Skip to main content

नागर खण्ड · अध्याय 246

पार्वती द्वारा देवों को शाप एवं बिल्वपत्र-महिमा का वर्णन

अध्याय 245अध्याय-सूचीअध्याय 247

श्लोक 1 (skanda.6.246.1)

गालव उवाच । शक्रादयस्तु देवेशा दुःखसंतप्तमानसाः । ईश्वरादर्शनभ्रांतमनः कर्मेंद्रियारतिम्

gālava uvāca śakrādayastu deveśā duḥkhasaṁtaptamānasāḥ īśvarādarśanabhrāṁtamanaḥ karmeṁdriyāratim

गालव ने कहा — इन्द्र आदि देवगण, दुःख से संतप्त मन वाले, ईश्वर के अदर्शन से भ्रांत मन वाले, तथा कर्मेन्द्रियों में अरति को प्राप्त —

श्लोक 2 (skanda.6.246.2)

न प्रापुर्लोकनाथं ते कृत्वा यः प्रतिमाकृतिम् । तपसाराधयामासुः सर्वभूतहृदिस्थितम्

na prāpurlokanāthaṁ te kṛtvā yaḥ pratimākṛtim tapasārādhayāmāsuḥ sarvabhūtahṛdisthitam

— उन्हें लोकनाथ की प्राप्ति नहीं हुई; अतः उन्होंने एक प्रतिमा बनाकर, समस्त प्राणियों के हृदय में स्थित उन्हीं की तप से आराधना की —

श्लोक 3 (skanda.6.246.3)

कपर्दशिरसं देवं शूलहस्तं पिनाकिनम् । कपालखट्वांगधरं दशहस्तं किरीटिनम्

kapardaśirasaṁ devaṁ śūlahastaṁ pinākinam kapālakhaṭvāṁgadharaṁ daśahastaṁ kirīṭinam

— जटाधारी देव को, शूलधारी, पिनाकधारी को, कपाल और खट्वांग धारण करने वाले, दस भुजाओं वाले, मुकुटधारी को,

श्लोक 4 (skanda.6.246.4)

उमासहितमीशानं पंचवक्त्रं महाभुजम् । कर्पूरगौरदेहाभं सितभूतिविभूषितम्

umāsahitamīśānaṁ paṁcavaktraṁ mahābhujam karpūragauradehābhaṁ sitabhūtivibhūṣitam

उमा सहित ईशान को, पंचमुख, महाभुज, कर्पूर के समान गौर शरीर वाले, श्वेत भस्म से विभूषित को,

श्लोक 5 (skanda.6.246.5)

नागयज्ञोपवीतेन गजचर्मसमन्वितम् । कृष्णसारत्वचा चापि कृतप्रावरणं विभुम्

nāgayajñopavītena gajacarmasamanvitam kṛṣṇasāratvacā cāpi kṛtaprāvaraṇaṁ vibhum

सर्प के यज्ञोपवीत वाले, गजचर्म से युक्त, तथा कृष्णमृग की त्वचा से आवरण किए हुए उन विभु को —

श्लोक 6 (skanda.6.246.6)

कृतध्यानाः सुरास्तत्र वृक्षाधारे समाश्रिताः । व्रतचर्यां समाश्रित्य प्रचक्रुस्तप उत्तमम् । षडक्षरेण मंत्रेण शैवेन विहिताः सुराः

kṛtadhyānāḥ surāstatra vṛkṣādhāre samāśritāḥ vratacaryāṁ samāśritya pracakrustapa uttamam ṣaḍakṣareṇa maṁtreṇa śaivena vihitāḥ surāḥ

वहाँ वृक्षों का आश्रय लेकर देवगण ध्यान में स्थित हो गए; व्रत-आचरण का आश्रय लेकर उन्होंने उत्तम तप किया, षडक्षर शैव मन्त्र से नियोजित होकर।

श्लोक 7 (skanda.6.246.7)

शूद्र उवाच । व्रतचर्या त्वया या सा प्रोक्ता संजायते कथम्

śūdra uvāca vratacaryā tvayā yā sā proktā saṁjāyate katham

शूद्र (पैजवन) ने कहा — यह व्रत-आचरण जो आपने बताया, वह कैसे संपन्न होता है?

