नागर खण्ड · अध्याय 240
दीपदान से लेकर सायुज्य-चिंतन तक भक्ति का निरूपण
श्लोक 1 (skanda.6.240.1)
ब्रह्मा उवाच । हरेर्दीपस्तु मद्दीपादधिकोऽयं प्रकुर्वतः । वैकुण्ठवास एव स्यान्ममैश्वर्यमवांछितम्
brahmā uvāca harerdīpastu maddīpādadhiko'yaṁ prakurvataḥ vaikuṇṭhavāsa eva syānmamaiśvaryamavāṁchitam
ब्रह्मा जी ने कहा — इसे करने वाले के लिए हरि का यह दीप मेरे दीप से भी बढ़कर है; उसे वैकुण्ठ-वास ही प्राप्त होगा, वह मेरे ऐश्वर्य की भी इच्छा नहीं करेगा।
श्लोक 2 (skanda.6.240.2)
नारद उवाच । दीपोऽयं विष्णुभवने मन्त्रवद्विहितो नरैः । सदा विशेषफलदश्चातुर्मास्येऽधिकः कथम्
nārada uvāca dīpo'yaṁ viṣṇubhavane mantravadvihito naraiḥ sadā viśeṣaphaladaścāturmāsye'dhikaḥ katham
नारद जी ने कहा — विष्णु के मंदिर में मनुष्यों द्वारा मन्त्रपूर्वक विहित यह दीप सदा विशेष फल देने वाला है; चातुर्मास्य में यह और भी अधिक फलदायक कैसे हो जाता है?
श्लोक 3 (skanda.6.240.3)
ब्रह्मा उवाच । विष्णुर्नित्याधिदैवं मे विष्णुः पूज्यः सदा मम । विष्णुमेनं सदा ध्याये विष्णुर्मत्तः परो हि सः
brahmā uvāca viṣṇurnityādhidaivaṁ me viṣṇuḥ pūjyaḥ sadā mama viṣṇumenaṁ sadā dhyāye viṣṇurmattaḥ paro hi saḥ
ब्रह्मा जी ने कहा — विष्णु ही मेरे नित्य अधिष्ठाता देव हैं, विष्णु ही सदा मेरे लिए पूज्य हैं। मैं सदा इन्हीं विष्णु का ध्यान करता हूँ; वे निश्चय ही मुझसे भी श्रेष्ठ हैं।
श्लोक 4 (skanda.6.240.4)
स विष्णुवल्लभो दीपः सर्वदा पापहारकः । चातुर्मास्ये विशेषेण कामनासिद्धिकारकः
sa viṣṇuvallabho dīpaḥ sarvadā pāpahārakaḥ cāturmāsye viśeṣeṇa kāmanāsiddhikārakaḥ
विष्णु को प्रिय वह दीप सदा ही पाप हरने वाला है; विशेषतः चातुर्मास्य में वह कामनाओं की सिद्धि करने वाला है।
श्लोक 5 (skanda.6.240.5)
विष्णुर्दीपेन संतुष्टो यथा भवति पुत्रक । तथा यज्ञसहस्रैश्च वरं नैव प्रयच्छति
viṣṇurdīpena saṁtuṣṭo yathā bhavati putraka tathā yajñasahasraiśca varaṁ naiva prayacchati
हे पुत्रक, विष्णु दीप से जितने संतुष्ट होते हैं, उतना संतुष्ट होकर वे सहस्रों यज्ञों से भी वर प्रदान नहीं करते।
श्लोक 6 (skanda.6.240.6)
स्वल्पव्ययेन दीपस्य फलमानंतकं नृणाम् । अनंतशयने प्राप्ते पुण्यसंख्या न विद्यते
svalpavyayena dīpasya phalamānaṁtakaṁ nṛṇām anaṁtaśayane prāpte puṇyasaṁkhyā na vidyate
अत्यल्प व्यय से ही दीप का फल मनुष्यों के लिए अनन्त हो जाता है; अनंत भगवान् के शयनकाल में उसके पुण्य की गणना ही संभव नहीं है।
श्लोक 7 (skanda.6.240.7)
तस्मात्सर्वात्मभावेन श्रद्धया संयुतेन च । दीपप्रदानं कुरुते हरेः पापैर्न लिप्यते
tasmātsarvātmabhāvena śraddhayā saṁyutena ca dīpapradānaṁ kurute hareḥ pāpairna lipyate
अतः जो पूर्ण आत्मभाव से और श्रद्धा से युक्त होकर हरि को दीपदान करता है, वह पापों से लिप्त नहीं होता।
