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नागर खण्ड · अध्याय 245

शिव-पार्वती विवाह एवं तारकासुर से पीड़ित देवों की व्यथा का वर्णन

अध्याय 244अध्याय-सूचीअध्याय 246

श्लोक 1 (skanda.6.245.1)

पैजवन उवाच । शालिग्रामशिलायां च जगदादिः सनातनः । कथं पाषाणतां प्राप्तो गण्डक्यां तच्च मे वद

paijavana uvāca śāligrāmaśilāyāṁ ca jagadādiḥ sanātanaḥ kathaṁ pāṣāṇatāṁ prāpto gaṇḍakyāṁ tacca me vada

पैजवन ने कहा — जगत् के सनातन आदि-कारण भगवान् शालिग्राम-शिला में गण्डकी नदी में किस प्रकार पाषाणत्व को प्राप्त हुए, यह मुझे बताइए।

श्लोक 2 (skanda.6.245.2)

त्वत्प्रसादेन विप्रर्षे हरौ भक्तिर्दृढा भवेत् । भवंतस्तीर्थरूपा हि दर्शनात्पापहारिणः

tvatprasādena viprarṣe harau bhaktirdṛḍhā bhavet bhavaṁtastīrtharūpā hi darśanātpāpahāriṇaḥ

हे विप्रर्षे, आपकी कृपा से हरि में मेरी भक्ति दृढ़ हो जाए; क्योंकि आप स्वयं तीर्थस्वरूप हैं, जिनके दर्शनमात्र से पापों का नाश हो जाता है।

श्लोक 3 (skanda.6.245.3)

तीर्थामृतावगाहेन यथा पवित्रता नृणाम् । भवद्वाक्यामृताज्जाता तथा मम न संशयः

tīrthāmṛtāvagāhena yathā pavitratā nṛṇām bhavadvākyāmṛtājjātā tathā mama na saṁśayaḥ

जिस प्रकार तीर्थों के अमृतरूपी जल में स्नान करने से मनुष्यों को पवित्रता प्राप्त होती है, उसी प्रकार आपकी वाणी के अमृत से मुझे पवित्रता प्राप्त हुई है, इसमें संशय नहीं है।

श्लोक 4 (skanda.6.245.4)

गालव उवाच । इतिहासस्त्वयं पुण्यः पुराणेषु च पठ्यते । यथा स एव भगवाञ्छालिग्रामत्वमागतः

gālava uvāca itihāsastvayaṁ puṇyaḥ purāṇeṣu ca paṭhyate yathā sa eva bhagavāñchāligrāmatvamāgataḥ

गालव ने कहा — यह पुण्य इतिहास पुराणों में पढ़ा जाता है, कि कैसे वे ही भगवान् शालिग्रामत्व को प्राप्त हुए।

श्लोक 5 (skanda.6.245.5)

महेश्वरश्च लिंगत्वं कथयेऽहं तवाऽनघ । पूर्वं प्रजापतिर्दक्षो ब्रह्मणोंऽगुष्ठसंभवः

maheśvaraśca liṁgatvaṁ kathaye'haṁ tavā'nagha pūrvaṁ prajāpatirdakṣo brahmaṇoṁ'guṣṭhasaṁbhavaḥ

हे अनघ, महेश्वर किस प्रकार लिंग-रूप को प्राप्त हुए, यह भी मैं तुम्हें बताता हूँ। पूर्वकाल में प्रजापति दक्ष ब्रह्मा के अंगूठे से उत्पन्न हुए थे।

श्लोक 6 (skanda.6.245.6)

तस्यासीद्दुहिता साध्वी सतीनाम्नी सुलक्षणा । हरेणोढा विधिज्ञेन वेदोक्तविधिना ततः

tasyāsīdduhitā sādhvī satīnāmnī sulakṣaṇā hareṇoḍhā vidhijñena vedoktavidhinā tataḥ

उनकी एक साध्वी, सुलक्षणा पुत्री थी, जिसका नाम सती था; तत्पश्चात् विधिज्ञ हर ने उसे वेदोक्त विधि से विवाहा।

श्लोक 7 (skanda.6.245.7)

