नागर खण्ड · अध्याय 253
शंकरकृतपार्वत्यनुनय
श्लोक 1 (skanda.6.253.1)
शूद्र उवाच । पार्वतीकुपिता देवी कथं देवेन शूलिना । प्रसादं च गता शप्त्वा यत्कोपात्क्षुभ्यते जगत्
śūdra uvāca pārvatīkupitā devī kathaṁ devena śūlinā prasādaṁ ca gatā śaptvā yatkopātkṣubhyate jagat
शूद्र ने कहा — पार्वती देवी, जिनके कोप से जगत् क्षुब्ध हो उठता है, शूलधारी देव पर कुपित होकर, शाप देकर, फिर किस प्रकार प्रसन्नता को प्राप्त हुईं,
श्लोक 2 (skanda.6.253.2)
कथं स भगवान्रुद्रो भार्याशापमवाप ह । वैकृतं रूपमासाद्य पुनर्दिव्यं वपुः श्रितः
kathaṁ sa bhagavānrudro bhāryāśāpamavāpa ha vaikṛtaṁ rūpamāsādya punardivyaṁ vapuḥ śritaḥ
और किस प्रकार भगवान् रुद्र ने अपनी पत्नी के शाप को प्राप्त किया, विकृत रूप पाकर, और फिर पुनः अपने दिव्य शरीर का आश्रय लिया?
श्लोक 3 (skanda.6.253.3)
गालव उवाच । देवा रूपाण्यदृश्यानि कृत्वा देव्या महाभयात् । मनुष्यलोके सकले प्रतिमासु च संस्थिताः
gālava uvāca devā rūpāṇyadṛśyāni kṛtvā devyā mahābhayāt manuṣyaloke sakale pratimāsu ca saṁsthitāḥ
गालव ने कहा — देवी के महान् भय से देवताओं ने अपने रूपों को अदृश्य बनाकर, सम्पूर्ण मनुष्यलोक में प्रतिमाओं में स्थित हो गए।
श्लोक 4 (skanda.6.253.4)
तेषामपि प्रसन्ना साऽनुग्रहं समुपाकरोत् । विष्णुस्तुता महाभागा विश्वमाताऽघनाशिनी
teṣāmapi prasannā sā'nugrahaṁ samupākarot viṣṇustutā mahābhāgā viśvamātā'ghanāśinī
उनके प्रति भी प्रसन्न होकर, विष्णु द्वारा स्तुत, महाभागा, पापनाशिनी, विश्व की माता उस देवी ने अनुग्रह प्रदान किया।
श्लोक 5 (skanda.6.253.5)
तेषां बलाच्च पार्वत्याः शापभारेण यन्त्रितः । तां नित्यमेवानुनयन्नृचे सोवाच शंकरम्
teṣāṁ balācca pārvatyāḥ śāpabhāreṇa yantritaḥ tāṁ nityamevānunayannṛce sovāca śaṁkaram
फिर भी, पार्वती के शाप के भार से आबद्ध, उन्हें (शंकर को) निरन्तर मनाते हुए भी, वे देवी शंकर से इस प्रकार बोलीं —
श्लोक 6 (skanda.6.253.6)
एते देवा विश्वपूज्या विश्वस्य च वरप्रदाः । मत्प्रसादाद्भविष्यंति भक्तितस्तोषिता नरैः
ete devā viśvapūjyā viśvasya ca varapradāḥ matprasādādbhaviṣyaṁti bhaktitastoṣitā naraiḥ
"ये देवता विश्व के पूज्य तथा विश्व को वर देनेवाले होंगे। मेरे प्रसाद से ही वे मनुष्यों की भक्ति से सन्तुष्ट होंगे।"
श्लोक 7 (skanda.6.253.7)
त्वामृते मम कर्मेदं कृतं साधुविनिन्दितम् । वेद्यां विवाहकाले च प्रत्यक्षं सर्वसाक्षिकम्
tvāmṛte mama karmedaṁ kṛtaṁ sādhuvininditam vedyāṁ vivāhakāle ca pratyakṣaṁ sarvasākṣikam
"तुम्हें छोड़कर मेरा यह कर्म साधुजनों द्वारा उचित ही निन्दित हुआ है — वह प्रतिज्ञा जो विवाह के समय वेदी पर सबके समक्ष, सबकी साक्षी में की गई थी,"
श्लोक 8 (skanda.6.253.8)
यत्सप्तमंडलानां च गमनं च करार्पणम् । वह्निश्च वरुणः कृष्णो देवताश्च सवल्लभाः
