नागर खण्ड · अध्याय 257
द्वादशाक्षर-मन्त्र-माहात्म्य तथा पार्वती के तपोव्रत का वर्णन
श्लोक 1 (skanda.6.257.1)
पार्वत्युवाच । द्वादशाक्षरमाहात्म्यं मम विस्तरतो वद । यथावर्णं यत्फलं च यथा च क्रियते मया
pārvatyuvāca dvādaśākṣaramāhātmyaṁ mama vistarato vada yathāvarṇaṁ yatphalaṁ ca yathā ca kriyate mayā
पार्वती ने कहा — मुझे द्वादशाक्षर मन्त्र का माहात्म्य विस्तारपूर्वक बताइए, प्रत्येक अक्षर का जो फल है वह भी बताइए, तथा यह भी बताइए कि मैं इसका जप किस प्रकार करूँ।
श्लोक 2 (skanda.6.257.2)
श्रीमहादेव उवाच । द्विजातीनां सहोंकारसहितो द्वादशाक्षरः । स्त्रीशूद्राणां नमस्कारपूर्वकः समुदाहृतः
śrīmahādeva uvāca dvijātīnāṁ sahoṁkārasahito dvādaśākṣaraḥ strīśūdrāṇāṁ namaskārapūrvakaḥ samudāhṛtaḥ
श्री महादेव ने कहा — द्विजातियों के लिए यह द्वादशाक्षर मन्त्र ओंकार-सहित कहा गया है; स्त्रियों और शूद्रों के लिए यह 'नमः' शब्द के साथ आरम्भ करके बताया गया है।
श्लोक 3 (skanda.6.257.3)
प्रकृतीनां रामनाम संमतो वा षडक्षरः । सोऽपि प्रणवहीनः स्यात्पुराणस्मृतिनिर्णयः
prakṛtīnāṁ rāmanāma saṁmato vā ṣaḍakṣaraḥ so'pi praṇavahīnaḥ syātpurāṇasmṛtinirṇayaḥ
सामान्य प्रजाजनों के लिए छह अक्षरों वाला राम-नाम भी सम्मत है; पुराणों और स्मृतियों के निर्णयानुसार वह भी प्रणव (ओंकार) से रहित ही होता है।
श्लोक 4 (skanda.6.257.4)
क्रमोऽयं सर्ववर्णानां प्रकृतीनां सदैव हि । क्रमेण रहितो यस्तु करोति मनुजो जपम् । तस्य प्रकुप्यति विभुर्नरकादिप्रदायकः
kramo'yaṁ sarvavarṇānāṁ prakṛtīnāṁ sadaiva hi krameṇa rahito yastu karoti manujo japam tasya prakupyati vibhurnarakādipradāyakaḥ
यह क्रम सभी वर्णों और सामान्य प्रजाजनों के लिए सदा से यही है; जो मनुष्य इस क्रम का पालन किए बिना जप करता है, उससे सर्वव्यापी प्रभु कुपित होकर उसे नरकादि प्रदान करते हैं।
श्लोक 5 (skanda.6.257.5)
पार्वत्युवाच । मया त्रिमात्रया स्वामिन्सेव्यते जगदीश्वरः । रूपमस्य कथं जाने वचसामप्यगोचरम्
pārvatyuvāca mayā trimātrayā svāminsevyate jagadīśvaraḥ rūpamasya kathaṁ jāne vacasāmapyagocaram
पार्वती ने कहा — हे स्वामिन्! मैं त्रिमात्रा (ओंकार) से जगदीश्वर की सेवा करती हूँ; किंतु उनके उस स्वरूप को, जो वाणी के लिए भी अगोचर है, मैं कैसे जानूँ?
