नागर खण्ड · अध्याय 244
शालिग्राम की चौबीस मूर्तियों और नामों का वर्णन
श्लोक 1 (skanda.6.244.1)
पैजवन उवाच । एतान्भेदान्मम ब्रूहि विस्तरेण तपोधन । त्वद्वाक्यामृतपानेन तृषा नैव प्रशाम्यति
paijavana uvāca etānbhedānmama brūhi vistareṇa tapodhana tvadvākyāmṛtapānena tṛṣā naiva praśāmyati
पैजवन ने कहा — हे तपोधन, मुझे ये भेद विस्तार से बताइए; आपके वचनामृत का पान करके भी मेरी तृषा शांत नहीं होती।
श्लोक 2 (skanda.6.244.2)
गालव उवाच । शृणु विस्तरतो भेदान्पुराणोक्तान्वदामि ते । याञ्छ्रुत्वा मुच्यतेऽवश्यं मनुजः सर्वकिल्बिषात्
gālava uvāca śṛṇu vistarato bhedānpurāṇoktānvadāmi te yāñchrutvā mucyate'vaśyaṁ manujaḥ sarvakilbiṣāt
गालव ने कहा — पुराणों में कहे गए इन भेदों को मैं तुम्हें विस्तार से बताता हूँ, सुनो; जिन्हें सुनकर मनुष्य निश्चय ही समस्त पापों से मुक्त हो जाता है।
श्लोक 3 (skanda.6.244.3)
पूर्वं तु केशवः पूज्यो द्वितीयो मधुसूदनः । संकर्षणस्तृतीयस्तु ततो दामोदरः स्मृतः
pūrvaṁ tu keśavaḥ pūjyo dvitīyo madhusūdanaḥ saṁkarṣaṇastṛtīyastu tato dāmodaraḥ smṛtaḥ
पहले केशव पूज्य हैं, दूसरे मधुसूदन हैं; तीसरे संकर्षण हैं, तत्पश्चात् चौथे दामोदर स्मरण किए जाते हैं।
श्लोक 4 (skanda.6.244.4)
पंचमो वासुदेवाख्यः षष्ठः प्रद्युम्नसंज्ञकः । सप्तमो विष्णुरुक्तश्चाष्टमो माधव एव च
paṁcamo vāsudevākhyaḥ ṣaṣṭhaḥ pradyumnasaṁjñakaḥ saptamo viṣṇuruktaścāṣṭamo mādhava eva ca
पाँचवें वासुदेव नामक हैं, छठे प्रद्युम्न संज्ञक हैं; सातवें विष्णु कहे गए हैं, तथा आठवें माधव ही हैं।
श्लोक 5 (skanda.6.244.5)
नवमोऽनंतमूर्त्तिश्च दशमः पुरुषोत्तमः । अधोक्षजस्ततः पश्चाद्द्वादशस्तु जनार्दनः
navamo'naṁtamūrttiśca daśamaḥ puruṣottamaḥ adhokṣajastataḥ paścāddvādaśastu janārdanaḥ
नौवें अनंतमूर्ति हैं, दसवें पुरुषोत्तम हैं; तत्पश्चात् ग्यारहवें अधोक्षज हैं, और बारहवें जनार्दन हैं।
श्लोक 6 (skanda.6.244.6)
त्रयोदशस्तु गोविंदश्चतुर्दशस्त्रिविक्रमः । श्रीधरश्च पंचदशो हृषीकेशस्तु षोडशः
trayodaśastu goviṁdaścaturdaśastrivikramaḥ śrīdharaśca paṁcadaśo hṛṣīkeśastu ṣoḍaśaḥ
तेरहवें गोविन्द हैं, चौदहवें त्रिविक्रम हैं; पंद्रहवें श्रीधर हैं, तथा सोलहवें हृषीकेश हैं।
श्लोक 7 (skanda.6.244.7)
नृसिंहस्तु सप्तदशो विश्वयोनिस्ततः परम् । वामनश्च ततः प्रोक्तस्ततो नारायणः स्मृतः
nṛsiṁhastu saptadaśo viśvayonistataḥ param vāmanaśca tataḥ proktastato nārāyaṇaḥ smṛtaḥ
