नागर खण्ड · अध्याय 256
रामनाममहिमवर्णन
श्लोक 1 (skanda.6.256.1)
गालव उवाच । एकदा भगवान्रुद्रः कैलासशिखरे स्थितः । दधार परमां लक्ष्मीमुमया सहितः किल
gālava uvāca ekadā bhagavānrudraḥ kailāsaśikhare sthitaḥ dadhāra paramāṁ lakṣmīmumayā sahitaḥ kila
गालव ने कहा — एक बार कैलास शिखर पर स्थित भगवान् रुद्र, उमा के साथ, परम शोभा को धारण कर रहे थे।
श्लोक 2 (skanda.6.256.2)
गणानां कोटयस्तिस्रस्तं यदा पर्यवारयन् । वीरबाहुर्वीरभद्रो वीरसेनश्च भृङ्गिराट्
gaṇānāṁ koṭayastisrastaṁ yadā paryavārayan vīrabāhurvīrabhadro vīrasenaśca bhṛṅgirāṭ
जब तीन करोड़ गणों ने उन्हें घेर रखा था — वीरबाहु, वीरभद्र, वीरसेन तथा भृंगिराट्,
श्लोक 3 (skanda.6.256.3)
रुचिस्तुटिस्तथा नन्दी पुष्पदन्तस्तथोत्कटः । विकटः कण्टकश्चैव हरः केशो विघंटकः
rucistuṭistathā nandī puṣpadantastathotkaṭaḥ vikaṭaḥ kaṇṭakaścaiva haraḥ keśo vighaṁṭakaḥ
रुचि, तुटि, नन्दी, पुष्पदन्त, उत्कट, विकट, कण्टक, हर, केश, विघण्टक,
श्लोक 4 (skanda.6.256.4)
मालाधरः पाशधरः शृङ्गी च नरनस्तथा । पुण्योत्कटः शालिभद्रो महाभद्रो विभद्रकः
mālādharaḥ pāśadharaḥ śṛṅgī ca naranastathā puṇyotkaṭaḥ śālibhadro mahābhadro vibhadrakaḥ
मालाधर, पाशधर, शृंगी, नरन, पुण्योत्कट, शालिभद्र, महाभद्र, विभद्रक,
श्लोक 5 (skanda.6.256.5)
कणपः कालपः कालो धनपो रक्तलोचनः । विकटास्यो भद्रकश्च दीर्घजिह्वो विरोचनः
kaṇapaḥ kālapaḥ kālo dhanapo raktalocanaḥ vikaṭāsyo bhadrakaśca dīrghajihvo virocanaḥ
कणप, कालप, काल, धनप, रक्तलोचन, विकटास्य, भद्रक, दीर्घजिह्व, विरोचन,
श्लोक 6 (skanda.6.256.6)
पारदो घनदो ध्वांक्षी हंसक्री नरकस्तथा । पंचशीर्षस्त्रिशीर्षश्च क्रोडदंष्ट्रो महाद्भुतः
pārado ghanado dhvāṁkṣī haṁsakrī narakastathā paṁcaśīrṣastriśīrṣaśca kroḍadaṁṣṭro mahādbhutaḥ
पारद, घनद, ध्वांक्षी, हंसक्री, नरक, पंचशीर्ष, त्रिशीर्ष, क्रोडदंष्ट्र, महाद्भुत,
श्लोक 7 (skanda.6.256.7)
सिंहवक्त्रो वृषहनुः प्रचण्डस्तुंडिरेव च । एते चान्ये च बहवस्तदा भवसमीपगाः
siṁhavaktro vṛṣahanuḥ pracaṇḍastuṁḍireva ca ete cānye ca bahavastadā bhavasamīpagāḥ
सिंहवक्त्र, वृषहनु, प्रचण्ड, और तुण्डि भी — ये तथा अन्य बहुत-से गण उस समय भव के समीप थे,
श्लोक 8 (skanda.6.256.8)
महादेव जयेत्युच्चैर्भद्रकालीसमन्विताः । भूतप्रेतपिशाचानां समूहा यस्य वल्लभाः
mahādeva jayetyuccairbhadrakālīsamanvitāḥ bhūtapretapiśācānāṁ samūhā yasya vallabhāḥ
"महादेव की जय हो" ऐसा ऊँचे स्वर में कहते हुए, भद्रकाली सहित। भूत, प्रेत तथा पिशाचों के समूह, जो उन्हें प्रिय हैं,
श्लोक 9 (skanda.6.256.9)
अस्तुवंस्तं समीपस्था वसन्ते समुपागते । वनराजिर्विभाति स्म नवकोरकशोभिता
