नागर खण्ड · अध्याय 258
हरशाप — दारुवन के ऋषियों द्वारा शिवलिंग-पतन का वर्णन
श्लोक 1 (skanda.6.258.1)
गालव उवाच । प्रवृत्तायां शैलपुत्र्यां महत्तपसि दारुणे । कन्दर्पेण पराभूतो विचचार महीं हरः
gālava uvāca pravṛttāyāṁ śailaputryāṁ mahattapasi dāruṇe kandarpeṇa parābhūto vicacāra mahīṁ haraḥ
गालव ने कहा — पर्वतपुत्री (पार्वती) के भीषण महातप में प्रवृत्त हो जाने पर, कामदेव से पराभूत होकर हर पृथ्वी पर विचरण करने लगे।
श्लोक 2 (skanda.6.258.2)
वृक्षच्छायासु तीर्थेषु नदीषु च नदेषु च । जलेन सिंचत्स्ववपुः सर्वत्रापि महेश्वरः
vṛkṣacchāyāsu tīrtheṣu nadīṣu ca nadeṣu ca jalena siṁcatsvavapuḥ sarvatrāpi maheśvaraḥ
वृक्षों की छाया में, तीर्थों में, नदियों और नदों में — महेश्वर सर्वत्र अपने शरीर को जल से सींचते रहे।
श्लोक 3 (skanda.6.258.3)
तथापि कामाकुलितो न लेभे शर्म कर्हिचित् । एकदा यमुनां दृष्ट्वा जलकल्लोलमालिनीम्
tathāpi kāmākulito na lebhe śarma karhicit ekadā yamunāṁ dṛṣṭvā jalakallolamālinīm
तथापि काम से व्याकुल होकर उन्हें कहीं भी शांति न मिली; एक दिन जल की तरंगों से सुशोभित यमुना को देखकर,
श्लोक 4 (skanda.6.258.4)
विगाहितुं मनश्चक्रे तापार्तिं शमयन्निव । कृष्णं बभूव तन्नीरं हरकायाग्निवह्निना
vigāhituṁ manaścakre tāpārtiṁ śamayanniva kṛṣṇaṁ babhūva tannīraṁ harakāyāgnivahninā
मानो अपने संतापपीड़ा को शांत करने के लिए उसमें डूबने का उन्होंने मन बनाया; हर के शरीर की अग्नि से वह जल काला पड़ गया।
श्लोक 5 (skanda.6.258.5)
दग्धं विगाहनेनाशु मषीप्रायं तदा बभौ । साऽपि दिव्यवपुः पूर्वं श्यामा भूत्वा हराद्यतः
dagdhaṁ vigāhanenāśu maṣīprāyaṁ tadā babhau sā'pi divyavapuḥ pūrvaṁ śyāmā bhūtvā harādyataḥ
उनके तुरंत उसमें उतरने से वह जल दग्ध होकर मानो कालिख के समान दिखाई देने लगा; पहले जिसका दिव्य रूप था, वह भी हर के कारण श्यामवर्णा हो गई।
श्लोक 6 (skanda.6.258.6)
स्तुत्वा नत्वा महेशानमुवाच पुनरेव सा । प्रसादं कुरु देवेश वशगास्मि सदा तव
stutvā natvā maheśānamuvāca punareva sā prasādaṁ kuru deveśa vaśagāsmi sadā tava
महेश की स्तुति और वन्दना करके वह पुनः बोली — हे देवेश! प्रसन्न हों, मैं सदा आपके ही अधीन हूँ।
श्लोक 7 (skanda.6.258.7)
ईश्वर उवाच । अस्मिंस्तीर्थवरेपुण्ये यः स्नास्यति नरो भुवि । तस्य पापसहस्राणि यास्यंति विलयं ध्रुवम्
īśvara uvāca asmiṁstīrthavarepuṇye yaḥ snāsyati naro bhuvi tasya pāpasahasrāṇi yāsyaṁti vilayaṁ dhruvam
ईश्वर ने कहा — पृथ्वी पर जो मनुष्य इस श्रेष्ठ पुण्य तीर्थ में स्नान करेगा, उसके सहस्रों पाप निश्चित ही नष्ट हो जाएँगे।
