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नागर खण्ड · अध्याय 251

विष्णुशापवर्णन

अध्याय 250अध्याय-सूचीअध्याय 252

श्लोक 1 (skanda.6.251.1)

गालव उवाच । इत्युक्त्वाऽऽकाशजावाणी विरराम शुभप्रदा । तेऽपि देवास्तदाश्चर्यं महद्दृष्ट्वा महाव्रताः

gālava uvāca ityuktvā''kāśajāvāṇī virarāma śubhapradā te'pi devāstadāścaryaṁ mahaddṛṣṭvā mahāvratāḥ

गालव ने कहा — ऐसा कहकर शुभप्रदा, आकाश से उत्पन्न वाणी शान्त हो गई। महाव्रतधारी देवता भी उस महान् आश्चर्य को देखकर,

श्लोक 2 (skanda.6.251.2)

चतुष्टयं च वृक्षाणां चातुर्मास्ये समागते । अपूजयंश्च विधिवदैक्यभावेन शूद्रज

catuṣṭayaṁ ca vṛkṣāṇāṁ cāturmāsye samāgate apūjayaṁśca vidhivadaikyabhāvena śūdraja

चातुर्मास्य के आने पर, हे शूद्रपुत्र, उन चारों वृक्षों की विधिपूर्वक, एकत्व के भाव से पूजा की।

श्लोक 3 (skanda.6.251.3)

चातुर्मास्येऽथ संपूर्णे देवो हरिहरात्मकः । प्रसन्नस्तानुवाचाथ भक्त्या प्रत्यक्षरूपधृक्

cāturmāsye'tha saṁpūrṇe devo hariharātmakaḥ prasannastānuvācātha bhaktyā pratyakṣarūpadhṛk

तत्पश्चात् चातुर्मास्य पूर्ण होने पर हरिहरस्वरूप देव प्रसन्न होकर, भक्तिवश साक्षात् रूप धारण कर, उनसे बोले —

श्लोक 4 (skanda.6.251.4)

यूयं गच्छत देवेश महाव्रतपरायणाः । भुंक्त स्वान्स्वांश्चाधिकारान्मया ते दानवा हताः

yūyaṁ gacchata deveśa mahāvrataparāyaṇāḥ bhuṁkta svānsvāṁścādhikārānmayā te dānavā hatāḥ

हे महाव्रतपरायण देवगण! तुम अब जाओ और अपने-अपने अधिकारों को भोगो; मेरे द्वारा वे दानव मार दिए गए हैं।

श्लोक 5 (skanda.6.251.5)

इत्युक्त्वा देवदेवेशावैक्यरूपधरौ यदा । गणानां देवतानां च बुद्धिं निर्भेदतां तदा

ityuktvā devadeveśāvaikyarūpadharau yadā gaṇānāṁ devatānāṁ ca buddhiṁ nirbhedatāṁ tadā

ऐसा कहकर, एकत्वरूप धारण करनेवाले वे दोनों देवदेवेश जब गणों और देवताओं की बुद्धि को अभेदभाव की ओर

श्लोक 6 (skanda.6.251.6)

नयन्तौ तौ तदा चेशा बभूवतुररिन्दमौ । तेऽपि देवा निराबाधा हृष्टचित्ता ह्यभेदतः

nayantau tau tadā ceśā babhūvaturarindamau te'pi devā nirābādhā hṛṣṭacittā hyabhedataḥ

ले जा रहे थे, तब वे दोनों ईश शत्रुओं के दमनकर्ता बन गए। देवता भी उस अभेदभाव से बाधारहित और प्रसन्नचित्त होकर,

श्लोक 7 (skanda.6.251.7)

प्रययुः स्वांश्चाधिकारान्विमानगणकोटिभिः । गालव उवाच । तथा तत्रापि ते देवाः पार्वत्याः शापमोहिताः

prayayuḥ svāṁścādhikārānvimānagaṇakoṭibhiḥ gālava uvāca tathā tatrāpi te devāḥ pārvatyāḥ śāpamohitāḥ

