नागर खण्ड · अध्याय 255
लक्ष्मीनारायणमहिमवर्णन
श्लोक 1 (skanda.6.255.1)
गालव उवाच । एवं ते लब्धशापाश्च पार्वतीशापपीडिताः । अनपत्या बभूवुश्च तथा च प्रतिमानवाः
gālava uvāca evaṁ te labdhaśāpāśca pārvatīśāpapīḍitāḥ anapatyā babhūvuśca tathā ca pratimānavāḥ
गालव ने कहा — इस प्रकार शाप प्राप्त करके, पार्वती के शाप से पीड़ित होकर, वे सन्तानरहित हो गए, और उसी प्रकार नई प्रतिमाओं के रूप में स्थित हुए।
श्लोक 2 (skanda.6.255.2)
शालग्रामस्तु गंडक्यां नर्मदायां महेश्वरः । उत्पद्यते स्वयंभूश्च तावेतौ नैव कृत्रिमौ
śālagrāmastu gaṁḍakyāṁ narmadāyāṁ maheśvaraḥ utpadyate svayaṁbhūśca tāvetau naiva kṛtrimau
शालग्राम गण्डकी में उत्पन्न होता है, और महेश्वर नर्मदा में — दोनों स्वयंभू हैं; ये दोनों कभी भी कृत्रिम नहीं हैं।
श्लोक 3 (skanda.6.255.3)
चतुर्विंशतिभेदेन शालग्रामगतो हरिः । परीक्ष्यः पुरुषैर्नित्यमेकरूपः सदाशिवः
caturviṁśatibhedena śālagrāmagato hariḥ parīkṣyaḥ puruṣairnityamekarūpaḥ sadāśivaḥ
चौबीस भेदों से शालग्राम में स्थित हरि को मनुष्यों को सदा परखना चाहिए। सदाशिव तो सदा एकरूप ही हैं।
श्लोक 4 (skanda.6.255.4)
शालग्रामशिला यत्र गंडकीविमले जले । तत्र स्नात्वा च पीत्वा च ब्रह्मणः पदमाप्नुयात्
śālagrāmaśilā yatra gaṁḍakīvimale jale tatra snātvā ca pītvā ca brahmaṇaḥ padamāpnuyāt
जहाँ गण्डकी के निर्मल जल में शालग्राम शिला है, वहाँ स्नान करके और जल पीकर मनुष्य ब्रह्मपद को प्राप्त करता है।
श्लोक 5 (skanda.6.255.5)
तां पूजयित्वा विधिवद्गंडकीसंभवां शिलाम् । योगीश्वरो विशुद्धात्मा जायते नात्र संशयः
tāṁ pūjayitvā vidhivadgaṁḍakīsaṁbhavāṁ śilām yogīśvaro viśuddhātmā jāyate nātra saṁśayaḥ
गण्डकी से उत्पन्न उस शिला की विधिपूर्वक पूजा करके मनुष्य योगीश्वर और विशुद्धात्मा हो जाता है, इसमें संशय नहीं।
श्लोक 6 (skanda.6.255.6)
एतत्ते कथितं सर्वं यत्पृष्टोऽहमिह त्वया । यथा हरो विप्रशापं प्राप्तवांस्तन्निशामय
etatte kathitaṁ sarvaṁ yatpṛṣṭo'hamiha tvayā yathā haro vipraśāpaṁ prāptavāṁstanniśāmaya
यह सब तुमसे जो मुझसे पूछा गया था, वह मैंने बता दिया। अब सुनो कि हर ने ब्राह्मण के शाप को किस प्रकार प्राप्त किया।
श्लोक 7 (skanda.6.255.7)
यः शृणोति नरो भक्त्या वाच्यमानामिमां कथाम् । गिरीशनृत्यसंबन्धामुमादेहार्द्धवर्णिताम्
yaḥ śṛṇoti naro bhaktyā vācyamānāmimāṁ kathām girīśanṛtyasaṁbandhāmumādehārddhavarṇitām
जो मनुष्य भक्तिपूर्वक इस कथा को सुनता है, जो गिरीश के नृत्य से सम्बन्धित है और उमा के आधे शरीर का वर्णन करती है,
श्लोक 8 (skanda.6.255.8)
ब्रह्मणः स्तुतिसंयुक्तां स गच्छेत्परमां गतिम् । श्लोकार्द्धं श्लोकपादं वा समस्तं श्लोकमेव वा
brahmaṇaḥ stutisaṁyuktāṁ sa gacchetparamāṁ gatim ślokārddhaṁ ślokapādaṁ vā samastaṁ ślokameva vā
