नागर खण्ड · अध्याय 254
हरतांडवनर्त्तनवर्णन
श्लोक 1 (skanda.6.254.1)
शूद्र उवाच । इदमाश्चर्यरूपं मे प्रतिभाति वचस्तव । यद्यपि स्यान्महाक्लेशो वदतस्तव सुव्रत
śūdra uvāca idamāścaryarūpaṁ me pratibhāti vacastava yadyapi syānmahākleśo vadatastava suvrata
शूद्र ने कहा — तुम्हारा यह वचन मुझे आश्चर्यरूप प्रतीत होता है। हे सुव्रत! यद्यपि इसे कहने में तुम्हें महान् क्लेश हो सकता है,
श्लोक 2 (skanda.6.254.2)
तथापि मम भाग्येन मत्पुण्यैर्मद्गृहं गतः । न तृप्ये त्वन्मुखांभोजाच्च्युतं वाक्यामृतं पुनः
tathāpi mama bhāgyena matpuṇyairmadgṛhaṁ gataḥ na tṛpye tvanmukhāṁbhojāccyutaṁ vākyāmṛtaṁ punaḥ
तथापि मेरे भाग्य और पुण्यों से तुम मेरे घर आए हो। तुम्हारे मुखकमल से झरते हुए वाणी के अमृत से मैं बार-बार भी तृप्त नहीं होता,
श्लोक 3 (skanda.6.254.3)
पिबन्गौरीकथाख्यानं विशेषगुणपूरितम् । कथं महेश्वरो नृत्यं चकार सुरसंवृतः
pibangaurīkathākhyānaṁ viśeṣaguṇapūritam kathaṁ maheśvaro nṛtyaṁ cakāra surasaṁvṛtaḥ
गौरी की विशेष गुणों से भरी कथा को पीते हुए। महेश्वर ने देवताओं से घिरकर किस प्रकार नृत्य किया?
श्लोक 4 (skanda.6.254.4)
चातुर्मास्ये कथं जातं कि ग्राह्यं व्रतमुच्यते । अनुग्रहं कृतवती सा कथं को ह्यनुग्रहः
cāturmāsye kathaṁ jātaṁ ki grāhyaṁ vratamucyate anugrahaṁ kṛtavatī sā kathaṁ ko hyanugrahaḥ
चातुर्मास्य में यह कैसे हुआ? कौन-सा व्रत ग्रहण करने योग्य कहा जाता है? उन्होंने अनुग्रह किस प्रकार किया, और वह अनुग्रह क्या था?
श्लोक 5 (skanda.6.254.5)
एतद्विस्तरतो ब्रूहि पृच्छतो मे द्विजोत्तम । भगवान्पूज्यते लोके ममानुग्रहकारकः
etadvistarato brūhi pṛcchato me dvijottama bhagavānpūjyate loke mamānugrahakārakaḥ
हे द्विजोत्तम! पूछते हुए मुझे यह विस्तार से बताइए। जगत् में पूजित भगवान् मुझ पर भी अनुग्रह करनेवाले हैं,
श्लोक 6 (skanda.6.254.6)
प्रसन्नवदनो भूत्वा स्वस्थः कथय सुव्रत । गालवश्चापि तच्छ्रुत्वा पुनराह प्रहृष्टवान्
prasannavadano bhūtvā svasthaḥ kathaya suvrata gālavaścāpi tacchrutvā punarāha prahṛṣṭavān
इसलिए हे सुव्रत! प्रसन्नमुख होकर, स्वस्थ चित्त से कहिए। गालव ने भी यह सुनकर, अत्यन्त प्रसन्न होकर, फिर कहा —
श्लोक 7 (skanda.6.254.7)
गालव उवाच । इतिहासमिमं पुण्यं कथयामि तवानघ । शृणुष्वावहितो भूत्वा यज्ञायुतफलप्रदम्
gālava uvāca itihāsamimaṁ puṇyaṁ kathayāmi tavānagha śṛṇuṣvāvahito bhūtvā yajñāyutaphalapradam
गालव ने कहा — हे निष्पाप! मैं यह पुण्यकारी इतिहास तुम्हें सुनाता हूँ। सावधान होकर सुनो — यह दस हजार यज्ञों का फल देनेवाला है।
श्लोक 8 (skanda.6.254.8)
चातुर्मास्येऽथ संप्राप्ते हरो भक्तिसमन्वितः । ब्रह्मचर्यव्रतपरः प्रहृष्टवदनोऽभवत्
cāturmāsye'tha saṁprāpte haro bhaktisamanvitaḥ brahmacaryavrataparaḥ prahṛṣṭavadano'bhavat
तत्पश्चात् चातुर्मास्य के आने पर, भक्ति से युक्त, ब्रह्मचर्य व्रत में तत्पर हर अत्यन्त प्रसन्नमुख हो गए।
श्लोक 9 (skanda.6.254.9)
देवतानां च संकल्पं महर्षीणां चकार ह । समागत्य ततो देवा मन्दराचलमास्थिताः
devatānāṁ ca saṁkalpaṁ maharṣīṇāṁ cakāra ha samāgatya tato devā mandarācalamāsthitāḥ
उन्होंने देवताओं और महर्षियों से अपना संकल्प प्रकट किया। तत्पश्चात् देवता एकत्र होकर मन्दराचल पर स्थित हुए,
श्लोक 10 (skanda.6.254.10)
प्रणम्य ते महेशानं तस्थुः प्रांजलयोऽग्रतः । तानुवाच सुरान्सर्वान्हरो दृष्ट्वा समागतान्
praṇamya te maheśānaṁ tasthuḥ prāṁjalayo'grataḥ tānuvāca surānsarvānharo dṛṣṭvā samāgatān
और महेशान को प्रणाम करके हाथ जोड़े हुए उनके समक्ष खड़े हो गए। सभी एकत्र हुए देवताओं को देखकर हर ने उनसे कहा —
श्लोक 11 (skanda.6.254.11)
पार्वत्याभिहितं प्राह कस्मिन्कार्यांतरे सति । मया नियुक्तेऽभिनये यत्र साहाय्यकारिणः
pārvatyābhihitaṁ prāha kasminkāryāṁtare sati mayā niyukte'bhinaye yatra sāhāyyakāriṇaḥ
उन्होंने पार्वती द्वारा कही गई बात बताई — "किसी विशेष अवसर पर, जब मैं किसी अभिनय में नियुक्त होऊँ, तुम वहाँ सहायक बनना,"
श्लोक 12 (skanda.6.254.12)
भवंत्विंद्रपुरोगाश्च चातुर्मास्ये समागते । ते तथोचुश्च संहृष्टा नमस्कृत्य च शूलिनम्
bhavaṁtviṁdrapurogāśca cāturmāsye samāgate te tathocuśca saṁhṛṣṭā namaskṛtya ca śūlinam
"इन्द्र को आगे करके, चातुर्मास्य के आने पर।" वे भी अत्यन्त प्रसन्न होकर, शूलधारी को नमस्कार करके इसी प्रकार बोले,
श्लोक 13 (skanda.6.254.13)
स्वंस्वं भवनमाजग्मुर्विमानैः सूर्यसन्निभैः । तथाऽऽषाढे शुक्लपक्षे चतुर्दश्यां महेश्वरः
svaṁsvaṁ bhavanamājagmurvimānaiḥ sūryasannibhaiḥ tathā''ṣāḍhe śuklapakṣe caturdaśyāṁ maheśvaraḥ