स चकार महायज्ञे हरद्वेषं विमूढधीः । तेन द्वेषेण महता सती प्रकुपिता भृशम्

sa cakāra mahāyajñe haradveṣaṁ vimūḍhadhīḥ tena dveṣeṇa mahatā satī prakupitā bhṛśam

उस मोहित बुद्धि वाले दक्ष ने महायज्ञ में हर के प्रति द्वेष किया; उस महान द्वेष से सती अत्यंत क्रुद्ध हो गईं।

श्लोक 8 (skanda.6.245.8)

यज्ञवेद्यां समागम्य वह्निधारणया तदा । प्राणायामपरा भूत्वा देहोत्सर्गं चकार सा

yajñavedyāṁ samāgamya vahnidhāraṇayā tadā prāṇāyāmaparā bhūtvā dehotsargaṁ cakāra sā

यज्ञ-वेदी पर जाकर, अग्नि को धारण करके, तब प्राणायाम में तत्पर होकर उन्होंने अपने शरीर का त्याग कर दिया।

श्लोक 9 (skanda.6.245.9)

पितृभागं परित्यज्य स्वभागेन युता सती । मनसा ध्यानमगमच्छीतलं च हिमालयम्

pitṛbhāgaṁ parityajya svabhāgena yutā satī manasā dhyānamagamacchītalaṁ ca himālayam

पिता के भाग को त्यागकर, अपने ही भाग से युक्त सती ने मन से शीतल हिमालय का ध्यान किया।

श्लोक 10 (skanda.6.245.10)

यत्रयत्र मनो याति स्वकर्मवशगं मृतौ । अवतारस्तत्रतत्र जायते नात्र संशयः

yatrayatra mano yāti svakarmavaśagaṁ mṛtau avatārastatratatra jāyate nātra saṁśayaḥ

मृत्यु के समय अपने कर्मों के वशीभूत मन जहाँ-जहाँ जाता है, वहीं-वहीं पुनर्जन्म होता है, इसमें संशय नहीं है।

श्लोक 11 (skanda.6.245.11)

दह्यमाना हि सा देवी हिमालयसुताऽभवत् । तत्र सा पार्वती भूत्वा तप उग्रं समाश्रिता

dahyamānā hi sā devī himālayasutā'bhavat tatra sā pārvatī bhūtvā tapa ugraṁ samāśritā

जलती हुई वह देवी हिमालय की पुत्री बनीं; वहाँ पार्वती बनकर उन्होंने उग्र तप का आश्रय लिया।

श्लोक 12 (skanda.6.245.12)

शिवभक्तिरता नित्यं हरव्रतपरायणा । शृंगे हिमवतः पुत्री मनो न्यस्य महेश्वरे

śivabhaktiratā nityaṁ haravrataparāyaṇā śṛṁge himavataḥ putrī mano nyasya maheśvare

शिव-भक्ति में नित्य अनुरक्त, हर-व्रत में परायण, हिमालय की वह पुत्री शिखर पर अपना मन महेश्वर में लगाकर स्थित रहीं।

श्लोक 13 (skanda.6.245.13)

ततो वर्षसहस्रांते भगवान्भूतभावनः । अथाजगाम तं देशं विप्ररूपो महेश्वरः

tato varṣasahasrāṁte bhagavānbhūtabhāvanaḥ athājagāma taṁ deśaṁ viprarūpo maheśvaraḥ

तत्पश्चात् एक सहस्र वर्ष के अंत में, प्राणियों के उत्पत्तिकर्ता भगवान् महेश्वर, ब्राह्मण के रूप में उस स्थान पर आए।

श्लोक 14 (skanda.6.245.14)

तां ज्ञात्वा तपसा शुद्धां कर्मभावैः परीक्षितैः । ततो दिव्यवपुर्भूत्वा करे जग्राह पार्वतीम्

tāṁ jñātvā tapasā śuddhāṁ karmabhāvaiḥ parīkṣitaiḥ tato divyavapurbhūtvā kare jagrāha pārvatīm

उन्हें तप से शुद्ध, तथा कर्मों और भावों से परीक्षित जानकर, तब दिव्य रूप धारण करके उन्होंने पार्वती का हाथ ग्रहण किया।

श्लोक 15 (skanda.6.245.15)