श्लोक 6 (skanda.6.257.6)
ईश्वर उवाच । प्रणवस्याधिकारो न तवास्ति वरवर्णिनि । नमो भगवते वासुदेवायेति जपः सदा
īśvara uvāca praṇavasyādhikāro na tavāsti varavarṇini namo bhagavate vāsudevāyeti japaḥ sadā
ईश्वर ने कहा — हे वरवर्णिनि! प्रणव का अधिकार तुम्हें नहीं है; तुम्हें सदा 'नमो भगवते वासुदेवाय' — इस मन्त्र का ही जप करना चाहिए।
श्लोक 7 (skanda.6.257.7)
पार्वत्युवाच । यदि सप्रणवं दद्याद्द्वादशाक्षरचिंतनम् । प्रणवे नाधिकारो मे कथं भवति धूर्जटे
pārvatyuvāca yadi sapraṇavaṁ dadyāddvādaśākṣaraciṁtanam praṇave nādhikāro me kathaṁ bhavati dhūrjaṭe
पार्वती ने कहा — हे धूर्जटे! यदि द्वादशाक्षर का चिंतन प्रणव-सहित दिया जाता है, तो फिर प्रणव में मेरा अधिकार क्यों नहीं है?
श्लोक 8 (skanda.6.257.8)
ईश्वर उवाच । प्रणवः सर्वदेवानामादिरेष प्रकीर्तितः । ब्रह्मा विष्णुः शिवश्चैव वसंति दयितायुताः
īśvara uvāca praṇavaḥ sarvadevānāmādireṣa prakīrtitaḥ brahmā viṣṇuḥ śivaścaiva vasaṁti dayitāyutāḥ
ईश्वर ने कहा — यह प्रणव समस्त देवताओं का आदि कहा गया है; इसमें ब्रह्मा, विष्णु और शिव अपनी-अपनी प्रियाओं के साथ निवास करते हैं।
श्लोक 9 (skanda.6.257.9)
तत्र सर्वाणि भूतानि सर्व तीर्थानि भागशः । तिष्ठंति सर्वतीर्थानि कैवल्यं ब्रह्म एव यः
tatra sarvāṇi bhūtāni sarva tīrthāni bhāgaśaḥ tiṣṭhaṁti sarvatīrthāni kaivalyaṁ brahma eva yaḥ
उसी में समस्त भूत तथा समस्त तीर्थ अपने-अपने अंश में स्थित रहते हैं, और वहीं सभी तीर्थ भी निवास करते हैं — वही ब्रह्म कैवल्य-स्वरूप है।
श्लोक 10 (skanda.6.257.10)
तस्य योग्या तदा देवि भविष्यसि यदा तपः । चातुर्मास्ये हरिप्रीत्यै करिष्यसि शुभानने
tasya yogyā tadā devi bhaviṣyasi yadā tapaḥ cāturmāsye hariprītyai kariṣyasi śubhānane
हे देवि! हे शुभानने! तुम उस प्रणव के योग्य तभी बनोगी जब चातुर्मास्य में हरि की प्रसन्नता के लिए तप करोगी।
श्लोक 11 (skanda.6.257.11)
तपसा प्राप्यते कामस्तपसा च महत्फलम् । तपसा जायते सर्वं तत्तपः सुलभं नरैः
tapasā prāpyate kāmastapasā ca mahatphalam tapasā jāyate sarvaṁ tattapaḥ sulabhaṁ naraiḥ
तप से कामना पूर्ण होती है, तप से ही महान फल प्राप्त होता है, तप से ही सब कुछ उत्पन्न होता है — तथापि वह तप मनुष्यों के लिए सुलभ ही है।
श्लोक 12 (skanda.6.257.12)
यशः सौभाग्यमतुलं क्षमासत्यादयो गुणाः । सुलभं तपसा नित्यं तपश्चर्त्तुं न शक्यते
yaśaḥ saubhāgyamatulaṁ kṣamāsatyādayo guṇāḥ sulabhaṁ tapasā nityaṁ tapaścarttuṁ na śakyate
यश, अतुलनीय सौभाग्य, तथा क्षमा-सत्य आदि गुण — ये सब तप से सदा ही सुलभ हो जाते हैं, किंतु तप का आचरण करना सहज नहीं है।
श्लोक 13 (skanda.6.257.13)