सूर्य के समान तेजस्वी विमानों से अपने-अपने भवन को गए। और आषाढ़ मास के शुक्लपक्ष की चतुर्दशी को महेश्वर ने,
श्लोक 14 (skanda.6.254.14)
प्रनर्त्तयितुमारेभे भवानीतोषणाय च । मंदरे पर्वतश्रेष्ठे तत्र जग्मुर्महर्षयः
pranarttayitumārebhe bhavānītoṣaṇāya ca maṁdare parvataśreṣṭhe tatra jagmurmaharṣayaḥ
भवानी को प्रसन्न करने के लिए नृत्य करना आरम्भ किया। पर्वतों में श्रेष्ठ मन्दराचल पर महर्षिगण वहाँ गए —
श्लोक 15 (skanda.6.254.15)
नारदो देवलो व्यासः शुकद्वैपायनादयः । अंगिराश्च मरीचिश्च कर्दमश्च प्रजापतिः
nārado devalo vyāsaḥ śukadvaipāyanādayaḥ aṁgirāśca marīciśca kardamaśca prajāpatiḥ
नारद, देवल, व्यास, शुक, द्वैपायन आदि; अंगिरा, मरीचि तथा प्रजापति कर्दम;
श्लोक 16 (skanda.6.254.16)
कश्यपो गौतमश्चात्रिर्वसिष्ठो भृगुरेव च । जमदग्निस्तथोत्तंको रामो भार्गव एव च
kaśyapo gautamaścātrirvasiṣṭho bhṛgureva ca jamadagnistathottaṁko rāmo bhārgava eva ca
कश्यप, गौतम, अत्रि, वसिष्ठ तथा भृगु; जमदग्नि, उत्तंक, और भार्गव राम भी;
श्लोक 17 (skanda.6.254.17)
अगस्त्यश्च पुलोमा च पुलस्त्यः पुलहस्तथा । प्रचेताश्च क्रतुश्चैव तथैवान्ये महर्षयः
agastyaśca pulomā ca pulastyaḥ pulahastathā pracetāśca kratuścaiva tathaivānye maharṣayaḥ
अगस्त्य, पुलोमा, पुलस्त्य तथा पुलह; प्रचेता तथा क्रतु, और उसी प्रकार अन्य महर्षिगण भी,
श्लोक 18 (skanda.6.254.18)
सिद्धा यक्षाः पिशाचाश्च चारणाश्चारणैः सह । आदित्या गुह्यकाश्चैव साध्याश्च वसवोऽश्विनौ
siddhā yakṣāḥ piśācāśca cāraṇāścāraṇaiḥ saha ādityā guhyakāścaiva sādhyāśca vasavo'śvinau
सिद्ध, यक्ष, पिशाच, चारण अन्य चारणों सहित; आदित्य, गुह्यक, साध्य, वसुगण तथा अश्विनीकुमार —
श्लोक 19 (skanda.6.254.19)
एते सर्वे तथेन्द्राद्या ब्रह्मविष्णुपुरोगमाः । समाजग्मुर्महेशस्य नृत्यदर्शनलालसाः
ete sarve tathendrādyā brahmaviṣṇupurogamāḥ samājagmurmaheśasya nṛtyadarśanalālasāḥ
ये सभी, तथा इन्द्र आदि, ब्रह्मा और विष्णु को आगे करके, महेश के नृत्यदर्शन की लालसा से एकत्र हुए।
श्लोक 20 (skanda.6.254.20)
ततो गणा नंदिमुखा रत्नानि प्रददुस्तथा । भूषणानि च वासांसि मुन्यादिभ्यो यथाक्रमम्
tato gaṇā naṁdimukhā ratnāni pradadustathā bhūṣaṇāni ca vāsāṁsi munyādibhyo yathākramam
तब नन्दी को आगे रखे हुए गणों ने मुनियों आदि को यथाक्रम रत्न, आभूषण तथा वस्त्र प्रदान किए।
श्लोक 21 (skanda.6.254.21)
ततो वाद्यसहस्रेषु वादित्रेषु समंततः । सर्वैर्जयेति चैवोक्ता भगवान्व्रतमादिशत्
tato vādyasahasreṣu vāditreṣu samaṁtataḥ sarvairjayeti caivoktā bhagavānvratamādiśat
फिर चारों ओर हजारों बाजे बजने लगे। सबने "जय हो" ऐसा कहा, और भगवान् ने व्रत का आदेश दिया।
श्लोक 22 (skanda.6.254.22)
भवानी हृष्टहृदया महादेवं व्यलोकयत् । जया च विजया चैव जयन्ती मंगलारुणा
bhavānī hṛṣṭahṛdayā mahādevaṁ vyalokayat jayā ca vijayā caiva jayantī maṁgalāruṇā
प्रसन्न हृदयवाली भवानी महादेव को देखती रहीं। जया, विजया, जयन्ती, तथा मंगलारुणा —
श्लोक 23 (skanda.6.254.23)
चतुष्टयसखीमध्ये विरराज शुभानना । तस्याः सान्निध्ययोगेन जगद्भाति गुणोत्तरम्
catuṣṭayasakhīmadhye virarāja śubhānanā tasyāḥ sānnidhyayogena jagadbhāti guṇottaram
इन चार सखियों के मध्य वह शुभमुखी देवी सुशोभित हो रही थीं। उनकी सन्निधि से यह जगत् उत्तम गुणों से शोभित होता है,
श्लोक 24 (skanda.6.254.24)
यस्याः शरीरजा शोभा वर्णितुं नैव शक्यते । ईशोऽपि गणकोटीभिर्नानावक्त्राभिरीक्षितः
yasyāḥ śarīrajā śobhā varṇituṁ naiva śakyate īśo'pi gaṇakoṭībhirnānāvaktrābhirīkṣitaḥ
जिनके शरीर से उत्पन्न शोभा का वर्णन करना संभव ही नहीं है। ईश भी करोड़ों गणों द्वारा, अनेक मुखोंवाले होकर, देखे जा रहे थे,
श्लोक 25 (skanda.6.254.25)
पिशाचभूतसंघैश्च वृतः परमशोभनः । स्वर्णवेत्रधरो नन्दी बभौ कपिमुखोऽग्रतः
piśācabhūtasaṁghaiśca vṛtaḥ paramaśobhanaḥ svarṇavetradharo nandī babhau kapimukho'grataḥ
पिशाचों और भूतों के समूहों से घिरे, अत्यन्त शोभायमान थे। स्वर्ण की छड़ी धारण किए वानरमुख नन्दी आगे शोभित हो रहे थे।
श्लोक 26 (skanda.6.254.26)
विद्याधराश्च गंधर्वाश्चित्रसेनादयस्तथा । चित्रन्यस्ता इव बभुस्तत्र नागा मुनीश्वराः
vidyādharāśca gaṁdharvāścitrasenādayastathā citranyastā iva babhustatra nāgā munīśvarāḥ
विद्याधर और गन्धर्व, चित्रसेन आदि, तथा नाग और मुनीश्वर वहाँ मानो चित्र में अंकित से शोभित हो रहे थे।
श्लोक 27 (skanda.6.254.27)
श्रीरागप्रमुखा रागास्तस्य पुत्रा महौजसः । अमूर्त्ताश्चैव ते पुत्रा हरदेव समुद्भवाः
