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नागर खण्ड · अध्याय 247

पैजवनोपाख्यान में अश्वत्थमहिमवर्णन

अध्याय 246अध्याय-सूचीअध्याय 248

श्लोक 1 (skanda.6.247.1)

पैजवन उवाच । श्रीः कथं तुलसीरूपा बिल्ववृक्षे च पार्वती । एतच्च विस्तरेण त्वं मुने तत्त्वं वद प्रभो

paijavana uvāca śrīḥ kathaṁ tulasīrūpā bilvavṛkṣe ca pārvatī etacca vistareṇa tvaṁ mune tattvaṁ vada prabho

पैजवन ने कहा — हे मुने, हे प्रभो! श्री (लक्ष्मी) तुलसी के रूप में तथा पार्वती बिल्ववृक्ष के रूप में कैसे हुईं? यह तत्त्व मुझे विस्तार से बताइए।

श्लोक 2 (skanda.6.247.2)

गालव उवाच । पुरा दैवासुरे युद्धे दानवा बलदर्पिताः । देवान्निजघ्नुः संग्रामे घोररूपाः सुदारुणाः

gālava uvāca purā daivāsure yuddhe dānavā baladarpitāḥ devānnijaghnuḥ saṁgrāme ghorarūpāḥ sudāruṇāḥ

गालव ने कहा — पूर्वकाल में देवासुर संग्राम में बल के मद से उन्मत्त, भयंकर तथा अत्यन्त दारुण रूपवाले दानवों ने युद्ध में देवताओं का वध किया।

श्लोक 3 (skanda.6.247.3)

देवाश्च भयसंविग्ना ब्रह्माणं शरणं ययुः । ते स्तुत्वा पितरं नत्वा वृहस्पतिपुरःसराः

devāśca bhayasaṁvignā brahmāṇaṁ śaraṇaṁ yayuḥ te stutvā pitaraṁ natvā vṛhaspatipuraḥsarāḥ

भय से व्याकुल हुए देवता ब्रह्मा की शरण में गए। बृहस्पति को आगे करके उन्होंने पितामह की स्तुति और वन्दना की।

श्लोक 4 (skanda.6.247.4)

तस्थुः प्रांजलयः सर्वे तानुवाच पितामहः । किमर्थं म्लानवदना अस्मद्गेहमुपागताः

tasthuḥ prāṁjalayaḥ sarve tānuvāca pitāmahaḥ kimarthaṁ mlānavadanā asmadgehamupāgatāḥ

वे सब हाथ जोड़कर खड़े हो गए। पितामह ने उनसे कहा — किस कारण मलिन मुखवाले होकर तुम मेरे घर आए हो?

श्लोक 5 (skanda.6.247.5)

कारणं कथ्यतामाशु वह्नीन्द्रवसुभिर्युताः । देवा ऊचुः । दैत्यैः पराजितास्तात संगरेऽद्भुतकारिभिः

kāraṇaṁ kathyatāmāśu vahnīndravasubhiryutāḥ devā ūcuḥ daityaiḥ parājitāstāta saṁgare'dbhutakāribhiḥ

अग्नि, इन्द्र और वसुओं सहित तुम शीघ्र ही कारण बताओ। देवताओं ने कहा — हे तात! अद्भुत पराक्रम दिखानेवाले दैत्यों से हम युद्ध में पराजित हो गए हैं,

श्लोक 6 (skanda.6.247.6)

वयं सर्वे पराक्रांता अतस्त्वां शरणं गताः । त्राह्यस्मान्देवदेवेश शरणं समुपागतान्

vayaṁ sarve parākrāṁtā atastvāṁ śaraṇaṁ gatāḥ trāhyasmāndevadeveśa śaraṇaṁ samupāgatān

हम सब पराभूत हो गए हैं, इसीलिए आपकी शरण में आए हैं। हे देवदेवेश! आपकी शरण में आए हुए हमारी रक्षा कीजिए।

श्लोक 7 (skanda.6.247.7)

तच्छ्रुत्वा भगवान्प्राह ब्रह्मा लोकपितामहः । मया न शक्यते कर्त्तुं पक्षः कस्य जनस्य च

tacchrutvā bhagavānprāha brahmā lokapitāmahaḥ mayā na śakyate karttuṁ pakṣaḥ kasya janasya ca

यह सुनकर लोकपितामह भगवान् ब्रह्मा ने कहा — मुझसे किसी भी एक पक्ष का समर्थन करना संभव नहीं है।