yatsaptamaṁḍalānāṁ ca gamanaṁ ca karārpaṇam vahniśca varuṇaḥ kṛṣṇo devatāśca savallabhāḥ
"अर्थात् सात मण्डलों का परिक्रमण और हाथों का ग्रहण — अग्नि, वरुण, कृष्ण, तथा अपनी-अपनी पत्नियों सहित देवताओं की उपस्थिति में,"
श्लोक 9 (skanda.6.253.9)
चतुर्दिक्ष्वंगसंयुक्ता देवब्राह्मणसंयुताः । एतेषामग्रतो दिब्यं कृत्वा त्वं जनसंसदि
caturdikṣvaṁgasaṁyuktā devabrāhmaṇasaṁyutāḥ eteṣāmagrato dibyaṁ kṛtvā tvaṁ janasaṁsadi
"जो चारों दिशाओं में उपस्थित थे, देवताओं और ब्राह्मणों सहित — इन सबके समक्ष, जनसमूह की सभा में तुमने वह दिव्य प्रतिज्ञा की थी,"
श्लोक 10 (skanda.6.253.10)
प्रमादात्सत्त्वमापन्नो व्यभिचारं कथं कृथाः । गुरवोऽपि न सन्मार्गे प्रवर्त्तंते जनौघवत्
pramādātsattvamāpanno vyabhicāraṁ kathaṁ kṛthāḥ guravo'pi na sanmārge pravarttaṁte janaughavat
"तो प्रमाद से उस भाव को पाकर तुमने व्यभिचार कैसे किया? गुरुजन भी जब सन्मार्ग पर नहीं चलते, तो साधारण जनसमूह के समान ही व्यवहृत होते हैं।"
श्लोक 11 (skanda.6.253.11)
निग्राह्याः सर्वलोकेषु प्रबुद्धैः श्रूयते श्रुतौ । पुत्रेणापि पिता शास्यः शिष्येणापि गुरुः स्वयम्
nigrāhyāḥ sarvalokeṣu prabuddhaiḥ śrūyate śrutau putreṇāpi pitā śāsyaḥ śiṣyeṇāpi guruḥ svayam
"श्रुति में सुना जाता है कि सभी लोकों में उन्हें विवेकीजनों द्वारा रोका जाना चाहिए। पुत्र द्वारा भी पिता का सुधार होना चाहिए, शिष्य द्वारा भी स्वयं गुरु का,"
श्लोक 12 (skanda.6.253.12)
क्षत्रियैर्ब्राह्मणः शास्यो भार्यया च पतिस्तथा । उन्मार्गगामिनं श्रेष्ठमपि वेदान्तपारगम्
kṣatriyairbrāhmaṇaḥ śāsyo bhāryayā ca patistathā unmārgagāminaṁ śreṣṭhamapi vedāntapāragam
"क्षत्रियों द्वारा ब्राह्मण का, और उसी प्रकार पत्नी द्वारा पति का सुधार होना चाहिए। उन्मार्गगामी को, चाहे वह श्रेष्ठ हो, वेदान्त का पारगामी क्यों न हो,"
श्लोक 13 (skanda.6.253.13)
नीचैरपि प्रशास्येत श्रुतिराह सनातनी । सन्मार्ग एव सर्वत्र पूज्यते नापथः क्वचित्
nīcairapi praśāsyeta śrutirāha sanātanī sanmārga eva sarvatra pūjyate nāpathaḥ kvacit
"नीच पुरुषों द्वारा भी शासित किया जाना चाहिए — ऐसा सनातन श्रुति कहती है। सर्वत्र सन्मार्ग की ही पूजा होती है, कुमार्ग की कहीं नहीं।"
श्लोक 14 (skanda.6.253.14)
येन स्वकुलजो धर्मस्त्यक्तः स पतितो भवेत् । मृतश्च नरकं प्राप्य दुःखभारेण युज्यते
yena svakulajo dharmastyaktaḥ sa patito bhavet mṛtaśca narakaṁ prāpya duḥkhabhāreṇa yujyate
"जिसके द्वारा अपने कुल में जन्मा हुआ धर्म त्यागा जाता है, वह पतित हो जाता है। और मरकर नरक को प्राप्त होकर दुःख के भार से युक्त होता है।"
श्लोक 15 (skanda.6.253.15)
धर्मं त्यजति नास्तिक्याज्ज्ञातिभेदमुपागतः । स निग्राह्यः सर्वलोकैर्मनुधर्मपरायणैः