śrīrāgapramukhā rāgāstasya putrā mahaujasaḥ amūrttāścaiva te putrā haradeva samudbhavāḥ
श्रीराग को प्रमुख माननेवाले, अत्यन्त तेजस्वी वे राग उनके पुत्र थे। वे रूपरहित पुत्र देव हर से ही उत्पन्न हुए थे,
श्लोक 28 (skanda.6.254.28)
एकैकस्य च षड्भार्याः सर्वासां च पितामहः । ताभिः सहैव ते रागा लीलावपुर्धरास्तथा
ekaikasya ca ṣaḍbhāryāḥ sarvāsāṁ ca pitāmahaḥ tābhiḥ sahaiva te rāgā līlāvapurdharāstathā
और प्रत्येक की छह-छह पत्नियाँ थीं, जिन सबके पितामह वे ही थे। उन्हीं के साथ वे राग, लीलामय शरीर धारण करके,
श्लोक 29 (skanda.6.254.29)
प्रादुर्बभूवुः सहसा चिंतितास्तेन शंभुना । तेषां नामानि ते वच्मि शृणुष्व त्वं महाधन
prādurbabhūvuḥ sahasā ciṁtitāstena śaṁbhunā teṣāṁ nāmāni te vacmi śṛṇuṣva tvaṁ mahādhana
शम्भु द्वारा चिन्तन मात्र से सहसा प्रकट हो गए। उनके नाम मैं तुम्हें बताता हूँ, हे महाधन! सुनो।
श्लोक 30 (skanda.6.254.30)
श्रीरागः प्रथमः पुत्र ईश्वरस्य विमोहनः । आसां चक्रे भ्रुवोर्मध्ये परब्रह्म प्रदायकः
śrīrāgaḥ prathamaḥ putra īśvarasya vimohanaḥ āsāṁ cakre bhruvormadhye parabrahma pradāyakaḥ
श्रीराग पहला पुत्र है, जो ईश्वर को भी मोहित करनेवाला है। वह भौंहों के मध्य के चक्र में स्थित है, परब्रह्म का प्रदान करनेवाला।
श्लोक 31 (skanda.6.254.31)
तन्मध्यश्चैव माहेशात्समुद्भूतो गणोत्तमः । द्वितीयोऽथ वसन्तोऽभूत्कटिदेशान्महायशाः
tanmadhyaścaiva māheśātsamudbhūto gaṇottamaḥ dvitīyo'tha vasanto'bhūtkaṭideśānmahāyaśāḥ
वही मध्यस्थ, महेश से उत्पन्न, गणों में श्रेष्ठ है। तत्पश्चात् दूसरा वसन्त हुआ, जो कटिप्रदेश से उत्पन्न, महायशस्वी है।
श्लोक 32 (skanda.6.254.32)
महदंकश्च भूतानां चक्राच्चैव विशुद्धितः । पंचमस्तु तृतीयोऽभूत्सुतो विश्वविभूषणः
mahadaṁkaśca bhūtānāṁ cakrāccaiva viśuddhitaḥ paṁcamastu tṛtīyo'bhūtsuto viśvavibhūṣaṇaḥ
वह प्राणियों का महान् चिह्न है, और नाभिचक्र से पूर्ण शुद्धिपूर्वक उत्पन्न हुआ है। पाँचवाँ ही तीसरे रूप में गिना गया वह पुत्र विश्व का आभूषण है,
श्लोक 33 (skanda.6.254.33)
महेश्वरहृदो जातं चक्रं चैवमनाहतम् । नासादेशात्समुद्भूतो भैरवो भैरवः स्वयम्
maheśvarahṛdo jātaṁ cakraṁ caivamanāhatam nāsādeśātsamudbhūto bhairavo bhairavaḥ svayam
जो महेश्वर के हृदय से उत्पन्न अनाहत चक्र से जन्मा है। और नासिका-प्रदेश से स्वयं भैरव, भैरव रूप में उत्पन्न हुआ,
श्लोक 34 (skanda.6.254.34)
मणिपूरकनामेदं चक्रं तद्धि विमुक्तिदम् । पंचाशच्च तथा वर्णा अंका नाम महेश्वरात्
maṇipūrakanāmedaṁ cakraṁ taddhi vimuktidam paṁcāśacca tathā varṇā aṁkā nāma maheśvarāt
जो मणिपूरक नामक चक्र से सम्बद्ध है, जो मुक्ति देनेवाला है। पचास वर्ण भी, तथा अंक नामक तत्त्व, महेश्वर से ही उत्पन्न हुए,
श्लोक 35 (skanda.6.254.35)
राशयो द्वादश तथा नक्षत्राणि तथैव च । स्वाधिष्ठानसमुद्भूता जगद्बीजसमन्विताः
rāśayo dvādaśa tathā nakṣatrāṇi tathaiva ca svādhiṣṭhānasamudbhūtā jagadbījasamanvitāḥ
तथा बारह राशियाँ और उसी प्रकार नक्षत्र भी स्वाधिष्ठान चक्र से उत्पन्न हुए, जो जगत् के बीज से युक्त हैं।
श्लोक 36 (skanda.6.254.36)
क्षणेन वृद्धिमायांति ततो रेतः प्रवर्तते । रेतसस्तु जगत्सृष्टं तदीशजननेंद्रियम्
kṣaṇena vṛddhimāyāṁti tato retaḥ pravartate retasastu jagatsṛṣṭaṁ tadīśajananeṁdriyam
वे क्षणभर में वृद्धि को प्राप्त होते हैं, और उससे वीर्य प्रवर्तित होता है। उस वीर्य से ही जगत् की सृष्टि हुई है — वही ईश्वर का जनन-इन्द्रिय है,
श्लोक 37 (skanda.6.254.37)
आधाराच्च महान्षष्ठो नटो नारायणोऽभवत् । महेशवल्लभः पुत्रो नीलो विष्णुपराक्रमः
ādhārācca mahānṣaṣṭho naṭo nārāyaṇo'bhavat maheśavallabhaḥ putro nīlo viṣṇuparākramaḥ
और मूलाधार चक्र से छठा महान् नर्तक नारायण उत्पन्न हुआ। महेश का प्रिय पुत्र नील, विष्णु के पराक्रम से युक्त, भी उत्पन्न हुआ,
श्लोक 38 (skanda.6.254.38)
एते मूर्तिधरा रागा जाता भार्यासहायिनः । भार्यास्तेषां समुद्भूताः शिरोभागात्पिनाकिनः
ete mūrtidharā rāgā jātā bhāryāsahāyinaḥ bhāryāsteṣāṁ samudbhūtāḥ śirobhāgātpinākinaḥ
ये सभी मूर्तिधारी राग अपनी-अपनी पत्नियों सहित उत्पन्न हुए। उनकी पत्नियाँ पिनाकधारी के शिरोभाग से उत्पन्न हुई थीं,
श्लोक 39 (skanda.6.254.39)
षट्त्रिंशत्परिमाणेन ततस्तास्त्वं निशामय । गौरी कोलाहली धीरा द्राविडी मालकौशिकी
ṣaṭtriṁśatparimāṇena tatastāstvaṁ niśāmaya gaurī kolāhalī dhīrā drāviḍī mālakauśikī
छत्तीस की संख्या में। अब तुम उनको सुनो — गौरी, कोलाहली, धीरा, द्राविडी, मालकौशिकी,
श्लोक 40 (skanda.6.254.40)
