नागर खण्ड · अध्याय 242
अठारह प्रकृतियों का कथन
श्लोक 1 (skanda.6.242.1)
ऋषय ऊचुः । नारद उवाच । अष्टादश प्रकृतयः का वदस्व पितामह । वृत्तिस्तासां च को धर्मः सर्वं विस्तरतो मम
ṛṣaya ūcuḥ nārada uvāca aṣṭādaśa prakṛtayaḥ kā vadasva pitāmaha vṛttistāsāṁ ca ko dharmaḥ sarvaṁ vistarato mama
ऋषियों ने कहा — नारद ने पूछा — हे पितामह, अठारह प्रकृतियाँ क्या हैं, यह बताइए। उनकी वृत्ति और उनका धर्म क्या है, यह सब मुझे विस्तार से कहिए।
श्लोक 2 (skanda.6.242.2)
ब्रह्मा उवाच । मज्जन्माभूद्भगवतो नाभिपंकजकोशतः । स्वकालपरिमाणेन प्रबुद्धस्य जगत्पतेः
brahmā uvāca majjanmābhūdbhagavato nābhipaṁkajakośataḥ svakālaparimāṇena prabuddhasya jagatpateḥ
ब्रह्मा जी ने कहा — मेरा जन्म भगवान् जगत्पति के नाभि-कमल की कोशिका से हुआ, जब वे अपने काल-परिमाण के अनुसार जागृत हुए।
श्लोक 3 (skanda.6.242.3)
ततो बहुतिथे काले केशवेन पुरा स्मृतः । स्रष्टुकामेन विविधाः प्रजा मनसि राजसीः
tato bahutithe kāle keśavena purā smṛtaḥ sraṣṭukāmena vividhāḥ prajā manasi rājasīḥ
तत्पश्चात् बहुत समय बीतने पर, विविध प्रजाओं की सृष्टि की इच्छा रखने वाले केशव ने, राजस भाव से मन में जिनका चिंतन किया था, उन्हें (मुझे) पूर्वकाल में स्मरण किया।
श्लोक 4 (skanda.6.242.4)
अहं कमलजस्तत्र जातः पुत्रश्चतुर्मुखः । उदरं नाभिनालेन प्रविश्याथ व्यलोकयम्
ahaṁ kamalajastatra jātaḥ putraścaturmukhaḥ udaraṁ nābhinālena praviśyātha vyalokayam
वहाँ मैं, कमल से उत्पन्न, चतुर्मुख पुत्र के रूप में जन्मा; तत्पश्चात् नाभि-नाल के मार्ग से उनके उदर में प्रवेश करके मैंने देखा।
श्लोक 5 (skanda.6.242.5)
तत्र ब्रह्मांडकोटीनां दर्शनं मेऽभवत्पुनः । विस्मयाच्चिंतयानस्य सृष्ट्यर्थमभिधावता
tatra brahmāṁḍakoṭīnāṁ darśanaṁ me'bhavatpunaḥ vismayācciṁtayānasya sṛṣṭyarthamabhidhāvatā
वहाँ मुझे पुनः करोड़ों ब्रह्माण्डों का दर्शन हुआ; विस्मित होकर मैं सृष्टि के प्रयोजन के लिए दौड़ता हुआ विचार करने लगा।
श्लोक 6 (skanda.6.242.6)
निर्गम्य पुनरेवाहं पद्मनालेन यावता । बहिरागां विस्मृतं तत्सर्वं सृष्ट्यर्थकारणम्
nirgamya punarevāhaṁ padmanālena yāvatā bahirāgāṁ vismṛtaṁ tatsarvaṁ sṛṣṭyarthakāraṇam
पद्म-नाल के मार्ग से पुनः निकलकर, जब तक मैं बाहर आया, तब तक सृष्टि के उस सम्पूर्ण प्रयोजन को मैं भूल चुका था।
श्लोक 7 (skanda.6.242.7)