यदा हि तपसो वृद्धिस्तदा भक्तिर्हरौ भवेत् । तदा हि तपसो हानिर्यदा भक्तिं विना कृतम्
yadā hi tapaso vṛddhistadā bhaktirharau bhavet tadā hi tapaso hāniryadā bhaktiṁ vinā kṛtam
जब तप की वृद्धि होती है तभी हरि में भक्ति उत्पन्न होती है; और जो तप भक्ति के बिना किया जाए, वह तप की हानि ही है।
श्लोक 14 (skanda.6.257.14)
तावत्तपांसि गर्जंति देहेऽस्मिन्सततं नृणाम् । यदा विष्णुं स्मरेन्नित्यं जिह्वाग्रं पावनं भवेत्
tāvattapāṁsi garjaṁti dehe'sminsatataṁ nṛṇām yadā viṣṇuṁ smarennityaṁ jihvāgraṁ pāvanaṁ bhavet
मनुष्यों के इस शरीर में तप तभी तक निरंतर उथल-पुथल मचाते रहते हैं, जब तक कि वे नित्य विष्णु का स्मरण नहीं करते; स्मरण करते ही उनकी जिह्वा का अग्रभाग पवित्र हो जाता है।
श्लोक 15 (skanda.6.257.15)
यथा प्रदीपे ज्वलिते प्रणश्यति महत्तमः । तथा हरेः कथायां च याति पापमनेकधा
yathā pradīpe jvalite praṇaśyati mahattamaḥ tathā hareḥ kathāyāṁ ca yāti pāpamanekadhā
जिस प्रकार दीपक जलते ही घोर अंधकार नष्ट हो जाता है, उसी प्रकार हरि की कथा से पाप अनेक प्रकार से नष्ट हो जाता है।
श्लोक 16 (skanda.6.257.16)
तस्मात्पार्वति यत्नेन हरौ सुप्ते तपः कुरु । चातुर्मास्येऽथ संप्राप्ते प्रणवेन समन्वितम्
tasmātpārvati yatnena harau supte tapaḥ kuru cāturmāsye'tha saṁprāpte praṇavena samanvitam
इसलिए, हे पार्वती! हरि के शयन करने पर यत्नपूर्वक तप करो, और चातुर्मास्य के आ जाने पर प्रणव-सहित उस तप को करो।
श्लोक 17 (skanda.6.257.17)
विशुद्धहृदया भूत्वा मन्त्रराजमिमं जप । स एव भगवांस्तुष्टो द्वादशाक्षरसंयुतम्
viśuddhahṛdayā bhūtvā mantrarājamimaṁ japa sa eva bhagavāṁstuṣṭo dvādaśākṣarasaṁyutam
विशुद्ध हृदय होकर द्वादशाक्षर से युक्त इस मन्त्रराज का जप करो; वही भगवान प्रसन्न होकर —
श्लोक 18 (skanda.6.257.18)
प्रदास्यति परं ज्ञानं ब्रह्मरूपमखण्डितम् । ब्रह्मकल्पांतकोटीषु जप त्वं द्वादशाक्षरम्
pradāsyati paraṁ jñānaṁ brahmarūpamakhaṇḍitam brahmakalpāṁtakoṭīṣu japa tvaṁ dvādaśākṣaram
तुम्हें परम ज्ञान प्रदान करेगा, जो अखण्डित ब्रह्मरूप है; अतः करोड़ों ब्रह्म-कल्पों के अंत तक तुम इस द्वादशाक्षर का जप करती रहो।
श्लोक 19 (skanda.6.257.19)
मन्त्रराजं सप्रणवं ध्यायेत्सोऽपि न पश्यति । इत्युक्ता सा तपोनिष्ठा तपश्चरितुमागता
mantrarājaṁ sapraṇavaṁ dhyāyetso'pi na paśyati ityuktā sā taponiṣṭhā tapaścaritumāgatā
इस प्रणव-सहित मन्त्रराज का ध्यान करना चाहिए, जिसे साधारणतः देख पाना भी कठिन है — यह सुनकर तपोनिष्ठ पार्वती तप के आचरण के लिए चल पड़ीं।
श्लोक 20 (skanda.6.257.20)
हिमाचलस्य शिखरे चातुर्मास्ये समागते । ब्रह्मचर्यव्रतपरा वसनत्रयसंयुता
