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नागर खण्ड · अध्याय 252

वृक्षमाहात्म्यकथन

अध्याय 251अध्याय-सूचीअध्याय 253

श्लोक 1 (skanda.6.252.1)

शूद्र उवाच । महदाश्चर्यमेतद्धि यत्सुरा वृक्षरूपिणः । चातुर्मास्ये समायाते सर्ववृक्षनिवासिनः

śūdra uvāca mahadāścaryametaddhi yatsurā vṛkṣarūpiṇaḥ cāturmāsye samāyāte sarvavṛkṣanivāsinaḥ

शूद्र ने कहा — यह अत्यन्त आश्चर्य की बात है कि देवता वृक्षरूप धारण करते हैं। चातुर्मास्य के आने पर वे सभी वृक्षों में निवास करते हैं।

श्लोक 2 (skanda.6.252.2)

भगवन्के सुरास्ते तु केषुकेषु निवासिनः । एतद्विस्तरतो ब्रूहि ममानुग्रहकाम्यया

bhagavanke surāste tu keṣukeṣu nivāsinaḥ etadvistarato brūhi mamānugrahakāmyayā

हे भगवन्! वे देवता कौन हैं और किस-किस वृक्ष में निवास करते हैं? मुझ पर अनुग्रह करने की इच्छा से यह विस्तार से बताइए।

श्लोक 3 (skanda.6.252.3)

गालव उवाच । अमृतं जलमित्याहुश्चातुर्मास्ये तदिच्छया । लीलया विधृतं देवैः पिबंति द्रुमदेवताः

gālava uvāca amṛtaṁ jalamityāhuścāturmāsye tadicchayā līlayā vidhṛtaṁ devaiḥ pibaṁti drumadevatāḥ

गालव ने कहा — चातुर्मास्य में जल को अमृत कहा जाता है। देवताओं की इच्छा से लीलापूर्वक धारण किए गए उस जल को वृक्षदेवता पीते हैं।

श्लोक 4 (skanda.6.252.4)

तस्य पानान्महातृप्तिर्जायते नाऽत्र संशयः । बलं तेजश्च कांतिश्च सौष्ठवं लघुविक्रमः

tasya pānānmahātṛptirjāyate nā'tra saṁśayaḥ balaṁ tejaśca kāṁtiśca sauṣṭhavaṁ laghuvikramaḥ

उसके पान से महान् तृप्ति उत्पन्न होती है, इसमें संशय नहीं। बल, तेज, कान्ति, सौष्ठव तथा लघु पराक्रम —

श्लोक 5 (skanda.6.252.5)

गुणा एते प्रजायन्ते पानात्कृष्णांशसंभवात् । नित्यामृतस्यपानेन बलं स्वल्पं प्रजायते

guṇā ete prajāyante pānātkṛṣṇāṁśasaṁbhavāt nityāmṛtasyapānena balaṁ svalpaṁ prajāyate

ये गुण कृष्ण के अंश से उत्पन्न उस पान से उत्पन्न होते हैं। किन्तु केवल अमृत के नित्य पान से बल अत्यल्प ही उत्पन्न होता है,

श्लोक 6 (skanda.6.252.6)

भोजनं तत्प्रशंसंति नित्यमेतन्न संशयः । तस्माच्चतुर्षु मासेषु पिबन्ति जलमेव हि

bhojanaṁ tatpraśaṁsaṁti nityametanna saṁśayaḥ tasmāccaturṣu māseṣu pibanti jalameva hi

इसलिए उसी की भोजन के रूप में सदा प्रशंसा करते हैं, इसमें संशय नहीं। इसीलिए वे चारों महीनों में केवल जल ही पीते हैं।

श्लोक 7 (skanda.6.252.7)

वृक्षस्थाः पितरो देवाः प्राणिनां हितकाम्यया । वृक्षाणां सेवनं श्रेष्ठं सर्वमासेषु सर्वदा

vṛkṣasthāḥ pitaro devāḥ prāṇināṁ hitakāmyayā vṛkṣāṇāṁ sevanaṁ śreṣṭhaṁ sarvamāseṣu sarvadā

पितर और देवता प्राणियों के हित की कामना से वृक्षों में निवास करते हैं। वृक्षों की सेवा सभी महीनों में सदा ही श्रेष्ठ है,

श्लोक 8 (skanda.6.252.8)