और ब्रह्मा की स्तुति से युक्त है, वह परम गति को प्राप्त होता है। जो कोई आधा श्लोक, या श्लोक का चौथाई भाग, या सम्पूर्ण श्लोक भी,
श्लोक 9 (skanda.6.255.9)
यः पठेदविरोधेन मायामानविवर्जितः । स याति परमं स्थानं यत्र गत्वा न शोचति
yaḥ paṭhedavirodhena māyāmānavivarjitaḥ sa yāti paramaṁ sthānaṁ yatra gatvā na śocati
माया और अभिमान से रहित होकर बिना विरोध के पढ़ता है, वह उस परम स्थान को प्राप्त होता है, जहाँ जाकर मनुष्य शोक नहीं करता।
श्लोक 10 (skanda.6.255.10)
चातुर्मास्ये विशेषेण पठञ्छृण्वन्नरोत्तमः । लभते चिंतितां सिद्धिं धनपुत्रादिसंवृतः
cāturmāsye viśeṣeṇa paṭhañchṛṇvannarottamaḥ labhate ciṁtitāṁ siddhiṁ dhanaputrādisaṁvṛtaḥ
विशेष रूप से चातुर्मास्य में, पढ़ता या सुनता हुआ श्रेष्ठ मनुष्य, धन-पुत्रादि से युक्त होकर, अपनी सोची हुई सिद्धि को प्राप्त करता है।
श्लोक 11 (skanda.6.255.11)
यथा ब्रह्मादयो देवा गीतवाद्याभियोगतः । परां सिद्धिमवापुस्ते दुर्गाशिवसमीपतः
yathā brahmādayo devā gītavādyābhiyogataḥ parāṁ siddhimavāpuste durgāśivasamīpataḥ
जैसे ब्रह्मा आदि देवताओं ने गीत और वाद्य के अभ्यास से दुर्गा और शिव की समीपता से परम सिद्धि प्राप्त की,
श्लोक 12 (skanda.6.255.12)
वर्षाकाले च संप्राप्ते भक्तियोगे जनार्दने । महेश्वरेऽथ दुर्गायां न भूयः स्तनपो भवेत्
varṣākāle ca saṁprāpte bhaktiyoge janārdane maheśvare'tha durgāyāṁ na bhūyaḥ stanapo bhavet
उसी प्रकार वर्षाकाल के आने पर जनार्दन में, तथा महेश्वर और दुर्गा में भक्तियुक्त होनेवाला मनुष्य पुनः शिशु रूप में जन्म नहीं लेता।
श्लोक 13 (skanda.6.255.13)
गणेशस्य सदा कुर्याच्चातुर्मास्ये विशेषतः । पूजां मनुष्यो लाभार्थं यत्नो लाभप्रदो हि सः
gaṇeśasya sadā kuryāccāturmāsye viśeṣataḥ pūjāṁ manuṣyo lābhārthaṁ yatno lābhaprado hi saḥ
मनुष्य को गणेश की पूजा सदा करनी चाहिए, विशेष रूप से चातुर्मास्य में, लाभ प्राप्ति के लिए — क्योंकि वह प्रयत्न निश्चय ही लाभदायक है।
श्लोक 14 (skanda.6.255.14)
सूर्यो नीरोगतां दद्याद्भक्त्या यैः पूज्यते हि सः । चातुर्मास्ये समायाते विशेषफलदो नृणाम्
sūryo nīrogatāṁ dadyādbhaktyā yaiḥ pūjyate hi saḥ cāturmāsye samāyāte viśeṣaphalado nṛṇām
सूर्य उन्हें निरोगता प्रदान करते हैं, जिनके द्वारा वे भक्तिपूर्वक पूजित होते हैं। चातुर्मास्य के आने पर वे मनुष्यों को विशेष फल देनेवाले होते हैं।
श्लोक 15 (skanda.6.255.15)
इदं हि पंचायतनं सेव्यते गृहमेधिभिः । चातुर्मास्ये विशेषेण सेवितं चिंतितप्रदम्
idaṁ hi paṁcāyatanaṁ sevyate gṛhamedhibhiḥ cāturmāsye viśeṣeṇa sevitaṁ ciṁtitapradam
यह पंचायतन गृहस्थों द्वारा सेवित होता है। विशेष रूप से चातुर्मास्य में सेवित होकर यह इच्छित वस्तु प्रदान करनेवाला है।
श्लोक 16 (skanda.6.255.16)
शालग्रामगतं विष्णुं यः पूजयति नित्यदा । द्वारवतीचक्रशिलासहितं मोक्षदायकम्
śālagrāmagataṁ viṣṇuṁ yaḥ pūjayati nityadā dvāravatīcakraśilāsahitaṁ mokṣadāyakam