श्लोक 8 (skanda.6.246.8)

ब्रह्मन्विस्तरतो ब्रूहि न तृप्येते वचोऽमृतैः

brahmanvistarato brūhi na tṛpyete vaco'mṛtaiḥ

हे ब्रह्मन्, इसे विस्तार से बताइए; मैं आपके वचनामृत से तृप्त नहीं होता।

श्लोक 9 (skanda.6.246.9)

गालव उवाच । जपन्भस्म च खट्वांगं कपालं स्फाटिकं तथा । रुंडमालां पंचवक्त्रमर्द्धचंद्रं च मूर्द्धनि

gālava uvāca japanbhasma ca khaṭvāṁgaṁ kapālaṁ sphāṭikaṁ tathā ruṁḍamālāṁ paṁcavaktramarddhacaṁdraṁ ca mūrddhani

गालव ने कहा — मन्त्रजप करते हुए, भस्म, खट्वांग, कपाल, तथा स्फटिक की माला, मुण्डमाला, पंचमुखता, तथा सिर पर अर्धचन्द्र,

श्लोक 10 (skanda.6.246.10)

चित्रकृत्तिपरीधानं कौपीनकुण्डलद्वयम् । घंटायुग्मं त्रिशूलं च सूत्रं चर्यास्वरूपकम्

citrakṛttiparīdhānaṁ kaupīnakuṇḍaladvayam ghaṁṭāyugmaṁ triśūlaṁ ca sūtraṁ caryāsvarūpakam

चित्रित मृगचर्म का वस्त्र, कौपीन, दोनों कुण्डल, घंटा-युग्म, त्रिशूल, तथा सूत्र — यही व्रताचरण का स्वरूप है।

श्लोक 11 (skanda.6.246.11)

अमीभिर्लक्षणैर्लक्ष्यं मयोक्तं तव शूद्रज । अनेन विधिना सर्वे देवा वह्निपुरोगमाः

amībhirlakṣaṇairlakṣyaṁ mayoktaṁ tava śūdraja anena vidhinā sarve devā vahnipurogamāḥ

हे शूद्रज, इन्हीं लक्षणों से पहचाने जाने वाले उस ध्येय को मैंने तुम्हें बताया। इसी विधि से अग्नि को आगे करके समस्त देवों ने —

श्लोक 12 (skanda.6.246.12)

सर्व आराधयामासुः सर्वोपायैर्वरप्रदम् । चातुर्मास्ये च संपूर्णे सपूर्णे कार्तिकेऽमले

sarva ārādhayāmāsuḥ sarvopāyairvarapradam cāturmāsye ca saṁpūrṇe sapūrṇe kārtike'male

— सभी उपायों से उस वरदायक देव की आराधना की; और चातुर्मास्य के पूर्ण होने पर, निर्मल कार्तिक मास के पूर्ण होने पर,

श्लोक 13 (skanda.6.246.13)

चीर्णव्रतान्सुरान्दृष्ट्वा विशुद्धांश्च महेश्वरः । मतिं तेषां ददौ तुष्टो जीवात्मा सर्वभूतदृक्

cīrṇavratānsurāndṛṣṭvā viśuddhāṁśca maheśvaraḥ matiṁ teṣāṁ dadau tuṣṭo jīvātmā sarvabhūtadṛk

व्रत पूर्ण कर चुके, विशुद्ध हो चुके देवों को देखकर, समस्त प्राणियों के जीवात्मा और द्रष्टा महेश्वर ने प्रसन्न होकर उन्हें सद्बुद्धि प्रदान की।

श्लोक 14 (skanda.6.246.14)

शतरुद्रीयजाप्येन विधानसहितेन च । ध्यानेन दीपदानेन चातुर्मास्ये तुतोष सः

śatarudrīyajāpyena vidhānasahitena ca dhyānena dīpadānena cāturmāsye tutoṣa saḥ

शतरुद्रीय के विधानपूर्वक जप से, ध्यान से, तथा दीपदान से, चातुर्मास्य में वे प्रसन्न हुए।

श्लोक 15 (skanda.6.246.15)

पूजनैः षोडशविधैर्यथा विष्णोस्तथा हरे । कुर्वाणान्भक्तिभावेन ज्ञात्वा देवान्समागतान्

pūjanaiḥ ṣoḍaśavidhairyathā viṣṇostathā hare kurvāṇānbhaktibhāvena jñātvā devānsamāgatān

जैसे विष्णु की पूजा होती है, वैसे ही हर की भी षोडशोपचार पूजा भक्तिभाव से करते हुए समागत देवों को जानकर,