षष्ठी स्याद्देवगांधारी श्रीरागत्य प्रिया इमाः । आन्दोला कौशिकी चैव तथा चरममंजरी
ṣaṣṭhī syāddevagāṁdhārī śrīrāgatya priyā imāḥ āndolā kauśikī caiva tathā caramamaṁjarī
और छठी देवगान्धारी — ये श्रीराग की प्रिय पत्नियाँ हैं। आन्दोला, कौशिकी, तथा चरममंजरी —
श्लोक 41 (skanda.6.254.41)
गंडगिरी देवशाखा रामगिरी वसन्तगा । त्रिगुणा स्तम्भतीर्था च अहिरी कुंकुमा तथा
gaṁḍagirī devaśākhā rāmagirī vasantagā triguṇā stambhatīrthā ca ahirī kuṁkumā tathā
गण्डगिरी, देवशाखा, रामगिरी — ये वसन्त की पत्नियाँ हैं। त्रिगुणा, स्तम्भतीर्था, अहिरी, तथा कुंकुमा —
श्लोक 42 (skanda.6.254.42)
वैराटी सामवेरी च षड्भार्याः पंचमे मताः । भैरवी गुर्जरी चैव भाषा वेलागुली तथा
vairāṭī sāmaverī ca ṣaḍbhāryāḥ paṁcame matāḥ bhairavī gurjarī caiva bhāṣā velāgulī tathā
और वैराटी, सामवेरी — ये छह पत्नियाँ पाँचवें राग की मानी गई हैं। भैरवी, गुर्जरी, भाषा, तथा वेलावली —
श्लोक 43 (skanda.6.254.43)
कर्णाटकी रक्तहंसा षड्भार्या भैरवानुगाः । बंगाली मधुरा चैव कामोदा चाक्षिनारिका
karṇāṭakī raktahaṁsā ṣaḍbhāryā bhairavānugāḥ baṁgālī madhurā caiva kāmodā cākṣinārikā
कर्णाटकी, रक्तहंसा — ये छह पत्नियाँ भैरव के अनुगत हैं। बंगाली, मधुरा, कामोदा, तथा अक्षिनारिका —
श्लोक 44 (skanda.6.254.44)
देवगिरी च देवाली मेघरागानुगा इमा । त्रोटकी मीडकी चैव नरादुम्बी तथैव च
devagirī ca devālī megharāgānugā imā troṭakī mīḍakī caiva narādumbī tathaiva ca
और देवगिरी, देवाली — ये मेघराग के अनुगत हैं। त्रोटकी, मीडकी, तथा नारादुम्बी —
श्लोक 45 (skanda.6.254.45)
मल्हारी सिन्धुमल्हारी नटनारायणानुगाः । एता हि गिरिशं नत्वा महेशं च महेश्वरीम्
malhārī sindhumalhārī naṭanārāyaṇānugāḥ etā hi giriśaṁ natvā maheśaṁ ca maheśvarīm
मल्हारी, सिन्धुमल्हारी — ये नटनारायण के अनुगत हैं। इन सभी ने गिरिश को, महेश और महेश्वरी को प्रणाम करके,
श्लोक 46 (skanda.6.254.46)
स्वमूर्त्तिवाहनोपेताः स्वभर्तृसहिताः स्थिताः । ब्रह्मा मृदंगवाद्येन तोषयामास शंकरम्
svamūrttivāhanopetāḥ svabhartṛsahitāḥ sthitāḥ brahmā mṛdaṁgavādyena toṣayāmāsa śaṁkaram
अपने-अपने रूप और वाहनों से युक्त, अपने-अपने पतियों सहित खड़ी हुईं। ब्रह्मा ने मृदंग बजाकर शंकर को प्रसन्न किया,
श्लोक 47 (skanda.6.254.47)
चतुरक्षरवाद्येन सुवाद्यं चाकरोत्पुनः । तालक्रियां महेशाय दर्शयामास केशवः
caturakṣaravādyena suvādyaṁ cākarotpunaḥ tālakriyāṁ maheśāya darśayāmāsa keśavaḥ
और चार अक्षरोंवाले वाद्य से पुनः सुन्दर वाद्य बजाया। केशव ने महेश को ताल की क्रिया दिखलाई।
श्लोक 48 (skanda.6.254.48)
वायवस्तत्र वाद्यं च चक्रुः सुस्वरमोजसा । महेन्द्रो वंशवाद्यं च सुगिरं सुस्वरं बहुः
vāyavastatra vādyaṁ ca cakruḥ susvaramojasā mahendro vaṁśavādyaṁ ca sugiraṁ susvaraṁ bahuḥ
वायुगणों ने वहाँ बल के साथ मधुर स्वरवाला वाद्य बजाया। महेन्द्र ने वंशी बजाई, जो मधुरवाणी और अत्यन्त सुस्वर थी।
श्लोक 49 (skanda.6.254.49)
वह्निः शूर्परवं चक्रे पणवं च तथाश्विनौ । उपांगवादनं चक्रे सोमः सूर्यः समंततः
vahniḥ śūrparavaṁ cakre paṇavaṁ ca tathāśvinau upāṁgavādanaṁ cakre somaḥ sūryaḥ samaṁtataḥ
अग्नि ने शूर्प का शब्द किया, और अश्विनीकुमारों ने पणव बजाया। सोम ने उपांग बजाया, और सूर्य ने चारों ओर,
श्लोक 50 (skanda.6.254.50)
घंटानां वादनं चक्रुर्गणाः शतसहस्रशः । मुनीश्वरास्तथा देव्यः पार्वतीसहितास्तथा
ghaṁṭānāṁ vādanaṁ cakrurgaṇāḥ śatasahasraśaḥ munīśvarāstathā devyaḥ pārvatīsahitāstathā
लाखों गणों ने घण्टियाँ बजाईं। मुनीश्वर, और उसी प्रकार पार्वती सहित देवियाँ,
श्लोक 51 (skanda.6.254.51)
स्वर्णभद्रासनेष्वेते ह्युपविष्टा व्यलोकयन् । शृंगाणां वादनं चक्रुर्वसवः समहोरगाः
svarṇabhadrāsaneṣvete hyupaviṣṭā vyalokayan śṛṁgāṇāṁ vādanaṁ cakrurvasavaḥ samahoragāḥ
स्वर्ण के भद्रासनों पर बैठकर देखते रहे। वसुगणों ने महानागों के साथ सींग बजाए।
श्लोक 52 (skanda.6.254.52)
भेरीध्वनिं तथा साध्या वाद्यान्यन्ये सुरोत्तमाः । झर्झरीगोमुखादीनि साध्याश्चक्रुर्महोत्सवे
bherīdhvaniṁ tathā sādhyā vādyānyanye surottamāḥ jharjharīgomukhādīni sādhyāścakrurmahotsave
साध्यगणों ने भेरी का घोष किया, और अन्य श्रेष्ठ देवताओं ने अन्य वाद्य बजाए। उस महोत्सव में साध्यों ने झर्झरी, गोमुख आदि बजाए।
श्लोक 53 (skanda.6.254.53)
तन्त्रीलयसमायुक्ता गंधर्वा मधुरस्वराः । सुवर्णशृंगनादं च चक्रुः सिद्धाः समंततः
tantrīlayasamāyuktā gaṁdharvā madhurasvarāḥ suvarṇaśṛṁganādaṁ ca cakruḥ siddhāḥ samaṁtataḥ
