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नागर खण्ड · अध्याय 250

बिल्वोत्पत्तिवर्णन

अध्याय 249अध्याय-सूचीअध्याय 251

श्लोक 1 (skanda.6.250.1)

वाण्युवाच । बिल्वपत्रस्य माहात्म्यं कथितुं नैव शक्यते । तवोद्देशेन वक्ष्यामि महेन्द्र शृणु तत्त्वतः

vāṇyuvāca bilvapatrasya māhātmyaṁ kathituṁ naiva śakyate tavoddeśena vakṣyāmi mahendra śṛṇu tattvataḥ

वाणी ने कहा — बिल्वपत्र का माहात्म्य कहा नहीं जा सकता। फिर भी, हे महेन्द्र, तुम्हारे लिए संक्षेप में कहती हूँ, यथार्थ रूप से सुनो।

श्लोक 2 (skanda.6.250.2)

विहारश्रममापन्ना देवी गिरिसुता शुभा । ललाटफलके तस्याः स्वेदबिन्दुरजायत

vihāraśramamāpannā devī girisutā śubhā lalāṭaphalake tasyāḥ svedabindurajāyata

क्रीड़ा के परिश्रम से थकी हुई पर्वतपुत्री शुभा देवी के ललाटतल पर स्वेद की एक बूँद उत्पन्न हुई।

श्लोक 3 (skanda.6.250.3)

स भवान्या विनिक्षिप्तो भूतले निपपात च । महातरुरयं जातो मन्दरे पर्वतोत्तमे

sa bhavānyā vinikṣipto bhūtale nipapāta ca mahātarurayaṁ jāto mandare parvatottame

भवानी द्वारा गिराई गई वह बूँद भूतल पर गिरी, और उससे पर्वतों में श्रेष्ठ मन्दराचल पर यह महावृक्ष उत्पन्न हुआ।

श्लोक 4 (skanda.6.250.4)

ततः शैलसुता तत्र रममाणा ययौ पुनः । दृष्ट्वा वनगतं वृक्षं विस्मयोत्फुल्ललोचना

tataḥ śailasutā tatra ramamāṇā yayau punaḥ dṛṣṭvā vanagataṁ vṛkṣaṁ vismayotphullalocanā

तत्पश्चात् क्रीड़ा करती हुई पर्वतपुत्री पुनः वहाँ गईं। वन में स्थित उस वृक्ष को देखकर उनके नेत्र आश्चर्य से विस्फारित हो गए,

श्लोक 5 (skanda.6.250.5)

जयां च विजयां चैव पप्रच्छ च सखीद्वयम् । कोऽयं महातरुर्दिव्यो विभाति वनमध्यगः । दृश्यते रुचिराकारो महाहर्षकरो ह्ययम्

jayāṁ ca vijayāṁ caiva papraccha ca sakhīdvayam ko'yaṁ mahātarurdivyo vibhāti vanamadhyagaḥ dṛśyate rucirākāro mahāharṣakaro hyayam

और उन्होंने अपनी दो सखियों जया और विजया से पूछा — यह वन के मध्य में शोभित होनेवाला दिव्य महावृक्ष कौन-सा है? यह मनोहर आकारवाला और अत्यन्त हर्ष उत्पन्न करनेवाला दिखाई देता है।

श्लोक 6 (skanda.6.250.6)

जयोवाच । देवि त्वद्देहसंभूतो वृक्षोऽयं स्वेदबिन्दुजः । नामाऽस्य कुरु वै क्षिप्रं पूजितः पापनाशनः

jayovāca devi tvaddehasaṁbhūto vṛkṣo'yaṁ svedabindujaḥ nāmā'sya kuru vai kṣipraṁ pūjitaḥ pāpanāśanaḥ

जया ने कहा — हे देवी! यह वृक्ष आपके शरीर से उत्पन्न, स्वेद-बिन्दु से उत्पन्न है। शीघ्र ही इसका नाम रखिए; पूजित होने पर यह पापनाशक है।

