नागर खण्ड · अध्याय 243
पैजवन की कथा एवं शालिग्राम-पूजन-माहात्म्य का वर्णन
श्लोक 1 (skanda.6.243.1)
ब्रह्मा उवाच । शूद्रः पैजवनोनाम गार्हस्थ्याच्छुद्धिमाप्तवान् । धर्ममार्गाविरोधेन तन्निबोध महामते
brahmā uvāca śūdraḥ paijavanonāma gārhasthyācchuddhimāptavān dharmamārgāvirodhena tannibodha mahāmate
ब्रह्मा जी ने कहा — पैजवन नामक एक शूद्र ने गृहस्थाश्रम से ही, धर्ममार्ग का उल्लंघन किए बिना, शुद्धि प्राप्त की; हे महामते, इसे समझो।
श्लोक 2 (skanda.6.243.2)
आसीत्पैजवनः शूद्रः पुरा त्रेतायुगे किल । स्वधर्मनिरतः ख्यातो विष्णुब्राह्मणपूजकः
āsītpaijavanaḥ śūdraḥ purā tretāyuge kila svadharmanirataḥ khyāto viṣṇubrāhmaṇapūjakaḥ
प्राचीन त्रेतायुग में पैजवन नामक एक शूद्र था, जो अपने धर्म में निरत रहने के लिए प्रसिद्ध था, तथा विष्णु और ब्राह्मणों का पूजक था,
श्लोक 3 (skanda.6.243.3)
न्यायागतधनो नित्यं शांतः सर्वजनप्रियः । सत्यवादी विवेकज्ञस्तस्य भार्या च सुन्दरी
nyāyāgatadhano nityaṁ śāṁtaḥ sarvajanapriyaḥ satyavādī vivekajñastasya bhāryā ca sundarī
न्यायपूर्वक अर्जित धन वाला, सदा शांत, सभी को प्रिय, सत्यवादी तथा विवेकवान् था। उसकी पत्नी भी सुंदर थी,
श्लोक 4 (skanda.6.243.4)
धर्मोढा वेदविधिना समानकुलजा शुभा । पतिव्रता महाभागा देवद्विजहिते रता
dharmoḍhā vedavidhinā samānakulajā śubhā pativratā mahābhāgā devadvijahite ratā
वेदविधि से धर्मपूर्वक विवाहित, समान कुल में उत्पन्न, शुभ, पतिव्रता, महाभागा, तथा देवों और ब्राह्मणों के हित में रत थी।
श्लोक 5 (skanda.6.243.5)
काश्यां संबंधिता बाला वैजयंत्यां विवाहिता । सा धर्माचरणे दक्षा वैष्णवव्रतचारिणी
kāśyāṁ saṁbaṁdhitā bālā vaijayaṁtyāṁ vivāhitā sā dharmācaraṇe dakṣā vaiṣṇavavratacāriṇī
वह बाला काशी में संबंधित हुई थी और वैजयंती में विवाहित हुई थी; वह धर्माचरण में कुशल तथा वैष्णव-व्रतों का पालन करने वाली थी।
श्लोक 6 (skanda.6.243.6)
भर्त्रा सह तथा सम्यक्चिक्रीडे सुविनीतवत् । सोऽपि रेमे तया काले हस्तिन्येव महागजः
bhartrā saha tathā samyakcikrīḍe suvinītavat so'pi reme tayā kāle hastinyeva mahāgajaḥ
वह अपने पति के साथ भलीभाँति और विनम्रतापूर्वक विचरण करती थी; वह भी उसके साथ उचित समय पर उसी प्रकार रमण करता था जैसे हथिनी के साथ महान गज।
श्लोक 7 (skanda.6.243.7)
अर्थाप्तिः पूर्वपुण्येन जाता तस्य महात्मनः । वाणिज्यं स्वजनैर्नित्यं स्वदेशपरदेशजम्
arthāptiḥ pūrvapuṇyena jātā tasya mahātmanaḥ vāṇijyaṁ svajanairnityaṁ svadeśaparadeśajam
पूर्वजन्म के पुण्य से उस महात्मा को धन की प्राप्ति हुई; वह अपने स्वजनों के माध्यम से नित्य स्वदेश तथा परदेश में उत्पन्न वस्तुओं का व्यापार करता था,
श्लोक 8 (skanda.6.243.8)
कारयत्यर्थजातैश्च परकीयस्वकीयजैः । एवमर्थश्च बहुधा संजातो धर्मदर्शिनः
kārayatyarthajātaiśca parakīyasvakīyajaiḥ evamarthaśca bahudhā saṁjāto dharmadarśinaḥ
तथा पराए और अपने धन से उत्पन्न वस्तुओं से व्यापार करवाता था। इस प्रकार धर्मदर्शी उस पुरुष का धन बहुविध रूप से बढ़ता गया।
