नागर खण्ड · अध्याय 248
पलाशमहिमवर्णन
श्लोक 1 (skanda.6.248.1)
वाण्युवाच । पलाशो हरिरूपेण सेव्यते हि पुराविदैः । बहुभिर्ह्युपचारैस्तु ब्रह्मवृक्षस्य सेवनम्
vāṇyuvāca palāśo harirūpeṇa sevyate hi purāvidaiḥ bahubhirhyupacāraistu brahmavṛkṣasya sevanam
वाणी ने कहा — पलाश हरि के रूप में पुराविदों द्वारा सेवित होता है। अनेक उपचारों से ब्रह्मवृक्ष की सेवा की जाती है।
श्लोक 2 (skanda.6.248.2)
सर्वकामप्रदं प्रोक्तं महापातकनाशनम् । त्रीणि पत्राणि पालाशे मध्यमं विष्णुशापितम्
sarvakāmapradaṁ proktaṁ mahāpātakanāśanam trīṇi patrāṇi pālāśe madhyamaṁ viṣṇuśāpitam
यह सभी कामनाओं को देनेवाला तथा महापातकों का नाश करनेवाला कहा गया है। पलाश के तीन पत्ते होते हैं, जिनमें मध्यम पत्ता विष्णु को समर्पित है।
श्लोक 3 (skanda.6.248.3)
वामे ब्रह्मा दक्षिणे च हर एकः प्रकीर्तितः । पलाशपात्रे यो भुंक्ते नित्यमेव नरोत्तमः
vāme brahmā dakṣiṇe ca hara ekaḥ prakīrtitaḥ palāśapātre yo bhuṁkte nityameva narottamaḥ
बाईं ओर ब्रह्मा और दाहिनी ओर हर विराजमान माने गए हैं। जो श्रेष्ठ पुरुष सदा पलाश के पत्ते के दोने में भोजन करता है,
श्लोक 4 (skanda.6.248.4)
अश्वमेधसहस्रस्य फलं प्राप्नोत्यसंशयम् । चातुर्मास्ये विशेषेण भोक्तुर्मोक्षप्रदं भवेत्
aśvamedhasahasrasya phalaṁ prāpnotyasaṁśayam cāturmāsye viśeṣeṇa bhokturmokṣapradaṁ bhavet
वह निःसंदेह हजार अश्वमेध यज्ञों का फल प्राप्त करता है। विशेष रूप से चातुर्मास्य में यह भोजन करनेवाले के लिए मोक्ष देनेवाला होता है।
श्लोक 5 (skanda.6.248.5)
पयसा वाथ दुग्धेन रविवारेऽनिशं यदि । चातुर्मास्येऽर्चितो यैस्तु ते यांति परमंपदम्
payasā vātha dugdhena ravivāre'niśaṁ yadi cāturmāsye'rcito yaistu te yāṁti paramaṁpadam
यदि रविवार को निरन्तर जल अथवा दूध से इसकी अर्चना की जाए, तो जो लोग चातुर्मास्य में इस प्रकार इसकी पूजा करते हैं, वे परम पद को प्राप्त होते हैं।
श्लोक 6 (skanda.6.248.6)
दृश्यते यदि पालाशः प्रातरुत्थाय मानवैः । नरकानाशु निर्धूय गम्यते परमं पदम्
dṛśyate yadi pālāśaḥ prātarutthāya mānavaiḥ narakānāśu nirdhūya gamyate paramaṁ padam
यदि मनुष्य प्रातःकाल उठकर पलाश के दर्शन करें, तो वे नरकों को शीघ्र झाड़कर परम पद को प्राप्त होते हैं।
श्लोक 7 (skanda.6.248.7)
पालाशः सर्वदेवानामाधारो धर्मसाधनम् । यत्र लोभस्तु तस्य स्यात्तत्र पूज्यो महातरुः
pālāśaḥ sarvadevānāmādhāro dharmasādhanam yatra lobhastu tasya syāttatra pūjyo mahātaruḥ
पलाश सभी देवताओं का आधार और धर्म का साधन है। जहाँ कहीं भी वह उपलब्ध हो, वह महावृक्ष वहाँ पूज्य है।
श्लोक 8 (skanda.6.248.8)
यथा सर्वेषु वर्णेषु विप्रो मुख्यतमो भवेत् । मध्ये सर्वतरूणां च ब्रह्मवृक्षो महोत्तमः