चातुर्मास्ये विशेषेण सेविताः सौख्यकारकाः । तिलोदकेन वृक्षाणां सेचनं सर्वकामदम्

cāturmāsye viśeṣeṇa sevitāḥ saukhyakārakāḥ tilodakena vṛkṣāṇāṁ secanaṁ sarvakāmadam

और विशेष रूप से चातुर्मास्य में सेवित होने पर वे सुख देनेवाले हैं। तिलमिश्रित जल से वृक्षों का सिंचन सभी कामनाओं को पूर्ण करनेवाला है।

श्लोक 9 (skanda.6.252.9)

क्षीरवृक्षाः क्षीरयुक्तैस्तोयैः सिक्ताः शुभप्रदाः । चतुष्टयं च वृक्षाणां यच्चोक्तं पूर्वतो मया

kṣīravṛkṣāḥ kṣīrayuktaistoyaiḥ siktāḥ śubhapradāḥ catuṣṭayaṁ ca vṛkṣāṇāṁ yaccoktaṁ pūrvato mayā

दूधवाले वृक्ष दूधमिश्रित जल से सींचे जाने पर शुभ प्रदान करनेवाले होते हैं। और जो मैंने पहले उन चार वृक्षों के विषय में बताया था,

श्लोक 10 (skanda.6.252.10)

चातुर्मास्ये विशेषेण सर्वकामफलप्रदम् । ब्रह्मा तु वटमाश्रित्य प्राणिनां स वरप्रदः

cāturmāsye viśeṣeṇa sarvakāmaphalapradam brahmā tu vaṭamāśritya prāṇināṁ sa varapradaḥ

वह विशेष रूप से चातुर्मास्य में सभी कामनाओं का फल देनेवाला है। ब्रह्मा तो वटवृक्ष का आश्रय लेकर प्राणियों को वर देनेवाले हैं।

श्लोक 11 (skanda.6.252.11)

सावित्रीं तिलमास्थाय पवित्रं श्वेतभूषणम् । सुप्ते देवे विशेषेण तिलसेवा महाफला

sāvitrīṁ tilamāsthāya pavitraṁ śvetabhūṣaṇam supte deve viśeṣeṇa tilasevā mahāphalā

सावित्री देवी पवित्र, श्वेत आभूषणोंवाले तिल में निवास करती हैं। देवशयन के समय विशेष रूप से तिल की सेवा महान् फलदायी है।

श्लोक 12 (skanda.6.252.12)

तिलाः पवित्रमतुलं तिला धर्मार्थसाधकाः । तिला मोक्षप्रदाश्चैव तिलाः पापापहारिणः

tilāḥ pavitramatulaṁ tilā dharmārthasādhakāḥ tilā mokṣapradāścaiva tilāḥ pāpāpahāriṇaḥ

तिल अतुलनीय पवित्रता हैं, तिल धर्म और अर्थ को सिद्ध करनेवाले हैं। तिल मोक्ष देनेवाले हैं और तिल पाप को हरनेवाले हैं।

श्लोक 13 (skanda.6.252.13)

तिला विशेषफलदास्तिलाः शत्रुविनाशनाः । तिलाः सर्वेषु पुण्येषु प्रथमं समुदाहृताः

tilā viśeṣaphaladāstilāḥ śatruvināśanāḥ tilāḥ sarveṣu puṇyeṣu prathamaṁ samudāhṛtāḥ

तिल विशेष फल देनेवाले हैं, तिल शत्रुओं का विनाश करनेवाले हैं। सभी पुण्य कर्मों में तिल को प्रथम कहा गया है।

श्लोक 14 (skanda.6.252.14)

न तिला धान्यमित्याहुर्देवधान्यमिति स्मृतम् । तस्मात्सर्वेषु दानेषु तिलदानं महोत्तमम्

na tilā dhānyamityāhurdevadhānyamiti smṛtam tasmātsarveṣu dāneṣu tiladānaṁ mahottamam

तिल को केवल धान्य नहीं कहा जाता, वह देवताओं का धान्य कहा गया है। इसलिए सभी दानों में तिलदान सर्वोत्तम है।

श्लोक 15 (skanda.6.252.15)

कनकेन युता येन तिलादत्तास्तु शूद्रज । ब्रह्महत्यादिपापानां विनाशस्तेन वै कृतः

kanakena yutā yena tilādattāstu śūdraja brahmahatyādipāpānāṁ vināśastena vai kṛtaḥ