astuvaṁstaṁ samīpasthā vasante samupāgate vanarājirvibhāti sma navakorakaśobhitā
समीप खड़े होकर उनकी स्तुति करते रहे, जब वसन्त ऋतु आ गई थी। वन की पंक्तियाँ नई कोंपलों से सुशोभित होकर चमक रही थीं,
श्लोक 10 (skanda.6.256.10)
दक्षिणानिलसंस्पर्शः कवीनां सुखकृद्बभौ । वियोगिहृदयाकर्षी किंशुकः पुष्पशोभितः
dakṣiṇānilasaṁsparśaḥ kavīnāṁ sukhakṛdbabhau viyogihṛdayākarṣī kiṁśukaḥ puṣpaśobhitaḥ
और दक्षिणी वायु का स्पर्श कवियों के लिए सुखदायी हो रहा था। पुष्पों से सुशोभित किंशुक वृक्ष विरही हृदयों को आकृष्ट करनेवाला था।
श्लोक 11 (skanda.6.256.11)
द्वन्द्वादिविक्रियाभावं चिक्रीडुश्च समंततः । तस्मिन्विगाढे समये मनस्युन्मादके तथा
dvandvādivikriyābhāvaṁ cikrīḍuśca samaṁtataḥ tasminvigāḍhe samaye manasyunmādake tathā
जोड़े-जोड़े में प्राणी चारों ओर विकार भाव से क्रीड़ा करने लगे। उस मन को उन्मत्त करनेवाले गहन समय में,
श्लोक 12 (skanda.6.256.12)
नंदी दंडधरः संज्ञां दृष्ट्वा चक्रे हरो परः । अलं चापलदोषेण तपः कुर्वंतु भो गणाः
naṁdī daṁḍadharaḥ saṁjñāṁ dṛṣṭvā cakre haro paraḥ alaṁ cāpaladoṣeṇa tapaḥ kurvaṁtu bho gaṇāḥ
दण्डधारी नन्दी ने स्थिति देखकर संकेत किया, और परम हर ने कहा — "चंचलता के दोष से बस करो, हे गणो! तपस्या करो।"
श्लोक 13 (skanda.6.256.13)
तदा सर्वे वनमपि भूकांडजमभूत्पुनः । गणास्ते तप आतस्थुर्दृष्ट्वा कान्तिं वसन्तजाम्
tadā sarve vanamapi bhūkāṁḍajamabhūtpunaḥ gaṇāste tapa ātasthurdṛṣṭvā kāntiṁ vasantajām
तब सम्पूर्ण वन भी मानो पृथ्वी से पुनः नया उत्पन्न हो गया। उन गणों ने वसन्त से उत्पन्न कान्ति को देखकर तपस्या का आश्रय लिया।
श्लोक 14 (skanda.6.256.14)
ततः सा विश्वजननी पार्वती प्राह शंकरम् । इयं ते करगा नित्यमक्षमाला महेश्वर
tataḥ sā viśvajananī pārvatī prāha śaṁkaram iyaṁ te karagā nityamakṣamālā maheśvara
तत्पश्चात् उस विश्वजननी पार्वती ने शंकर से कहा — "हे महेश्वर! यह अक्षमाला सदा आपके हाथ में रहती है,"
श्लोक 15 (skanda.6.256.15)
त्वया किं जप्यते देव संदेहयति मे मनः । त्वमेकः सर्वभूतानामादिकृत्सकलेश्वरः
tvayā kiṁ japyate deva saṁdehayati me manaḥ tvamekaḥ sarvabhūtānāmādikṛtsakaleśvaraḥ
"आप उससे क्या जपते हैं, हे देव? मेरा मन संदेह में है। आप अकेले ही समस्त प्राणियों के आदिकर्ता और सबके ईश्वर हैं,"
श्लोक 16 (skanda.6.256.16)
न माता न पिता बंधुस्तव जातिर्न कश्चन । अहं तव परं किंचिद्वेद्मि नास्तीति किंचन
na mātā na pitā baṁdhustava jātirna kaścana ahaṁ tava paraṁ kiṁcidvedmi nāstīti kiṁcana
"आपकी न कोई माता है, न पिता, न बन्धु, न कोई जाति। मैं आपसे बढ़कर किसी को नहीं जानती, ऐसा कुछ है ही नहीं,"
