नागर खण्ड · अध्याय 259
अमरकण्टक में लिंग-स्थापन तथा नील वृषभ की स्तुति
श्लोक 1 (skanda.6.259.1)
गालव उवाच । तस्मिंस्तु पतिते लिंगे योजनायामविस्तृते । विषादार्त्ता ऋषिगणास्तत्राजग्मुः सहस्रशः
gālava uvāca tasmiṁstu patite liṁge yojanāyāmavistṛte viṣādārttā ṛṣigaṇāstatrājagmuḥ sahasraśaḥ
गालव ने कहा — जब वह लिंग एक योजन तक फैला हुआ गिरा, तब विषाद से पीड़ित ऋषिगण वहाँ सहस्रों की संख्या में आए।
श्लोक 2 (skanda.6.259.2)
व्यलोकयन्त सर्वत्र दृष्ट्वा तत्र महेश्वरम् । नासौ दृष्टिपथे तेषां बभूव भयविह्वलः
vyalokayanta sarvatra dṛṣṭvā tatra maheśvaram nāsau dṛṣṭipathe teṣāṁ babhūva bhayavihvalaḥ
वे सर्वत्र देखने लगे कि कहीं महेश्वर दिखाई दें, किंतु भय से विह्वल वे उनकी दृष्टि के मार्ग में न आए।
श्लोक 3 (skanda.6.259.3)
वीर्यं वर्षसहस्राणि बहून्यपि सुसंचितम् । पृथिवीं सकलां व्याप्य स्थितं ददृशिरे द्विजाः
vīryaṁ varṣasahasrāṇi bahūnyapi susaṁcitam pṛthivīṁ sakalāṁ vyāpya sthitaṁ dadṛśire dvijāḥ
द्विजों ने देखा कि वह वीर्य, अनेक सहस्र वर्षों तक भलीभाँति संचित हो, संपूर्ण पृथ्वी को व्याप्त कर स्थित है।
श्लोक 4 (skanda.6.259.4)
तद्दृष्ट्वा सुमहल्लिंगं रुधिराक्तं जलैः प्लुतम् । ब्राह्मणाः संशयगता दह्यमाना वसुन्धरा
taddṛṣṭvā sumahalliṁgaṁ rudhirāktaṁ jalaiḥ plutam brāhmaṇāḥ saṁśayagatā dahyamānā vasundharā
रक्त से लिप्त और जल से आप्लावित उस विशाल लिंग को देखकर ब्राह्मण संशय में पड़ गए, और पृथ्वी दग्ध होने लगी।
श्लोक 5 (skanda.6.259.5)
तल्लिंगं तत्र संस्थाप्य चक्रुस्तां नर्मदां नदीम् । तज्जलं नर्मदारूपं लिंगं चामरकण्टकम्
talliṁgaṁ tatra saṁsthāpya cakrustāṁ narmadāṁ nadīm tajjalaṁ narmadārūpaṁ liṁgaṁ cāmarakaṇṭakam
उस लिंग को वहीं स्थापित करके उन्होंने उसे नर्मदा नदी बना दिया; वह जल नर्मदा-रूप हुआ, और लिंग अमरकण्टक हुआ।
श्लोक 6 (skanda.6.259.6)
नरकं वारयत्येतत्सेवितं नरकापहम् । भूतग्रहाश्च सर्वेऽपि यास्यंति विलयं ध्रुवम्
narakaṁ vārayatyetatsevitaṁ narakāpaham bhūtagrahāśca sarve'pi yāsyaṁti vilayaṁ dhruvam
नरकनाशक यह तीर्थ, सेवन किए जाने पर, नरक का निवारण करता है; और समस्त भूत-ग्रह भी निश्चित रूप से नष्ट हो जाते हैं।
श्लोक 7 (skanda.6.259.7)
तत्र स्नात्वा जलं पीत्वा संतर्प्य च पितॄंस्तथा । सर्वान्कामानवाप्नोति मनुष्यो भुवि दुर्लभान्
tatra snātvā jalaṁ pītvā saṁtarpya ca pitṝṁstathā sarvānkāmānavāpnoti manuṣyo bhuvi durlabhān
वहाँ स्नान करके, जल पीकर, तथा पितरों को तर्पण करके, मनुष्य पृथ्वी पर दुर्लभ भी सभी कामनाओं को प्राप्त कर लेता है।
श्लोक 8 (skanda.6.259.8)
लिंगानि नार्मदेयानि पूजयिष्यंति ये नराः । तेषां रुद्रमयो देहो भविष्यति न संशयः
liṁgāni nārmadeyāni pūjayiṣyaṁti ye narāḥ teṣāṁ rudramayo deho bhaviṣyati na saṁśayaḥ
जो मनुष्य नर्मदा के लिंगों की पूजा करेंगे, उनका शरीर निःसंदेह रुद्रमय हो जाएगा।
श्लोक 9 (skanda.6.259.9)
चातुर्मास्ये विशेषेण लिंगपूजा महाफला । चातुर्मास्ये रुद्रजपं हरपूजा शिवे रतिः
cāturmāsye viśeṣeṇa liṁgapūjā mahāphalā cāturmāsye rudrajapaṁ harapūjā śive ratiḥ
चातुर्मास्य में विशेष रूप से लिंग-पूजा महाफलदायी है; चातुर्मास्य में रुद्र-जप, हर-पूजा तथा शिव में अनुराग करना चाहिए।
श्लोक 10 (skanda.6.259.10)
पंचामृतेन स्नपनं न तेषांगर्भवेदना । ये करिष्यंति मधुना सेचनं लिंगमस्तके