श्लोक 8 (skanda.6.258.8)
हरतीर्थमिति ख्यातं पुण्यं लोके भविष्यति । इत्युक्त्वा तां प्रणम्याथ तत्रैवांतरधीयत
haratīrthamiti khyātaṁ puṇyaṁ loke bhaviṣyati ityuktvā tāṁ praṇamyātha tatraivāṁtaradhīyata
यह लोक में 'हरतीर्थ' नाम से प्रसिद्ध पुण्य-तीर्थ होगा — ऐसा कहकर उसे प्रणाम करके वे वहीं अंतर्धान हो गए।
श्लोक 9 (skanda.6.258.9)
तस्यास्तीरे महेशोऽपि कृत्वा रूपं मनोहरम् । कामालयं वाद्यहस्तं कृतपुंड्रं जटाधरम्
tasyāstīre maheśo'pi kṛtvā rūpaṁ manoharam kāmālayaṁ vādyahastaṁ kṛtapuṁḍraṁ jaṭādharam
उसी के तट पर महेश ने भी एक मनोहर रूप धारण किया — काम का आगार, हाथ में वाद्य लिए, पुंड्र-चिह्न धारण किए हुए, जटाधारी।
श्लोक 10 (skanda.6.258.10)
स्वेच्छया मुनिगेहेषु दर्शयत्यंगचापलम् । क्वचिद्गायति गीतानि क्वचिन्नृत्यति छन्दतः
svecchayā munigeheṣu darśayatyaṁgacāpalam kvacidgāyati gītāni kvacinnṛtyati chandataḥ
अपनी इच्छानुसार मुनियों के घरों में अपने अंगों की चंचलता दिखलाने लगे; कहीं गीत गाते, कहीं मनमाने ढंग से नृत्य करते।
श्लोक 11 (skanda.6.258.11)
स च क्रुद्ध्यति हसति स्त्रीणां मध्यगतः क्वचित् । एवं विचरतस्तस्य ऋषिपत्न्यः समंततः
sa ca kruddhyati hasati strīṇāṁ madhyagataḥ kvacit evaṁ vicaratastasya ṛṣipatnyaḥ samaṁtataḥ
कहीं वे क्रोध करते, कहीं हँसते, कहीं स्त्रियों के बीच में जा बैठते; इस प्रकार विचरण करते हुए उनके प्रति, चारों ओर से ऋषिपत्नियाँ —
श्लोक 12 (skanda.6.258.12)
पत्युः शुश्रूषणं गेहे त्यक्त्वा कार्याण्यपि क्षणात् । तमेव मनसा चक्रुः पतिरूपेण मोहिताः
patyuḥ śuśrūṣaṇaṁ gehe tyaktvā kāryāṇyapi kṣaṇāt tameva manasā cakruḥ patirūpeṇa mohitāḥ
पति की सेवा और घर के कार्यों को क्षणभर में छोड़कर, मोहित होकर उसी को अपने पति के रूप में मन से मानने लगीं।
श्लोक 13 (skanda.6.258.13)
भ्रमंत्यश्चैव हास्यानि चक्रुस्ता अपि योषितः । ततस्तु मुनयो दृष्ट्वा तासां दुःशीलभावनाम्
bhramaṁtyaścaiva hāsyāni cakrustā api yoṣitaḥ tatastu munayo dṛṣṭvā tāsāṁ duḥśīlabhāvanām
वे स्त्रियाँ इधर-उधर घूमती हुई हँसी-ठिठोली भी करने लगीं; तब मुनियों ने उनकी उस दुराचार-भावना को देखकर,
श्लोक 14 (skanda.6.258.14)
चुक्रुधुर्मुनयः सर्वे रूपं तस्य मनोहरम् । गृह्यतां हन्यतामेष कोऽयं दुष्ट उपागतः
cukrudhurmunayaḥ sarve rūpaṁ tasya manoharam gṛhyatāṁ hanyatāmeṣa ko'yaṁ duṣṭa upāgataḥ
उस मनोहर रूप पर सभी मुनि अत्यंत क्रुद्ध हो उठे — यह कौन दुष्ट यहाँ आया है, इसे पकड़ो, इसे मार डालो!