श्लोक 17 (skanda.6.256.17)
श्रमेण त्वं समायुक्तो श्वासोच्छ्वासपरायणः । जपन्नपि महाभक्त्या दृश्यसे त्वं मया सदा
śrameṇa tvaṁ samāyukto śvāsocchvāsaparāyaṇaḥ japannapi mahābhaktyā dṛśyase tvaṁ mayā sadā
"फिर भी आप श्रम से युक्त, श्वास-प्रश्वास में तत्पर होकर, महान् भक्ति से जप करते हुए ही सदा मुझे दिखाई देते हैं,"
श्लोक 18 (skanda.6.256.18)
त्वत्तःपरतरं किचिद्यत्त्वं ध्यायसि चेतसा । तन्मे कथय देवेश यद्यहं दयिता तव
tvattaḥparataraṁ kicidyattvaṁ dhyāyasi cetasā tanme kathaya deveśa yadyahaṁ dayitā tava
"तो जो कुछ भी आपसे बढ़कर है, जिसका आप मन से ध्यान करते हैं, वह मुझे बताइए, हे देवेश, यदि मैं आपकी प्रिय हूँ।"
श्लोक 19 (skanda.6.256.19)
इति स्पृष्टस्तदा शंभुरुवाच हरिसेवकः । हरेर्नामसहस्राणां सारं ध्यायामि नित्यशः
iti spṛṣṭastadā śaṁbhuruvāca harisevakaḥ harernāmasahasrāṇāṁ sāraṁ dhyāyāmi nityaśaḥ
इस प्रकार पूछे जाने पर, हरि के सेवक शम्भु ने कहा — "मैं हरि के सहस्र नामों के सार का सदा ध्यान करता हूँ,"
श्लोक 20 (skanda.6.256.20)
जपामि रामनामांकमवातरं ससप्तमम् । चतुर्विशतिसंख्याकान्प्रादुर्भावान्हरेर्गुणान्
japāmi rāmanāmāṁkamavātaraṁ sasaptamam caturviśatisaṁkhyākānprādurbhāvānharerguṇān
"मैं राम नाम का, अवतारों सहित सप्तम तक जप करता हूँ; हरि के चौबीस प्रादुर्भावों और गुणों का भी जप करता हूँ,"
श्लोक 21 (skanda.6.256.21)
एतेषामपि यत्सारं प्रणवाख्यं महत्फलम् । द्वादशाक्षरसंयुक्तं ब्रह्मरूपं सनातनम्
eteṣāmapi yatsāraṁ praṇavākhyaṁ mahatphalam dvādaśākṣarasaṁyuktaṁ brahmarūpaṁ sanātanam
"और इन सबका भी जो सार है, वह प्रणव नामक महाफलदायी, द्वादशाक्षर से युक्त, सनातन ब्रह्मस्वरूप है,"
श्लोक 22 (skanda.6.256.22)
अक्षरत्रयसंबद्धं ग्रामत्रयसमन्वितम् । सबिंदुं प्रणवं शश्वज्जपामि जपमालया
akṣaratrayasaṁbaddhaṁ grāmatrayasamanvitam sabiṁduṁ praṇavaṁ śaśvajjapāmi japamālayā
"जो तीन अक्षरों से युक्त और तीनों ग्रामों से संयुक्त है — उस बिन्दुसहित प्रणव का मैं इस जपमाला से निरन्तर जप करता हूँ।"
श्लोक 23 (skanda.6.256.23)
वेदसारमिदं नित्यं द्व्यक्षरं सततोद्यतम् । निर्मलं ह्यमृतं शांतं सदूपममृतोपमम्
vedasāramidaṁ nityaṁ dvyakṣaraṁ satatodyatam nirmalaṁ hyamṛtaṁ śāṁtaṁ sadūpamamṛtopamam
"यह वेदों का सार, नित्य, द्व्यक्षर, सदा उद्यत रहनेवाला है; निर्मल, अमृतमय, शान्त, सत्यस्वरूप, अमृत के समान है,"
श्लोक 24 (skanda.6.256.24)
कलातीतं निर्वशगं निर्व्यापारं महत्परम् । विश्वाधारं जगन्मध्यं कोटिब्रह्मांडबीजकम्
kalātītaṁ nirvaśagaṁ nirvyāpāraṁ mahatparam viśvādhāraṁ jaganmadhyaṁ koṭibrahmāṁḍabījakam
