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नागर खण्ड · अध्याय 249

तुलसीमाहात्म्यवर्णन

अध्याय 248अध्याय-सूचीअध्याय 250

श्लोक 1 (skanda.6.249.1)

वाण्युवाच । तुलसी रोपिता येन गृहस्थेन महाफला । गृहे तस्य न दारिद्र्यं जायते नात्र संशयः

vāṇyuvāca tulasī ropitā yena gṛhasthena mahāphalā gṛhe tasya na dāridryaṁ jāyate nātra saṁśayaḥ

वाणी ने कहा — जिस गृहस्थ ने महाफलदायिनी तुलसी का रोपण किया है, उसके घर में दरिद्रता नहीं आती, इसमें कोई संशय नहीं।

श्लोक 2 (skanda.6.249.2)

तुलस्या दर्शनादेव पापराशिर्निवर्तते । श्रियेऽमृतकणोत्पन्ना तुलसी हरिवल्लभा

tulasyā darśanādeva pāparāśirnivartate śriye'mṛtakaṇotpannā tulasī harivallabhā

तुलसी के दर्शन मात्र से पापों का समूह दूर हो जाता है। श्री (लक्ष्मी) के हेतु अमृत की एक बूँद से उत्पन्न तुलसी हरि को अत्यन्त प्रिय है।

श्लोक 3 (skanda.6.249.3)

पिबन्त्या रुचिरं पानं प्राणिनां पापहारिणी । यस्या रूपे वसेल्लक्ष्मीः स्कन्धे सागरसंभवा

pibantyā ruciraṁ pānaṁ prāṇināṁ pāpahāriṇī yasyā rūpe vasellakṣmīḥ skandhe sāgarasaṁbhavā

मनोहर जलपान करती हुई वह प्राणियों के पापों को हरनेवाली है। उसके रूप में लक्ष्मी निवास करती हैं और स्कन्ध में सागर से उत्पन्न देवी।

श्लोक 4 (skanda.6.249.4)

पत्रेषु सततं श्रीश्च शाखासु कमला स्वयम् । इन्दिरा पुष्पगा नित्यं फले क्षीराब्धिसंभवा

patreṣu satataṁ śrīśca śākhāsu kamalā svayam indirā puṣpagā nityaṁ phale kṣīrābdhisaṁbhavā

पत्तों में सदा श्री विराजमान हैं और शाखाओं में स्वयं कमला। पुष्पों में नित्य इन्दिरा निवास करती हैं और फल में क्षीरसागर से उत्पन्न देवी।

श्लोक 5 (skanda.6.249.5)

तुलसी शुष्ककाष्ठेषु या रूपा विश्वव्यापिनी । मज्जायां पद्मवासा च त्वचासु च हरिप्रिया

tulasī śuṣkakāṣṭheṣu yā rūpā viśvavyāpinī majjāyāṁ padmavāsā ca tvacāsu ca haripriyā

तुलसी, जिसका रूप सूखी लकड़ी में भी सम्पूर्ण विश्व में व्याप्त है, मज्जा में कमलवासिनी और छाल में हरिप्रिया देवी निवास करती हैं।

श्लोक 6 (skanda.6.249.6)

सर्वरूपा च सर्वेशा परमानन्ददायिनी । तुलसी प्राशको मर्त्यो यमलोकं न गच्छति

sarvarūpā ca sarveśā paramānandadāyinī tulasī prāśako martyo yamalokaṁ na gacchati

सर्वरूपा, सर्वेश्वरी, परमानन्द देनेवाली तुलसी को ग्रहण करनेवाला मरणधर्मा मनुष्य यमलोक को नहीं जाता।

श्लोक 7 (skanda.6.249.7)

शिरस्था तुलसी यस्य न याम्यैरनुभूयते । मुखस्था तुलसी यस्य निर्वाणपददायिनी

śirasthā tulasī yasya na yāmyairanubhūyate mukhasthā tulasī yasya nirvāṇapadadāyinī

जिसके सिर पर तुलसी हो, वह यमदूतों द्वारा स्पर्श नहीं किया जाता। जिसके मुख में तुलसी हो, वह उसके लिए निर्वाणपद देनेवाली होती है।

श्लोक 8 (skanda.6.249.8)

हस्तस्थातुलसीयस्य स तापत्रयवर्जितः । तुलसी हृदयस्था च प्राणिनां सर्वकामदा

hastasthātulasīyasya sa tāpatrayavarjitaḥ tulasī hṛdayasthā ca prāṇināṁ sarvakāmadā

जिसके हाथ में तुलसी हो, वह त्रिविध तापों से रहित हो जाता है। हृदय में स्थित तुलसी प्राणियों की सभी कामनाओं को पूर्ण करनेवाली है।

श्लोक 9 (skanda.6.249.9)

स्कन्धस्था तुलसी यस्य स पापैर्न च लिप्यते । कण्ठगा तुलसी यस्य जीवन्मुक्तः सदा हि सः

skandhasthā tulasī yasya sa pāpairna ca lipyate kaṇṭhagā tulasī yasya jīvanmuktaḥ sadā hi saḥ

जिसके कन्धे पर तुलसी हो, वह पापों से लिप्त नहीं होता। जिसके कण्ठ में तुलसी हो, वह सदा जीवन्मुक्त ही है।

श्लोक 10 (skanda.6.249.10)

तुलसीसंभवं पत्रं सदा वहति यो नरः । मनसा चिन्तितां सिद्धिं संप्राप्नोति न संशयः

tulasīsaṁbhavaṁ patraṁ sadā vahati yo naraḥ manasā cintitāṁ siddhiṁ saṁprāpnoti na saṁśayaḥ