जो शालग्राम में स्थित विष्णु की, द्वारवती चक्र-शिला सहित, मोक्ष देनेवाली उस मूर्ति की सदा पूजा करता है,
श्लोक 17 (skanda.6.255.17)
चातुर्मास्ये विशेषेण दर्शनादपि मुक्तिदम् । यस्मिन्स्तुते स्तुतं सर्वं पूजिते पूजितं जगत्
cāturmāsye viśeṣeṇa darśanādapi muktidam yasminstute stutaṁ sarvaṁ pūjite pūjitaṁ jagat
विशेष रूप से चातुर्मास्य में, वह दर्शन मात्र से भी मुक्ति देनेवाला है। उसके स्तुत होने पर सब कुछ स्तुत हो जाता है, उसके पूजित होने पर सम्पूर्ण जगत् पूजित हो जाता है।
श्लोक 18 (skanda.6.255.18)
पूजितः पठितो ध्यातः स्मृतो वै कलुषापहः । शालग्रामे किं पुनर्यच्छालग्रामगतो हरिः
pūjitaḥ paṭhito dhyātaḥ smṛto vai kaluṣāpahaḥ śālagrāme kiṁ punaryacchālagrāmagato hariḥ
पूजित, पठित, ध्यात अथवा स्मरण किया गया, वह निश्चय ही मल का नाश करनेवाला है — फिर शालग्राम में क्या कहना, जहाँ हरि स्वयं स्थित हैं?
श्लोक 19 (skanda.6.255.19)
पुनर्हि हरिनैवेद्यं फलं चापि धृतं जलम् । चातुर्मास्ये विशेषेण शालग्रामगतं शुभम्
punarhi harinaivedyaṁ phalaṁ cāpi dhṛtaṁ jalam cāturmāsye viśeṣeṇa śālagrāmagataṁ śubham
और भी, हरि को अर्पित नैवेद्य, फल, तथा जो जल चढ़ाया जाता है, वह विशेष रूप से चातुर्मास्य में शालग्राम में स्थित होकर शुभ बन जाता है।
श्लोक 20 (skanda.6.255.20)
तिलाः पुनंत्यर्पिताश्च शालग्रामस्य शूद्रज । चातुर्मास्ये विशेषेण नरं भक्त्या समन्वितम्
tilāḥ punaṁtyarpitāśca śālagrāmasya śūdraja cāturmāsye viśeṣeṇa naraṁ bhaktyā samanvitam
हे शूद्रपुत्र! शालग्राम को अर्पित किए गए तिल, विशेष रूप से चातुर्मास्य में, भक्तियुक्त मनुष्य को पवित्र करते हैं,
श्लोक 21 (skanda.6.255.21)
स लक्ष्मीसहितो नित्यं धनधान्यसमन्वितः । महाभाग्यवतां गेहे जायते नात्र संशयः
sa lakṣmīsahito nityaṁ dhanadhānyasamanvitaḥ mahābhāgyavatāṁ gehe jāyate nātra saṁśayaḥ
वह सदा लक्ष्मी सहित, धन-धान्य से युक्त होकर, महाभाग्यशाली लोगों के घर में जन्म लेता है, इसमें संशय नहीं।
श्लोक 22 (skanda.6.255.22)
स लक्ष्मीसहितो विष्णुर्विज्ञेयो नात्र संशयः । तं पूजयेन्महाभक्त्या स्थिरा लक्ष्मीर्गृहे भवेत्
sa lakṣmīsahito viṣṇurvijñeyo nātra saṁśayaḥ taṁ pūjayenmahābhaktyā sthirā lakṣmīrgṛhe bhavet
उसे लक्ष्मी सहित विष्णु ही जानना चाहिए, इसमें संशय नहीं। उसकी महाभक्ति से पूजा करनी चाहिए, तो लक्ष्मी घर में स्थिर हो जाती हैं।
श्लोक 23 (skanda.6.255.23)
तावद्दरिद्रता लोके तावद्गर्जति पातकम् । तावत्क्लेशाः शरीरेऽस्मिन्न यावत्पूजयेद्धरिम्
tāvaddaridratā loke tāvadgarjati pātakam tāvatkleśāḥ śarīre'sminna yāvatpūjayeddharim
जब तक मनुष्य हरि की पूजा नहीं करता, तब तक ही जगत् में दरिद्रता है, तब तक ही पाप गरजता है, तब तक ही इस शरीर में क्लेश हैं।
श्लोक 24 (skanda.6.255.24)