पुनरेव ततो गत्वा प्रजाः सृष्ट्वा चतुर्विधाः । नाभिनालेन निर्गत्य विस्मृतेनांतरात्मना
punareva tato gatvā prajāḥ sṛṣṭvā caturvidhāḥ nābhinālena nirgatya vismṛtenāṁtarātmanā
पुनः वहाँ जाकर, चार प्रकार की प्रजाओं की सृष्टि करके, विस्मृत हुए अंतरात्मा सहित मैं नाभि-नाल के मार्ग से बाहर निकला।
श्लोक 8 (skanda.6.242.8)
तदाहं जडवज्जातो वागुवाचाशरीरिणी । तपस्तप महाबुद्धे जडत्वं नोचितं तव
tadāhaṁ jaḍavajjāto vāguvācāśarīriṇī tapastapa mahābuddhe jaḍatvaṁ nocitaṁ tava
तब मैं जड़ के समान हो गया; तब एक अशरीरी वाणी ने कहा — 'हे महाबुद्धे, तप करो, तप करो; यह जड़ता तुम्हारे लिए उचित नहीं है।'
श्लोक 9 (skanda.6.242.9)
दशवर्षसहस्राणि ततोऽहं तप आस्थितः । पुनराकाशजा वाणी मामुवाचाविनश्वरा
daśavarṣasahasrāṇi tato'haṁ tapa āsthitaḥ punarākāśajā vāṇī māmuvācāvinaśvarā
तत्पश्चात् मैंने दस सहस्र वर्षों तक तप किया; फिर आकाश से उत्पन्न एक अविनश्वर वाणी ने मुझसे कहा,
श्लोक 10 (skanda.6.242.10)
वेदरूपाश्रिता पूर्वमाविर्भूता तपोबलात् । ततो भगवताऽऽदिष्टः सृज त्वं बहुधा प्रजाः
vedarūpāśritā pūrvamāvirbhūtā tapobalāt tato bhagavatā''diṣṭaḥ sṛja tvaṁ bahudhā prajāḥ
— वह वाणी, जो पहले वेद-रूप में आश्रित थी, तप के बल से प्रकट हुई। तत्पश्चात् भगवान् द्वारा आदिष्ट होकर — 'तुम बहुविध प्रजाओं की सृष्टि करो' —
श्लोक 11 (skanda.6.242.11)
राजसं गुणमाश्रित्य भूतसर्गमकल्मषम् । मनसा मानसी सृष्टिः प्रथमं चिंतिता मया
rājasaṁ guṇamāśritya bhūtasargamakalmaṣam manasā mānasī sṛṣṭiḥ prathamaṁ ciṁtitā mayā
— रजोगुण का आश्रय लेकर, मैंने मन से पहले निर्मल भूत-सृष्टि का, अर्थात् मानसी सृष्टि का चिंतन किया।
श्लोक 12 (skanda.6.242.12)
ततो वै ब्राह्मणा जाता मरीच्यादिमुनीश्वराः । तेषां कनीयांस्त्वं जातो ज्ञानवेदांतपारगः
tato vai brāhmaṇā jātā marīcyādimunīśvarāḥ teṣāṁ kanīyāṁstvaṁ jāto jñānavedāṁtapāragaḥ
तत्पश्चात् मरीचि आदि मुनीश्वर ब्राह्मण उत्पन्न हुए। हे नारद, उनमें तुम कनिष्ठ पुत्र के रूप में उत्पन्न हुए, जो ज्ञान और वेदान्त के पारगामी हो।
श्लोक 13 (skanda.6.242.13)
कर्मनिष्ठाश्च ते नित्यं सृष्ट्यर्थं सततोद्यताः । निर्व्यापारो विष्णुभक्त एकांतब्रह्मसेवकः
karmaniṣṭhāśca te nityaṁ sṛṣṭyarthaṁ satatodyatāḥ nirvyāpāro viṣṇubhakta ekāṁtabrahmasevakaḥ
