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नागर खण्ड · अध्याय 241

सच्छूद्र के धर्म का वर्णन

अध्याय 240अध्याय-सूचीअध्याय 242

श्लोक 1 (skanda.6.241.1)

ईश्वर उवाच । एतत्ते पूजनं विष्णोः षोडशोपायसंभवम् । कथितं यद्द्विजः कृत्वा प्राप्नोति परमं पदम्

īśvara uvāca etatte pūjanaṁ viṣṇoḥ ṣoḍaśopāyasaṁbhavam kathitaṁ yaddvijaḥ kṛtvā prāpnoti paramaṁ padam

ईश्वर ने कहा — विष्णु का यह षोडशोपचार-पूजन तुम्हें बताया गया, जिसे करके द्विज परम पद प्राप्त करता है।

श्लोक 2 (skanda.6.241.2)

तथा च क्षत्रियविशां करणान्मुक्तिरुत्तमा । शूद्राणां नाधिकारोऽस्मिन्स्त्रीणां नैव कदाचन

tathā ca kṣatriyaviśāṁ karaṇānmuktiruttamā śūdrāṇāṁ nādhikāro'sminstrīṇāṁ naiva kadācana

इसी प्रकार क्षत्रिय और वैश्य भी इसे करके उत्तम मुक्ति प्राप्त करते हैं। किंतु इसमें शूद्रों का अधिकार नहीं है, और स्त्रियों का भी कभी नहीं।

श्लोक 3 (skanda.6.241.3)

कार्तिकेय उवाच । शूद्राणां च तथा स्त्रीणां धर्मं विस्तरतो वद । केन मुक्तिर्भवेत्तेषां कृष्णस्याराधनं विना

kārtikeya uvāca śūdrāṇāṁ ca tathā strīṇāṁ dharmaṁ vistarato vada kena muktirbhavetteṣāṁ kṛṣṇasyārādhanaṁ vinā

कार्तिकेय ने कहा — तब शूद्रों तथा स्त्रियों के धर्म को विस्तार से बताइए। कृष्ण की आराधना के बिना, किस उपाय से उनकी मुक्ति हो सकती है?

श्लोक 4 (skanda.6.241.4)

ईश्वर उवाच । सच्छूद्रैरपि नो कार्या वेदाक्षरविचारणा । न श्रोतव्या न पठ्या च पठन्नरकभाग्भवेत्

īśvara uvāca sacchūdrairapi no kāryā vedākṣaravicāraṇā na śrotavyā na paṭhyā ca paṭhannarakabhāgbhavet

ईश्वर ने कहा — सच्छूद्रों को भी वेद के अक्षरों का विचार नहीं करना चाहिए; वह न सुनने योग्य है, न पढ़ने योग्य; उसे पढ़ने वाला नरक का भागी होता है।

श्लोक 5 (skanda.6.241.5)

पुराणानां नैव पाठः श्रवणं कारयेत्सदा । स्मृत्युक्तं सुगुरोर्ग्राह्यं न पाठः श्रवणादिकम्

purāṇānāṁ naiva pāṭhaḥ śravaṇaṁ kārayetsadā smṛtyuktaṁ sugurorgrāhyaṁ na pāṭhaḥ śravaṇādikam

पुराणों का पाठ भी स्वयं नहीं करना चाहिए, अपितु सदा दूसरों से उनका श्रवण करना चाहिए। स्मृति में कहा गया ज्ञान सद्गुरु से ही ग्रहण करना चाहिए, स्वयं पाठ या श्रवण आदि नहीं करना चाहिए।

श्लोक 6 (skanda.6.241.6)

स्कंद उवाच । सच्छूद्राः के समाख्यातास्तांश्च विस्तरतो वद । के संतः के च शूद्राश्च सच्छूद्रा नामतश्च के

skaṁda uvāca sacchūdrāḥ ke samākhyātāstāṁśca vistarato vada ke saṁtaḥ ke ca śūdrāśca sacchūdrā nāmataśca ke

स्कंद ने कहा — सच्छूद्र किसे कहा जाता है? उन्हें विस्तार से बताइए। कौन संत हैं, कौन शूद्र हैं, और नाम से सच्छूद्र कौन हैं?