dharmaṁ tyajati nāstikyājjñātibhedamupāgataḥ sa nigrāhyaḥ sarvalokairmanudharmaparāyaṇaiḥ
"जो नास्तिकता के कारण धर्म को त्याग देता है और अपने ज्ञातिजनों से भेद को प्राप्त होता है, वह मनुधर्म में तत्पर सभी लोकों द्वारा रोका जाने योग्य है।"
श्लोक 16 (skanda.6.253.16)
कुलधर्माञ्ज्ञातिधर्मान्देशधर्मान्महेश्वर । ये त्यजंति च तेऽवश्यं कुलाच्च पतिता जनाः
kuladharmāñjñātidharmāndeśadharmānmaheśvara ye tyajaṁti ca te'vaśyaṁ kulācca patitā janāḥ
"हे महेश्वर! जो लोग कुलधर्म, ज्ञातिधर्म और देशधर्म को त्याग देते हैं, वे निश्चय ही अपने कुल से पतित हो जाते हैं।"
श्लोक 17 (skanda.6.253.17)
अग्नित्यागो व्रतत्यागो वचनत्याग एव च । धर्मत्यागो नैव कार्यः कुर्वन्पतित एव हि
agnityāgo vratatyāgo vacanatyāga eva ca dharmatyāgo naiva kāryaḥ kurvanpatita eva hi
"अग्नि का त्याग, व्रत का त्याग, तथा वचन का त्याग — धर्म का त्याग कभी नहीं करना चाहिए; करनेवाला निश्चय ही पतित हो जाता है।"
श्लोक 18 (skanda.6.253.18)
न पिता न च ते माता न भ्राता स्वजनोऽपि च । पश्यते तव वार्तां च अस्पृश्यस्त्वमदन्विषम्
na pitā na ca te mātā na bhrātā svajano'pi ca paśyate tava vārtāṁ ca aspṛśyastvamadanviṣam
"न पिता, न तुम्हारी माता, न भाई, न स्वजन भी तुम्हारी बात सुनेगा। विष खा चुके हुए तुम अस्पृश्य हो गए हो,"
श्लोक 19 (skanda.6.253.19)
अस्थिमालाचिताभस्म जटाधारी कुचैलवान् । चपलो मुक्तमर्यादस्तस्थुं नार्हसि मेऽग्रतः
asthimālācitābhasma jaṭādhārī kucailavān capalo muktamaryādastasthuṁ nārhasi me'grataḥ
"अस्थियों की माला और चिता की भस्म धारण किए, जटाधारी, मलिन वस्त्रोंवाले, चंचल, मर्यादाहीन — तुम मेरे समक्ष खड़े होने योग्य नहीं हो,"
श्लोक 20 (skanda.6.253.20)
अब्रह्मण्योऽव्रती भिक्षुर्दुष्टात्मा कपटी सदा । नार्हसि त्वं मम पुरः संभाषयितुमीश्वर
abrahmaṇyo'vratī bhikṣurduṣṭātmā kapaṭī sadā nārhasi tvaṁ mama puraḥ saṁbhāṣayitumīśvara
"ब्राह्मणों के प्रति अहितकारी, व्रतरहित, भिक्षुक, दुष्ट स्वभाववाले, सदा कपटी — हे ईश्वर, तुम मेरे समक्ष बोलने के भी योग्य नहीं हो।"
श्लोक 21 (skanda.6.253.21)
एवं सा रुदती देवी बाष्पव्याकुललोचना । महादुःखयुतैवासीद्देवेशेऽनुनयत्यपि
evaṁ sā rudatī devī bāṣpavyākulalocanā mahāduḥkhayutaivāsīddeveśe'nunayatyapi
इस प्रकार रोती हुई वह देवी, आँसुओं से व्याकुल नेत्रोंवाली, देवेश के मनाने पर भी महान् दुःख से युक्त ही बनी रहीं।
श्लोक 22 (skanda.6.253.22)
पुनरेव प्रकुपिता हरं प्रोवाच भामिनी । तवार्जवं न हृदये काठिन्यं वेद्मि नित्यदा
punareva prakupitā haraṁ provāca bhāminī tavārjavaṁ na hṛdaye kāṭhinyaṁ vedmi nityadā
पुनः क्रुद्ध होकर उस भामिनी ने हर से कहा — "तुम्हारे हृदय में सरलता नहीं है, मैं तो सदा कठोरता ही जानती हूँ।"
