skanda.6.239.42)
आब्रह्मस्तंबपर्यंतं पूजितं तेन वै जगत् । अतः सुश्वेतकुसुमैर्विष्णुं संपूजयेत्सदा
ābrahmastaṁbaparyaṁtaṁ pūjitaṁ tena vai jagat ataḥ suśvetakusumairviṣṇuṁ saṁpūjayetsadā
उसके द्वारा ब्रह्मा से लेकर तृण-पर्यंत सम्पूर्ण जगत् की ही पूजा हो जाती है। अतः उत्तम श्वेत पुष्पों से विष्णु की सदा पूजा करनी चाहिए।
श्लोक 43 (skanda.6.239.43)
चातुर्मास्ये विशेषेण भक्तियुक्तः सदा शुचिः । भक्त्या सुविहिता ब्रह्मन्पुष्पपूजा नरैर्यदि
cāturmāsye viśeṣeṇa bhaktiyuktaḥ sadā śuciḥ bhaktyā suvihitā brahmanpuṣpapūjā narairyadi
विशेषतः चातुर्मास्य में सदा भक्तियुक्त और पवित्र रहना चाहिए। हे ब्रह्मन्, यदि मनुष्यों द्वारा भक्तिपूर्वक पुष्पपूजा भलीभाँति सम्पन्न की जाए,
श्लोक 44 (skanda.6.239.44)
यंयं काममभिध्यायेत्तस्य सिद्धिर्निरंतरा । पुष्पैरुपचितं विष्णुं यद्यन्ये प्रणमंति च
yaṁyaṁ kāmamabhidhyāyettasya siddhirniraṁtarā puṣpairupacitaṁ viṣṇuṁ yadyanye praṇamaṁti ca
तो जिस-जिस कामना का चिंतन किया जाए, उसकी निरंतर सिद्धि होती है। और पुष्पों से सुसज्जित विष्णु को यदि अन्य लोग भी प्रणाम करें,
श्लोक 45 (skanda.6.239.45)
तेषामप्यक्षया लोकाश्चातुर्मास्येऽधिकं फलम् । एकादश्या धूपदानं कर्तव्यं यतये हरौ
teṣāmapyakṣayā lokāścāturmāsye'dhikaṁ phalam ekādaśyā dhūpadānaṁ kartavyaṁ yataye harau
तो उन्हें भी अक्षय लोक प्राप्त होते हैं, चातुर्मास्य में यह फल और भी अधिक होता है। ग्यारहवीं ऋचा से यति-स्वरूप हरि को धूप अर्पित करना चाहिए।
श्लोक 46 (skanda.6.239.46)
वनस्पतिरसो दिव्यो गंधाढ्यो गन्ध उत्तमः । आघ्रेयः सर्वदेवानां धूपोऽयं प्रतिगृह्यताम्
vanaspatiraso divyo gaṁdhāḍhyo gandha uttamaḥ āghreyaḥ sarvadevānāṁ dhūpo'yaṁ pratigṛhyatām
(मन्त्र का भाव) — यह दिव्य वनस्पति-रस, गन्ध से समृद्ध, उत्तम सुगन्ध, समस्त देवों द्वारा सूँघने योग्य — यह धूप स्वीकार किया जाए।
श्लोक 47 (skanda.6.239.47)
इमं मंत्रं समुच्चार्य धूपमागुरुजं शुभम् । दद्याद्भगवते नित्यं चातुर्मास्ये महाफलम्
imaṁ maṁtraṁ samuccārya dhūpamāgurujaṁ śubham dadyādbhagavate nityaṁ cāturmāsye mahāphalam
इस मन्त्र का उच्चारण करके अगरु से बना शुभ धूप भगवान् को नित्य अर्पित करना चाहिए; चातुर्मास्य में यह महाफलदायक है।
श्लोक 48 (skanda.6.239.48)
कर्पूरचन्दनदलैः सितामधुसमन्वितम् । मांसीजटाभिः सहितं सुप्ते देवेऽथ सत्तम
karpūracandanadalaiḥ sitāmadhusamanvitam māṁsījaṭābhiḥ sahitaṁ supte deve'tha sattama
हे सत्तम, देव के शयनकाल में कर्पूर, चन्दन-दल, शक्कर, मधु तथा जटामांसी से युक्त धूप अर्पित करना चाहिए,
श्लोक 49 (skanda.6.239.49)
देवा घ्राणेन तुष्यंति धूपं घ्राणहरं शुभम् । द्वादश्या दीपदानं तु कर्तव्यं मुक्तिमिच्छुभिः
devā ghrāṇena tuṣyaṁti dhūpaṁ ghrāṇaharaṁ śubham dvādaśyā dīpadānaṁ tu kartavyaṁ muktimicchubhiḥ
— इस घ्राणहर शुभ धूप से देवता घ्राणेन्द्रिय द्वारा तृप्त होते हैं। बारहवीं ऋचा से मुक्ति के इच्छुक पुरुषों को दीपदान करना चाहिए।