श्लोक 8 (skanda.6.247.8)

वक्ष्याम्युपायं सद्धर्माश्रितानां भवतां पुरः । एकदा शिवभक्तानां विवादः सुमहानभूत् । समं केशवभक्तैश्च परस्परजिगीषया । ततस्तु भगवान्रुद्रः स्वभक्तानां च पश्यताम्

vakṣyāmyupāyaṁ saddharmāśritānāṁ bhavatāṁ puraḥ ekadā śivabhaktānāṁ vivādaḥ sumahānabhūt samaṁ keśavabhaktaiśca parasparajigīṣayā tatastu bhagavānrudraḥ svabhaktānāṁ ca paśyatām

तुम जैसे सद्धर्माश्रितों के समक्ष मैं एक उपाय बताता हूँ। एक बार शिवभक्तों और केशवभक्तों में परस्पर जीतने की इच्छा से महान विवाद हुआ था। तब भगवान् रुद्र ने अपने भक्तों के देखते-देखते

श्लोक 9 (skanda.6.247.9)

ऐक्यं विष्णुगणैः कुर्वन्दध्रे रूपं महाद्भुतम् । तदा हरिहराख्यं च देहार्द्धाभ्यां दधार सः

aikyaṁ viṣṇugaṇaiḥ kurvandadhre rūpaṁ mahādbhutam tadā hariharākhyaṁ ca dehārddhābhyāṁ dadhāra saḥ

विष्णु के गणों के साथ ऐक्य करके एक अत्यन्त अद्भुत रूप धारण किया। तब उन्होंने आधे-आधे शरीर से हरिहर नामक रूप धारण किया।

श्लोक 10 (skanda.6.247.10)

हरश्चैवार्द्धदेहेन विष्णुरर्द्धेन चाभवत् । एकतो विष्णुचिह्नानि हरचिह्नानि चैकतः

haraścaivārddhadehena viṣṇurarddhena cābhavat ekato viṣṇucihnāni haracihnāni caikataḥ

हर आधे शरीर से हर रहे और विष्णु आधे शरीर से विष्णु। एक ओर विष्णु के चिह्न थे और दूसरी ओर हर के चिह्न।

श्लोक 11 (skanda.6.247.11)

एकतो वैनतेयश्च वृषभश्चान्यतोऽभवत् । वामतो मेघवर्णाभो देहोऽश्मनिचयोपमः

ekato vainateyaśca vṛṣabhaścānyato'bhavat vāmato meghavarṇābho deho'śmanicayopamaḥ

एक ओर गरुड़ थे और दूसरी ओर वृषभ। बाईं ओर शरीर मेघ के रंग जैसा, पत्थरों के ढेर के समान श्याम था।

श्लोक 12 (skanda.6.247.12)

कर्पूरगौरः सव्ये तु समजायत वै तदा । द्वयोरैक्यसमं विश्वं विश्वमैक्यमवर्त्तत

karpūragauraḥ savye tu samajāyata vai tadā dvayoraikyasamaṁ viśvaṁ viśvamaikyamavarttata

तब दाहिनी ओर वह कर्पूर के समान गौरवर्ण हो गया। उन दोनों की एकता से सारा विश्व एकता से युक्त हो गया, अथवा विश्व ही उस ऐक्य के रूप में परिणत हो गया।

श्लोक 13 (skanda.6.247.13)

विभेदमतयो नष्टाः श्रुतिस्मृत्यर्थबाधकाः । पाखंडिनो हैतुकाश्च सर्वे विस्मयमागमन्

vibhedamatayo naṣṭāḥ śrutismṛtyarthabādhakāḥ pākhaṁḍino haitukāśca sarve vismayamāgaman

श्रुति और स्मृति के अर्थ में बाधा डालनेवाले भेदभाव के मत नष्ट हो गए। पाखण्डी और तार्किक — सभी को महान् आश्चर्य हुआ।

श्लोक 14 (skanda.6.247.14)

स्वंस्वं मार्गं परित्यज्य ययुर्निर्वाणपद्धतिम् । मंदरे पवतश्रेष्ठे सा मूर्तिर्नित्यसंस्तुता

svaṁsvaṁ mārgaṁ parityajya yayurnirvāṇapaddhatim maṁdare pavataśreṣṭhe sā mūrtirnityasaṁstutā

वे अपने-अपने मार्गों को छोड़कर निर्वाण के मार्ग पर चल पड़े। पर्वतों में श्रेष्ठ मन्दराचल पर वह मूर्ति नित्य स्तुति की जाती है,