yathā sarveṣu varṇeṣu vipro mukhyatamo bhavet madhye sarvatarūṇāṁ ca brahmavṛkṣo mahottamaḥ
जैसे सभी वर्णों में ब्राह्मण सर्वप्रधान होता है, वैसे ही सभी वृक्षों में ब्रह्मवृक्ष (पलाश) सर्वश्रेष्ठ है।
श्लोक 9 (skanda.6.248.9)
यस्य मूले हरो नित्यं स्कंधे शूलधरःस्वयम् । शाखासु भगवान्रुद्रः पुष्पेषु त्रिपुरांतकः
yasya mūle haro nityaṁ skaṁdhe śūladharaḥsvayam śākhāsu bhagavānrudraḥ puṣpeṣu tripurāṁtakaḥ
जिसके मूल में हर सदा निवास करते हैं, स्कन्ध में स्वयं शूलधर, शाखाओं में भगवान् रुद्र, और पुष्पों में त्रिपुरान्तक विराजमान हैं।
श्लोक 10 (skanda.6.248.10)
शिवः पत्रेषु वसति फले गणपतिस्तथा । गंगापतिस्त्वचायां तु मज्जायां भगवान्भवः
śivaḥ patreṣu vasati phale gaṇapatistathā gaṁgāpatistvacāyāṁ tu majjāyāṁ bhagavānbhavaḥ
शिव पत्तों में निवास करते हैं और गणपति फल में। छाल में गंगापति और मज्जा में भगवान् भव विराजमान हैं।
श्लोक 11 (skanda.6.248.11)
ईश्वरस्तु प्रशाखासु सर्वोऽयं हरवल्लभः । हरः कर्पूरधवलो यथावद्वर्णितः सदा
īśvarastu praśākhāsu sarvo'yaṁ haravallabhaḥ haraḥ karpūradhavalo yathāvadvarṇitaḥ sadā
ईश्वर टहनियों में विराजमान हैं — यह सम्पूर्ण वृक्ष हर को प्रिय है। हर सदा कर्पूर के समान श्वेत वर्णवाला वर्णित किया गया है।
श्लोक 12 (skanda.6.248.12)
तथा ह्ययं ब्रह्मरूपः सितवर्णो महाभगः । चिंतितो रिपुनाशाय पापसंशोषणाय च
tathā hyayaṁ brahmarūpaḥ sitavarṇo mahābhagaḥ ciṁtito ripunāśāya pāpasaṁśoṣaṇāya ca
इसी प्रकार यह ब्रह्मरूप, श्वेत वर्णवाला और परम सौभाग्यशाली वृक्ष है, जो चिन्तन किए जाने पर शत्रुनाश तथा पापों को सुखा देने के लिए,
श्लोक 13 (skanda.6.248.13)
मनोरथप्रदानाय जायते नात्र संशयः । गुरुवारे समायाते चातुर्मास्ये तथैव च
manorathapradānāya jāyate nātra saṁśayaḥ guruvāre samāyāte cāturmāsye tathaiva ca
तथा मनोरथ की पूर्ति के लिए होता है, इसमें कोई संशय नहीं है। गुरुवार के आने पर और उसी प्रकार चातुर्मास्य में भी,
श्लोक 14 (skanda.6.248.14)
पूजितश्च स्तुतो ध्यातः सर्वदुःखविनाशकः
pūjitaśca stuto dhyātaḥ sarvaduḥkhavināśakaḥ
पूजित, स्तुत और ध्यात होकर यह सभी दुःखों का नाश करनेवाला होता है।
श्लोक 15 (skanda.6.248.15)
देवस्तुत्यो देवबीजं परं यन्मूर्तं ब्रह्म ब्रह्मवृक्षत्वमाप्तम् । नित्यं सेव्यः श्रद्धया स्थाणुरूपश्चातुर्मास्ये सेवितः पापहा स्यात्
devastutyo devabījaṁ paraṁ yanmūrtaṁ brahma brahmavṛkṣatvamāptam nityaṁ sevyaḥ śraddhayā sthāṇurūpaścāturmāsye sevitaḥ pāpahā syāt
देवताओं द्वारा स्तुत, देवताओं का परम बीज, साक्षात् मूर्तिमान् ब्रह्म ही ब्रह्मवृक्ष के रूप को प्राप्त हुआ है। श्रद्धापूर्वक सदा सेवनीय, स्थाणुरूप यह वृक्ष चातुर्मास्य में सेवित होकर पापनाशक होता है।