तपसा निर्जितश्चास्मि करवाणि च किं प्रियम् । ततः प्राह महेशानं प्रमाणं मे पिता गुरुः

tapasā nirjitaścāsmi karavāṇi ca kiṁ priyam tataḥ prāha maheśānaṁ pramāṇaṁ me pitā guruḥ

(उन्होंने कहा) — मैं तुम्हारे तप से जीत लिया गया हूँ, बताओ तुम्हारे लिए क्या प्रिय करूँ? तब पार्वती ने महेश से कहा — मेरे लिए मेरे पिता ही प्रमाण और गुरु हैं।

श्लोक 16 (skanda.6.245.16)

सप्तर्षीन्स तथोक्तस्तु प्रेषयामास शंकरः । ते तत्र गत्वा समयं वक्तुं हिमवता सह

saptarṣīnsa tathoktastu preṣayāmāsa śaṁkaraḥ te tatra gatvā samayaṁ vaktuṁ himavatā saha

इस प्रकार कहे जाने पर शंकर ने सप्तर्षियों को भेजा; वे वहाँ जाकर हिमवान् के साथ विवाह का समय निश्चित करने के लिए गए।

श्लोक 17 (skanda.6.245.17)

निवेद्य च महेशानं प्रेषिता मुनयो ययुः । ततो लग्नदिने देवा महेन्द्रादय ईश्वरम्

nivedya ca maheśānaṁ preṣitā munayo yayuḥ tato lagnadine devā mahendrādaya īśvaram

महेश की ओर से निवेदन करके भेजे गए वे मुनि लौट गए; तत्पश्चात् लग्न के दिन इन्द्र आदि देवगण ईश्वर के पास —

श्लोक 18 (skanda.6.245.18)

ब्रह्मविष्णुपुरोगाश्च पुरोधायाग्निमाययुः । योगसिद्धा समायांतं वरवेषं वृषध्वजम्

brahmaviṣṇupurogāśca purodhāyāgnimāyayuḥ yogasiddhā samāyāṁtaṁ varaveṣaṁ vṛṣadhvajam

— ब्रह्मा और विष्णु को आगे करके, अग्नि को प्रमुख बनाकर वहाँ पहुँचे, जब वृषभध्वज शिव, योगसिद्ध होकर, वरवेश धारण किए हुए आ रहे थे।

श्लोक 19 (skanda.6.245.19)

हिमवान्पूजयामास मधुपर्कादिकैः शुभैः । उपचारैर्मुदा युक्तो मानयन्कृतकृत्यताम्

himavānpūjayāmāsa madhuparkādikaiḥ śubhaiḥ upacārairmudā yukto mānayankṛtakṛtyatām

हिमवान् ने मधुपर्क आदि शुभ उपचारों से उनकी पूजा की; हर्ष से युक्त होकर, अपने कृतकृत्य होने का सम्मान करते हुए उन्होंने यह सब किया।

श्लोक 20 (skanda.6.245.20)

वेदोक्तेन विधानेन तां कन्यां समयोजयत् । पाणिग्रहेण विधिना द्विजातिगणसंवृतः

vedoktena vidhānena tāṁ kanyāṁ samayojayat pāṇigraheṇa vidhinā dvijātigaṇasaṁvṛtaḥ

वेदोक्त विधि से उस कन्या को विधिपूर्वक विवाह में योजित किया, द्विजातियों के समूह से घिरे हुए पाणिग्रहण विधि के द्वारा।

श्लोक 21 (skanda.6.245.21)

वह्निं प्रदक्षिणीकृत्य गिरीशस्तदनन्तरम् । दानकाले च गोत्रादि पृष्टो लज्जापरो हर

vahniṁ pradakṣiṇīkṛtya girīśastadanantaram dānakāle ca gotrādi pṛṣṭo lajjāparo hara

अग्नि की प्रदक्षिणा करके, गिरीश ने तत्पश्चात् (कन्यादान संपन्न किया); दान के समय गोत्र आदि पूछे जाने पर हर लज्जा से भर गए।

श्लोक 22 (skanda.6.245.22)

ब्रह्मणो वचनात्तेन विधिशेषोऽवशेषितः । चरुप्राशनकाले तु पंचवक्त्रप्रकाशकृत्

brahmaṇo vacanāttena vidhiśeṣo'vaśeṣitaḥ caruprāśanakāle tu paṁcavaktraprakāśakṛt