श्लोक 15 (skanda.6.247.15)

प्रमथाद्यैर्गणैश्चैव वर्त्ततेऽद्यापि निश्चला । सृष्टिस्थित्यंतकर्त्री सा विश्वबीजमनंतका

pramathādyairgaṇaiścaiva varttate'dyāpi niścalā sṛṣṭisthityaṁtakartrī sā viśvabījamanaṁtakā

प्रमथ आदि गणों द्वारा पूजित होकर वह आज भी वहाँ अचल रूप में विराजमान है — वह सृष्टि, स्थिति और संहार करनेवाली, विश्व का अनन्त बीज है।

श्लोक 16 (skanda.6.247.16)

महेशविष्णुसंयुक्ता सा स्मृता पापनाशिनी । योगिध्येया सदापूज्य सत्त्वाधारगुणातिगा

maheśaviṣṇusaṁyuktā sā smṛtā pāpanāśinī yogidhyeyā sadāpūjya sattvādhāraguṇātigā

महेश और विष्णु से युक्त वह मूर्ति पापनाशिनी कही गई है — योगियों के ध्यान योग्य, सदा पूज्य, सत्त्वगुण का आधार तथा गुणों से परे।

श्लोक 17 (skanda.6.247.17)

मुमुक्षवोऽपि तां ध्यात्वा प्रयांति परमं पदम् । चातुर्मास्ये विशेषेण ध्यात्वा मर्त्यो ह्यमानुषः

mumukṣavo'pi tāṁ dhyātvā prayāṁti paramaṁ padam cāturmāsye viśeṣeṇa dhyātvā martyo hyamānuṣaḥ

मुमुक्षुजन भी उसका ध्यान करके परम पद को प्राप्त होते हैं। विशेष रूप से चातुर्मास्य में उसका ध्यान करनेवाला मरणधर्मा मनुष्य भी मनुष्य से बढ़कर हो जाता है,

श्लोक 18 (skanda.6.247.18)

तत्र गच्छंति ये तेषां स देवः संविधास्यति । इत्युक्त्वा भगवांस्तेषां तत्रैवांतरधीयत

tatra gacchaṁti ye teṣāṁ sa devaḥ saṁvidhāsyati ityuktvā bhagavāṁsteṣāṁ tatraivāṁtaradhīyata

और जो वहाँ जाते हैं, उनका वह देव स्वयं ध्यान रखते हैं। ऐसा कहकर भगवान् उन्हीं के समक्ष वहीं अन्तर्धान हो गए।

श्लोक 19 (skanda.6.247.19)

तेऽपि वह्निमुखा देवाः प्रजग्मुर्मंदराचलम् । बभ्रमुस्तत्र तत्रैव विचिन्वाना महेश्वरम्

te'pi vahnimukhā devāḥ prajagmurmaṁdarācalam babhramustatra tatraiva vicinvānā maheśvaram

अग्नि आदि देवता भी मन्दराचल की ओर चल पड़े। वे महेश्वर की खोज करते हुए वहाँ-वहाँ भटकते रहे,

श्लोक 20 (skanda.6.247.20)

पार्वतीं बिल्ववृक्षस्थां लक्ष्मीं च तुलसीगताम् । आदौ सर्वं वृक्षमयं पूर्वं विश्वमजायत

pārvatīṁ bilvavṛkṣasthāṁ lakṣmīṁ ca tulasīgatām ādau sarvaṁ vṛkṣamayaṁ pūrvaṁ viśvamajāyata

तथा बिल्ववृक्ष में स्थित पार्वती और तुलसी में स्थित लक्ष्मी की भी खोज करते रहे। आदिकाल में सम्पूर्ण विश्व पहले वृक्षमय ही उत्पन्न हुआ था।

श्लोक 21 (skanda.6.247.21)

एते वृक्षा महाश्रेष्ठाः सर्वे देवांशसंभवाः । एतेषां स्पर्शनादेव सर्वपापैः प्रमुच्यते

ete vṛkṣā mahāśreṣṭhāḥ sarve devāṁśasaṁbhavāḥ eteṣāṁ sparśanādeva sarvapāpaiḥ pramucyate

ये वृक्ष अत्यन्त श्रेष्ठ हैं, सभी देवताओं के अंश से उत्पन्न हुए हैं। इनके स्पर्श मात्र से मनुष्य सभी पापों से मुक्त हो जाता है,

श्लोक 22 (skanda.6.247.22)