और करोड़ों विमानों के समूह के साथ अपने-अपने अधिकारों की ओर चल दिए। गालव ने कहा — इसी प्रकार वहाँ भी वे देवता, पार्वती के शाप से मोहित होकर,

श्लोक 8 (skanda.6.251.8)

स्तुत्वा तां बिल्वपत्रैश्च पूजयित्वा महेश्वरीम् । प्रसन्नवदनां स्तुत्वा प्रणिपत्य पुनःपुनः

stutvā tāṁ bilvapatraiśca pūjayitvā maheśvarīm prasannavadanāṁ stutvā praṇipatya punaḥpunaḥ

बिल्वपत्रों से उस महेश्वरी की पूजा और स्तुति करके, उनके प्रसन्न मुख की स्तुति करके, बार-बार प्रणाम करके,

श्लोक 9 (skanda.6.251.9)

सा प्रोवाच ततो देवान्विश्वमाता तु संस्तुता । मम शापो वृथा नैव भविष्यति सुरोत्तमाः

sā provāca tato devānviśvamātā tu saṁstutā mama śāpo vṛthā naiva bhaviṣyati surottamāḥ

तब उस प्रकार स्तुति की गई विश्वमाता ने देवताओं से कहा — हे श्रेष्ठ देवगण! मेरा शाप व्यर्थ नहीं होगा।

श्लोक 10 (skanda.6.251.10)

तथापि कृतपापानां करवाणि कृपां च वः । स्वर्गे दृषन्मया नैव भविष्यथ सुरोत्तमाः

tathāpi kṛtapāpānāṁ karavāṇi kṛpāṁ ca vaḥ svarge dṛṣanmayā naiva bhaviṣyatha surottamāḥ

तथापि पाप करनेवाले तुम पर मैं कृपा करती हूँ — हे श्रेष्ठ देवगण! तुम स्वर्ग में मेरे द्वारा पत्थर नहीं बनोगे।

श्लोक 11 (skanda.6.251.11)

मर्त्यलोकं च संप्राप्य प्रतिमासु च सर्वशः । सर्वे देवाश्च वरदा लोकानां प्रभविष्यथ

martyalokaṁ ca saṁprāpya pratimāsu ca sarvaśaḥ sarve devāśca varadā lokānāṁ prabhaviṣyatha

बल्कि मृत्युलोक को प्राप्त कर तथा सर्वत्र प्रतिमाओं में स्थित होकर, तुम सभी देवगण वरदाता होकर लोकों पर प्रभुत्व पाओगे।

श्लोक 12 (skanda.6.251.12)

पाणिग्रहेण विहिता ये कुमाराः कुमारिकाः । तेषांतेषां प्रजाश्चैव भविष्यथ न संशयः

pāṇigraheṇa vihitā ye kumārāḥ kumārikāḥ teṣāṁteṣāṁ prajāścaiva bhaviṣyatha na saṁśayaḥ

पाणिग्रहण संस्कार से जो कुमार और कुमारियाँ विधिपूर्वक जुड़ते हैं, उन-उन सबकी सन्तान के रूप में तुम प्रकट होगे, इसमें संशय नहीं।

श्लोक 13 (skanda.6.251.13)

इत्युक्त्वा सा भगवती देवतानां वरप्रदा । विष्णुं महेश्वरं चैव प्रोवाच कुपिता भृशम्

ityuktvā sā bhagavatī devatānāṁ varapradā viṣṇuṁ maheśvaraṁ caiva provāca kupitā bhṛśam

ऐसा कहकर देवताओं को वर देनेवाली वह भगवती अत्यन्त कुपित होकर विष्णु तथा महेश्वर से बोलीं —

श्लोक 14 (skanda.6.251.14)

देवास्तस्या भयान्नष्टा मर्त्येषु प्रतिमां गताः । भक्तानां मानसं भावं पूरयन्तः सुसंस्थिताः

devāstasyā bhayānnaṣṭā martyeṣu pratimāṁ gatāḥ bhaktānāṁ mānasaṁ bhāvaṁ pūrayantaḥ susaṁsthitāḥ