हे शूद्रपुत्र! जिसने सोने से युक्त तिल दान किए हैं, उसने निश्चय ही ब्रह्महत्या आदि पापों का विनाश कर दिया है।

श्लोक 16 (skanda.6.252.16)

सावित्री च तिलाः प्रोक्ता सर्वकार्यार्थसाधकाः । तिलैस्तु तर्पणं कुर्याच्चातुर्मास्ये विशेषतः

sāvitrī ca tilāḥ proktā sarvakāryārthasādhakāḥ tilaistu tarpaṇaṁ kuryāccāturmāsye viśeṣataḥ

तिल को सावित्री ही कहा गया है, जो सभी कार्यों और अर्थों को सिद्ध करनेवाली है। विशेष रूप से चातुर्मास्य में तिलों से तर्पण करना चाहिए।

श्लोक 17 (skanda.6.252.17)

तिलानां दर्शनं पुण्यं स्पर्शनं सेवनं तथा । हवनं भक्षणं चैव शरीरोद्वर्त्तनं तथा

tilānāṁ darśanaṁ puṇyaṁ sparśanaṁ sevanaṁ tathā havanaṁ bhakṣaṇaṁ caiva śarīrodvarttanaṁ tathā

तिलों का दर्शन पुण्यकारी है, वैसे ही उनका स्पर्श और सेवन। उनका हवन, भक्षण तथा शरीर पर उनका उबटन भी पुण्यकारी है।

श्लोक 18 (skanda.6.252.18)

सर्वथा तिलवृक्षोऽयं दर्शनादेव पापहा । चातुर्मास्ये विशेषेण सेवितः सर्वसौख्यदः

sarvathā tilavṛkṣo'yaṁ darśanādeva pāpahā cāturmāsye viśeṣeṇa sevitaḥ sarvasaukhyadaḥ

यह तिलपौधा सब प्रकार से, दर्शन मात्र से पाप का नाशक है। विशेष रूप से चातुर्मास्य में सेवित होकर यह सभी सुख देनेवाला है।

श्लोक 19 (skanda.6.252.19)

महेन्द्रो यवमास्थाय स्थितो भूतहिते रतः । यवस्य सेवनं पुण्यं दर्शनं स्पर्शनं तथा

mahendro yavamāsthāya sthito bhūtahite rataḥ yavasya sevanaṁ puṇyaṁ darśanaṁ sparśanaṁ tathā

महेन्द्र जौ में निवास करके प्राणियों के हित में तत्पर रहते हैं। जौ की सेवा पुण्यकारी है, वैसे ही उसका दर्शन और स्पर्श,

श्लोक 20 (skanda.6.252.20)

यवैस्तु तर्पणं कुर्याद्देवानां दत्तमक्षयम् । प्रजानां पतयः सर्वे चूतवृक्षमुपाश्रिताः

yavaistu tarpaṇaṁ kuryāddevānāṁ dattamakṣayam prajānāṁ patayaḥ sarve cūtavṛkṣamupāśritāḥ

और जौ से तर्पण करना चाहिए — देवताओं को दिया गया वह अक्षय होता है। प्रजापति सभी आम्रवृक्ष का आश्रय लिए हुए हैं,

श्लोक 21 (skanda.6.252.21)

गन्धर्वा मलयं वृक्षमगुरुं गणनायकः । समुद्रा वेतसं वृक्षं यक्षा पुन्नागमेव च

gandharvā malayaṁ vṛkṣamaguruṁ gaṇanāyakaḥ samudrā vetasaṁ vṛkṣaṁ yakṣā punnāgameva ca

गन्धर्व चन्दन-वृक्ष का, गणनायक अगुरु का, समुद्र वेतस-वृक्ष का, और यक्ष पुन्नाग-वृक्ष का आश्रय लिए हुए हैं।

श्लोक 22 (skanda.6.252.22)

नागवृक्षं तथा नागाः सिद्धाः कंकोलकं द्रुमम् । गुह्यकाः पनसं चैव किन्नरा मरिचं श्रिताः

nāgavṛkṣaṁ tathā nāgāḥ siddhāḥ kaṁkolakaṁ drumam guhyakāḥ panasaṁ caiva kinnarā maricaṁ śritāḥ