श्लोक 7 (skanda.6.250.7)

पार्वत्युवाच । यस्मात्क्षोणीतलं भित्त्वा विशिष्टोऽयं महातरुः

pārvatyuvāca yasmātkṣoṇītalaṁ bhittvā viśiṣṭo'yaṁ mahātaruḥ

पार्वती ने कहा — चूँकि पृथ्वीतल को भेदकर यह विशिष्ट महावृक्ष

श्लोक 8 (skanda.6.250.8)

उदतिष्ठत्समीपे मे तस्माद्बिल्वो भवत्वयम् । इमं वृक्षं समासाद्य भक्तितः पत्रसंचयम्

udatiṣṭhatsamīpe me tasmādbilvo bhavatvayam imaṁ vṛkṣaṁ samāsādya bhaktitaḥ patrasaṁcayam

मेरे समीप उठ खड़ा हुआ है, इसलिए यह बिल्व नाम से हो। इस वृक्ष के पास पहुँचकर भक्तिपूर्वक पत्रों का संचय करके,

श्लोक 9 (skanda.6.250.9)

आहरिष्यत्यसौ राजा भविष्यत्येव भूतले । यः करिष्यति मे पूजां पत्रैः श्रद्धासमन्वितः

āhariṣyatyasau rājā bhaviṣyatyeva bhūtale yaḥ kariṣyati me pūjāṁ patraiḥ śraddhāsamanvitaḥ

जो श्रद्धासहित इसके पत्रों से मेरी पूजा करेगा, वह पृथ्वी पर अवश्य ही राजा बनेगा।

श्लोक 10 (skanda.6.250.10)

यंयं काममभिध्यायेत्तस्य सिद्धिः प्रजायते । यो दृष्ट्वा बिल्वपत्राणि श्रद्धामपि करिष्यति

yaṁyaṁ kāmamabhidhyāyettasya siddhiḥ prajāyate yo dṛṣṭvā bilvapatrāṇi śraddhāmapi kariṣyati

वह जिस-जिस कामना का ध्यान करेगा, उसकी सिद्धि हो जाएगी। और जो बिल्वपत्रों को देखकर श्रद्धा भी करेगा,

श्लोक 11 (skanda.6.250.11)

पूजनार्थाय विधये धनदाऽहं न संशयः । पत्राग्रप्राशने यस्तु करिष्यति मनो यदि । तस्य पापसहस्राणि यास्यंति विलयं स्वयम्

pūjanārthāya vidhaye dhanadā'haṁ na saṁśayaḥ patrāgraprāśane yastu kariṣyati mano yadi tasya pāpasahasrāṇi yāsyaṁti vilayaṁ svayam

उसके लिए पूजन-विधि के हेतु मैं धन देनेवाली बनूँगी, इसमें संशय नहीं। और जो पत्र के अग्रभाग को चखने का मन बना लेगा, उसके हजारों पाप स्वयं ही नष्ट हो जाएँगे।

श्लोक 12 (skanda.6.250.12)

शिरः पत्राग्रसंयुक्तं करोति यदि मानवः । न याम्या यातना ह्यस्य दुःखदात्री भविष्यति

śiraḥ patrāgrasaṁyuktaṁ karoti yadi mānavaḥ na yāmyā yātanā hyasya duḥkhadātrī bhaviṣyati

यदि मनुष्य अपना सिर पत्र के अग्रभाग से युक्त करता है, तो यमदूतों की यातना उसके लिए दुःखदायिनी नहीं होगी।

श्लोक 13 (skanda.6.250.13)

इत्युक्त्वा पार्वती हृष्टा जगाम भवनं स्वकम् । सखीभिः सहिता देवी गणैरपि समन्विता

ityuktvā pārvatī hṛṣṭā jagāma bhavanaṁ svakam sakhībhiḥ sahitā devī gaṇairapi samanvitā