ब्रह्मा के वचन से शेष विधि उनके द्वारा पूर्ण की गई। चरु-प्राशन के समय अपने पंच मुखों को प्रकट करने वाले —

श्लोक 23 (skanda.6.245.23)

सहितः सकलैर्देवैः कुतूहलपरायणः । गिरिजार्थं समायुक्तो वरः सोऽपि महेश्वरः

sahitaḥ sakalairdevaiḥ kutūhalaparāyaṇaḥ girijārthaṁ samāyukto varaḥ so'pi maheśvaraḥ

— समस्त देवों सहित, कौतूहल में परायण, वे वर महेश्वर भी गिरिजा के लिए (उस विधि में) संयुक्त हुए।

श्लोक 24 (skanda.6.245.24)

नवकोटिमुखां दृष्ट्वा साट्टहासो जनोऽभवत् । वैदिकी श्रुतिरित्युक्ता शिव त्वं स्थिरतां व्रज

navakoṭimukhāṁ dṛṣṭvā sāṭṭahāso jano'bhavat vaidikī śrutirityuktā śiva tvaṁ sthiratāṁ vraja

उनके नौ करोड़ मुखों को देखकर लोग ठहाका मारकर हँस पड़े; तब वैदिक श्रुति ने कहा — हे शिव, तुम स्थिरता को प्राप्त हो।

श्लोक 25 (skanda.6.245.25)

लज्जिता सा परित्यागं नाकरोत्पंचजन्मसु । भर्त्तारमसितापांगी हरमेवाभ्यगच्छत

lajjitā sā parityāgaṁ nākarotpaṁcajanmasu bharttāramasitāpāṁgī haramevābhyagacchata

लज्जित होते हुए भी उन्होंने पाँच जन्मों तक उनका त्याग नहीं किया; काले नेत्रों वाली वह देवी हर को ही अपना पति मानकर उनके पास गईं।

श्लोक 26 (skanda.6.245.26)

देवानां पर्वतानां च प्रहृष्टं सकलं कुलम् । ततो विवाहे संपूर्णे हरोऽगात्कौतुकौकसि

devānāṁ parvatānāṁ ca prahṛṣṭaṁ sakalaṁ kulam tato vivāhe saṁpūrṇe haro'gātkautukaukasi

देवताओं और पर्वतों का सम्पूर्ण कुल अत्यंत हर्षित हुआ; तत्पश्चात् विवाह पूर्ण होने पर हर उत्सव-गृह को गए।

श्लोक 27 (skanda.6.245.27)

गणानां चापि सान्निध्ये सा नामर्षयदंबिका । पारिबर्हं ततो दत्त्वा शैलेन स विसर्जितः

gaṇānāṁ cāpi sānnidhye sā nāmarṣayadaṁbikā pāribarhaṁ tato dattvā śailena sa visarjitaḥ

गणों की उपस्थिति में भी अंबिका ने कोई अप्रसन्नता नहीं दिखाई; तत्पश्चात् वैवाहिक उपहार देकर पर्वतराज ने उन्हें विदा किया।

श्लोक 28 (skanda.6.245.28)

मानितः सत्कृतश्चापि मन्दराचलमभ्यगात् । विश्वकर्मा ततस्तस्य क्षणेन मणिमद्गृहम्

mānitaḥ satkṛtaścāpi mandarācalamabhyagāt viśvakarmā tatastasya kṣaṇena maṇimadgṛham

सम्मानित और सत्कृत होकर वे मंदराचल पर्वत की ओर गए; तत्पश्चात् विश्वकर्मा ने उनके लिए क्षणमात्र में मणिमय भवन —

श्लोक 29 (skanda.6.245.29)

निर्ममे देवदेवस्य स्वेच्छावर्द्धिष्णुमंदिरम् । सर्वर्द्धिमत्प्रशस्ताभं मणिविद्रुमभूषितम्

nirmame devadevasya svecchāvarddhiṣṇumaṁdiram sarvarddhimatpraśastābhaṁ maṇividrumabhūṣitam

— देवाधिदेव के लिए इच्छानुसार बढ़ने वाला मंदिर निर्मित किया, जो सर्व-समृद्धिमय, प्रशस्त कांतिमय, मणि और मूँगे से अलंकृत था,