उसके भय से देवता अन्तर्धान हो गए और मनुष्यलोक में प्रतिमाओं में जाकर, भक्तों के मन के भाव को पूर्ण करते हुए सुस्थित हो गए।

श्लोक 15 (skanda.6.251.15)

यस्माद्विष्णो महेशानस्त्वयाऽपि न निषेधितः । तस्मात्त्वमपि पाषाणो भविष्यसि न संशयः

yasmādviṣṇo maheśānastvayā'pi na niṣedhitaḥ tasmāttvamapi pāṣāṇo bhaviṣyasi na saṁśayaḥ

हे विष्णु! चूँकि महेशान को भी तुमने नहीं रोका, इसलिए तुम भी निश्चय ही पत्थर बनोगे।

श्लोक 16 (skanda.6.251.16)

हरोऽप्यश्ममयं रूपं प्राप्य लोकविगर्हितम् । लिंगाकारं विप्रशापान्महद्दुःखमवाप्स्यति

haro'pyaśmamayaṁ rūpaṁ prāpya lokavigarhitam liṁgākāraṁ vipraśāpānmahadduḥkhamavāpsyati

हर भी पत्थर से बना रूप पाकर, लोकनिन्दित लिंग के आकार में, ब्राह्मण के शाप से महान् दुःख प्राप्त करेंगे।

श्लोक 17 (skanda.6.251.17)

तच्छ्रुत्वा भगवान्विष्णुः पार्वतीमनुकूलयन् । उवाच प्रणतो भूत्वा हरभार्यां महेश्वरीम्

tacchrutvā bhagavānviṣṇuḥ pārvatīmanukūlayan uvāca praṇato bhūtvā harabhāryāṁ maheśvarīm

यह सुनकर भगवान् विष्णु पार्वती को अनुकूल करने के लिए, नत होकर, हर की पत्नी महेश्वरी से बोले —

श्लोक 18 (skanda.6.251.18)

श्रीविष्णुरुवाच । महाव्रते महादेवि महादेवप्रिया सदा । त्वं हि सत्त्वरजःस्था च तामसी शक्तिरुत्तमा

śrīviṣṇuruvāca mahāvrate mahādevi mahādevapriyā sadā tvaṁ hi sattvarajaḥsthā ca tāmasī śaktiruttamā

श्रीविष्णु ने कहा — हे महाव्रता, हे महादेवी, सदा महादेव को प्रिय! आप ही सत्त्व और रज में स्थित हैं तथा तामसी उत्तम शक्ति भी आप ही हैं।

श्लोक 19 (skanda.6.251.19)

मात्रात्रयसमोपेता गुणत्रयविभाविनी । मायादीनां जनित्री त्वं विश्वव्यापकरूपिणी

mātrātrayasamopetā guṇatrayavibhāvinī māyādīnāṁ janitrī tvaṁ viśvavyāpakarūpiṇī

आप तीनों मात्राओं से समान रूप से युक्त हैं, तीनों गुणों को प्रकट करनेवाली हैं। आप माया आदि की जननी और सम्पूर्ण विश्व में व्याप्त रूपवाली हैं।

श्लोक 20 (skanda.6.251.20)

वेदत्रयस्तुता त्वं च साध्यारूपेण रागिणी । अरूपा सर्वरूपा त्वं जनसन्तानदायिनी

vedatrayastutā tvaṁ ca sādhyārūpeṇa rāgiṇī arūpā sarvarūpā tvaṁ janasantānadāyinī

तीनों वेदों द्वारा स्तुत आप ही साध्यरूप से रागस्वरूपिणी हैं। रूपरहित होकर भी सर्वरूपा आप ही मनुष्यों की सन्तान देनेवाली हैं।

श्लोक 21 (skanda.6.251.21)

फलवेला महाकाली महालक्ष्मीः सरस्वती । ओंकारश्च वषट्कारस्त्वमेव हि सुरेश्वरि

phalavelā mahākālī mahālakṣmīḥ sarasvatī oṁkāraśca vaṣaṭkārastvameva hi sureśvari

फलदायी काल, महाकाली, महालक्ष्मी, सरस्वती — तथा ओंकार और वषट्कार भी, हे सुरेश्वरी, आप ही हैं।