चातुर्मास्ये विशेषेण महापापौघहारिणः । यदा तेनैव ददृशुर्देवास्त्रिभुवनेश्वरम्

cāturmāsye viśeṣeṇa mahāpāpaughahāriṇaḥ yadā tenaiva dadṛśurdevāstribhuvaneśvaram

और विशेष रूप से चातुर्मास्य में ये महापाप के समूह को हरनेवाले हैं। जब उसी उपाय से देवताओं ने त्रिभुवनेश्वर का दर्शन किया,

श्लोक 23 (skanda.6.247.23)

तदाकाशभवा वाणीं प्राह देवान्यथार्थतः । ईश्वरः सर्वभूतानां कृपया वृक्षमाश्रितः

tadākāśabhavā vāṇīṁ prāha devānyathārthataḥ īśvaraḥ sarvabhūtānāṁ kṛpayā vṛkṣamāśritaḥ

तब आकाश से उत्पन्न वाणी ने देवताओं से यथार्थ रूप में कहा — सर्वभूतों के ईश्वर कृपावश वृक्ष का आश्रय लेकर स्थित हैं।

श्लोक 24 (skanda.6.247.24)

चातुर्मास्येऽथ संप्राप्ते सर्वभूतदयाकरः । अश्वत्थोऽतः सदा सेव्यो मंदवारे विशेषतः

cāturmāsye'tha saṁprāpte sarvabhūtadayākaraḥ aśvattho'taḥ sadā sevyo maṁdavāre viśeṣataḥ

चातुर्मास्य के आने पर वे सभी प्राणियों पर दया करनेवाले हो जाते हैं। इसलिए अश्वत्थ (पीपल) सदा सेवनीय है, विशेषतः शनिवार को।

श्लोक 25 (skanda.6.247.25)

नित्यमश्वत्थसंस्पर्शात्पापं याति सहस्रधा । दुग्धेन तर्पणं ये वै तिलमिश्रेण भक्तितः

nityamaśvatthasaṁsparśātpāpaṁ yāti sahasradhā dugdhena tarpaṇaṁ ye vai tilamiśreṇa bhaktitaḥ

अश्वत्थ के नित्य स्पर्श से पाप हजार भागों में विनष्ट हो जाता है। जो लोग भक्तिपूर्वक तिलमिश्रित दूध से उसका तर्पण करते हैं,

श्लोक 26 (skanda.6.247.26)

सेचनं वा करिष्यंति तृप्तिस्तत्पूर्वजेषु च । दर्शनादेव वृक्षस्य पातकं तु विनश्यति

secanaṁ vā kariṣyaṁti tṛptistatpūrvajeṣu ca darśanādeva vṛkṣasya pātakaṁ tu vinaśyati

या उसका सिंचन करते हैं, उनके पितरों को भी तृप्ति प्राप्त होती है। और उस वृक्ष के दर्शन मात्र से पाप नष्ट हो जाता है।

श्लोक 27 (skanda.6.247.27)

पिप्पलः पूजितो ध्यातो दृष्टः सेवित एव वा । पापरोगविनाशाय चातुर्मास्ये विशेषतः । अश्वत्थं पूजितं सिक्तं सर्वभूतसुखावहम्

pippalaḥ pūjito dhyāto dṛṣṭaḥ sevita eva vā pāparogavināśāya cāturmāsye viśeṣataḥ aśvatthaṁ pūjitaṁ siktaṁ sarvabhūtasukhāvaham

पीपल पूजित, ध्यात, दृष्ट अथवा सेवित होकर, विशेष रूप से चातुर्मास्य में, पाप और रोग का नाश करता है। पूजित और सिंचित अश्वत्थ सभी प्राणियों को सुख देनेवाला है,

श्लोक 28 (skanda.6.247.28)

सर्वामयहरं चैव सर्वपापौघहारिणम् । ये नराः कीर्तयिष्यंति नामाप्यश्वत्थवृक्षजम्

sarvāmayaharaṁ caiva sarvapāpaughahāriṇam ye narāḥ kīrtayiṣyaṁti nāmāpyaśvatthavṛkṣajam

सभी रोगों को हरनेवाला और सभी पापों के समूह को दूर करनेवाला है। जो मनुष्य अश्वत्थवृक्ष से उत्पन्न नाम का भी कीर्तन करेंगे,

श्लोक 29 (skanda.6.247.29)