श्लोक 15 (skanda.6.258.15)
इति ते गृह्य काष्ठानि यदोपस्थे ययुस्तदा । पलायितः स बहुधा भयात्तेषां महात्मनाम्
iti te gṛhya kāṣṭhāni yadopasthe yayustadā palāyitaḥ sa bahudhā bhayātteṣāṁ mahātmanām
ऐसा कहकर वे लाठियाँ लेकर जब उसके निकट पहुँचे, तब वे उन महात्माओं के भय से इधर-उधर भाग निकले।
श्लोक 16 (skanda.6.258.16)
यो जीवकलया विश्वं व्याप्य तिष्ठति देहिनाम् । न ज्ञायते न च ग्राह्यो न भेद्यश्चापि जायते
yo jīvakalayā viśvaṁ vyāpya tiṣṭhati dehinām na jñāyate na ca grāhyo na bhedyaścāpi jāyate
जो अपनी जीव-कला से देहधारियों के इस समस्त विश्व को व्याप्त करके स्थित हैं, वे न जाने जा सकते हैं, न पकड़े जा सकते हैं, और न ही कभी भेदे जा सकते हैं।
श्लोक 17 (skanda.6.258.17)
न शेकुस्ते यदा सर्वे ग्रहीतुं तं महेश्वरम् । तदा शिवं प्रकुपिता शेपुरित्थं द्विजातयः
na śekuste yadā sarve grahītuṁ taṁ maheśvaram tadā śivaṁ prakupitā śepuritthaṁ dvijātayaḥ
जब वे सब उस महेश्वर को पकड़ने में समर्थ न हो सके, तब क्रुद्ध हुए द्विजों ने शिव को इस प्रकार शाप दिया —
श्लोक 18 (skanda.6.258.18)
यस्माल्लिंगार्थमागत्य ह्याश्रमांश्चोरवत्कृतम् । परदारापहरणं तल्लिङ्गं पततां भुवि
yasmālliṁgārthamāgatya hyāśramāṁścoravatkṛtam paradārāpaharaṇaṁ talliṅgaṁ patatāṁ bhuvi
चूँकि लिंग की प्रेरणा से आकर तुमने चोर के समान इन आश्रमों में परस्त्री-हरण किया है, इसलिए तुम्हारा वह लिंग ही पृथ्वी पर गिर पड़े।
श्लोक 19 (skanda.6.258.19)
सद्य एव हि शापं त्वं दुष्टं प्राप्नुहि तापस । एवमुक्ते स शापाग्निर्वज्ररूपधरो महान्
sadya eva hi śāpaṁ tvaṁ duṣṭaṁ prāpnuhi tāpasa evamukte sa śāpāgnirvajrarūpadharo mahān
हे दुष्ट तापस! तू अभी ही इस शाप को प्राप्त कर — ऐसा कहते ही वह विशाल शाप-अग्नि वज्र का रूप धारण कर उठी,
श्लोक 20 (skanda.6.258.20)
तल्लिगं धूर्जटेश्छित्त्वा पातयामास भूतले । रुधिरौघपरिव्याप्तो मुमोह भगवान्विभुः
talligaṁ dhūrjaṭeśchittvā pātayāmāsa bhūtale rudhiraughaparivyāpto mumoha bhagavānvibhuḥ
धूर्जटि के उस लिंग को काटकर पृथ्वी पर गिरा दिया; रक्त के प्रवाह से आप्लावित होकर भगवान विभु मूर्च्छित हो गए।
श्लोक 21 (skanda.6.258.21)
वेदनार्त्तोज्ज्वलवपुर्महाशापाभिभूतधीः । तं तथा पतितं दृष्ट्वा त आजग्मुर्महर्षयः
vedanārttojjvalavapurmahāśāpābhibhūtadhīḥ taṁ tathā patitaṁ dṛṣṭvā ta ājagmurmaharṣayaḥ
वेदना से पीड़ित उनका तेजस्वी शरीर उस महाशाप से अभिभूत हो गया; उन्हें उस प्रकार गिरा हुआ देखकर वे महर्षिगण वहाँ आए।
श्लोक 22 (skanda.6.258.22)