श्लोक 8 (skanda.6.240.8)
उपचारैः षोडशकैर्यतिरूपे हरौ पुनः । दीपप्रदाने विहिते सर्वमुद्द्योतितं जगत्
upacāraiḥ ṣoḍaśakairyatirūpe harau punaḥ dīpapradāne vihite sarvamuddyotitaṁ jagat
सोलह उपचारों में यति-रूप हरि को पुनः दीप अर्पित किए जाने पर, सम्पूर्ण जगत् ही प्रकाशित हो जाता है।
श्लोक 9 (skanda.6.240.9)
दीपादनंतरं ब्रह्मन्नन्नस्य च निवेदनम् । त्रयोदश्या भक्तियुक्तैः कार्यं मोक्षपदस्थितैः
dīpādanaṁtaraṁ brahmannannasya ca nivedanam trayodaśyā bhaktiyuktaiḥ kāryaṁ mokṣapadasthitaiḥ
हे ब्रह्मन्, दीप के अनन्तर अन्न का निवेदन किया जाता है; तेरहवीं ऋचा से मोक्ष-पद में स्थित भक्तियुक्त पुरुषों द्वारा यह किया जाना चाहिए।
श्लोक 10 (skanda.6.240.10)
अमृतं संपरित्यज्य यदन्नं देवता अपि । स्पृहयंति गृहस्थस्य गृहद्वारगताः सदा
amṛtaṁ saṁparityajya yadannaṁ devatā api spṛhayaṁti gṛhasthasya gṛhadvāragatāḥ sadā
अमृत को भी छोड़कर जिस अन्न की देवता भी अभिलाषा करते हैं, वे सदा गृहस्थ के घर के द्वार तक स्वयं आ जाते हैं।
श्लोक 11 (skanda.6.240.11)
हरौ सुप्ते विशेषेण प्रदेयः प्रत्यहं नरैः । फलैरर्घ्यो विष्णुतुष्ट्यै तत्कालसमुदाहृतैः
harau supte viśeṣeṇa pradeyaḥ pratyahaṁ naraiḥ phalairarghyo viṣṇutuṣṭyai tatkālasamudāhṛtaiḥ
हरि के शयनकाल में विशेषतः मनुष्यों द्वारा प्रतिदिन विष्णु की प्रसन्नता के लिए, उस समय उपलब्ध फलों से अर्घ्य अर्पित करना चाहिए।
श्लोक 12 (skanda.6.240.12)
तांबूलवल्लीपत्रैश्च तथा पूगफलैः शुभैः । द्राक्षाजंब्वाम्रजफलैरक्रोडैर्दाडिमैरपि
tāṁbūlavallīpatraiśca tathā pūgaphalaiḥ śubhaiḥ drākṣājaṁbvāmrajaphalairakroḍairdāḍimairapi
पान के पत्तों से, तथा शुभ सुपारी के फलों से, अंगूर, जामुन और आम के फलों से, अखरोट और अनार से भी,
श्लोक 13 (skanda.6.240.13)
बीजपूरफलैश्चैव दद्यादर्घ्यं सुभक्तितः । शंखतोयं समादाय तस्योपरि फलं शुभम्
bījapūraphalaiścaiva dadyādarghyaṁ subhaktitaḥ śaṁkhatoyaṁ samādāya tasyopari phalaṁ śubham
तथा बिजौरे के फलों से भी, सुभक्तिपूर्वक अर्घ्य देना चाहिए; शंख का जल लेकर उसके ऊपर एक शुभ फल रखकर —
श्लोक 14 (skanda.6.240.14)
मंत्रेणानेन विप्रेन्द्र केशवाय निवेदयेत् । पुनराचमनं देयमन्नदानादनंतरम्
maṁtreṇānena viprendra keśavāya nivedayet punarācamanaṁ deyamannadānādanaṁtaram
हे विप्रेन्द्र, इस मन्त्र के साथ केशव को निवेदित करना चाहिए। अन्नदान के अनन्तर पुनः आचमन देना चाहिए।
श्लोक 15 (skanda.6.240.15)
आर्तिक्यं च ततः कुर्यात्सर्वपापविनाशनम् । चतुर्दश्या नमस्कुर्याद्विष्णवे यतिरूपिणे
ārtikyaṁ ca tataḥ kuryātsarvapāpavināśanam caturdaśyā namaskuryādviṣṇave yatirūpiṇe
तत्पश्चात् सर्वपापविनाशक आरती करनी चाहिए; चौदहवीं ऋचा से यति-रूप विष्णु को नमस्कार करना चाहिए।