नाग नागवृक्ष का, सिद्ध कंकोल-वृक्ष का, गुह्यक कटहल-वृक्ष का, तथा किन्नर काली मिर्च के पौधे का आश्रय लिए हुए हैं।

श्लोक 23 (skanda.6.252.23)

यष्टीमधु समाश्रित्य कन्दर्पोऽभूद्व्यवस्थितः । रक्तांजनं महावृक्षं वह्निराश्रित्य तिष्ठति

yaṣṭīmadhu samāśritya kandarpo'bhūdvyavasthitaḥ raktāṁjanaṁ mahāvṛkṣaṁ vahnirāśritya tiṣṭhati

कन्दर्प (काम) मुलेठी का आश्रय लेकर स्थित हुए हैं, और अग्नि रक्तांजन नामक महावृक्ष का आश्रय लेकर स्थित रहते हैं।

श्लोक 24 (skanda.6.252.24)

यमो विभीतकं चैव बकुलं नैर्ऋताधिपः । वरुणः खर्जुरीवृक्षं पूगवृक्षं च मारुतः

yamo vibhītakaṁ caiva bakulaṁ nairṛtādhipaḥ varuṇaḥ kharjurīvṛkṣaṁ pūgavṛkṣaṁ ca mārutaḥ

यम विभीतक-वृक्ष का, नैऋत्याधिप बकुल-वृक्ष का, वरुण खजूर-वृक्ष का, और मारुत सुपारी-वृक्ष का आश्रय लिए हुए हैं।

श्लोक 25 (skanda.6.252.25)

धनदोऽक्षोटकं वृक्षं रुद्राश्च बदरीद्रुमम् । सप्तर्षीणां महाताला बहुलश्चामरैर्वृतः

dhanado'kṣoṭakaṁ vṛkṣaṁ rudrāśca badarīdrumam saptarṣīṇāṁ mahātālā bahulaścāmarairvṛtaḥ

धनद अखरोट-वृक्ष का और रुद्रगण बेर-वृक्ष का आश्रय लिए हुए हैं। सप्तर्षियों के लिए महान् तालवृक्ष हैं, जो देवगणों से घिरे रहते हैं।

श्लोक 26 (skanda.6.252.26)

जंबूर्मेघैः परिवृतः कृष्णवर्णोऽघनाशनः । कृष्णस्य सदृशो वर्णस्तेन जंबू नगोत्तमः

jaṁbūrmeghaiḥ parivṛtaḥ kṛṣṇavarṇo'ghanāśanaḥ kṛṣṇasya sadṛśo varṇastena jaṁbū nagottamaḥ

जामुन का वृक्ष मेघों से घिरा हुआ, कृष्ण वर्णवाला, पापनाशक है। उसका वर्ण कृष्ण के समान है, इसीलिए जामुन वृक्षों में श्रेष्ठ है।

श्लोक 27 (skanda.6.252.27)

तत्फलैर्वासुदेवस्तु प्रीतो भवति दानतः । जंबूवृक्षं समाश्रित्य कुर्वंति द्विजभोजनम्

tatphalairvāsudevastu prīto bhavati dānataḥ jaṁbūvṛkṣaṁ samāśritya kurvaṁti dvijabhojanam

उसके फलों के दान से वासुदेव प्रसन्न होते हैं। जामुन के वृक्ष का आश्रय लेकर लोग ब्राह्मणों को भोजन कराते हैं,

श्लोक 28 (skanda.6.252.28)

तेषां प्रीतो हरिर्दद्यात्पुरुषार्थचतुष्टयम् । चातुर्मास्ये समायाते सुप्ते देवे जनार्दने

teṣāṁ prīto harirdadyātpuruṣārthacatuṣṭayam cāturmāsye samāyāte supte deve janārdane

और उनसे प्रसन्न होकर हरि पुरुषार्थ-चतुष्टय प्रदान करते हैं। चातुर्मास्य के आने पर, देव जनार्दन के शयन करने पर,

श्लोक 29 (skanda.6.252.29)

ब्राह्मणान्भोजयेद्यस्तु सपत्नीकाञ्छुचिः स्थितः । तेन नारायणस्तुष्टो भवेल्लक्ष्मीसहायवान्

brāhmaṇānbhojayedyastu sapatnīkāñchuciḥ sthitaḥ tena nārāyaṇastuṣṭo bhavellakṣmīsahāyavān