"कला से परे, किसी के वश में न होनेवाला, क्रियारहित, महान् और सर्वोत्तम; विश्व का आधार, जगत् का मध्यबिन्दु, करोड़ों ब्रह्माण्डों का बीज है,"
श्लोक 25 (skanda.6.256.25)
जडं शुद्धक्रियं वापि निरंजनं नियामकम् । यज्ज्ञात्वा मुच्यते क्षिप्रं घोरसंसारबंधनात्
jaḍaṁ śuddhakriyaṁ vāpi niraṁjanaṁ niyāmakam yajjñātvā mucyate kṣipraṁ ghorasaṁsārabaṁdhanāt
"जड़ है, अथवा शुद्ध क्रियावाला भी है, निष्कलंक और नियन्ता है — जिसे जानकर मनुष्य घोर संसार-बन्धन से शीघ्र मुक्त हो जाता है,"
श्लोक 26 (skanda.6.256.26)
ओंकारसहितं यच्च द्वादशाक्षरबीजकम् । जपतः पापकोटीनां दावाग्नित्वं प्रजायते
oṁkārasahitaṁ yacca dvādaśākṣarabījakam japataḥ pāpakoṭīnāṁ dāvāgnitvaṁ prajāyate
"और जो ओंकार सहित द्वादशाक्षर बीजमन्त्र है, उसे जपनेवाले के लिए वह करोड़ों पापों के लिए दावाग्नि के समान हो जाता है।"
श्लोक 27 (skanda.6.256.27)
एतदेव परं गुह्यमेतदेव परं महः । एतद्धि दुर्लभं लोके लोकत्रयविभूषणम्
etadeva paraṁ guhyametadeva paraṁ mahaḥ etaddhi durlabhaṁ loke lokatrayavibhūṣaṇam
"यही परम रहस्य है, यही परम तेज है; यह लोक में दुर्लभ है, तीनों लोकों का आभूषण है,"
श्लोक 28 (skanda.6.256.28)
प्राप्यते जन्मकोटीभिः शुभाशुभविनाशकम् । एतदेव परं ज्ञानं द्वादशाक्षरचिन्तनम्
prāpyate janmakoṭībhiḥ śubhāśubhavināśakam etadeva paraṁ jñānaṁ dvādaśākṣaracintanam
"करोड़ों जन्मों के बाद प्राप्त होता है, और शुभ-अशुभ दोनों का नाश करनेवाला है। यही परम ज्ञान है — द्वादशाक्षर का चिन्तन,"
श्लोक 29 (skanda.6.256.29)
चातुर्मास्ये विशेषेण ब्रह्मदं चिंतितप्रदम् । एतदक्षरजं स्तोत्रं यः समाश्रयते सदा
cāturmāsye viśeṣeṇa brahmadaṁ ciṁtitapradam etadakṣarajaṁ stotraṁ yaḥ samāśrayate sadā
"विशेष रूप से चातुर्मास्य में यह ब्रह्म को देनेवाला और इच्छित वस्तु देनेवाला है। जो कोई इन अक्षरों से उत्पन्न इस स्तोत्र का सदा आश्रय लेता है,"
श्लोक 30 (skanda.6.256.30)
मनसा कर्मणा वाचा तस्य नास्ति पुनर्भवः । द्वादशाक्षरसंयुक्तं चक्रद्वादशभूषितम्
manasā karmaṇā vācā tasya nāsti punarbhavaḥ dvādaśākṣarasaṁyuktaṁ cakradvādaśabhūṣitam
"मन, कर्म और वाणी से, उसका पुनर्जन्म नहीं होता। द्वादशाक्षर से युक्त, बारह चक्रों से सुशोभित —"
श्लोक 31 (skanda.6.256.31)
मासद्वादशनामानि विष्णोर्यो भक्तितत्परः । शालग्रामेषु तान्युक्त्वा न्यसेदघहराणि च
māsadvādaśanāmāni viṣṇoryo bhaktitatparaḥ śālagrāmeṣu tānyuktvā nyasedaghaharāṇi ca
"भक्ति में तत्पर जो मनुष्य विष्णु के बारह मासनामों को, जो पापहारी हैं, शालग्रामों पर स्थापित करता है,"
श्लोक 32 (skanda.6.256.32)
दिवसेदिवसे तस्य द्वादशाहफलं लभेत् । द्वादशाक्षरमाहात्म्यं वर्णितुं नैव शक्यते