न तेषां यमलोकस्य भयं मार्गे प्रजायते । कुंकुमैश्चंदनैश्चैव सुलिप्तं यश्च कारयेत

na teṣāṁ yamalokasya bhayaṁ mārge prajāyate kuṁkumaiścaṁdanaiścaiva suliptaṁ yaśca kārayeta

उनके मार्ग में यमलोक का भय उत्पन्न नहीं होता। और जो कुंकुम तथा चन्दन से उसका भलीभाँति लेपन कराता है,

श्लोक 30 (skanda.6.247.30)

तस्य तापत्रयाभावो वैकुंठे गणता भवेत् । दुःस्वप्नं दुष्टचिंताञ्च दुष्टज्वरपराभवान्

tasya tāpatrayābhāvo vaikuṁṭhe gaṇatā bhavet duḥsvapnaṁ duṣṭaciṁtāñca duṣṭajvaraparābhavān

उसके त्रिविध तापों का अभाव हो जाता है और वह वैकुण्ठ में गणना पाता है। बुरे स्वप्न, दुष्ट चिन्ता तथा दुष्ट ज्वर से होनेवाले पराभव को —

श्लोक 31 (skanda.6.247.31)

विलयं नय पापानि पिप्पल त्वं हरिप्रिय । मंत्रेणानेन ये देवाः पूजयिष्यंति पिप्पलम्

vilayaṁ naya pāpāni pippala tvaṁ haripriya maṁtreṇānena ye devāḥ pūjayiṣyaṁti pippalam

"हे पिप्पल, हे हरिप्रिय! इन पापों को विलीन कर दो" — इस मन्त्र से जो लोग पिप्पल की पूजा करेंगे,

श्लोक 32 (skanda.6.247.32)

ततस्तेषां धर्मराजो जायते वाक्यकारकः । अश्वत्थो वचनेनापि प्रोक्तो ज्ञानप्रदो नृणाम्

tatasteṣāṁ dharmarājo jāyate vākyakārakaḥ aśvattho vacanenāpi prokto jñānaprado nṛṇām

उनके लिए धर्मराज उनकी बात माननेवाले हो जाते हैं। अश्वत्थ का उच्चारण मात्र भी मनुष्यों को ज्ञान देनेवाला कहा गया है,

श्लोक 33 (skanda.6.247.33)

श्रुतो हरति पापं च जन्मादि मरणावधि । अश्वत्थसेवनं पुण्यं चातुर्मास्ये विशेषतः

śruto harati pāpaṁ ca janmādi maraṇāvadhi aśvatthasevanaṁ puṇyaṁ cāturmāsye viśeṣataḥ

सुनने मात्र से भी वह जन्म से लेकर मृत्यु तक के पाप को हर लेता है। अश्वत्थ का सेवन पुण्यकारी है, विशेषतः चातुर्मास्य में।

श्लोक 34 (skanda.6.247.34)

सुप्ते देवे वृक्षमध्यमास्थाय भगवान्प्रभुः । जलं पृथ्वीगतं सर्वं प्रपिबन्निव सेवते

supte deve vṛkṣamadhyamāsthāya bhagavānprabhuḥ jalaṁ pṛthvīgataṁ sarvaṁ prapibanniva sevate

देवशयन के समय भगवान् प्रभु वृक्ष के मध्य में स्थित होकर पृथ्वी में स्थित सम्पूर्ण जल को मानो पीते हुए-से निवास करते हैं।

श्लोक 35 (skanda.6.247.35)

जलं विष्णुर्जलत्वेन विष्णुरेव रसो महान् । तस्माद्वृक्षगतो विष्णुश्चातुर्मास्येऽघनाशनः

jalaṁ viṣṇurjalatvena viṣṇureva raso mahān tasmādvṛkṣagato viṣṇuścāturmāsye'ghanāśanaḥ

जल विष्णु ही है जल के रूप में, विष्णु ही महान् रस हैं। इसलिए वृक्ष में स्थित विष्णु चातुर्मास्य में पापनाशक हैं।

श्लोक 36 (skanda.6.247.36)

सर्वभूतगतो विष्णुराप्याययति वै जगत् । तथाश्वत्थगतं विष्णुं यो नमस्येन्न नारकी

sarvabhūtagato viṣṇurāpyāyayati vai jagat tathāśvatthagataṁ viṣṇuṁ yo namasyenna nārakī

सभी प्राणियों में स्थित विष्णु ही जगत् का पोषण करते हैं। इसी प्रकार अश्वत्थ में स्थित विष्णु को जो नमस्कार करता है, वह नरक में नहीं जाता।