जो शुद्ध रहकर पत्नीसहित ब्राह्मणों को भोजन कराता है, उससे लक्ष्मी सहित नारायण प्रसन्न होते हैं।

श्लोक 30 (skanda.6.252.30)

लक्ष्मीनारायणप्रीत्यै वस्त्रालंकरणैः शुभैः । परिधाय सपत्नीकः कृतकृत्यो भवेन्नरः

lakṣmīnārāyaṇaprītyai vastrālaṁkaraṇaiḥ śubhaiḥ paridhāya sapatnīkaḥ kṛtakṛtyo bhavennaraḥ

लक्ष्मी-नारायण को प्रसन्न करने के लिए शुभ वस्त्र और आभूषणों से युक्त कर देने पर, पत्नीसहित वह मनुष्य कृतकृत्य हो जाता है।

श्लोक 31 (skanda.6.252.31)

यद्रात्रित्रितयेनैव वटाशोकभवेन च । फलं संजायते तच्च जंबुना द्विजभोजनात्

yadrātritritayenaiva vaṭāśokabhavena ca phalaṁ saṁjāyate tacca jaṁbunā dvijabhojanāt

तीन रात्रियों के व्रत से तथा वट और अशोक से जो फल प्राप्त होता है, वही फल जामुन के नीचे ब्राह्मण-भोजन कराने से प्राप्त होता है।

श्लोक 32 (skanda.6.252.32)

तस्मिन्दिने एकभुक्तं कारयेत्कृत्यकृत्तदा । बहुना च किमुक्तेन जंबूवृक्षप्रपूजनात्

tasmindine ekabhuktaṁ kārayetkṛtyakṛttadā bahunā ca kimuktena jaṁbūvṛkṣaprapūjanāt

उस दिन कर्तव्य पालन करनेवाला मनुष्य एक ही समय भोजन करे। अधिक कहने से क्या लाभ — जामुन के वृक्ष की पूजा करने से

श्लोक 33 (skanda.6.252.33)

पुत्रपौत्रधनैर्युक्तो जायते नात्र संशयः । जंबूर्मेघैः परिवृता विद्युताऽशोक एव च

putrapautradhanairyukto jāyate nātra saṁśayaḥ jaṁbūrmeghaiḥ parivṛtā vidyutā'śoka eva ca

मनुष्य निश्चय ही पुत्र, पौत्र और धन से युक्त हो जाता है। जामुन मेघों से घिरी हुई है, और अशोक विद्युत् से घिरा हुआ है।

श्लोक 34 (skanda.6.252.34)

वसुभिः स्वीकृतो नित्यं प्रियालश्च महानगः । आदित्यैस्तु जपावृक्षो ह्यश्विभ्यां मदनस्तथा

vasubhiḥ svīkṛto nityaṁ priyālaśca mahānagaḥ ādityaistu japāvṛkṣo hyaśvibhyāṁ madanastathā

प्रियाल नामक महावृक्ष सदा वसुओं द्वारा स्वीकृत है। जपा-वृक्ष आदित्यों द्वारा, और मदन-वृक्ष उसी प्रकार अश्विनीकुमारों द्वारा स्वीकृत है।

श्लोक 35 (skanda.6.252.35)

विश्वेभिश्च मधूकश्च गुग्गुलः पिशिताशनैः । सूर्येणार्कः पवित्रेण सोमे नाथ त्रिपत्रकः

viśvebhiśca madhūkaśca guggulaḥ piśitāśanaiḥ sūryeṇārkaḥ pavitreṇa some nātha tripatrakaḥ

महुआ विश्वेदेवों द्वारा और गुग्गुल मांसाहारियों (राक्षसों) द्वारा स्वीकृत है। पवित्र सूर्य द्वारा आक और, हे नाथ, चन्द्रमा द्वारा त्रिपत्रक (बिल्व) स्वीकृत है।

श्लोक 36 (skanda.6.252.36)

खदिरो भूमिपुत्रेण अपामार्गो बुधेन च । अश्वत्थो गुरुणा चैव शुक्रेणोदुम्बरस्तथा

khadiro bhūmiputreṇa apāmārgo budhena ca aśvattho guruṇā caiva śukreṇodumbarastathā