आकाशे सर्वभूतानि त्रेसुर्विश्वं चचाल ह । देवाश्च व्याकुला जाता महाभयमुपागताः
ākāśe sarvabhūtāni tresurviśvaṁ cacāla ha devāśca vyākulā jātā mahābhayamupāgatāḥ
आकाश में समस्त प्राणी थर्रा उठे और विश्व कांप उठा; देवगण भी व्याकुल होकर महाभय से आक्रांत हो गए।
श्लोक 23 (skanda.6.258.23)
ज्ञात्वा विप्रा महेशानं पीडिता हृदयेऽभवन् । शुशुचुर्भृशदुःखार्ता दैवं हि बलवत्तरम्
jñātvā viprā maheśānaṁ pīḍitā hṛdaye'bhavan śuśucurbhṛśaduḥkhārtā daivaṁ hi balavattaram
उसे महेश जानकर विप्रगण हृदय से पीड़ित हो उठे, और अत्यंत दुःख से व्याकुल होकर शोक करने लगे कि दैव ही सबसे बलवान है।
श्लोक 24 (skanda.6.258.24)
किं कृतं भगवानेष देवैरपि स सेव्यते । साक्षी सर्वस्य जगतोऽस्माभिर्नैवोपलक्षितः
kiṁ kṛtaṁ bhagavāneṣa devairapi sa sevyate sākṣī sarvasya jagato'smābhirnaivopalakṣitaḥ
हमने यह क्या कर डाला! ये तो भगवान हैं, देवगण भी जिनकी सेवा करते हैं, समस्त जगत के साक्षी हैं — पर हमने उन्हें पहचाना ही नहीं।
श्लोक 25 (skanda.6.258.25)
वयं मूढधियः पापाः परमज्ञानदुर्बलाः । कथमस्माभिर्यस्यात्मा श्रुतश्च न निवेदितः
vayaṁ mūḍhadhiyaḥ pāpāḥ paramajñānadurbalāḥ kathamasmābhiryasyātmā śrutaśca na niveditaḥ
हम मूढ़बुद्धि, पापी तथा घोर अज्ञान से दुर्बल हैं; जिनके विषय में सुना ही था, उस आत्मा को हम कैसे न पहचान सके।
श्लोक 26 (skanda.6.258.26)
मयेदृशो गृहस्थाय ह्यात्माऽयं न निवेदितः । निर्विकारो निर्विषयो निरीहो निरुपद्रवः
mayedṛśo gṛhasthāya hyātmā'yaṁ na niveditaḥ nirvikāro nirviṣayo nirīho nirupadravaḥ
मुझ गृहस्थ के द्वारा ऐसा वह आत्मा नहीं पहचाना जा सका — जो निर्विकार, निर्विषय, निरीह और निरुपद्रव हैं।
श्लोक 27 (skanda.6.258.27)
निर्ममो निरहंकारो यः शंभुर्नोपलक्षितः । यस्य लोका इमे सर्वे देहे तिष्ठंति मध्यगाः
nirmamo nirahaṁkāro yaḥ śaṁbhurnopalakṣitaḥ yasya lokā ime sarve dehe tiṣṭhaṁti madhyagāḥ
ममता और अहंकार से रहित वे शंभु हमारे द्वारा पहचाने न जा सके, जिनके शरीर के भीतर ये समस्त लोक स्थित हैं।
श्लोक 28 (skanda.6.258.28)
स एष जगतां स्वामी हरोऽस्माभिर्न वीक्षितः । इत्युक्त्वा ते ह्युपविष्टा यावत्तत्र समागताः
sa eṣa jagatāṁ svāmī haro'smābhirna vīkṣitaḥ ityuktvā te hyupaviṣṭā yāvattatra samāgatāḥ
वे ही जगत के स्वामी हर हैं, जिन्हें हमने पहचाना नहीं — ऐसा कहकर वे सब वहीं बैठ गए, जब तक कि वहाँ (शिव) पुनः आ न गए।
श्लोक 29 (skanda.6.258.29)
तान्दृष्ट्वा सहसा त्रस्तः पुनरेव महेश्वरः । विप्रशापभयान्नष्टस्त्रिपुरारिर्दिवं ययौ