श्लोक 16 (skanda.6.246.16)

प्रहृष्टो भगवान्रुद्रो ददौ तेषां शुभा मतिम् । ततः संमंत्र्य ते देवा वह्निं स्तुत्वा यथार्थतः

prahṛṣṭo bhagavānrudro dadau teṣāṁ śubhā matim tataḥ saṁmaṁtrya te devā vahniṁ stutvā yathārthataḥ

अत्यंत प्रसन्न होकर भगवान् रुद्र ने उन्हें शुभ बुद्धि प्रदान की। तत्पश्चात् परस्पर मंत्रणा करके उन देवों ने यथार्थ रूप से अग्नि की स्तुति करके,

श्लोक 17 (skanda.6.246.17)

प्रसन्नवदनं चक्रुः कार्यसाधनतत्परम् । कर्मसाक्षी महातेजाः कृत्वा पारावतं वपु

prasannavadanaṁ cakruḥ kāryasādhanatatparam karmasākṣī mahātejāḥ kṛtvā pārāvataṁ vapu

उसे प्रसन्नमुख बनाकर अपने कार्य की सिद्धि में तत्पर किया। कर्मों के साक्षी, महातेजस्वी अग्निदेव ने कपोत का रूप धारण करके,

श्लोक 18 (skanda.6.246.18)

प्रविवेश ततो मध्ये द्रष्टुं देवं महेश्वरम् । चकार गतिविक्षेपं गुंठनैरवगुंठनैः

praviveśa tato madhye draṣṭuṁ devaṁ maheśvaram cakāra gativikṣepaṁ guṁṭhanairavaguṁṭhanaiḥ

तत्पश्चात् देव महेश्वर को देखने के लिए उनके मध्य में प्रवेश किया। उसने लोटने और लपेटने की मुद्राओं से अपनी गति को विचित्र बना दिया,

श्लोक 19 (skanda.6.246.19)

लुंठनैः सर्पणैश्चैव चारुरूपोऽद्भुतां गतिम् । तं दृष्ट्वा भगवांस्तत्र कारणं समबुद्ध्यत

luṁṭhanaiḥ sarpaṇaiścaiva cārurūpo'dbhutāṁ gatim taṁ dṛṣṭvā bhagavāṁstatra kāraṇaṁ samabuddhyata

लोटन और रेंगने की क्रियाओं से भी वह सुंदर पक्षी अद्भुत गति दिखाने लगा। उसे देखकर वहाँ भगवान् ने (उसके आने का) कारण समझ लिया।

श्लोक 20 (skanda.6.246.20)

ऊर्ध्वरेतास्ततस्तस्मिन्ससर्जादौ दधार तत् । वीर्यं वह्निमुखे चैव सोत्पपात गृहाद्बहिः

ūrdhvaretāstatastasminsasarjādau dadhāra tat vīryaṁ vahnimukhe caiva sotpapāta gṛhādbahiḥ

तब ऊर्ध्वरेता महादेव ने अपने वीर्य को उसमें छोड़ दिया, जिसे उसने पहले धारण कर रखा था; अग्नि के मुख में वह वीर्य लेकर वह पक्षी घर से बाहर उड़ गया।

श्लोक 21 (skanda.6.246.21)

गते तस्मिन्पतंगेऽथ पार्वती विफलश्रमा । संक्रुद्धा सर्वदेवानां सा शशाप महेश्वरी

gate tasminpataṁge'tha pārvatī viphalaśramā saṁkruddhā sarvadevānāṁ sā śaśāpa maheśvarī

उस पक्षी के चले जाने पर, अपने श्रम को विफल पाकर पार्वती अत्यंत क्रुद्ध हो गईं; उन महेश्वरी ने समस्त देवों को शाप दे दिया।

श्लोक 22 (skanda.6.246.22)

यस्मान्ममेच्छा विहता भवद्भिर्दुष्टबुद्धिभिः । तस्मात्पाषाणतामाशु व्रजंतु त्रिदिवौकसः

yasmānmamecchā vihatā bhavadbhirduṣṭabuddhibhiḥ tasmātpāṣāṇatāmāśu vrajaṁtu tridivaukasaḥ

'चूँकि तुम दुष्ट-बुद्धि वालों ने मेरी इच्छा को विफल कर दिया है, इसलिए स्वर्गवासी देवगण शीघ्र ही पाषाणत्व को प्राप्त हो जाएँ।'

श्लोक 23 (skanda.6.246.23)