जो मनुष्य तुलसी से उत्पन्न पत्र को सदा धारण करता है, वह मन में सोची हुई सिद्धि को निःसंदेह प्राप्त कर लेता है।

श्लोक 11 (skanda.6.249.11)

तुलसींसर्वकायार्थसाधिनीं दुष्टवारिणीम् । यो नरः प्रत्यहं सिञ्चेन्न स याति यमालयम्

tulasīṁsarvakāyārthasādhinīṁ duṣṭavāriṇīm yo naraḥ pratyahaṁ siñcenna sa yāti yamālayam

जो मनुष्य प्रतिदिन उस तुलसी को सींचता है, जो शरीर के सभी प्रयोजनों को सिद्ध करनेवाली तथा दुष्टों का निवारण करनेवाली है, वह यमलोक को नहीं जाता।

श्लोक 12 (skanda.6.249.12)

चातुर्मास्ये विशेषेण वन्दितापि विमुक्तिदा । नारायणं जलगतं ज्ञात्वा वृक्षगतं तथा

cāturmāsye viśeṣeṇa vanditāpi vimuktidā nārāyaṇaṁ jalagataṁ jñātvā vṛkṣagataṁ tathā

विशेष रूप से चातुर्मास्य में वन्दन मात्र से भी वह मुक्ति देनेवाली है। नारायण को जल में स्थित और उसी प्रकार वृक्ष में स्थित जानकर,

श्लोक 13 (skanda.6.249.13)

प्राणिनां कृपया लक्ष्मीस्तुलसीवृक्षमाश्रिता । चातुर्मास्ये समायाते तुलसी सेविता यदि

prāṇināṁ kṛpayā lakṣmīstulasīvṛkṣamāśritā cāturmāsye samāyāte tulasī sevitā yadi

प्राणियों पर कृपा करके लक्ष्मी ने तुलसी वृक्ष का आश्रय लिया है। चातुर्मास्य के आने पर यदि तुलसी की सेवा की जाए,

श्लोक 14 (skanda.6.249.14)

तेषां पापसहस्राणि यांति नित्यं सहस्रधा । गोविन्दस्मरणं नित्यं तुलसीवनसेवनम्

teṣāṁ pāpasahasrāṇi yāṁti nityaṁ sahasradhā govindasmaraṇaṁ nityaṁ tulasīvanasevanam

तो उनके हजारों पाप प्रतिदिन सहस्र भागों में नष्ट हो जाते हैं। गोविन्द का नित्य स्मरण ही तुलसीवन की सेवा है।

श्लोक 15 (skanda.6.249.15)

तुलसीसेचनं दुग्धैश्चातुर्मास्येऽतिदुर्लभम् । तुलसीं वर्द्धयेद्यस्तु मानवो यदि श्रद्धया

tulasīsecanaṁ dugdhaiścāturmāsye'tidurlabham tulasīṁ varddhayedyastu mānavo yadi śraddhayā

चातुर्मास्य में दूध से तुलसी का सिंचन करना अत्यन्त दुर्लभ पुण्यकर्म है। और जो मनुष्य श्रद्धापूर्वक तुलसी को बढ़ाता है,

श्लोक 16 (skanda.6.249.16)

आलवालांबुदानैश्च पावितं सकलं कुलम् । यथा श्रीस्तुलसीसंस्था नित्यमेव हि वर्द्धते

ālavālāṁbudānaiśca pāvitaṁ sakalaṁ kulam yathā śrīstulasīsaṁsthā nityameva hi varddhate

क्यारी बनाकर जल देने से उसका सम्पूर्ण कुल पवित्र हो जाता है। जिस प्रकार तुलसी में स्थित श्री नित्य ही बढ़ती जाती है,

श्लोक 17 (skanda.6.249.17)

तथातथा गृहस्थस्य कामवृद्धिः प्रजायते । ब्रह्मचारीगृहस्थश्च वानप्रस्थो यतिस्तथा

tathātathā gṛhasthasya kāmavṛddhiḥ prajāyate brahmacārīgṛhasthaśca vānaprastho yatistathā

उसी प्रकार-उसी प्रकार गृहस्थ की कामनाओं की वृद्धि होती है। ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ तथा उसी प्रकार यति —

श्लोक 18 (skanda.6.249.18)

तथा प्रकृतयः सर्वास्तुलसीसेवने रताः । श्रद्धया यदि जायन्ते न तासां दुःखदो हरिः

tathā prakṛtayaḥ sarvāstulasīsevane ratāḥ śraddhayā yadi jāyante na tāsāṁ duḥkhado hariḥ

और इसी प्रकार सभी प्रकृतियाँ (सभी स्वभाव के लोग), यदि श्रद्धापूर्वक तुलसी की सेवा में संलग्न हो जाएँ, तो उनके लिए हरि दुःख देनेवाले नहीं होते।

श्लोक 19 (skanda.6.249.19)

एको हरिः सकलवृक्षगतो विभाति नानारसैस्तु परिभावितमूर्तिरेव । वृक्षाधिवासमगमत्कमला च देवी दुःखादिनाशनकरी सततं स्मृताऽपि

eko hariḥ sakalavṛkṣagato vibhāti nānārasaistu paribhāvitamūrtireva vṛkṣādhivāsamagamatkamalā ca devī duḥkhādināśanakarī satataṁ smṛtā'pi

एक ही हरि सम्पूर्ण वृक्षों में स्थित होकर, मानो अनेक रसों से युक्त हुई मूर्ति के रूप में, प्रकाशित होते हैं। और दुःख आदि का नाश करनेवाली देवी कमला भी, जो सदा स्मरण की जाती है, वृक्ष में निवास करने चली गईं।

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