तन्त्री की लय से युक्त, मधुर स्वरवाले गन्धर्व, और चारों ओर सिद्धों ने सुवर्ण-शृंगों की ध्वनि की।
श्लोक 54 (skanda.6.254.54)
ततस्तु भगवानासीन्महानटवपुर्धरः । मुकुटाः पंचशीर्षे तु पन्नगैरुपशोभिताः
tatastu bhagavānāsīnmahānaṭavapurdharaḥ mukuṭāḥ paṁcaśīrṣe tu pannagairupaśobhitāḥ
तत्पश्चात् भगवान् महान् नर्तक का रूप धारण किए हुए प्रकट हुए। उनके पाँचों सिरों पर मुकुट सर्पों से सुशोभित थे,
श्लोक 55 (skanda.6.254.55)
जटा विमुच्य सकला भस्मोद्धूलितविग्रहः । बाहुभिर्दशभिर्युक्तो हारकेयूरसंयुतः
jaṭā vimucya sakalā bhasmoddhūlitavigrahaḥ bāhubhirdaśabhiryukto hārakeyūrasaṁyutaḥ
समस्त जटाओं को खोले हुए, भस्म से धूलित शरीरवाले, दस भुजाओं से युक्त, हार और केयूर से सुसज्जित,
श्लोक 56 (skanda.6.254.56)
त्रैलोक्यव्यापकं रूपं सूर्यकोटिसमप्रभम् । कृत्वा ननर्त्त भगवान्भासुरं स महानगे
trailokyavyāpakaṁ rūpaṁ sūryakoṭisamaprabham kṛtvā nanartta bhagavānbhāsuraṁ sa mahānage
त्रैलोक्य में व्याप्त, करोड़ों सूर्यों के समान तेजस्वी रूप धारण करके, वे तेजोमय भगवान् उस महापर्वत पर नृत्य करने लगे।
श्लोक 57 (skanda.6.254.57)
ततं वीणादिकं वाद्यं कांस्यतालादिकं घनम् । वंशादिकं तु वादित्रं तोमरादिकनामकम्
tataṁ vīṇādikaṁ vādyaṁ kāṁsyatālādikaṁ ghanam vaṁśādikaṁ tu vāditraṁ tomarādikanāmakam
वीणा आदि तत् वाद्य, कांस्यताल आदि घन वाद्य, वंशी आदि सुषिर वाद्य, और तोमर आदि नामवाले वाद्य —
श्लोक 58 (skanda.6.254.58)
चतुर्विधं ततो वाद्यं तुमुलं समजायत । तालानां पटहादीनां हस्तकानां तथैव च
caturvidhaṁ tato vādyaṁ tumulaṁ samajāyata tālānāṁ paṭahādīnāṁ hastakānāṁ tathaiva ca
इस प्रकार चार प्रकार के वाद्यों का महान् कोलाहल उत्पन्न हुआ। तालों का, पटह आदि का, और उसी प्रकार हस्तकों का,
श्लोक 59 (skanda.6.254.59)
मानानां चैव तानानां प्रत्यक्षं रूपमाबभौ । सुकंठं सुस्वरं मुक्तं सुगम्भीरं महास्वनम्
mānānāṁ caiva tānānāṁ pratyakṣaṁ rūpamābabhau sukaṁṭhaṁ susvaraṁ muktaṁ sugambhīraṁ mahāsvanam
और मानों तथा तानों का साक्षात् रूप वहाँ प्रकट हो रहा था — सुकण्ठ, सुस्वर, मुक्त, अत्यन्त गम्भीर तथा महाध्वनियुक्त।
श्लोक 60 (skanda.6.254.60)
विश्वावसुर्नारदश्च तुंबुरुश्चैव गायकाः । जगुर्गंधर्वपतयोऽप्सरसो मधुरस्वराः
viśvāvasurnāradaśca tuṁburuścaiva gāyakāḥ jagurgaṁdharvapatayo'psaraso madhurasvarāḥ
विश्वावसु, नारद, तथा तुम्बुरु, ये गायक, गन्धर्वों के स्वामी, गाने लगे — और मधुर स्वरवाली अप्सराएँ भी गाने लगीं।
श्लोक 61 (skanda.6.254.61)
ग्रामत्रयसमोपेतं स्वरसप्तकसंयुतम् । दिव्यं शुद्धं च सांकल्पं तत्र गेयमवर्त्तत
grāmatrayasamopetaṁ svarasaptakasaṁyutam divyaṁ śuddhaṁ ca sāṁkalpaṁ tatra geyamavarttata
तीनों ग्रामों से युक्त, सातों स्वरों से संयुक्त, दिव्य, शुद्ध और अभीष्ट संकल्पयुक्त संगीत वहाँ प्रवर्तित हुआ।
श्लोक 62 (skanda.6.254.62)
पर्वतोऽपि महानादं हरपादतलाहतः । भ्रमिभिर्भ्रमयंस्तत्र महीं सपुरकाननाम्
parvato'pi mahānādaṁ harapādatalāhataḥ bhramibhirbhramayaṁstatra mahīṁ sapurakānanām
हर के चरणतल से आहत होकर पर्वत भी महान् गर्जना करने लगा, और उनकी घूर्णन-गति से नगरों और वनों सहित पृथ्वी भी घूर्णित होने लगी।
श्लोक 63 (skanda.6.254.63)
हस्तकांश्चतुराशीतिं स ससर्ज सदाशिवः । ललाटफलकस्वेदात्सूतमागधबंदिनः
hastakāṁścaturāśītiṁ sa sasarja sadāśivaḥ lalāṭaphalakasvedātsūtamāgadhabaṁdinaḥ
सदाशिव ने चौरासी हस्तमुद्राओं की रचना की। उनके ललाट के स्वेद से सूत, मागध, तथा वन्दीजन उत्पन्न हुए,
श्लोक 64 (skanda.6.254.64)
महेशहृदयाज्जाता गंधर्वा विश्वगायकाः । ते मूर्त्ता देवदेवस्य सुरंगालयसंयुताः
maheśahṛdayājjātā gaṁdharvā viśvagāyakāḥ te mūrttā devadevasya suraṁgālayasaṁyutāḥ
और महेश के हृदय से जगत् के गायक गन्धर्व उत्पन्न हुए। वे साकार होकर देवदेव के सुन्दर रंगमंच में सम्मिलित हुए।
श्लोक 65 (skanda.6.254.65)
प्रेक्षकाणामृषीणां च चक्रुराश्चर्यमोजसा । किन्नराः पुष्पवर्षाणि ससृजुः स्वैर्गुणैरिह
prekṣakāṇāmṛṣīṇāṁ ca cakrurāścaryamojasā kinnarāḥ puṣpavarṣāṇi sasṛjuḥ svairguṇairiha
उन्होंने अपनी शक्ति से दर्शक ऋषियों के मन में आश्चर्य उत्पन्न किया, और किन्नरों ने अपने-अपने गुणों से यहाँ पुष्पों की वर्षा की।
श्लोक 66 (skanda.6.254.66)
एवं चतुर्षुमासेषु यदा नृत्यमजायत । अतिक्रांता शरज्जाता निर्मलाकाशशोभिता
evaṁ caturṣumāseṣu yadā nṛtyamajāyata atikrāṁtā śarajjātā nirmalākāśaśobhitā
इस प्रकार जब चारों महीनों में नृत्य होता रहा, तब निर्मल आकाश से सुशोभित शरद् ऋतु व्यतीत हो गई,
श्लोक 67 (skanda.6.254.67)