श्लोक 30 (skanda.6.245.30)

स्थूणासहस्रसंयुक्तं मणिवेदिमनोहरम् । गणा नंदिप्रभृतयो यस्य द्वारि समाश्रिताः

sthūṇāsahasrasaṁyuktaṁ maṇivedimanoharam gaṇā naṁdiprabhṛtayo yasya dvāri samāśritāḥ

सहस्र स्तंभों से युक्त, मनोहर मणि-वेदि वाला; जिसके द्वार पर नंदी आदि गण आश्रय लेकर खड़े रहते थे,

श्लोक 31 (skanda.6.245.31)

त्रिनेत्राः शूलहस्ताश्च बभुः शंकररूपिणः । वाटिका अस्य परितः पारिजाताः सहस्रशः

trinetrāḥ śūlahastāśca babhuḥ śaṁkararūpiṇaḥ vāṭikā asya paritaḥ pārijātāḥ sahasraśaḥ

जो त्रिनेत्र, शूलधारी, शंकर के ही रूप में सुशोभित थे। उसके चारों ओर पारिजात वृक्षों के सहस्रों उद्यान थे;

श्लोक 32 (skanda.6.245.32)

कामधेनुर्मणिर्दिव्यो यस्य द्वारि समाश्रितौ । तस्मिन्मनोहरतरे कामवृद्धिकरे गृहे

kāmadhenurmaṇirdivyo yasya dvāri samāśritau tasminmanoharatare kāmavṛddhikare gṛhe

जिसके द्वार पर कामधेनु तथा एक दिव्य मणि स्थापित थे। उस अत्यंत मनोहर, समस्त कामनाओं को बढ़ाने वाले भवन में —

श्लोक 33 (skanda.6.245.33)

पार्वत्या वसतः सार्द्धं कामो दृष्टिपथं ययौ । वायुरूपः शिवं दृष्ट्वा कामः प्रोवाच शंकरम्

pārvatyā vasataḥ sārddhaṁ kāmo dṛṣṭipathaṁ yayau vāyurūpaḥ śivaṁ dṛṣṭvā kāmaḥ provāca śaṁkaram

— पार्वती के साथ निवास करते हुए उनकी दृष्टि के मार्ग में काम आ गया। वायुरूप धारण किए हुए काम ने शिव को देखकर शंकर से कहा —

श्लोक 34 (skanda.6.245.34)

नमस्ते सर्वरूपाय नमस्ते वृषभध्वज । नमस्ते गणनाथाय पाहि नाथ नमोऽस्तु ते

namaste sarvarūpāya namaste vṛṣabhadhvaja namaste gaṇanāthāya pāhi nātha namo'stu te

आपको नमस्कार है, जो सर्वरूप हैं; हे वृषभध्वज, आपको नमस्कार है। हे गणनाथ, आपको नमस्कार है; हे नाथ, मेरी रक्षा कीजिए, आपको नमस्कार हो।

श्लोक 35 (skanda.6.245.35)

त्वया विरहितं लोकं शववत्स्पृशते मही । न त्वया रहितं किञ्चिद्दृश्यते सचराचरे

tvayā virahitaṁ lokaṁ śavavatspṛśate mahī na tvayā rahitaṁ kiñciddṛśyate sacarācare

आपसे रहित इस लोक को पृथ्वी शव के समान स्पर्श करती है; आपके बिना चराचर में कुछ भी दिखाई नहीं देता।

श्लोक 36 (skanda.6.245.36)

त्वं गोप्ता त्वं विधाता च लोकसंहारकारकः । कृपां कुरु महादेव देहदानं प्रयच्छ मे

tvaṁ goptā tvaṁ vidhātā ca lokasaṁhārakārakaḥ kṛpāṁ kuru mahādeva dehadānaṁ prayaccha me

आप ही रक्षक हैं, आप ही विधाता हैं, तथा आप ही लोकों के संहारक हैं। हे महादेव, कृपा कीजिए, मुझे शरीर का दान प्रदान कीजिए।

श्लोक 37 (skanda.6.245.37)

ईश्वर उवाच । यन्मया त्वं पुरा दग्धः पर्वते पुरतोऽनघ । तस्या एव समीपे त्वं पुनर्भव स्वदेहवान्