tāndṛṣṭvā sahasā trastaḥ punareva maheśvaraḥ vipraśāpabhayānnaṣṭastripurārirdivaṁ yayau
उन्हें देखकर महेश्वर पुनः सहसा भयभीत हो उठे, और विप्रों के शाप के भय से त्रिपुरारि छिपकर स्वर्ग को चले गए।
श्लोक 30 (skanda.6.258.30)
सुरभिं गां च गोलोके तां तुष्टाव सुसंयतः । सृष्टिस्थिति विनाशानां कर्त्र्यै मात्रे नमोनमः
surabhiṁ gāṁ ca goloke tāṁ tuṣṭāva susaṁyataḥ sṛṣṭisthiti vināśānāṁ kartryai mātre namonamaḥ
वहाँ गोलोक में संयत होकर उन्होंने सुरभि गौ की स्तुति की — सृष्टि, स्थिति और संहार करने वाली माता को बारंबार नमस्कार है।
श्लोक 31 (skanda.6.258.31)
या त्वं रसमयैर्भावैराप्यायसि भूतलम् । देवानां च तथासंघान्पितॄणामपि वै गणान्
yā tvaṁ rasamayairbhāvairāpyāyasi bhūtalam devānāṁ ca tathāsaṁghānpitṝṇāmapi vai gaṇān
जो तुम रसमय भावों के द्वारा पृथ्वीतल को, तथा देवगणों और पितृगणों को भी तृप्त करती हो —
श्लोक 32 (skanda.6.258.32)
सर्वैर्ज्ञाता रसाभिज्ञैर्मधुरास्वाददायिनी । त्वया विश्वमिदं सर्वं बलस्नेहसमन्वितम्
sarvairjñātā rasābhijñairmadhurāsvādadāyinī tvayā viśvamidaṁ sarvaṁ balasnehasamanvitam
रस के ज्ञाताओं द्वारा जानी जाने वाली, मधुर स्वाद प्रदान करने वाली — तुम्हारे ही द्वारा यह संपूर्ण विश्व बल और स्नेह से युक्त है।
श्लोक 33 (skanda.6.258.33)
त्वं माता सर्वरुद्राणां वसूनां दुहिता तथा । आदित्यानां स्वसा चैव तुष्टा वांच्छितसिद्धिदा
tvaṁ mātā sarvarudrāṇāṁ vasūnāṁ duhitā tathā ādityānāṁ svasā caiva tuṣṭā vāṁcchitasiddhidā
तुम समस्त रुद्रों की माता हो, तथा वसुओं की पुत्री हो; आदित्यों की भगिनी भी हो, और प्रसन्न होने पर वांछित सिद्धि प्रदान करने वाली हो।
श्लोक 34 (skanda.6.258.34)
त्वं धृतिस्त्वं तथा पुष्टिस्त्वं स्वाहा त्वं स्वधा तथा । ऋद्धिः सिद्धिस्तथा लक्ष्मीर्धृतिः कीर्तिस्तथा मतिः
tvaṁ dhṛtistvaṁ tathā puṣṭistvaṁ svāhā tvaṁ svadhā tathā ṛddhiḥ siddhistathā lakṣmīrdhṛtiḥ kīrtistathā matiḥ
तुम धृति हो, तथा पुष्टि हो; तुम स्वाहा हो, तथा स्वधा हो; तुम ऋद्धि, सिद्धि, लक्ष्मी, धृति, कीर्ति और मति — सब कुछ हो।
श्लोक 35 (skanda.6.258.35)
कांतिर्लज्जा महामाया श्रद्धा सर्वार्थसाधिनी । त्वया विरहितं किंचिन्नास्ति त्रिभुवनेष्वपि
kāṁtirlajjā mahāmāyā śraddhā sarvārthasādhinī tvayā virahitaṁ kiṁcinnāsti tribhuvaneṣvapi
तुम कांति, लज्जा, महामाया और सर्वार्थ की सिद्धि करने वाली श्रद्धा हो; तीनों लोकों में भी तुमसे रहित कुछ भी नहीं है।
श्लोक 36 (skanda.6.258.36)
वह्नेस्तृप्तिप्रदात्री च देवादीनां च तृप्तिदा । त्वया सर्वमिदं व्याप्तं जगत्स्थावरजंगमम्