paṁcāmṛtena snapanaṁ na teṣāṁgarbhavedanā ye kariṣyaṁti madhunā secanaṁ liṁgamastake
जो पंचामृत से स्नपन करते हैं, उन्हें गर्भ की वेदना नहीं होती; जो लिंग के मस्तक पर मधु से सिंचन करते हैं —
श्लोक 11 (skanda.6.259.11)
तेषां दुःखसहस्राणि यास्यंति विलयं ध्रुवम् । दीपदानं कृतं येन चातुर्मास्ये शिवाग्रतः
teṣāṁ duḥkhasahasrāṇi yāsyaṁti vilayaṁ dhruvam dīpadānaṁ kṛtaṁ yena cāturmāsye śivāgrataḥ
— उनके सहस्रों दुःख निश्चय ही नष्ट हो जाते हैं। चातुर्मास्य में शिव के आगे जिसने दीप-दान किया है,
श्लोक 12 (skanda.6.259.12)
कुलकोटिं समुद्धृत्य स्वेच्छया शिवलोकभाक् । चन्दनागुरुधूपैश्च सुश्वेतकुसुमैरपि
kulakoṭiṁ samuddhṛtya svecchayā śivalokabhāk candanāgurudhūpaiśca suśvetakusumairapi
वह अपने करोड़ों कुल-जनों का उद्धार करके स्वेच्छा से शिवलोक का भागी होता है; तथा चंदन, अगुरु, धूप एवं शुभ्र पुष्पों से —
श्लोक 13 (skanda.6.259.13)
नर्मदाजललिंगं ये ह्यर्चयिष्यंति ते शिवाः । शिला हरत्वमापन्नाः प्राणिनामपि का कथा
narmadājalaliṁgaṁ ye hyarcayiṣyaṁti te śivāḥ śilā haratvamāpannāḥ prāṇināmapi kā kathā
जो नर्मदा-जल के लिंग का अर्चन करेंगे, वे स्वयं शिवस्वरूप हो जाते हैं; जब पत्थर तक हर-रूप को प्राप्त हो जाते हैं, तो प्राणियों की तो बात ही क्या!
श्लोक 14 (skanda.6.259.14)
तत्संभूतं महालिंगं जलधारणसंयुतम् । पूजयित्वा विधानेन चातुर्मास्ये शिवो भवेत्
tatsaṁbhūtaṁ mahāliṁgaṁ jaladhāraṇasaṁyutam pūjayitvā vidhānena cāturmāsye śivo bhavet
उससे उत्पन्न, जलधारा से युक्त उस महालिंग की चातुर्मास्य में विधिपूर्वक पूजा करके मनुष्य शिव हो जाता है।
श्लोक 15 (skanda.6.259.15)
चातुर्मास्ये ये मनुजा नर्मदाऽमरकण्टके । तीर्थे स्नास्यंति नियतास्तेषां वासस्त्रिविष्टपे
cāturmāsye ye manujā narmadā'marakaṇṭake tīrthe snāsyaṁti niyatāsteṣāṁ vāsastriviṣṭape
चातुर्मास्य में जो मनुष्य संयमपूर्वक नर्मदा के अमरकण्टक-तीर्थ में स्नान करते हैं, उनका निवास स्वर्गलोक में होता है।
श्लोक 16 (skanda.6.259.16)
ब्रह्मोवाच । इत्युक्त्वा ते द्विजास्तत्र स्थाप्य लिंगं यथाविधि । अमरकण्टकतीर्थे नर्मदां च महानदीम्
brahmovāca ityuktvā te dvijāstatra sthāpya liṁgaṁ yathāvidhi amarakaṇṭakatīrthe narmadāṁ ca mahānadīm
ब्रह्मा ने कहा — ऐसा कहकर उन द्विजों ने वहाँ अमरकण्टक-तीर्थ में विधिपूर्वक लिंग तथा महानदी नर्मदा को स्थापित किया,
श्लोक 17 (skanda.6.259.17)
पुनश्चिन्तापरा जाता विश्वस्य क्षोभकारणे । पद्मासनगता भूत्वा प्राणायामपरायणाः
punaścintāparā jātā viśvasya kṣobhakāraṇe padmāsanagatā bhūtvā prāṇāyāmaparāyaṇāḥ
पुनः विश्व के क्षोभ का कारण जानने के लिए चिंतित हो उठे; पद्मासन में बैठकर प्राणायाम में तत्पर होकर,
श्लोक 18 (skanda.6.259.18)
चिन्तयामासुरव्यग्रं हृदयस्थं महेश्वरम् । ततो देवा महेंद्राद्याः संप्राप्यामरकण्टकम्
cintayāmāsuravyagraṁ hṛdayasthaṁ maheśvaram tato devā maheṁdrādyāḥ saṁprāpyāmarakaṇṭakam
उन्होंने अव्यग्र होकर हृदय में स्थित महेश्वर का ध्यान किया। तब इंद्र आदि देवगण अमरकण्टक में पहुँचकर,
श्लोक 19 (skanda.6.259.19)
ब्राह्मणानां स्तुतिं चक्रुर्विनयानतकन्धराः । नमोऽस्तु वो द्विजातिभ्यो ब्रह्मविद्भ्यो महेश्वराः
brāhmaṇānāṁ stutiṁ cakrurvinayānatakandharāḥ namo'stu vo dvijātibhyo brahmavidbhyo maheśvarāḥ
विनयपूर्वक ग्रीवा झुकाकर ब्राह्मणों की स्तुति करने लगे — हे महेश्वरो! ब्रह्मवेत्ता द्विजातियों को नमस्कार हो,