पद्मखंडसमाच्छन्नसरोवरमुखांबुजा । फलवृक्षौषधीभिश्च किंचित्पांडुमुखच्छविः
padmakhaṁḍasamācchannasarovaramukhāṁbujā phalavṛkṣauṣadhībhiśca kiṁcitpāṁḍumukhacchaviḥ
जिसमें सरोवरों के मुखकमल कमल-समूहों से आच्छादित थे, और फलों के वृक्षों तथा औषधियों के कारण उसका मुख कुछ पीला हो गया था।
श्लोक 68 (skanda.6.254.68)
ऊर्जशुक्लचतुर्दश्यां प्रसन्ना गिरिजा तदा । समाप्तव्रतचर्यः स ईश्वरोऽपि तदा बभौ
ūrjaśuklacaturdaśyāṁ prasannā girijā tadā samāptavratacaryaḥ sa īśvaro'pi tadā babhau
ऊर्जमास (कार्तिक) की शुक्ल चतुर्दशी को गिरिजा उस समय प्रसन्न हुईं, और व्रत की चर्या पूर्ण करके ईश्वर भी उस समय शोभित हुए।
श्लोक 69 (skanda.6.254.69)
सा चोवाच तदा शंभुं विकचस्वरलोचना । विप्रशापपातितं च यदा लिंगं भविष्यति
sā covāca tadā śaṁbhuṁ vikacasvaralocanā vipraśāpapātitaṁ ca yadā liṁgaṁ bhaviṣyati
और खिले हुए तेजस्वी नेत्रोंवाली उन्होंने शम्भु से कहा — "जब ब्राह्मण के शाप से गिराया गया लिंग होगा,"
श्लोक 70 (skanda.6.254.70)
नर्मदाजलसंभूतं विश्वपूज्यं भविष्यति । एवमुक्त्वा ततस्तुष्टा हरस्तोत्रं चकार ह
narmadājalasaṁbhūtaṁ viśvapūjyaṁ bhaviṣyati evamuktvā tatastuṣṭā harastotraṁ cakāra ha
"तो नर्मदा के जल से उत्पन्न होकर वह विश्वपूज्य होगा।" ऐसा कहकर, प्रसन्न होकर, उन्होंने हर की स्तुति की —
श्लोक 71 (skanda.6.254.71)
नमस्ते देवदेवाय महादेवाय मौलिने । जगद्धात्रे सवित्रे च शंकराय शिवाय च
namaste devadevāya mahādevāya mauline jagaddhātre savitre ca śaṁkarāya śivāya ca
"देवों के देव, महादेव, मुकुटधारी को नमस्कार। जगत् के धारक, प्रसविता, शंकर तथा शिव को नमस्कार,"
श्लोक 72 (skanda.6.254.72)
कपर्दिनेऽजयादाय ब्रह्मगर्भाय ते नमः । हिरण्यरेतसे तुभ्यं नीलग्रीवाय ते नमः
kapardine'jayādāya brahmagarbhāya te namaḥ hiraṇyaretase tubhyaṁ nīlagrīvāya te namaḥ
"जटाधारी, अजेय दाता, ब्रह्मा को गर्भ में धारण करनेवाले को नमस्कार। हिरण्यरेता को नमस्कार, नीलकण्ठ को नमस्कार,"
श्लोक 73 (skanda.6.254.73)
नमो ब्रह्मण्यदेवाय सितभूतिधराय च । पंचवक्त्राय रूपाय नीरूपाय नमोनमः
namo brahmaṇyadevāya sitabhūtidharāya ca paṁcavaktrāya rūpāya nīrūpāya namonamaḥ
"ब्राह्मणों के हितकारी देव को नमस्कार, श्वेत भस्म धारण करनेवाले को नमस्कार। पंचमुख रूप को, और अरूप को बार-बार नमस्कार,"
श्लोक 74 (skanda.6.254.74)
सहस्राक्षाय शुभ्राय नमस्ते कृत्तिवाससे । अन्धकासुरमोक्षाय पशूनां पतये नमः
sahasrākṣāya śubhrāya namaste kṛttivāsase andhakāsuramokṣāya paśūnāṁ pataye namaḥ
"सहस्रनेत्रवाले, उज्ज्वल, गजचर्मधारी को नमस्कार। अन्धकासुर के मोक्षदाता को, पशुओं के पति को नमस्कार,"
श्लोक 75 (skanda.6.254.75)
विप्रवह्निमुखाग्राय हराय च भवाय च । शंकराय महेशाय ईश्वराय नमो नमः
vipravahnimukhāgrāya harāya ca bhavāya ca śaṁkarāya maheśāya īśvarāya namo namaḥ
"ब्राह्मणों और अग्नि के अग्रगण्य को, हर को, भव को — शंकर को, महेश को, ईश्वर को बार-बार नमस्कार,"
श्लोक 76 (skanda.6.254.76)
अमूर्तब्रह्मरूपाय मूर्त्तानां भावनाय च । नमः शिवाय चोग्राय हराय च भवाय च
amūrtabrahmarūpāya mūrttānāṁ bhāvanāya ca namaḥ śivāya cogrāya harāya ca bhavāya ca
"अमूर्त ब्रह्मरूप को, और मूर्तिमानों के भावक को नमस्कार। शिव को, उग्र को, हर को, और भव को नमस्कार,"
श्लोक 77 (skanda.6.254.77)
नमः कृष्णाय शर्वाय त्रिपुरांतकहारिणे । अघोराय नमस्तेऽस्तु नमस्ते पुरुषाय ते
namaḥ kṛṣṇāya śarvāya tripurāṁtakahāriṇe aghorāya namaste'stu namaste puruṣāya te
"कृष्ण को, शर्व को, त्रिपुर का नाश करनेवाले को नमस्कार। अघोर को नमस्कार हो, पुरुष को नमस्कार हो,"
श्लोक 78 (skanda.6.254.78)
सद्योजाताय तुभ्यं भो वामदेवाय ते नमः । ईशानाय नमस्तुभ्यं पंचास्याय कपालिने
sadyojātāya tubhyaṁ bho vāmadevāya te namaḥ īśānāya namastubhyaṁ paṁcāsyāya kapāline
"हे प्रभो, सद्योजात को, वामदेव को नमस्कार। ईशान को नमस्कार, पाँच मुखवाले, कपाल धारण करनेवाले को नमस्कार,"
श्लोक 79 (skanda.6.254.79)
विरूपाक्षाय भावाय भगनेत्रनिपातिने । पूषदंतनिपाताय महायज्ञनिपातिने
virūpākṣāya bhāvāya bhaganetranipātine pūṣadaṁtanipātāya mahāyajñanipātine
"विरूपाक्ष को, भाव को, भग के नेत्र गिरानेवाले को नमस्कार। पूषा के दाँत गिरानेवाले को, महायज्ञ को विध्वंस करनेवाले को नमस्कार,"
श्लोक 80 (skanda.6.254.80)
मृगव्याधाय धर्माय कालचक्राय चक्रिणे । महापुरुषपूज्याय गणानां पतये नमः
mṛgavyādhāya dharmāya kālacakrāya cakriṇe mahāpuruṣapūjyāya gaṇānāṁ pataye namaḥ