निरपत्या निर्दयाश्च सर्वे देवा भविष्यथ । ततः प्रसादयामासुः प्रणताः शापयंत्रिताः

nirapatyā nirdayāśca sarve devā bhaviṣyatha tataḥ prasādayāmāsuḥ praṇatāḥ śāpayaṁtritāḥ

'तथा तुम सभी देवगण संतानहीन और निर्दय हो जाओगे।' तत्पश्चात् शाप से बद्ध हुए देवगण झुककर उन्हें प्रसन्न करने लगे,

श्लोक 24 (skanda.6.246.24)

महद्दुःखं संप्रविष्टाः पुनः पुनरथाब्रुवन्

mahadduḥkhaṁ saṁpraviṣṭāḥ punaḥ punarathābruvan

महान दुःख में डूबे हुए वे बार-बार यह कहने लगे —

श्लोक 25 (skanda.6.246.25)

देवा ऊचुः । त्वं माता सर्वदेवानां सर्वसाक्षी सनातनी । उत्पत्तिस्थितिसंहारकारणं जगतां सदा

devā ūcuḥ tvaṁ mātā sarvadevānāṁ sarvasākṣī sanātanī utpattisthitisaṁhārakāraṇaṁ jagatāṁ sadā

देवों ने कहा — आप समस्त देवों की माता हैं, सर्वसाक्षी, सनातनी हैं; आप ही सदा जगतों की उत्पत्ति, स्थिति तथा संहार का कारण हैं।

श्लोक 26 (skanda.6.246.26)

भूतप्रकृतिरूपा त्वं महाभूतसमाश्रिता । अपर्णा तपसां धात्री भूतधात्री वसुन्धरा

bhūtaprakṛtirūpā tvaṁ mahābhūtasamāśritā aparṇā tapasāṁ dhātrī bhūtadhātrī vasundharā

आप प्राणियों की मूल-प्रकृति स्वरूपा हैं, महाभूतों में आश्रित हैं; आप अपर्णा हैं, तपों की धात्री हैं, प्राणियों की धारक, वसुंधरा हैं।

श्लोक 27 (skanda.6.246.27)

मंत्राराध्या मन्त्रबीजं विश्वबीजलयस्थितिः । यज्ञादिफलदात्री च स्वाहारूपेण सर्वदा

maṁtrārādhyā mantrabījaṁ viśvabījalayasthitiḥ yajñādiphaladātrī ca svāhārūpeṇa sarvadā

आप मन्त्रों से आराध्य हैं, मन्त्रों का बीज हैं, विश्व के बीज, लय और स्थिति स्वरूपा हैं; आप ही स्वाहा-रूप से सदा यज्ञ आदि का फल देने वाली हैं।

श्लोक 28 (skanda.6.246.28)

मन्त्रयन्त्रसमोपेता ब्रह्मविष्णुशिवादिषु । नित्यरूपा महारूपा सर्वरूपा निरञ्जना

mantrayantrasamopetā brahmaviṣṇuśivādiṣu nityarūpā mahārūpā sarvarūpā nirañjanā

आप मन्त्र और यन्त्र दोनों में समान रूप से विद्यमान हैं, ब्रह्मा-विष्णु-शिव आदि में भी; आप नित्यरूपा, महारूपा, सर्वरूपा, निरंजना हैं।

श्लोक 29 (skanda.6.246.29)

दोषत्रयसमाक्रान्त जननैः श्रेयसप्रदा । महालक्ष्मीर्महाकालीमहादेवी महेश्वरी

doṣatrayasamākrānta jananaiḥ śreyasapradā mahālakṣmīrmahākālīmahādevī maheśvarī

त्रिविध दोषों से आक्रांत प्राणियों को भी आप कल्याण प्रदान करने वाली हैं; आप महालक्ष्मी, महाकाली, महादेवी, महेश्वरी हैं,

श्लोक 30 (skanda.6.246.30)

विश्वेश्वरी महामाया मायाबीजवरप्रदा । वररूपा वरेण्या त्वं वरदात्री वरासुता

viśveśvarī mahāmāyā māyābījavarapradā vararūpā vareṇyā tvaṁ varadātrī varāsutā

विश्वेश्वरी, महामाया, माया के बीजरूप वर की दात्री हैं; आप वररूपा, वरेण्या, वरदात्री, तथा (पर्वतराज की) श्रेष्ठ पुत्री हैं।