श्लोक 20 (skanda.6.259.20)
भूसुरेभ्यो गुरुभ्यश्च विमुक्तेभ्यश्च वंधनात् । यूयं गुणत्रयातीता गुणरूपा गुणाकराः
bhūsurebhyo gurubhyaśca vimuktebhyaśca vaṁdhanāt yūyaṁ guṇatrayātītā guṇarūpā guṇākarāḥ
— पृथ्वी के देवताओं, हमारे गुरुओं, तथा बंधन से मुक्त तुम्हें नमस्कार; तुम त्रिगुणों से परे हो, फिर भी गुणरूप और गुणों की खान हो।
श्लोक 21 (skanda.6.259.21)
गुणत्रयमयैर्भावैः सततं प्राणबुद्बुदाः । येषां वाक्यजलेनैव पापिष्ठा अपि शुद्धताम् । प्रयांति पापपुंजाश्च भस्मसाद्यांति पापिनाम्
guṇatrayamayairbhāvaiḥ satataṁ prāṇabudbudāḥ yeṣāṁ vākyajalenaiva pāpiṣṭhā api śuddhatām prayāṁti pāpapuṁjāśca bhasmasādyāṁti pāpinām
त्रिगुणमय भावों से सदा प्राणों के बुद्बुद के समान होते हुए भी, जिनकी वाणी के जल से महापापी भी शुद्धता को प्राप्त हो जाते हैं, और पापियों के पाप-समूह भस्म हो जाते हैं।
श्लोक 22 (skanda.6.259.22)
शस्त्रं लोहमयं येषां वागेव तत्समन्विताः । पापैः पराभिभूतानां तेषां लोकोत्तरं बलम्
śastraṁ lohamayaṁ yeṣāṁ vāgeva tatsamanvitāḥ pāpaiḥ parābhibhūtānāṁ teṣāṁ lokottaraṁ balam
जिनका शस्त्र लोहे का नहीं, अपितु उसी सामर्थ्य से युक्त वाणी ही है; पापों से पराभूत हुए लोगों के लिए उनका वह बल लोकोत्तर है।
श्लोक 23 (skanda.6.259.23)
क्षमया पृथिवीतुल्याः कोपे वैश्वानरप्रभाः । पातनेऽनेकशक्तीनां समर्था यूयमेव हि
kṣamayā pṛthivītulyāḥ kope vaiśvānaraprabhāḥ pātane'nekaśaktīnāṁ samarthā yūyameva hi
क्षमा में तुम पृथ्वी के समान हो, और क्रोध में अग्नि के समान तेजस्वी हो; अनेक शक्तियों को गिराने में तुम ही समर्थ हो।
श्लोक 24 (skanda.6.259.24)
स्वर्गादीनां तथा याने भवन्तो गतयो ध्रुवम्
svargādīnāṁ tathā yāne bhavanto gatayo dhruvam
स्वर्गादि की प्राप्ति के लिए भी तुम ही निश्चित गति हो।
श्लोक 25 (skanda.6.259.25)
सत्कर्मकारकाश्चैव सत्कर्मनिरताः सदा । सत्कर्मफलदातारः सत्कर्मेभ्यो मुमुक्षवः
satkarmakārakāścaiva satkarmaniratāḥ sadā satkarmaphaladātāraḥ satkarmebhyo mumukṣavaḥ
तुम सत्कर्मों के करने वाले हो, और सदा सत्कर्मों में रत रहते हो; सत्कर्मों के फल देने वाले हो, और सत्कर्मों के द्वारा ही मुक्ति चाहते हो।
श्लोक 26 (skanda.6.259.26)
सावित्रीमंत्रनिरता ये भवंतोऽघनाशनाः । आत्मानं यजमानं च तारयंति न संशयः
sāvitrīmaṁtraniratā ye bhavaṁto'ghanāśanāḥ ātmānaṁ yajamānaṁ ca tārayaṁti na saṁśayaḥ
सावित्री-मंत्र में तत्पर रहकर पाप का नाश करने वाले तुम, स्वयं को और यजमान को भी बिना संदेह तार देते हो।
श्लोक 27 (skanda.6.259.27)
वह्नयश्च तथा विप्रास्तर्पिताः कार्यसाधकाः । चातुर्मास्ये विशेषेण तेषां पूजा महाफला
vahnayaśca tathā viprāstarpitāḥ kāryasādhakāḥ cāturmāsye viśeṣeṇa teṣāṁ pūjā mahāphalā
अग्नियाँ और उसी तरह विप्रगण, तृप्त किए जाने पर, कार्य सिद्ध करने वाले होते हैं; चातुर्मास्य में विशेष रूप से उनकी पूजा महाफलदायी है।
श्लोक 28 (skanda.6.259.28)
कोपिताः सर्वदेहस्य नाशनाय भवंति हि । तावन्न वज्रमिंद्रस्य शूलं नैव पिनाकिनः
kopitāḥ sarvadehasya nāśanāya bhavaṁti hi tāvanna vajramiṁdrasya śūlaṁ naiva pinākinaḥ
क्रुद्ध होने पर वे संपूर्ण शरीर के विनाश का कारण बन जाते हैं; उनके समक्ष न इंद्र का वज्र और न पिनाकी (शिव) का शूल ही ठहर पाता है।
श्लोक 29 (skanda.6.259.29)
दण्डो यमस्य तावन्नो यावच्छापो द्विजोद्भवः । अग्निना ज्वाल्यते दृश्यं शापोद्दिष्टानपि स्वयम्