divasedivase tasya dvādaśāhaphalaṁ labhet dvādaśākṣaramāhātmyaṁ varṇituṁ naiva śakyate
"उसे प्रतिदिन बारह दिनों का फल प्राप्त होता है। द्वादशाक्षर के माहात्म्य का वर्णन करना संभव ही नहीं है,"
श्लोक 33 (skanda.6.256.33)
जिह्वासहस्रैरपि च ब्रह्मणापि न वार्यते । महामन्त्रो ह्ययं लोके जप्यो ध्यातः स्तुतस्तथा
jihvāsahasrairapi ca brahmaṇāpi na vāryate mahāmantro hyayaṁ loke japyo dhyātaḥ stutastathā
"हजारों जिह्वाओं से भी, और स्वयं ब्रह्मा के द्वारा भी, इसे पूरी तरह नहीं कहा जा सकता। यह लोक में महामन्त्र है, जपने, ध्यान करने तथा स्तुति करने योग्य है,"
श्लोक 34 (skanda.6.256.34)
पापहा सर्वमासेषु चातुर्मास्ये विशेषतः । इदं रहस्यं वेदानां पुराणानामनेकशः
pāpahā sarvamāseṣu cāturmāsye viśeṣataḥ idaṁ rahasyaṁ vedānāṁ purāṇānāmanekaśaḥ
"सभी महीनों में पापनाशक है, विशेष रूप से चातुर्मास्य में। यह वेदों तथा अनेक पुराणों का रहस्य है,"
श्लोक 35 (skanda.6.256.35)
स्मृतीनामपि सर्वासां द्वादशाक्षरचिन्तनम् । चिंतनादेव मर्त्यानां सिद्धिर्भवति हीप्सिता
smṛtīnāmapi sarvāsāṁ dvādaśākṣaracintanam ciṁtanādeva martyānāṁ siddhirbhavati hīpsitā
"और सभी स्मृतियों का भी — यह द्वादशाक्षर का चिन्तन है। चिन्तन मात्र से मरणधर्मा मनुष्यों को इच्छित सिद्धि प्राप्त होती है,"
श्लोक 36 (skanda.6.256.36)
पुण्यदानेन याम्येन मुक्तिर्भवति शाश्वती । वर्णैस्तथाश्रमैरेव प्रणवेन समन्वितैः
puṇyadānena yāmyena muktirbhavati śāśvatī varṇaistathāśramaireva praṇavena samanvitaiḥ
"संयमपूर्वक किए गए पुण्यदान से शाश्वत मुक्ति प्राप्त होती है। वर्णों तथा आश्रमों द्वारा, प्रणव से युक्त होकर,"
श्लोक 37 (skanda.6.256.37)
जपैर्ध्यानैः शमपरैर्मोक्षं यास्येत निश्चितम् । शूद्राणां चापि नारीणां प्रणवेन विवर्जितः
japairdhyānaiḥ śamaparairmokṣaṁ yāsyeta niścitam śūdrāṇāṁ cāpi nārīṇāṁ praṇavena vivarjitaḥ
"जप और ध्यान से, शान्ति में तत्पर होकर, निश्चय ही मोक्ष प्राप्त होता है। किन्तु शूद्रों तथा स्त्रियों के लिए प्रणव वर्जित है,"
श्लोक 38 (skanda.6.256.38)
प्रकृतीनां च सर्वासां न मन्त्रो द्वादशाक्षरः । न जपो न तपः कार्यं कायक्लेशाद्विशुद्धिता
prakṛtīnāṁ ca sarvāsāṁ na mantro dvādaśākṣaraḥ na japo na tapaḥ kāryaṁ kāyakleśādviśuddhitā
"और सभी अन्य वर्गों के लोगों के लिए भी द्वादशाक्षर मन्त्र नहीं है। उनके लिए न जप और न तप करना है — उनकी शुद्धि शरीर के परिश्रम से होती है,"
श्लोक 39 (skanda.6.256.39)
विप्रभक्त्या च दानेन विष्णुध्यानेन सिद्ध्यति । तासां मन्त्रो रामनाम ध्येयः कोट्यधिको भवेत्
viprabhaktyā ca dānena viṣṇudhyānena siddhyati tāsāṁ mantro rāmanāma dhyeyaḥ koṭyadhiko bhavet