श्लोक 9 (skanda.6.243.9)
पुत्रत्रयं च संजातं पितुः शुश्रूषणे रतम् । तस्य पुत्राः पितुर्भक्ता द्रव्यादिमदवर्जिताः
putratrayaṁ ca saṁjātaṁ pituḥ śuśrūṣaṇe ratam tasya putrāḥ piturbhaktā dravyādimadavarjitāḥ
उसके तीन पुत्र उत्पन्न हुए, जो पिता की सेवा में रत रहते थे; उसके पुत्र पिता के प्रति भक्तिमान् थे, तथा धन आदि के मद से रहित थे।
श्लोक 10 (skanda.6.243.10)
पितृवाक्यरताः श्रेष्ठाः स्वधर्माचारशोभनाः । पित्रोः शुश्रूषणादन्यन्नाभिनंदंति किंचन
pitṛvākyaratāḥ śreṣṭhāḥ svadharmācāraśobhanāḥ pitroḥ śuśrūṣaṇādanyannābhinaṁdaṁti kiṁcana
वे पिता के वचन में अनुरक्त, श्रेष्ठ, अपने धर्माचरण से सुशोभित थे; माता-पिता की सेवा के अतिरिक्त वे किसी अन्य बात से आनंदित नहीं होते थे।
श्लोक 11 (skanda.6.243.11)
ते सम्बन्धैः सुसंबद्धाः पित्रा धर्मार्थदर्शिना । तत्पत्न्यो मातृपित्रर्चां कारयंत्यनिवारितम्
te sambandhaiḥ susaṁbaddhāḥ pitrā dharmārthadarśinā tatpatnyo mātṛpitrarcāṁ kārayaṁtyanivāritam
धर्म और अर्थ को देखने वाले उनके पिता द्वारा उनके विवाह-संबंध भलीभाँति स्थापित किए गए थे; उनकी पत्नियाँ बिना किसी रोक-टोक के सास-ससुर की सेवा-पूजा करती थीं।
श्लोक 12 (skanda.6.243.12)
ऋद्धिमद्भवनं तस्य धनधान्यसमन्वितम् । सोऽपि धर्मरतो नित्यं देवतातिथिपूजकः
ṛddhimadbhavanaṁ tasya dhanadhānyasamanvitam so'pi dharmarato nityaṁ devatātithipūjakaḥ
उसका भवन समृद्ध, धन-धान्य से युक्त था; वह स्वयं भी सदा धर्म में रत, देवताओं और अतिथियों का पूजक था।
श्लोक 13 (skanda.6.243.13)
गृहागतो न विमुखो यस्य जातु कदाचन । शीतकाले धनं प्रादादुष्णकाले जलान्नदः
gṛhāgato na vimukho yasya jātu kadācana śītakāle dhanaṁ prādāduṣṇakāle jalānnadaḥ
उसके घर आया हुआ कोई भी अतिथि कभी निराश होकर नहीं लौटा; शीतकाल में वह धन देता था, ग्रीष्मकाल में जल और अन्न देने वाला था,
श्लोक 14 (skanda.6.243.14)
वर्षाकाले वस्त्रदश्च बभूवान्नप्रदः सदा । वापीकूपतडागादिप्रपादेवगृहाणि च
varṣākāle vastradaśca babhūvānnapradaḥ sadā vāpīkūpataḍāgādiprapādevagṛhāṇi ca
तथा वर्षाकाल में वस्त्र देने वाला था; वह सदा अन्नदाता था। वह उचित समय पर बावली, कुआँ, तालाब आदि, प्याऊ तथा देवालय —
श्लोक 15 (skanda.6.243.15)
कारयत्युचिते काले शिवविष्णुव्रतस्थितः । इष्टधर्मस्तु वर्णानां समाचीर्णो महाफलः
kārayatyucite kāle śivaviṣṇuvratasthitaḥ iṣṭadharmastu varṇānāṁ samācīrṇo mahāphalaḥ
शिव और विष्णु के व्रतों में स्थित रहते हुए बनवाता था। वर्णों के लिए इष्ट-धर्म (यज्ञादि), भलीभाँति आचरित होने पर, महाफलदायक होता है,
श्लोक 16 (skanda.6.243.16)
अन्येषां पूर्तधर्माणां तेषां पूर्तकरः सदा । स बभूव धनाढ्योपि व्यसनैर्न समाश्रितः
anyeṣāṁ pūrtadharmāṇāṁ teṣāṁ pūrtakaraḥ sadā sa babhūva dhanāḍhyopi vyasanairna samāśritaḥ
तथा अन्य पूर्त-धर्मों (कुआँ, तालाब आदि सार्वजनिक कार्यों) का वह सदा करने वाला था। वह धनाढ्य होते हुए भी व्यसनों का आश्रय लेने वाला कभी नहीं बना।