daṇḍo yamasya tāvanno yāvacchāpo dvijodbhavaḥ agninā jvālyate dṛśyaṁ śāpoddiṣṭānapi svayam
— न यम का दंड ही उतना बलवान है, जितना द्विज से उत्पन्न शाप। अग्नि तो जो दिखाई देता है उसी को जलाती है, किंतु शाप स्वयं उस पर लक्षित व्यक्ति को भी भस्म कर देता है।
श्लोक 30 (skanda.6.259.30)
हंति जातानजातांश्च तस्माद्विप्रं न कोपयेत् । विप्रकोपाग्निना दग्धो नरकान्नैव मुच्यते
haṁti jātānajātāṁśca tasmādvipraṁ na kopayet viprakopāgninā dagdho narakānnaiva mucyate
वह जन्मे और अजन्मे दोनों को नष्ट कर देता है, इसलिए विप्र को कभी कुपित न करे; विप्र के क्रोध की अग्नि से दग्ध हुआ मनुष्य नरक से भी मुक्त नहीं होता।
श्लोक 31 (skanda.6.259.31)
शस्त्रक्षतोऽपि नरकान्मुच्यते नात्र संशयः । देवानां मधुधान्यानां सामर्थ्यं भेदनेन हि
śastrakṣato'pi narakānmucyate nātra saṁśayaḥ devānāṁ madhudhānyānāṁ sāmarthyaṁ bhedanena hi
शस्त्र से घायल हुआ मनुष्य भी नरक से मुक्त हो जाता है, इसमें कोई संदेह नहीं; परंतु देवताओं तथा मधु और धान्य का सामर्थ्य भी वाणी के भेदन के आगे फीका पड़ जाता है।
श्लोक 32 (skanda.6.259.32)
वाङ्मात्रेण हि विप्रस्य भिद्यते सकलं जगत् । ते यूयं गुरवोऽस्माकं विश्वकारणकारकाः । प्रसादपरमा नित्यं भवंतु भुवनेश्वराः
vāṅmātreṇa hi viprasya bhidyate sakalaṁ jagat te yūyaṁ guravo'smākaṁ viśvakāraṇakārakāḥ prasādaparamā nityaṁ bhavaṁtu bhuvaneśvarāḥ
विप्र की वाणी मात्र से ही संपूर्ण जगत विदीर्ण हो सकता है। इसलिए तुम ही हमारे गुरु हो, विश्व के कारण के भी कारण हो; हे भुवनेश्वरो! तुम सदा परम प्रसन्न रहो।
श्लोक 33 (skanda.6.259.33)
ईश्वरेण विना सर्वे वयं लोकाश्च दुःखिताः । तत्कथ्यतां स भगवान्कुत्रास्ते परमेश्वरः
īśvareṇa vinā sarve vayaṁ lokāśca duḥkhitāḥ tatkathyatāṁ sa bhagavānkutrāste parameśvaraḥ
ईश्वर के बिना हम सब और समस्त लोक दुःखी हो रहे हैं; अतः बताइए, वे भगवान परमेश्वर कहाँ हैं?
श्लोक 34 (skanda.6.259.34)
गालव उवाच । ज्ञात्वा मुनिभयत्रस्तं देवेशं शूलपाणिनम् । सुरभीगर्भसंभूतं देवानूचुर्महर्षयः
gālava uvāca jñātvā munibhayatrastaṁ deveśaṁ śūlapāṇinam surabhīgarbhasaṁbhūtaṁ devānūcurmaharṣayaḥ
गालव ने कहा — यह जानकर कि त्रिशूलधारी देवेश, मुनियों के भय से त्रस्त होकर सुरभि के गर्भ में समा गए हैं, महर्षियों ने देवताओं से कहा —
श्लोक 35 (skanda.6.259.35)
स्वागतं देवदेवेभ्यो ज्ञातो वै स महेश्वरः । तत्र गच्छंतु देवेशा यत्र देवः सनातनः
svāgataṁ devadevebhyo jñāto vai sa maheśvaraḥ tatra gacchaṁtu deveśā yatra devaḥ sanātanaḥ
देवगणों का स्वागत है — उस महेश्वर का पता चल गया है; हे देवेशो! वहीं चलें, जहाँ वे सनातन देव विराजमान हैं।
श्लोक 36 (skanda.6.259.36)
इत्युक्त्वा ते महात्मानः सह देवैर्ययुस्तदा । गोलोकं देवमार्गेण यत्र पायसकर्दमाः
ityuktvā te mahātmānaḥ saha devairyayustadā golokaṁ devamārgeṇa yatra pāyasakardamāḥ
ऐसा कहकर वे महात्मा तब देवगणों के साथ देवमार्ग से गोलोक की ओर चले, जहाँ खीर के कीचड़ हैं,
श्लोक 37 (skanda.6.259.37)
घृतनद्योमधु ह्रदा नदीनां यत्र संघशः । पूर्वजानां गणाः सर्वे दधिपीयूषपाणयः
ghṛtanadyomadhu hradā nadīnāṁ yatra saṁghaśaḥ pūrvajānāṁ gaṇāḥ sarve dadhipīyūṣapāṇayaḥ
जहाँ घी की नदियाँ और मधु के सरोवर हैं, जहाँ नदियों के अनेक समूह हैं, और जहाँ पूर्वजों के समस्त गण, दधि और अमृत हाथों में लिए हुए हैं,