श्लोक 16 (skanda.6.240.16)
पंचदश्या भ्रमः कार्यः सर्वदिक्षु द्विजैः सह । सप्तसागरजैस्तोयैर्दत्तैर्यत्फलमाप्यते
paṁcadaśyā bhramaḥ kāryaḥ sarvadikṣu dvijaiḥ saha saptasāgarajaistoyairdattairyatphalamāpyate
पन्द्रहवीं ऋचा से ब्राह्मणों के साथ समस्त दिशाओं में परिक्रमा करनी चाहिए; सप्तसागरों से उत्पन्न जलों को अर्पित करने से जो फल प्राप्त होता है,
श्लोक 17 (skanda.6.240.17)
तत्तोयदानाच्च हरेः प्राप्यते विष्णुवल्लभैः । चतुर्वारभ्रमीभिश्च जगत्सर्वं चराचरम्
tattoyadānācca hareḥ prāpyate viṣṇuvallabhaiḥ caturvārabhramībhiśca jagatsarvaṁ carācaram
— वही फल विष्णु के प्रियजनों को हरि को वह जल अर्पित करने से प्राप्त होता है; तथा चार बार परिक्रमा करने से सम्पूर्ण चराचर जगत् —
श्लोक 18 (skanda.6.240.18)
क्रांतं भवति विप्राग्र्य तत्तीर्थगमनादिकम् । षोडश्या देवसायुज्यं चिन्तयेद्योगवित्तमः
krāṁtaṁ bhavati viprāgrya tattīrthagamanādikam ṣoḍaśyā devasāyujyaṁ cintayedyogavittamaḥ
— हे श्रेष्ठ विप्र, मानो पार कर लिया जाता है, उन सब तीर्थों में जाने आदि सहित। सोलहवीं ऋचा से योगियों में श्रेष्ठ पुरुष को देव के साथ सायुज्य का चिंतन करना चाहिए।
श्लोक 19 (skanda.6.240.19)
आत्मनश्च हरेर्नित्यं न मूर्तिं भावयेत्तदा । मूर्तामूर्तस्वरूपत्वाद्दृश्यो भवति योगवित्
ātmanaśca harernityaṁ na mūrtiṁ bhāvayettadā mūrtāmūrtasvarūpatvāddṛśyo bhavati yogavit
तब उसे अपने आत्मा और हरि की मूर्ति का पृथक् भाव नहीं करना चाहिए; क्योंकि उनका स्वरूप मूर्त और अमूर्त दोनों है, इसलिए योगवेत्ता उसी रूप में दृश्य हो जाता है।
श्लोक 20 (skanda.6.240.20)
तस्मिन्दृष्टे निवर्तेत सदसद्रूपजा क्रिया । आत्मानं तेजसां मध्ये चिन्तयेत्सूर्यवर्चसम्
tasmindṛṣṭe nivarteta sadasadrūpajā kriyā ātmānaṁ tejasāṁ madhye cintayetsūryavarcasam
उस दर्शन के होने पर सत् और असत् रूपों से उत्पन्न होने वाली क्रिया निवृत्त हो जाती है। उसे तेजों के मध्य अपने आत्मा का सूर्य के समान वर्चस्वी होना चिंतन करना चाहिए।
श्लोक 21 (skanda.6.240.21)
अहमेव सदा विष्णुरित्यात्मनि विचारयन् । लभते वैष्णवं देहं जीवन्मुक्तो द्विजो भवेत्
ahameva sadā viṣṇurityātmani vicārayan labhate vaiṣṇavaṁ dehaṁ jīvanmukto dvijo bhavet
'मैं ही सदा विष्णु हूँ' — इस प्रकार अपने भीतर विचार करते हुए वह द्विज वैष्णव देह को प्राप्त करता है और जीवन्मुक्त हो जाता है।
श्लोक 22 (skanda.6.240.22)
चातुर्मास्ये विशेषेण योगयुक्तो द्विजो भवेत् । इयं भक्तिः समादिष्टा मोक्षमार्गप्रदे हरौ
cāturmāsye viśeṣeṇa yogayukto dvijo bhavet iyaṁ bhaktiḥ samādiṣṭā mokṣamārgaprade harau
विशेषतः चातुर्मास्य में वह द्विज योगयुक्त हो जाता है। मोक्ष-मार्ग प्रदान करने वाले हरि के विषय में यह भक्ति (विधि) बताई गई है।