वे सदा कर्मनिष्ठ हैं, सृष्टि के प्रयोजन के लिए निरंतर उद्यत रहते हैं; किंतु तुम व्यापाररहित, विष्णु के भक्त, तथा एकान्त रूप से ब्रह्म के सेवक हो।
श्लोक 14 (skanda.6.242.14)
निर्ममो निरहंकारो मम त्वं मानसः सुतः । क्रमान्मया तु तेषां वै वेदरक्षार्थमेव च
nirmamo nirahaṁkāro mama tvaṁ mānasaḥ sutaḥ kramānmayā tu teṣāṁ vai vedarakṣārthameva ca
तुम ममता और अहंकार से रहित, मेरे मानस पुत्र हो। और उनके ही वेद-रक्षार्थ, मेरे द्वारा क्रमपूर्वक —
श्लोक 15 (skanda.6.242.15)
प्रथमा मानसी सृष्टिर्द्विजात्यादिर्विनिर्मिता । ततोहमांगिकीं सृष्टिं सृष्टवांस्तत्र नारद
prathamā mānasī sṛṣṭirdvijātyādirvinirmitā tatohamāṁgikīṁ sṛṣṭiṁ sṛṣṭavāṁstatra nārada
— पहली मानसी सृष्टि, द्विजाति आदि से युक्त, निर्मित की गई। हे नारद, तत्पश्चात् मैंने वहाँ आंगिकी (शरीर के अंगों से उत्पन्न) सृष्टि की।
श्लोक 16 (skanda.6.242.16)
मुखाच्च ब्राह्मणा जाता बाहुभ्यः क्षत्रिया मम । वैश्या ऊरुसमुद्भूताः पद्भ्यां शूद्रा बभूविरे
mukhācca brāhmaṇā jātā bāhubhyaḥ kṣatriyā mama vaiśyā ūrusamudbhūtāḥ padbhyāṁ śūdrā babhūvire
मेरे मुख से ब्राह्मण उत्पन्न हुए, भुजाओं से क्षत्रिय; ऊरुओं से वैश्य उत्पन्न हुए, तथा चरणों से शूद्र उत्पन्न हुए।
श्लोक 17 (skanda.6.242.17)
अनुलोमविलोमाभ्यां क्रमाच्च क्रमयोगतः । शूद्रादधोऽधो जाताश्च सर्वे पादतलोद्भवाः
anulomavilomābhyāṁ kramācca kramayogataḥ śūdrādadho'dho jātāśca sarve pādatalodbhavāḥ
अनुलोम और विलोम संबंधों से, तथा क्रमिक योग से, शूद्र से भी नीचे-नीचे उत्पन्न सभी जातियाँ मेरे चरण-तल से ही उत्पन्न हुई हैं।
श्लोक 18 (skanda.6.242.18)
ताः सर्वास्तु प्रकृतयो मम देहांशसंभवाः । नारद त्वं विजानीहि तासां नामानि वच्मि ते
tāḥ sarvāstu prakṛtayo mama dehāṁśasaṁbhavāḥ nārada tvaṁ vijānīhi tāsāṁ nāmāni vacmi te
वे सभी प्रकृतियाँ मेरे देह के अंशों से उत्पन्न हैं; हे नारद, तुम यह जान लो, अब मैं उनके नाम तुम्हें बताता हूँ।
श्लोक 19 (skanda.6.242.19)
ब्राह्मणः क्षत्रियो वैश्यस्त्रय एव द्विजातयः । वेदास्तपोऽध्ययनं च यजनं दानमेव च
brāhmaṇaḥ kṣatriyo vaiśyastraya eva dvijātayaḥ vedāstapo'dhyayanaṁ ca yajanaṁ dānameva ca
ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य — ये तीनों ही द्विजाति हैं। वेद, तप, अध्ययन, यजन तथा दान —
श्लोक 20 (skanda.6.242.20)