श्लोक 31 (skanda.6.246.31)

बिल्वपत्रैः शुभैर्ये त्वां पूजयन्ति नराः सदा । तेषां राज्यप्रदात्री च कामदा सिद्धिदा सदा

bilvapatraiḥ śubhairye tvāṁ pūjayanti narāḥ sadā teṣāṁ rājyapradātrī ca kāmadā siddhidā sadā

जो मनुष्य सदा शुभ बिल्वपत्रों से आपकी पूजा करते हैं, आप उनके लिए सदा राज्य देने वाली, कामनाओं की पूर्ति करने वाली, तथा सिद्धि देने वाली हैं।

श्लोक 32 (skanda.6.246.32)

चातुर्मास्येऽर्चिता यैस्त्वं बिल्वपत्रैर्विशेषतः । तेषां वांछितसिद्ध्यर्थं जाता कामदुघा स्वयम्

cāturmāsye'rcitā yaistvaṁ bilvapatrairviśeṣataḥ teṣāṁ vāṁchitasiddhyarthaṁ jātā kāmadughā svayam

जिन लोगों ने चातुर्मास्य में विशेषतः बिल्वपत्रों से आपकी अर्चना की, उनकी वांछित कामनाओं की सिद्धि के लिए आप स्वयं कामधेनु के समान हो गईं।

श्लोक 33 (skanda.6.246.33)

येऽर्चयंति सदा लोके महेश्वरसमन्विताम् । बिल्वपत्रैर्महाभक्त्या न तेषां दुःखदुष्कृती

ye'rcayaṁti sadā loke maheśvarasamanvitām bilvapatrairmahābhaktyā na teṣāṁ duḥkhaduṣkṛtī

जो लोक में महेश्वर सहित आपकी सदा बिल्वपत्रों से महाभक्तिपूर्वक पूजा करते हैं, उन्हें न तो दुःख छूता है और न कोई दुष्कृत्य।

श्लोक 34 (skanda.6.246.34)

चातुर्मास्ये विशेषेण तव पूजा महाफला । अद्यप्रभृति यैर्लोकैर्बिल्वपत्रैस्तु पूजिता

cāturmāsye viśeṣeṇa tava pūjā mahāphalā adyaprabhṛti yairlokairbilvapatraistu pūjitā

विशेषतः चातुर्मास्य में आपकी पूजा महाफलदायक है। आज से जिन लोगों ने बिल्वपत्रों से आपकी पूजा की है,

श्लोक 35 (skanda.6.246.35)

विधास्यसि महेशानि तेषां ज्ञानमनुत्तमम् । चातुर्मास्येऽधिकफलं बिल्वपत्रं वरानने

vidhāsyasi maheśāni teṣāṁ jñānamanuttamam cāturmāsye'dhikaphalaṁ bilvapatraṁ varānane

हे महेशानी, आप उन्हें अनुपम ज्ञान प्रदान करेंगी। हे वरानने, चातुर्मास्य में बिल्वपत्र का फल और भी अधिक होता है।

श्लोक 36 (skanda.6.246.36)

उमामहेश्वरप्रीत्यै दत्तं विधिवदक्षयम् । यथा श्रीस्तुलसीवृक्षे तथा बिल्वे च पार्वती

umāmaheśvaraprītyai dattaṁ vidhivadakṣayam yathā śrīstulasīvṛkṣe tathā bilve ca pārvatī

उमा-महेश्वर की प्रीति के लिए विधिपूर्वक अर्पित बिल्वपत्र अक्षय हो जाता है। जैसे श्री तुलसी के वृक्ष में निवास करती हैं, वैसे ही पार्वती बिल्व वृक्ष में निवास करती हैं।

श्लोक 37 (skanda.6.246.37)

त्वं मूर्त्या दृश्यसे विश्वं सकलाभीष्टदायिनी । चातुर्मास्ये विशेषेण सेवितौ द्वौ महाफलौ

tvaṁ mūrtyā dṛśyase viśvaṁ sakalābhīṣṭadāyinī cāturmāsye viśeṣeṇa sevitau dvau mahāphalau

इसी मूर्तिमान् रूप में आप सम्पूर्ण विश्व को समस्त अभीष्ट देने वाली दिखाई देती हैं। विशेषतः चातुर्मास्य में सेवित होने पर ये दोनों (तुलसी और बिल्व) महाफलदायक हैं।

अध्याय 245अध्याय-सूचीअध्याय 247