"मृगव्याध को, धर्म को, कालचक्र को, चक्रधारी को नमस्कार। महापुरुष के पूज्य को, गणों के पति को नमस्कार,"
श्लोक 81 (skanda.6.254.81)
गंगाधराय मृडिने भवानीप्रियकारिणे । जगदानंददात्रे च ब्रह्मरूपाय ते नमः
gaṁgādharāya mṛḍine bhavānīpriyakāriṇe jagadānaṁdadātre ca brahmarūpāya te namaḥ
"गंगाधर को, दयालु को, भवानी के प्रिय करनेवाले को नमस्कार। जगत् को आनन्द देनेवाले, ब्रह्मरूप तुम्हें नमस्कार,"
श्लोक 82 (skanda.6.254.82)
गुणातीताय गुणिने सूक्ष्माय गुरवेऽपि च । नमो महास्वरूपाय भस्मनो जन्मकारिणे
guṇātītāya guṇine sūkṣmāya gurave'pi ca namo mahāsvarūpāya bhasmano janmakāriṇe
"गुणों से परे और गुणवान् दोनों को, सूक्ष्म और गुरु को भी नमस्कार। महास्वरूप को, भस्म से जन्म देनेवाले को नमस्कार,"
श्लोक 83 (skanda.6.254.83)
वैराग्यरूपिणे नित्यं योगाचार्याय वै नमः । मयोक्तमप्रियं देव स्मरसंहारकारक
vairāgyarūpiṇe nityaṁ yogācāryāya vai namaḥ mayoktamapriyaṁ deva smarasaṁhārakāraka
"नित्य वैराग्यस्वरूप, योग के आचार्य को नमस्कार। हे देव, हे कामदेव के संहारकर्ता, मैंने जो अप्रिय कहा है,"
श्लोक 84 (skanda.6.254.84)
क्षंतुमर्हसि विश्वेश शिरसा त्वां प्रसादये । शापानुग्रह एवैष कृतस्ते वै न संशयः
kṣaṁtumarhasi viśveśa śirasā tvāṁ prasādaye śāpānugraha evaiṣa kṛtaste vai na saṁśayaḥ
"हे विश्वेश, उसे क्षमा करने योग्य हैं; मस्तक झुकाकर मैं आपसे प्रसन्नता चाहती हूँ। यह शाप में अनुग्रह ही आपके द्वारा किया गया है, इसमें संशय नहीं,"
श्लोक 85 (skanda.6.254.85)
ममापराधजो मन्युर्न कार्यो भवताऽनघ । एवं प्रसादितः शंभुर्हृष्टात्मा त्रिदशैः सह
mamāparādhajo manyurna kāryo bhavatā'nagha evaṁ prasāditaḥ śaṁbhurhṛṣṭātmā tridaśaiḥ saha
"हे निष्पाप! मेरे अपराध से उत्पन्न क्रोध आप न करें।" इस प्रकार प्रसन्न किए गए शम्भु प्रसन्नचित्त होकर देवताओं सहित,
श्लोक 86 (skanda.6.254.86)
तीर्णव्रतपरानंदनिर्भरः प्राह तामुमाम् । य इमां मत्स्तुतिं भक्त्या पठिष्यति तवोद्गताम् । तस्य चेष्टवियोगश्च न भविष्यति पार्वति
tīrṇavrataparānaṁdanirbharaḥ prāha tāmumām ya imāṁ matstutiṁ bhaktyā paṭhiṣyati tavodgatām tasya ceṣṭaviyogaśca na bhaviṣyati pārvati
और व्रत को पूर्ण कर परमानन्द से परिपूर्ण होकर उन उमा से बोले — "जो कोई तुमसे उत्पन्न इस मेरी स्तुति को भक्तिपूर्वक पढ़ेगा, हे पार्वती, उसके अभीष्ट का वियोग कभी नहीं होगा।"
श्लोक 87 (skanda.6.254.87)
जन्मत्रयधनैर्युक्तः सर्वव्याधिविवर्जितः । भुक्त्वेह विविधान्भोगानंते यास्यति मत्पुरम्
janmatrayadhanairyuktaḥ sarvavyādhivivarjitaḥ bhuktveha vividhānbhogānaṁte yāsyati matpuram
"तीन जन्मों के धन से युक्त, सभी रोगों से रहित, यहाँ नाना प्रकार के भोगों का उपभोग करके, अन्त में मेरे पुर को प्राप्त होगा।"
श्लोक 88 (skanda.6.254.88)
इत्युक्त्वा तां महेशोऽपि स्वमंगं प्रददौ ततः । वैष्णवं वामभागं सा प्रतिजग्राह पार्वती
ityuktvā tāṁ maheśo'pi svamaṁgaṁ pradadau tataḥ vaiṣṇavaṁ vāmabhāgaṁ sā pratijagrāha pārvatī
ऐसा कहकर महेश ने भी उन्हें अपना शरीर प्रदान किया, और पार्वती ने उसके वाम भाग को, जो वैष्णव रूप था, ग्रहण किया।
श्लोक 89 (skanda.6.254.89)
शर्वं कपालहस्तं च ग्रीवार्द्धे गरलान्वितम् । रुण्डमालार्द्धहारं च सितगौरं समंततः
śarvaṁ kapālahastaṁ ca grīvārddhe garalānvitam ruṇḍamālārddhahāraṁ ca sitagauraṁ samaṁtataḥ
उस मिलित रूप में शर्व हाथ में कपाल लिए थे, कण्ठ का आधा भाग विष से युक्त था; आधी रुण्डमाला, आधा हार, और चारों ओर श्वेत गौर वर्ण था,
श्लोक 90 (skanda.6.254.90)
ब्रह्मांडकोटिजनकं जटाभिर्भूषितं शिरः । सितद्युतिकलाखंडरत्नभासावभासितम्
brahmāṁḍakoṭijanakaṁ jaṭābhirbhūṣitaṁ śiraḥ sitadyutikalākhaṁḍaratnabhāsāvabhāsitam
करोड़ों ब्रह्माण्डों का जनक, जटाओं से भूषित शिर; श्वेत चन्द्रकला के अंश और रत्नों की आभा से आलोकित,
श्लोक 91 (skanda.6.254.91)
स्वर्णाभरणसंयुक्तमेकतो भुजगांगदम् । एकतः कृत्तिवसनमन्यतः पट्टकूलवत्
svarṇābharaṇasaṁyuktamekato bhujagāṁgadam ekataḥ kṛttivasanamanyataḥ paṭṭakūlavat
एक ओर स्वर्ण आभूषणों से युक्त, सर्प का बाजूबन्द; एक ओर मृगचर्म वस्त्र, दूसरी ओर रेशमी वस्त्र,
श्लोक 92 (skanda.6.254.92)
मत्स्यवाहनसंयुक्तमन्यतो वृषभांकितम् । एकतः पार्षदैः सेव्यमन्यतः सखिसेवितम्
matsyavāhanasaṁyuktamanyato vṛṣabhāṁkitam ekataḥ pārṣadaiḥ sevyamanyataḥ sakhisevitam
एक ओर मत्स्य वाहन से युक्त, दूसरी ओर वृषभ से चिह्नित; एक ओर पार्षदों द्वारा सेवित, दूसरी ओर सखियों द्वारा सेवित —
श्लोक 93 (skanda.6.254.93)