श्लोक 7 (skanda.6.241.7)

ईश्वर उवाच । धर्मोढा यस्य पत्नी स्यात्स सच्छूद्र उदाहृतः । समानकुलरूपा च दशदोषविवर्जिता

īśvara uvāca dharmoḍhā yasya patnī syātsa sacchūdra udāhṛtaḥ samānakularūpā ca daśadoṣavivarjitā

ईश्वर ने कहा — जिसकी पत्नी धर्मपूर्वक विवाहित हो, वह सच्छूद्र कहलाता है — वह पत्नी समान कुल और रूप वाली हो, तथा दस दोषों से रहित हो,

श्लोक 8 (skanda.6.241.8)

उद्वोढा वेदविधिना स सच्छूद्रः प्रकीर्तितः । अक्लीवाऽव्यंगिनी शस्ता महारोगाद्यदूषिता

udvoḍhā vedavidhinā sa sacchūdraḥ prakīrtitaḥ aklīvā'vyaṁginī śastā mahārogādyadūṣitā

वेद-विधि से जिसका विवाह किया गया हो, वही सच्छूद्र कहा गया है — वह पत्नी अक्षत, अंगहीनता से रहित, प्रशस्त, तथा बड़े रोगों आदि से अदूषित हो,

श्लोक 9 (skanda.6.241.9)

अनिंदिता शुभकला चक्षुरोगविवर्जिता । बाधिर्यहीना चपला कन्या मधुरभाषिणी

aniṁditā śubhakalā cakṣurogavivarjitā bādhiryahīnā capalā kanyā madhurabhāṣiṇī

निंदा से रहित, शुभ कला वाली, नेत्ररोग से रहित, बहरेपन से रहित, चंचलता-रहित, मधुरभाषिणी कन्या हो,

श्लोक 10 (skanda.6.241.10)

दूषणैर्दशभिर्हीना वेदोक्तविधिना नरैः । विवाहिता च सा पत्नी गृहिणी यस्य सर्वदा

dūṣaṇairdaśabhirhīnā vedoktavidhinā naraiḥ vivāhitā ca sā patnī gṛhiṇī yasya sarvadā

दस दोषों से रहित हो, तथा जिसका पुरुषों द्वारा वेदोक्त विधि से विवाह किया गया हो — ऐसी पत्नी जिसकी सदा गृहिणी हो,

श्लोक 11 (skanda.6.241.11)

सच्छूद्रः स तु विज्ञेयो देवादीनां विभागकृत् । पुण्यकार्येषु सर्वेषु प्रथमं सा प्रकीर्तिता

sacchūdraḥ sa tu vijñeyo devādīnāṁ vibhāgakṛt puṇyakāryeṣu sarveṣu prathamaṁ sā prakīrtitā

वह पुरुष ही सच्छूद्र जानने योग्य है, जो देवों आदि को उनका भाग देने वाला हो; समस्त पुण्यकार्यों में उस पत्नी का प्रथम स्थान कहा गया है।

श्लोक 12 (skanda.6.241.12)

तया सुविहितो धर्मः संपूर्णफलदायकः । चातुर्मास्ये विशेषेण तया सह गुणाधिकः

tayā suvihito dharmaḥ saṁpūrṇaphaladāyakaḥ cāturmāsye viśeṣeṇa tayā saha guṇādhikaḥ

उसके साथ भलीभाँति किया गया धर्म संपूर्ण फल देने वाला होता है; विशेषतः चातुर्मास्य में उसके साथ किया गया धर्म गुणों में और अधिक हो जाता है।

श्लोक 13 (skanda.6.241.13)

भार्यारतिः शुचिर्भृत्यादीनां पोषणतत्परः । श्राद्धादिकारको नित्यमिष्टापूर्त्तप्रसाधकः

bhāryāratiḥ śucirbhṛtyādīnāṁ poṣaṇatatparaḥ śrāddhādikārako nityamiṣṭāpūrttaprasādhakaḥ