वृत्तिरध्यापनाच्चैव तथा स्वल्पप्रतिग्रहात् । विप्रः समर्थस्तपसा यद्यपि स्यात्प्रतिग्रहे
vṛttiradhyāpanāccaiva tathā svalpapratigrahāt vipraḥ samarthastapasā yadyapi syātpratigrahe
— तथा अध्यापन और स्वल्प प्रतिग्रह से आजीविका, यही (ब्राह्मण की वृत्ति है)। यद्यपि विप्र अपने तप के बल से बड़े प्रतिग्रह में भी समर्थ हो,
श्लोक 21 (skanda.6.242.21)
तथापि नैव गृह्णीयात्तपोरक्षा यतः सदा । वेदपाठो विष्णुपूजा ब्रह्मध्यानमलोभता
tathāpi naiva gṛhṇīyāttaporakṣā yataḥ sadā vedapāṭho viṣṇupūjā brahmadhyānamalobhatā
तथापि उसे ग्रहण नहीं करना चाहिए, क्योंकि तप की रक्षा सदा (सर्वोपरि) है। वेदपाठ, विष्णुपूजा, ब्रह्मध्यान, निर्लोभता,
श्लोक 22 (skanda.6.242.22)
अक्रोधता निर्मलत्वं क्षमासारत्वमार्यता । क्रियातत्परता दानक्रिया सत्यादिभिर्गुणैः
akrodhatā nirmalatvaṁ kṣamāsāratvamāryatā kriyātatparatā dānakriyā satyādibhirguṇaiḥ
अक्रोध, निर्मलता, क्षमा में दृढ़ता, आर्यता, क्रिया में तत्परता, दानशीलता — इन सत्य आदि गुणों से —
श्लोक 23 (skanda.6.242.23)
भूषितो यो भवेन्नित्यं स विप्र इति कथ्यते । क्षत्रियेण तपः कार्यं यजनं दानमेव च
bhūṣito yo bhavennityaṁ sa vipra iti kathyate kṣatriyeṇa tapaḥ kāryaṁ yajanaṁ dānameva ca
— जो सदा भूषित रहता है, वही विप्र कहलाता है। क्षत्रिय को तप, यजन तथा दान करना चाहिए,
श्लोक 24 (skanda.6.242.24)
वेदपाठो विप्रभक्तिरेषां शस्त्रेण जीवनम् । स्त्रीबालगोब्राह्मणार्थे भूम्यर्थे स्वामिसंकटे
vedapāṭho viprabhaktireṣāṁ śastreṇa jīvanam strībālagobrāhmaṇārthe bhūmyarthe svāmisaṁkaṭe
वेदपाठ करना चाहिए, तथा ब्राह्मणों में भक्ति रखनी चाहिए; इनकी आजीविका शस्त्र से होती है — स्त्री, बालक, गौ और ब्राह्मणों के लिए, भूमि के लिए, तथा स्वामी के संकट में —
श्लोक 25 (skanda.6.242.25)
संप्रतिशरणं चैव पीडितानां च शब्दिते । आर्तत्राणपरा ये च क्षत्रिया ब्रह्मणा कृताः
saṁpratiśaraṇaṁ caiva pīḍitānāṁ ca śabdite ārtatrāṇaparā ye ca kṣatriyā brahmaṇā kṛtāḥ
— शरणागत की रक्षा तथा पीड़ितों की पुकार सुनकर सहायता करना (उनका कर्तव्य है)। जो क्षत्रिय आर्तों की रक्षा में तत्पर रहते हैं, वे ही ब्रह्मा द्वारा (ऐसा) बनाए गए हैं।
श्लोक 26 (skanda.6.242.26)
धनवृद्धिकरो वैश्यः पशुपालः कृषीवलः । रसादीनां च विक्रेता देवब्राह्मणपूजकः
dhanavṛddhikaro vaiśyaḥ paśupālaḥ kṛṣīvalaḥ rasādīnāṁ ca vikretā devabrāhmaṇapūjakaḥ