श्लोक 38 (skanda.6.259.38)
मरीचिपाः सोमपाश्च सिद्धसंघास्तथा परे । घृतपाश्चैव साध्याश्च यत्र देवाः सनातनाः
marīcipāḥ somapāśca siddhasaṁghāstathā pare ghṛtapāścaiva sādhyāśca yatra devāḥ sanātanāḥ
तथा जहाँ मरीचि-पान करने वाले, सोम-पान करने वाले, सिद्धों के समूह और अन्य, घी-पान करने वाले, साध्यगण तथा सनातन देवगण निवास करते हैं।
श्लोक 39 (skanda.6.259.39)
ते तत्र गत्वा मुनयो ददृशुः सुरभीसुतम् । तेजसा भास्करं चैव नीलनामेति विश्रुतम् । इतस्ततोऽभिधावंतं गवां संघातमध्यगम्
te tatra gatvā munayo dadṛśuḥ surabhīsutam tejasā bhāskaraṁ caiva nīlanāmeti viśrutam itastato'bhidhāvaṁtaṁ gavāṁ saṁghātamadhyagam
वहाँ जाकर उन मुनियों ने सुरभि के पुत्र को देखा — तेज में सूर्य के समान, नील नाम से विख्यात, गौओं के समूह के बीच इधर-उधर दौड़ते हुए।
श्लोक 40 (skanda.6.259.40)
नंदा सुमनसा चैव सुरूपा च सुशीलका । कामिनी नंदिनी चैव मेध्या चैव हिरण्यदा
naṁdā sumanasā caiva surūpā ca suśīlakā kāminī naṁdinī caiva medhyā caiva hiraṇyadā
[उन गौओं में] नंदा, सुमनसा, सुरूपा, सुशीलका, कामिनी, नंदिनी, मेध्या तथा हिरण्यदा थीं,
श्लोक 41 (skanda.6.259.41)
धनदा धर्मदा चैव नर्मदा सकलप्रिया । वामनालंबिका कृष्णा दीर्घशृंगा सुपिच्छिका
dhanadā dharmadā caiva narmadā sakalapriyā vāmanālaṁbikā kṛṣṇā dīrghaśṛṁgā supicchikā
धनदा, धर्मदा, सबकी प्रिय नर्मदा, वामना, अलंबिका, कृष्णा, दीर्घशृंगा तथा सुपिच्छिका भी थीं,
श्लोक 42 (skanda.6.259.42)
तारा तरेयिका शांता दुर्विषह्या मनोरमा । सुनासा दीर्घनासा च गौरा गौरमुखीह या
tārā tareyikā śāṁtā durviṣahyā manoramā sunāsā dīrghanāsā ca gaurā gauramukhīha yā
तारा, तरेयिका, शांता, दुर्विषह्या, मनोरमा, सुनासा, दीर्घनासा, गौरा तथा जो गौरमुखी थी,
श्लोक 43 (skanda.6.259.43)
हरिद्रवर्णा नीला च शंखिनी पंचवर्णका । विनताभिनता चैव भिन्नवर्णा सुपत्रिका
haridravarṇā nīlā ca śaṁkhinī paṁcavarṇakā vinatābhinatā caiva bhinnavarṇā supatrikā
हरिद्रवर्णा, नीला, शंखिनी, पंचवर्णका, विनता, अभिनता, भिन्नवर्णा तथा सुपत्रिका थीं,
श्लोक 44 (skanda.6.259.44)
जयाऽरुणा च कुण्डोध्नी सुदती चारुचंपका । एतासां मध्यगं नीलं दृष्ट्वा ता मुनिदेवताः
jayā'ruṇā ca kuṇḍodhnī sudatī cārucaṁpakā etāsāṁ madhyagaṁ nīlaṁ dṛṣṭvā tā munidevatāḥ
जया, अरुणा, कुण्डोध्नी, सुदती तथा चारुचंपका थीं — इन्हीं के बीच नील को देखकर वे मुनि-देवगण,
श्लोक 45 (skanda.6.259.45)
विचरंति सुरूपं तं संजातविस्मयोन्मुखाः । मुनीश्वराः कृपाविष्टा इन्द्राद्या हृष्टमानसाः । स्तुतिमारेभिरे कर्त्तुं तेजसा तस्य तोषिताः
vicaraṁti surūpaṁ taṁ saṁjātavismayonmukhāḥ munīśvarāḥ kṛpāviṣṭā indrādyā hṛṣṭamānasāḥ stutimārebhire karttuṁ tejasā tasya toṣitāḥ
उस विचरण करते हुए सुंदर बछड़े को देखकर विस्मय से भर उठे; मुनीश्वर करुणा से आर्द्र हो उठे, और इंद्र आदि प्रसन्नचित्त होकर, उसके तेज से संतुष्ट होकर उसकी स्तुति करने लगे।
श्लोक 46 (skanda.6.259.46)
शूद्र उवाच । कथं नीलेति नामासौ जातोयमद्भुताकृतिः । किमस्तुवन्प्रसन्नास्ते ब्राह्मणा विश्वकारणम्
śūdra uvāca kathaṁ nīleti nāmāsau jātoyamadbhutākṛtiḥ kimastuvanprasannāste brāhmaṇā viśvakāraṇam
शूद्र ने कहा — यह अद्भुत आकृति वाला 'नील' नाम से कैसे प्रसिद्ध हुआ? और प्रसन्न हुए उन ब्राह्मणों ने विश्व के कारण की क्या स्तुति की?