"ब्राह्मणों की भक्ति से, दान से, तथा विष्णु के ध्यान से उनकी सिद्धि होती है। उनके लिए राम नाम ही मन्त्र है, जो करोड़ों गुना अधिक ध्यान करने योग्य है।"
श्लोक 40 (skanda.6.256.40)
रामेति द्व्यक्षरजपः सर्वपापापनोदकः । गच्छंस्तिष्ठञ्छयानो वा मनुजो रामकीर्तनात्
rāmeti dvyakṣarajapaḥ sarvapāpāpanodakaḥ gacchaṁstiṣṭhañchayāno vā manujo rāmakīrtanāt
"'राम' — इन दो अक्षरों का जप सभी पापों को दूर करनेवाला है। चलते, खड़े होते, अथवा लेटे हुए, मनुष्य राम-कीर्तन से,"
श्लोक 41 (skanda.6.256.41)
इह निर्वर्ततो याति प्रान्ते हरिगणो भवेत् । रामेति द्व्यक्षरो मन्त्रो मंत्रकोटिशताधिकः
iha nirvartato yāti prānte harigaṇo bhavet rāmeti dvyakṣaro mantro maṁtrakoṭiśatādhikaḥ
"इस जगत् से प्रस्थान करते समय अन्त में हरि के गण का सदस्य बन जाता है। 'राम' — यह द्व्यक्षर मन्त्र सैकड़ों करोड़ मन्त्रों से बढ़कर है,"
श्लोक 42 (skanda.6.256.42)
सर्वासां प्रकृतीनां च कथितः पापनाशकः । चातुर्मास्येऽथ संप्राप्ते सोऽप्यनंतफलप्रदः
sarvāsāṁ prakṛtīnāṁ ca kathitaḥ pāpanāśakaḥ cāturmāsye'tha saṁprāpte so'pyanaṁtaphalapradaḥ
"और सभी वर्गों के लिए पापनाशक कहा गया है। चातुर्मास्य के आने पर वह भी अनन्त फल देनेवाला हो जाता है,"
श्लोक 43 (skanda.6.256.43)
चातुर्मास्ये महापुण्ये लभ्यते भक्तितत्परैः । देववन्निष्फलं तेषां यमलोकस्यसेवनम्
cāturmāsye mahāpuṇye labhyate bhaktitatparaiḥ devavanniṣphalaṁ teṣāṁ yamalokasyasevanam
"जो महापुण्यकारी चातुर्मास्य में भक्ति में तत्पर लोगों द्वारा प्राप्त किया जाता है। उनके लिए यमलोक की सेवा देवताओं के समान निष्फल हो जाती है,"
श्लोक 44 (skanda.6.256.44)
न रामादधिकं किंचित्पठनं जगतीतले । रामनामाश्रया ये वै न तेषां यमयातना
na rāmādadhikaṁ kiṁcitpaṭhanaṁ jagatītale rāmanāmāśrayā ye vai na teṣāṁ yamayātanā
"पृथ्वीतल पर राम से बढ़कर पढ़ने योग्य कुछ भी नहीं है। जो राम-नाम का आश्रय लेते हैं, उन्हें यम की यातना नहीं होती,"
श्लोक 45 (skanda.6.256.45)
ये च दोषा विघ्नकरा मृतका विग्रहाश्च ये । रामनामैव विलयं यांति नात्र विचारणा
ye ca doṣā vighnakarā mṛtakā vigrahāśca ye rāmanāmaiva vilayaṁ yāṁti nātra vicāraṇā
"और जो भी विघ्नकारी दोष हैं, तथा जो भी मृतकों के रूप हैं, वे राम-नाम से ही विलीन हो जाते हैं, इसमें कोई विचार करने योग्य बात नहीं है,"
श्लोक 46 (skanda.6.256.46)
रमते सर्वभूतेषु स्थावरेषु चरेषु च । अन्तरात्मस्वरूपेण यच्च रामेति कथ्यते
ramate sarvabhūteṣu sthāvareṣu careṣu ca antarātmasvarūpeṇa yacca rāmeti kathyate
"क्योंकि वे सभी स्थावर और चर प्राणियों में, अन्तरात्मा के रूप में रमण करते हैं — इसीलिए उन्हें 'राम' कहा जाता है,"