वैश्य धन बढ़ाने वाला, पशुपालक, कृषक, तथा रस आदि पदार्थों का विक्रेता होता है, और देव तथा ब्राह्मणों का पूजक होता है।
श्लोक 27 (skanda.6.242.27)
अर्थवृद्धिकरो व्याजा यज्ञकर्मादिकारकः । दानमध्ययनं चेति वैश्यवृत्तिरुदाहृता
arthavṛddhikaro vyājā yajñakarmādikārakaḥ dānamadhyayanaṁ ceti vaiśyavṛttirudāhṛtā
वह ब्याज से धन बढ़ाता है, यज्ञ-कर्म आदि करता है, दान देता है तथा अध्ययन करता है — इस प्रकार वैश्य की वृत्ति कही गई है।
श्लोक 28 (skanda.6.242.28)
एतान्येव ह्यमंत्राणि शूद्रः कारयते सदा । नित्यं षड्दैवतं श्राद्धं हन्तकारोऽग्नितर्पणम्
etānyeva hyamaṁtrāṇi śūdraḥ kārayate sadā nityaṁ ṣaḍdaivataṁ śrāddhaṁ hantakāro'gnitarpaṇam
शूद्र भी इन्हीं कर्मों को सदा मन्त्ररहित रूप से करता है — नित्य छह देवताओं का पूजन, श्राद्ध, हवन की ध्वनि सहित अग्नि-तर्पण,
श्लोक 29 (skanda.6.242.29)
देवद्विजातिभक्तिश्च नमस्कारेण सिद्ध्यति । शूद्रोऽपि प्रातरुत्थाय कृत्वा पादाभिवंदनम्
devadvijātibhaktiśca namaskāreṇa siddhyati śūdro'pi prātarutthāya kṛtvā pādābhivaṁdanam
तथा देवों और द्विजातियों की भक्ति भी केवल नमस्कार से सिद्ध हो जाती है। शूद्र भी प्रातःकाल उठकर, चरण-वंदन करके,
श्लोक 30 (skanda.6.242.30)
विष्णुभक्तिमयाञ्श्लोकान्पठन्विष्णुत्वमाप्नुयात् । वार्षिकव्रतकृन्नित्यं तिथिवाराधिदैवतः
viṣṇubhaktimayāñślokānpaṭhanviṣṇutvamāpnuyāt vārṣikavratakṛnnityaṁ tithivārādhidaivataḥ
विष्णु-भक्ति से पूर्ण श्लोकों का पाठ करते हुए विष्णुत्व को प्राप्त कर सकता है; वह नित्य तिथि और वार के अधिष्ठाता देवताओं से युक्त वार्षिक व्रत करने वाला होता है।
श्लोक 31 (skanda.6.242.31)
अन्नदः सर्वजीवानां गृहस्थः शूद्र ईरितः । अमंत्राण्यपि कर्माणि कुर्वन्नेव हि मुच्यते
annadaḥ sarvajīvānāṁ gṛhasthaḥ śūdra īritaḥ amaṁtrāṇyapi karmāṇi kurvanneva hi mucyate
— गृहस्थ शूद्र समस्त जीवों को अन्न देने वाला कहा गया है; मन्त्ररहित कर्मों को करते हुए भी वह निश्चय ही मुक्त हो जाता है।
श्लोक 32 (skanda.6.242.32)
चातुर्मास्यव्रतकरः शूद्रोऽपि हरितां व्रजेत् । शिल्पी च नर्तकश्चैव काष्ठकारः प्रजापतिः
cāturmāsyavratakaraḥ śūdro'pi haritāṁ vrajet śilpī ca nartakaścaiva kāṣṭhakāraḥ prajāpatiḥ
चातुर्मास्य-व्रत करने वाला शूद्र भी हरि के गणों की स्थिति को प्राप्त हो जाता है। शिल्पी, नर्तक, काष्ठकार, कुम्भकार,