जो पत्नी में अनुरक्त रहता है, पवित्र है, सेवकों आदि के पोषण में तत्पर है, नित्य श्राद्ध आदि करने वाला है, तथा इष्ट-पूर्त कार्यों को सिद्ध करने वाला है —

श्लोक 14 (skanda.6.241.14)

नमस्कारान्तमन्त्रेण नामसंकीर्तनेन च । देवास्तस्य च तुष्यन्ति पंचयज्ञादिकैः शुभैः

namaskārāntamantreṇa nāmasaṁkīrtanena ca devāstasya ca tuṣyanti paṁcayajñādikaiḥ śubhaiḥ

— नमस्कार में समाप्त होने वाले मन्त्र से, नाम-संकीर्तन से, तथा शुभ पंच-यज्ञ आदि से उसके देवता प्रसन्न होते हैं।

श्लोक 15 (skanda.6.241.15)

स्नानं च तर्पणं चैव वह्निहोमोऽप्यमंत्रकः । ब्रह्मयज्ञोऽतिथेः पूजा पंचयज्ञान्न संत्यजेत्

snānaṁ ca tarpaṇaṁ caiva vahnihomo'pyamaṁtrakaḥ brahmayajño'titheḥ pūjā paṁcayajñānna saṁtyajet

स्नान, तर्पण, मन्त्ररहित अग्निहोम, ब्रह्मयज्ञ, तथा अतिथि-पूजा — इन पंच-यज्ञों को कभी नहीं त्यागना चाहिए।

श्लोक 16 (skanda.6.241.16)

कार्यं स्त्रीभिश्च शूद्रैश्च ह्यमंत्रं पंचयज्ञकम् । पंचयज्ञैश्च संतुष्टा यथैषां पितृदेवताः

kāryaṁ strībhiśca śūdraiśca hyamaṁtraṁ paṁcayajñakam paṁcayajñaiśca saṁtuṣṭā yathaiṣāṁ pitṛdevatāḥ

स्त्रियों और शूद्रों को यह पंच-यज्ञ मन्त्ररहित रूप से करना चाहिए। इन पंच-यज्ञों से इनके पितर और देवता संतुष्ट होते हैं,

श्लोक 17 (skanda.6.241.17)

तथा पतिव्रतायाश्च पतिशुश्रूषया सदा । पतिव्रताया देहे तु सर्वे देवा वसंति हि

tathā pativratāyāśca patiśuśrūṣayā sadā pativratāyā dehe tu sarve devā vasaṁti hi

तथा पतिव्रता स्त्री की पति-सेवा से भी सदा संतुष्ट होते हैं; क्योंकि पतिव्रता स्त्री के शरीर में समस्त देवता निवास करते हैं।

श्लोक 18 (skanda.6.241.18)

अतस्ताभ्यां समेताभ्यां धर्मादीनां समागमः । यदोभयोर्मते पृष्टे संतुष्टाः पितृदेवताः

atastābhyāṁ sametābhyāṁ dharmādīnāṁ samāgamaḥ yadobhayormate pṛṣṭe saṁtuṣṭāḥ pitṛdevatāḥ

अतः जब वे दोनों मिलकर रहते हैं, तब धर्म आदि का समागम होता है; तथा जब दोनों की सहमति ली जाए, तब पितर और देवता संतुष्ट होते हैं।

श्लोक 19 (skanda.6.241.19)

कार्यादीनां च सर्वेषां संगमस्तत्र नित्यदा । चातुर्मास्ये समायाते विष्णुभक्त्या तयोः शिवम्

kāryādīnāṁ ca sarveṣāṁ saṁgamastatra nityadā cāturmāsye samāyāte viṣṇubhaktyā tayoḥ śivam

वहाँ सदा समस्त कार्यों आदि का संगम होता है; चातुर्मास्य के आने पर विष्णु-भक्ति से उन दोनों का कल्याण होता है।