श्लोक 17 (skanda.6.243.17)
विष्णुभक्तिरतो नित्यं चातुर्मास्ये विशेषतः
viṣṇubhaktirato nityaṁ cāturmāsye viśeṣataḥ
वह सदा विष्णु-भक्ति में रत रहता था, विशेषतः चातुर्मास्य में।
श्लोक 18 (skanda.6.243.18)
एकदा गालवमुनिः शिष्यैर्बहुभिरावृतः
ekadā gālavamuniḥ śiṣyairbahubhirāvṛtaḥ
एक बार गालव मुनि, अनेक शिष्यों से घिरे हुए —
श्लोक 19 (skanda.6.243.19)
ब्रह्मज्ञानरतः शांतस्तपोनिष्ठो महावशी । अभ्याजगाम शूद्रस्य गेहे पैजवनस्य सः
brahmajñānarataḥ śāṁtastaponiṣṭho mahāvaśī abhyājagāma śūdrasya gehe paijavanasya saḥ
— ब्रह्मज्ञान में रत, शांत, तपोनिष्ठ, महान् संयमी वे मुनि उस शूद्र पैजवन के घर आ पहुँचे।
श्लोक 20 (skanda.6.243.20)
स वाग्भिर्मधुभिस्तस्य अभ्युत्थानासनादिभिः । उपचारैः पुनर्युक्तः कृतार्थ इव मानयन्
sa vāgbhirmadhubhistasya abhyutthānāsanādibhiḥ upacāraiḥ punaryuktaḥ kṛtārtha iva mānayan
उसने मधुर वचनों से तथा अभ्युत्थान, आसन आदि उपचारों से युक्त होकर, मानो स्वयं कृतार्थ हुआ हो, इस प्रकार उनका सम्मान किया।
श्लोक 21 (skanda.6.243.21)
अद्य मे सफलं जन्म जातं जीवितमुत्तमम् । अद्य मे सफलो धर्मः कुशलश्चोद्धृतस्त्वया
adya me saphalaṁ janma jātaṁ jīvitamuttamam adya me saphalo dharmaḥ kuśalaścoddhṛtastvayā
(पैजवन ने कहा) — आज मेरा जन्म सफल हुआ, आज मेरा जीवन उत्तम हो गया; आज मेरा धर्म सफल हुआ, तथा मेरा कल्याण आपके द्वारा सिद्ध हो गया।
श्लोक 22 (skanda.6.243.22)
मम पापसहस्राणि दृष्ट्या दग्धानि ते मुने । गृहं मम गृहस्थस्य सकलं पावितं त्वया
mama pāpasahasrāṇi dṛṣṭyā dagdhāni te mune gṛhaṁ mama gṛhasthasya sakalaṁ pāvitaṁ tvayā
हे मुने, आपकी दृष्टिमात्र से मेरे सहस्रों पाप भस्म हो गए; एक साधारण गृहस्थ का यह मेरा सम्पूर्ण घर आपके द्वारा पवित्र कर दिया गया।
श्लोक 23 (skanda.6.243.23)
तस्य भक्त्या प्रसन्नोऽभूद्गतमार्गपरिश्रमः । उवाच मुनिशार्दूलः सच्छूद्रं तं कृतांजलिम्
tasya bhaktyā prasanno'bhūdgatamārgapariśramaḥ uvāca muniśārdūlaḥ sacchūdraṁ taṁ kṛtāṁjalim
उसकी भक्ति से प्रसन्न होकर, मार्ग का श्रम भूल गए मुनि-श्रेष्ठ ने हाथ जोड़कर खड़े उस सच्छूद्र से कहा —
श्लोक 24 (skanda.6.243.24)
कच्चित्ते कुशलं सौम्य मनो धर्मे प्रवर्तते । अर्थानुबंधाः सततं बन्धुदारसुतादयः
kaccitte kuśalaṁ saumya mano dharme pravartate arthānubaṁdhāḥ satataṁ bandhudārasutādayaḥ
हे सौम्य, आशा है तुम कुशल हो, और तुम्हारा मन धर्म में प्रवृत्त है? क्या धन के बंधन, तथा तुम्हारे बंधु, पत्नी, पुत्र आदि सदा सुव्यवस्थित हैं?
श्लोक 25 (skanda.6.243.25)
गोविन्दे सततं भक्तिस्तथा दाने प्रवर्तते । धर्मार्थकामकार्येषु सप्रभावं मनस्तव
govinde satataṁ bhaktistathā dāne pravartate dharmārthakāmakāryeṣu saprabhāvaṁ manastava
क्या गोविन्द में तुम्हारी निरंतर भक्ति है, और दान में भी तुम्हारी प्रवृत्ति है? धर्म, अर्थ और काम के कार्यों में क्या तुम्हारा मन प्रभावशाली बना रहता है?