श्लोक 47 (skanda.6.259.47)
गालव उवाच । लोहितो यस्तु वर्णेन मुखे पुच्छे च पांडुरः । श्वेतः खुरविषाणेषु स नीलो वृषभः स्मृतः
gālava uvāca lohito yastu varṇena mukhe pucche ca pāṁḍuraḥ śvetaḥ khuraviṣāṇeṣu sa nīlo vṛṣabhaḥ smṛtaḥ
गालव ने कहा — जो वर्ण में लाल है, किंतु मुख और पूँछ में पीत-श्वेत, और खुरों तथा सींगों में श्वेत है, वही नील वृषभ कहा गया है।
श्लोक 48 (skanda.6.259.48)
चतुष्पादो धर्मरूपो नील लोहितचिह्नकः । कपिलः खुरचिह्नेषु स नीलो वृषभः स्मृतः
catuṣpādo dharmarūpo nīla lohitacihnakaḥ kapilaḥ khuracihneṣu sa nīlo vṛṣabhaḥ smṛtaḥ
जो चतुष्पाद, धर्मरूप, नीले तथा लाल चिह्नों वाला और खुरों के चिह्नों में कपिलवर्ण है, वही नील वृषभ कहा गया है।
श्लोक 49 (skanda.6.259.49)
योऽसौ महेश्वरो देवो वृषश्चापि स एव हि । चतुष्पादो धर्मरूपो नीलः पंचमुखो हरः
yo'sau maheśvaro devo vṛṣaścāpi sa eva hi catuṣpādo dharmarūpo nīlaḥ paṁcamukho haraḥ
जो देव महेश्वर हैं, वे ही यह वृषभ भी हैं — चतुष्पाद, धर्मरूप, नीलकंठ तथा पंचमुख हर।
श्लोक 50 (skanda.6.259.50)
यस्य संदर्शनादेव वाजपेयफलं लभेत् । नीले च पूजिते यस्मिन्पूजितं सकलं जगत्
yasya saṁdarśanādeva vājapeyaphalaṁ labhet nīle ca pūjite yasminpūjitaṁ sakalaṁ jagat
जिसके दर्शनमात्र से वाजपेय-यज्ञ का फल मिल जाता है; और जिस नील की पूजा करने पर संपूर्ण जगत की पूजा हो जाती है।
श्लोक 51 (skanda.6.259.51)
स्निग्धग्रासप्रदानेन जगदाप्यायितं भवेत् । यस्य देहे सदा श्रीमान्विश्वव्यापी जनार्दनः । नित्यमर्चयते योऽसौ वेदमन्त्रैः सनातनैः
snigdhagrāsapradānena jagadāpyāyitaṁ bhavet yasya dehe sadā śrīmānviśvavyāpī janārdanaḥ nityamarcayate yo'sau vedamantraiḥ sanātanaiḥ
स्निग्ध चारा देने से समस्त जगत तृप्त हो जाता है; जिसके शरीर में सदा श्रीमान विश्वव्यापी जनार्दन निवास करते हैं, और जो स्वयं भी सनातन वेदमंत्रों से नित्य पूजित होते हैं।
श्लोक 52 (skanda.6.259.52)
ऋषय ऊचुः । त्वं देवः सर्वगोप्तॄणां विश्वगोप्ता सनातनः । विघ्नहर्ता ज्ञानदश्च धर्मरूपश्च मोक्षदः
ṛṣaya ūcuḥ tvaṁ devaḥ sarvagoptṝṇāṁ viśvagoptā sanātanaḥ vighnahartā jñānadaśca dharmarūpaśca mokṣadaḥ
ऋषियों ने कहा — तुम समस्त रक्षकों के देव, विश्व के सनातन रक्षक, विघ्नहर्ता, ज्ञानदाता, धर्मरूप तथा मोक्षदाता हो।
श्लोक 53 (skanda.6.259.53)
त्वमेव धनदः श्रीदः सर्वव्याधिनिषूदनः । जगतां शर्मकरणे प्रवृत्तः कनकप्रदः
tvameva dhanadaḥ śrīdaḥ sarvavyādhiniṣūdanaḥ jagatāṁ śarmakaraṇe pravṛttaḥ kanakapradaḥ
तुम ही धन देने वाले, श्री देने वाले, समस्त व्याधियों के नाशक हो; जगत को सुख देने में तत्पर तथा सुवर्ण देने वाले हो।
श्लोक 54 (skanda.6.259.54)
तेजसां धाम सर्वेषां सौरभेय महाबल । शृंगाग्रे धृतकैलासः पार्वतीसहितस्त्वया
tejasāṁ dhāma sarveṣāṁ saurabheya mahābala śṛṁgāgre dhṛtakailāsaḥ pārvatīsahitastvayā
हे महाबल सुरभि-पुत्र! तुम समस्त तेजों के आश्रय हो; तुम्हारे सींगों के अग्रभाग पर पार्वती-सहित कैलास धारण किया गया है।
श्लोक 55 (skanda.6.259.55)
स्तुत्यो वेदमयो वेदात्मा वेदवित्तमः । वेदवेद्यो वेदयानो वेदरूपो गुणाकरः
stutyo vedamayo vedātmā vedavittamaḥ vedavedyo vedayāno vedarūpo guṇākaraḥ
तुम स्तुत्य, वेदमय, वेदात्मा तथा वेदों के सर्वश्रेष्ठ ज्ञाता हो; वेदों से जानने योग्य, वेद ही जिनका वाहन है, वेदरूप तथा गुणों की खान हो।
श्लोक 56 (skanda.6.259.56)