īśvara uvāca yanmayā tvaṁ purā dagdhaḥ parvate purato'nagha tasyā eva samīpe tvaṁ punarbhava svadehavān

ईश्वर ने कहा — हे अनघ, जिस कारण मैंने तुम्हें पर्वत पर पूर्वकाल में भस्म किया था, उसी की समीपता में तुम पुनः अपने शरीर से युक्त हो जाओ।

श्लोक 38 (skanda.6.245.38)

एवमुक्तस्ततः कामः स्वशरीरमुपागतः । ववंदे चरणौ शूद्र विनयावनतोऽभवत्

evamuktastataḥ kāmaḥ svaśarīramupāgataḥ vavaṁde caraṇau śūdra vinayāvanato'bhavat

इस प्रकार कहे जाने पर काम अपने शरीर को पुनः प्राप्त हुआ; हे शूद्र, उसने चरणों में वंदना की और विनयपूर्वक झुक गया।

श्लोक 39 (skanda.6.245.39)

ततो ननाम चरणौ पार्वत्याः संप्रहृष्टवान् । लब्धप्रसादस्तु तयोः समीपाद्भुवनत्रये

tato nanāma caraṇau pārvatyāḥ saṁprahṛṣṭavān labdhaprasādastu tayoḥ samīpādbhuvanatraye

तत्पश्चात् अत्यंत हर्षित होकर उसने पार्वती के चरणों में भी प्रणाम किया; उन दोनों से कृपा प्राप्त करके वह त्रिभुवन में —

श्लोक 40 (skanda.6.245.40)

चचार सुमहातेजा महामोहबलान्वितः । पुष्पधन्वा पुष्पबाणस्त्वाकुञ्चितशिरोरुहः

cacāra sumahātejā mahāmohabalānvitaḥ puṣpadhanvā puṣpabāṇastvākuñcitaśiroruhaḥ

— अत्यंत तेजस्वी, महामोह की शक्ति से युक्त होकर विचरण करने लगा, पुष्प-धनुष और पुष्प-बाण लिए, घुँघराले केशों वाला,

श्लोक 41 (skanda.6.245.41)

सदा घूर्णितनेत्रश्च तयोर्देहमुपाविशत् । दिव्यासवैर्दिव्यगंधैर्वस्त्रमाल्यादिभिस्तथा

sadā ghūrṇitanetraśca tayordehamupāviśat divyāsavairdivyagaṁdhairvastramālyādibhistathā

सदा मदमत्त नेत्रों वाला वह उन दोनों के शरीरों में समा गया। दिव्य मदिराओं, दिव्य सुगंधों, तथा वस्त्र-माला आदि से —

श्लोक 42 (skanda.6.245.42)

सख्यः संभोगसमये परिचक्रुः समंततः । एवं प्रक्रीडतस्तस्य वत्सराणां शतं ययौ

sakhyaḥ saṁbhogasamaye paricakruḥ samaṁtataḥ evaṁ prakrīḍatastasya vatsarāṇāṁ śataṁ yayau

— उनकी सखियाँ भोग के समय चारों ओर उनकी सेवा में तत्पर रहीं। इस प्रकार क्रीड़ा करते हुए उसके सौ वर्ष बीत गए,

श्लोक 43 (skanda.6.245.43)

साग्रमेका निशा यद्वन्मैथुने सक्तचेतसः । एतस्मिन्नंतरे देवास्तारकप्रद्रुता भयात् । ब्रह्माणं शरणं जग्मुः स्तुत्वा तं शरणं गताः

sāgramekā niśā yadvanmaithune saktacetasaḥ etasminnaṁtare devāstārakapradrutā bhayāt brahmāṇaṁ śaraṇaṁ jagmuḥ stutvā taṁ śaraṇaṁ gatāḥ

जो मैथुन में आसक्त-चित्त उनके लिए मानो कुछ अधिक की एक ही रात्रि के समान बीत गए। इसी बीच तारकासुर के भय से भागे हुए देवगण ब्रह्मा की शरण में गए, उनकी स्तुति करके शरणागत हुए।

श्लोक 44 (skanda.6.245.44)

देवा उचुः । तारकोऽसौ महारौद्रस्त्वया दत्तवरः पुरा

devā ucuḥ tārako'sau mahāraudrastvayā dattavaraḥ purā

देवों ने कहा — यह अत्यंत भयंकर तारक, जिसे आपने पूर्वकाल में वर दिया था,

श्लोक 45 (skanda.6.245.45)