श्लोक 22 (skanda.6.251.22)

भूतधात्रि नमस्तेऽस्तु शिवायै च नमोऽस्तु ते । रागिण्यै च विरागिण्यै विकराले नमः शुभे

bhūtadhātri namaste'stu śivāyai ca namo'stu te rāgiṇyai ca virāgiṇyai vikarāle namaḥ śubhe

हे भूतधात्री, आपको नमस्कार हो; हे शिवा, आपको नमस्कार हो। हे रागस्वरूपिणी और विरागस्वरूपिणी, हे विकराल तथा शुभे, आपको नमस्कार हो।

श्लोक 23 (skanda.6.251.23)

एवं स्तुता प्रसन्नाक्षी प्रसन्नेनांतरात्मना । उवाच परमोदारं मिथ्यारोषयुतं वचः

evaṁ stutā prasannākṣī prasannenāṁtarātmanā uvāca paramodāraṁ mithyāroṣayutaṁ vacaḥ

इस प्रकार स्तुत होकर, प्रसन्न नेत्रोंवाली तथा प्रसन्न अन्तरात्मा से युक्त उन्होंने कृत्रिम क्रोध से युक्त, अत्यन्त उदार वचन कहा —

श्लोक 24 (skanda.6.251.24)

मच्छापो नाऽन्यथा भावी जनार्दन तवाप्ययम् । तत्राऽपि संस्थितस्त्वं हि योगीश्वरविमुक्तिदः

macchāpo nā'nyathā bhāvī janārdana tavāpyayam tatrā'pi saṁsthitastvaṁ hi yogīśvaravimuktidaḥ

हे जनार्दन! मेरा यह शाप तुम पर भी अन्यथा नहीं हो सकता। तथापि उस अवस्था में स्थित रहकर भी तुम योगीश्वरों को मुक्ति देनेवाले बनोगे,

श्लोक 25 (skanda.6.251.25)

कामप्रदश्च भक्तानां चातुर्मास्ये विशेषतः । निम्नगा गंडकीनाम ब्रह्मणो दयिता सुता

kāmapradaśca bhaktānāṁ cāturmāsye viśeṣataḥ nimnagā gaṁḍakīnāma brahmaṇo dayitā sutā

और अपने भक्तों को, विशेष रूप से चातुर्मास्य में, कामनाएँ देनेवाले बनोगे। गण्डकी नाम की एक नदी है, जो ब्रह्मा की प्यारी पुत्री है,

श्लोक 26 (skanda.6.251.26)

पाषाणसारसंभूता पुण्यदात्री महाजला । तस्याः सुविमले नीरे तव वासो भविष्यति

pāṣāṇasārasaṁbhūtā puṇyadātrī mahājalā tasyāḥ suvimale nīre tava vāso bhaviṣyati

जो पत्थर के सार से उत्पन्न हुई है, पुण्य देनेवाली तथा विशाल जलवाली है। उसके अत्यन्त निर्मल जल में तुम्हारा निवास होगा,

श्लोक 27 (skanda.6.251.27)

चतुर्विंशतिभेदेन पुराणज्ञैर्निरीक्षितः । मुखे जांबूनदं चैव शालग्रामः प्रकीर्तितः

caturviṁśatibhedena purāṇajñairnirīkṣitaḥ mukhe jāṁbūnadaṁ caiva śālagrāmaḥ prakīrtitaḥ

पुराणों के ज्ञाताओं द्वारा चौबीस भेदों में देखे गए और मुख में सोने के चिह्नवाले, तुम शालग्राम नाम से प्रसिद्ध होगे।

श्लोक 28 (skanda.6.251.28)

वर्त्तुलस्तेजसः पिंडः श्रिया युक्तो भविष्यसि । सर्वसामर्थ्यसंयुक्तो योगिनामपि मोक्षदः

varttulastejasaḥ piṁḍaḥ śriyā yukto bhaviṣyasi sarvasāmarthyasaṁyukto yogināmapi mokṣadaḥ