श्लोक 26 (skanda.6.243.26)
विष्णुपादोदकं नित्यं शिरसा धार्यते न वा । पादोद्भवं च गंगोदं द्वादशाब्दफलप्रदम्
viṣṇupādodakaṁ nityaṁ śirasā dhāryate na vā pādodbhavaṁ ca gaṁgodaṁ dvādaśābdaphalapradam
क्या तुम विष्णु के चरणोदक को नित्य अपने सिर पर धारण करते हो, अथवा नहीं? क्योंकि उनके चरणों से उत्पन्न गंगाजल बारह वर्षों के फल को देने वाला है;
श्लोक 27 (skanda.6.243.27)
चातुर्मास्ये विशेषेण तत्फलं द्विगुणं भवेत् । हरिभक्तिर्हरिकथा हरिस्तोत्रं हरेर्नतिः
cāturmāsye viśeṣeṇa tatphalaṁ dviguṇaṁ bhavet haribhaktirharikathā haristotraṁ harernatiḥ
विशेषतः चातुर्मास्य में वह फल दुगुना हो जाता है। हरि-भक्ति, हरि-कथा, हरि-स्तोत्र, हरि को प्रणाम,
श्लोक 28 (skanda.6.243.28)
हरिध्यानं हरेः पूजा सुप्ते देवे च मोक्षकृत् । एवं ब्रुवाणं स मुनिं पुनराह नतिं गतः
haridhyānaṁ hareḥ pūjā supte deve ca mokṣakṛt evaṁ bruvāṇaṁ sa muniṁ punarāha natiṁ gataḥ
हरि-ध्यान, तथा हरि-पूजा — जब देव शयन में हों, तब ये सब मोक्ष प्रदान करने वाले होते हैं। इस प्रकार बोलते हुए मुनि से नत होकर पैजवन ने पुनः कहा —
श्लोक 29 (skanda.6.243.29)
भवद्दृष्ट्याश्रमफलमेतज्जातं न संशयः । तथापि श्रोतुमिच्छामि तव वाणीमनामयीम्
bhavaddṛṣṭyāśramaphalametajjātaṁ na saṁśayaḥ tathāpi śrotumicchāmi tava vāṇīmanāmayīm
आपकी दृष्टि से ही यह आश्रम-फल मुझे प्राप्त हो गया है, इसमें संशय नहीं है; फिर भी मैं आपकी कल्याणकारी वाणी सुनना चाहता हूँ।
श्लोक 30 (skanda.6.243.30)
भवादृशानां गमनं सर्वार्थेषु प्रकल्पते । ततस्तौ सुमुदा युक्तौ संजातौ हृष्टचेतसौ
bhavādṛśānāṁ gamanaṁ sarvārtheṣu prakalpate tatastau sumudā yuktau saṁjātau hṛṣṭacetasau
आप जैसे महापुरुषों का आगमन ही समस्त प्रयोजनों की सिद्धि करने वाला होता है। तत्पश्चात् वे दोनों अत्यंत हर्ष से युक्त, प्रसन्नचित्त हो गए।
श्लोक 31 (skanda.6.243.31)
मुनिं पैजवनोनाम सच्छूद्रः प्राह संमतः । किमागमनकृत्यं ते कथयस्व प्रसादतः
muniṁ paijavanonāma sacchūdraḥ prāha saṁmataḥ kimāgamanakṛtyaṁ te kathayasva prasādataḥ
सर्वसम्मत उस सच्छूद्र पैजवन ने मुनि से कहा — आपके आगमन का क्या प्रयोजन है, कृपया प्रसन्नतापूर्वक बताइए।
श्लोक 32 (skanda.6.243.32)
को वा तीर्थप्रसंगश्च चातुर्मास्ये समीपगे । गालवः प्राह सच्छूद्रं धार्मिकं सत्यवादिनम्
ko vā tīrthaprasaṁgaśca cāturmāsye samīpage gālavaḥ prāha sacchūdraṁ dhārmikaṁ satyavādinam
तथा चातुर्मास्य के समीप आने पर आपका कौन-सा तीर्थ-प्रसंग है? तब गालव जी ने उस धार्मिक, सत्यवादी सच्छूद्र से कहा —
श्लोक 33 (skanda.6.243.33)
मम तीर्थावसिक्तस्य मासा बहुतरा गताः । इदानीमाश्रमं यास्ये चातुर्मास्ये समागते
mama tīrthāvasiktasya māsā bahutarā gatāḥ idānīmāśramaṁ yāsye cāturmāsye samāgate
तीर्थों में निमग्न मुझे बहुत से महीने बीत चुके हैं; अब चातुर्मास्य के आने पर मैं अपने आश्रम को जाऊँगा।
श्लोक 34 (skanda.6.243.34)
आषाढशुक्लैकादश्यां करिष्ये नियमं गृहे । नारायणस्य प्रीत्यर्थं श्रेयोऽर्थं चात्मनस्तथा । प्रत्युवाच मुनिर्धर्मान्विनयानतकन्धरम्
āṣāḍhaśuklaikādaśyāṁ kariṣye niyamaṁ gṛhe nārāyaṇasya prītyarthaṁ śreyo'rthaṁ cātmanastathā pratyuvāca munirdharmānvinayānatakandharam
आषाढ़ शुक्ल एकादशी को घर में नियम-पालन करूँगा, नारायण की प्रीति के लिए तथा अपने कल्याण के लिए भी — इस प्रकार धर्मज्ञ मुनि ने विनयपूर्वक झुकी हुई गर्दन वाले उस पैजवन से कहा।
श्लोक 35 (skanda.6.243.35)
पैजवन उवाच । मामनुग्रहजां बुद्धिं ब्रूहि त्वं द्विजपुंगव । वेदेऽधिकारो नैवास्ति वेदसारजपस्य वा
paijavana uvāca māmanugrahajāṁ buddhiṁ brūhi tvaṁ dvijapuṁgava vede'dhikāro naivāsti vedasārajapasya vā
पैजवन ने कहा — हे द्विजश्रेष्ठ, मुझे अपनी कृपा से उत्पन्न बुद्धि प्रदान कीजिए; मुझे वेद में कोई अधिकार नहीं है, और न ही वेदसार के जप में।
श्लोक 36 (skanda.6.243.36)
पुराणस्मृतिपाठस्य तस्मात्किंचिद्वदस्व मे । तत्त्वात्मसदृशं किंचिद्भाति रूपं महाफलम्
purāṇasmṛtipāṭhasya tasmātkiṁcidvadasva me tattvātmasadṛśaṁ kiṁcidbhāti rūpaṁ mahāphalam
पुराण और स्मृति के पाठ में भी नहीं; अतः मुझे कुछ और बताइए। क्या मेरे स्वभाव के अनुकूल कोई ऐसा साधन है जो महाफलदायक प्रतीत होता हो?