vahnestṛptipradātrī ca devādīnāṁ ca tṛptidā tvayā sarvamidaṁ vyāptaṁ jagatsthāvarajaṁgamam
तुम अग्नि को भी तृप्ति देने वाली हो, और देवादिकों को भी तृप्ति देने वाली हो; तुम्हारे ही द्वारा यह संपूर्ण चराचर जगत व्याप्त है।
श्लोक 37 (skanda.6.258.37)
पादास्ते वेदाश्चत्वारः समुद्राः स्तनतां ययुः । चंद्रार्कौ लोचने यस्या रोमाग्रेषु च देवताः
pādāste vedāścatvāraḥ samudrāḥ stanatāṁ yayuḥ caṁdrārkau locane yasyā romāgreṣu ca devatāḥ
तुम्हारे पैर चारों वेद हैं, समुद्र तुम्हारे स्तनरूप में परिणत हुए हैं; चंद्रमा और सूर्य तुम्हारे नेत्र हैं, और तुम्हारे रोमों के अग्रभाग में देवता निवास करते हैं।
श्लोक 38 (skanda.6.258.38)
शृङ्गयोः पर्वताः सर्वे कर्णयोर्वायवस्तथा । नाभौ चैवामृतं देवि पातालानि खुरास्तथा
śṛṅgayoḥ parvatāḥ sarve karṇayorvāyavastathā nābhau caivāmṛtaṁ devi pātālāni khurāstathā
तुम्हारे सींगों में समस्त पर्वत हैं, कानों में वायुगण हैं; हे देवि! तुम्हारी नाभि में अमृत है, और खुरों में पाताल-लोक हैं।
श्लोक 39 (skanda.6.258.39)
स्कन्धे च भगवान्ब्रह्मा मस्तकस्थः सदाशिवः । हृद्देशे च स्थितो विष्णुः पुच्छाग्रे पन्नगास्तथा
skandhe ca bhagavānbrahmā mastakasthaḥ sadāśivaḥ hṛddeśe ca sthito viṣṇuḥ pucchāgre pannagāstathā
तुम्हारे कंधे पर भगवान ब्रह्मा हैं, मस्तक पर सदाशिव विराजमान हैं; हृदय-प्रदेश में विष्णु स्थित हैं, तथा पूँछ के अग्रभाग में सर्पगण हैं।
श्लोक 40 (skanda.6.258.40)
शकृत्स्था वसवः सर्वे साध्या मूत्रस्थितास्तव । सर्वे यज्ञा ह्यस्थिदेशे किन्नरा गुह्यसंस्थिताः
śakṛtsthā vasavaḥ sarve sādhyā mūtrasthitāstava sarve yajñā hyasthideśe kinnarā guhyasaṁsthitāḥ
तुम्हारे गोबर में समस्त वसुगण स्थित हैं, मूत्र में साध्यगण; समस्त यज्ञ हड्डियों के प्रदेश में हैं, और गुह्य अंगों में किन्नरगण स्थित हैं।
श्लोक 41 (skanda.6.258.41)
पितॄणां च गणाः सर्वे पुरःस्था भांति सर्वदा । सर्वे यक्षा भालदेशे किन्नराश्च कपोलयोः
pitṝṇāṁ ca gaṇāḥ sarve puraḥsthā bhāṁti sarvadā sarve yakṣā bhāladeśe kinnarāśca kapolayoḥ
पितरों के समस्त गण सदा तुम्हारे सम्मुख शोभित रहते हैं; समस्त यक्षगण भाल-प्रदेश में हैं, और किन्नरगण कपोलों में स्थित हैं।
श्लोक 42 (skanda.6.258.42)
सर्वदेवमयी त्वं हि सर्वभूतविवृद्धिदा । सर्वलोकहिता नित्यं मम देहहिता भव
sarvadevamayī tvaṁ hi sarvabhūtavivṛddhidā sarvalokahitā nityaṁ mama dehahitā bhava
तुम समस्त देवमयी हो, समस्त प्राणियों की वृद्धि करने वाली हो, नित्य समस्त लोकों की हितकारी हो — मेरे शरीर की भी हितकारी बनो।