श्लोक 47 (skanda.6.256.47)
रामेति मंत्रराजोऽयं भयव्याधिनिषूदकः । रणे विजयदश्चापि सर्वकार्यार्थसाधकः
rāmeti maṁtrarājo'yaṁ bhayavyādhiniṣūdakaḥ raṇe vijayadaścāpi sarvakāryārthasādhakaḥ
"'राम' यह मन्त्रों का राजा है, भय और रोग का नाशक है; युद्ध में विजय देनेवाला भी है, तथा सभी कार्यों और प्रयोजनों को सिद्ध करनेवाला है,"
श्लोक 48 (skanda.6.256.48)
सर्वतीर्थफलः प्रोक्तो विप्राणामपि कामदः । रामचन्द्रेति रामेति रामेति समुदाहृतः
sarvatīrthaphalaḥ prokto viprāṇāmapi kāmadaḥ rāmacandreti rāmeti rāmeti samudāhṛtaḥ
"सभी तीर्थों का फल देनेवाला कहा गया है, और ब्राह्मणों की कामनाओं को भी पूर्ण करनेवाला है। 'रामचन्द्र' कहकर, 'राम' कहकर, 'राम' कहकर ही इसका उच्चारण किया जाता है —"
श्लोक 49 (skanda.6.256.49)
द्व्यक्षरो मन्त्रराजोऽयं सर्वकार्यकरो भुवि । देवा अपि प्रगायंति रामनामगुणाकरम्
dvyakṣaro mantrarājo'yaṁ sarvakāryakaro bhuvi devā api pragāyaṁti rāmanāmaguṇākaram
"यह द्व्यक्षर मन्त्रराज पृथ्वी पर सभी कार्यों को सिद्ध करनेवाला है। देवता भी गुणों की खान इस राम-नाम का गान करते हैं,"
श्लोक 50 (skanda.6.256.50)
तस्मात्त्वमपि देवेशि रामनाम सदा वद । रामनाम जपेद्यो वै मुच्यते सर्वकिल्बिषैः
tasmāttvamapi deveśi rāmanāma sadā vada rāmanāma japedyo vai mucyate sarvakilbiṣaiḥ
"इसलिए, हे देवेशी! आप भी सदा राम-नाम का उच्चारण करें। जो कोई राम-नाम का जप करता है, वह सभी पापों से मुक्त हो जाता है,"
श्लोक 51 (skanda.6.256.51)
सहस्रनामजं पुण्यं रामनाम्नैव जायते । चातुर्मास्ये विशेषेण तत्पुण्यं दशधोत्तरम्
sahasranāmajaṁ puṇyaṁ rāmanāmnaiva jāyate cāturmāsye viśeṣeṇa tatpuṇyaṁ daśadhottaram
"और सहस्र नामों के जप से उत्पन्न होनेवाला पुण्य राम-नाम मात्र से ही उत्पन्न हो जाता है। विशेष रूप से चातुर्मास्य में वह पुण्य दस गुना और भी अधिक हो जाता है,"
श्लोक 52 (skanda.6.256.52)
हीनजातिप्रजातानां महदह्यति पातकम्
hīnajātiprajātānāṁ mahadahyati pātakam
"और यहाँ तक कि निम्न जाति में जन्मे लोगों का भी महान् पाप जलकर भस्म हो जाता है।"
श्लोक 53 (skanda.6.256.53)
रामो ह्ययं विश्वमिदं समयं स्वतेजसा व्याप्य जनांतरात्मना । पुनाति जन्मांतरपातकानि स्थूलानि सूक्ष्माणि क्षणाच्च दग्ध्वा
rāmo hyayaṁ viśvamidaṁ samayaṁ svatejasā vyāpya janāṁtarātmanā punāti janmāṁtarapātakāni sthūlāni sūkṣmāṇi kṣaṇācca dagdhvā
यह राम ही इस सम्पूर्ण विश्व को अपने ही तेज से व्याप्त करके, प्राणियों की अन्तरात्मा के रूप में स्थित होकर, पूर्वजन्मों के पापों को — स्थूल हो या सूक्ष्म — क्षणभर में जलाकर पवित्र कर देते हैं।