खैर भूमिपुत्र (मंगल) द्वारा और अपामार्ग बुध द्वारा स्वीकृत है। अश्वत्थ गुरु द्वारा और उसी प्रकार गूलर शुक्र द्वारा स्वीकृत है।

श्लोक 37 (skanda.6.252.37)

शमी शनैश्चरेणाथ स्वीकृता शूद्रजातिभिः । राहुणा स्वीकृता दूर्वा पितॄणां तर्पणोचिता

śamī śanaiścareṇātha svīkṛtā śūdrajātibhiḥ rāhuṇā svīkṛtā dūrvā pitṝṇāṁ tarpaṇocitā

शमी शनैश्चर द्वारा और शूद्रजाति के लोगों द्वारा स्वीकृत है। दूर्वा राहु द्वारा स्वीकृत है, जो पितरों के तर्पण के योग्य है,

श्लोक 38 (skanda.6.252.38)

विष्णोश्च दयिता नित्यं चातुर्मास्ये विशेषतः । केतुना स्वीकृतो दर्भो याज्ञिकेयो महाफलः

viṣṇośca dayitā nityaṁ cāturmāsye viśeṣataḥ ketunā svīkṛto darbho yājñikeyo mahāphalaḥ

और सदा विष्णु को प्रिय है, विशेष रूप से चातुर्मास्य में। दर्भ केतु द्वारा स्वीकृत है, जो यज्ञों में उपयोगी और महाफलदायी है,

श्लोक 39 (skanda.6.252.39)

विना येन शुभं कर्म संपूर्णं नैव जायते । पवित्राणां पवित्रं यो मङ्गलानां च मङ्गलम्

vinā yena śubhaṁ karma saṁpūrṇaṁ naiva jāyate pavitrāṇāṁ pavitraṁ yo maṅgalānāṁ ca maṅgalam

जिसके बिना कोई भी शुभ कर्म पूर्ण नहीं होता — जो पवित्रों का भी पवित्र और मंगलों का भी मंगल है,

श्लोक 40 (skanda.6.252.40)

मुमूर्षूणां मोक्षरूपो धरासंस्थो महाद्रुमः । अस्मिन्वसंति सततं ब्रह्मविष्णुशिवाः सदा

mumūrṣūṇāṁ mokṣarūpo dharāsaṁstho mahādrumaḥ asminvasaṁti satataṁ brahmaviṣṇuśivāḥ sadā

जो मरणासन्न लोगों के लिए साक्षात् मोक्षस्वरूप है, धरती पर स्थित यह महातृण-राज — इसमें ब्रह्मा, विष्णु और शिव सदा निवास करते हैं,

श्लोक 41 (skanda.6.252.41)

मूले मध्ये तथाऽग्रे च यस्य नामापि तृप्तिदम् । अन्येऽपि देवा वृक्षांस्तानधिश्रित्य महाद्रुमाः

mūle madhye tathā'gre ca yasya nāmāpi tṛptidam anye'pi devā vṛkṣāṁstānadhiśritya mahādrumāḥ

इसके मूल, मध्य तथा अग्रभाग में — जिसका नाम भी तृप्ति देनेवाला है। अन्य देवता भी उन-उन महावृक्षों का आश्रय लेकर,

श्लोक 42 (skanda.6.252.42)

प्रवर्त्तंते हि मासेषु चतुर्षु च न संशयः । चातुर्मास्ये देवपत्न्यः सर्वा वल्लीसमाश्रिताः

pravarttaṁte hi māseṣu caturṣu ca na saṁśayaḥ cāturmāsye devapatnyaḥ sarvā vallīsamāśritāḥ

उन चारों महीनों में सक्रिय रहते हैं, इसमें संशय नहीं। चातुर्मास्य में देवपत्नियाँ सभी लताओं का आश्रय लेती हैं,

श्लोक 43 (skanda.6.252.43)

प्रयच्छंति नृणां कामान्वांछितान्सेविता अपि । तस्मात्सर्वात्मभावेन पिप्पलो येन सेवितः

prayacchaṁti nṛṇāṁ kāmānvāṁchitānsevitā api tasmātsarvātmabhāvena pippalo yena sevitaḥ

और सेवित होने पर मनुष्यों की इच्छित कामनाओं को प्रदान करती हैं। इसलिए जिसने सर्वात्मभाव से पीपल की सेवा की है,