श्लोक 37 (skanda.6.243.37)
चातुर्मास्ये विशेषेण मुक्तिसंसाधकं वद
cāturmāsye viśeṣeṇa muktisaṁsādhakaṁ vada
मुझे विशेषतः वह बताइए जो चातुर्मास्य में मुक्ति को सिद्ध करने वाला हो।
श्लोक 38 (skanda.6.243.38)
गालव उवाच । शालिग्रामगतं विष्णुं चक्रांकितपुटं सदा । येऽर्चयन्ति नरा नित्यं तेषां भुक्तिस्त्वदूरतः
gālava uvāca śāligrāmagataṁ viṣṇuṁ cakrāṁkitapuṭaṁ sadā ye'rcayanti narā nityaṁ teṣāṁ bhuktistvadūrataḥ
गालव ने कहा — जो मनुष्य सदा चक्र से अंकित शालिग्राम में स्थित विष्णु का नित्य पूजन करते हैं, उनके लिए भोग दूर नहीं है,
श्लोक 39 (skanda.6.243.39)
शालिग्रामे मनो यस्य यत्किंचित्क्रियते शुभम् । अक्षय्यं तद्भवेन्नित्यं चातुर्मास्ये विशेषतः
śāligrāme mano yasya yatkiṁcitkriyate śubham akṣayyaṁ tadbhavennityaṁ cāturmāsye viśeṣataḥ
जिसका मन शालिग्राम में रमता है, उसके द्वारा किया गया जो कुछ भी शुभ कर्म है, वह सदा अक्षय हो जाता है — विशेषतः चातुर्मास्य में।
श्लोक 40 (skanda.6.243.40)
शालिग्रामशिला यत्र यत्र द्वारावती शिला । उभयोः संगमः प्राप्तो मुक्तिस्तस्य न दुर्लभा
śāligrāmaśilā yatra yatra dvārāvatī śilā ubhayoḥ saṁgamaḥ prāpto muktistasya na durlabhā
जहाँ-जहाँ शालिग्राम-शिला और द्वारावती-शिला (दोनों) हों, वहाँ दोनों का संगम प्राप्त करने वाले के लिए मुक्ति दुर्लभ नहीं है।
श्लोक 41 (skanda.6.243.41)
शालिग्रामशिला यस्यां भूमौ संपूज्यते नृभिः । पञ्चक्रोशं पुनात्येषा अपि पापशतान्वितैः
śāligrāmaśilā yasyāṁ bhūmau saṁpūjyate nṛbhiḥ pañcakrośaṁ punātyeṣā api pāpaśatānvitaiḥ
जिस भूमि पर शालिग्राम-शिला मनुष्यों द्वारा पूजी जाती है, वह शिला पाँच कोस तक की भूमि को पवित्र कर देती है, सैकड़ों पापों से युक्त लोगों के लिए भी।
श्लोक 42 (skanda.6.243.42)
तैजसं पिंडमेतद्धि ब्रह्मरूपमिदं शुभम् । यस्याः संदर्शनादेव सद्यः कल्मषनाशनम्
taijasaṁ piṁḍametaddhi brahmarūpamidaṁ śubham yasyāḥ saṁdarśanādeva sadyaḥ kalmaṣanāśanam
यह तेजोमय पिंड है, यह शुभ स्वरूप साक्षात् ब्रह्म ही है; जिसके दर्शनमात्र से ही तत्काल पाप का नाश हो जाता है।
श्लोक 43 (skanda.6.243.43)
सर्वतीर्थानि पुण्यानि देवतायतनानि च । नद्यः सर्वा महाशूद्र तीर्थत्वं प्राप्नुवंति हि
sarvatīrthāni puṇyāni devatāyatanāni ca nadyaḥ sarvā mahāśūdra tīrthatvaṁ prāpnuvaṁti hi
हे महाशूद्र, समस्त पुण्य तीर्थ, देवालय, तथा समस्त नदियाँ भी इसी के प्रभाव से तीर्थत्व को प्राप्त होती हैं।
श्लोक 44 (skanda.6.243.44)
सन्निधानेन वै तस्याः क्रिया सर्वत्रशोभनाः । व्रजंति हि क्रियात्वं च चातुर्मास्ये विशेषतः
sannidhānena vai tasyāḥ kriyā sarvatraśobhanāḥ vrajaṁti hi kriyātvaṁ ca cāturmāsye viśeṣataḥ
उसकी सन्निधि मात्र से सर्वत्र की क्रियाएँ शोभन हो जाती हैं, और सच्चे कर्मत्व को प्राप्त होती हैं — विशेषतः चातुर्मास्य में।
श्लोक 45 (skanda.6.243.45)