श्लोक 37 (skanda.6.247.37)

अश्वत्थं रोपयेद्यस्तु पृथिव्यां प्रयतो नरः । तस्य पापसहस्राणि विलयं यांति तत्क्षणात्

aśvatthaṁ ropayedyastu pṛthivyāṁ prayato naraḥ tasya pāpasahasrāṇi vilayaṁ yāṁti tatkṣaṇāt

जो शुद्ध मन से मनुष्य पृथ्वी पर अश्वत्थ का रोपण करता है, उसके हजारों पाप उसी क्षण नष्ट हो जाते हैं।

श्लोक 38 (skanda.6.247.38)

अश्वत्थः सर्ववृक्षाणां पवित्रो मंगलान्वितः । मुक्तिदो रोपितो ध्यातश्चातुर्मास्येऽघनाशनः

aśvatthaḥ sarvavṛkṣāṇāṁ pavitro maṁgalānvitaḥ muktido ropito dhyātaścāturmāsye'ghanāśanaḥ

अश्वत्थ सभी वृक्षों में सबसे पवित्र और मंगलयुक्त है। रोपित तथा ध्यात होकर वह मुक्तिदायक है और चातुर्मास्य में पापनाशक है।

श्लोक 39 (skanda.6.247.39)

अश्वत्थे चरणं दत्त्वा ब्रह्महत्या प्रजायते । निष्कारणं संकुथित्वा नरके पच्यते ध्रुवम्

aśvatthe caraṇaṁ dattvā brahmahatyā prajāyate niṣkāraṇaṁ saṁkuthitvā narake pacyate dhruvam

अश्वत्थ पर पैर रखने से ब्रह्महत्या का पाप उत्पन्न होता है। और बिना कारण उसे क्षति पहुँचाकर मनुष्य निश्चय ही नरक में पकाया जाता है।

श्लोक 40 (skanda.6.247.40)

मूले विष्णुः स्थितो नित्यं स्कंधे केशव एव च । नारायणस्तु शाखासु पत्रेषु भगवान्हरिः

mūle viṣṇuḥ sthito nityaṁ skaṁdhe keśava eva ca nārāyaṇastu śākhāsu patreṣu bhagavānhariḥ

मूल में विष्णु सदा स्थित रहते हैं और स्कन्ध में केशव। शाखाओं में नारायण और पत्तों में भगवान् हरि स्थित हैं।

श्लोक 41 (skanda.6.247.41)

फलेऽच्युतो न संदेहः सर्वदेवैः समन्वितः । चातुर्मास्ये विशेषेण द्रुमपूजी स मुक्तिभाक्

phale'cyuto na saṁdehaḥ sarvadevaiḥ samanvitaḥ cāturmāsye viśeṣeṇa drumapūjī sa muktibhāk

फल में निःसंदेह अच्युत स्थित हैं, सभी देवताओं के साथ। जो चातुर्मास्य में विशेष रूप से इस वृक्ष की पूजा करता है, वह मुक्ति का भागी होता है।

श्लोक 42 (skanda.6.247.42)

तस्मात्सर्वप्रयत्नेन सदैवाश्वत्थसेवनम् । यः करोति नरो भक्त्या पापं याति दिनोद्भवम्

tasmātsarvaprayatnena sadaivāśvatthasevanam yaḥ karoti naro bhaktyā pāpaṁ yāti dinodbhavam

इसलिए सम्पूर्ण प्रयत्न से सदैव अश्वत्थ की सेवा करनी चाहिए। जो मनुष्य भक्तिपूर्वक ऐसा करता है, उस दिन उत्पन्न पाप नष्ट हो जाता है।

श्लोक 43 (skanda.6.247.43)

स एव विष्णुर्द्रुम एव मूर्तो महात्मभिः सेवितपुण्यमूलः । यस्याश्रयः पापसहस्रहंता भवेन्नृणां कामदुघो गुणाढ्यः

sa eva viṣṇurdruma eva mūrto mahātmabhiḥ sevitapuṇyamūlaḥ yasyāśrayaḥ pāpasahasrahaṁtā bhavennṛṇāṁ kāmadugho guṇāḍhyaḥ

वे विष्णु ही वृक्ष के रूप में साकार हैं, जिनका पवित्र मूल महात्माओं द्वारा सेवित है। उनका आश्रय लेनेवाला हजारों पापों का नाशक बनता है और मनुष्यों के लिए वे गुणों से समृद्ध, कामनाओं को पूर्ण करनेवाले बन जाते हैं।

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