श्लोक 44 (skanda.6.252.44)

सेविताः सकला वृक्षाश्चातुर्मास्ये विशेषतः । तुलसी सेविता येन सर्ववल्यश्च सेविताः

sevitāḥ sakalā vṛkṣāścāturmāsye viśeṣataḥ tulasī sevitā yena sarvavalyaśca sevitāḥ

उसके द्वारा विशेष रूप से चातुर्मास्य में समस्त वृक्ष सेवित हो जाते हैं। और जिसने तुलसी की सेवा की है, उसके द्वारा सभी लताएँ सेवित हो जाती हैं।

श्लोक 45 (skanda.6.252.45)

आप्यायितं जगत्सर्वमाब्रह्मस्तंबसेवितम् । चातुर्मास्ये गृहस्थेन वानप्रस्थेन वा पुनः

āpyāyitaṁ jagatsarvamābrahmastaṁbasevitam cāturmāsye gṛhasthena vānaprasthena vā punaḥ

इस प्रकार ब्रह्मा से लेकर तृण-पर्यन्त सेवित यह सम्पूर्ण जगत् तृप्त हो जाता है। चातुर्मास्य में गृहस्थ द्वारा, या पुनः वानप्रस्थ द्वारा,

श्लोक 46 (skanda.6.252.46)

ब्रह्मचारियतिभ्यां च सेविता मोक्षदायिनी । एतेषां सर्ववृक्षाणां छेदनं नैव कारयेत्

brahmacāriyatibhyāṁ ca sevitā mokṣadāyinī eteṣāṁ sarvavṛkṣāṇāṁ chedanaṁ naiva kārayet

तथा ब्रह्मचारी और यति द्वारा सेवित होकर यह मोक्षदायिनी बनती है। इन सभी वृक्षों का छेदन कभी नहीं कराना चाहिए,

श्लोक 47 (skanda.6.252.47)

चातुर्मास्ये विशेषेण विना यज्ञादिकारणम् । एतदुक्तमशेषेण यत्पृष्टोऽहमिह त्वया

cāturmāsye viśeṣeṇa vinā yajñādikāraṇam etaduktamaśeṣeṇa yatpṛṣṭo'hamiha tvayā

विशेष रूप से चातुर्मास्य में, यज्ञ आदि कारण के बिना। जो तुमने मुझसे यहाँ पूछा था, वह सब मैंने पूर्णतः बता दिया —

श्लोक 48 (skanda.6.252.48)

यथा वृक्षत्वमापन्ना देवाः सर्वेऽपि शूद्रज

yathā vṛkṣatvamāpannā devāḥ sarve'pi śūdraja

हे शूद्रपुत्र! अर्थात् किस प्रकार सभी देवता वृक्षत्व को प्राप्त हुए।

श्लोक 49 (skanda.6.252.49)

अश्वत्थमेकं पिचुमन्दमेकं न्यग्रोधमेकं दश तित्तिडीश्च । कपित्थबिल्वामलकीत्रयं च एतांश्च दृष्ट्वा नरकं न पश्येत्

aśvatthamekaṁ picumandamekaṁ nyagrodhamekaṁ daśa tittiḍīśca kapitthabilvāmalakītrayaṁ ca etāṁśca dṛṣṭvā narakaṁ na paśyet

एक अश्वत्थ, एक नीम, एक बरगद, दस इमली के वृक्ष, तथा कैथ, बिल्व और आँवले के तीन वृक्ष — इन्हें देखकर मनुष्य नरक नहीं देखता।

श्लोक 50 (skanda.6.252.50)

सर्वे देवा विश्ववृक्षेशयाश्च कृष्णा धारा कृष्णमध्याग्रकाश्च । यस्मिन्देवे सेविते विश्वपूज्ये सर्वं तृप्तं जायते विश्वमेतत्

sarve devā viśvavṛkṣeśayāśca kṛṣṇā dhārā kṛṣṇamadhyāgrakāśca yasmindeve sevite viśvapūjye sarvaṁ tṛptaṁ jāyate viśvametat

सभी देवता विश्व के वृक्षों में शयन करनेवाले हैं, जिनकी धारा, मध्य और अग्रभाग कृष्णवर्ण के हैं। विश्व-पूज्य उस देव के सेवित होने पर यह सम्पूर्ण विश्व तृप्त हो जाता है।

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