पूज्यते भवने यस्य शालिग्रामशिला शुभा । कोमलैस्तुलसीपत्रैर्विमुखस्तत्र वै यमः
pūjyate bhavane yasya śāligrāmaśilā śubhā komalaistulasīpatrairvimukhastatra vai yamaḥ
जिसके घर में कोमल तुलसी-पत्रों से शुभ शालिग्राम-शिला पूजी जाती है, वहाँ यमराज मुख फेर लेते हैं।
श्लोक 46 (skanda.6.243.46)
ब्राह्मणक्षत्रियविशां सच्छूद्राणामथापि वा । शालिग्रामाधिकारोऽस्ति न चान्येषां कदाचन
brāhmaṇakṣatriyaviśāṁ sacchūdrāṇāmathāpi vā śāligrāmādhikāro'sti na cānyeṣāṁ kadācana
ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा सच्छूद्रों को भी शालिग्राम-पूजन का अधिकार है, किंतु अन्य किसी को कभी नहीं।
श्लोक 47 (skanda.6.243.47)
सच्छूद्र उवाच । ब्रह्मन्वेदविदां श्रेष्ठ सर्वशास्त्रविशारद । स्त्रीशूद्रादिनिषेधोऽयं शालिग्रामे हि श्रूयते
sacchūdra uvāca brahmanvedavidāṁ śreṣṭha sarvaśāstraviśārada strīśūdrādiniṣedho'yaṁ śāligrāme hi śrūyate
सच्छूद्र ने कहा — हे ब्रह्मन्, वेदवेत्ताओं में श्रेष्ठ, समस्त शास्त्रों में विशारद, यह तो सुना जाता है कि शालिग्राम में स्त्री-शूद्र आदि का निषेध है।
श्लोक 48 (skanda.6.243.48)
मादृशस्त्वं कथं शालिग्रामपूजाविधिं वद
mādṛśastvaṁ kathaṁ śāligrāmapūjāvidhiṁ vada
फिर मुझ जैसे को आप कैसे शालिग्राम-पूजा-विधि बताते हैं?
श्लोक 49 (skanda.6.243.49)
गालव उवाच । असच्छूद्रगतं दास निषेधं विद्धि मानद । स्त्रीणामपि च साध्वीनां नैवाभावः प्रकीर्तितः
gālava uvāca asacchūdragataṁ dāsa niṣedhaṁ viddhi mānada strīṇāmapi ca sādhvīnāṁ naivābhāvaḥ prakīrtitaḥ
गालव ने कहा — हे मानद, यह निषेध असच्छूद्रों के लिए है, यह जानो। तथा साध्वी स्त्रियों के लिए भी कभी अभाव (निषेध) नहीं कहा गया है।
श्लोक 50 (skanda.6.243.50)
मा भूत्संशयस्तेनात्र नाऽऽप्नुषे संशयात्फलम् । शालिग्रामार्चनपराः शुद्धदेहा विवेकिनः
mā bhūtsaṁśayastenātra nā''pnuṣe saṁśayātphalam śāligrāmārcanaparāḥ śuddhadehā vivekinaḥ
इस विषय में तुम्हें संशय नहीं करना चाहिए, क्योंकि संशय से फल प्राप्त नहीं होता। शालिग्राम-अर्चन में तत्पर, शुद्ध शरीर वाले, विवेकी पुरुष —
श्लोक 51 (skanda.6.243.51)
न ते यमपुरं यांति चातुर्मास्ये च पूजकाः । शालिग्रामार्पितं माल्यं शिरसा धारयंति ये
na te yamapuraṁ yāṁti cāturmāsye ca pūjakāḥ śāligrāmārpitaṁ mālyaṁ śirasā dhārayaṁti ye
— वे यमपुरी को नहीं जाते, विशेषतः चातुर्मास्य के पूजक। जो शालिग्राम को अर्पित की गई माला अपने सिर पर धारण करते हैं,
श्लोक 52 (skanda.6.243.52)
तेषां पापसहस्राणि विलयं यांति तत्क्षणात् । शालिग्रामशिलाग्रे तु ये प्रयच्छंति दीपकम्
teṣāṁ pāpasahasrāṇi vilayaṁ yāṁti tatkṣaṇāt śāligrāmaśilāgre tu ye prayacchaṁti dīpakam
उनके सहस्रों पाप उसी क्षण विलीन हो जाते हैं। तथा जो शालिग्राम-शिला के समक्ष दीपक जलाते हैं,
श्लोक 53 (skanda.6.243.53)
तेषां सौरपुरे वासः कदाचिन्नैव हीयते । शालिग्रामगतं विष्णुं सुमनोभिर्मनोहरैः । येऽर्चयंति महाशूद्र सुप्ते देवे हरौ तथा