श्लोक 20 (skanda.6.241.20)

समानजातिसंभूता पत्नी यस्य धृता भवेत् । पूर्वो भर्त्ताऽर्द्धभागी स्याद्द्वितीयस्य न किंचन

samānajātisaṁbhūtā patnī yasya dhṛtā bhavet pūrvo bharttā'rddhabhāgī syāddvitīyasya na kiṁcana

जिस पुरुष ने समान जाति में उत्पन्न पत्नी को ग्रहण किया हो, यदि वह किसी अन्य को पुनः विवाही जाए, तो पहला पति आधे भाग का अधिकारी होता है, दूसरे का उसमें कोई भाग नहीं है।

श्लोक 21 (skanda.6.241.21)

अर्थकार्याधिकारोऽस्यास्तेन धर्मार्धधारिणी । स्वंस्वं कृतं सदैव स्यात्तयोः कर्म शुभाशुभम्

arthakāryādhikāro'syāstena dharmārdhadhāriṇī svaṁsvaṁ kṛtaṁ sadaiva syāttayoḥ karma śubhāśubham

धन तथा कार्यों में उसका अधिकार होता है, इसीलिए वह धर्म के आधे भाग को धारण करने वाली है। उन दोनों का किया हुआ शुभ या अशुभ कर्म सदा अपना-अपना ही रहता है।

श्लोक 22 (skanda.6.241.22)

याऽनुगच्छति भर्तारं मृतं सुतपसा द्विज । साध्वी सा हि परिज्ञेया तया चोद्ध्रियते कुलम्

yā'nugacchati bhartāraṁ mṛtaṁ sutapasā dvija sādhvī sā hi parijñeyā tayā coddhriyate kulam

हे द्विज, जो पत्नी अपने मृत पति का महान तप से अनुगमन करती है, वही साध्वी जानने योग्य है; उसके द्वारा सम्पूर्ण कुल का उद्धार होता है।

श्लोक 23 (skanda.6.241.23)

अन्यजातेर्मृतस्याथ धृता वापि विवाहिता । वैश्वानरस्य मार्गेण सा तमुद्धरते पतिम्

anyajātermṛtasyātha dhṛtā vāpi vivāhitā vaiśvānarasya mārgeṇa sā tamuddharate patim

तथा अन्य जाति के मृत पति द्वारा ग्रहण की गई अथवा विवाहित पत्नी भी, अग्नि के मार्ग से, उस पति का उद्धार कर देती है।

श्लोक 24 (skanda.6.241.24)

यथा जलाच्च जंबालः कृष्यते धार्मिकैर्नृभिः । एवमुद्धरते साध्वी भर्त्तारं याऽनुगच्छति

yathā jalācca jaṁbālaḥ kṛṣyate dhārmikairnṛbhiḥ evamuddharate sādhvī bharttāraṁ yā'nugacchati

जैसे धार्मिक पुरुषों द्वारा जल से कीचड़ निकाल दी जाती है, वैसे ही अपने पति का अनुगमन करने वाली साध्वी स्त्री उसका उद्धार कर देती है।

श्लोक 25 (skanda.6.241.25)

अन्यजातिसमुद्भूता अन्येन विधृता यदि । तावुभौ धर्मकार्येषु संत्याज्यौ नित्यदा मतौ

anyajātisamudbhūtā anyena vidhṛtā yadi tāvubhau dharmakāryeṣu saṁtyājyau nityadā matau

यदि अन्य जाति में उत्पन्न स्त्री किसी अन्य पुरुष द्वारा ग्रहण की गई हो, तो वे दोनों धर्मकार्यों में सदा त्याज्य ही माने गए हैं।

श्लोक 26 (skanda.6.241.26)

स्वंस्वं कर्म प्रकुरुतः सत्कर्मजं स्वकं फलम् । तस्माद्वरिष्ठा हीना वा सत्कुल्या शूद्रसंभवैः

svaṁsvaṁ karma prakurutaḥ satkarmajaṁ svakaṁ phalam tasmādvariṣṭhā hīnā vā satkulyā śūdrasaṁbhavaiḥ