रूपमेवंविधं दृष्ट्वा ब्रह्माद्या देवतागणाः । तुष्टुवुः परया भक्त्या तेजोभूषितलोचनम्
rūpamevaṁvidhaṁ dṛṣṭvā brahmādyā devatāgaṇāḥ tuṣṭuvuḥ parayā bhaktyā tejobhūṣitalocanam
इस प्रकार के उस रूप को देखकर ब्रह्मा आदि देवतागणों ने, जिनके नेत्र तेज से भूषित हो गए थे, परम भक्ति से उसकी स्तुति की —
श्लोक 94 (skanda.6.254.94)
त्वमेको भगवान्सर्वव्यापकः सर्वदेहिनाम् । पितृवद्रक्षकोऽसि त्वं माता त्वं जीवसंज्ञकः
tvameko bhagavānsarvavyāpakaḥ sarvadehinām pitṛvadrakṣako'si tvaṁ mātā tvaṁ jīvasaṁjñakaḥ
"तुम अकेले ही भगवान् सभी देहधारियों में सर्वव्यापी हो। तुम पिता के समान रक्षक हो, तुम माता हो, तुम्हीं जीव कहलाते हो,"
श्लोक 95 (skanda.6.254.95)
साक्षी विश्वस्य बीजं त्वं ब्रह्मांडवशकारकः । उत्पद्यंते विलीयंते त्वयि ब्रह्मांडकोटयः
sākṣī viśvasya bījaṁ tvaṁ brahmāṁḍavaśakārakaḥ utpadyaṁte vilīyaṁte tvayi brahmāṁḍakoṭayaḥ
"तुम विश्व के साक्षी और बीज हो, ब्रह्माण्डों को वश में करनेवाले हो। तुम्हीं में करोड़ों ब्रह्माण्ड उत्पन्न होते और लीन होते हैं,"
श्लोक 96 (skanda.6.254.96)
ऊर्मयः सागरे नित्यं सलिले बुद्बुदा यथा । अहं कदाचित्तेनेत्रात्कदाचित्तव भालतः
ūrmayaḥ sāgare nityaṁ salile budbudā yathā ahaṁ kadācittenetrātkadācittava bhālataḥ
जैसे सागर में नित्य लहरें, अथवा जल में बुलबुले। मैं (ब्रह्मा) कभी तुम्हारे नेत्र से, कभी तुम्हारे ललाट से उत्पन्न हुआ हूँ,
श्लोक 97 (skanda.6.254.97)
क्वचित्संगे शिवादेव्या प्राहुर्भूत्वा सृजे जगत् । तवाज्ञाकरिणः सर्वे वयं ब्रह्मादयः सुराः
kvacitsaṁge śivādevyā prāhurbhūtvā sṛje jagat tavājñākariṇaḥ sarve vayaṁ brahmādayaḥ surāḥ
"और कभी शिवा देवी के संग से — ऐसा कहा गया है — प्रकट होकर मैं जगत् की सृष्टि करता हूँ। ब्रह्मा आदि हम सभी देवता तुम्हारी आज्ञा का पालन करनेवाले हैं,"
श्लोक 98 (skanda.6.254.98)
अनंतवैभवोऽनंतोऽनंतधामाऽस्यनंतकः । अनंतः सर्वभंगाय कुरुषे रूपमद्भुतम्
anaṁtavaibhavo'naṁto'naṁtadhāmā'syanaṁtakaḥ anaṁtaḥ sarvabhaṁgāya kuruṣe rūpamadbhutam
"अनन्त वैभववाले, अनन्त, अनन्त धामवाले, तुम अनन्तक हो। अनन्त तुम सभी विघ्नों के विनाश के लिए अद्भुत रूप धारण करते हो,"
श्लोक 99 (skanda.6.254.99)
भवानि त्वं भयं नित्यमशिवानां पवित्रकृत् । शिवा नामपि दात्री त्वं तपसामपि त्वं फलम्
bhavāni tvaṁ bhayaṁ nityamaśivānāṁ pavitrakṛt śivā nāmapi dātrī tvaṁ tapasāmapi tvaṁ phalam
"हे भवानी, तुम अशिवों के लिए सदा भय हो और पवित्रता करनेवाली हो। तुम कल्याण की भी दात्री हो, और तुम्हीं तपस्याओं का फल भी हो,"
श्लोक 100 (skanda.6.254.100)
यः शिवः स स्वयं विष्णुर्यो विष्णुः स सदाशिवः । इत्यभेदमतिर्जाता स्वल्पा नस्त्वत्प्रसादतः
yaḥ śivaḥ sa svayaṁ viṣṇuryo viṣṇuḥ sa sadāśivaḥ ityabhedamatirjātā svalpā nastvatprasādataḥ
"जो शिव हैं, वे स्वयं विष्णु हैं, और जो विष्णु हैं, वे ही सदाशिव हैं — इस प्रकार यह अभेद-बुद्धि, यद्यपि अल्प है, तुम्हारी ही कृपा से हममें उत्पन्न हुई है,"
श्लोक 101 (skanda.6.254.101)
यत्किंचिच्च जगत्यस्मिन्दृश्यते श्रूयतेऽपि वा । मध्ये बहिश्च तत्सर्वं त्रयं व्याप्य स्थिता यदा
yatkiṁcicca jagatyasmindṛśyate śrūyate'pi vā madhye bahiśca tatsarvaṁ trayaṁ vyāpya sthitā yadā
"क्योंकि इस जगत् में जो कुछ भी दिखाई देता है या सुना जाता है, भीतर और बाहर, वह सब — जब तुम उस त्रय में व्याप्त होकर स्थित हो,"
श्लोक 102 (skanda.6.254.102)
जगत्पूज्ये सुरेशानि जगद्वंद्ये तथांबिके । प्रसादं कुरु देवेशि देवेश प्रणता वयम्
jagatpūjye sureśāni jagadvaṁdye tathāṁbike prasādaṁ kuru deveśi deveśa praṇatā vayam
"हे जगत्पूज्या, हे सुरेशानी, हे जगद्वन्द्या माता — हे देवेशी, प्रसन्न होइए; हे देवेश, हम आपके समक्ष नत हैं।"
श्लोक 103 (skanda.6.254.103)
इत्युक्त्वा त्रिदशाः सर्वे हृष्टा जग्मुर्यथागतम्
ityuktvā tridaśāḥ sarve hṛṣṭā jagmuryathāgatam
ऐसा कहकर सभी तैंतीस कोटि देवता प्रसन्न होकर जैसे आए थे, वैसे ही चले गए।
श्लोक 104 (skanda.6.254.104)
गालव उवाच । तद्दिव्यरूपमतुलं भुवि ये मनुष्याः संसारसागरसमुत्तरणैकपोतम् । संचिन्तयंति मनसा हृतकिल्बिषास्ते ब्रह्मस्वरूपमनुयांति विमुक्तसंगाः
gālava uvāca taddivyarūpamatulaṁ bhuvi ye manuṣyāḥ saṁsārasāgarasamuttaraṇaikapotam saṁcintayaṁti manasā hṛtakilbiṣāste brahmasvarūpamanuyāṁti vimuktasaṁgāḥ
गालव ने कहा — पृथ्वी पर जो मनुष्य उस दिव्य, अनुपम रूप का, जो संसार-सागर से पार जाने की एकमात्र नौका है, मन से चिन्तन करते हैं, वे पापों से मुक्त होकर, समस्त आसक्तियों से रहित होकर, ब्रह्मस्वरूप को प्राप्त होते हैं।