श्लोक 33 (skanda.6.242.33)
वर्धकिश्चित्रकश्चैव सूत्रको रजकस्तथा । गच्छकस्तन्तुकारश्च चक्रिकश्चर्मकारकः
vardhakiścitrakaścaiva sūtrako rajakastathā gacchakastantukāraśca cakrikaścarmakārakaḥ
वर्धकि (राजगीर), चित्रकार, सूत्रकार, तथा धोबी, फेरीवाला व्यापारी, बुनकर, चाक चलाने वाला, चमड़े का काम करने वाला —
श्लोक 34 (skanda.6.242.34)
सूनिको ध्वनिकश्चैव कौल्हिको मत्स्यघातकः । औनामिकस्तु चंडालः प्रकृत्याष्टादशैव ते
sūniko dhvanikaścaiva kaulhiko matsyaghātakaḥ aunāmikastu caṁḍālaḥ prakṛtyāṣṭādaśaiva te
कसाई, वादक, कोल्हू चलाने वाला, तथा मछुआरा, और चांडाल — स्वभाव से ये अठारह ही (प्रकृतियाँ) हैं।
श्लोक 35 (skanda.6.242.35)
शिल्पिकः स्वर्णकारकश्च दारुकः कांस्यकारकः । काडुकः कुम्भकारश्च प्रकृत्या उत्तमाश्च षट्
śilpikaḥ svarṇakārakaśca dārukaḥ kāṁsyakārakaḥ kāḍukaḥ kumbhakāraśca prakṛtyā uttamāśca ṣaṭ
शिल्पी, सुनार, बढ़ई, कांस्यकार, लकड़हारा तथा कुम्हार — स्वभाव से ये छह उत्तम माने गए हैं।
श्लोक 36 (skanda.6.242.36)
खरवाह्युष्ट्रवाही हयवाही तथैव च । गोपाल इष्टिकाकारो अधमाधमपञ्चकम्
kharavāhyuṣṭravāhī hayavāhī tathaiva ca gopāla iṣṭikākāro adhamādhamapañcakam
गधे को चलाने वाला, ऊँट को चलाने वाला, तथा घोड़े को चलाने वाला, गोपालक, तथा ईंट बनाने वाला — ये अधमों में भी अधम पाँच हैं।
श्लोक 37 (skanda.6.242.37)
रजकश्चर्मकारश्च नटो बुरुड एव च । कैवर्त्तमेदभिल्लाश्च सप्तैते अन्त्यजाः स्मृताः
rajakaścarmakāraśca naṭo buruḍa eva ca kaivarttamedabhillāśca saptaite antyajāḥ smṛtāḥ
धोबी, चमड़े का काम करने वाला, नट, तथा बांस का काम करने वाला, मल्लाह, मेद तथा भील — ये सात अन्त्यज कहे गए हैं।
श्लोक 38 (skanda.6.242.38)
यो यस्य हीनो वर्णेन स चाष्टादशमो नरः । सर्वासां प्रकृतीनां च उत्तमा मध्यमाः समाः
yo yasya hīno varṇena sa cāṣṭādaśamo naraḥ sarvāsāṁ prakṛtīnāṁ ca uttamā madhyamāḥ samāḥ
जो जिससे वर्ण में हीन है, वह उसका अठारहवाँ (भेद) होता है। समस्त प्रकृतियों में उत्तम, मध्यम तथा साधारण भेद हैं।
श्लोक 39 (skanda.6.242.39)
भेदास्त्रयः समाख्याता विज्ञेयाः स्मृतिनिर्णयात् । शिल्पिनः सप्त विज्ञेया उत्तमाः समुदाहृताः
bhedāstrayaḥ samākhyātā vijñeyāḥ smṛtinirṇayāt śilpinaḥ sapta vijñeyā uttamāḥ samudāhṛtāḥ