ऐसा कहकर प्रसन्न हुई पार्वती अपने भवन को चली गईं — सखियों सहित और गणों से भी युक्त वह देवी।

श्लोक 14 (skanda.6.250.14)

वाण्युवाच । अयं बिल्वतरुः श्रेष्ठः पवित्रः पापनाशनः । तस्य मूले स्थिता देवी गिरिजा नात्र संशयः

vāṇyuvāca ayaṁ bilvataruḥ śreṣṭhaḥ pavitraḥ pāpanāśanaḥ tasya mūle sthitā devī girijā nātra saṁśayaḥ

वाणी ने कहा — यह बिल्ववृक्ष श्रेष्ठ, पवित्र और पापनाशक है। इसके मूल में देवी गिरिजा स्थित हैं, इसमें कोई संशय नहीं।

श्लोक 15 (skanda.6.250.15)

स्कन्धे दाक्षायणी देवी शाखासु च महेश्वरी । पत्रेषु पार्वती देवी फले कात्यायनी स्मृता

skandhe dākṣāyaṇī devī śākhāsu ca maheśvarī patreṣu pārvatī devī phale kātyāyanī smṛtā

स्कन्ध में देवी दाक्षायणी और शाखाओं में महेश्वरी विराजमान हैं। पत्तों में देवी पार्वती और फल में कात्यायनी स्मरण की गई हैं।

श्लोक 16 (skanda.6.250.16)

त्वचि गौरी समाख्याता अपर्णा मध्यवल्कले । पुष्पे दुर्गा समाख्याता उमा शाखांगकेषु च

tvaci gaurī samākhyātā aparṇā madhyavalkale puṣpe durgā samākhyātā umā śākhāṁgakeṣu ca

छाल में गौरी कही गई हैं और मध्यछाल में अपर्णा। पुष्प में दुर्गा कही गई हैं और उपशाखाओं में उमा।

श्लोक 17 (skanda.6.250.17)

कण्टकेषु च सर्वेषु कोटयो नवसंख्यया । शक्तयः प्राणिरक्षार्थं संस्थिता गिरिजाऽऽज्ञया

kaṇṭakeṣu ca sarveṣu koṭayo navasaṁkhyayā śaktayaḥ prāṇirakṣārthaṁ saṁsthitā girijā''jñayā

और सभी काँटों में नौ करोड़ की संख्या में शक्तियाँ, गिरिजा की आज्ञा से, प्राणियों की रक्षा के लिए स्थित हैं।

श्लोक 18 (skanda.6.250.18)

तां भजंति सुपत्रैश्च पूजयंति सनातनीम् । यंयं कामयते कामं तस्य सिद्धिर्भवेद्ध्रुवम्

tāṁ bhajaṁti supatraiśca pūjayaṁti sanātanīm yaṁyaṁ kāmayate kāmaṁ tasya siddhirbhaveddhruvam

जो सुन्दर पत्रों से उस सनातनी देवी को भजते और पूजते हैं, वे जिस-जिस कामना की इच्छा करते हैं, उसकी सिद्धि निश्चय ही होती है।

श्लोक 19 (skanda.6.250.19)

महेश्वरी सा गिरिजा महेश्वरी विशुद्धरूपा जनमोक्षदात्री । हरं च दृष्ट्वाथ पलाशमाश्रितं स्वलीलया बिल्ववपुश्चकार सा

maheśvarī sā girijā maheśvarī viśuddharūpā janamokṣadātrī haraṁ ca dṛṣṭvātha palāśamāśritaṁ svalīlayā bilvavapuścakāra sā

वह महेश्वरी गिरिजा, विशुद्ध रूपवाली, जनों को मोक्ष देनेवाली — हर को पलाश का आश्रय लिए हुए देखकर, अपनी लीला से उन्होंने बिल्व का शरीर धारण कर लिया।

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