गुणत्रयेभ्योऽपि परो याथात्म्यं वेद कस्तव । वृषस्त्वं भगवान्देव यस्तुभ्यं कुरुते त्वघम्
guṇatrayebhyo'pi paro yāthātmyaṁ veda kastava vṛṣastvaṁ bhagavāndeva yastubhyaṁ kurute tvagham
तुम त्रिगुणों से भी परे हो — तुम्हारे यथार्थ स्वरूप को कौन जान सकता है? तुम भगवान वृषभ हो; जो तुम्हारे प्रति पाप करता है,
श्लोक 57 (skanda.6.259.57)
वृषलः स तु विज्ञेयो रौरवादिषु पच्यते । यदा स्पृष्टः स तु नरो नरकादिषु यातनाः
vṛṣalaḥ sa tu vijñeyo rauravādiṣu pacyate yadā spṛṣṭaḥ sa tu naro narakādiṣu yātanāḥ
वह वृषल (पतित) जानना चाहिए, जो रौरव आदि नरकों में पकाया जाता है; जब उस पाप से स्पर्शित होता है, तब वह मनुष्य नरक आदि में यातनाएँ —
श्लोक 58 (skanda.6.259.58)
सेवते पापनिचयैर्निगाढप्रायबन्धनैः । क्षुत्क्षामं च तृषाक्रांतं महाभारसमन्वितम्
sevate pāpanicayairnigāḍhaprāyabandhanaiḥ kṣutkṣāmaṁ ca tṛṣākrāṁtaṁ mahābhārasamanvitam
— अपने पाप-समूहों से बने, अत्यंत दृढ़ बंधनों से बद्ध होकर भोगता है — भूख से क्षीण, प्यास से पीड़ित तथा भारी बोझ से युक्त होकर।
श्लोक 59 (skanda.6.259.59)
निर्दया ये प्रशोष्यंति मतिस्तेषां न शाश्वती । चतुर्भिः सहितं मर्त्या विवाहविधिना तु ये
nirdayā ye praśoṣyaṁti matisteṣāṁ na śāśvatī caturbhiḥ sahitaṁ martyā vivāhavidhinā tu ye
जो निर्दयतापूर्वक इसे भूखा रखकर सुखा देते हैं, उनकी बुद्धि स्थिर नहीं रहती; किंतु जो मनुष्य चार अंगों सहित विवाह-विधि से —
श्लोक 60 (skanda.6.259.60)
विवाहं नीलरूपस्य ये करिष्यंति मानवाः । पितॄनुद्दिश्य तेषां वै कुले नैवास्ति नारकी
vivāhaṁ nīlarūpasya ye kariṣyaṁti mānavāḥ pitṝnuddiśya teṣāṁ vai kule naivāsti nārakī
— नीलरूप वृषभ का विवाह करेंगे, अपने पितरों के उद्देश्य से, उनके कुल में कोई भी नरकगामी नहीं होता।
श्लोक 61 (skanda.6.259.61)
त्वं गतिः सर्वलोकानां त्वपिता परमेश्वरः । त्वया विना जगत्सर्वं तत्क्षणादेव नश्यति
tvaṁ gatiḥ sarvalokānāṁ tvapitā parameśvaraḥ tvayā vinā jagatsarvaṁ tatkṣaṇādeva naśyati
तुम समस्त लोकों की गति हो, अपिता (स्वयंभू) परमेश्वर हो; तुम्हारे बिना संपूर्ण जगत उसी क्षण नष्ट हो जाए।
श्लोक 62 (skanda.6.259.62)
परा चैव तु पश्यंती मध्यमा वैखरी तथा । चतुर्विधानां वचसामीश्वरं त्वां विदुर्बुधाः
parā caiva tu paśyaṁtī madhyamā vaikharī tathā caturvidhānāṁ vacasāmīśvaraṁ tvāṁ vidurbudhāḥ
परा, पश्यंती, मध्यमा तथा वैखरी — इन चार प्रकार की वाणियों के भी ईश्वर तुम्हें ही ज्ञानीजन जानते हैं।
श्लोक 63 (skanda.6.259.63)
चतुःशृंगं चतुष्पादं द्विशीर्षसप्तहस्तकम् । त्रिधा बद्धं धर्ममयं त्वामेव वृषभं विदुः
catuḥśṛṁgaṁ catuṣpādaṁ dviśīrṣasaptahastakam tridhā baddhaṁ dharmamayaṁ tvāmeva vṛṣabhaṁ viduḥ
चार सींगों वाले, चार पैरों वाले, दो सिरों वाले, सात हाथों वाले, तीन प्रकार से बद्ध, धर्ममय वृषभ के रूप में वे तुम्हें ही जानते हैं।
श्लोक 64 (skanda.6.259.64)
तृप्तिदं सर्वभूतानां विश्वव्यापकमोजसा । ब्रह्म धर्ममयं नित्यं त्वामात्मानं विदुर्जनाः
tṛptidaṁ sarvabhūtānāṁ viśvavyāpakamojasā brahma dharmamayaṁ nityaṁ tvāmātmānaṁ vidurjanāḥ
समस्त प्राणियों को तृप्ति देने वाले, अपने ओज से विश्व में व्याप्त, धर्ममय नित्य ब्रह्म को — तुम्हें ही लोग अपना आत्मा जानते हैं।
श्लोक 65 (skanda.6.259.65)
अच्छेद्यस्त्वमभेद्यस्त्वमप्रमेयो महायशाः । अशोच्यस्त्वमदाह्योऽसि विदुः पौराणिका जनाः