himācalasya śikhare cāturmāsye samāgate brahmacaryavrataparā vasanatrayasaṁyutā
हिमाचल के शिखर पर, चातुर्मास्य के आ जाने पर, ब्रह्मचर्य व्रत में तत्पर होकर, तीन वस्त्रों से युक्त होकर —
श्लोक 21 (skanda.6.257.21)
प्रातर्मध्येऽपराह्ने च ध्यायन्ती हरिशंकरम् । वपुर्यथा पुरा कृष्टं पूजने शंकरस्य च
prātarmadhye'parāhne ca dhyāyantī hariśaṁkaram vapuryathā purā kṛṣṭaṁ pūjane śaṁkarasya ca
प्रातःकाल, मध्याह्न और अपराह्न में हरि-शंकर का ध्यान करती हुईं, तथा पूर्व की भाँति शंकर की पूजा में क्षीण-काय होकर —
श्लोक 22 (skanda.6.257.22)
सखीजन समायुक्ता पितुः शृंगे मनोहरे । अतपत्सा विशालाक्षी क्षमादिगुणसंयुता
sakhījana samāyuktā pituḥ śṛṁge manohare atapatsā viśālākṣī kṣamādiguṇasaṁyutā
अपनी सखियों सहित, पिता के उस मनोहर शिखर पर, क्षमा आदि गुणों से युक्त उन विशाल-नेत्रा पार्वती ने तप किया।
श्लोक 23 (skanda.6.257.23)
गालव उवाच । या हि योगीश्वरध्येया या वन्द्या विश्ववन्दिता । जननी या च विश्वस्य साऽपि कामात्तपोगता
gālava uvāca yā hi yogīśvaradhyeyā yā vandyā viśvavanditā jananī yā ca viśvasya sā'pi kāmāttapogatā
गालव ने कहा — जो योगीश्वरों द्वारा ध्यान किए जाने योग्य हैं, जो वन्दनीय और सारे विश्व द्वारा वन्दित हैं, जो स्वयं विश्व की जननी हैं — वे भी कामनावश तप के लिए गईं।
श्लोक 24 (skanda.6.257.24)
या हि प्रकृतिसद्रूपा तडित्कोटिसमप्रभा । विरजा या स्वयं वन्द्या गुणातीताचरत्तपः
yā hi prakṛtisadrūpā taḍitkoṭisamaprabhā virajā yā svayaṁ vandyā guṇātītācarattapaḥ
जो प्रकृति का सत्-स्वरूप हैं, करोड़ों बिजलियों के समान प्रभावाली हैं, निर्मल और स्वयं वन्दनीय तथा गुणों से अतीत हैं — उन्होंने ही तप का आचरण किया।
श्लोक 25 (skanda.6.257.25)
पृथ्व्यंबु तेजो वायुश्च गगनं यन्मयं विदुः । मूलप्रकृतिरूपा या सा चकारोत्तम तपः
pṛthvyaṁbu tejo vāyuśca gaganaṁ yanmayaṁ viduḥ mūlaprakṛtirūpā yā sā cakārottama tapaḥ
पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश — जिनसे बने हुए जाने जाते हैं, वह मूलप्रकृति-स्वरूपा देवी ही उत्तम तप करने वाली हुईं।
श्लोक 26 (skanda.6.257.26)
या स्थावरं जंगममाशु विश्वं व्याप्य स्थिता या प्रकृतेः पुरापि । स्पृहादिरूपेण च तृप्तिदात्री देवे प्रसुप्ते तपसाऽऽप शुद्धिम्
yā sthāvaraṁ jaṁgamamāśu viśvaṁ vyāpya sthitā yā prakṛteḥ purāpi spṛhādirūpeṇa ca tṛptidātrī deve prasupte tapasā''pa śuddhim
जो चराचर विश्व को शीघ्र व्याप्त करके स्थित हैं, जो प्रकृति से भी पूर्व विद्यमान हैं, जो इच्छा आदि रूपों से तृप्ति प्रदान करने वाली हैं — वे ही, भगवान विष्णु के शयनकाल में, तप के द्वारा शुद्धि को प्राप्त हुईं।