वे दोनों अपना-अपना कर्म ही करते हैं, तथा सत्कर्म से उत्पन्न फल भी अपना ही होता है। अतः शूद्रकुल में उत्पन्न पुरुषों को श्रेष्ठ अथवा साधारण, किंतु सत्कुल की ही पत्नी ग्रहण करनी चाहिए,

श्लोक 27 (skanda.6.241.27)

धृता न कार्या सा पत्नी यत्करोति न वर्द्धते । तया सह कृतं पुण्यं वर्द्धते दशधोत्तरम्

dhṛtā na kāryā sā patnī yatkaroti na varddhate tayā saha kṛtaṁ puṇyaṁ varddhate daśadhottaram

वह पत्नी ग्रहण नहीं करनी चाहिए जिसके साथ किया गया धर्म वृद्धि को प्राप्त न हो; जिसके साथ किया गया पुण्य दस गुना से भी अधिक वृद्धि को प्राप्त होता है, वही ग्राह्य है।

श्लोक 28 (skanda.6.241.28)

अनन्ततृप्तिदं नैव तत्सुतैरपि वा तथा । क्रयक्रीता च या कन्या दासी सा परिकीर्तिता

anantatṛptidaṁ naiva tatsutairapi vā tathā krayakrītā ca yā kanyā dāsī sā parikīrtitā

अन्यथा वह न तो अनंत तृप्ति देने वाला होता है, न उससे उत्पन्न पुत्रों के द्वारा। तथा जो कन्या मूल्य देकर खरीदी गई हो, वह दासी कही गई है,

श्लोक 29 (skanda.6.241.29)

सच्छूद्रस्याधिकारे सा कदाचिन्नैव जायते । या कन्या स्वयमुद्यम्य पित्रा दत्ता वराय च

sacchūdrasyādhikāre sā kadācinnaiva jāyate yā kanyā svayamudyamya pitrā dattā varāya ca

वह सच्छूद्र के अधिकार में कभी नहीं आती। किंतु जो कन्या स्वयं प्रयत्न करके पिता द्वारा वर के लिए दी जाती है,

श्लोक 30 (skanda.6.241.30)

विवाहविधिनोदूढा पितृदेवार्थसाधिनी । सुलक्षणा विनीता सा विवेकादिगुणा शुभा

vivāhavidhinodūḍhā pitṛdevārthasādhinī sulakṣaṇā vinītā sā vivekādiguṇā śubhā

तथा विवाह-विधि से विवाहित होकर पितरों और देवों के प्रयोजन सिद्ध करने वाली हो, सुलक्षणा, विनीत, विवेक आदि गुणों से युक्त, शुभ हो,

श्लोक 31 (skanda.6.241.31)

सच्चरित्रा पतिपरा सा तेभ्यो दातुमर्हति । विशुद्धकुलजा कन्या धर्मोढा धर्मचारिणी

saccaritrā patiparā sā tebhyo dātumarhati viśuddhakulajā kanyā dharmoḍhā dharmacāriṇī

सच्चरित्र और पति-परायण हो — वही उन्हें (श्राद्धादि) देने योग्य है। विशुद्ध कुल में उत्पन्न, धर्मपूर्वक विवाहित, धर्माचरण करने वाली कन्या —

श्लोक 32 (skanda.6.241.32)

सा पुनाति कुलं सर्वं मातृतः पितृतस्तथा । एष एव मया प्रोक्तः सच्छूद्राणां परो विधिः

sā punāti kulaṁ sarvaṁ mātṛtaḥ pitṛtastathā eṣa eva mayā proktaḥ sacchūdrāṇāṁ paro vidhiḥ

वह माता और पिता दोनों ओर से समस्त कुल को पवित्र कर देती है। यही सच्छूद्रों के लिए मेरे द्वारा कहा गया सर्वोच्च विधान है।

श्लोक 33 (skanda.6.241.33)