विजित्य तरसा शक्रं भुंक्ते त्रैलोक्यपूजितः । वधोपायो यथा तस्य जायते त्वं कुरु स्वयम्

vijitya tarasā śakraṁ bhuṁkte trailokyapūjitaḥ vadhopāyo yathā tasya jāyate tvaṁ kuru svayam

बल से इन्द्र को जीतकर त्रैलोक्य-पूजित होकर भोग कर रहा है। उसके वध का जो उपाय हो, आप स्वयं वह कीजिए।

श्लोक 46 (skanda.6.245.46)

ब्रह्मा उवाच । मया दत्तवरश्चासौ मयैवोच्छिद्यते नहि । स्वयं संवर्ध्य कटुकं छेत्तुं कोऽपि न चार्हति

brahmā uvāca mayā dattavaraścāsau mayaivocchidyate nahi svayaṁ saṁvardhya kaṭukaṁ chettuṁ ko'pi na cārhati

ब्रह्मा ने कहा — जिसे मैंने वर दिया, वह मेरे द्वारा ही नष्ट नहीं किया जा सकता। स्वयं जिसे बढ़ाया गया हो, उस कटु वृक्ष को काटने का अधिकार किसी को नहीं है।

श्लोक 47 (skanda.6.245.47)

तस्मात्तस्य वधोपायं कथयामि महात्मनः । पार्वत्यां यो महेशानात्सूनुरुत्पत्स्यते हि सः

tasmāttasya vadhopāyaṁ kathayāmi mahātmanaḥ pārvatyāṁ yo maheśānātsūnurutpatsyate hi saḥ

अतः उस महात्मा के वध का उपाय मैं तुम्हें बताता हूँ। पार्वती में महेश से जो पुत्र उत्पन्न होगा,

श्लोक 48 (skanda.6.245.48)

दिनसप्तकवान्भूत्वा तारकं स हनिष्यति । इति वाक्यं तु ते श्रुत्वा मंदरं लोकसुंदरम्

dinasaptakavānbhūtvā tārakaṁ sa haniṣyati iti vākyaṁ tu te śrutvā maṁdaraṁ lokasuṁdaram

वही सात दिन का होकर तारक का वध करेगा। यह वचन सुनकर वे देवगण लोकसुंदर मंदराचल की ओर —

श्लोक 49 (skanda.6.245.49)

ब्रह्मलोकात्समाजग्मुः पीडिता दैत्यदानवैः

brahmalokātsamājagmuḥ pīḍitā daityadānavaiḥ

— दैत्यों और दानवों से पीड़ित होकर ब्रह्मलोक से एक साथ चल पड़े।

श्लोक 50 (skanda.6.245.50)

तत्र नंदिप्रभृतयो गणाः शूलभृतः पुरः । गृहद्वारे ह्युपावृत्य तस्थुः संयतचेतसः

tatra naṁdiprabhṛtayo gaṇāḥ śūlabhṛtaḥ puraḥ gṛhadvāre hyupāvṛtya tasthuḥ saṁyatacetasaḥ

वहाँ नंदी आदि शूलधारी गण द्वार के आगे घूमकर संयत चित्त से खड़े हो गए।

श्लोक 51 (skanda.6.245.51)

देवा ऊचुः । देवाश्च दुःखातुरचेतसो भृशं हतप्रभास्त्यक्तगृहाश्रयाखिलाः । संप्राप्य मासांश्चतुरः स्तपः स्थिता देवे प्रसुप्ते हरतोषणं परम्

devā ūcuḥ devāśca duḥkhāturacetaso bhṛśaṁ hataprabhāstyaktagṛhāśrayākhilāḥ saṁprāpya māsāṁścaturaḥ stapaḥ sthitā deve prasupte haratoṣaṇaṁ param

देवों ने कहा — हम देवगण, दुःख से आतुर चित्त, अपनी सम्पूर्ण कांति खोकर, अपने-अपने घरों और आश्रयों का त्याग कर, चातुर्मास आने पर हरि की परम प्रसन्नता के लिए, देव के शयन-काल में तप में स्थित हैं।

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