श्लोक 23 (skanda.6.253.23)
ब्राह्मणैस्त्वासुरैरुक्तं तन्मृषा प्रतिभाति मे । यस्मान्मयि महादुष्टभाव एव कृतस्त्वया
brāhmaṇaistvāsurairuktaṁ tanmṛṣā pratibhāti me yasmānmayi mahāduṣṭabhāva eva kṛtastvayā
"ब्राह्मणों ने असुरों के विषय में जो कहा था, वह मुझे अब मिथ्या प्रतीत होता है, क्योंकि मेरे प्रति तुमने अत्यन्त दुष्ट भाव ही धारण किया है।"
श्लोक 24 (skanda.6.253.24)
ब्राह्मणा वंचिता यस्माद्ब्राह्मणैस्त्वं हनिष्यसे । एवमुक्त्वा भगवती पुनराह न किञ्चन
brāhmaṇā vaṁcitā yasmādbrāhmaṇaistvaṁ haniṣyase evamuktvā bhagavatī punarāha na kiñcana
"चूँकि ब्राह्मण छले गए हैं, इसलिए तुम ब्राह्मणों द्वारा ही मारे जाओगे।" ऐसा कहकर भगवती ने फिर कुछ नहीं कहा।
श्लोक 25 (skanda.6.253.25)
ईशः प्रसन्नवदनामुपचारैरथाकरोत् । शनैर्नीतिमयैर्वाक्यैर्हेतुमद्भिर्महेश्वरः
īśaḥ prasannavadanāmupacārairathākarot śanairnītimayairvākyairhetumadbhirmaheśvaraḥ
तब ईश महेश्वर ने उपचारों से उनके मुख को प्रसन्न किया, धीरे-धीरे नीतियुक्त और युक्तिसंगत वचनों से।
श्लोक 26 (skanda.6.253.26)
प्रसन्नलोचनां ज्ञात्वा किंचित्प्राह हरस्ततः । कोपेन कलुषं वक्त्रं पूर्णचन्द्रसमप्रभम्
prasannalocanāṁ jñātvā kiṁcitprāha harastataḥ kopena kaluṣaṁ vaktraṁ pūrṇacandrasamaprabham
उनके नेत्रों को प्रसन्न जानकर, हर ने तब उनसे कुछ कहा — जिनका पूर्णचन्द्र के समान तेजस्वी मुख क्रोध से मलिन हो गया था।
श्लोक 27 (skanda.6.253.27)
कस्मात्त्वं कुरुषे भद्रे युक्तमेव वचो न ते । सर्वभूतदया कार्या प्राणिनां हि हितेच्छया
kasmāttvaṁ kuruṣe bhadre yuktameva vaco na te sarvabhūtadayā kāryā prāṇināṁ hi hitecchayā
"हे भद्रे! तुम ऐसा क्यों करती हो? तुम्हारा यह वचन उचित नहीं है। प्राणियों के हित की इच्छा से सभी प्राणियों पर दया करनी चाहिए।"
श्लोक 28 (skanda.6.253.28)
यद्यपीष्टो हि यस्यार्थो न कार्यं परपीडनम् । जगत्सर्वं सुतप्रायं तवास्ति वरवर्णिनि
yadyapīṣṭo hi yasyārtho na kāryaṁ parapīḍanam jagatsarvaṁ sutaprāyaṁ tavāsti varavarṇini
"यद्यपि किसी का कोई प्रयोजन अभीष्ट हो, तो भी दूसरे को पीड़ा नहीं पहुँचानी चाहिए। हे वरवर्णिनी! सम्पूर्ण जगत् तुम्हारे लिए पुत्र के समान ही है।"
श्लोक 29 (skanda.6.253.29)
जगत्पूज्या त्वमेवैका सर्वरूपधरानघे । मया यदि कृतं कर्मावद्यं देव हिताय वै
jagatpūjyā tvamevaikā sarvarūpadharānaghe mayā yadi kṛtaṁ karmāvadyaṁ deva hitāya vai
"हे निष्पाप देवी! सम्पूर्ण रूपों को धारण करनेवाली तुम अकेली ही जगत्पूज्य हो। यदि मेरे द्वारा कोई निन्दनीय कर्म किया भी गया, तो वह हित के लिए ही किया गया,"
श्लोक 30 (skanda.6.253.30)
तथाप्येवं तव सुतो भविष्यति न संशयः । अथवा मम सर्वेभ्यः प्राणेभ्योऽपि गरीयसी