teṣāṁ saurapure vāsaḥ kadācinnaiva hīyate śāligrāmagataṁ viṣṇuṁ sumanobhirmanoharaiḥ ye'rcayaṁti mahāśūdra supte deve harau tathā
उनका सौरपुर में निवास कभी क्षीण नहीं होता। तथा हे महाशूद्र, जो हरि के शयनकाल में शालिग्राम में स्थित विष्णु को मनोहर सुंदर पुष्पों से पूजते हैं,
श्लोक 54 (skanda.6.243.54)
पंचामृतेन स्नपनं ये कुर्वंति सदा नराः । शालिग्रामशिलायां च न ते संसारिणो नराः
paṁcāmṛtena snapanaṁ ye kurvaṁti sadā narāḥ śāligrāmaśilāyāṁ ca na te saṁsāriṇo narāḥ
जो मनुष्य शालिग्राम-शिला को सदा पंचामृत से स्नान कराते हैं, वे मनुष्य फिर संसार-चक्र में बद्ध नहीं रहते।
श्लोक 55 (skanda.6.243.55)
मुक्तेर्निदानममलं शालिग्रामगतं हरिम् । हृदि न्यस्य सदा भक्त्या यो ध्यायति स मुक्तिभाक्
mukternidānamamalaṁ śāligrāmagataṁ harim hṛdi nyasya sadā bhaktyā yo dhyāyati sa muktibhāk
जो शालिग्राम में स्थित, मुक्ति के निर्मल कारणस्वरूप हरि को अपने हृदय में स्थापित कर, सदा भक्तिपूर्वक उनका ध्यान करता है, वह मुक्ति का भागी होता है।
श्लोक 56 (skanda.6.243.56)
तुलसीदलजां मालां शालिग्रामोपरि न्यसेत् । चातुर्मास्ये विशेषेण सर्वकामानवाप्नुयात्
tulasīdalajāṁ mālāṁ śāligrāmopari nyaset cāturmāsye viśeṣeṇa sarvakāmānavāpnuyāt
तुलसी-दल से बनी माला शालिग्राम के ऊपर रखनी चाहिए; विशेषतः चातुर्मास्य में, इससे मनुष्य समस्त कामनाओं को प्राप्त कर लेता है।
श्लोक 57 (skanda.6.243.57)
न तावत्पुष्पजा माला शालिग्रामस्य वल्लभा । सर्वदा तुलसी देवी विष्णोर्नित्यं शुभा प्रिया
na tāvatpuṣpajā mālā śāligrāmasya vallabhā sarvadā tulasī devī viṣṇornityaṁ śubhā priyā
साधारण पुष्पों से बनी माला उतनी शालिग्राम को प्रिय नहीं है; देवी तुलसी ही विष्णु की सदा नित्य शुभ प्रिया हैं।
श्लोक 58 (skanda.6.243.58)
तुलसी वल्लभा नित्यं चातुर्मास्ये विशेषतः । शालिग्रामो महाविष्णुस्तुलसी श्रीर्न संशयः
tulasī vallabhā nityaṁ cāturmāsye viśeṣataḥ śāligrāmo mahāviṣṇustulasī śrīrna saṁśayaḥ
तुलसी नित्य ही प्रिया हैं, विशेषतः चातुर्मास्य में; शालिग्राम साक्षात् महाविष्णु हैं, और तुलसी साक्षात् श्री हैं, इसमें संशय नहीं है।
श्लोक 59 (skanda.6.243.59)
अतो वासितपानीयैः स्नाप्यं चंदनचर्चितैः । मंजरीभिर्युतं देवं शालग्रामशिलाहरिम्
ato vāsitapānīyaiḥ snāpyaṁ caṁdanacarcitaiḥ maṁjarībhiryutaṁ devaṁ śālagrāmaśilāharim
अतः तुलसी-मंजरियों सहित शालिग्राम-शिला में स्थित हरि को सुगन्धित, चन्दन-चर्चित जल से स्नान कराना चाहिए,
श्लोक 60 (skanda.6.243.60)
तुलसीसंभवाभिश्च कृत्वा कामानवाप्नुयात् । पत्रे तु प्रथमे ब्रह्मा द्वितीये भगवाञ्छिवः
tulasīsaṁbhavābhiśca kṛtvā kāmānavāpnuyāt patre tu prathame brahmā dvitīye bhagavāñchivaḥ
तथा तुलसी से उत्पन्न जल से भी; ऐसा करने से मनुष्य कामनाओं को प्राप्त कर लेता है। पहले पत्र में ब्रह्मा, दूसरे में भगवान् शिव निवास करते हैं,