अधोजातिसमुद्भूता सच्छूद्रात्क्रमहीनजा । विवाहो दशधा तेषां दशधा पुत्रता भवेत्

adhojātisamudbhūtā sacchūdrātkramahīnajā vivāho daśadhā teṣāṁ daśadhā putratā bhavet

सच्छूद्र से निम्न क्रम में उत्पन्न, नीची जाति में जन्मे लोगों के विवाह दस प्रकार के होते हैं, और उसी प्रकार पुत्रता भी दस प्रकार की होती है।

श्लोक 34 (skanda.6.241.34)

चत्वार उत्तमाः प्रोक्ता विवाहा मुनिसत्तम । शेषाः सर्वप्रकृतिषु कथिताश्च पुराविदैः

catvāra uttamāḥ proktā vivāhā munisattama śeṣāḥ sarvaprakṛtiṣu kathitāśca purāvidaiḥ

हे मुनिसत्तम, इनमें से चार विवाह उत्तम कहे गए हैं; शेष विवाह समस्त (निम्न) जातियों में होने वाले पुराणविदों द्वारा कहे गए हैं।

श्लोक 35 (skanda.6.241.35)

प्राजापत्यस्तथा ब्राह्मो दैवार्षौ चातिशोभना । गांधर्वश्चासुरश्चैव राक्षसश्च पिशाचकः

prājāpatyastathā brāhmo daivārṣau cātiśobhanā gāṁdharvaścāsuraścaiva rākṣasaśca piśācakaḥ

प्राजापत्य, ब्राह्म, तथा अत्यंत शोभन दैव और आर्ष — (ये चार उत्तम हैं); गांधर्व, आसुर, राक्षस तथा पैशाच —

श्लोक 36 (skanda.6.241.36)

प्रातिभो घातनश्चेति विवाहाः कथिता दश । एते हि हीनजातीनां विवाहाः परिकीर्तिताः

prātibho ghātanaśceti vivāhāḥ kathitā daśa ete hi hīnajātīnāṁ vivāhāḥ parikīrtitāḥ

तथा प्रातिभ और घातन — इस प्रकार दस विवाह कहे गए हैं। ये सब नीच जातियों के विवाह कहे गए हैं।

श्लोक 37 (skanda.6.241.37)

औरसः क्षेत्रजश्चैव दत्तः कृत्रिम एव च । गूढोत्पन्नोऽपविद्धश्च कानीनश्च सहोढजः

aurasaḥ kṣetrajaścaiva dattaḥ kṛtrima eva ca gūḍhotpanno'paviddhaśca kānīnaśca sahoḍhajaḥ

औरस, क्षेत्रज, दत्तक, तथा कृत्रिम, गूढ़ोत्पन्न, अपविद्ध, कानीन, सहोढज —

श्लोक 38 (skanda.6.241.38)

क्रीतः पौनर्भवश्चापि पुत्रा दशविधाः स्मृताः । औरसादपि हीनाश्च तेऽपि तेषां शुभावहाः

krītaḥ paunarbhavaścāpi putrā daśavidhāḥ smṛtāḥ aurasādapi hīnāśca te'pi teṣāṁ śubhāvahāḥ

क्रीत तथा पौनर्भव — इस प्रकार पुत्र दस प्रकार के कहे गए हैं। औरस पुत्र से हीन होते हुए भी वे सभी अपने पिताओं के लिए शुभ ही लाने वाले हैं।

श्लोक 39 (skanda.6.241.39)

अष्टादशमिता नीचाः प्रकृतानां यथातथा । विधिनैव क्रिया नैव स्मृतिमार्गोऽपि नैव च

aṣṭādaśamitā nīcāḥ prakṛtānāṁ yathātathā vidhinaiva kriyā naiva smṛtimārgo'pi naiva ca

नीच जातियाँ अठारह प्रकार की गिनी गई हैं, जो वे यथावत् हैं; उनके लिए न तो विधिपूर्वक कोई क्रिया है, न स्मृति का कोई मार्ग ही है।