श्लोक 43 (skanda.6.258.43)
प्रणतस्तव देवेशि पूजये त्वां सदाऽनघे । स्तौमि विश्वार्तिहन्त्रीं त्वां प्रसन्ना वरदा भव
praṇatastava deveśi pūjaye tvāṁ sadā'naghe staumi viśvārtihantrīṁ tvāṁ prasannā varadā bhava
हे देवेशि! हे निष्पाप! तुम्हें प्रणाम कर मैं सदा तुम्हारी पूजा करता हूँ; विश्व की पीड़ा हरने वाली तुम्हारी मैं स्तुति करता हूँ — प्रसन्न होकर वरदान दो।
श्लोक 44 (skanda.6.258.44)
विप्रशापाग्निना दग्धं शरीरं मम शोभने । स्वतेजसा पुनः कर्त्तुमर्हस्यमृतसंभवे
vipraśāpāgninā dagdhaṁ śarīraṁ mama śobhane svatejasā punaḥ karttumarhasyamṛtasaṁbhave
हे शोभने! विप्रों के शाप की अग्नि से मेरा शरीर दग्ध हो गया है; हे अमृत की उत्पत्ति-स्थान! तुम अपने तेज से उसे पुनः बना सकती हो।
श्लोक 45 (skanda.6.258.45)
इत्युक्त्वा ता परिक्रम्य तस्या देहे लयं गतः । साऽपि गर्भे दधाराथ सुरभिस्तदनन्तरम्
ityuktvā tā parikramya tasyā dehe layaṁ gataḥ sā'pi garbhe dadhārātha surabhistadanantaram
ऐसा कहकर उसकी परिक्रमा करके वे उसके शरीर में लीन हो गए; और तत्पश्चात् सुरभि ने उसे अपने गर्भ में धारण किया।
श्लोक 46 (skanda.6.258.46)
कालातिक्रमयोगेन सर्वव्याकुलतां ययौ । यस्मिन्प्रनष्टे देवेशे विप्रशापभयावृते
kālātikramayogena sarvavyākulatāṁ yayau yasminpranaṣṭe deveśe vipraśāpabhayāvṛte
समय के बीत जाने पर सर्वत्र व्याकुलता छा गई, क्योंकि विप्रों के शाप-भय से आवृत होकर देवेश अंतर्धान हो गए थे।
श्लोक 47 (skanda.6.258.47)
देवा महार्तिं प्रययुश्चचाल पृथिवी तथा । चंद्रार्कौ निष्प्रभौ चैव वायुरुच्चण्ड एव च
devā mahārtiṁ prayayuścacāla pṛthivī tathā caṁdrārkau niṣprabhau caiva vāyuruccaṇḍa eva ca
देवगण महाकष्ट को प्राप्त हुए, तथा पृथ्वी भी कांप उठी; चंद्रमा और सूर्य निस्तेज हो गए, और वायु अत्यंत प्रचंड बह चली।
श्लोक 48 (skanda.6.258.48)
समुद्राः क्षोभमगमंस्तस्मिन्काले द्विजोत्तम
samudrāḥ kṣobhamagamaṁstasminkāle dvijottama
हे द्विजोत्तम! उस समय समुद्र भी क्षुब्ध हो उठे।
श्लोक 49 (skanda.6.258.49)
यस्मिञ्जगत्स्थावरजंगमादिकं काले लयं प्राप्य पुनः प्ररोहति । तस्मिन्प्रनष्टे द्विजशापपीडिते जगद्धतप्रायमवर्तत क्षणात्
yasmiñjagatsthāvarajaṁgamādikaṁ kāle layaṁ prāpya punaḥ prarohati tasminpranaṣṭe dvijaśāpapīḍite jagaddhataprāyamavartata kṣaṇāt
जिसमें यह चराचर जगत काल आने पर लय को प्राप्त होकर पुनः अंकुरित होता है, वे ही जब द्विजों के शाप से पीड़ित होकर अंतर्धान हो गए, तब क्षणभर में जगत मानो नष्टप्राय हो गया।