acchedyastvamabhedyastvamaprameyo mahāyaśāḥ aśocyastvamadāhyo'si viduḥ paurāṇikā janāḥ
तुम अछेद्य, अभेद्य, अप्रमेय तथा महायशस्वी हो; तुम अशोच्य और अदाह्य हो — ऐसा पुराणों के ज्ञाता जन जानते हैं।
श्लोक 66 (skanda.6.259.66)
त्वदाधारमिदं सर्वं त्वदाधारमिदं जगत् । त्वदाधाराश्च देवाश्च त्वदाधारं तथा मृतम्
tvadādhāramidaṁ sarvaṁ tvadādhāramidaṁ jagat tvadādhārāśca devāśca tvadādhāraṁ tathā mṛtam
यह सब तुम्हारे ही आधार पर टिका है, यह जगत तुम्हारे ही आधार पर टिका है; देवगण भी तुम्हारे आधार पर हैं, और मृत्यु भी तुम्हारे ही आधार पर है।
श्लोक 67 (skanda.6.259.67)
जीवरूपेण लोकांस्त्रीन्व्याप्य तिष्ठसि नित्यदा
jīvarūpeṇa lokāṁstrīnvyāpya tiṣṭhasi nityadā
जीव के रूप में तीनों लोकों को व्याप्त करके तुम सदा स्थित रहते हो।
श्लोक 68 (skanda.6.259.68)
एवं स संस्तुतो नीलो विप्रैस्तैः सोमपायिभिः । प्रसन्नवदनो भूत्वा विप्रान्प्रणतितत्परः
evaṁ sa saṁstuto nīlo vipraistaiḥ somapāyibhiḥ prasannavadano bhūtvā viprānpraṇatitatparaḥ
इस प्रकार सोमपायी उन विप्रों द्वारा स्तुति किए गए नील, प्रसन्नवदन होकर, उन विप्रों को प्रणाम करने में तत्पर हुए,
श्लोक 69 (skanda.6.259.69)
पुनरेव वचः प्रोचुर्विप्राः कृतशिवागसः । वरं ददुर्महेशस्य नीलरूपस्य धर्मतः
punareva vacaḥ procurviprāḥ kṛtaśivāgasaḥ varaṁ dadurmaheśasya nīlarūpasya dharmataḥ
और शिव के विरुद्ध अपराध कर चुके उन विप्रों ने पुनः वचन कहे, तथा धर्मानुसार नीलरूप महेश को वरदान दिया —
श्लोक 70 (skanda.6.259.70)
एकादशाहे प्रेतस्य यस्य नोत्सृज्यते वृषः । प्रेतत्वं सुस्थिरं तस्य दत्तैः श्राद्धशतैरपि
ekādaśāhe pretasya yasya notsṛjyate vṛṣaḥ pretatvaṁ susthiraṁ tasya dattaiḥ śrāddhaśatairapi
— कि जिस मृतक के लिए ग्यारहवें दिन वृषभ नहीं छोड़ा जाता, उसका प्रेतत्व सैकड़ों श्राद्ध दिए जाने पर भी अटल बना रहता है।
श्लोक 71 (skanda.6.259.71)
पुनरेव सुसर्पंतं दृष्ट्वा नीलं महावृषम् । स्वल्पक्रोधसमाविष्टं द्विजाश्चक्रुस्तमंकितम्
punareva susarpaṁtaṁ dṛṣṭvā nīlaṁ mahāvṛṣam svalpakrodhasamāviṣṭaṁ dvijāścakrustamaṁkitam
फिर उस महावृषभ नील को घूमते देखकर, कुछ क्रोध से भर उठे द्विजों ने उसे अंकित किया —
श्लोक 72 (skanda.6.259.72)
चक्रं च वामभागेषु शूलं पार्श्वे च दक्षिणे । उत्ससृजुर्गवां मध्ये तं देवैर्गोपितं तदा
cakraṁ ca vāmabhāgeṣu śūlaṁ pārśve ca dakṣiṇe utsasṛjurgavāṁ madhye taṁ devairgopitaṁ tadā
— उसके बाएँ भाग में चक्र और दाहिने पार्श्व में शूल अंकित करके, तब देवताओं द्वारा रक्षित उस वृषभ को गौओं के बीच छोड़ दिया।
श्लोक 73 (skanda.6.259.73)
ततो देवगणाः सर्वे महर्षीणां गणाः पुनः । स्वानि स्थानानि ते जग्मुर्मुनयो वीतमत्सराः
tato devagaṇāḥ sarve maharṣīṇāṁ gaṇāḥ punaḥ svāni sthānāni te jagmurmunayo vītamatsarāḥ
तत्पश्चात् समस्त देवगण तथा महर्षियों के गण, ईर्ष्यारहित होकर, अपने-अपने स्थानों को चले गए।
श्लोक 74 (skanda.6.259.74)
एवमृषीणां दयितासु सक्तः कामार्त्तचित्तो मुनिपुंगवानाम् । शापं समासाद्य शिवोऽपि भक्त्या रेवाजलेऽगात्सुशिलामयत्वम्
evamṛṣīṇāṁ dayitāsu saktaḥ kāmārttacitto munipuṁgavānām śāpaṁ samāsādya śivo'pi bhaktyā revājale'gātsuśilāmayatvam
इस प्रकार श्रेष्ठ मुनियों की प्रिय पत्नियों में आसक्त, काम से पीड़ित-चित्त शिव भी शाप को प्राप्त कर, भक्तिवश रेवा (नर्मदा) के जल में सुंदर शिला के रूप में परिणत हो गए।