स एव पूज्यते यत्र पंचक्रोशं पवित्रकम् । करोति सकलं क्षेत्रं न तवाऽशुभसंभवः
sa eva pūjyate yatra paṁcakrośaṁ pavitrakam karoti sakalaṁ kṣetraṁ na tavā'śubhasaṁbhavaḥ
जहाँ वे ही पूजित होते हैं, वहाँ वे पाँच कोस तक सम्पूर्ण क्षेत्र को पवित्र बना देते हैं — वहाँ किसी अशुभ के उत्पन्न होने की सम्भावना नहीं रहती।
श्लोक 25 (skanda.6.255.25)
एतदेव महाभाग्यमेतदेव महातपः । एष एव परो मोक्षो यत्र लक्ष्मीशपूजनम्
etadeva mahābhāgyametadeva mahātapaḥ eṣa eva paro mokṣo yatra lakṣmīśapūjanam
यही महान् सौभाग्य है, यही महान् तपस्या है, यही परम मोक्ष है — जहाँ लक्ष्मीपति की पूजा होती है।
श्लोक 26 (skanda.6.255.26)
शंखश्च दक्षिणावर्त्तो लक्ष्मीनारायणात्मकः । तुलसी कृष्णसारोऽत्र यत्र द्वारवती शिला । तत्र श्रीर्विजयो विष्णुर्मुक्तिरेवं चतुष्टयम्
śaṁkhaśca dakṣiṇāvartto lakṣmīnārāyaṇātmakaḥ tulasī kṛṣṇasāro'tra yatra dvāravatī śilā tatra śrīrvijayo viṣṇurmuktirevaṁ catuṣṭayam
दक्षिणावर्ती शंख लक्ष्मीनारायण के स्वरूप में है। तुलसी और कृष्णमृगचर्म भी — जहाँ द्वारवती शिला हो, वहाँ श्री, विजय, विष्णु और मुक्ति — इस प्रकार यह चतुष्टय प्राप्त होता है।
श्लोक 27 (skanda.6.255.27)
लक्ष्मीनारायणे पूजां विधातुर्मनुजस्य तु । ददाति पुण्यमतुलं मुक्तो भवति तत्क्षणात्
lakṣmīnārāyaṇe pūjāṁ vidhāturmanujasya tu dadāti puṇyamatulaṁ mukto bhavati tatkṣaṇāt
जो मनुष्य लक्ष्मीनारायण की विधिपूर्वक पूजा करता है, उसे यह अतुलनीय पुण्य प्रदान करती है, और वह उसी क्षण मुक्त हो जाता है।
श्लोक 28 (skanda.6.255.28)
चातुर्मास्ये विशेषेण पूज्यो लक्ष्मीयुतो हरिः
cāturmāsye viśeṣeṇa pūjyo lakṣmīyuto hariḥ
विशेष रूप से चातुर्मास्य में लक्ष्मी सहित हरि पूज्य हैं।
श्लोक 29 (skanda.6.255.29)
कुर्वतस्तस्य देवस्य ध्यानं कल्मषनाशनम् । तुलसीमञ्जरीभिश्च पूजितो जन्मनाशनः
kurvatastasya devasya dhyānaṁ kalmaṣanāśanam tulasīmañjarībhiśca pūjito janmanāśanaḥ
उस देव का ध्यान करनेवाले के लिए यह पाप का नाश करनेवाला है। तुलसी की मंजरियों से पूजित होकर वह जन्म-मरण के चक्र का नाश करनेवाला है।
श्लोक 30 (skanda.6.255.30)
पूजितो बिल्वपत्रेण चातुर्मास्येऽघहृत्तमः
pūjito bilvapatreṇa cāturmāsye'ghahṛttamaḥ
बिल्वपत्र से पूजित होकर, चातुर्मास्य में वह पाप का सर्वश्रेष्ठ हरनेवाला है।
श्लोक 31 (skanda.6.255.31)
सर्वप्रयत्नेन स एव सेव्यो यो व्याप्य विश्वं जगतामधीशः । काले सृजत्यत्ति च हेलया वा तं प्राप्य भक्तो न हि सीदतीति
sarvaprayatnena sa eva sevyo yo vyāpya viśvaṁ jagatāmadhīśaḥ kāle sṛjatyatti ca helayā vā taṁ prāpya bhakto na hi sīdatīti
सम्पूर्ण प्रयत्न से वे ही सेवनीय हैं, जो विश्व में व्याप्त होकर सम्पूर्ण जगत् के अधीश्वर हैं, जो काल में मानो लीलापूर्वक सृष्टि करते और उसका संहार करते हैं — उन्हें प्राप्त करके भक्त कभी दुःखी नहीं होता।