नृसिंह सत्रहवें हैं, तत्पश्चात् विश्वयोनि हैं; फिर वामन कहे गए हैं, और तत्पश्चात् नारायण स्मरण किए जाते हैं।
श्लोक 8 (skanda.6.244.8)
पुंडरीकाक्ष उक्तस्तु ह्युपेंद्रश्च ततः परम् । हरिस्त्रयोविंशतिमः कृष्णश्चांत्य उदाहृतः
puṁḍarīkākṣa uktastu hyupeṁdraśca tataḥ param haristrayoviṁśatimaḥ kṛṣṇaścāṁtya udāhṛtaḥ
फिर पुण्डरीकाक्ष कहे गए हैं, तथा तत्पश्चात् उपेन्द्र हैं; हरि तेईसवें हैं, और अंत में कृष्ण कहे गए हैं।
श्लोक 9 (skanda.6.244.9)
शालिग्रामस्य भेदांश्च मयोक्तास्तव शूद्रज । मूर्तिभेदास्तथा प्रोक्ता एत एव महाधन
śāligrāmasya bhedāṁśca mayoktāstava śūdraja mūrtibhedāstathā proktā eta eva mahādhana
हे शूद्रज, शालिग्राम के ये भेद मेरे द्वारा तुम्हें बताए गए; तथा हे महाधन, ये ही मूर्ति-भेद भी कहे गए हैं।
श्लोक 10 (skanda.6.244.10)
मूर्त्तयस्तिथिनाम्न्यः स्युरेकादश्यः सदैव हि । संवत्सरेण पूज्यंते चतुर्विंशतिमूर्तयः
mūrttayastithināmnyaḥ syurekādaśyaḥ sadaiva hi saṁvatsareṇa pūjyaṁte caturviṁśatimūrtayaḥ
ये मूर्तियाँ सदा एकादशी तिथियों के ही नाम धारण करती हैं; एक संवत्सर में ये चौबीसों मूर्तियाँ पूजी जाती हैं।
श्लोक 11 (skanda.6.244.11)
देवावताराश्च तथा चतुर्विंशतिसंख्यकाः । मासा मार्गशिराद्याश्च मासार्द्धाः पक्षसंज्ञकाः
devāvatārāśca tathā caturviṁśatisaṁkhyakāḥ māsā mārgaśirādyāśca māsārddhāḥ pakṣasaṁjñakāḥ
तथा देवावतार भी चौबीस की संख्या में हैं; मार्गशीर्ष आदि मास, तथा पक्ष संज्ञा वाले अर्ध-मास (भी इसी संख्या में आते हैं)।
श्लोक 12 (skanda.6.244.12)
अधीशसहितान्नित्यं पूजयन्भक्तिमान्भवेत् । चतुर्विंशतिसंज्ञं च चतुष्टयमुदाहृतम्
adhīśasahitānnityaṁ pūjayanbhaktimānbhavet caturviṁśatisaṁjñaṁ ca catuṣṭayamudāhṛtam
जो इन्हें उनके अधिष्ठाता देवों सहित नित्य पूजता है, वह भक्तिमान् हो जाता है। इस प्रकार चौबीस की संज्ञा वाला यह चतुष्टय कहा गया है —
श्लोक 13 (skanda.6.244.13)
एतच्चतुष्टयं नृणां धर्मकामार्थमोक्षदम् । यः शृणोति नरो भक्त्तया पठेद्वापि समाहितः
etaccatuṣṭayaṁ nṛṇāṁ dharmakāmārthamokṣadam yaḥ śṛṇoti naro bhakttayā paṭhedvāpi samāhitaḥ
— यह चतुष्टय मनुष्यों को धर्म, काम, अर्थ तथा मोक्ष प्रदान करने वाला है। जो मनुष्य भक्तिपूर्वक और एकाग्रचित्त होकर इसे सुनता है अथवा पढ़ता है,
श्लोक 14 (skanda.6.244.14)
भूतसर्गस्य गोप्ताऽसौ हरिस्तस्य प्रसीदति
bhūtasargasya goptā'sau haristasya prasīdati
— प्राणियों की सृष्टि के रक्षक वे हरि उस पर प्रसन्न होते हैं।