श्लोक 61 (skanda.6.243.61)
मंजर्यां भगवान्विष्णुस्तदेकस्थत्रया सदा । मंजरी दलसंयुक्ता ग्राह्या बुधजनैः शुभा
maṁjaryāṁ bhagavānviṣṇustadekasthatrayā sadā maṁjarī dalasaṁyuktā grāhyā budhajanaiḥ śubhā
तथा मंजरी में भगवान् विष्णु निवास करते हैं; इस प्रकार वे तीनों सदा एक ही स्थान में स्थित रहते हैं। पत्ते सहित शुभ मंजरी बुद्धिमान् जनों द्वारा ग्रहण करने योग्य है।
श्लोक 62 (skanda.6.243.62)
तां निवेद्य गुरौ भक्त्या जन्मादिक्षयकारणम् । शालिग्रामे धूपराशिं निवेद्य हरितत्परः
tāṁ nivedya gurau bhaktyā janmādikṣayakāraṇam śāligrāme dhūparāśiṁ nivedya haritatparaḥ
उसे भक्तिपूर्वक गुरु को अर्पित करना जन्म आदि (चक्र) के क्षय का कारण बनता है। हरि में तत्पर पुरुष शालिग्राम में धूप-राशि अर्पित करके —
श्लोक 63 (skanda.6.243.63)
चातुर्मास्ये विशेषेण मनुष्यो नैव नारकी । शालिग्रामं नरो दृष्ट्वा पूजितं कुसुमैः शुभैः
cāturmāsye viśeṣeṇa manuṣyo naiva nārakī śāligrāmaṁ naro dṛṣṭvā pūjitaṁ kusumaiḥ śubhaiḥ
— विशेषतः चातुर्मास्य में वह मनुष्य कभी नारकी नहीं होता। जो मनुष्य शुभ पुष्पों से पूजित शालिग्राम का दर्शन करता है,
श्लोक 64 (skanda.6.243.64)
सर्वपापविशुद्धात्मा याति तन्मयतां हरौ । यस्तौत्यश्मगतं विष्णुं गंडकीजलसंभवम्
sarvapāpaviśuddhātmā yāti tanmayatāṁ harau yastautyaśmagataṁ viṣṇuṁ gaṁḍakījalasaṁbhavam
वह समस्त पापों से शुद्धात्मा होकर हरि में तन्मयता को प्राप्त हो जाता है। जो गंडकी के जल से उत्पन्न शिला में स्थित विष्णु की स्तुति करता है,
श्लोक 65 (skanda.6.243.65)
श्रुतिस्मृतिपुराणैश्च सोऽपि विष्णुपदं व्रजेत् । शालिग्रामशिलायाश्च चतुर्विंशतिसंख्यकाः । भेदाः संति महाशूद्र ताञ्छृणुष्व महामते
śrutismṛtipurāṇaiśca so'pi viṣṇupadaṁ vrajet śāligrāmaśilāyāśca caturviṁśatisaṁkhyakāḥ bhedāḥ saṁti mahāśūdra tāñchṛṇuṣva mahāmate
श्रुति, स्मृति तथा पुराणों में कथित मन्त्रों से भी, वह भी विष्णुपद को प्राप्त करता है। हे महाशूद्र, हे महामते, शालिग्राम-शिला के चौबीस भेद हैं, उन्हें सुनो।
श्लोक 66 (skanda.6.243.66)
इमाः पूज्याश्च लोकेऽत्र चतुर्विंशतिसंख्यकाः । तासां च दैवतं विष्णुं नामानि च वदाम्यहम्
imāḥ pūjyāśca loke'tra caturviṁśatisaṁkhyakāḥ tāsāṁ ca daivataṁ viṣṇuṁ nāmāni ca vadāmyaham
ये चौबीसों इस लोक में पूजनीय हैं; अब मैं उनके अधिष्ठाता देव विष्णु के तथा उनके नामों को बताता हूँ।
श्लोक 67 (skanda.6.243.67)
स एव मूर्त्तश्चतुरुत्तरासिर्विंशद्भिरेको भगवान्यथाऽऽद्यः । स एव संवत्सरनामसंज्ञः स एव ग्रावागत आदिदेवः
sa eva mūrttaścaturuttarāsirviṁśadbhireko bhagavānyathā''dyaḥ sa eva saṁvatsaranāmasaṁjñaḥ sa eva grāvāgata ādidevaḥ
वही आदि भगवान् इन चौबीसों में एक होकर भी मूर्तिमान् होते हैं; वे ही संवत्सर के नामों की संज्ञा धारण करने वाले हैं, और वे ही आदिदेव पाषाण-रूप में अवतरित हुए हैं।