श्लोक 50 (skanda.6.239.50)
दीपः सर्वेषु कार्येषु प्रथमस्तेजसां पतिः । दीपस्तमौघनाशाय दीपः कांतिं प्रयच्छति
dīpaḥ sarveṣu kāryeṣu prathamastejasāṁ patiḥ dīpastamaughanāśāya dīpaḥ kāṁtiṁ prayacchati
दीप समस्त कार्यों में प्रथम है, तेजों का स्वामी है; दीप अंधकार के समूह का नाश करता है, दीप कांति प्रदान करता है।
श्लोक 51 (skanda.6.239.51)
तस्माद्दीपप्रदानेन प्रीयतां मे जनार्दनः । अयं पौराणजो मंत्रो वेदर्चेन समन्वितः । दीपप्रदाने सकलः प्रयुक्तो नाशयेदघम्
tasmāddīpapradānena prīyatāṁ me janārdanaḥ ayaṁ paurāṇajo maṁtro vedarcena samanvitaḥ dīpapradāne sakalaḥ prayukto nāśayedagham
(मन्त्र का भाव) — अतः इस दीपदान से मेरे जनार्दन प्रसन्न हों। यह पौराणिक मन्त्र वेदर्चा से युक्त है; दीपदान के समय पूर्णतः प्रयुक्त किया गया यह पाप का नाश करता है।
श्लोक 52 (skanda.6.239.52)
चातुर्मास्ये दीपदानं कुरुते यो हरेः पुरः । तस्य पापमयो राशिर्निमेषादपि दह्यते
cāturmāsye dīpadānaṁ kurute yo hareḥ puraḥ tasya pāpamayo rāśirnimeṣādapi dahyate
जो चातुर्मास्य में हरि के समक्ष दीपदान करता है, उसकी पापमय राशि पलक झपकते ही जल जाती है।
श्लोक 53 (skanda.6.239.53)
तावत्पापानि गर्जंति तावद्बिभेति पातकी । यावन्न विहितो भास्वान्दीपो नारायणालये
tāvatpāpāni garjaṁti tāvadbibheti pātakī yāvanna vihito bhāsvāndīpo nārāyaṇālaye
जब तक नारायण के मंदिर में प्रकाशमान दीप स्थापित नहीं किया जाता, तभी तक पाप गरजते रहते हैं, तभी तक पापी भयभीत रहता है।
श्लोक 54 (skanda.6.239.54)
दर्शनादपि दीपस्य सर्वसिद्धिर्नृणां भवेत्
darśanādapi dīpasya sarvasiddhirnṛṇāṁ bhavet
उस दीप के दर्शनमात्र से भी मनुष्यों को सर्वसिद्धि प्राप्त होती है।
श्लोक 55 (skanda.6.239.55)
कामनां यां समुद्दिश्य दीपं कारयते हरौ । सासा सिद्ध्यति निर्विघ्ना सुप्तेऽनंते गुणोत्तरम्
kāmanāṁ yāṁ samuddiśya dīpaṁ kārayate harau sāsā siddhyati nirvighnā supte'naṁte guṇottaram
जिस कामना को लक्ष्य करके हरि के समक्ष दीप जलाया जाता है, गुणों में सर्वोत्तम अनंत के शयनकाल में वह कामना निर्विघ्न सिद्ध हो जाती है।
श्लोक 56 (skanda.6.239.56)
पंचायतनसंस्थेषु तथा देवेषु पंचसु । विहितं दीपदानं च चातुर्मास्ये महाफलम्
paṁcāyatanasaṁstheṣu tathā deveṣu paṁcasu vihitaṁ dīpadānaṁ ca cāturmāsye mahāphalam
इसी प्रकार पंचायतन में स्थापित पाँचों देवों के लिए विहित दीपदान भी चातुर्मास्य में महाफलदायक है।
श्लोक 57 (skanda.6.239.57)
एको विष्णुस्तुष्यते मुक्तिदाता नित्यं ध्यातः पूजितः संस्तुतश्च । यच्चाभीष्टं यच्च गेहे शुभं वा तत्तद्देयं मुक्तिहेतोर्नृवर्यैः
eko viṣṇustuṣyate muktidātā nityaṁ dhyātaḥ pūjitaḥ saṁstutaśca yaccābhīṣṭaṁ yacca gehe śubhaṁ vā tattaddeyaṁ muktihetornṛvaryaiḥ
मुक्ति देने वाले एक विष्णु ही निरंतर ध्यान, पूजन और स्तवन से प्रसन्न होते हैं; जो कुछ भी अभीष्ट हो अथवा घर में जो कुछ शुभ हो, वह सब श्रेष्ठ पुरुषों द्वारा मुक्ति के हेतु अर्पित कर देना चाहिए।