tathāpyevaṁ tava suto bhaviṣyati na saṁśayaḥ athavā mama sarvebhyaḥ prāṇebhyo'pi garīyasī
"तथापि इस प्रकार तुम्हारा पुत्र होगा, इसमें संशय नहीं। अथवा, तुम मेरे लिए सभी प्राणों से भी बढ़कर प्रिय हो,"
श्लोक 31 (skanda.6.253.31)
यदिच्छसि तथा कुर्यां तथा तव मनोरथान् । प्रसन्नवदना भूत्वा कथयस्व वरानने
yadicchasi tathā kuryāṁ tathā tava manorathān prasannavadanā bhūtvā kathayasva varānane
"जो तुम चाहो, वैसा ही मैं करूँगा, तथा तुम्हारे मनोरथों को भी पूर्ण करूँगा। हे वरानने! प्रसन्नमुखी होकर अपनी बात कहो।"
श्लोक 32 (skanda.6.253.32)
इत्युक्ता सा भगवती पुनराह महेश्वरम् । चातुर्मास्ये च संप्राप्ते महाव्रतधरो यदि
ityuktā sā bhagavatī punarāha maheśvaram cāturmāsye ca saṁprāpte mahāvratadharo yadi
ऐसा कहे जाने पर वह भगवती पुनः महेश्वर से बोलीं — "यदि चातुर्मास्य के आने पर तुम महाव्रत धारण करके,"
श्लोक 33 (skanda.6.253.33)
देवतानां च प्रत्यक्षं तांडवं नर्तसे यदि । पारयित्वा व्रतं सम्यग्ब्रह्मचर्यं महेश्वर
devatānāṁ ca pratyakṣaṁ tāṁḍavaṁ nartase yadi pārayitvā vrataṁ samyagbrahmacaryaṁ maheśvara
"देवताओं के समक्ष प्रत्यक्ष रूप से ताण्डव नृत्य करो; और, हे महेश्वर, ब्रह्मचर्य के व्रत को भलीभाँति पूर्ण करके,"
श्लोक 34 (skanda.6.253.34)
मत्प्रीत्यै यदि देहार्थं वैष्णवं च प्रयच्छसि । शापस्यानुग्रहं कुर्यां प्रसववदना सती
matprītyai yadi dehārthaṁ vaiṣṇavaṁ ca prayacchasi śāpasyānugrahaṁ kuryāṁ prasavavadanā satī
"मेरी प्रसन्नता के लिए यदि शरीर के हेतु वैष्णव व्रत भी करो, तो मैं, प्रसन्नमुखी होकर, शाप में अनुग्रह करूँगी।"
श्लोक 35 (skanda.6.253.35)
नान्यथा मम चित्तं त्वां विश्वासमनुगच्छति । तच्छ्रुत्वा भगवांस्तुष्टस्तथेति प्रत्युवाच ताम्
nānyathā mama cittaṁ tvāṁ viśvāsamanugacchati tacchrutvā bhagavāṁstuṣṭastatheti pratyuvāca tām
"अन्यथा मेरा मन तुम पर विश्वास नहीं करता।" यह सुनकर प्रसन्न हुए भगवान् ने उनसे "तथास्तु" कहा।
श्लोक 36 (skanda.6.253.36)
सापि हृष्टा भगवती शापस्यानुग्रहे वृता
sāpi hṛṣṭā bhagavatī śāpasyānugrahe vṛtā
वह भगवती भी प्रसन्न हो गईं, शाप में अनुग्रह करने के लिए तत्पर होकर।
श्लोक 37 (skanda.6.253.37)
इदं पुराणं मनुजः शृणोति श्रद्धायुक्तो भेदबुद्ध्या दृढत्वम् । तस्या वश्यं जीवितं सर्वसिद्धं मर्त्याः सत्यात्तच्छ्रयत्वं प्रयांति
idaṁ purāṇaṁ manujaḥ śṛṇoti śraddhāyukto bhedabuddhyā dṛḍhatvam tasyā vaśyaṁ jīvitaṁ sarvasiddhaṁ martyāḥ satyāttacchrayatvaṁ prayāṁti
जो मनुष्य श्रद्धायुक्त होकर, भेदबुद्धि की दृढ़ता को त्यागकर इस पुराण को सुनता है, उसका जीवन उस देवी के अधीन हो जाता है और सर्वसिद्ध बन जाता है। सत्य के द्वारा मरणधर्मा मनुष्य उनके शरणागत होने की स्थिति को प्राप्त होते हैं।