श्लोक 40 (skanda.6.241.40)

तासां ब्राह्मणशुश्रूषा विष्णुध्यानं शिवार्चनम् । अमन्त्रात्पुण्यकरणं दानं देयं च वै सदा

tāsāṁ brāhmaṇaśuśrūṣā viṣṇudhyānaṁ śivārcanam amantrātpuṇyakaraṇaṁ dānaṁ deyaṁ ca vai sadā

उनके लिए ब्राह्मणों की सेवा, विष्णु का ध्यान, शिव की अर्चना, मन्त्ररहित पुण्यकर्म, तथा दान — ये सदा करने योग्य हैं।

श्लोक 41 (skanda.6.241.41)

न दानस्य क्षयो लोके श्रद्धया यत्प्रदीयते । अश्रद्धयाऽशुचितया दानं वैरस्यकारणम्

na dānasya kṣayo loke śraddhayā yatpradīyate aśraddhayā'śucitayā dānaṁ vairasyakāraṇam

इस लोक में श्रद्धापूर्वक दिया गया दान कभी क्षीण नहीं होता; किंतु अश्रद्धा और अशुद्धि से दिया गया दान वैर का कारण बन जाता है।

श्लोक 42 (skanda.6.241.42)

अहिंसादि समादिष्टो धर्मस्तासां महाफलः । चातुर्मास्ये विशेषेण त्रिदिवेशादिसेवया

ahiṁsādi samādiṣṭo dharmastāsāṁ mahāphalaḥ cāturmāsye viśeṣeṇa tridiveśādisevayā

अहिंसा आदि से युक्त उनके लिए बताया गया धर्म महाफलदायक है; विशेषतः चातुर्मास्य में स्वर्गाधिपतियों आदि की सेवा से,

श्लोक 43 (skanda.6.241.43)

सुदर्शनैस्तथा धर्मः सेव्यते ह्यविरोधिभिः । सच्छूद्रैर्दानपुण्यैश्च द्विजशुश्रूषणादिभिः

sudarśanaistathā dharmaḥ sevyate hyavirodhibhiḥ sacchūdrairdānapuṇyaiśca dvijaśuśrūṣaṇādibhiḥ

— उचित दृष्टि रखने वाले, अपने स्वभाव के अविरोधी सच्छूद्रों द्वारा, दान-पुण्यों तथा द्विजों की सेवा आदि के द्वारा धर्म का सेवन किया जाता है।

श्लोक 44 (skanda.6.241.44)

वृत्तिश्च सत्यानृतजा वाणिज्यव्यवहारजा । अशीतिभागमारभ्याद्व्याजाद्वार्धुषिकः शते

vṛttiśca satyānṛtajā vāṇijyavyavahārajā aśītibhāgamārabhyādvyājādvārdhuṣikaḥ śate

उनकी वृत्ति सत्य-असत्य के व्यवहार से तथा वाणिज्य-व्यवहार से उत्पन्न होती है; ब्याज से जीविका चलाने वाला सूदखोर अस्सी भाग तक (सौ में) ले सकता है।

श्लोक 45 (skanda.6.241.45)

सपादभागवृद्धिस्तु क्षत्त्रियादिषु गृह्यते । एवं न बन्धो भवति पातकस्य कदाचन

sapādabhāgavṛddhistu kṣattriyādiṣu gṛhyate evaṁ na bandho bhavati pātakasya kadācana

किंतु क्षत्रिय आदि से सवा भाग की ही वृद्धि ली जाती है। इस प्रकार आचरण करने से पाप का बंधन कभी नहीं होता।

श्लोक 46 (skanda.6.241.46)

प्रातःकर्म सुरेशानां मध्याह्ने द्विजसेवनम् । अपराह्णेऽथ कार्याणि कुर्वन्मर्त्यः सुखी भवेत्

prātaḥkarma sureśānāṁ madhyāhne dvijasevanam aparāhṇe'tha kāryāṇi kurvanmartyaḥ sukhī bhavet