तुम तेज के गोल पिण्ड के रूप में, श्री से युक्त होगे, सम्पूर्ण सामर्थ्य से युक्त और योगियों को भी मोक्ष देनेवाले होगे।

श्लोक 29 (skanda.6.251.29)

ये त्वां शिलागतं विष्णुं पूजयिष्यंति मानवाः । तेषां सुचिन्तितां सिद्धिं भक्तानां संप्रयच्छसि

ye tvāṁ śilāgataṁ viṣṇuṁ pūjayiṣyaṁti mānavāḥ teṣāṁ sucintitāṁ siddhiṁ bhaktānāṁ saṁprayacchasi

जो मनुष्य शिलारूप में स्थित विष्णु के रूप में तुम्हारी पूजा करेंगे, उन भक्तों को तुम उनकी सुचिन्तित सिद्धि प्रदान करोगे।

श्लोक 30 (skanda.6.251.30)

शिलागतं च देवेशं तुलस्या भक्ति तत्पराः । पूजयिष्यंति मनुजास्तेषां मुक्तिर्न दूरतः

śilāgataṁ ca deveśaṁ tulasyā bhakti tatparāḥ pūjayiṣyaṁti manujāsteṣāṁ muktirna dūrataḥ

और जो मनुष्य भक्ति में तत्पर होकर तुलसी सहित शिलागत उस देवेश की पूजा करेंगे, उनके लिए मुक्ति दूर नहीं होगी।

श्लोक 31 (skanda.6.251.31)

शिलास्थितं च यः पश्येत्त्वां विष्णुं प्रतिमागतम् । सुचक्रांकितसर्वांगं न स गच्छेद्यमालयम्

śilāsthitaṁ ca yaḥ paśyettvāṁ viṣṇuṁ pratimāgatam sucakrāṁkitasarvāṁgaṁ na sa gacchedyamālayam

और जो शिला में स्थित, प्रतिमारूप में स्थित, सभी अंगों पर चक्र के चिह्नवाले तुम विष्णु को देखेगा, वह यमलोक को नहीं जाएगा।

श्लोक 32 (skanda.6.251.32)

गालव उवाच । इति ते कथितं सर्वं शालग्रामस्य कारणम् । यथा स भगवान्विष्णुः पाषाणत्वमुपागतः

gālava uvāca iti te kathitaṁ sarvaṁ śālagrāmasya kāraṇam yathā sa bhagavānviṣṇuḥ pāṣāṇatvamupāgataḥ

गालव ने कहा — इस प्रकार तुम्हें शालग्राम का सम्पूर्ण कारण बताया गया कि किस प्रकार भगवान् विष्णु पाषाणत्व को प्राप्त हुए।

श्लोक 33 (skanda.6.251.33)

गोविन्दोऽपि महाशापं लब्ध्वा स्वभवनं गतः । पार्वती च महेशानं कुपिता प्रणमय्य च

govindo'pi mahāśāpaṁ labdhvā svabhavanaṁ gataḥ pārvatī ca maheśānaṁ kupitā praṇamayya ca

गोविन्द भी वह महान् शाप पाकर अपने भवन को चले गए। कुपित हुई पार्वती ने महेशान को भी प्रणाम कराकर,

श्लोक 34 (skanda.6.251.34)

एवं स एव भगवान्भवभूत भव्यभूतादिकृत्सकलसंस्थितिनाशनांकः । सोऽपि श्रिया सह भवोऽपि गिरीशपुत्र्या सार्द्धं चतुर्षु च द्रुमेषु निवासमाप

evaṁ sa eva bhagavānbhavabhūta bhavyabhūtādikṛtsakalasaṁsthitināśanāṁkaḥ so'pi śriyā saha bhavo'pi girīśaputryā sārddhaṁ caturṣu ca drumeṣu nivāsamāpa

इस प्रकार वे ही भगवान्, जो भूत और भविष्य के समस्त प्राणियों के आदिकर्ता तथा समस्त स्थिति और संहार के चिह्न हैं — वे विष्णु श्री के साथ और भव भी गिरिराज-पुत्री के साथ, उन चारों वृक्षों में निवास करने लगे।

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