स्मृति के निर्णय से जानने योग्य तीन भेद कहे गए हैं। शिल्पियों में सात जानने योग्य हैं, जो उत्तम कहे गए हैं —
श्लोक 40 (skanda.6.242.40)
स्वर्णकृत्कंबुकश्चैव तन्दुलीपुष्पलावकः । तांबूली नापितश्चैव मणिकारश्च सप्तधा
svarṇakṛtkaṁbukaścaiva tandulīpuṣpalāvakaḥ tāṁbūlī nāpitaścaiva maṇikāraśca saptadhā
सुनार, शंख का काम करने वाला, चावल कूटने वाला, माली, पान बेचने वाला, नाई, तथा मणिकार — ये सात हैं।
श्लोक 41 (skanda.6.242.41)
न स्नानं देवताहोमस्तपोनियम एव च । न स्वाध्यायवषट्कारौ न च शुद्धिर्विवाहिता
na snānaṁ devatāhomastaponiyama eva ca na svādhyāyavaṣaṭkārau na ca śuddhirvivāhitā
उनके लिए न तो (विहित) स्नान है, न देवताओं का होम, न तप का नियम; न स्वाध्याय और वषट्कार हैं, और न ही विवाह की (वैदिक) शुद्धि है।
श्लोक 42 (skanda.6.242.42)
एतासां प्रकृतीनां च गुरुपूजा सदोदिता । विप्राणां प्राकृतो नित्यं दानमेव परो विधिः
etāsāṁ prakṛtīnāṁ ca gurupūjā sadoditā viprāṇāṁ prākṛto nityaṁ dānameva paro vidhiḥ
इन प्रकृतियों के लिए गुरु-पूजा सदा कही गई है। साधारण जन के लिए विप्रों को नित्य दान देना ही परम विधि है।
श्लोक 43 (skanda.6.242.43)
सर्वेषामेव वर्णानामाश्रमाणां महामुने । सर्वासां प्रकृतीनां च विष्णुभक्तिः सदा शुभा
sarveṣāmeva varṇānāmāśramāṇāṁ mahāmune sarvāsāṁ prakṛtīnāṁ ca viṣṇubhaktiḥ sadā śubhā
हे महामुने, समस्त वर्णों और आश्रमों के लिए, तथा समस्त प्रकृतियों के लिए, विष्णु-भक्ति सदा शुभ है।
श्लोक 44 (skanda.6.242.44)
इति ते कथितं सर्वं यथाप्रकृतिसंभवम् । कथां शृणु महापुण्यां शूद्रः शुद्धिमगाद्यथा
iti te kathitaṁ sarvaṁ yathāprakṛtisaṁbhavam kathāṁ śṛṇu mahāpuṇyāṁ śūdraḥ śuddhimagādyathā
इस प्रकार प्रत्येक प्रकृति की उत्पत्ति के अनुसार तुम्हें सब कुछ कह दिया गया। अब वह महापुण्य कथा सुनो, जिसमें एक शूद्र ने शुद्धि किस प्रकार प्राप्त की।
श्लोक 45 (skanda.6.242.45)
इदं पुराणं परमं पवित्रं विशुद्धधीर्यस्तु शृणोति वा पठेत् । विधूय पापानि पुरार्जितानि स याति विष्णोर्भवनं क्रियापरः
idaṁ purāṇaṁ paramaṁ pavitraṁ viśuddhadhīryastu śṛṇoti vā paṭhet vidhūya pāpāni purārjitāni sa yāti viṣṇorbhavanaṁ kriyāparaḥ
यह पुराण परम पवित्र है; जो विशुद्ध बुद्धि वाला मनुष्य इसे सुनता या पढ़ता है, वह पूर्वार्जित पापों को झाड़कर, अपने कर्तव्यों में तत्पर रहते हुए विष्णु के धाम को प्राप्त होता है।