प्रातःकाल देवों का पूजन, मध्याह्न में द्विजों की सेवा, तथा अपराह्न में (अपने) कार्य करते हुए मनुष्य सुखी होता है।

श्लोक 47 (skanda.6.241.47)

गृहस्थैश्च सदा भाव्यं यावज्जीवं क्रियापरैः । पंचयज्ञरतैश्चैवातिथिद्विजसुपूजकैः

gṛhasthaiśca sadā bhāvyaṁ yāvajjīvaṁ kriyāparaiḥ paṁcayajñarataiścaivātithidvijasupūjakaiḥ

गृहस्थों को जीवनपर्यंत सदा अपने कर्तव्यों में तत्पर रहना चाहिए, पंच-यज्ञों में रत रहना चाहिए, तथा अतिथि और द्विजों का भलीभाँति पूजन करना चाहिए,

श्लोक 48 (skanda.6.241.48)

विष्णुभक्तिरतैश्चैव वेदमन्त्रविपाठकैः । सततं दानशीलैश्च दीनार्तजनवत्सलैः

viṣṇubhaktirataiścaiva vedamantravipāṭhakaiḥ satataṁ dānaśīlaiśca dīnārtajanavatsalaiḥ

विष्णु-भक्ति में रत रहना चाहिए, वेद-मन्त्रों का पाठ करना चाहिए, निरंतर दानशील रहना चाहिए, तथा दीन-दुःखी जनों के प्रति स्नेह रखना चाहिए,

श्लोक 49 (skanda.6.241.49)

क्षमादिगुणसंयुक्तैर्द्वादशाक्षरपूजकैः । षडक्षरमहोद्गारपरमानन्दपूरितैः

kṣamādiguṇasaṁyuktairdvādaśākṣarapūjakaiḥ ṣaḍakṣaramahodgāraparamānandapūritaiḥ

क्षमा आदि गुणों से युक्त रहना चाहिए, द्वादशाक्षर मन्त्र से पूजा करनी चाहिए, तथा षडक्षर मन्त्र के महान् उच्चारण से परमानन्द से परिपूर्ण रहना चाहिए,

श्लोक 50 (skanda.6.241.50)

सदपत्यैः सदाचारैः सतां शुश्रूषणैरपि । विमत्सरैः सदा स्थेयं तापक्लेशविवर्जितैः

sadapatyaiḥ sadācāraiḥ satāṁ śuśrūṣaṇairapi vimatsaraiḥ sadā stheyaṁ tāpakleśavivarjitaiḥ

सत्संतान वाले होकर, सदाचारी होकर, सत्पुरुषों की सेवा करते हुए भी, ईर्ष्यारहित होकर सदा स्थिर रहना चाहिए, ताप और क्लेश से रहित होकर,

श्लोक 51 (skanda.6.241.51)

प्रव्रज्यावर्जनैरेवं सच्छूद्रैर्धर्मतत्परैः । तोषणं सर्वभूतानां कार्यं वित्तानुसारतः

pravrajyāvarjanairevaṁ sacchūdrairdharmatatparaiḥ toṣaṇaṁ sarvabhūtānāṁ kāryaṁ vittānusārataḥ

तथा संन्यास (गृहत्याग) से बचते हुए — इस प्रकार धर्मपरायण सच्छूद्रों को अपनी सामर्थ्य के अनुसार समस्त प्राणियों को संतुष्ट करने का कार्य करना चाहिए।

श्लोक 52 (skanda.6.241.52)

सदा विष्णुशिवादीनां ये भक्तास्ते नराः सदा । देववद्दिवि दीव्यंति चातुर्मास्ये विशेषतः

sadā viṣṇuśivādīnāṁ ye bhaktāste narāḥ sadā devavaddivi dīvyaṁti cāturmāsye viśeṣataḥ

जो मनुष्य सदा विष्णु, शिव आदि के भक्त होते हैं, वे सदा देवताओं के समान स्वर्ग में सुशोभित होते हैं — विशेषतः चातुर्मास्य के व्रत से।

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